हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
विषयानुक्रमणिका. ( २१ ) विषय. पृष्ठ. | विषय. पृष्ठ. लूतागंडमाला चिकित्सा .... ४१० | कुंकुमादिघृत .... ४२५ कुष्ठचिकित्सा .... ४१२ | भ्रूदोषलक्षण .... ४२६ कुष्ठोंके सामान्यभेद और लक्षण .... ४१३ | भ्रूदोषकी चिकित्सा .... ” कुष्ठोंके नाम ... ” | नासारोगलक्षण .... ४२७ कपाल व उदुंबर कुष्ठलक्षण .... ” | नासारोगचिकित्सा .... ४२८ मंडलकुष्ठ तथा गजचर्मकुष्ठका लक्षण ” | इंद्रलुप्तरोगका लक्षण .... ” गोजिह्वककुष्ठलक्षण .... ४१४ | इंद्रलुप्तरोगकी चिकित्सा .... ४२९ विपादिकाकुष्ठलक्षण .... ” | कर्णरोगलक्षण .... ४३० वातादिजन्यकुष्ठका लक्षण .... ” | कर्णरोगकी चिकित्सा .... ४३१ रक्तस्थकुष्ठ .... ४१५ | नेत्ररोगके लक्षण .... ४३२ मांसस्थ मेदस्थ तथा अस्थिस्थकुष्ठ ” | नेत्ररोगकी चिकित्सा .... ४३३ मज्जास्थ तथा शुक्रस्थ कुष्ठ .... ” | नेत्रके फूलेकी चिकित्सा .... ४३४ कुष्ठचिकित्सा .... ” | नेत्रपटलका लक्षण .... ४३५ शुंण्ठ्यादि क्वाथ .... ४१६ | नेत्रपटलचिकित्सा .... ” गुडूच्यादि क्वाथ .... ४१७ | नेत्ररोगमें वर्ज्य .... ४३६ कुष्ठरोगमें लेपविधि .... ” | मुखरोगकी चिकित्सा .... ” खदिरादि क्वाथ .... ४१८ | ओष्ठरोगकी चिकित्सा .... ” आरग्वधादि क्वाथ .... ” | दंतरोगलक्षण .... ४३७ खदिरादिघृतपानक .... ” | दंतरोगचिकित्सा .... ” भल्लातकतैल .... ४१९ | जिह्वारोगलक्षण .... ४३८ तिलतैल .... ” | जिह्वारोगचिकित्सा .... ” हरिद्रादितैल .... ” | गलगंडरोगके लक्षण .... ४३९ निंबादिघृत .... ” | गलगंडरोगकी चिकित्सा .... ” पांडुरकुष्ठकी चिकित्सा .... ४२० | गलशुंडिकारोगके लक्षण .... ४४० अथ शालाक्यतंत्र .... ४२१ | गलशुंडिकारोगकी चिकित्सा .... ” शिरोरोगचिकित्सा .... ” | नपुंसकके लक्षण .... ४४१ षट्बिंदुनामकतैल .... ४२४ | शुक्रवृद्धिके उपाय .... ४४२ बिंदुत्रयतैल .... ४२५ | विदार्यादि औषध .... ४४३ कुष्ठादिघृत .... ” | शुक्रवृद्धिमें वर्जित पदार्थ .... ” लाक्षादितैल .... ” | वंध्यारोगके लक्षण .... ४४४
( २२ ) हारीतसंहिता-
| विषय. | पृष्ठ. | विषय. | पृष्ठ. |
|---|---|---|---|
| वंध्यारोगके दूरकरनेवाले औषध .... | ४४५ | बालकोंके पूतनाका दोष .... | ४६१ |
| त्रिदोषदूषितरजकी चिकित्सा .... | ,, | भूतविद्या .... | ४६४ |
| पित्तदूषितरजकी चिकित्सा .... | ४४६ | ग्रहदोषनाशक धूप .... | ४६७ |
| कफदूषितरजकी चिकित्सा .... | ,, | भूतेश्वरमंत्र .... | ,, |
| स्त्रियोंके गर्भार्थ पथ्य .... | ४४७ | आवेश मंत्र .... | ४६८ |
| गर्भोपचारविधि .... | ,, | विषतंत्र .... | ,, |
| चलितगर्भचिकित्सा .... | ४४९ | मुखसिंचन मंत्र .... | ४६९ |
| गर्भोपद्रवचिकित्सा .... | ४५० | कानमें जपनेके वास्ते मंत्र .... | ,, |
| मधुकादि कल्क .... | ४५१ | विषशमन औषध .... | ४७० |
| गर्भोपद्रवमें उपचारकी शिक्षा .... | ४५२ | जंगमविषकी चिकित्सा .... | ४७१ |
| मूढगर्भचिकित्सा .... | ,, | विषबंधनमंत्र .... | ,, |
| मृतगर्भका लक्षण .... | ४५३ | लेप .... | ४७२ |
| वातिकमूढगर्भचिकित्सा .... | ,, | मंत्र .... | ४७३ |
| पैत्तिकमूढगर्भचिकित्सा .... | ,, | भिन्न अर्थात् शस्त्रादिसे टूटे- | |
| कफजमूढगर्भचिकित्सा .... | ,, | हुएकी चिकित्सा .... | ,, |
| रक्तपित्तजमूढगर्भचिकित्सा .... | ४५४ | भिन्नअस्थिकी चिकित्सा .... | ४७४ |
| मूढगर्भमें शस्त्रचिकित्सा .... | ,, | शल्योद्धारचिकित्सा .... | ४७५ |
| उत्पत्तिके उपायके वास्ते मंत्र और औषध | ४५५ | अस्थिभग्नकी चिकित्सा .... | ४७६ |
| सुखसे बालक होनेके यत्न .... | ,, | घृष्टहाड़की चिकित्सा .... | ४७७ |
| मन्त्र .... | ,, | आस्फालित हाड़की चिकित्सा .... | ४७८ |
| यंत्र .... | ४५६ | अभिघात अर्थात् चोट लगी हुईकी | |
| मंत्र .... | ,, | चिकित्सा .... | ,, |
| सूतिकारोगकी चिकित्सा .... | ,, | अग्निदग्ध चिकित्सा .... | ४७९ |
| स्त्रीके दूध बढ़ानेके उपाय .... | ४५७ | धूमपानचिकित्सा .... | ४८० |
| बालरोगनिदान और चिकित्सा .... | ४५८ | ||
| उत्फुल्लरोगकी चिकित्सा .... | ४५९ | इति तृतीयस्थानं समाप्तम् । | |
| बालरोगचिकित्साके अन्य उपाय .... | ,, | ||
| बालकोंकी वृद्धिको बढ़ानेवाले औषध | ४६० | अथ चतुर्थस्थानम् । | |
| बालकोंकी वाणीको करनेवाले औषध | ४६१ | तुलामानविधि.... .... | ४८१ |
| बालकोंके अपस्माररोगकी चिकित्सा | ,, | अन्यमत .... | ,, |
विषयानुक्रमणिका. (२३) विषय. पृष्ठ. | विषयः पृष्ठ. तैलपाकविधि .... .... ४८३ | त्रिफलाकाथ .... ४९१ निरूहबस्तिकर्मविधि .... ४८४ | हरडेके कल्प और वर्णोंका भेद ४९४ स्वेदनविधि .... .... ४८५ | रसोनकल्प .... ४९६ रक्तावसेच फस्त खुलानेकी विधि ४८६ | लहुसुनके गुण .... ४९८ रक्तलक्षण .... ... ४८७ | पेयरसोनविधि .... " जलौकाविचारविधि .... " | गुग्गुलकल्प .... ५०० इन्द्रायुधके लक्षण .... .... " | इति पञ्चमस्थानं समाप्तम् । रोहिणीके लक्षण .... .... " | अथ षष्ठं शारीरस्थानम् । कालिका जोखके लक्षण .... ४८८ | धूम्रा जोखके लक्षण .... .... " | शारीराध्याय .... ५०३ जोख लगवानेका क्रम .... " | नपुंसक तथा अपत्ययुग्मका विचार ५०७ इति चतुर्थस्थानं समाप्तम् । | नपुंसकका विचार .... " अथ पंचमं कल्पस्थानम् । | गर्भका विवर्णन .... ५०८ हरीतकीका कल्प .... ४८९ | परिशिष्टाध्याय .... ५११ इति हारीतसंहिताविषयानुक्रमणिका समाप्ता ।
(४५) विषयानुक्रमणिका
पृ. विषय । पृ. विषय १२४ .... अजापुच्छी । १४० .... पीतिकापुष्प ४२५ .... अपामार्ग विशेष परीक्षा । १४१ .... पीतिकाफलिकाफलानि १२६ .... एकमुण्डि । .... .... पिच्छिलद्रु १२७ .... लघु विष्णुकान्ता । १४४ .... गिरि पिप्पलीका फल प्रकार .... .... रोहितकद्वयम् । १४५ .... .... पिप्पला .... .... कनककुङ्कुम । .... .... पिप्पलीमूलभेद .... प्रकारान्तर रस .... .... .... मूल के प्रकार .... गन्धकशोधन दुग्ध द्वारा .... .... .... मूल ओषधि .... .... पृश्निपर्णि । १४६ .... लघुत्व संपादे प्रकारान्तर .... वलीपलितहर रस प्रकार । .... .... रस सिन्दूर गुण .... .... मान्दी द्रवण । .... .... विष द्रवीकरण प्रकार .... .... मान्दी द्रावण । .... प्रकारान्तर रससिन्दूर गुण १३२ .... लवणद्रावण । १४९ .... प्रकारान्तर सैन्धव द्रवण .... .... .... । १५३ .... विष द्रावणक्रिया .... रससिन्दूरनिर्गमनक्रियाविधानम् ती ... (चित्र / Floral Motif)
श्रीगणेशाय नमः । अथ हारीतसंहिता । भाषाटीकासमेता । ॥ प्रथमोऽध्यायः १. मंगलाचरण । नत्वा शिवं परमतत्त्वकलाविरूढं ज्ञानामृतैकचटुलं परमात्मरूपम् ॥ रागादिरोगशमनं दमनं स्मरस्य शश्वत्क्षपाधिपधरं त्रिगुणात्मरूपम् ॐ ॥ १ ॥ श्रीमद्देवीपदद्वन्द्वं प्रत्यूहव्यूहनाशनम् । तन्नमामि नतिर्य्यस्य वितरत्युत्तमां मतिम् ॥ १ ॥ शिवसहायपुत्रेण रविदत्तेन धीमता । हारीतसंहिताभाषाटीका रम्या विरच्यते ॥ २ ॥ परमतत्त्व रूप कलाको उत्पन्न करनेवाले, ज्ञानरूपी अमृतसे सुन्दर परमात्मरूप राग आदि रोगोंको शांत, कामदेवको दग्ध, निरंतर चन्द्रमाको मस्तकमें धारण करनेवाले, त्रिगुणात्मस्वरूप महादेवजीको प्रणाम करके ( यह हारीतसंहितानामक ग्रन्थ करता हूं ) ॥ १ ॥ २ ॥ आत्रेयहारीतसंवाद । हिमवदुत्तरे कूले सिद्धगन्धर्वसेविते॥शान्ते मृगगणाकीर्णे नाना- पादपशोभिते ॥ २ ॥ तत्रस्थं तपसा युक्तं तरुणादित्यतेजसम् ॥ शुद्धस्फटिकवच्छुभ्रं भूतिभूषितविग्रहम् ॥ ३ ॥ जटाजूटाटवी- मूलेऽषितं शुभ्रकुण्डलम् ॥ आत्रेयं बहुशिष्यैस्तु राजितं तपसा- न्वितम् ॥४॥ पप्रच्छ शिष्यो हारीतः सर्वज्ञानमिदं महत् ॥५॥
पादटिप्पणी (Footnotes): १ 'विरूढोऽङ्कुरिते जाते' इति मेदिनी । २ 'चटुलः सुन्दरेऽभियाम्'इत्यमरः। * संहितां करोमीति शेषेणान्वयः ।
( २ ) हारीतसंहिता । [ प्रथमस्थाने- सिद्ध और गन्धर्वोंसे सेवित, बाधाओंसे रहित, मृगोंके समूहसे व्याप्त और अनेक प्रकारके वृक्षोंसे शोभित हिमालयपर्वतके उत्तर कूल पर बैठे ॥ २ ॥ तरुण सूर्यके समान तेजवाले, तपसे युक्त शुद्ध हुए बिल्लौरी पत्थरके समान श्वेत और भूतिसे भूषित शरीर ॥ ३ ॥ जटाजूटरूपी वनके मूलमें बसनेवाले श्वेतकुंडलोंको धारण किये और बहुतसे शिष्योंसे शोभित, तपस्वी आत्रेयजी महाराजसे ॥ ४ ॥ हारीत नामके शिष्यने इस सम्पूर्ण महाज्ञानको पूछा ॥ ५ ॥ हारीत उवाच ॥ भवन् गुणगणाधार आयुर्वेदविदां वर ॥ विनयाद्विनीतोऽहं पृच्छामि मुनिपुङ्गव ॥ ६॥ कथं रोगसमुत्प- त्तिरुत्पन्नो ज्ञायते कथम्॥ उपचारः प्रचारश्च कथं वा सिद्धिम- च्छति ॥७॥ एतत्सम्यक्परिज्ञानं कथयस्व महामुने ॥ एवं पृष्टो महाचार्यो हारीतेन महात्मना ॥ प्रत्युवाच ऋषिः पुत्रं प्रहस्योत्फुल्ललोचनः ॥ ८ ॥ हारीत बोले-हे पूज्य ! हे गुणोंके समूहके आधार ! हे आयुर्वेदके जाननेवालोंमें श्रेष्ठ ! हे मुनियोंमें उत्तम ! अशिक्षित मैं विनयसे पूछता हूँ ॥ ६ ॥ कैसे रोगकी उत्पत्ति होती है ? उत्पन्न हुआ रोग कैसे जाना जाता है ? रोगकी चिकित्सा और पथ्य कैसे होता है ? और वही रोग कैसे सिद्धिको प्राप्त होता है ? ॥ ७ ॥ हे महामुने ! इस परिज्ञानको अच्छी तरह कहो । इस प्रकार महात्मा हारीतसे पूछे गये खिले हुए नेत्रवाले महा आचार्य आत्रेयजी हँसकर शिष्य हारीतसे बोले ॥ ८ ॥ आत्रेय उवाच ॥ शृणु पुत्र महाप्राज्ञ सर्वशास्त्रविशारद ॥ चिकित्साशास्त्रकुशल वैद्यविद्याविचक्षण ॥ ९ ॥ आयुर्वेदमपा- रन्तु श्लोकानां लक्षसंख्यया ॥ कथं तस्य परिज्ञानं कालेनाल्पेन पुत्रक ॥ १० ॥ आत्रेयजी कहते हैं-हे पुत्र ! हे महाप्राज्ञ ! हे सर्वशास्त्रोंमें कुशल ! हे चिकित्साशा- स्त्रमें कुशल ! हे वैद्योंकी विद्याके जाननेवाले ! ॥ ९ ॥ हे पुत्र ! श्लोकोंकी लक्ष संख्यासे युक्त आयुर्वेद अपार है । उसका परिज्ञान थोड़े समयमें कैसे हो सकता है ? ॥ १० ॥ अल्पायुषोऽल्पवक्तारः स्वल्पशास्त्रविशारदाः ॥ अल्पावधारणे शक्ताः कलौ जाता इमे नराः ॥ ११ ॥ अल्पः कलियुगश्चायं नरोपद्रवकारणम् ॥ कथं पुत्र प्रवक्ष्यामि विस्तरेण तवा- गमम् ॥ १२ ॥
अ० १ ] भाषाटीकासमेता । ( ३ ) अल्प आयुवाले और अल्प बोलनेवाले और स्वल्प अर्थात् थोड़े शास्त्रको जाननेवाले और थोड़ा धारण करनेवाले अर्थात् अल्पबुद्धि ये मनुष्य कलियुगमें उत्पन्न होते हैं ॥ ११ ॥ यह कलियुग भी अल्परूप है परंतु मनुष्योंके उपद्रवोंका कारण है इसलिये हे पुत्र ! विस्तारसे तुमसे वैद्यक शास्त्र कैसे कहूँ ॥ १२ ॥ यस्य श्रवणकालो यो याति चान्तश्च पुत्रक ! ॥ तस्माच्चाल्पत- रेणाऽपि वक्ष्यामि शृणु साम्प्रतम् ॥ १३ ॥ चतुर्विंशसहस्रैस्तु मयोक्ता चाद्यसंहिता ॥ तथा द्वादशसाहस्री द्वितीया संहिता मता ॥ १४ ॥ तृतीया षट्सहस्रैस्तु चतुर्थी त्रिभिरेव च ॥ १५ ॥ पञ्चमी द्विकपञ्चशतैः प्रोक्ताः पञ्चात्र संहिताः ॥ तस्माच्चाल्पत- रेणापि वक्ष्यामि शृणु पुत्रक ॥ १६ ॥ जिस वैद्यकके सुननेका जो समय है वह तत्काल ही समाप्त हो जाता है अर्थात् दिन जाते देर नहीं लगता इसलिये इस समय मैं तुमसे संक्षेप ही में कहूँगा, सुनो ॥ १३ ॥ मैंने चौबीस हजार श्लोकोंसे युक्त प्रथम संहिता कही है और तैसे ही बारह हजार श्लोकोंसे संयुक्त दूसरी संहिता कही है ॥ १४ ॥ और तैसे ही छः हजार श्लोकोंसे युक्त तीसरी संहिता कही है और तीन हजार श्लोकोंसे संयुक्त चौथी संहिता कही है ॥ १५ ॥ और डेढ़ हजार अर्थात् पंद्रहसौ श्लोकोंसे संयुक्त पाँचवीं संहिता कही है। ऐसे पांच संहिता मैने कही हैं इसलिये हे पुत्र ! मैं संक्षेपसे कहूँगा तुम सुनो ? ॥ १६ ॥ येन विज्ञानमात्रेण गदवेदविदो भवेत् ॥ किमत्र बहुनोक्तेन चा- ल्पसारे विशारद ॥ १७ ॥ येन धर्मार्थसौख्यं च तद्धि कर्म समाचरेत् ॥ येन संजायते श्रेयो येन कीर्तिमहत्सुखम् ॥ १८ ॥ तत्कर्म नितरां साध्यं जनानन्दविधायकम् ॥ १९ ॥ जिसके जानने मात्रसे आयुर्वेदको जाननेवाला मनुष्य हो जाता है, हे विशारद ! अल्प,आयु, बुद्धि और बलवाले इस कलिमें अधिक कहनेसे लाभ ही क्या ? ॥ १७॥ जिस कर्मसे धर्म, अर्थ और सुख प्राप्त हो, जिससे कल्याण हो और जिससे कीर्ति तथा महा आनन्द प्राप्त हो वही कर्म करे ॥ १८ ॥ वह कर्म अवश्य करे जो मनुष्योंको आनन्द देनेवाला है ॥ १९ ॥ १ इस संहितामें १०३ अध्याय और ३९१७ श्लोक हैं। मेरी समझमें यह ३ हजार श्लोकवाली संहिता है । १५ वें इसी श्लोकके अनुकूल इस संहितामें सैकड़ों श्लोक एक या दो चरणके हो श्लोक पूर्ण माने गये हैं। वही सब मिलकर ९१७ हो गये हैं । इनमें भी बहुत कुछ सुधारने योग्य सुधारे गये हैं ।
( ४ ) हारीतसंहिता । [ प्रथमस्थाने- एकं शास्त्रं वैद्यमध्यात्म कं वा सौख्यं चैकं यत्सुखं व तपो वा ॥ वन्द्यश्चैको भूपतिर्वा यतिर्वा एकं कर्म श्रेयसं वा यशो वा ॥२०॥ बहुतरमुपचारात् सारमाधारलोके जननमतिसुखानां वर्द्धनं श्रेयसां वा ॥ विगतकलुषभावा चोज्ज्वला कीर्त्तिमूर्त्तिर्न खलु कुटिलतास्याः श्रूयते लोकवृन्दैः ॥ २१ ॥ एक ही शास्त्र ठीक है, वैद्यक अथवा वेदांत और सुख भी एक ही ठीक है, भोग अथवा तप, वंदनाके योग्य भी एक ही ठीक है, राजा अथवा संन्यासी, कर्म भी एक ही ठीक है, कल्याण अथवा यश ॥ २० ॥ इस संसारमें चिकित्सा करनेसे अपने और दूसरोंके सुखोंको देनेवाला, कल्याणके बढ़ानेवाला बहुत सा लाभ होता है । कलुषतासे हीन, उज्ज्वल कीर्ति प्राप्त होती है । उसकी कुटिलता मनुष्योंके द्वारा कहीं नहीं सुनी जाती ॥ २१ ॥ आयुर्वेदमिदं सम्यङ् न देयं यस्य कस्यचित् ॥ २२ ॥ नाभ- क्तायाप्यशान्ताय न मूर्खाय न चाधमे ॥ शान्ते देयं न देयं स्यात् सर्वथा नाधमेऽधने ॥ २३ ॥ अच्छी तरहसे यह आयुर्वेद हर एक मनुष्यको नहीं देना चाहिये ॥२२॥ अभक्त, शान्त, मूर्ख और नीचको कभी न दे । शान्त पुरुषको दे। नीचप्रकृति और कंगालको न देना चाहिये॥२३॥ धर्मिष्ठः कुहनाविर्वाजतमनाः शान्तः शुचिः शुद्धधीर्धीरो- ऽभीरुविवेकसारहृदयो विद्याविलासोज्ज्वलः॥प्राज्ञो रोगगणप्र- चारनिपुणोऽलुब्धः सदा तोषधृगित्थं सर्वगुणाकरो नृपजनैः पूज्यः सदा रोगवित् ॥ २४ ॥ धर्ममें स्थित, कपटसे वर्जित मन, शांत, पवित्र, शुद्धःबुद्धि, धीर, निर्भय, विवेकके सारसे संयुक्त हृदय, विद्याके आनंदसे प्रकाशित, पंडित, रोगोंके समूहके प्रचारमें, निपुण, निर्लोभी, सब कालमें संतोषको धारनेवाला और सब गुणोंका खजाना वैद्य राजालोगोंका पूज्य होता है ॥२४॥ दृष्ट्वा यथा मृगपतिं गजयूथनाथः संशुष्कमानमदबिन्दुकपोल धारस्त्यक्त्वा वनं व्रजति चाकुलमानसेन दृष्ट्वा तथा गद्गजौ १ 'नद्याग्निः कुहना लोभान्मिथ्येर्यापथकल्पना' इत्यमरः । लोभात् परधनाद्यभिलाषात् या मिथ्येर्या- पथकल्पना दंभेन ध्यानमौनादिसंपादनं सा कुहनेत्यमरविवेके महेश्वरः ।
अ० १] भाषाटीकासमेता । (५) भिषजं प्रयाति ॥२५॥ यद्वत्तमोवृतमिदं भुवनं मयूखैः प्राका- श्यमाशु कुरुते सकलं रविस्तु ॥ तद्वत्सुवैद्य उपलभ्य रुजो- ऽतिनाशं शीघ्रं करोति गदिनं गदमुक्तभारम् ॥ २६ ॥ जैसे सिंहको देखके हस्तियोंके समूहके स्वामीकी मदबिंदुओंकी धारा गंडस्थलमें ही सूख जाती है और वह हाथी उस वनको त्याग व्याकुल मन करके भागता है तैसे वैद्यको देख कर रोगरूपी गजराज गमन करता है ॥ २५॥ जैसे अन्धकारसे आच्छादित इस समस्त संसार- को सूर्य अपनी किरणोंसे प्रकाशित कर देता है तैसे ही सुवैद्य रोगको नाशकर रोगीको रोगके भारसे छुड़ा देता है ॥ २६ ॥ लुब्धः क्रूरः१ शठजठरको मद्यपश्चालसश्चाधीरो भीरुर्विकलहृदयो हीनकर्मार्थमन्दः॥ शास्त्रज्ञाताऽप्यविदितगदज्ञानपाखण्डखण्डो वर्ज्यो वैद्यः प्रबलमतिभिर्भूमिपैर्वा सुदूरात् ॥ २७ ॥ लोभी, हिंसक, शठ, कठोर, मदिरा पीनेवाला, आलसी, अधीर, डरनेवाला, विकल हृदय, हीनकर्मवाला, कंगाल, वैद्यक न जाननेवाला, पाखंडी ऐसा वैद्य यदि अन्यशास्त्रोंके जाननेवाला भी हो तो भी उसको अच्छी बुद्धिवाले राजाओंको दूर रखना चाहिये ॥ २७ ॥ वैद्यशास्त्रपठनविधि । अद्रुतं चाप्यशङ्कञ्च नात्युच्चं नीचमेव च ॥ यः पठेच्छास्त्रमि- त्यञ्च शास्त्राप्तिस्तस्य दृश्यते ॥ २८ ॥ चर्वणं गिलनं चापि कम्पितं श्वसितं तथा॥नीचोच्चं चैव गम्भीरं वर्जयेत्पाठकेनतु२९ जो विचार विचार कर बे खौफ न अति उच्चस्वरमें न अति नीचस्वरमें पढ़ता है, उसे शास्त्रकी प्राप्ति होती है ॥ २८ ॥ चाबना, निगलना, काँपना, अतिश्वास लेना, नीचापना, ऊँचापना और गंभीरपना विद्यार्थीको छोड़ देना चाहिये ॥ २९ ॥ अनध्याये न शास्त्रस्य नोत्सवे यज्ञकर्मसु ॥ जातके सूतके चाथ पठनं न विधीयते ॥३०॥चतुर्दश्यष्टमीदर्शप्रतिपत्पूर्णिमास्तथा॥ वर्ज्याः पञ्च इमाः पाठे मुनिभिः परिकीर्तिताः ॥ ३१ ॥ अकाले दुर्दिने गर्जे दिग्दाहे भूमिकम्पने ॥ शास्त्रपाठस्तथा वर्ज्यो ग्रहणे १ 'नृशंसो धातुकः क्रूरः' इत्यमरः ।
( ६ ) हारीतसंहिता । [ प्रथमस्थाने० चन्द्रसूर्य्ययोः॥३२॥अनध्याया द्वादशैते प्रोक्ताः शृणु तु पुत्रक॥ गुरुपीडासमुत्पन्ने नृपे संपीडितेऽथवा ॥ ३३ ॥ आहवे जीवस- म्पाते प्रदोषे वाऽथवा पुनः ॥ राष्ट्रपीडासमुत्पन्ने न कुर्य्याच्छा- स्त्रपाठनम् ॥३४॥ एतैस्तु पठितं शास्त्रं न स्वार्थे सिद्धिसाध- कम् ॥ न श्रेयसे न माङ्गल्ये नोपकारे सुखावहम् ॥ ३५ ॥ अनध्याय, उत्सव, यज्ञकर्म, जन्मका सूतक और मृतसूतकमें शास्त्रको नहीं पढ़ना चाहिये ॥ ३० ॥ चतुर्दशी, अष्टमी, अमावास्या, प्रतिपदा, पूर्णिमा ये पाचों तिथियां मुनिजनोंने पढ़नेमें वर्जी हैं ॥३१॥ अकाल, दुर्दिन, गङ्गर्जना, दिग्दाह, भूमिकंप अर्थात् भूचाल, चंद्रमाका ग्रहण और सूर्यके ग्रहणमें शास्त्रका पढ़ना वर्जित है ॥ ३२ ॥ हे पुत्र ! बारह अनध्याय कहे हैं, तुम सुनो । गुरुके पीडा उत्पन्न होनेपर, राजाके पीडित होनेपर ॥३३॥ युद्ध, जीवोंके मरनेपर, प्रदोष, देशके दुःखित होनेपर ॥ ३४ ॥ इन अनध्यायोंमें पठित किया शास्त्र अपने प्रयोजनमें सिद्धिको नहीं देता और कल्याणको नहीं करता और मंगलको नहीं देता और उपका- रमें सुखको नहीं देता ॥ ३५ ॥ एवं ज्ञात्वा पठति निपुणो वैद्यविद्यानिधानं श्रेयस्तस्य प्रतिदिन मसौ वाञ्छितार्थं प्रपद्येत् ॥ कीर्त्तिः सौख्यं भवति नितरां तस्य लोकप्रशंसा पूज्यो राज्ञां सततमपि वै जायते स्वार्थसिद्धिः॥३६॥ इति आत्रेयभाषिते हारीतोत्तरे वैद्यगुणदोषशास्त्रपठनवि- धिर्नाम प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥ ऐसे जानके जो कुशल वैद्य शास्त्रका पठन करता है उसको कल्याण मिलता है और नित्यप्रति मनोवांछित प्रयोजन प्राप्त होता है और उस वैद्यको नित्यप्रति सुख होता है, संसारमें कीर्ति और प्रशंसा प्राप्त होती है और अपने प्रयोजनकी सिद्धि होती है और ऐसे पठन करने- वाला पंडित राजा लोगों करके निरंतर पूजनेके योग्य है ॥ ३६ ॥ इति बेरीनिवासि-बुध- शिवसहायतनयवैद्यरविदत्तशास्त्रि-अनुवादित-हारीतसंहिताभाषाटीकायां प्रथमस्थाने वैद्यगुणदोष- शास्त्रपठनविधिर्नाम प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥
अ० २ ] भाषाटीकासमेता । (७) द्वितीयोऽध्यायः २. चिकित्सासंग्रह । आत्रेय उवाच ॥ अथातः संप्रवक्ष्यामि शास्त्रस्यास्य समुच्चयम् ॥ आयुर्वेदसमुत्पत्तिं सर्वशास्त्रार्थसंग्रहम् ॥ १ ॥ आत्रेयजी कहते हैं-इस पहिले अध्यायको कहकर अब दूसरे अध्यायमें इस शास्त्रके समुच्चय आयुर्वेदकी समुत्पत्ति और सब शास्त्रोंके अर्थके संग्रहको कहूंगा ॥ १ ॥ अष्टौ चात्र चिकित्साश्च तिष्ठन्ति भिषजां वर ॥ ता वक्ष्यामि समासेन चिकित्साश्च पृथक्पृथक् ॥ २ ॥ हे वैद्योंमें श्रेष्ठ ! इस ग्रन्थमें आठ प्रकारकी चिकित्सायें स्थित हैं, सम्पूर्णतासे उन्हें और भांति भांतिकी चिकित्सायें कहूँगा ॥ २ ॥ संग्रहस्य प्रवक्ष्यामि प्रथमं चान्नपानकम् ॥ अरिष्टं च द्वितीयं स्यात्तृतीय च चिकित्सितम् ॥३॥ कल्पं चतुर्थकं प्रोक्तं सूत्र- स्थानन्तु पञ्चमम् ॥ षष्ठं चात्र शरीरं स्यादित्यायुर्वेदकारकाः ॥४॥ शल्यशालाक्यकायाश्च तथा बालचिकित्सितम् ॥ अगदं विषतन्त्रञ्च भूतविद्या रसायनम् ॥ वाजीकरणमेवेति चिकित्सा चाष्टधा स्मृता ॥५॥ वैद्यागमेषु सर्वेषु प्रोक्तं श्रेष्ठमिदं महत् ॥ तथा चाष्टौ चिकित्सायां वदन्ति वेदविज्जनाः ॥ ६ ॥ संग्रहके अन्नपानामक प्रथमस्थान, अरिष्ट नामवाले दूसरे स्थान और चिकित्सित नामवाले तीसरे स्थानको कहूंगा ॥ ३॥ कल्प नामवाला चौथा स्थान है, सूत्रस्थान पाँचवाँ है, शारीर- स्थान छठा है ऐसा आयुर्वेदको करनेवाले कहते हैं ॥ ४ ॥ शल्य, शालाक्य, कायचिकित्सा, बालचिकित्सित, अगद, विषतंत्र, भूतविद्या, रसायन, वाजीकरण इसतरह चिकित्सा आठ प्रकारसे कही है॥५॥ वैद्योंके सब ग्रन्थोंमें यह उत्तम और बड़ा ग्रन्थ माना है तथा आयुर्वेदज्ञोंने चिकित्सा में यह आठ प्रकारकी चिकित्सा श्रेष्ठ कही है ॥ ६ ॥ यन्त्रशस्त्राग्निक्षाराणामौषधं पथ्यमेव च ॥ स्वेदनं मर्दनं चैव कथितान्युपकारिणाम् ॥ ७ ॥ यंत्रकर्म, शस्त्रकर्म, अग्निकर्म, क्षारकर्म, औषध, पथ्य, स्वेदन और मर्दन यह आठ श्रेष्ठ चिकित्सायें उपकार करनेवाली चिकित्साओंमें श्रेष्ठ कही गयी है ॥ ७ ॥
एतैर्वैद्यकशास्त्रस्य सारो भवति सर्वतः ॥ ८ ॥ इन्हीं आठोंसे वैद्यक शास्त्रका सब ओरसे काम निकल आता है ॥ ८ ॥ अथ शल्यतन्त्र । यन्त्रशास्त्रार्थबन्धैस्तु येन चोद्ध्रियते भिषक् ॥ तच्च शल्योद्धरणकं प्रोच्यते वैद्यकागमे ॥ नाराचवालवल्लीभिर्भल्लैः कुन्तैश्च तोमरैः ॥ ९ ॥ शिलाग्निभिन्नगात्रस्य तत्र सार्यादिशल्यकम् ॥ १० ॥ तत्प्रतीकारकरणं तच्च शल्यचिकित्सितम् ॥ तथा बाणसमु- द्दिष्टतृणपांशुकृमीकचम् ॥ रक्तवस्तु तथा पेशी पूयं शेषान्तरेऽपि यत् ॥ ११॥ तच्छल्यमिति जानीयाल्लोष्ठकाष्ठविभिन्नकम्॥ १२॥ वैद्य यंत्र, शस्त्रार्थबन्धनोंसे तथा जिस शल्यसे रोगको दूर करता है, वैद्यक शास्त्रमें उसे शल्यो- द्धरण कहा जाता है । बाण, केश, वल्ली, भल्ली, कुन्त और तोमरोंसे शिला और अग्निसे भिन्न गात्रवाले पुरुषके शरीरमें प्राप्त शल्यके निकालनेका उपाय करना शल्यचिकित्सा कहलाता है॥९॥१०॥ और बाण अर्थात् तीरका उद्देश लेके कहा हुआ तृण, फांस, कीड़ा, बाल, आदि लाल चीज, मांसकी पेशी, राद और शेष अन्तरमें जो कुछ हो और लोहा, लकड़ी आदि जो है इन सबोंको शल्य जानना वह शल्यतंत्र है॥ ११॥ १२॥ अथ शालाक्य । शिरोरोंगा नेत्ररोगा कर्णरोगा विशेषतः ॥ भ्रूकण्ठशंखमन्यासु ये रोगाः सम्भवन्ति हि ॥ १३ ॥ तेषां प्रतीकारकमे नासावर्त्य- ञ्जनानि च ॥ अभ्यङ्गं मुखगण्डूषक्रियाशालाक्यनामिका॥ १४॥ इति शालाक्यं नाम ॥ अथ शालाक्य तंत्रका लक्षण-शिरके रोग, नेत्रोंके रोग, कानके रोग और विशेष करके भ्रुकुटी, कनपटी और कंधामें उत्पन्न जो रोग ॥ १३ ॥ उनके दूर करनेके लिये जो नस्यकर्म, अंजन, अभ्यंग अर्थात् मालिस, गंडूष अर्थात् कुल्ले करना आदि क्रिया ये सब शालाक्य कहलाते हैं ॥ १४ ॥ अथ कायचिकित्सा । कषायचूर्णगुटिकाः पञ्चानां शोधनानि च ॥ कोष्ठामयानां शमनी क्रिया कायचिकित्सितम् ॥ १५ ॥ १-( श्लो० १३ ) मन्याग्रीवायाः पश्चाद्देशस्थाशिरा ( मु०घ० )
अ० २ ] भाषाटीकासमेता । ( ९ ) अथ कायचिकित्साका लक्षण-काढ़ा, चूरन और गोली स्वेदन, स्नेहन, वमन, विरेचन और बस्तिकर्म ये सब और कोष्ठके रोगोंको शांत करनेवाली क्रिया कायचिकित्सित कहाती है ॥ १५ ॥ अथ अगदोंके नाम । गुदामयं बस्तिरुजं शमनं बस्तिरूहकम् ॥ आस्थापनानुवासन्तु अगदं नामएव च ॥ १६ ॥ अथ अगदतंत्रलक्षण-गुदाके रोग और मूत्राशयके रोगको शांत करना, निरूहबस्ति, आस्थापन बस्ति, अनुवासन बस्ति ये सब अगदतन्त्रनामसे विख्यात हैं ॥ १६ ॥ अथ बालचिकित्सा । गर्भोपक्रमविज्ञानं सूतिकोपक्रमस्तथा ॥ बालानां रोगशमनी क्रिया बालचिकित्सितम् ॥ १७॥ अथ बालचिकित्सितका लक्षण-गर्भके भलीभांति आरम्भका सूतिकाकी चिकि- त्साका विज्ञान और बालकोंके रोगको शमन करनेवाली क्रिया बालचिकित्सा कहलाती है॥ १७॥ अथ विषतन्त्रके नाम । सर्पवृश्चिकलूतानां विषोपशमनी तु या ॥ सा क्रिया विषतन्त्रञ्च नाम प्रोक्ता मनीषिभिः ॥ १८ ॥ अथ विषतन्त्रका लक्षण-सांप, बीछू और मकड़ीके विषको शांत करनेवाली क्रिया बुद्धिमानोंसे विषतन्त्र नामकी कही जाती है ॥ १८ ॥ अथ भूतविद्याकानाम । ग्रहभूतपिशाचाश्च शाकिनीडाकिनीग्रहाः ॥ एतेषां निग्रहः सम्यग्भूतविद्या निगद्यते ॥ १९ ॥ अथ भूतविद्याका लक्षण-ग्रह, भूत, पिशाच, डाकिनी, शाकिनी, ग्रह इनका अच्छी तरह निग्रह करना भूतविद्या कहाती है ॥ १९ ॥ अथ वाजीकरण । क्षीणानां चाल्पवीर्याणां बृंहणं बलवर्द्धनम् ॥ तर्पणं समधातूनां वाजीकरणमुच्यते ॥ २० ॥
१ 'ज्ञात्वारम्भ उपक्रमः, प्रक्रमः स्यादुपक्रमः, उपायपूर्व आरम्भ उपधा चाप्युपक्रमः' इत्यमरः । २ ग्रहशब्देभ्य पुनरुक्त्या बालग्रहाणां सूर्यादीनां च ग्रहणम् ।
(१०) हारीतसंहिता । [ प्रथमस्थाने- अथ वाजीकरणका लक्षण-क्षीण हुए और अल्प वीर्यवाले मनुष्योंको पुष्ट करना और बलको बढ़ाना और समान धातुवालोंको तृप्त करना यह वाजीकरण कहाता है ॥ २० ॥ अथ रसायन तन्त्र । देहस्येन्द्रियदन्तानां दृढीकरणमेव च ॥ वलीपलितखालि- त्यवर्जनेऽपि च या क्रिया ॥ २१ ॥ पूर्ववैद्यप्रणीतं हि तद्रसायन- मुच्यते ॥ २२ ॥ अथ रसायनका लक्षण-शरीर, इंद्रिय और दंतोंको दृढ करना और शरीरकी वली, बालोंकी सफेदी और चँदुआपनको हटानेवाली जो क्रिया ॥ २१ ॥ और पूर्ववैद्य धन्व- न्तरि आदिका बनाया वह रसायनके नामसे कहा जाता है ॥ २२ ॥ अथ उपांगचिकित्सा । छिन्नं भिन्नं तथा भग्नं क्षतं पिच्चितमेव च ॥ तेषां दग्धप्रतीकारः प्रोक्तश्चोपाङ्गसंज्ञकः ॥ २३ ॥ अथ उपांगचिकित्साका लक्षण-छिन्न अर्थात् छेदित हुआ, भिन्न अर्थात् विदारित हुआ, भग्न अर्थात् टूटा हुआ, क्षत अर्थात् घाव आदि, पिच्चित अर्थात् पिचलित हुआ, दग्ध अर्थात् जला हुआ इनकी चिकित्साको उपांगसंज्ञक कहते हैं ॥ २३ ॥ इति वैद्यकसर्वस्वं चिकित्सागमभूषणम् ॥ पठित्वा तु सुधीः सम्यक्प्राप्स्यते सिद्धिसङ्गमम् ॥ २४ ॥ इति वैद्यकसर्वस्वे चिकित्सासंग्रहो नाम द्वितीयोऽध्यायः॥२॥ ऐसे चिकित्सारूपी शास्त्रसे भूषित हुआ वैद्यकसर्वस्व वैद्य अच्छी तरह पढ़के सिद्धिको प्राप्त होता है ॥ २४ ॥ इति बेरीनिवासिबुधशिवसहायसूनुवैद्यरविदत्तशास्त्रि-अनुवादितहारीतसंहिताभाषा- टीकायां प्रथमस्थाने चिकित्सासंग्रहो नाम द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥ तृतीयोऽध्यायः ३. वैद्यशिक्षाविधान । अथ वक्ष्यामि रोगाणामुपचारक्रमं तथा ॥ जानाति यो बुधः सम्यक् पूज्यते नृपसत्तमैः ॥ १ ॥ अथ रोगोंके चिकित्साक्रमके लक्षण-इसके अनंतर रोगोंकी चिकित्साके क्रमको- कहूंगा जो पंडित इसको अच्छी तरह जानता है वह राजालोगोंसे पूजित होता है॥ १ ॥
अ० ३] भाषाटीकासमेता । ( ११ ) उपचारकरनेकी योग्यता । ज्ञात्वा रोगसमुत्पत्तिं रोगाणामप्युपक्रमम् ॥ ज्ञात्वा प्रतिक्रियां वैद्यः प्रतिकुर्य्याद्यथोचिताम् ॥ २ ॥ कुशल वैद्य रोगकी उत्पत्ति, रोगोंके पथ्य आदि और चिकित्साको जानके पश्चात् यथोचित प्रतिकार करे ॥ २ ॥ देश-काल आदिका ज्ञान । देशं कालं वयो वह्निं सात्म्यप्रकृतिभेषजम् ॥ देहं सत्त्वं बलं व्याधेर्दृष्ट्वा कम समाचरेत् ॥ ३ ॥ देश, समय, अवस्था, जठराग्नि, सानुकूलता, प्रकृति, औषध, देह, सत्त्व, और रोगका बल देखके पीछे चिकित्साका आरंभ करे ॥ ३ ॥ उपचारकरनेका फल । धर्मार्थकामलाभः स्यात् सम्यगातुरसेवनात् ॥ यदा नाचरतस्तस्य विनाशश्चात्मनस्तदा ॥ ४ ॥ रोगीकी अच्छी तरह चिकित्सा करनेसे धर्म, अर्थ, और कामकी प्राप्ति होती है । जो वैद्य रोगीकी चिकित्सा नहीं करता उस वैद्यके शरीरका नाश हो जाता है ॥ ४ ॥ वैद्यका वैद्यत्व । व्याधेस्तत्त्वपरिज्ञानं वेदनायाश्च निग्रहः ॥ एतद्वैद्यस्य वैद्यत्वं न वैद्यः प्रभुरायुषः ॥ ५ ॥ रोगके तत्त्वको जानना, पीड़ाका नाश करना, वैद्यका यही वैद्यपना है और आयुका मालिक वैद्य नहीं है ॥ ५ ॥ दो प्रकारका उपचार-उपक्रम । द्विविधोपक्रमश्चैव शमनः कोपनो रुजाम् ॥ तथैव ज्ञात्वा विबुधः क्रियां कुर्य्याद्विचक्षणः ॥ ६ ॥ चिकित्सा २ प्रकारकी है, एक शमन दूसरी कोपन । सो रोगको जानके कुशल वैद्य क्रियाको करे ॥ ६ ॥ दो प्रकारके वैद्य । वैद्योऽपि द्विविधो ज्ञेयो विकारेङ्गितरोगयोः ॥ उपचारापचारज्ञो द्विविधः प्रोच्यते भिषक् ॥ ७ ॥ उपचारेण शमनमपचारेण कोपनम् ॥ एवं विज्ञाय सवैद्यः कुर्य्यात् संशमनक्रियाम् ॥८॥
( १२ ) हारीतसंहिता । [ प्रथमस्थाने- वैद्य भी २ प्रकारका है, रोगके उपचार अर्थात् चिकित्साको जाननेवाला और रोगके अपचार अर्थात् दुष्परिणामको जाननेवाला ऐसे दो प्रकारका वैद्य कहा है॥७॥ उपचारसे रोगकी शांति होती है, अपचारसे रोगका कोप होता है, कुशलवैद्य ऐसा समझकर संशमन अर्थात् रोगको शांत करनेवाली क्रिया करें ॥ ८ ॥ व्याधिके साध्य और असाध्यका विचार । साध्योऽसाध्यश्च याप्यश्च कृच्छ्रसाध्यस्तथैव च ॥ व्याधिश्चतु- र्विधः प्रोक्तः सद्द्यैः शास्त्रकोविदैः ॥९॥ उपचारेण साध्या ये रोगा गच्छन्ति याप्यताम्॥ याप्यास्त्वसाध्यतां यान्ति साध्यः कष्टेन पुत्रक ॥१०॥ सम्भवन्ति महोरोगाः कष्टसाध्या म्रियें- न्ति वै ॥ एवं चतुर्विधो व्याधिर्ज्ञात्वा कर्म समाचरेत् ॥११॥ साध्य,असाध्य, याप्य, कष्टसाध्य इन भेदोंसे रोग भी ४ प्रकारके कुशल वैद्योंने कहे हैं॥९॥ हे पुत्र ! चिकित्साके नहीं करनेसे साध्यरोग याप्यपनेको प्राप्त होते हैं और याप्य रोग असाध्यपने- को प्राप्त होते हैं साध्य कष्ट करके ॥ १० ॥ महारोग होते हैं और कष्टसाध्य रोगवाले मर जाते हैं इस तरह व्याधि चार प्रकारकी जानकर कर्मका आचरण करे ॥ ११ ॥ उपचारका फल । उपचारकृता दोषाः कृच्छ्रास्त यान्ति याप्यताम् ॥ याप्याः साध्यत्वमायान्ति कष्टसाध्यं भवेद्ध्रुवम् ॥ १२ ॥ सुखसाध्यः सुखी शीघ्रं स्यात् सुधीभिरुपक्रमैः ॥ साध्यासाध्यपरिज्ञाने ज्ञात्वोपक्रमणं तथा ॥ १३ ॥ चिकित्साके करनेसे कष्टसाध्य रोग याप्यपनेको प्राप्त होते हैं और याप्य रोग साध्यपनेको प्राप्त होते हैं ऐसे कष्टसाध्यकी व्यवस्था है॥ १२ ॥ सुवैद्योंकी चिकित्सासे सुखसाध्य रोगी शीघ्र सुखी होजाता है । इसलिये साध्य और असाध्यके परिज्ञानको जानकर पीछे चिकित्सा करें १३॥ दोषके शेष रहजानेसे हानि । साध्य गतो यदा रोगो दोषशेषं न धारयेत् ॥ दोषशेषेऽपि कष्टं स्यात्तस्माद्यत्नान्निकृन्तयेत्॥१४॥यथा हि कालो दुष्टः स्यात् सूक्ष्मोऽग्निश्च यथा कणः॥स्वल्पस्तद्वत् क्रियाप्राप्तो गदो घोर- १ म्रियन्ति इत्यार्षः ।
अ० ३ ] भाषाटीकासमेता । ( १३ ) तरो भवेत्॥१५॥तथा दोषस्य शेषे तु शमनं याति चाल्पशः॥ दैवाद्यदुष्टतां याति यथाग्निः कुपितो भृशम् ॥ १६ ॥ जब साध्य रोग हो तब वात आदि दोषके शेषको नहीं धारण करना क्योंकि दोषके बाकी रहनेमें कष्ट हो जाता है इसलिये दोषका नाश कर दे ॥ १४॥ जैसे काल दुष्ट होता है जैसे अग्निका सूक्ष्म किनका बढ़ जाता है तैसे क्रियाको नहीं प्राप्त हुआ स्वल्प भी रोग अतिघोर हो जाता है ॥ १५ ॥ दोषके शेषमें अतिअल्परोग शांत हो जाता है परंतु दैवयोगसे यदि फिर दूषित होजाता है तो दवे अग्नि ही के समान कुपित होता है ॥ १६ ॥ अपथ्यसे हानि । यथा काष्ठचय दूरात् प्राप्य घोरतरोऽग्निकः ॥ तथा पथ्यस्य संयोगाद्भवद्धोरतरो गदः ॥ १७ ॥ कषायैश्च फलैश्चूर्णैः पिण्डलेहानुवासनैः ॥ सर्वाः क्रिया भृशं व्यर्था न शमं याति चामयः ॥ १८ ॥ जैसे काष्ठके समूहमें दूरसे प्राप्त हुआ अग्नि भयंकर होजाता है तैसे अपथ्यके संयोगसे रोग भी अतिघोर हो जाता है ॥ १७ ॥ काढा, फल, चूरन, गोली, चटनी, अनुवासन बस्तिकर्म इनकी सब क्रियायें व्यर्थ होजाती और रोग शांत नहीं होता है ॥ १८ ॥ एवं ज्ञात्वा सदा वैद्यै रोगशान्तिककारणम् ॥ कर्त्तव्यमतियोगेन येन रोगः प्रशाम्यति ॥ १९ ॥ ऐसा जानकर सब कालमें वैद्योंको रोगशांति करनेवाली क्रिया अतियोगसे अर्थात् पूर्वोक्त- क्रिया विशेष करके करनी चाहिये जिससे रोग शांत हो जावे १९ ॥ लंघनकी योग्यता । ज्ञात्वा दोषबलं धीमल्लँघनानि समाचरेत् ॥ दोषे सति न दोषाय लंघनानि बहून्यपि ॥ २० ॥ वैद्य दोषके बलको समझकर लंघन कराये । क्योंकि दोष रहनेपर बहुत भी लंघन कोई उपद्रव नहीं करते ॥ २० ॥ जठराग्निका कर्म । पचेत्प्रथममाहारं दोषानाहारसंक्षये ॥ दोषक्षयेऽनलो धातून्प्राणान्धातुक्षये सति ॥ २१ ॥
( १४ ) हारीतसंहिता । [ प्रथमस्थाने- जठराग्नि प्रथम भोजनको पकाता है और भोजनके नाश होनेमें वात आदि दोषोंको पकाता है और दोषोंके क्षय होनेमें धातुओंको पकाता है और धातुओंके क्षय होनेमें प्राणोंको पकाता है अर्थात् नाश करता है ॥ २१ ॥ सामनिराम-व्याधिकाउपक्रम । ज्ञात्वा बलाबलं व्याधेः सामं निराममेव च ॥ तदा सामे पाचनं स्यान्निरामे पथ्यसंक्रमः ॥ २२ ॥ रोगके बल और अबल, साम तथा निरामरूप रोगको जानकर पीछे साम अर्थात् आमसे संयुक्त हुए रोगमें लंघन करावे और निराम अर्थात् आमसे रहित हुए रोगमें पथ्य दिलावे ॥ २२ ॥ वैद्यकी योग्यता । सामं निराममथ संसुखसाध्यमेवं सम्यग्रुजश्च परिलक्ष्य रुजो विनाशम् ॥ एतद्भवेत्सकलवैद्यकशास्त्रसारो नैवायुषश्च बलदा- नकरो हि वैद्यः ॥ २३ ॥ दोषयुक्त, निर्दोष, इसके अनन्तर सुखसाध्य इस तरह रोग और रोगकी नाशिनी चिकित्साको देखकर कर्म करे, यही समस्त वैद्यकशास्त्रका तत्त्व है । आयुके बलको देनेवाला वैद्य नहीं ॥ २३ ॥ नो वैद्यो मनुजस्य सौख्यमथवा दुःखञ्च दातुं क्षमो जन्तोः कर्म- विपाक एव भुवने सौख्याय दुःखाय च ॥ तस्मान्मानवदुःखका- रणरुजां नाशस्य चात्र क्षमो वैद्यो बुद्धिनिधानधाम चतुरो नाम्नैव वैद्योऽपरः ॥ २४॥ सम्यग्रुजां परिज्ञानं ज्ञात्वा दोषवि- निग्रहम्॥ प्रत्याख्येयं च यः साध्यं जानाति स भवेद्भिषक् ॥ २५॥ मनुष्यको सुख अथवा दुःख देनेको वैद्य समर्थ नहीं है किंतु संसारमें सुख और दुःखको देनेवाला जीवोंके कर्मोंका विपाक है इस कारण मनुष्यको दुःख करनेवाले रोगोंके नाशनेके लिये वैद्य समर्थ है और वैद्य बुद्धिभांडारका घर है, चतुर है और इससे विपरीत जो दूसरा वैद्य हो वह नामसे ही वैद्य है ॥ २४ ॥ जो रोगोंको अच्छी तरह जानकर और दोषोंके निग्रहको समझ कर साध्य और असाध्य रोगीको जानता है उसे वैद्य कहते हैं ॥ २५ ॥ पुण्यार्थउपचार करनेयोग्य मनुष्य । तपस्वी च ब्राह्मणश्च स्त्रियो वा बालकस्तथा॥ दीनो वा दुर्बलो वापि प्राज्ञो वा पण्डितस्तथा ॥२६॥ महात्मा श्रोत्रियः साधु-
अ० ३.] भाषाटीकासमेता । ( १५ ) रनाथो बन्धुवर्जितः ॥ एतानव्याधिविनिग्रस्तान्प्रतिकुर्याद्वि- शेषतः ॥ २७ ॥ तपस्वी, ब्राह्मण, स्त्री, बालक, दीन, दुर्बल, बुद्धिमान्, पंडित ॥ २६ ॥ महात्मा, वेदपाठी, साधु, अनाथ और बंधुओंसे रहित इतने रोगियोंकी दवा विशेष करके करे ॥ २७ ॥ उपचारसे धन लेने योग्य मनुष्य । राजा च सुधनी चैव मण्डलीको बलाधिपः ॥ उपचार्य्योऽर्थसिद्धिः स्याद्वित्तं ग्राह्यं भयं न च॥ २८ ॥ राजा, धनवाला, साहूकार, छोटा राजा, ठाकुर, सेनाका स्वामी इन्होंकी चिकित्सा करे, जब वे अच्छे होजावें तब उनसे निर्भय होकर धन लेना चाहिये ॥ २८ ॥ यश मिलने योग्य मनुष्य । मध्यमा वणिजां पत्तिः पुरोधा ब्राह्मणादयः ॥ भट्टो वा गणका- ग्रण्यश्चिकित्स्यास्तु विशेषतः ॥ रोगग्रस्तेषु चैतेषु चिकित्सा कीर्तिकारिणी ॥ २९ ॥ इनसे नीचे बनियोंका व्यापार करनेवाले, पुरोहित, ब्राह्मणादिक, वेदज्ञ वा भाट, ज्योतिषी इनकी चिकित्सा ध्यानसे करें क्योंकि इन रोगियोंकी दवा करनेसे कीर्ति प्राप्त होती है॥२९॥ चिकित्सा करनेके अयोग्य मनुष्य । व्याधश्चोरस्तथा म्लेच्छो वह्निदो मत्स्यबन्धकः॥ ३० ॥ बहुद्वेषो ग्रामकूटो बन्धकी मांसविक्रयी॥ एतेषां व्याधिग्रस्तानां नैव कुर्यात्प्रतिक्रियाम् ॥ ३१ ॥ एतेभ्यः स्वार्थसिद्धिनोप- कारो हितमङ्गलम् ॥ तेषां जीवातसंजातो वैद्यो भवति दोषभाक् ॥ ३२ ॥ और कसाई, चोर, म्लेच्छ अग्नि लगानेवाला, मछलियोंको बींधनेवाला ॥ ३० ॥ बहुतोंका बैरी, ग्राममें चुगली करनेवाला, व्यभिचारिणी, मांसको बेचनेवाला इनके यदि रोग उत्पन्न हो तो वैद्य चिकित्सा नहीं करे ॥ ३१ ॥ क्योंकि इनसे स्वार्थकी सिद्धि नहीं है, न उपकार है और कल्याण भी नहीं है और मंगल भी नहीं है, इन्हें जीवदान देनेसे वैद्य दोषका भागी हो जाता है ॥ ३२ ॥ एवं ज्ञात्वा तु सद्द्यैद्यः कुर्यादथ प्रतिक्रियाम् ॥ धर्मार्थकामसम्पत्तिः कीर्तिर्लोके प्रवर्त्तते ॥ ३३ ॥ १ 'बन्धक्यसती कुलटेत्वरी' इत्यमरः ।
ऐसे जानके पीछे कुशल वैद्य चिकित्साको करे, चिकित्सासे धर्म, अर्थ, और कामकी प्राप्ति और लोकमें कीर्त्ति प्रवृत्त होती है ॥ ३३ ॥ वैद्य-कर्त्तव्यका उपसंहार । इति बहुविधियुक्तो वैद्यविद्याविचारः क्षणमपि हृदये यो धारणं संकरोति ॥ स भवति गदसंघस्याथ विध्वंसशक्तो विमलवि- दितकीर्तिः पूज्यमानो नरैन्द्रैः ॥ ३४ ॥ इति आत्रेयभाषित हारीतोत्तरे वैद्यशिक्षाविधानं नाम तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥ ऐसे बहुतसी विधिसे युक्त और वैद्यकविद्याको विचारनेवाला जो वैद्य एक क्षणभर भी अपने हृदयमें यह धारणा करता है, वह वैद्य रोगके समूहको नाशनेमें समर्थ, स्वच्छ तथा विख्यात कीर्तिवाला और राजा लोगोंसे पूज्यमान होता है ॥ ३४ ॥ इति बेरीनिवा- सिबुधशिवसहायसूनुवैद्यरविदत्तशास्त्रि-अनुवादितहारीतसंहिताभाषाटीकायां प्रथमस्थाने वैद्यशिक्षा- विधानं नाम तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥
चतुर्थोऽध्यायः ४. अथ देशकालबलाबल । इदानीं संप्रवक्ष्यामि देशकालबलाबलम् ॥ सात्म्यं प्रकृतिदेहश्च तथाग्नीनां विशेषणम् ॥ १ ॥ अब देश, काल, बल, अबल, सात्म्य, प्रकृति, देह, अग्नियोंकी विशेषता कहूँगा ॥ १ ॥ देश भेदाः । देशस्तु त्रिविधो ज्ञेयो ह्यनूपो जाङ्गलस्तथा ॥ साधारणो विशेषेण ज्ञातव्यास्ते मनीषिभिः ॥ २ ॥ और इस तरह देश तीन प्रकारके जानने चाहिये । अनूप, जाङ्गल, और साधारण। वे विद्वानों- को विशेषकरके जानने चाहिये ॥ २ ॥ अथ अनूपदेशलक्षण । बहुतरशुभनद्यश्चारुपानीयपुष्टाः सरससरउपेता शाद्वलासार- भूमिः ॥ हरितकुशजलानां शालिकेदाररम्य दिनकरकरदीप्तिं वाञ्छते यत्र लोकः ॥ ३ ॥ गुरुमधुररसाढ्या भाति चेक्षुः सदार्द्रा १ 'धारासंपात आसारः' इत्यमरः ।