गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
प्रेतकल्प ] वृषोत्सर्गकी महिमामें राजा वीरवाहनकी कथा ४८३
स्थित क्रोधसे लाल-लाल नेत्रोंवाले काले पहाड़के समान भयंकर आकृतिसे युक्त यमराजको देखता है। विशाल दाँतोंसे उनका मुखमण्डल बड़ा ही भयानक लगता है। उनकी भ्रू-भंगिमाएँ तनी रहती हैं, जिससे उनकी आकृति भयानक प्रतीत होती है। अत्यन्त विकृत मुखाकृतियोंसे युक्त सैकड़ों व्याधियाँ उनको चारों ओरसे घेरे रहती हैं। उनके एक हाथमें दण्ड और दूसरे हाथमें भैरव-पाश रहता है।
यमलोकमें पहुँचा हुआ जीव यमके द्वारा बतायी गयी शुभाशुभ गतिको प्राप्त करता है। जैसा मैंने तुमसे पहले कहा है, उसी प्रकारकी पापात्मक गति पापी जीवको प्राप्त होती है। जो लोग छत्र, पादुका और घरका दान देते हैं, जो लोग पुण्यकर्म करते हैं, वे वहाँपर पहुँचकर सौम्य स्वरूपवाले, कानोंमें कुण्डल और सिरपर मुकुट धारण किये हुए शोभासम्पन्न यमराजका दर्शन करते हैं।
चूँकि वहाँ जीवको बहुत भूख लगती है, इसलिये एकादशाह, द्वादशाह, षण्मास तथा वार्षिक तिथिपर बहुत-से ब्राह्मणोंको भोजन कराना चाहिये। हे खगश्रेष्ठ ! जो व्यक्ति पुत्र, स्त्री तथा अन्य सगे-सम्बन्धियोंके द्वारा कहे गये उनके स्वार्थको ही जीवनपर्यन्त सिद्ध करता है और अपने परलोकको बनानेके लिये पुण्यकर्म नहीं करता, वही अन्तमें कष्ट प्राप्त करता है।
हे गरुड ! मृत्युके पश्चात् संयमनीपुरको जानेवाले प्राणीकी जो गति होती है और वर्षपर्यन्त जो कृत्य किये जाते हैं, उसको मैंने कहा। अब और क्या सुनना चाहते हो ? (अध्याय ५)
वृषोत्सर्गकी महिमामें राजा वीरवाहनकी कथा, देवर्षि नारदके पूर्वजन्मके इतिहासवर्णनमें सत्संगति और भगवद्भक्तिका माहात्म्य, वृषोत्सर्गके प्रभावसे राजा वीरवाहनको पुण्यलोककी प्राप्ति
गरुडने कहा— हे प्रभो! जो तीर्थ-सेवन और दानमें निरन्तर लगा है तथा अन्य साधनोंसे भी सम्पन्न है, उसे भी वृषोत्सर्ग किये बिना परलोकमें सद्गति नहीं प्राप्त होती। इसलिये मनुष्यको वृषोत्सर्ग अवश्य करना चाहिये। ऐसा मैंने आपसे सुन लिया। इस वृषोत्सर्गका फल क्या है? प्राचीन समयमें इस यज्ञको किसने किया? इसमें किस प्रकारका वृष होना चाहिये? विशेष रूपसे इस कार्यको किस समय करना चाहिये और इसको करनेकी कौन-सी विधि बतायी गयी है? यह सब बतानेकी कृपा करें।
श्रीकृष्णने कहा— हे खगेश्वर! मैं उस महापुण्यशाली इतिहासका वर्णन कर रहा हूँ, जिसका वर्णन ब्रह्माके पुत्र महर्षि वसिष्ठने राजा वीरवाहनसे किया था।
प्राचीन समयकी बात है, विराधनगरमें वीरवाहन नामक एक धर्मात्मा, सत्यवादी, दानशील और विप्रोंको संतुष्ट करनेवाले राजा रहते थे। किसी समय वे शिकार खेलनेके लिये वनमें गये। कुछ पूछनेकी जिज्ञासासे वे वसिष्ठमुनिके आश्रममें जा पहुँचे। वहाँ आसन ग्रहण कर विनम्रतासे झुके हुए राजाने ऋषियोंकी संसदमें मुनिको नमस्कार करके पूछा।
राजाने कहा— हे मुने! मैंने यथाशक्ति प्रयत्नपूर्वक अनेक धार्मिक कृत्य किये हैं, फिर भी यमराजके कठोर शासनको सुनकर मैं हृदयमें बहुत ही भयभीत
| ४८४ | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ धर्मकाण्ड— |
|---|
हूँ। हे कृपानिधान! महाभाग! ऋषिवर! मुझे यम, यमदूत और देखनेमें अतिशय भयंकर लगनेवाले नरकलोकोंको न देखना पड़े, ऐसा कोई उपाय बतानेकी कृपा करें।
वसिष्ठने कहा— हे राजन्! शास्त्रवेत्ता अनेक प्रकारके धर्मोंका वर्णन करते हैं, किंतु कर्ममार्गसे विमोहित जन सूक्ष्मतया उनको नहीं जानते। दान, तीर्थ, तपस्या, यज्ञ, संन्यास तथा पितृक्रिया आदि सभी धर्म हैं, उन धर्मोंमें भी वृषोत्सर्गका विशेष महत्त्व है। मनुष्यको बहुत-से पुत्रोंकी अभिलाषा करनी चाहिये। यदि उनमेंसे एक भी पुत्र गया-तीर्थमें जाय, अश्वमेधयज्ञ करे अथवा नील वृषभ यथाविधि छोड़े तो जाने-अनजाने किये गये ब्रह्महत्या आदि पाप भी विनष्ट हो जाते हैं। यह शुद्धि नील वर्णके वृषभका उत्सर्ग अथवा समुद्रमें स्नान करनेसे भी हो सकती है। हे राजेन्द्र! जिसके एकादशाहमें वृषोत्सर्ग नहीं होता, उसका प्रेतत्व स्थिर ही रहता है। मात्र श्राद्ध करनेसे क्या लाभ होगा ? जिस-किसी भाँति नगर अथवा तीर्थमें वृषोत्सर्ग अवश्य करना चाहिये।
हे खगेश! वृष-यज्ञके द्वारा प्रेतत्वसे मुक्ति प्राप्त होती है, अन्य साधनोंसे नहीं। जो वृषभ शुभ लक्षणोंसे समन्वित युवा तथा कृष्ण गल-कम्बलवाला हो और सदैव जो गायोंके झुंडमें घूमनेवाला हो, उस वृषभको विधि-विधानसे चार अथवा दो या एक बछियाके साथ पहले उसका विवाह करना चाहिये। तदनन्तर माङ्गलिक द्रव्यों एवं मन्त्रोंके साथ उन सबका उत्सर्ग किया जाय। 'इहरतीति०* इन छः मन्त्रोंसे अग्निदेवको आहुति देनी चाहिये। कार्तिक, माघ और वैशाखकी पूर्णिमा, संक्रान्ति, अन्य पुण्यकाल, व्यतिपात तथा तीर्थमें और पिताकी क्षयतिथि वृषोत्सर्गके लिये विशेष रूपसे प्रशस्त मानी जाती है। 'जो वृषभ लाल वर्णका हो और उसका मुँह-पूँछ पाण्डु (श्वेत-पीतमिश्रित) हो, खुर और सींगोंका वर्ण पीत हो, वह नीलवृषभ कहा जाता है'—
लोहितो यस्तु वर्णेन मुखे पुच्छे च पाण्डुरः॥
<p align="right">(६। १९-२०)</p>
पीतः खुरविषाणेषु स नीलो वृष उच्यते।
जो वृषभ श्वेत वर्णका होता है वह ब्राह्मण है, जो लोहित वर्णका है वह क्षत्रिय है, जो पीत वर्णका है वह वैश्य है और जो कृष्ण वर्णका है वह शूद्र है। अतः ब्राह्मण, क्षत्रिय एवं वैश्य वर्णको अपने वर्णके अनुसार वृषोत्सर्ग करना चाहिये अथवा रक्तवर्णका ही वृषभ सबके लिये कल्याणप्रद है।
पिता, पितामह तथा प्रपितामह पुत्रके उत्पन्न होनेपर यही आशा करते हैं कि यह मेरे लिये वृषोत्सर्ग करेगा। वृषोत्सर्गके समय इस प्रकार प्रार्थना करनी चाहिये—
धर्मस्त्वं वृषरूपेण जगदानन्ददायकः॥
<p align="right">(६। २३—२५)</p>
अष्टमूर्तेरधिष्ठानमतः शान्तिं प्रयच्छ मे।
गङ्गायमुनयोः पेयमन्तर्वेदि तृणं चर॥
धर्मराजस्य पुरतो वाच्यं मे सुकृतं वृष।
हे धर्म! आप इस वृषभरूपमें संसारको आनन्द प्रदान करनेवाले देव हैं। आप ही अष्टमूर्ति शिवके अधिष्ठान हैं। अतः मुझे शान्ति प्रदान करें। आप गङ्गा-यमुनाका जल पियें। अन्तर्वेदीमें घास चरें और हे वृष! धर्मराजके सामने मेरे पुण्यकर्मकी चर्चा करें।
इस प्रकारका निवेदन करते हुए संस्कार्ताको चाहिये कि वृषभके दाहिने कन्धेपर त्रिशूल और
* ॐ इह रतिः स्वाहा इदमग्नये। ॐ इह रमध्वं स्वाहा इदमग्नये। ॐ इह धृतिः स्वाहा इदमग्नये। ॐ इह स्वधृतिः स्वाहा इदमग्नये। ॐ उपसृजन् धरुणं मात्रे धरुणो मातरं धयन् स्वाहा इदमग्नये। ॐ रायस्पोषमस्मासु दीधरत् स्वाहा इदमग्नये। (यजु० ८। ५१)
प्रेतकल्प ] वृषोत्सर्गकी महिमामें राजा वीरवाहनकी कथा ४८५
बायें ऊरुभागमें चक्रका चिह्न अंकित करके गन्ध, पुष्प तथा अक्षत आदिसे बछियाके सहित उस वृषभकी पूजा करके विधिवत् बन्धनमुक्त कर दे।
वसिष्ठजीने कहा—हे राजन्! आप भी विधिवत् वृषोत्सर्ग करें, अन्यथा सभी साधनोंसे सम्पन्न होनेपर भी आपको सद्गति नहीं प्राप्त हो सकती है। राजन्! पहले त्रेतायुगमें विदेहनगरमें धर्मवत्स नामका एक ब्राह्मण था, जो अपने वर्णानुसार कर्ममें अहर्निश निरत, विद्वान्, विष्णुभक्त, अत्यन्त तेजस्वी और यथालाभसे संतुष्ट रहता था। एक बार पितृपर्वके आनेपर वह कुश लेनेके लिये वनमें गया। वहाँ इधर-उधर घूमता हुआ वह कुश और पलाशके पत्तोंको एकत्र करने लगा। एकाएक वहाँपर देखनेमें अत्यन्त सुन्दर चार पुरुष आये और उस ब्राह्मणको पकड़कर आकाशमार्गसे लेकर चले गये। वे चारों पुरुष उस दीन, व्यथित ब्राह्मणको पकड़कर बहुत-से वृक्षोंवाले घनघोर वन, पर्वतोंके दुर्गोंको पार कराते हुए एक वनसे दूसरे वनके मध्य ले गये। हे राजन्! वहाँपर उस ब्राह्मणने एक बहुत बड़ा नगर देखा। वह नगर मुख्यद्वारसे समन्वित तथा अनेक प्रासादोंसे सुशोभित हो रहा था। चबूतरा, बाजार, खरीदी-बेची जानेवाली वस्तुओं और नर-नारीसे युक्त उस नगरमें तुरहियोंकी ध्वनि हो रही थी। वीणा और नगाड़े बज रहे थे। वहाँ कुछ भूखसे पीड़ित, दीन-हीन, पुरुषार्थसे रहित लोगोंको भी उसने देखा। उसके बाद अत्यन्त मैले-कुचैले, फटे-पुराने वस्त्रोंको पहने हुए लोग दिखायी पड़े। आगे हृष्ट-पुष्ट स्वर्णाभूषणसे अलंकृत सुन्दर-सुन्दर वस्त्र धारण किये हुए कुछ ऐसे लोग थे, जो देवताओंके समान शोभासम्पन्न थे; जिनको देखकर वह विस्मयाभिभूत हो उठा। वह सोचने लगा कि क्या मैं स्वप्न देख रहा हूँ? अथवा यह कोई माया है? या मेरे मनका यह विभ्रम है? वह ब्राह्मण इस प्रकारकी शंका कर ही रहा था कि वे चारों पुरुष उसको लेकर राजाके पास गये। स्वर्णजटित उस राजप्रासादके बीच स्थित राजाको वह ब्राह्मण एकटक देखता ही रह गया। वहाँपर एक महादिव्य सिंहासन था, जहाँ छत्र और चँवर डुलाये जा रहे थे। उसके ऊपर स्वर्णनिर्मित मुकुट धारण किया हुआ महान् शोभा-सम्पन्न राजा बैठा हुआ था। वन्दीजन उसका गुणगान कर रहे थे।
राजा उस ब्राह्मणको देखकर खड़ा हो गया और उसने मधुपर्क तथा आसनादि प्रदान कर उनकी विधिवत् पूजा की। तत्पश्चात् अत्यन्त प्रसन्नचित्त होकर वह राजा उन विप्रदेवसे इस प्रकार कहने लगा—हे प्रभो! आज आप-जैसे धर्मपरायण विष्णुभक्तका दर्शन हुआ है, इससे मेरा जन्म सफल हो गया। मेरा यह कुल भी पवित्र हो उठा। तदनन्तर राजाने उस ब्राह्मणको प्रणाम किया और बहुत प्रकारसे उनको संतुष्ट करके अपने दूतोंसे कहा—हे दूतो! ये ब्राह्मणदेव जहाँसे आये हुए हैं, पुनः तुम सब इन्हें वहीं ले जाकर पहुँचा आओ। ऐसा सुनकर उन ब्राह्मणश्रेष्ठने राजासे पूछा—
हे राजन्! यह कौन-सा देश है? यहाँपर ये उत्तम, मध्यम और अधम चरित्रवाले लोग कहाँसे आये हुए हैं? आप किस पुण्यके प्रभावसे यहाँ इन सबके बीच प्रधान पदपर विराजमान हैं? मुझको यहाँ किसलिये लाया गया और फिर क्यों वापस भेजा जा रहा है? यह सब स्वप्नके समान मुझे अनोखा दिखायी दे रहा है!
इसपर राजाने कहा—हे विप्रदेव! अपने धर्मका पालन करते हुए जो मनुष्य सदैव भगवान् हरिकी भक्तिमें अनुरक्त और इन्द्रियोंके विषयसे परे रहता है, वह मेरे लिये निश्चित ही पूज्य है। नित्य जो
| ४८६ | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ धर्मकाण्ड - |
|---|
प्राणी तीर्थोंकी यात्रा करनेमें ही लगा रहता है, जो वृषोत्सर्गके माहात्म्यको भलीभाँति जानता है और जो सत्य एवं दान-धर्मका पालक है, वह व्यक्ति देवताओंके लिये भी प्रणम्य है। हे परंतप ! हे पूजार्ह ! आपका दर्शन हम सभी प्राप्त कर सकें, इसलिये आपको यहाँ लाया गया था। हे देव ! आप मुझपर प्रसन्न हों और मुझे इस साहसके लिये क्षमा करें। मैं स्वयं अपने सम्पूर्ण चरित्रका वर्णन करनेमें समर्थ नहीं हूँ। इस वृत्तान्तका वर्णन मेरा यह विपश्चित् नामवाला मन्त्री करेगा। राजाका वह मन्त्री सब वेदोंको जाननेवाला विद्वान् व्यक्ति था। अतः अपने स्वामीकी हार्दिक इच्छाको जानकर वह कहने लगा—
हे विप्र ! यह राजा पूर्वजन्ममें द्विज और देवताओंसे सुशोभित विराधनगरमें विश्वम्भर नामका एक वैश्य था। ऐसा मैंने सुना है। वैश्य-वृत्तिसे जीवनयापन करते हुए वह अपने परिवारका पालन करता था। नित्य गायोंकी सेवा तथा ब्राह्मणोंकी पूजा भी करता था। सत्पात्रको दान, अतिथिसेवा तथा अग्निहोत्र करना उसका नित्य धर्म था। सत्यमेधा नामकी पत्नीके साथ उसने विधिवत् गृहस्थाश्रमका संचालन किया। उसने स्मार्त कर्मके अनुष्ठानसे सभी लोकों तथा श्रौत कर्मोंसे देवताओंको जीत लिया था।
किसी समय जब वह वैश्य अपने भाइयोंके साथ बहुत-से तीर्थोंकी यात्रा कर अपने घर लौट रहा था, तब मार्गमें ही उसे लोमश ऋषिका दर्शन हो गया। उसने महर्षिके चरणोंमें दण्डवत् प्रणाम किया। हाथ जोड़कर विनयावनत खड़े उस वैश्यसे करुणाके सागर महर्षि लोमशने पूछा—
हे भद्रपुरुष ! ब्राह्मणों और अपने भाई-बन्धुओंके साथ आप कहाँसे आ रहे हैं? धर्मप्राण ! आपको देखकर मेरा मन आर्द्र हो उठा है।
इसपर विश्वम्भर वैश्यने उत्तर दिया— मुनिवर ! यह शरीर नश्वर है। मृत्यु प्राणीके सामने ही खड़ी रहती है—ऐसा जानकर अपनी धर्मपरायणा पत्नीके साथ मैं तीर्थयात्रामें गया था। तीर्थोंका विधिवत् दर्शन एवं प्रचुर धन-दान कर मैं अपने घरकी ओर वापस जा रहा था कि सौभाग्यवश आपका दर्शन हो गया।
लोमशने कहा—इस भारतवर्षकी पावन भूमिमें बहुत-से तीर्थ हैं। आपने जिन तीर्थोंकी यात्रा की है, उनका वर्णन मुझसे करें।
वैश्यने कहा—हे ऋषिवर ! जहाँ गङ्गा, यमुना और सरस्वती नामक पवित्रतम नदियाँ एक साथ मिलकर प्रवाहित होती हैं, जहाँ ब्रह्मा तथा देवराज इन्द्रने दशाश्वमेध-यज्ञ किया था उस तीर्थराज प्रयाग; जहाँ करुणानिधान देवदेवेश्वर शिव प्राणियोंके कानमें 'तारकमन्त्र' का उपदेश देते हैं उस मोक्षदायिनी काशी; पुलहाश्रम, फल्गुतीर्थ, गण्डकी, चक्रतीर्थ, नैमिषारण्य, शिवतीर्थ, अनन्तक, गोप्रतारक, नागेश्वर, विन्दुसरोवर, मोक्षदायक राजीवलोचन भगवान् रामसे सुशोभित अयोध्या; अग्नितीर्थ, वायुतीर्थ, कुबेरतीर्थ, कुमारतीर्थ, सूकरक्षेत्र, भगवान् कृष्णसे अलंकृत मथुरा; पुष्कर, सत्यतीर्थ, ज्वालातीर्थ, दिनेश्वरतीर्थ, इन्द्रतीर्थ, पश्चिमवाहिनी सरस्वती तथा कुरुक्षेत्र जाकर मैंने दर्शन किया। उसके बाद मैं ताप्ती, पयोष्णी, निर्विन्ध्या, मलय, कृष्णवेणी, गोदावरी, दण्डकवन, ताम्रचूड, सदोदक और द्यावाभूमीश्वर तीर्थको देखकर पर्वतराज श्रीशैल पहुँचा। तदनन्तर महातेजस्वी भगवान् हरि स्वयं जहाँ श्रीरङ्ग नामसे निवास करते हैं, जहाँ महिषासुरमर्दिनी दुर्गा वेंकटी नामसे पुकारी जाती हैं, उस वेंकटाचलकी यात्रा मेरे द्वारा की गयी। तत्पश्चात् चन्द्रतीर्थ, भद्रवट, कावेरी, कुटिलाचल, अवटोदा, ताम्रपर्णी, त्रिकूट, कोल्लकगिरि, वसिष्ठतीर्थ,
२२३- और्ध्वदेहिक क्रियाके अधिकारी तथा जीवित-श्राद्धकी संक्षिप्त विधि
प्रेतकल्प ] वृषोत्सर्गकी महिमामें राजा वीरवाहनकी कथा ४८७
ब्रह्मतीर्थ, ज्ञानतीर्थ, महोदधि, हृषीकेश, विराज, विशाल और नीलाद्रि (जगन्नाथपुरी), भीमकूट, श्वेतगिरि, रुद्रतीर्थ तथा जहाँ तपस्या करके पार्वतीने भगवान् शिवका पतिरूपमें वरण किया था, उस उमावन तीर्थकी मैंने यात्रा की। साथ ही वरुणतीर्थ, सूर्यतीर्थ, हंसतीर्थ तथा महोदधि तीर्थकी यात्रा हुई, जहाँ स्नान करके काकोला (पहाड़ी कौआ) भी राजहंस बन जाता है, जहाँ स्नान मात्र करके एक राक्षसने देवत्व पद प्राप्त कर लिया था। उसके बाद विश्वरूप, वन्दितीर्थ, रत्नेश तथा कुहकाचल तीर्थ गया, जहाँ नरनारायणका दर्शन करके मनुष्य करोड़ों पापसे मुक्त हो जाता है। सरस्वती, दृषद्वती और नर्मदा नामक मनुष्योंके लिये कल्याणकारिणी नदियोंकी मैंने यात्रा की। भगवान् नीलकण्ठ, महाकाल, अमरकण्टक, चन्द्रभागा, वेत्रवती, वीरभद्र, गणेश्वर, गोकर्ण, बिल्वतीर्थ, कर्मकुण्ड और सतारक तीर्थोंमें जाकर आपकी कृपासे मैं अन्य तीर्थोंमें भी गया जहाँ मात्र स्नान करके मनुष्य कर्मबन्धनसे मुक्त हो जाता है।
हे मुने ! साधुजनोंकी जो कृपा है, वह प्राणियोंमें कल्याणकारिणी बुद्धिको जन्म देती है। एक ओर तो सभी तीर्थ हैं और दूसरी ओर करुणापूर्ण साधुजन प्राणियोंके कल्याणका उनपर कृपा करनेका व्रत धारण कर वे इतस्ततः परिभ्रमण करते रहते हैं—
उत्पद्यते शुभा बुद्धिः साधूनां यदनुग्रहः।
एकतः सर्वतीर्थानि करुणाः साधवोऽन्यतः॥
अनुग्रहाय भूतानां चरन्ति चरितव्रताः।
(६।७७-७८)
हे प्रभो ! आप सभी वर्णोंके गुरु हैं तथा विद्या एवं वयमें श्रेष्ठ हैं। अतः मैं आपसे उस आधिभौतिक स्वरूपके विषयमें पूछ रहा हूँ, जो चिरंतन कालसे चला आ रहा है। मैं क्या करूँ? किससे पूछूँ? मेरा मन अत्यन्त चञ्चल हो उठा है। यह ब्रह्मके विषयमें तो निस्पृह रहता है, पर विषयोंमें अति लालायित है। यह रंचमात्र भी उस अज्ञानरूपी अन्धकारका विछोह सहन नहीं कर सकता है। हे विप्रदेव ! कर्मोंका जो श्रेष्ठतम क्षेत्र है, वह अनेक प्रकारके भावोंसे व्यामोहित है। ज्ञानसम्पन्न व्यक्तिके पास जिस प्रकारसे शान्ति आ जाती है, विवेकवान् श्रेष्ठ मनुष्य जिस प्रकार अन्तर्बाह्य दोनों स्थितियोंमें शुद्धताको प्राप्त कर लेता है वह सब मुझे बतानेकी कृपा करें।
ऋषिने कहा—हे वैश्यवर्य ! यह मन अत्यन्त बलवान् है। यह नित्य ही विकारयुक्त स्वभाववाला है। तथापि जैसे पीलवान मतवाले हाथीको भी वशमें कर लेता है वैसे ही सत्संगतिसे, आलस्यरहित होकर साधन करके, तीव्र भक्तियोगसे तथा सद्धिचारके द्वारा अपने मनको वशमें कर लेना चाहिये। इस सम्बन्धमें तुम्हें विश्वास हो जाय, इसलिये मैं एक इतिहास बता रहा हूँ, जो नारदके पूर्वजन्मके जीवनवृत्तसे जुड़ा हुआ है, जिसको स्वयं उन्होंने ही मुझसे कहा था।
नारदजीने मुझसे कहा—हे मुने ! मैं प्राचीनकालमें किसी श्रेष्ठ ब्राह्मणका दासीपुत्र था। वहींपर मुझे महान् पुण्यात्माओंकी सत्संगति प्राप्त करनेका सुअवसर भी मिला। एक बार वर्षाकालमें भाग्यवश मेरे घर साधुजन ठहरे हुए थे। मेरे द्वारा विनम्रतापूर्वक बराबर की गयी सेवासे अत्यन्त संतुष्ट होकर उन लोगोंने मुझे उपदेश दिया था, जिसके प्रभावसे मेरी बुद्धि निर्मल और हितैषिणी बन गयी, जिससे अब मैं अपनेमें ही सबको विष्णुमय देखता हूँ।
मुनियोंने नारदजीसे कहा—हे वत्स ! तुम सुनो। हम सब तुम्हारे हितमें कह रहे हैं, जिसको स्वीकार कर तदनुसार जीवनयापन करनेवाला प्राणी इस लोक और परलोक दोनोंमें सुख प्राप्त
| ४८८ | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ धर्मकाण्ड- |
|---|
करता है। इस संसारमें अनेक प्रकारके देवता, पक्षी तथा मनुष्यादिकी योनियाँ हैं, जो कर्मपाशमें बँधी हुई हैं। वे सदैव पृथक्-पृथक् रूपसे कर्मफलोंका भोग करते हुए सत्त्वगुणसे देवत्व, रजोगुणसे मनुष्यत्व और तमोगुणसे तिर्यक् योनि प्राप्त करते हैं। वासनामें आबद्ध बुद्धिहीन प्राणी माताके गर्भसे बार-बार जन्म लेकर मृत्युका वरण करता है। इस प्रकार उन असंख्य योनियोंमें जाकर वह कभी दैवयोगसे ही मनुष्यकी दुर्लभ योनिको प्राप्त कर, महात्माओंकी कृपासे भगवान् हरिको जानकर तथा अपार भवसागरको रोगरूपी ग्राह और मोहरूपी पाशसे युक्त समझकर मुक्त हो जाता है। इस भवसागरको पार करनेके इच्छुक प्राणीके लिये राम-नाम-स्मरणके अतिरिक्त अन्य कोई साधन हमें दिखायी नहीं देता है। जैसे दहीका मन्थन करनेसे नवनीत और काष्ठका मन्थन करनेसे अग्नि प्राप्त होती है, वैसे ही आत्ममन्थन कर उस परमात्माको जो प्राणी जान लेता है, वह सुखी हो जाता है।
यह आत्मा नित्य, अव्यय, सत्य, सर्वगामी, सभी प्राणियोंमें अवस्थित और महान् है। यह अप्रमेय है। यह स्वयंमें ज्योतिस्वरूप एवं मनसे भी अग्राह्य है। यह वह तत्त्व है, जो सच्चिदानन्दरूप है और सभी प्राणियोंके हृदयमें विराजमान रहता है। भावोंके विनष्ट हो जानेपर भी कभी विनष्ट नहीं होता है। जिस प्रकार आकाश सभी प्राणियोंमें, तेज जलमें तथा वायु सभी पार्थिव पदार्थोंमें स्थित है, उसी प्रकार आत्मा सर्वत्र व्याप्त और निर्लेप है। भक्तोंपर कृपादृष्टि रखनेवाले भगवान् हरि साधुओंकी रक्षा करनेके लिये अवतरित होते हैं। यद्यपि वे निर्गुण हैं, फिर भी अज्ञानियोंको गुणवान् प्रतीत होते हैं। जो व्यक्ति इस प्रकारकी ज्ञानवती बुद्धिसे अपने हृदयमें उस परमात्माका चिन्तन करता है, उसके भक्तियोगसे संतुष्ट होकर वे अजन्मा पुरुष परमात्मा उसको अपना दर्शन देते हैं। तत्पश्चात् वह भक्त कृतार्थ हो जाता है और सर्वदा सर्वत्र निष्कामभावसे बना रहता है। अतः बन्धनयुक्त इस शरीरमें अहंकारका परित्याग करके स्वप्नप्राय संसारमें ममता और आसक्तिसे रहित होकर संचरण करे। स्वप्नमें धैर्य कहाँ स्थिर रहता है? इन्द्रजालमें कहाँ सत्यता होती है? शरत्कालके मेघमें कहाँ नित्यता रहती है? वैसे ही शरीरमें सत्यता कहाँ रहती है? यह दृश्यमान समस्त चराचर जगत् अविद्या-कर्मजनित है। ऐसा जानकर तुम्हें आचारवान् योगी बनना चाहिये। उससे तुम सिद्धि प्राप्त कर सकते हो।
इस प्रकारका उपदेश देकर वे सभी दीन-हीन प्राणियोंपर वात्सल्य-भाव रखनेवाले साधु वहाँसे चले गये। तदनन्तर मैं (नारद) उनके द्वारा बताये गये मार्गसे उसी प्रकारका आचरण प्रतिदिन करता रहा। कुछ ही समयके पश्चात् मैंने अपने अन्तःकरणमें यह एक आश्चर्यजनक दृश्य देखा कि शरत्कालीन चन्द्रमाके समान निर्मल, प्रतिक्षण आनन्द प्रदान करनेवाला अद्भुत प्रकाशपुञ्ज प्रज्वलित हो रहा है। वह महातेज मुझे प्रचुर सुखसे सींचकर (अपने प्रति) अधिक स्पृहायुक्त बनाकर आकाशमें विद्युत्की भाँति अन्तर्हित हो गया। भक्तिपूर्वक मैं उस अनोखे ज्योतिपुञ्जका ध्यान करता हुआ समय आनेपर अपना शरीर छोड़कर विष्णुलोक चला गया।
हे ब्रह्मन्! उन्हीं प्रभुकी इच्छासे पुनः मेरा जन्म ब्रह्मासे हुआ। उन भगवान्की कृपासे ही मैं आज अनासक्त रहकर तीनों लोकोंमें बार-बार वीणा बजाते और गीत गाते हुए घूमता रहता हूँ।
अपना ऐसा अनुभव बताकर मुनि नारद मेरे पाससे मनोनुकूल दिशामें चले गये। उनकी उस बातसे मुझको बड़ा ही आश्चर्य हुआ और बहुत संतोष भी मिला।
२२४- राजा बभ्रुवाहनकी कथा, राजाद्वारा प्रेतके निमित्त की गयी और्ध्वदेहिक क्रिया एवं वृषोत्सर्गसे प्रेतका उद्धार
प्रेतकल्प ] वृषोत्सर्गकी महिमामें राजा वीरवाहनकी कथा ४८९
अतः सत्संगति तथा भगवद्भक्तिसे तुम्हारा विशुद्ध, निर्मल और शान्त स्वभाववाला मन सुखी हो जायगा। हे धर्मज्ञ! साधुसंगति होनेपर अनेक जन्मोंमें किया गया पाप शीघ्र ही उसी प्रकार विनष्ट हो जाता है, जैसे शरत्कालके आनेपर बरसात समाप्त हो जाती है—
अतस्ते साधुसङ्गत्या भक्त्या च परमात्मनः॥
विशुद्धं निर्मलं शान्तं मनो निर्वृतिमेष्यति।
अनेकजन्मजनितं पातकं साधुसङ्गमे॥
क्षिप्रं नश्यति धर्मज्ञ जलानां शरदो यथा।
(६।१११-११३)
वैश्यने कहा—हे ऋषिराज! आपके इस वाक्यामृत-रसपानसे मेरे अन्तःकरणको शान्ति मिल गयी। आज आपके इस दर्शनसे मेरी समस्त तीर्थयात्राका फल प्रकट हो उठा है।
यह सुनकर लोमशजीने कहा—हे राजेन्द्र! धर्म, अर्थ और काम—इस त्रिवर्गके फलकी इच्छा करनेवाले तुम्हारे हितमें यह मानता हूँ कि वृषोत्सर्गके बिना जो बहुत-से सत्कर्म तुमने किये हैं, वे सब ओसकणोंके रूपमें पृथ्वीपर गिरे हुए जलके समान कुछ भी कल्याण करनेकी सामर्थ्य नहीं रखते हैं। इस पृथ्वीतलपर वृषोत्सर्गके सदृश हितकारी कोई साधन नहीं है। इस श्रेष्ठकर्मको करनेवाले लोग अनायास पुण्यात्माओंकी सद्गति प्राप्त कर लेते हैं। वृषोत्सर्ग-कर्म जिसने किया है वह व्यक्ति और जो अश्वमेधयज्ञका कर्ता है, मेरी दृष्टिमें दोनों समान हैं। वे दोनों दिव्य शरीर प्राप्त करके इन्द्रदेवका सांनिध्य ग्रहण करते हैं। अतः तुम पुष्करतीर्थमें जाकर वृषोत्सर्ग-कर्मको सम्पन्न करो। हे साधु! उसके बाद ही तुम अपने घर जाओ, जिससे कि इस तीर्थ-यात्राका समस्त कृत्य भलीभाँति पूर्ण हो जाय।
विपश्चित्ने कहा—इसके बाद वह वैश्य यज्ञको पूर्ण करनेवाले वराहरूपी भगवान् जहाँ विद्यमान हैं, उस श्रेष्ठ पुष्करतीर्थमें गया और उसने कार्तिक पूर्णिमाके दिन ऋषिश्रेष्ठने जैसा कहा था, उस वृषोत्सर्ग-कर्मको विधिवत् सम्पन्न किया। इसके बाद लोमश ऋषिकी संगतिसे वह बहुत-से तीर्थोंमें गया। अधिक पुण्य नील (वृष)-विवाहसे उसको प्राप्त हुआ था। श्रेष्ठ विमानपर चढ़कर दिव्य विषयोंको भोगनेके बाद उसका वीरसेनके राजकुलमें जन्म हुआ। इस जन्ममें उसको वीरपञ्चानन नामकी ख्याति प्राप्त हुई। वह धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—इस पुरुषार्थ चतुष्टयका एक अद्वितीय साधक था। वृषोत्सर्ग करते समय वहाँ जो नौकर-चाकर उपस्थित थे, वे भी गायकी पूँछके तर्पणके छींटोंका स्पर्श करके दिव्य रूप हो गये। जो दूरसे ही इस कार्यको देख रहे थे, वे लोग हृष्ट-पुष्ट हो गये और उनका स्वरूप कान्तिसे चमक उठा। इसके अतिरिक्त जो लोग इस सत्कर्मके भू-भागसे बहुत दूर थे, वे मलिन दिखायी दे रहे थे। वृषोत्सर्ग न देखते हुए जो लोग उसकी निन्दा करनेवाले थे, वे अभागे, दीन-हीन और व्यवहार आदिमें रूक्ष, कृश और वस्त्रविहीन हो गये। हे द्विज! मैंने भगवान् पराशरसे पूर्वजन्मसे सम्बद्ध इस राजाका अद्भुत और धार्मिक जो वृत्तान्त सुना था, उसका वर्णन आपसे कर दिया। इसलिये आप मेरे ऊपर कृपा करके अब अपने घर लौट जायें। मन्त्रीके ऐसे वाक्योंको सुनकर वे ब्राह्मण अत्यधिक आश्चर्यचकित हो उठे। तदनन्तर राजसेवकोंके द्वारा उन्हें घरपर पहुँचा दिया गया।
वसिष्ठने कहा—हे राजन्! सभी कर्मोंमें वृषोत्सर्ग-कर्म श्रेष्ठतम है। अतः आप यदि यमराजसे भयभीत हैं तो यथाविधि वृषोत्सर्ग-कर्म ही करें।
हे राजश्रेष्ठ! वृषोत्सर्गके अतिरिक्त अन्य कोई भी ऐसा साधन नहीं है जो मनुष्यको
| ४९० | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ धर्मकाण्ड— |
|---|
स्वर्ग-प्राप्तिकी सिद्धि प्रदान कर सके—
वृषोत्सर्गसमं किञ्चित् साधनं न दिवः परम्।
(६।१३०)
आपको मैंने धर्मका रहस्य बता दिया है। यदि पति-पुत्रसे युक्त नारी पतिके आगे मर जाती है तो उसके निमित्त वृषोत्सर्ग नहीं करना चाहिये, अपितु दूध देनेवाली गायका दान देना चाहिये*।
श्रीकृष्णने कहा— हे खगेश! महर्षि वसिष्ठके उक्त वचनोंको सुनकर राजा वीरवाहनने मथुरामें जाकर विधिवत् वृषोत्सर्गका अनुष्ठान किया। तदनन्तर अपने घर पहुँचकर उसने अपनेको कृतार्थ माना। समय आनेपर जब उसकी मृत्यु हुई तब यमराजके दूत उसको लेकर कालपुरीकी ओर चले, किंतु उस नगरको पार करके मार्गमें जब वह अधिक दूर निकल गया तो उसने दूतोंसे पूछा कि श्राद्धदेवका नगर कहाँ है? तब दूतोंने उसको बताया कि जहाँ पापी लोग पापशुद्धिके लिये यमदूतोंके द्वारा नरकमें ढकेले जाते हैं, जहाँ धर्माधर्मकी विवेचना करनेवाले धर्मराज विराजमान रहते हैं, वहीं वह श्राद्धदेवपुर है। आप-जैसे पुण्यात्माओंके द्वारा वह नहीं देखा जाता है। उसी समय देव-गन्धर्वोंके सहित दिव्य रूपवाले धर्मराजने उस राजाके समक्ष अपनेको प्रकट किया। अपने सामने उपस्थित धर्मराजको देखकर राजाने बड़े ही आदरके साथ हाथ जोड़कर उन्हें प्रणाम किया और प्रसन्नचित्त होकर उसने अनेक प्रकारसे गुण-कीर्तन करते हुए उन्हें संतुष्ट किया। धर्मराजने भी राजाकी प्रशंसा करके यही कहा—हे दूतो! तुम सब, इन्हें उस देवलोकमें ले जाओ, जहाँ प्रचुर भोगके साधन सुलभ हैं। राजा वीरवाहनने उस आदेशको सुनकर सामने ही स्थित धर्मराजसे पूछा—हे देव! मैं यह नहीं जानता हूँ कि आप मुझे किस पुण्यके प्रभावसे स्वर्गलोक ले जा रहे हैं।
धर्मराजने कहा— हे राजन्! तुमने दान-यज्ञादि अनेक पुण्यकार्योंको विधिवत् सम्पन्न किया है। वसिष्ठकी आज्ञा मान करके तुमने मथुरामें वृषोत्सर्ग भी किया है।
हे नरेश! यदि मनुष्य थोड़े भी धर्मका सम्यक्रूपसे पालन करता है तो वह ब्राह्मण और देवताओंकी कृपासे अधिकाधिक हो जाता है—
धर्मः स्वल्पोऽपि नृपते यदि सम्यगुपासितः।
द्विजदेवप्रसादेन स याति बहुविस्तरम्॥
(६।१४२)
ऐसा कहकर यमुनाके भ्राता उसी क्षण अन्तर्धान हो गये। तत्पश्चात् वीरवाहन स्वर्गमें जाकर देवताओंके साथ सुखपूर्वक रहने लगा।
श्रीकृष्णने कहा— हे पक्षिराज! मैंने वृषोत्सर्ग नामक यज्ञका माहात्म्य विस्तारपूर्वक तुम्हें सुना दिया है। प्राणियोंके पापकर्मको समाप्त करनेवाले इस आख्यानको सुननेवाला व्यक्ति पापमुक्त हो जाता है।
(अध्याय ६)
संतप्तक ब्राह्मण तथा पाँच प्रेतोंकी कथा, सत्संगति तथा भगवत्कृपासे पाँच प्रेतों तथा ब्राह्मणका उद्धार
गरुडने कहा— हे प्रभो! आपने वृषोत्सर्ग नामक यज्ञसे प्राप्त होनेवाले फलसे सम्बन्धित जो आख्यान कहा, उसको मैंने सुन लिया है। अब आप पुनः किसी अन्य कथाका वर्णन करें, जिसमें आपकी अद्भुत महिमा निहित हो।
श्रीकृष्णने कहा— हे गरुड! अब मैं संतप्तक
* पतिपुत्रवती नारी भर्तुरग्रे मृता यदि। वृषोत्सर्गं न कुर्वीत गां दद्याच्च पयस्विनीम्॥ (६।१३१)
प्रेतकल्प ]
संतप्तक ब्राह्मण तथा पाँच प्रेतोंकी कथा
४९१
नामक ब्राह्मण तथा पाँच प्रेतोंकी कथाको बताता हूँ।
हे पक्षिन्! पूर्वकालमें संतप्तक नामक एक ब्राह्मण था, जिसने तपस्याके बलपर अपनेको पापरहित कर लिया था। यह संसार असार है, ऐसा जानकर वह वनोंमें वैखानस मुनियोंके द्वारा आचरित वृत्तिका पालन करते हुए अरण्यमें ही विचरण करता था। किसी समय उस ब्राह्मणने तीर्थ-यात्राको लक्ष्य बनाकर अपनी यात्रा प्रारम्भ की। संसारके प्रति इन्द्रियाँ स्वतः आकृष्ट हो जाती हैं, इस कारणसे उसने अपनी बाह्य चित्तवृत्तियोंको भी रोक लिया था, किंतु पूर्व संस्कारोंके प्रभावसे वह मार्ग भूल गया और चलते-चलते मध्याह्नकाल हो गया, स्नानके लिये जलकी अभिलाषासे वह चारों ओर देखने लगा। उसे उस समय सैकड़ों गुल्म-लता और बाँसके वृक्षोंसे घिरा हुआ, वृक्षोंकी शाखाओंसे व्याप्त, घनघोर एक वन दिखायी पड़ा। वहाँ ताल, तमाल, प्रियाल, कटहल, श्रीपर्णी, शाल, शाखोट (सिहोरका वृक्ष), चन्दन, तिन्दुक, राल, अर्जुन, आमड़ा, लसोड़ा, बहेड़ा, नीम, इमली, बैर और कनैल तथा अन्य बहुत-से वृक्षोंकी सघनताके कारण पक्षियोंके लिये भी मार्ग नहीं दीखता था। फिर मनुष्यके लिये उस वनमें कहाँ मार्ग मिल सकता था? वह वन तो सिंह, व्याघ्र, तरक्षु (एक छोटी जातिका बाघ), नीलगाय, रीछ, महिष, हाथी, कृष्णमृग, नाग और बंदर तथा अन्यान्य प्रकारके हिंसक जीव-जन्तु, राक्षस एवं पिशाचोंसे परिव्याप्त था।
संतप्तक उस प्रकारके घनघोर भयावह वनको देखकर भयाक्रान्त हो उठा। भयभीत वह अब किस दिशामें जाय, इसका निर्णय नहीं कर सका। फिर जो होगा, देखा जायगा—यह सोचकर वह वहाँसे पुनः चल पड़ा। झींगुरोंकी झंकार तथा उल्लुओंकी धूत्कार ध्वनियोंपर कान लगाये वह पाँच ही डग चला था कि सामने बरगदके वृक्षमें बँधा एक शव लटका हुआ उसे दिखायी दिया, जिसे पाँच महाभयंकर प्रेत खा रहे थे। हे खगेश! उन प्रेतोंके शरीरमें मात्र शिराओंसे युक्त हड्डी और चमड़ा ही शेष था। उनका पेट पीठमें धँसा हुआ था। नेत्ररूपी कुओंमें गिरनेके भयसे नासिकाने उनका साथ छोड़ दिया था। वसासे भरे हुए ताजे शवके मस्तिष्क-भागका स्वाद लेकर जो नित्य अपना महोत्सव मनाते थे और हड्डीकी गाँठोंको तोड़नेमें लगे हुए जिनके बड़े-बड़े दाँत किटकिटाते थे, ऐसे प्रेतोंको देखकर घबड़ाये हुए हृदयवाला वह ब्राह्मण वहीं ठिठक गया। उस निर्जन वनमें आ रहे ब्राह्मणको उन प्रेतोंने देख लिया था। अतः 'मैं उसके पास पहले जाऊँगा, मैं उसके पास पहले जाऊँगा'—इस प्रकारकी प्रतिस्पर्धा में वे सभी प्रेत दौड़ पड़े। उनमेंसे दो प्रेतोंने इस ब्राह्मणके दोनों हाथ पकड़ लिये, दो प्रेतोंने दोनों पैर पकड़ लिये। एक प्रेत शेष बचा था, उसने इसका सिर पकड़ लिया। तदनन्तर वे सभी कहने लगे कि 'मैं इसे डकारूँगा, मैं इसे खाऊँगा।' ऐसा कहते हुए वे पाँचों प्रेत ब्राह्मणको खींचने लगे। फिर उसे साथ लेकर वे सहसा आकाशमें चले गये। किंतु उस बरगदपर शवका अभी कितना मांस शेष है और कितना नहीं, इस बातको भी वे सोच रहे थे। उसी समय उन लोगोंने देखा कि दाँतोंके द्वारा नोंचे जानेके कारण वह शव तो अभी फटी हुई आँतसे युक्त है। इसलिये वे आकाशसे नीचे उतर आये और शवको अपने पैरोंसे बाँधकर पुनः आकाशमें ही उड़ गये।
आकाशमें ले जाये जा रहे उस प्रेतरूपमें स्वयंको ही समझकर वह भयार्त ब्राह्मण पूर्ण मनसे मेरी शरणमें आ गया। देवाधिदेव, चिन्मय,
४९२ संक्षिप्त गरुडपुराण [ धर्मकाण्ड-
सुदर्शनचक्रधारी मुझ हरिको प्रणाम कर वह इस प्रकार स्तुति करने लगा—
जिन भगवान्ने अपने चक्रके प्रहारसे ग्राहके मुखको विदीर्णकर उसके दुःखको नष्ट किया था, जो ग्राहके मुखमें फँसे हुए गजराजको मुक्त करानेवाले हैं, वे श्रीहरि मेरे कर्मपाशको काटकर मुझे मुक्त करें। मगधनरेश जरासन्धने निर्दोष राजाओंको बंदी बनाकर कारागारमें डाल दिया था, जिन मुरारि श्रीकृष्णने राजसूययज्ञके लिये पाण्डुपुत्र भीमसेनके द्वारा उस दुष्टको मल्लयुद्धमें मरवाकर राजाओंको मुक्त किया था। वे इस समय मेरे कर्मपाशको काटकर मेरा दुःख दूर करें।
हे गरुड! उस समय दत्तचित्त होकर जब वह मेरी स्तुतिमें लग गया तो उसे सुनते ही मैं भी उठ खड़ा हुआ और सहसा वहाँ जा पहुँचा, जहाँ प्रेत उसको लेकर जा रहे थे। उन लोगोंके द्वारा ले जाते हुए उस ब्राह्मणको देखकर मुझे आश्चर्य हुआ। कुछ कालतक बिना पूछे मैं भी उनके पीछे-पीछे चलने लगा। मेरी संनिधिमात्रसे उस ब्राह्मणको पालकीमें सोये हुए राजाके समान सुख प्राप्त हुआ। इसके बाद मैंने मार्गमें सुमेरु पर्वतपर जा रहे मणिभद्र नामक यक्षराजको देखा। मैंने नेत्रोंके संकेतसे उन्हें अपने पास बुलाया और कहा—हे यक्षराज! तुम इस समय इन प्रेतोंको विनष्ट करनेके लिये प्रतिद्वन्द्वी योद्धा बन जाओ। युद्धमें इन्हें मारकर इस शवको अपने अधिकारमें करो।
ऐसा सुनते ही उस मणिभद्रने प्रेतोंको दुःख पहुँचानेवाले प्रेतरूपको धारण कर लिया। दोनों भुजाओंको फैलाकर ओठोंको जीभसे चाटते हुए और अपनी लम्बी-लम्बी निःश्वासोंसे उन प्रेतोंको दहलाते हुए वह मणिभद्र उनके सम्मुख जाकर डट गया। उसने दोको अपनी दोनों भुजाओंसे, दोको दोनों पैरोंसे और एकको सिरसे पकड़ लिया। उसके बाद अपने शक्तिशाली मुक्केसे उन प्रेतोंपर ऐसा प्रहार किया कि वे सभी विवर्णमुख हो गये। वे उस ब्राह्मण तथा शवको एक हाथ और एक पैरसे पकड़कर युद्ध करने लगे। उन लोगोंने अपने नख-थप्पड़, लात एवं दाँतोंसे उसपर प्रहार किये, पर मणिभद्रने उनके प्रहारको विफल कर उनसे शवको ले लिया। उस यक्षके द्वारा शवको छीन लिये जानेपर पारियात्र पर्वतपर उस ब्राह्मणको छोड़कर वे सभी प्रेत अत्यन्त उत्साहसे भरे हुए पुनः प्रेतरूप मणिभद्रकी ओर दौड़ पड़े। क्षणमात्रमें ही उन लोगोंने वायुके समान द्रुतगामी मणिभद्रको घेर लिया, किंतु वह अदृश्य हो गया। ऐसी स्थिति देखकर हताश होकर वे प्रेत उस ब्राह्मणके पास जा पहुँचे। उस पर्वतपर पहुँचकर उन लोगोंने ब्राह्मणको ज्यों ही मारना प्रारम्भ किया, त्यों ही मेरी उपस्थिति और ब्राह्मणके प्रभावसे तत्काल उनमें पूर्वजन्मकी स्मृति जाग्रत् हो उठी। इसके बाद ब्राह्मणकी प्रदक्षिणा करके उन प्रेतोंने ब्राह्मणश्रेष्ठसे कहा—हे विप्रदेव! आप हमें क्षमा करें। उनके दीन वचनोंको सुनकर ब्राह्मणने पूछा—आप लोग कौन हैं? यह क्या कोई माया है अथवा यह मैं स्वप्न देख रहा हूँ या यह मेरे चित्तका विभ्रम है?
प्रेतोंने कहा—हम सब प्रेत हैं और पूर्वजन्मके
२२५- श्राद्धान्नका पितरोंके पास पहुँचना, दृष्टान्तरूपमें देवी सीताद्वारा भोजन करते हुए ब्राह्मणके शरीरमें महाराज दशरथ आदिका दर्शन करना, मृत्युके अनन्तर दूसरे शरीरकी प्राप्ति, सत्कर्मकी महिमा तथा पिण्डदानसे शरीरका निर्माण
प्रेतकल्प ] संतप्तक ब्राह्मण तथा पाँच प्रेतोंकी कथा ४९३
दुष्कर्मोंके प्रभावसे इस योनिको प्राप्त हुए हैं। ब्राह्मणने कहा—हे प्रेतो! तुम्हारे क्या नाम हैं? तुम सब क्या करते हो? तुम्हें कैसे इस दशाकी प्राप्ति हुई? पहले मेरे प्रति तुम लोगोंका व्यवहार कैसे अविनयी था और इस समय कैसे विनयी हो गया है। प्रेतोंने कहा—हे द्विजराज! आप यथाक्रम अपने प्रश्नोंका उत्तर सुनें। हे योगिराज! हम आपके दर्शनसे निष्पाप हो गये हैं। हमारे नाम क्रमशः पर्युषित, सूचीमुख, शीघ्रग, रोधक और लेखक हैं। ब्राह्मणने कहा—हे प्रेतो! पूर्वकर्मसे उत्पन्न प्रेतोंका नाम कैसे निरर्थक हो सकता है? तुम सब अपने इन विचित्र नामोंके विषयमें विस्तारसे मुझे बताओ। श्रीकृष्णने कहा—ब्राह्मणके द्वारा ऐसा कहे जानेपर पृथक्-पृथक् रूपसे प्रेतोंने कहा— पर्युषितने कहा—किसी समय मैंने श्राद्धके सुअवसरपर ब्राह्मणको निमन्त्रित किया था, वह वृद्ध ब्राह्मण मेरे घर विलम्बसे पहुँचा। बिना श्राद्ध किये ही भूखके कारण मैंने उस पाकको खा लिया। कुछ पर्युषित (बासी) अन्न लाकर मैंने उस ब्राह्मणको दे दिया। मरनेपर मुझे उसी पापके कारण इस दुष्टयोनिकी प्राप्ति हुई। मैंने ब्राह्मणको जो बासी भोजन दिया था, उसीसे मेरा नाम पर्युषित हो गया। सूचीमुखने कहा—किसी समय कोई ब्राह्मणी तीर्थस्नानके लिये भद्रवट तीर्थमें गयी। उसके साथ उसका पाँच वर्षीय पुत्र भी था, जिसके सहारे वह जीवित थी। मैं उस समय क्षत्रिय था। मैं उसके मार्गका अवरोधक बन गया और निर्जन वनमें मैंने राहजनी की। हे विप्र! उस लड़केके सिरपर मुष्टि-प्रहार कर मैंने दोनोंके वस्त्र और राहमें खाने योग्य सामान छीन लिया। वह लड़का प्याससे व्याकुल हो उठा था। अतः वह माताके पास स्थित जल लेकर पीने लगा। उस पात्रमें उतना ही जल था। मैंने उसको डाँटकर जल पीनेसे रोक दिया और स्वयं उस पात्रका सारा जल पी गया। भयसंत्रस्त, प्याससे व्याकुल उस बालककी वहींपर मृत्यु हो गयी। पुत्रशोकसे व्यथित उसकी माँने भी कुएँमें कूदकर अपना प्राण त्याग दिया। इसी पापसे मुझको यह प्रेतयोनि प्राप्त हुई है। पर्वताकार शरीर होनेपर भी इस समय मैं सुईकी नोंकके समान मुखवाला हूँ। यद्यपि खाने योग्य पदार्थ मैं प्राप्त कर लेता हूँ, फिर भी यह मेरा सुईके छिद्रके समान मुख उसको खानेमें असमर्थ है। मैंने क्षुधाग्निसे जलते हुए ब्राह्मणीके बालकका मुँह बंद किया था, उसी पापसे मेरे मुँहका छिद्र भी सुईकी नोंकके समान हो गया है। इसी कारण मैं आज सूचीमुख नामसे प्रसिद्ध हूँ। शीघ्रगने कहा—हे विप्रवर! मैं पहले एक धनवान् वैश्य था। उस जन्ममें अपने मित्रके साथ व्यापार करनेके लिये मैं एक दूसरे देशमें जा पहुँचा। मेरे मित्रके पास बहुत धन था। अतः उस धनके प्रति मेरे मनमें लोभ आ गया। अदृष्टके विपरीत होनेसे वहाँ मेरा मूल धन समाप्त हो चुका था। हम दोनोंने वहाँसे निकलकर मार्गमें स्थित नदीको नावसे पार करना प्रारम्भ किया। उस समय आकाशमें सूर्य लाल हो गया था। राहकी थकानसे व्याकुल मेरा वह मित्र मेरी गोदमें अपना सिर रखकर सो गया। उस समय लोभवश मेरी बुद्धि अत्यन्त क्रूर हो उठी। अतः सूर्यास्त हो जानेपर गोदमें सोये हुए अपने मित्रको मैंने जल-प्रवाहमें फेंक दिया। मेरे द्वारा नावमें किये गये उस कृत्यको अन्य लोग भी न जान सके। उस व्यक्तिके पास जो कुछ बहुमूल्य हीरे-जवाहरात, मोती तथा सोनेकी वस्तुएँ थीं, वह सब लेकर मैं शीघ्र ही उस
| ४९४ | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ धर्मकाण्ड— |
|---|
देशसे अपने घर लौट आया। घरमें वह सब सामान रखकर मैंने उस मित्रकी पत्नीके पास जाकर कहा कि मार्गमें डाकुओंने मेरे उस मित्रको मारकर सब सामान छीन लिया और मैं भाग आया हूँ। मैंने उससे फिर कहा कि हे पुत्रवती नारी ! तुम रोना नहीं। शोकसे व्यथित उस स्त्रीने तत्काल घरके बन्धु-बान्धवोंकी ममताका परित्याग कर अपने प्राणोंकी भेंट अग्निको यथाविधि चढ़ा दिया। उसके बाद निष्कण्टक स्थिति देखकर मैं प्रसन्नचित्त अपने घर चला आया। घर आकर जबतक मेरा जीवन रहा, तबतक उस धनका मैंने उपभोग किया। मित्रको नदीके जल-प्रवाहमें फेंककर मैं शीघ्र ही अपने घर लौट आया था, उसी पापके कारण मुझे प्रेतयोनि मिली और मेरा नाम शीघ्रग हो गया।
**रोधकने कहा—**हे मुनीश्वर ! मैं पूर्व-जन्ममें शूद्र जातिका था। राजभवनसे मुझे जीवन-यापनके लिये उपहारमें बहुत बड़े-बड़े सौ गाँवोंका अधिकार प्राप्त था। मेरे परिवारमें बूढ़े माता-पिता थे और एक छोटा सगा भाई था। लोभवश मैंने शीघ्र ही अपने उस भाईको अलग कर दिया जिसके कारण अन्न-वस्त्रसे रहित उस भाईको अत्यधिक दुःख भोगना पड़ा। उसके दुःखको देखकर मेरे माता-पिता लुक-छिपकर कुछ-न-कुछ उसको दे देते थे। जब मैंने भाईको माता-पिताके द्वारा दी जा रही उस सहायताकी बात विश्वस्त पुरुषोंसे सुनी तो एक सूने घरमें माता-पिताको जंजीरसे रुद्ध कर दिया। कुछ दिनोंके बाद दुःखी उन दोनोंने विष पीकर अपनी जीवन-लीला समाप्त कर ली। हे द्विज ! माता-पितासे रहित होकर मेरा भाई भी इधर-उधर भटकने लगा। ग्राम तथा नगरमें भटकता हुआ एक दिन वह भी भूखसे पीड़ित होकर मर गया। हे ब्राह्मण ! मरनेके बाद उसी पापके कारण मुझे यह प्रेतयोनि मिली। माता-पिताको मैंने बंदी बनाया था, इसी कारण मेरा नाम रोधक पड़ा।
**लेखकने कहा—**हे विप्रदेव ! मैं पूर्वजन्ममें उज्जैन नगरका ब्राह्मण था। वहाँके राजाने मेरी नियुक्ति देवालयमें पुजारीके पदपर की थी। उस मन्दिरमें विभिन्न नामवाली बहुत-सी मूर्तियाँ थीं। स्वर्णनिर्मित उन प्रतिमाओंके अङ्गोंमें बहुत-सा रत्न भी लगा हुआ था। उनकी पूजा करते हुए मेरी बुद्धि पापासक्त हो गयी। अतः मैंने एक तेज धारवाले लोहेसे उन मूर्तियोंके नेत्रादिसे रत्नोंको निकाल लिया। क्षत-विक्षत और रत्नरहित नेत्रोंको देखकर राजा प्रज्वलित अग्निके समान क्रोधसे तमतमा उठा। उसके बाद राजाने यह प्रतिज्ञा की कि चोर चाहे श्रेष्ठ ब्राह्मण ही क्यों न हो यदि उसने मूर्तियोंसे रत्न और सोना चुराया होगा तो ज्ञात होनेपर निश्चित ही मेरे द्वारा मारा जायगा। वह सब सुनकर मैंने रात्रिमें तलवार उठायी और राजाके घरमें जाकर उसका पशुकी तरह वध कर दिया। तदनन्तर चुरायी गयी मणियों तथा सोनेको लेकर मैं रात्रिमें ही अन्यत्र जाने लगा, किंतु मार्गमें स्थित घनघोर जंगलमें एक व्याघ्रने मुझे मार डाला। मैंने लोहेसे प्रतिमा-छेदन एवं काटनेका जो कार्य किया था, उस पापसे आज मैं लेखक नामका प्रेत हूँ। नरकभोग करनेके पश्चात् मुझे यही प्रेत-योनि प्राप्त हुई।
**ब्राह्मणने कहा—**हे प्रेतगणो ! आप लोगोंने अपनी जैसी दशाएँ बतायी हैं, वैसे ही आप सबके नाम भी हैं। वर्तमान समयमें तुम लोगोंका आचरण और आहार क्या है ? उसको भी मुझे बताओ।
**प्रेतोंने कहा—**हे द्विजराज ! जहाँपर वेदमार्गका अनुसरण होता है, जहाँ लज्जा,धर्म, दम, क्षमा, धृति और ज्ञान—ये सब रहते हैं, वहाँ हम सब वास नहीं करते। जिसके घरमें श्राद्ध तथा तर्पणका
प्रेतकल्प ] और्ध्वदैहिक क्रियाके अधिकारी ४९५
कार्य नहीं किया जाता, उसके शरीरसे मांस और रक्त बलात् अपहृत करके हम उसे पीड़ा पहुँचाते हैं। मांस खाना और रक्त पीना यही हमारा आचरण है। हे निष्पाप ! सभी लोगोंके द्वारा निन्दनीय हमारे आहारको सुनें। कुछ तो आपने देख लिया है और जो आपको मालूम नहीं है, उसको हम बता रहे हैं। हे विप्र ! वमन, विष्ठा, कीचड़, कफ, मूत्र और आँसुओंके साथ निकलनेवाला मल, हमारा भक्ष्य और पान है। इसके आगे न पूछें, क्योंकि अपने आहारको बताते हुए हमें बहुत लज्जा आ रही है। हे स्वामिन् ! हम सब अज्ञानी, तामसी, मन्दबुद्धि और भयसे भागनेवाले हैं। हे विप्र ! हममें पूर्वजन्मकी स्मृति एकाएक आ गयी है। अपने विनय या अविनयके संदर्भमें हम कुछ नहीं जानते हैं।
श्रीकृष्णने कहा— हे गरुड ! प्रेतोंके ऐसा कहने एवं ब्राह्मणके सुननेके समय मैंने उन्हें दर्शन दिया। हृदयमें निवास करनेवाले अन्तर्यामी पुरुषके स्वरूपको सामने देखकर उस श्रेष्ठ ब्राह्मणने पृथ्वीपर साष्टाङ्ग प्रणाम किया और स्तुतियोंसे मुझे संतुष्ट किया। आश्चर्यसे उत्फुल्ल नेत्रवाले उन प्रेतोंने तपस्या की। हे खगराज ! प्रेमाधिक्य होनेसे उनकी वाणी रुक गयी। उस समय उनके मुखसे कुछ भी नहीं निकल पा रहा था। स्खलित वाणीमें वह ब्राह्मण कहने लगा—
हे प्रभो! आप कृपा करके रजोगुणके कारण घोर चित्तवाले और तमोगुणसे मूढ़ चित्तवाले प्राणियोंका उद्धार करते हैं। आपको नमस्कार है।
ब्राह्मणने जैसे ही यह कहा, उसी समय मेरी इच्छासे अत्यन्त तेजस्वी, श्रेष्ठ आकाशचारी गन्धर्व एवं अप्सराओंसे युक्त छः विमान वहाँ आ पहुँचे। उन विमानोंकी प्रभासे वह पर्वत चतुर्दिक् आलोकित हो गया। उन पाँचोंके साथ वह ब्राह्मण विमानपर चढ़कर मेरे लोकको चला गया। (अध्याय ७)
और्ध्वदैहिक क्रियाके अधिकारी तथा जीवित-श्राद्धकी संक्षिप्त विधि
गरुडने कहा— हे स्वामिन् ! इस सम्पूर्ण और्ध्वदैहिक कार्यको सम्पन्न करनेका अधिकारी कौन है ? यह क्रिया कितने प्रकारकी है ? यह सब मुझे बतानेकी कृपा करें।
श्रीकृष्णने कहा— हे खगेश ! [जो मनुष्य मर जाता है, उसका और्ध्वदैहिक कार्य] पुत्र, पौत्र, प्रपौत्र, भाई, भाईकी संतान अथवा सपिण्ड या जातिके लोग कर सकते हैं। इन सभीके अभावमें समानोदक संतान इस कार्यको करनेका अधिकारी है। यदि दोनों कुलों (मातृकुल एवं पितृकुल)-के पुरुष समाप्त हो गये हों तो स्त्रियाँ इस कार्यको कर सकती हैं। यदि मनुष्यने इच्छापूर्वक अपने सभी सगे-सम्बन्धियोंसे अपना सम्बन्ध-विच्छेद कर लिया है तो उसका और्ध्वदैहिक कार्य राजाको कराना चाहिये।
यह क्रिया तीन प्रकारकी है, जिनको पूर्व, मध्यम एवं उत्तर क्रियाओंकी संज्ञा दी गयी है। हे पक्षिन् ! इस क्रियाको प्रतिसंवत्सर एकोद्दिष्ट-विधानसे करना अपेक्षित है। इस श्राद्ध-क्रियाके फलको तुम मुझसे सुनो।
ब्रह्मा, इन्द्र, रुद्र, अश्विनीकुमार, सूर्य, अग्नि, वसु, मरुद्गण, विश्वेदेव, पितृगण, पक्षी, मनुष्य, पशु, सरीसृप, मातृगण और इनके अतिरिक्त जो भी प्राणी इस संसारमें उत्पन्न हैं, उन सभीको श्रद्धापूर्वक किये जा रहे श्राद्धसे मनुष्य प्रसन्न कर सकता है। ऐसे श्राद्धसे तो सम्पूर्ण जगत् प्रसन्न हो
| ४९६ | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ धर्मकाण्ड- |
|---|
उठता है। जो लोग अपने सगे-सम्बन्धियोंके द्वारा किये गये श्राद्धसे संतृप्त हो जाते हैं, वे श्राद्धकर्ताको पुत्र, स्त्री और धन आदिके द्वारा तृप्त करते हैं। हे गरुड! इस प्रकार मैंने संक्षेपमें अधिकार और क्रिया-भेदका निरूपण किया।
गरुडने कहा— हे देवश्रेष्ठ! यदि पहले कहे गये अधिकारियोंमेंसे एक भी न हो तो उस समय मनुष्यको क्या करना चाहिये?
श्रीकृष्णने कहा— जब अधिकारी व्यक्ति न हो और न तो किसीके अधिकारका निश्चय ही हो रहा हो तो वैसी स्थितिमें मनुष्यको स्वयं अपने जीवनकालमें ही जीवित-श्राद्ध कर लेना चाहिये। उपवासपूर्वक स्नान करके भगवान् कृष्णके प्रति आसक्त-हृदय होकर मनुष्य एकाग्र मनसे उस कर्ता, भोक्ता, सर्वेश्वर विष्णुकी पूजा करे। उसके बाद वह अपने पितृगणोंके लिये तिल एवं दक्षिणाके सहित तीन जलधेनु* 'ॐ पितृभ्यः स्वधा' कहकर निवेदित करे और धेनुदान करते समय 'ॐ अग्नये कव्यवाहनाय स्वधा नमः' तथा 'ॐ सोमाय त्वा पितृमते स्वधा नमः' ऐसा स्मरण करता हुआ वह दक्षिणाभिमुख होकर दक्षिणासहित तीसरी जलधेनु देते समय विशेषरूपसे 'यमायाङ्गिरसे स्वधा नमः' यह स्मरण करता रहे। भगवान् विष्णुके यजन एवं जलधेनुदानके मध्य ही ब्राह्मणोंका आवाहन करके उन्हें भोजन कराना चाहिये। वह पहली जलधेनु उत्तर दिशामें तथा दूसरी जलधेनु दक्षिण दिशामें रखे और उन दोनों धेनुओंके मध्यमें तीसरी धेनु रखकर आवाहन आदि श्राद्धसम्बन्धी कार्य करे। इस आवाहनादि क्रियाके पूर्वमें सर्वप्रथम आवाहनपूर्वक विश्वेदेवोंके प्रतिनिधिभूत ब्राह्मणोंकी भलीभाँति पूजा कर वह यह कहे—
वसुभ्यस्त्वामहं विप्र रुद्रेभ्यस्त्वामहं ततः।
सूर्येभ्यस्त्वामहं विप्र भोजयामीति तान्वदेत्॥
(८। १७)
तदनन्तर आवाहनादिक जो शेष कार्य हैं, उन्हें पितृ-शेष कार्योंकी तरह सम्पादित करे। उसके बाद वह वसुके उद्देश्यसे ब्राह्मणको एक सुशील धेनुका दान दे। तत्पश्चात् आग्नेय कोणमें रुद्रदेव तथा दक्षिण दिशामें सूर्यदेवके निमित्त स्थित ब्राह्मणोंको भी एक-एक गाय देनी चाहिये तथा विश्वेदेवोंके लिये तिलपूर्ण पात्रका निवेदन करे। तदनन्तर ब्राह्मणोंको अक्षय्योदक दान करना चाहिये एवं ब्राह्मण 'ॐ स्वस्ति' इस प्रतिवचनसे श्राद्धकृत्यकी सम्पूर्णताका आशीर्वाद दें। इसके बाद अष्टाक्षर-मन्त्रसे भगवान् विष्णुका स्मरण करते हुए उनका विसर्जन करे।
इसके पश्चात् स्वस्थचित्त होकर कुलदेवी, ईशानी, शिव तथा भगवान् नारायणका स्मरण करे। तदनन्तर चतुर्दशी तिथिको सुगमतासे उपलब्ध होनेवाली श्रेष्ठ नदीके तटपर जाय। वहाँ वस्त्र तथा लौहखण्डोंका दान करे एवं 'ॐ जितं ते' इस मन्त्रका जप करता हुआ स्वयं दक्षिणाभिमुख होकर अग्निको प्रज्वलित करे। तदनन्तर वह पचास कुशोंसे ब्राह्मीप्रतिकृति (पुत्तल) बना करके उसका दाह करे। इसके बाद श्मशानमें विहित होम करके अन्तमें पूर्णाहृतिकी क्रिया सम्पन्न करे। तत्पश्चात् निरग्नि भूमि, यम तथा रुद्रदेवका स्मरण करे। हवन करनेके बाद प्रधान स्थानपर उक्त देवोंका आवाहन करना चाहिये। उसके बाद वह अग्निमें मूँगमिश्रित चरु पकाये। तदनन्तर तिल-तण्डुल-मिश्रित दूसरा चरु पकाये।
'ॐ पृथिव्यै नमस्तुभ्यं०'—इस मन्त्रसे प्रथम चरु निवेदित करे। 'ॐ यमाय नमश्च०' इस
* दानके लिये कृत्रिम धेनुका विधान है। इसे गोदानप्रसंगमें वराहपुराण आदिमें जलधेनुदानविधिके अन्तर्गत देखना चाहिये।
प्रेतकल्प ] राजा बभ्रुवाहनकी कथा ४१७
मन्त्रसे यमको द्वितीय चरु निवेदित करे। 'ॐ नमश्चाथ रुद्राय श्मशानपतये नमः'—इस मन्त्रसे श्मशानपति रुद्रको निवेदित करे। उसके बाद श्राद्धकर्ता सात नामवाले यमराजके लिये निम्न मन्त्रोंसे सात जलाञ्जलियाँ छोड़े—'ॐ यमाय स्वधा तस्मै नमः', 'ॐ धर्मराजाय स्वधा तस्मै नमः', 'ॐ मृत्यवे स्वधा तस्मै नमः', 'ॐ अन्तकाय स्वधा तस्मै नमः', 'ॐ वैवस्वताय स्वधा तस्मै नमः', 'ॐ कालाय स्वधा तस्मै नमः' और 'ॐ सर्वप्राणहराय स्वधा तस्मै नमः।'
इसके बाद श्राद्धकर्ता 'तुम सब अमुक-अमुक गोत्रसे सम्बन्धित हो, यह तिलोदक तुम्हारे लिये होवे'। ऐसा कहते हुए अर्घ्य-पुष्पसे युक्त दस पिण्ड-दान दे। उसके बाद उन्हें धूप, दीप, बलि, गन्ध तथा अक्षय जल प्रदान करे। उक्त दस पिण्डोंका दान देनेके पश्चात् भगवान् विष्णुके सुन्दर सुभग मुखका ध्यान करना चाहिये।
इस कृत्यको करनेके बाद आशौचके अन्तमें प्रतिमास मासिक श्राद्ध और सपिण्डीकरण करना चाहिये। श्राद्ध चाहे अपने लिये हो या दूसरेके लिये यही नियम है। शक्ति, आरोग्य, धन और आयु—ये चारों अस्थिर होते हैं, अतः ऐसा जानकर जीवित-श्राद्ध करना चाहिये। मैंने इस जीवित-श्राद्धके विषयमें तुम्हें सब कुछ बता दिया है। (अध्याय ८)
राजा बभ्रुवाहनकी कथा, राजाद्वारा प्रेतके निमित्त की गयी और्ध्वदेहिक क्रिया एवं वृषोत्सर्गसे प्रेतका उद्धार
गरुडने कहा— हे निष्पाप देव! आपने यह कहा कि जब मनुष्यकी और्ध्वदेहिक क्रियाको करनेवाला कोई न हो तो उस आद्य क्रियाको राजा सम्पन्न कर सकता है। प्राचीनकालमें क्या किसी राजाने किसी ऐसे व्यक्तिकी और्ध्वदेहिक आदि क्रिया सम्पन्न की थी?
श्रीकृष्णने कहा— हे सुपर्ण! तुम सुनो! जिस राजाने इस क्रियाको किया था, मैं उसके विषयमें कहूँगा। कृतयुगमें वंग देशमें बभ्रुवाहन नामका एक राजा था। हे पक्षीन्द्र! वह समुद्रसे चारों ओर घिरी हुई अपनी पृथ्वीकी धर्मानुसार भलीभाँति रक्षा करता था। उसने अपने जीवनकालमें इस सम्पूर्ण पृथ्वीका विधिवत् भोग किया। उसके शासनकालमें कोई भी पापी नहीं था। प्रजाओंको न तो चोरका भय था और न तो दुष्टजनोंके द्वारा किये गये उपद्रवोंका आतंक था। उसके राज्यकालमें किसी भी प्रकारके रोगका भी भय नहीं था। सभी अपने-अपने धर्ममें अनुरक्त थे। वह राजा तेजमें सूर्यकी भाँति, अक्षुब्धता (शान्ति)-में पर्वतके समान और सहिष्णुतामें पृथ्वीके सदृश था। किसी समय उस राजाने एक सौ घुड़सवार सैनिकोंको साथ लेकर मृगयाके लिये एक घने वनकी ओर प्रस्थान किया। उस समय योद्धाओंके सिंहनाद, शङ्ख तथा दुन्दुभियोंकी ध्वनिसे मिलकर निकले किलकिलाहटभरे शब्दोंसे वातावरण गूँज रहा था। वहाँ स्थान-स्थानपर चारों ओर उस राजाकी स्तुति हो रही थी। चलते-चलते उस राजाको नन्दनवनके समान एक वन दिखायी पड़ा। वह वन बिल्व, मंदार, खदिर, कैथ तथा बाँसके वृक्षोंसे परिव्याप्त था। ऊँचे, नीचे पर्वतोंसे चारों ओर घिरा हुआ था। जलरहित तथा निर्जन उस वनका विस्तार कई योजनका था। मृग, सिंह तथा अन्य महाभयंकर हिंसक जीव-जन्तु उसमें भरे हुए थे। अपने सेवक एवं सैनिकोंके साथ नाना प्रकारके मृगोंको मारते
२२६- जीवकी ऊर्ध्वगति एवं अधोगतिका वर्णन
४९८ | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ धर्मकाण्ड-
हुए उस नरशार्दूलने खेल-ही-खेलमें उस वनको विक्षुब्ध कर दिया।
इसके बाद राजाने किसी एक मृगके कुक्षिभागमें बाणका प्रहार किया। आहत होकर भी वह मृग बड़ी तेजीसे दौड़ पड़ा। राजाने भी उस मृगका पीछा किया। अकेला अत्यधिक दूरी तय करनेके कारण थका हुआ भूख-प्याससे पीड़ित वह राजा उस वनको पार कर एक दूसरे घनघोर वनमें जा पहुँचा। अत्यन्त प्याससे क्षुब्ध होकर वह उस वनमें इधर-उधर जल खोजने लगा। हंस और सारस पक्षियोंके शब्दसे सूचित किये गये पूरचक्र नामक सरोवरपर जाकर उसने अश्वके साथ वहाँ स्नान किया। तदनन्तर उस सरोवरके लाल एवं नीले कमलोंके परागसे सुगन्धित शीतल जलको पीकर वह जलसे बाहर आया। मार्गमें अत्यधिक चलनेके कारण थके हुए राजाने उसी सरोवरके किनारे एक छायादार वटवृक्षको देखकर उसमें अपने घोड़ेको बाँध दिया। तत्पश्चात् आस्तरणको बिछाकर तथा ढालकी तकिया लगाकर क्षणभरमें ही शीतल मन्द वायुके सुखकी अनुभूति करता हुआ वह सो गया।
राजाके सोते ही वहाँ सौ प्रेतोंके साथ घूमता हुआ प्रेतवाहन नामक एक प्रेत आ पहुँचा। उसके शरीरमें मात्र अस्थि, चर्म और शिराएँ ही शेष थीं। वह खाने-पीनेको खोजता हुआ धैर्य नहीं धारण कर पा रहा था। आहट पाकर राजाकी नींद खुल गयी। पहले कभी न देखे गये उस दृश्यको देखकर राजाने शीघ्र ही अपने धनुषपर बाण चढ़ा लिया। अपने सामने राजाको देखकर वह प्रेत भी स्थाणुके सदृश खड़ा रहा। उसको अवस्थित देखकर राजाके मनमें कौतूहल हो उठा। उन्होंने प्रेतसे पूछा कि तुम कौन हो ? यहाँ कहाँसे आये हो ? तुम्हें यह विकृत शरीर कैसे प्राप्त हुआ है ?
प्रेतने कहा—हे महाबाहो ! आपके इस संयोगसे मैंने अपना प्रेतभाव त्याग दिया है। मुझे अब परमगति प्राप्त हो गयी है। मेरे समान धन्य अन्य कोई नहीं है।
बभ्रुवाहनने कहा—यह वन सर्वत्र अत्यन्त भयानक है। इसमें मैं यह क्या देख रहा हूँ ? हे पिशाच ! यहाँ यह वन भी आँधीके झोंकोंसे ग्रस्त है। यहाँ पतंग, मशक, मधुमक्खी, कबन्ध, शिरी, मत्स्य, कच्छप, गिरगिट, बिच्छू, भ्रमर, सर्प, अधोमुखी हवाएँ चलती हैं, बिजलीकी आग जलती है, वायुके झोंकोंसे इधर-उधर तिनके हिल-डुल रहे हैं। यहाँ नाना प्रकारके जीव-जन्तु, हाथी तथा टिड्डियोंके बहुत प्रकारके शब्द सुनायी पड़ रहे हैं, किंतु कहींपर भी कोई दिखायी नहीं दे रहा है। यह सब विकृत स्थिति देखकर मेरा हृदय काँप रहा है।
प्रेतने कहा—राजन् ! जिन प्राणियोंका अग्नि-संस्कार, श्राद्ध, तर्पण, षट्पिण्ड, दशगात्र, सपिण्डीकरण नहीं हुआ है, जो विश्वासघाती, मद्यपी और स्वर्णचोर रहे हैं, जो लोग अपमृत्युसे मरे हैं, जो ईर्ष्या करनेवाले हैं, जो अपने पापोंका प्रायश्चित्त नहीं करते हैं, जो गुरु आदिकी पत्नीके साथ गमन करते हैं, वे सभी प्राणी अपने कर्मोंके कारण भटकते हुए प्रेतरूपमें यहाँपर निवास करते हैं। इनको खान-पान बड़ा दुर्लभ है। ये अत्यधिक पीड़ित रहते हैं। हे राजन् ! कृपया आप इनका और्ध्वदैहिक संस्कार करें। जिनके माता-पिता, पुत्र और भाई-बन्धु नहीं हैं, उनका और्ध्वदैहिक संस्कार राजाको स्वयं करना चाहिये। राजा इससे अपने पारलौकिक शुभ कर्मको भी सम्पन्न कर सकता है और वह सभी दुःखोंसे विमुक्त हो जाता है। इस कर्मसे सम्मानित होकर राजा अपनी दुर्गति दूर कर सकता है। इस संसारमें कौन किसका भाई
२२७- चौरासी लाख योनियोंमें मनुष्यजन्मकी श्रेष्ठता, मनुष्यमात्रका एकमात्र कर्तव्य—धर्माचरण
प्रेतकल्प ] राजा बभ्रुवाहनकी कथा ४९९
है, कौन किसका पुत्र है और कौन किसकी स्त्री है, सभी स्वार्थके वशीभूत हैं। उनमें मनुष्यको विश्वास नहीं करना चाहिये; क्योंकि वह अपने कर्मोंका स्वयं ही भोग करता है। धन घरमें छूट जाता है, भाई-बन्धु श्मशानमें छूट जाते हैं, शरीर काष्ठको सौंप दिया जाता है। जीवके साथ पाप-पुण्य ही जाता है—
गृहेष्वर्था निवर्तन्ते श्मशाने चैव बान्धवाः॥
<div style="text-align: right;">(९।३६-३७)</div>
शरीरं काष्ठमादत्ते पापं पुण्यं सह व्रजेत्।
अतः राजन्! अपने कल्याणकी इच्छासे आप इस नश्वर शरीरसे अविलम्ब प्रेतोंका और्ध्वदैहिक कर्म सम्पन्न करें।
राजाने कहा—हे प्रेतराज! कृशकाय भयंकर नेत्रवाले तुम प्रेतके समान दिखायी देते हो। तुम प्रसन्न होकर अपना जैसा वृत्तान्त हो, वैसा सब कुछ मुझसे कहो। इस प्रकार पूछे जानेपर प्रेतने अपना सारा वृत्तान्त राजासे कहा।
प्रेतने कहा—हे नृपश्रेष्ठ! मैं प्रारम्भसे लेकर आजतकका सम्पूर्ण वृत्तान्त आपसे कह रहा हूँ। हे राजन्! सभी सम्पदाओंको सुखपूर्वक वहन करनेवाला, विभिन्न जनपदोंमें उत्पन्न नाना प्रकारके रत्नोंसे परिव्याप्त, अनेकानेक पुष्पोंसे सुशोभित वनप्रान्तवाला तथा विभिन्न पुण्यजनोंसे आवृत विदिशा नामक एक नगर था। सदैव देवाराधनमें अनुरक्त रहता हुआ मैं उसी नगरमें निवास करता था। मैं वैश्यजातिमें उत्पन्न हुआ था, उस जन्ममें सुदेव मेरा नाम था। मेरे द्वारा दिये गये 'हव्य'से देवता और 'कव्य'से पितृगण संतुष्ट रहते थे। मैंने नाना प्रकारके दान देकर ब्राह्मणोंको संतृप्त किया था। मेरा आहार-विहार सुनिश्चित था। दीन-हीन, अनाथ और विशिष्ट सत्पात्रोंको मैंने अनेक प्रकारसे सहायता पहुँचायी थी; किंतु दैवयोगसे वह सब निष्फल हो गया। मेरे न तो कोई संतान हुई, न कोई सगे बन्धु-बान्धव हैं और न वैसा कोई मित्र ही है, जो मेरा और्ध्वदैहिक कर्म कर सके। हे श्रेष्ठ राजन्! उसीसे मेरा यह प्रेतत्व स्थिर हो गया है।
हे भूपते! एकादशाह, त्रैपाक्षिक, षाण्मासिक, वार्षिक तथा जो मासिक श्राद्ध होते हैं, इन सभी श्राद्धोंकी कुल संख्या सोलह है। जिस मृतकके लिये इन श्राद्धोंका अनुष्ठान नहीं किया जाता है, उसका प्रेतत्व अन्य सैकड़ों श्राद्ध करनेपर भी स्थिर ही रहता है। हे महाराज! ऐसा जानकर आप मुझे इस प्रेतत्वसे मुक्ति प्रदान करायें। इस संसारमें राजा सभी वर्णोंका बन्धु कहा गया है। इसलिये आप मेरा निस्तार करें। हे राजेन्द्र! मैं आपको यह मणिरत्न दे रहा हूँ। जिस प्रकार मेरा कल्याण हो, मुझपर कृपा करके आप वैसा ही कार्य करें। मेरे निष्ठुर सपिण्डों और सगोत्रियोंने मेरे लिये वृषोत्सर्ग नहीं किया है, उसीसे मैं इस प्रेतयोनिको प्राप्त हुआ हूँ। भूख-प्याससे आक्रान्त मैं खाने-पीनेके लिये कुछ नहीं पा रहा हूँ। उसीसे मेरे शरीरमें यह विकृति आ गयी है। शरीर कृश हो गया है। इसमें मांसतक नहीं रह गया है। भूख-प्याससे उत्पन्न इस महान् दुःखको मैं बार-बार भोग रहा हूँ। वृषोत्सर्ग न करनेके कारण यह कष्टकारी प्रेतत्व मुझे प्राप्त हुआ है। हे राजन्! हे दयासिन्धो! इसीलिये मैं प्रेतत्वनिवृत्तिके निमित्त आपसे प्रार्थना कर रहा हूँ। आप मेरा कल्याण करें।
राजाने कहा—हे प्रेत! मेरे कुलका कोई प्रेत हुआ है, यह मनुष्य कैसे जान सकता है। प्राणी इस प्रेतत्वसे कैसे मुक्त हो सकता है? यह सब तुम मुझे बताओ।
प्रेतने कहा—हे राजन्! लिङ्ग (चिह्नविशेष) और पीड़ाके कारण प्रेतयोनिका अनुमान लगाना चाहिये। इस पृथ्वीपर प्रेतद्वारा उत्पन्न की गयी जो
| ५०० | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ धर्मकाण्ड- |
|---|
पीड़ाएँ हैं, उनका मैं वर्णन कर रहा हूँ। जब स्त्रियोंका ऋतुकाल निष्फल हो जाता है, वंशवृद्धि नहीं होती है। अल्पायुमें ही किसी परिजनकी मृत्यु हो जाती है तो उसे प्रेतोत्पन्न पीड़ा माननी चाहिये। अकस्मात् जब जीविका छिन जाती है, लोगोंके बीच अपनी प्रतिष्ठा विनष्ट हो जाती है, एकाएक घर जलकर नष्ट हो जाता है तो उसे प्रेतजन्य पीड़ा ही मानें। जब अपने घरमें नित्य कलह हो, मिथ्यापवाद हो, राजयक्ष्मा आदि रोग उत्पन्न हो जायें तो उसे प्रेतोद्भूत पीड़ा समझे। जब अपने प्राचीन अनिन्दित व्यापार-मार्गमें प्रयत्न करनेपर भी मनुष्यको सफलता नहीं मिलती है, उसमें लाभ नहीं होता है, अपितु हानि ही उठानी पड़ती है तो उस पीड़ाको भी प्रेतजन्य ही मानें। जब अच्छी वर्षा होनेपर भी कृषि विनष्ट हो जाती है, व्यापारमें प्राणीकी जीविका भी चली जाती है, अपनी स्त्री अनुकूल नहीं रह जाती है तो उस पीड़ाको भी प्रेतसमुद्भूत माननी चाहिये। हे राजन्! इसी प्रकारकी अन्य पीड़ाओंसे आप प्रेतत्वका ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं।
हे राजेन्द्र! जब मनुष्य वृषोत्सर्ग करता है, तब जाकर वह प्रेतत्वसे मुक्त होता है। आपका इस कार्यमें अधिकार है, इसलिये कृपया आप मेरे उद्देश्यसे वृषोत्सर्ग करें। आप इस मणिरत्नको ग्रहण करें। इसीके धनसे मेरे लिये वृषोत्सर्ग करें। यह कार्य कार्तिककी पूर्णिमा अथवा आश्विनमासके मध्यकालमें करना चाहिये। हे राजन्! मेरा यह संस्कार रेवतीनक्षत्रसे युक्त तिथिमें भी हो सकता है। श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको निमन्त्रित करके विधिवत् अग्निस्थापन तथा वेद-मन्त्रोंके द्वारा यथाविधान होम करें। बहुत-से ब्राह्मणोंको बुलाकर इस रत्नसे प्राप्त हुए धनके द्वारा उन्हें भोजन करायें। ऐसा करनेसे मुझे मुक्ति प्राप्त हो सकेगी।
श्रीकृष्णने कहा— हे खगेश! इसके बाद राजाने उस प्रेतसे 'ऐसा ही होगा', यह कहकर मणि ले ली। जो व्यक्ति धन ले लेता है, वह भी उस दाताकी क्रिया करनेका अधिकारी हो जाता है। प्रेतविषयक इस प्रकारकी वार्ता उन दोनोंके मध्य जिस समय चल रही थी, उसी समय देखते-ही-देखते वहाँ घण्टा और भेरियोंकी ध्वनि करती हुई राजाकी चतुरंगिणी सेना आ गयी। उस सेनाके आते ही प्रेत अदृश्य हो गया। उसके बाद उस वनसे निकलकर राजा अपने नगर चला आया। तदनन्तर उसने कार्तिक-मासकी पूर्णिमा तिथि आनेपर उस प्राप्त हुई मणिके धनसे प्रेतत्वनिवृत्तिके लिये विधिवत् वृषोत्सर्ग किया। हे गरुड! उस संस्कारके पूर्ण होते ही वह प्रेत भी तत्काल सुवर्ण देहसे सुशोभित हो उठा और उसने राजाको प्रणाम किया। तत्पश्चात् उस राजाकी प्रशंसा करते हुए प्रेतने कहा— हे देव! यह सब आपकी महिमा है। इस प्रकार राजाके द्वारा किये गये उपकारके प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करते हुए वह स्वर्गलोकको चला गया। जिस प्रकार राजाके द्वारा किये गये संस्कारसे वह प्रेत अपने प्रेतत्वसे मुक्त हुआ था, वह सब वृत्तान्त मैंने तुम्हें सुना दिया। अब तुम और क्या सुनना चाहते हो? (अध्याय ९)
२२८- वृषोत्सर्ग तथा सत्कर्मकी महिमा
| प्रेतकल्प ] | श्राद्धान्नका पितरोंके पास पहुँचना | ५०१ |
|---|
श्राद्धान्नका पितरोंके पास पहुँचना, दृष्टान्तरूपमें देवी सीताद्वारा भोजन करते हुए ब्राह्मणके शरीरमें महाराज दशरथ आदिका दर्शन करना, मृत्युके अनन्तर दूसरे शरीरकी प्राप्ति, सत्कर्मकी महिमा तथा पिण्डदानसे शरीरका निर्माण
गरुडने कहा— हे प्रभो! सपिण्डीकरण और वार्षिक श्राद्ध करनेके पश्चात् मृत व्यक्ति स्वकर्मानुसार देवत्व, मनुष्यत्व अथवा पक्षित्वको प्राप्त करता है। फिर भिन्न-भिन्न आहारवाले उन लोगोंके लिये किये गये श्राद्ध, ब्राह्मण-भोजन और होमसे उन्हें कैसे संतृप्ति होती है? अपने शुभाशुभ कर्मोंके द्वारा प्राप्त हुई प्रेतयोनिमें स्थित वह प्राणी अपने सम्बन्धियोंसे प्राप्त उस भोज्य पदार्थका उपभोग कैसे करता है? श्राद्धकी आवश्यकता तो मैंने अमावास्यादि तिथियोंमें सुनी है। [यह बतलानेकी कृपा करें।]
श्रीभगवान्ने कहा— हे पक्षिराज! श्राद्ध प्रेतजनोंको जिस प्रकारसे तृप्ति प्रदान करता है, उसे सुनो। मनुष्य अपने कर्मानुसार यदि देवता हो जाता है तो श्राद्धान्न अमृत होकर उसे प्राप्त होता है तथा वही अन्न गन्धर्व-योनिमें भोगरूपसे और पशुयोनिमें तृणरूपमें प्राप्त होता है। वही श्राद्धान्न नागयोनिमें वायुरूपसे, पक्षीकी योनिमें फलरूपसे और राक्षसयोनिमें आमिष बन जाता है। वही श्राद्धान्न दानव-योनिके लिये मांस, प्रेतके लिये रक्त, मनुष्यके लिये अन्न-पानादि तथा बाल्यावस्थामें भोगरस हो जाता है*।
गरुडने कहा— हे स्वामिन्! इस लोकमें मनुष्योंके द्वारा दिये गये हव्य-कव्य पदार्थ पितृलोकमें कैसे जाते हैं? उनको प्राप्त करानेवाला कौन है? यदि श्राद्ध मरे हुए प्राणियोंके लिये भी तृप्ति प्रदान करनेवाला है तो बुझे हुए दीपकका तेल भी उसकी लौको बढ़ा सकता है। मरे हुए पुरुष अपने कर्मानुसार गति प्राप्त करते हैं तो अपने पुत्रके द्वारा दिये गये पुण्य कर्मोंके फल वे कैसे प्राप्त कर सकेंगे?
श्रीभगवान्ने कहा— हे तार्क्ष्य! प्रत्यक्षकी अपेक्षा श्रुतिका प्रमाण बलवान् होता है। श्रुतिसे प्राप्त हुए ज्ञानका स्वरूप अमृतादिके समान होता है। श्राद्धमें उच्चरित पितरोंके नाम तथा गोत्र हव्य-कव्यके प्रापक हैं। भक्तिपूर्वक पढ़े गये मन्त्र श्राद्धके प्रापक होते हैं। हे सुपर्ण! ये अचेतन मन्त्र कैसे उस श्राद्धको प्राप्त करा सकते हैं, इस विषयमें तुम्हें संशय नहीं रखना चाहिये। अस्तु, इसे समझनेके लिये मैं तुम्हें दूसरा प्रापक बता रहा हूँ। अग्निष्वात्त आदि पितृगण उन पितरोंके राजपदपर नियुक्त हैं। समय आनेपर विधिवत् प्रतिपादित अन्न, अभीष्ट पितृपात्रमें पहुँच जाता है। जहाँ वह जीव रहता है, वहाँ ये अग्निष्वात्त आदि पितृदेव ही अन्न लेकर जाते हैं। नाम-गोत्र और मन्त्र ही उस दान दिये गये अन्नको ले जाते हैं। शतशः योनियोंमें जो जीव जिस योनिमें स्थित रहता है उस योनिमें उसे
* देवो यदपि जातोऽयं मनुष्यः कर्मयोगतः ॥
तस्यान्नममृतं भूत्वा देवत्वेऽप्यनुयाति च। गान्धर्वे भोगरूपेण पशुत्वे च तृणं भवेत् ॥
श्राद्धं हि वायुरूपेण नागत्वेऽप्यनुगच्छति। फलं भवति पक्षित्वे राक्षसेषु तथामिषम् ॥
दानवत्वे तथा मांसं प्रेतत्वे रुधिरं तथा। मनुष्यत्वेऽन्नपानादि बाल्ये भोगरसो भवेत् ॥ (१०।४—७)
२२९- और्ध्वदेहिक क्रिया, गोदान एवं वृषोत्सर्गका माहात्म्य
| ५०२ | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ धर्मकाण्ड- |
|---|
नाम-गोत्रके उच्चारणसे तृप्ति प्राप्त होती है। संस्कार करनेवाले व्यक्तिके द्वारा कुशाच्छादित पृथ्वीपर दाहिने कन्धेपर यज्ञोपवीत करके दिये गये तीन पिण्ड उन पितरोंको संतुष्टि प्रदान करते हैं।
पितर जिस योनिमें, जिस आहारवाले होते हैं, उन्हें श्राद्धके द्वारा वहाँ उसी प्रकारका आहार प्राप्त होता है। गायोंका झुंड तितर-बितर हो जानेपर भी बछड़ा अपनी माताको जैसे पहचान लेता है, वैसे ही वह जीव जहाँ जिस योनिमें रहता है, वहाँ पितरोंके निमित्त ब्राह्मणको कराया गया श्राद्धान्न स्वयं उसके पास पहुँच जाता है—
यदाहारा भवन्त्येते पितरो यत्र योनिषु।
<div style="text-align: right;">(१०।१९-२०)</div>
तासु तासु तदाहारः श्राद्धान्नेनोपतिष्ठति॥
यथा गोषु प्रनष्टासु वत्सो विन्दति मातरम्।
तथान्नं नयते विप्रो जन्तुर्यत्रावतिष्ठते॥
पितृगण सदैव विश्वेदेवोंके साथ श्राद्धान्न ग्रहण करते हैं। ये ही विश्वेदेव श्राद्धका अन्न ग्रहण कर पितरोंको संतृप्त करते हैं। वसु, रुद्र, देवता, पितर तथा श्राद्धदेवता श्राद्धोंमें संतृप्त होकर श्राद्ध करनेवालोंके पितरोंको प्रसन्न करते हैं। जैसे गर्भिणी स्त्री दोहद (गर्भावस्थामें विशेष भोजनकी अभिलाषा)-के द्वारा स्वयंको और अपने गर्भस्थ जीवको भी आहार पहुँचाकर प्रसन्न करती है, वैसे ही देवता श्राद्धके द्वारा स्वयं संतुष्ट होते हैं और पितरोंको भी संतुष्ट करते हैं—
आत्मानं गुर्विणी गर्भमपि प्रीणाति वै यथा।
<div style="text-align: right;">(१०।२३)</div>
दोहदेन तथा देवाः श्राद्धैः स्वांश्च पितॄन् नृणाम्॥
'श्राद्धका समय आ गया है'—ऐसा जानकर पितरोंको प्रसन्नता होती है। वे परस्पर ऐसा विचार करके उस श्राद्धमें मनके समान तीव्रगतिसे आ पहुँचते हैं। अन्तरिक्षगामी वे पितृगण उस श्राद्धमें ब्राह्मणोंके साथ ही भोजन करते हैं। वे वायुरूपमें वहाँ आते हैं और भोजन करके परम गतिको प्राप्त हो जाते हैं। हे पक्षिन्! श्राद्धके पूर्व जिन ब्राह्मणोंको निमन्त्रित किया जाता है, पितृगण उन्हींके शरीरमें प्रविष्ट होकर वहाँ भोजन करते हैं और उसके बाद वे पुनः वहाँसे अपने लोकको चले जाते हैं—
निमन्त्रितास्तु ये विप्राः श्राद्धपूर्वदिने खग।
<div style="text-align: right;">(१०।२६)</div>
प्रविश्य पितरस्तेषु भुक्त्वा यान्ति स्वमालयम्॥
यदि श्राद्धकर्ता श्राद्धमें एक ही ब्राह्मणको निमन्त्रित करता है तो उस ब्राह्मणके उदरभागमें पिता, वामपार्श्वमें पितामह, दक्षिणपार्श्वमें प्रपितामह और पृष्ठभागमें पिण्डभक्षक पितर रहता है। श्राद्धकालमें यमराज प्रेत तथा पितरोंको यमलोकसे मृत्युलोकके लिये मुक्त कर देते हैं। हे काश्यप! नरक भोगनेवाले भूख-प्याससे पीड़ित पितृजन अपने पूर्वजन्मके किये गये पापका पश्चात्ताप करते हुए अपने पुत्र-पौत्रोंसे मधुमिश्रित पायसकी अभिलाषा करते हैं। अतः विधिपूर्वक पायसके द्वारा उन पितृगणोंको संतृप्त करना चाहिये।
गरुडने कहा— हे स्वामिन्! उस लोकसे आकर इस पृथ्वीपर श्राद्धमें भोजन करते हुए पितरोंको किसीने देखा भी है?
श्रीभगवान्ने कहा— हे गरुत्मन्! सुनो—देवी सीताका उदाहरण है। जिस प्रकार सीताने पुष्करतीर्थमें अपने ससुर आदि तीन पितरोंको श्राद्धमें निमन्त्रित ब्राह्मणके शरीरमें प्रविष्ट हुआ देखा था, उसको मैं कह रहा हूँ।
हे गरुड! पिताकी आज्ञा प्राप्त करके जब श्रीराम वन चले गये तो उसके बाद सीताके साथ श्रीरामने पुष्कर-तीर्थकी यात्रा की। तीर्थमें पहुँचकर उन्होंने श्राद्ध करना प्रारम्भ किया। जानकीने एक