हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
गानस्त्रीबालकं रमः ॥ ३८ ॥ न चाभरणताम्बूलं कोपशोषं जहाति च ॥ दूरे चैतानि वर्जेत्तु यदीच्छेत्सुखसम्पदः ॥३९॥ लाल चावल, सांठी चावल, अरहर, कुलथी ॥ ३५ ॥ घृत, किंचित् मधुर अन्न इनको भोजनके वास्ते देवे और खारा, चर्चरा पदार्थ, दिनमें सोना विशेष करके वर्ज देवे ॥ ३६ ॥ स्त्रीका दर्शन, मैथुन, ज्यादे भोजन करना, मार्गमें चलना, भाजना, मूत्रका रोकना ॥ ३७ ॥ वस्त्रसे वायु करना, रक्तवस्त्र पहिरना वैद्यजन इस रोगमें वर्ज देवे । एकांतमें, घरके मध्यमें, गाना, स्त्री बालक इनके संग प्यार करना ॥ ३८ ॥ आभूषण पहिरना, पान चबाना, क्रोध करना इनको इस रोगमें दूरसे ही त्याग देवे तब सुख होता है ॥ ३९ ॥ पीतप्रमेहपर हरिद्रादिक्वाथ । हरिद्राद्वितयं शुण्ठी विडङ्गानि हरीतकी ॥ कफप्रमेहे विहितः क्वाथोऽयं मधुना सह ॥ ४० ॥ नीलोत्पलमुशीरञ्च पथ्यामल- कमुस्तकम् ॥ पिबेत्पीतप्रमेहार्त्तः क्वाथं मधुविमिश्रितम् ॥४१॥ दोनों हल्दी, सोंठ, वायविडंग, हरडै इनका क्वाथ शहदके संग पीना कफप्रमेहमें श्रेष्ठ कहा है ॥ ४० ॥ नीलाकमल, खश, हरडै, आंवला, नागरमोथा इनका क्वाथ शहदके संग पीनेसे पीतप्रमेहका नाश होता है ॥ ४१ ॥ अथ पित्तप्रमेहपर कमलादिक्वाथ । कमलञ्च तथा रोध्रमुशीरमर्जुनान्वितम् ॥ पित्तप्रमेहे विहितः क्वाथोऽयं मधुना सह ॥ ४२ ॥ कमल, लोध, खश, अर्जुनवृक्ष इनका क्वाथ शहदके संग पीना पित्तप्रमेहमें हित कहा है ॥ ४२ ॥ अथ आमलक्यादिचूर्ण । आमलकस्य स्वरसं मधुना च विमिश्रितम् ॥ हरीतक्याश्च चूर्णं वा सर्वमेहनिवारणम् ॥ ४३ ॥ आंवलोंके रसमें शहद मिला अथवा हरडैके चूर्णमें शहद मिला खानेसे सब प्रकारके प्रमेह रोगोंका नाश होता है ॥ ४३ ॥ अथ खदिरादि चूर्ण । खदिरं शर्करा दारु हरिद्रा मुस्तमेव च ॥ चूर्णितं तु पिबेत्सर्वप्रमेहगदशान्तये ॥ ४४ ॥
: अ० २९] भाषाटीकासमेता । (३९१) : खैर, खांड, देवदारु, हलदी, नागरमोथा इनके चूर्णको पीनेसे सब प्रमेहरोग शांत : होते हैं॥ ४४ ॥ : अथ कुष्ठादि चूर्ण। : कुष्ठं हरिद्राद्वयदेवदारु पाठा गुडूची त्रिफला च मुस्तम्॥एषां : हि चूर्णं मधुना विमिश्रं मूत्रप्रमेहं हरते व्यथाञ्च॥४५॥इत्या- : त्रेयभाषिते हारीतोत्तरे तृतीयस्थाने प्रमेहचिकित्सा नाम : अष्टाविंशोऽध्यायः ॥ २८ ॥ : कूठ, दोनों हलदी, देवदार, पाठा, गिलोय, त्रिफला, नागरमोथा इनके चूर्णको शहदके : संग पीनेसे सब मूत्रप्रमेहरोग और पीडा इनका नाश होता है॥ ४५ ॥ : इति बेरीनिवासिबुधशिवसहायसूनुवैद्यरविदत्तशास्त्र्यनुवादितहारीतसंहिताभाषाटीकायां : तृतीयस्थाने प्रमेहचिकित्सानम अष्टाविंशोऽध्यायः ॥ २८ ॥ : एकोनत्रिंशोऽध्यायः २९. : अथ मूत्रकृच्छ्रचिकित्सा । : आत्रेय उवाच ॥ एला शिलाजतुयुतं मागधिकापाषाणभेदसंचू- : र्णम्॥तण्डुलजलेन पीतं प्रमेहरोगं हरत्येव ॥ १ ॥ एरण्डमूल- : पाषाणभेदगोक्षुरकास्तथा॥ एलाटरूषपिप्पल्यो यष्टीमधुसम- : न्विताः ॥२॥ एषां क्वाथं पिबेज्जन्तुः शिलादित्येन योजितम्॥ : अश्मरीशर्करायाञ्च शर्करायाः पलद्वयम् ॥३॥ सुशीतलं जलं : कर्षमात्रंस्यान्मूत्रकृच्छ्रहृत्॥दध्यम्बुना च संमिश्रमयश्चूर्णं सुख- : प्रदम् ॥४॥ मूत्रकृच्छ्रे यवक्षारचूर्ण हिंगुप्रयोजितम् ॥ कूष्माण्डं : च समादाय शर्करासहितं पिबेत् ॥५॥ यो हि त्रिदोषसम्भू- : तमूत्रकृच्छ्रनिवारणः ॥ पिबेच्छतावरीमूलं शीतपानीयचूर्णित : म् ॥६॥ अतः शर्करारोगातें शर्करां संप्रयोजयेत् ॥ आरग्व- : धफलं मूलं दुरालभा धान्यकशतावर्य्यः ॥७॥ पाषाणभेदप- : थ्ये क्वाथोऽयं मूत्रकृच्छ्रे स्यात् ॥ ८ ॥ पाषाणभेदस्त्रिवृता : Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu
( ३९२ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- च पथ्या दुरालभा गोक्षुरपुष्करं वा ॥ एला कुरण्टाप्यथकर्कटीजं बीजं कषायः सुनिरुद्धमूत्रे ॥ ९ ॥ कुलत्थयुक्तः पटोलीमू- लकषायः प्रतिपाकः ॥ पुष्करमूलविमिश्रः प्रमेहपाषाणरोगघ्नः स्यात् ॥ १० ॥ यो मातुलुङ्गिकामूलं पिबेत्पर्युषिताम्बुना ॥ तस्यान्तः शर्करोद्भूतं दुःखं सद्यो विलीयते ॥ ११ ॥ गवां तक्रेण संंपिष्टं क्षिप्रनामकमौषधम् ॥ पिबेच्चिरेण तक्रञ्च शर्करादोषदू- षितः ॥ १२ ॥ इत्यात्रेयभाषिते हारीतोत्तरे तृतीयस्थाने मूत्र- कृच्छ्रचिकित्सा नामैकोनत्रिंशोऽध्यायः ॥ २९ ॥ आत्रेयजी कहते हैं--इलायची, शिलाजीत, पीपल, पाषाणभेद इनके चूर्णको चावलोंके धोवनके जलके संग पीनेसे प्रमेहरोगका नाश होता है ॥ १ ॥ अरंडकी जड़, पाषाणभेद, गोखुरू, इलायची, वांसा, पीपली, मुलहटी इनका क्वाथ बना शिलाजीत मिला पीनेसे मूत्रकृच्छ्र दूर होता है ॥ २ ॥ और पथरीरोग, शर्करारोग, इनमें ८ तोला प्रमाण खांड मिला पीना चाहिये ॥ ३ ॥ एक तोला प्रमाण ठण्डा जल पीनेसे मूत्रकृच्छ्ररोग दूर होता है तथा दहीके पानीसे लोहचूर्णको पान करे ॥ ४ ॥ और मूत्रकृ- च्छ्ररोगमें जवाखारका चूर्ण, हींग, कोहला, खांड इनको जलके संग पीवे ॥ ५ ॥ और शीतल जलके संग शतावरीके जड़को पीनेसे त्रिदोषसे उपजा मूत्रकृच्छ्र दूर होता है ॥ ६ ॥ और शर्करारोगमें खाँड़को पीवे और अमलतास, मूली, जवांसा धनियां शतावरी ॥ ७ ॥ पाषाणभेद, हरड़ै इनका क्वाथ पीनेसे मूत्रकृच्छ्ररोग दूर होता है ॥ ८ ॥ पाषाणभेद, निशोत, हरड़ै, जवासा, गोखरू, पोहकरमूल, इलायची, कोरंटा, काकड़ीका बीज, इनका क्वाथ मूत्रबन्धमें पीना श्रेष्ठ है ॥ ९ ॥ कुलथी, परवल, मूली, पोहकरमूल इनका क्वाथ बना पीनेसे प्रमेह, पथरीरोग इनका नाश होता है ॥ १० ॥ जो पुरुष बिजौराकी जड़को बासी जलके संग पीता है वह शर्करारोगसे छूट जाता है ॥ ११ ॥ और गौकी तक्रके संग कायफलको पीस पीनेसे शर्करारोग दूर होता है ॥ १२ ॥ इति वेरीनवासिबुधशिवसहायसूनुवैद्यरविदत्तशा- स्त्र्यनुवादितहारीतसंहिताभाषाटीकायां तृतीयस्थाने मूत्रकृच्छ्रचिकित्सानामैकोनत्रिंशोऽध्यायः २९॥ त्रिंशोऽध्यायः ३०. अथ मूत्ररोधचिकित्सा । आत्रेय उवाच ॥ पिबेत्कर्कटिकाबीजं त्रिफलासैन्धवान्वितम् ॥
अ० ३० ] भाषाटीकासमेता । ( ३९३ ) उष्णांबुचूर्णितं पीतं मूत्ररोधं शमं नयेत् ॥ १ ॥ यस्तिलकाण्ड- क्षारं दधिमधुसंमिश्रितं पिबेत् ॥ स नरश्च मूत्ररोधं हत्वा सद्यः सुखमायाति ॥२॥ अजाक्षीरेण संमिश्रं जातीमूलं प्रपेषितम् ॥ पिबेत्सदाहमूत्रोष्णवेदनाशनमं यतः ॥ ३ ॥ तैलेन पद्मिनी- कन्दं पक्वगोमूत्रमिश्रितम् ॥ पिबेन्मूत्रनिरोधे तु सतीव्रवेदना- न्विते ॥ ४ ॥ आत्रेयजी कहते हैं-काकड़ीके बीज त्रिफला, सेन्धानमक, इनके साथ पीस गरम जलके संग पीनेसे मूत्ररोध दूर होता है ॥ १ ॥ तिलोंकी नालियोंका क्षार, दही, शहद इनको मिला पीनेसे मूत्ररोध रोग दूर होता है, तत्काल सुख होता है ॥ २ ॥ जायफलको बकरीके दूधमें पीस पीनेसे दाह, गरम, मूत्रकी पीड़ाकी शांति होती है ॥ ३ ॥ कमलकंदको तेलमें पीस गोमूत्रमें मिला पीनेसे तीव्र पीड़ासे युक्त मूत्रकृच्छ्ररोग दूर होता है ॥ ४ ॥ अथ मूत्रकृच्छ्रका कारण । पित्तप्रकोपनैर्द्रव्यैः कट्वम्ललवणैस्तथा ॥ गौरास्त्रीसेवनेनापि रक्तं वापि प्रवर्त्तते ॥५॥ मद्यपानेन चोष्णेन श्रमव्यायामपी- डितैः ॥ पित्तं प्रकोपयेच्छीघ्रं करोति मूत्रकृच्छ्रकम् ॥ ६॥ तेन मूत्रयते कृच्छ्रं चोष्णधारा प्रवर्त्तते ॥ मूत्रस्रोतश्च हरति रक्तं चापि प्रवर्त्तते॥तस्य वक्ष्यामि भैषज्यं येन संपद्यतेसुखम्॥७॥ पित्तको कोप करनेवाले द्रव्य, चर्चरा, खट्टा, नमक इनके खानेसे और गौरस्त्रीके सेवनसे इन्द्रि- यमें रक्त प्रवृत्त होजाता है ॥ ५ ॥ गरम मदिरा पीनेसे, श्रम, कसरत, इनकी पीड़ा होनेसे शीघ्र ही पित्त कुपित हो जाता है, वह मूत्रकृच्छ्र रोगको कर देता है ॥ ६॥ उससे कष्टसे मूत्र उतरे । गरम गरम धार जावे और मूत्रका वेग बंद हो जावे तथा रक्त गिरने लगे ॥ ७ ॥ अथ मूत्रकृच्छ्रपर उपाय । यष्टीमधुकमृद्वीका चन्दनं रक्तचन्दनम् ॥रक्ततण्डुलतोयेन मूत्र- कृच्छ्ररुजापहम् ॥८॥ वटप्ररोहमालासु द्राक्षाशर्करयान्वितः॥ लेहोऽयं मूत्रकृच्छ्रस्य नाशनो भिषजां वर ॥९॥ देहोपशमनः प्रोक्तः शीतगाहनकोपततः ॥ मूत्रकृच्छ्रे तु तत्प्रोक्तं भोजनं मधुरं हितम् ॥ १० ॥ उत्तानस्य रतौ भङ्गाद्दाहव्यायामजातके ॥
( ३९४ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने-
मूत्ररोधे वचा वर्या दद्यात्तत्रानिरोधकान् ॥११॥ अव्यायामे शुभं भोज्ये शीतावगाहिता नरे ॥ एतैस्तु कुपितो वायुर्मूत्रद्वारं प्ररुन्धति ॥ १२ ॥ श्लेष्मसहितः पापिष्ठ उक्तः कष्टतमो गदः ॥ शृणु तस्य प्रतीकारं कषायं वानुवासनम् ॥ १३ ॥ बस्ति- निरूहक्वाथं च मूत्ररोधे हितो विधिः॥सर्वसंस्वेदनं चैव स्थानं वक्रमणाविव ॥१४॥ तुरङ्गशकटारोहधावनं च हितं मतम् ॥ फलत्रिकं समगुडं क्वाथः क्षीररसेन तु ॥१५॥ पानं मूत्रनिरो- धेषु पित्ताद्वा लवणाम्लकम् ॥ पाटला टुण्टका चैव निम्बगो- क्षुरकं तथा॥१६॥एलात्वक् च तथा पत्रं क्वाथस्त्रिफलयान्वितः॥ गुडेन संयुतं पीतं हन्ति मूत्रनिरोधकम् ॥ १७ ॥ दाडिमाम्ल- युतं चैव हितं मूत्ररुजां नृणाम् ॥ त्रिफलेक्षुसिताक्वाथगुडेन सह सैन्धवम् ॥१८॥ मूत्ररोधं वारयति पथ्या वा गुडसंयुता ॥ अथवा तोदनन्नारीमैथुनं च विधेयकम् ॥ १९ ॥ तेन सौख्यं भवेच्छीघ्रं स्त्रीणाञ्च योनिमर्दनम्॥२०॥इत्यात्रेयभाषितेहारीतो त्तरे तृतीयस्थाने मूत्ररोधचिकित्सानाम त्रिंशोऽध्यायः ॥३०॥ अब तिसक्री औषधोंको कहते हैं जिससे सुख होवे है-मुलहटी, महुआ, मुनक्का, दाख, चन्दन, लाल चन्दन ॥ ८ ॥ इनको लाल चावलोंके धोवनके जलमें पीस पीनेसे मूत्रकृच्छ्रकी पीड़ा दूर होती है। और बड़के पत्तोंके अंकुर, दाख, खांड, ये मिला लेह बना खानेसे मूत्रकृच्छ्ररोगका नाश होता है ॥ ९ ॥ और यह लेह देहको शांत करनेवाला है और शीतल जलमें गोता मारनेसे उपजे हुए मूत्रकृच्छ्ररोगमें मधुर भोजन हित कहा है ॥ १० ॥ मोधा सोवनेसे मैथुनके भंग होनेसे, दाह और कसरतके परिश्रमसे उपजे हुए मूत्ररोधमें वच, शतावरी इनको देवे ॥ ११ ॥ कसरत नहीं करना, सुन्दर तथा ज्यादे भोजन करना, शीतल जलमें गोता मारना, इनसे कुपित हुआ वायु मूत्रद्वारको रोकलेता है ॥ १२ ॥ और अत्यंत कष्टवाला पापवाला यह रोग कफ सहित होता है। अब इसरोगका इलाज कह- ते हैं, अनुवासन बस्तिमें क्वाथ वरतना चाहिये ॥ १३ ॥ मूत्ररोधमें निरूह बस्तिद्वारा क्वाथ देना चाहिये और सब शरीरमें पसीना दिलाना हित है जैसे टेढी मणिमें स्थान दीखता है ऐसे ही मूत्ररोग जानना ॥ १४ ॥ घोड़ा, गाड़ी इनकी सवारीपर चढ़के भागना हित कहा है और त्रिफला, गुड़ इनको समान भागले गुड़में क्वाथ बनादेना हित है ॥ १५ ॥
अ० ३१ ] भाषाटीकासमेता । ( ३९५ ) और पित्तसे उपजे मूत्ररोधमें नमक, कांजीका पीना हित कहा है और पाडलवृक्ष, टेंटूवृक्ष, नींव, गोखरू ॥ १६ ॥ इलायची, दालचीनी, तेजपात, त्रिफलाका काथ बना गुड़के संग मिला पीनेसे मूत्ररोध दूर होता है ॥ १७ ॥ अनारदानाकी कांजी पीना मूत्ररोगवाले पुरुषोंको हित है और त्रिफला, ईख, मिश्रीका काथ बना गुड़, सेंधा- नमकके संग पीनेसे ॥ १८ ॥ या हरड़ैं गुड़ इनके खानेसे मूत्ररोधका निवारण होता है अथवा इंद्रियोंको मलना अथवा स्त्रीके संग मूत्र आनेके समय विषय करना श्रेष्ठ है ॥ १९ ॥ और स्त्रीके मूत्र बंध होवे तो उसकी योनि मर्दन करे तो शीघ्र ही सुख उत्पन्न होता है ॥ २० ॥ इति वेरीनिवासिबुधशिवसहायसूनुवैद्यरविदत्तशास्त्र्यनुवादितहारीतसंहिताभाषाटीकायां तृतीयस्थाने मूत्ररोधचिकित्सा नाम विंशोऽध्यायः ॥ ३० ॥ एकत्रिशोऽध्यायः ३१. अथ अश्मरी अर्थात् पथरी रोगकी चिकित्सा । आत्रेय उवाच ॥ पितृमातृकदोषेण अथवा मूत्ररोधनात् ॥ अप- थ्यसेवनाचारैर्जायते चाश्मरीगदः ॥ १ ॥ मूत्राविष्टौ च पितरौ सुरतं कुरुतो यदि ॥ मूत्रेण सहितं युक्तं च्यवते गर्भसम्भवम् ॥ ॥२॥ पश्च यस्य सदेहस्य स च तत्र प्रजायते॥मूत्रं मूत्रस्य संस्था- ने करोति बन्धनं त्रिषु ॥ ३ ॥ सोऽप्यसाध्यो मूत्रगदश्चाल्पाङ्ग- वति मानुषे ॥ तारुण्ये चापि साध्यश्च जायते मूत्रशर्करा ॥४॥ विपरीतेन चोत्ताने स्त्रिया च पुरुषेण वा ॥ शुक्रञ्च प्रबलेत्तस्य स्त्री शुक्रं विचिनोति च ॥५॥ पुनश्च मेहने वासो वातेन शो- णितं च तत् ॥ द्वयं दत्तं प्रपद्येत मूत्रद्वारं प्ररुध्यति ॥ ६ ॥ तेन मूत्रप्ररोधश्च जायते तीव्रवेदना ॥ अण्डसन्धिस्यिता याति शर्करा शस्त्रसाध्यका ॥ ७ ॥ आत्रेयजी कहते हैं-माता पिताके दोषसे अथवा मूत्रके रोकनेसे पथ्य वस्तुओंके सेवन नहीं करनेसे पथरीरोग होजाता है ॥१॥ मूत्रके वेगसे युक्त हुए माता पिता जब मैथुन करते हैं तब गर्भको उत्पन्न करनेवाला वीर्य मूत्र सहित झिरता है ॥ २ ॥ फिर उस गर्भके शरीरमें वह मूत्र उसीस्थानमें प्राप्त होजाता है वह मूत्र मूत्रके स्थानमें बंधाकर देताहै ॥ ३ ॥ यह पथरी-
( ३९६ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- रोग असाध्य होता है बालक अवस्थामें ही यह पथरी रोग होता है । यह तीन प्रकार से होता है ॥ ४ ॥ और जवान अवस्थामें मूत्रशर्करा रोग होता है वह साध्य होता है स्त्री और पुरुषके विपरीत तथा मोहेहोके मैथुन करनेसे जो वीर्य झिरता है और स्त्रीका वीर्य इकट्ठा होता है ॥ ५ ॥ वह वीर्य तो मूत्रके संग वासमें युक्त होता है और स्त्रीका रुधिर वातके संग युक्त होजाता है फिर इन दोनोंके गर्भमें संयुक्त होनेसे मूत्रद्वारा रुक जाता है ॥ ६ ॥ वह जो बालक उत्पन्न होवे उसके मूत्ररोध रोग होवे, तीव्र पीड़ा हो यह अंडसंधिमें शर्करासंज्ञक रोग हो जाता है यह शस्त्रसाध्य होता है ॥ ७ ॥ अथ अश्मरीरोगपर चिकित्सा । अतो वक्ष्यामि भैषज्यं शृणु पुत्र महामते ॥ शुण्ठी गोक्षुरकं चैव वरुणस्य त्वचस्तथा ॥ ८ ॥ क्वाथो गुडयवक्षारयुक्तश्चाश्मरि- नाशनः ॥ कुशकाशनलं वेणु अग्निमन्थाक्षनृत्तकम् ॥ ९ ॥ श्वदं- ष्ट्रा मोरटा वापि तथा पाषाणभेदकम् ॥ पलाशत्रिफलाक्वाथो गुडेन परिमिश्रितः ॥ १० ॥ पाने मूत्राश्मरीं हन्ति शूलब- स्तौ व्यपोहति ॥ ११ ॥ हे पुत्र, हे महामते ! अब इन्होंकी औषध कहते हैं सुनो सोंठ, गोखरू, वरणाकी छाल ॥ ८ ॥ गुड, जवाखार इनका क्वाथ बना पीनेसे पथरीका नाश होता है ॥ ९ ॥ कुशा, कास, उशीर, बांस, अरणी, बहेड़ा, बेत, गोखरू, मोरबेल, पाषाणभेद ॥ १० ॥ टेसू, त्रिफला, इनका क्वाथ बना गुडमें मिला खानेसे पथरीका नाश होता है और वस्तिशूल दूर होता है ॥ ११ ॥ अथ एलादि क्वाथ । एलाकणावृषत्रिकण्टकरेणुकाचपाषाणभेदमधुकं च फलत्रि- कञ्च ॥ एरण्डतैलकशिलाजतुशर्कराद्यं क्वाथोऽश्मरीघ्नइति सोष्णजलस्य पानम् ॥ १२ ॥ इलायची, पीपल, बांसा, दोनों कटेहली, गोखरू, रेणुका, पाषाणभेद, त्रिफला, अरंडीका तेल, शिलाजीत, खांड इनका क्वाथ बना गरम २ पीनेसे पथरी रोग दूर होता है ॥ १२ ॥ अथ गोक्षुरकादि चूर्ण । गोक्षुरकस्य बीजानां धातुमाक्षिकसंयुतम् ॥ अश्मरीपातनं चूर्ण महिषीदुग्धभक्षितम् ॥ १३ ॥
अ० ३२ ] भाषाटीकासमेता । ( ३९७ ) और गोखरूके बीज, सोनामाखी इन्होंके चूर्णको भैंसके दूधके संग पीनेसे पथरी गिरती है ॥ १३ ॥ अथ अन्य उपाय। शस्त्रविधिरुत्तरीय सूत्रस्थाने प्रोक्तं घृताध्याये च स्मृतम्॥१४ पुराणषष्टिका शालिरक्ततण्डुलकास्तथा ॥ श्यामाकः कोद्रवो दालो मर्कटी तृणधान्यकम् ॥१५॥ यवगोधूमकुलत्थास्तथा चैवाढकी भिषक्॥वातहराः प्रयोक्तव्या भोजने वातरोगिणाम् ॥१६॥॥क्रौञ्चाद्यानि च मांसानि पथ्यान्यश्मरीनाशने ॥१७॥ इत्यात्रेयभाषिते हारीतोत्तरे तृतीयस्थाने अश्मरीचिकित्सा- नामैकत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३१ ॥ उत्तर सूत्रस्थानमें शस्त्रविधि कहदी है, तैलाध्यायमें तैल कह दिया है और घृता- ध्यायमें घृत कह दिया है ॥ १४ ॥ पुराने सांठी चावल, शालिसंज्ञक चावल, लाल चावल, शामक, कोदूधान्य, दाल, क्रौंच, तृणधान्य आदि अन्न ॥ १५ ॥ जब, गेहूं, कुलथी, आढकी धान्य, इन भोजनोंको देवे और वातरोगवाले पुरुषोंको वातनाशक भोजनोंको देवे ॥ ॥ १६ ॥ पथरी रोगके नाशके वास्ते क्रूंजि आदि पक्षियोंका मांस देना चाहिये ॥ १७ ॥ इति वेरीनिवासिबुधशिवसहायसूनुवैद्यरविदत्तशास्त्र्यनुवादितहारीतसंहिताभाषाटीकायां तृतीयस्थाने अश्मरीचिकित्सानामैकत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३१ ॥ द्वात्रिंशोऽध्यायः ३२. अथ वृषणचिकित्सा । आत्रेय उवाच ॥ अत ऊर्ध्वमण्डवृद्धिर्हृश्यते भिषजां वर ॥ बाल्ये मातुः पितुर्दोषाज्जायते वृषणानुगा॥१॥दुष्टादाराविहा- राच्च वातो बस्तिगतो भृशम् ॥ अण्डस्थानं च संप्राप्य तस्य वृद्धिं करोति वै॥२॥एकैकसन्निपातश्च चतुर्थः सन्निपातिकः ॥ पित्तदोषात्सन्निपातात्तथाऽसाध्या इमे स्मृताः ॥ ३ ॥ आत्रेय कहते हैं-हे उत्तमवैद्य ! हारीत ! इसके उपरांत अंडवृद्धि रोग होता है
( ३९८ ) हारीतसंहिता। [ तृतीयस्थाने
सो बालकके मातापिताके दोषसे वृषणोंका रोग होता है ॥ १ ॥ दूषित स्त्रीके संग मैथुन करनेसे वस्तिस्थानमें प्राप्त हुआ बहुतसा वायु अंडस्थानमें प्राप्त होके अंडवृद्धि करदेता है॥२॥ एक एक दोषसे तीन प्रकारका और चौथा सन्निपातसे होता है और पित्तके दोषसे उपजे हुए और सन्निपातसे उपजे हुए अंडवृद्धिरोग असाध्य कहे हैं ॥ ३ ॥ दोषान् वक्ष्याम्यौषधानि शृणु तानि भिषग्वर॥स्वेदनान्यभ्य- ञ्जनानि क्वाथ्यपानं विधीयते ॥ ४ ॥ शिरःस्रावो भिषक्श्रेष्ठ तेषां वक्ष्यामि लक्षणम् ॥ कंपश्च मृदुवातेन पित्तेन दाहकृ- ज्वरः ॥ ५ ॥ कफाद्दृढश्च शोषश्च कठिनो वृषणो भवेत् ॥ रसालशल्लकीक्वाथस्तर्कारी कटुतुम्बिका ॥ ६ ॥ क्वाथसं- सेवनार्था च मुष्कवृद्धिः सवातिके ॥ शीततोयावगाहो वा शीतसंसेवनं तथा॥शीतशीतैश्च लेपश्च पित्तमुष्के प्रशस्यते॥७॥ हे उत्तमवैद्य ! अब दोषोंको और औषधोंको कहते हैं सुनो । पसीना दिलाना, मालिस करनी और क्वाथ पान, नसोंका स्राव ये विधि करनी चाहिये ॥ ४ ॥ अब इनके लक्ष- णोंको कहेंगे, वातदोषसे उपजे अंडवृद्धिरोगमें कंपनाहो कोमलहो और पित्तसे दाहहो, ज्वरहो ॥ ५ ॥ कफसे कड़ाहो, शोषहो, कठिन अंड हो, वातसे उपजे अंडवृद्धिरोगमें आंब, शल्लकी वृक्ष, अरणी, कडुई तुंबी, इनका क्वाथ बना सेवन करना चाहिये ॥ ६ ॥ और पित्तसे उपजे अंडवृद्धिरोगमें शीतल जलमें गोता मारना, शीतल वस्तुसे बना और चंदन, कपूर चीता इनका लेप करना श्रेष्ठ है ॥ ७ ॥ वृषणवृद्धिपर चिकित्सा । वचालवणतोयेन कदम्बार्जुनसर्षपैः॥कषायसेवनैः प्रोक्तं कफ- मुष्केऽहितापहम् ॥ ८ ॥ अरुणवरुणकोलं च शालिपर्णी शता- वरी॥क्वाथः पित्तसन्निपातमुष्कवृद्धौ विदां वर ॥ ९ ॥ वरुण- वृक्षादनी चैव दशमूली शतावरी॥क्वाथपानं वातिके च मुष्क- वृद्धौ हितावहम् ॥१०॥ एतेन भवते सौख्यं तदा कर्मावकार- येत्॥कर्णकोषस्य मध्ये तु रक्तान्निर्हारयेच्छिराम् ॥ ११ ॥ वामकोष्ठस्य वृद्ध्या तु दक्षिणां हारयेच्छिराम्॥उभाभ्यां द्वे शिरे वेध्ये तेन वा तत्सुखं भवेत् ॥१२॥ इति चाण्डक्रिया प्रोक्ता
अ० ३३] भाषाटीकासमेता । (३९९) सा चैवोन्नीतरोगिणे ॥१३॥ इत्यात्रेयभाषिते हारीतोत्तरे तृती- यस्थाने वृषणवृद्धिचिकित्सा नाम द्वात्रिंशोऽध्यायः ॥ ३२ ॥ कफसे उपजे अण्डवृद्धिमें वच, नमक, कदंबवृक्ष, सरसों, इनका क्वाथ बना सेवन करना हित है ॥८॥ लाल ऊंगा, वायवरणा, कंकोल, शालपर्णी, शतावरी, इनका क्वाथ पित्त और सन्निपातसे उपजे अंडवृद्धिरोगमें हित है ॥ ९ ॥ अमरवेल, वायवरणा, दशमूल, शतावरी, इनका क्वाथ वातके अंडवृद्धिरोगमें पीना हित है ॥ १०॥ इस करके सुख हो जाता है पीछे अन्यकर्म करें। कानके मध्यमें रहनेवाली रक्तको धारण करनेवाली नाड़ीको विंधावे ॥ ११ ॥ बाईंतर्फ अंडवृद्धि होवे तो दाहिने कानकी नस विंधावे और दोनोंतर्फ अंडवृद्धि होवे तो दोनों कानोंकी नसोंको विंधावे ऐसे करनेसे सुख उत्पन्न होता है ॥ १२ ॥ यह दारुण क्रिया कही है जिसके ज्यादा अंडवृद्धि हो रही हो उस रोगीके करनी चाहिये ॥ १३ ॥ इति वेरीनिवासिबुधशिवसहायसूनुवैद्यरविदत्तशास्त्र्यनुवादितहारीतसंहिताभाषाटीकायां तृतीयस्थाने वृषणवृद्धिचिकित्सानाम द्वात्रिंशोऽध्यायः ॥ ३२ ॥ त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः ३३. अथ विसर्परोगकी चिकित्सा । आत्रेय उवाच॥ लवणाम्लक्षारकटुकैरुष्णस्वेदातिदोषतः॥ रक्त- पित्तं प्रकुप्येत स विसर्पी भिषग्वर ॥१॥ स सप्तधा परिज्ञेयः पृथग्दोषैश्च द्वन्द्वजैः॥ केवलो रक्तजस्त्वन्यः सन्निपातेन सप्तमः ॥ २ ॥ तथापरे प्रवक्ष्यन्ते नामानि च पृथक्पृथक्॥ आग्नेयो ग्रन्थिको घोरः कर्दमश्च तथापरः ॥३॥ आग्नेयो वातपित्तेन ग्रन्थिकः पित्तश्लेष्मणा॥ कदमो वातश्लेष्मोत्थो घोरः स्यात्सा- न्निपातिकः ॥४॥ रक्तंलसीकात्वङ्मांसं दूष्यं दोषास्त्रयो मलाः॥ विसर्पाणां समुत्पत्तौ विज्ञेयाः सप्तधातवः ॥५॥ न्यग्रोधबि- ल्वखदिरकषायो धावने हितः ॥ काञ्जिकाम्लैः पिच्छिलया सौवीरकरसेन वा ॥६॥ मातुलुङ्गरसेनापि धावनं वातसर्पिषु ॥ क्षीरेण शीततोयेन धावनं पित्तसर्पिणि ॥ ७ ॥ श्लेष्मविसर्पिणे
(४००) हारीतसंहिता । [तृतीयस्थाने- वाथ धवार्जुनकदम्बकम् ॥ धावनं सर्पिणे शस्तं सुरासौवीर- केण वा ॥ ८ ॥ धावनञ्च हितं तस्य सन्निपाते विसर्पिणे ॥ यवाग्निमन्थैश्च शटीन्यग्रोधैश्च ससर्षपैः ॥९॥ क्वाथः स्यात्स- न्निपातोत्थविसर्पधावने हितः॥पञ्चजीरकपवित्थांश्च काञ्जिकेन तु पेषयेत्॥ मातुलुङ्गरसेनापि लेपनं वातसर्पिणे ॥१०॥ धवा- रोध्रतिलाश्रैलविदारीकण्टकं तथा ॥ लेपः पित्तविसर्पे वा गुआपत्रैस्तु लेपनम् ॥११॥ सैन्धवारिष्टतुम्बीकापटोलपत्रकै- घृतम्॥पाचितं लेपने शस्तं विसर्पाणां निवारणम् ॥ १२ ॥ रक्तजेषु विसर्पेषु कुर्य्याद्रक्तावसेचनम् ॥ पश्चाद्धवकदम्बानां सर्वदा गृहधूमकम् ॥१३॥ लेपने हितकृत्प्रोक्तं धावनं काञ्जि- केन तु ॥ कुठेरकाश्च सुरसा चक्रमर्दो निशायुगम् ॥ १४ ॥ सर्षपाः काञ्जिकेनापि पिष्ट्वा च लेपनं हितम् ॥१५॥ इत्या- त्रेयभाषिते हारीतोत्तरे तृतीयस्थाने विसर्पचिकित्सा नाम त्रयास्त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३३ ॥ आत्रेयजी कहते हैं-नमक, खट्टा, खारा, चर्चरा, गरम, ऐसा पदार्थ सेवनेसे और पसीनेके दोषसे रक्तपित्त कुपित हो जाता है वह विसर्परोग कहाता है ॥ १ ॥ वह जुदे जुदे दोषों करके और द्वंदज दोषों करके सात प्रकारका होता है और केवल रक्तसे उपजा हुआ सन्निपातसे युक्त सातवां होता है ॥ २ ॥ अन्य कईक जन जुदे २ नामोंवाले इन रोगोंको कहते हैं । आक्षेपनामवाला, ग्रंथिकनामवाला, घोरनामवाला और कर्दमनामवाला ऐसे तीन प्रकारसे होता है ॥३॥ आक्षेप विसर्परोग वातपित्तसे होता है और ग्रंथिक पित्तकफसे होता है, कर्दमनामवाला पिसर्प वातकफसे होता है और घोरनामक सन्निपातसे होता है ॥४॥ रक्तक्रांति, त्वचा, मांस इनसे दूषित हुए तीनों दोष और सात धातु ये विसर्प रोगोंकी उत्पत्तिमें हेतु कहे हैं ॥ ५ ॥ और बड़,बेलगिरी, खैर इनके काथसे शरीरका धोवना हित है और कांजीका खटाई- के झागोंसे अथवा सौवीर संज्ञक कांजीके रससे ॥ ६ ॥ अथवा बिजौराके रससे धोवना वातसे उपजे विसर्परोगमें हित है और पित्तके विसर्पमें दूध और शीतल जलकरके धोवना हित हैं ॥७॥कफके विसर्परोगमें धव, अर्जुनवृक्ष,इनके काथसे अथवा मदिरा सौवीर संज्ञक कांजी इनसे धोवना हित है ॥ ८ ॥ सन्निपातके विसर्पमें भी मदिरा, सौवीर संज्ञक कांजी इनसे धोवना हित है और अजवायन,अरणी,कचूर,बड़,सरसों॥९॥इनके क्वाथसे सन्निपातसे उपजे विसर्पको
अ० ३४] भाषाटीकासमेता । (४०१) धोना हित है और पांच प्रकारके जीरे, कैथ, इनको कांजीमें पीस बिजौराके रसके संग वातके विस- र्पमें लेप करना हित है ॥१०॥ धव, लोध, तिल, एलवालुक, विदारीकंद, गोखरूको पीस लेप करना अथवा चिरमठीके पत्तोंका लेप करना हित है ॥ ११ ॥ सैंधानमक, नींव, तुंबी, परवलके पत्ते इनको घृतमें पका लेप करनेसे सब प्रकारके विसर्पोका नाश होता है ॥ १२ ॥ रक्तसे उपजे हुए विसर्परोगमें फस्तखुलानी चाहिये पीछे धव, कदंब, वरका धुवां ॥ १३ ॥ इनका लेप करना हित है और कांजीसे धोवना हित है और आजबला, तुलसी, पुआड़, दोनोँ प्रकारकी हल्दी ॥ १४ ॥ सरसों इनको कांजीमें पीस लप करना हित है ॥ १५ ॥ इति वेरीनिवार्सिबुधशिवसहायसूनुवैद्यरविदत्तशास्त्र्यनुवादितहारीतसंहिताभाषाटी- कायां तृतीयस्थाने विसर्पचिकित्सानाम त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३३ ॥ चतुस्त्रिंशोऽध्यायः ३४. अथोपसर्गचिकित्सा । आत्रेय उवाच ॥ चतुर्विधो भवेद्दोषो वातरक्तसमुद्भवः ॥ गन्धदोषेण जायन्ते नामान्येषां पृथक् पृथक् ॥१॥ क्षुद्रतश्चा- न्तको घोरोऽथवा चान्यमसूरिका ॥ वसन्तः सर्षपाकारा पिटका यस्य दृश्यते ॥ २ ॥ सोऽपि क्षुद्रतरः प्रोक्तः पित्तरक्तप्रदोषतः ॥ अग्निदग्धवत्स दाहः पिटिका यस्य दृश्यते ॥ ३ ॥ सोऽप्यतीव विसर्पी स्यादसुखी च निरन्तरम् ॥ ४ ॥ सघनाः पीडका यस्य पाक्यति समः कफः ॥ दाहोऽरतिर्विवर्णत्वं तस्य सद्यः प्रजायते ॥५॥ वर्त्तुलमसूरिकावत् पिटका यस्य दृश्यते ॥ शाम्यति शीघ्रं पाकेन सा विज्ञेया मसूरिका॥तस्य वक्ष्यामि भेषज्यं यथाविधि महामते ॥ ६ ॥ आत्रेयजी कहते हैं--वातरक्तसे उपजाहुआ चारप्रकारका दोष होता है सो गंधके दोषसे उत्पन्न होते हैं उनके जुदे २ नामोंको कहते हैं ॥ १ ॥ क्षुद्रक, अंतक, घोर, मसूरिका ये हैं और जिसके गौर सरसोंके आकार फुनसी दीखें ॥ २ ॥ वह क्षुद्ररोग, पित्तरक्तके दोषसे होता है और जिसमें अग्निके दग्ध होनेके समान दाह हो ॥ ३ ॥ निरंतर सुखी नहीं हो वह अति घोर विसर्परोग होता है ॥ ४ ॥ कड़ी तथा पकीहुईके समान पिड़िका हो, दाह हो, २६
( ४०२ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने-
ग्लानि हो, विवर्ण हो वह तात्काल अंतक रोग होता है ॥ ५ ॥ जिसके मसूरिकाके समान गोल पिडिका हो जल्दी ही पकके शांत होजावे वह मसूरिका कहाती है । हे महामते ! इसकी यथार्थ विधिको कहते हैं ॥ ६ ॥ अथ मसूरिकामें चिकित्सा । गुप्ताकारं सुरक्षेच्च रक्षायोगविधानतः ॥ न स्त्रीणां नाधमानाञ्च संसर्गं वा प्रसङ्गकम् ॥ ७॥ सुशीतं शीतलं स्थानं कारयेत्सु- प्रयत्नतः ॥ क्षुद्रकस्योपसर्गस्य लेपनं चात्र कारयेत् ॥ ८ ॥ कुष्ठं सोशीरन्यग्रोधस्तथोदुम्बरिकत्वचः ॥ प्रलेपनं प्रशस्तं स्यात्क्षुद्रोपसर्गवारणम् ॥ ९ ॥ मधुशर्करया युक्तं क्षीरपानं सुखावहम् ॥ जम्ब्वाम्रपल्लवानाञ्च विष्टं दधिमधुयुतम् ॥१०॥ पाययेत् क्षुद्रकस्यास्य अतिसाराग्निनाशनम् ॥ गोक्षुरश्वाति- विषा च कर्कटाद्यं सपर्पटम् ॥ ११॥ कल्कमेतत्प्रयोक्तव्यं मधु- शर्करया युतम् ॥ हरीतकीमातुलुङ्गस्वरसं शर्करायुतम् ॥१२॥ क्षुद्रकस्योपसर्गस्य वमिशोषनिवारणम् ॥ अग्निकोऽप्युपसर्गे च योज्यं चैतत्प्रलेपनम् ॥ १३ ॥ रक्तचन्दनमञ्जिष्ठानिम्बप- त्राणि चार्जुनम् ॥ क्षीरेण नवनीतेन हितं स्याल्लेपनं तथा ॥१४॥ गुप्त आकारसे रक्षायोगके विधानसे उस रोगीको रक्खे और स्त्री तथा नीच जन इनका मेल नहीं होनेदेवे ॥ ७ ॥ अत्यंत यत्नसे शीतल स्थान रक्खे और क्षुद्रक उपसर्गमें लेप करना चाहिये ॥ ८ ॥ कूठ, खश, बड़, गूलरकी छाल इनका लेप करनेसे क्षुद्र उप- सर्गरोगका निवारण होता है ॥ ९ ॥ शहद, खांड इनसे युक्त दूधका पीना सुखदायक है और जामन, आंब इनके पत्तोंको पीस दही और शहद मिला॥ १० ॥पीनेसे क्षुद्रकरोग अतीसारकी अग्नि इनका नाश होता है। और गोखरू, अतीशा, काकडासींगी, पित्तपापड़ा ॥ ११॥ इनका कल्क बना शहद और खांड मिला ॥ १२ ॥ खानेसे क्षुद्र रोगवाले पुरुषका वमन, शोष, इनका निवारण होता है और अग्निसरीखे दाहवाले उपसर्गरोगमें ॥ १३ ॥ लाल चंदन, मँजीठ, नींबके पत्ते, अर्जुनवृक्षकी छाल इनको दूध, नौनीघृतमें पीस लेप करना हित है ॥ १४ ॥ घोरं चोपद्रवं दृष्ट्वा न स्वेदं न च मर्दनम्॥प्रलेपनं न कुर्वन्ति यथायोगेन पण्डिताः ॥१५॥ अरण्यगोमयक्षारतैलेन चालनं हितम् ॥ न तैलेनापि चाभ्यङ्गं लेपेनैव च कारयेत् ॥ १६ ॥
अ० ३४] भाषाटीकासमेता । (४०३) चन्दनं मधुकं रोध्रं न्यग्रोधोत्पलसारिवा ॥ मधुना संयुक्तः कल्कः पानेन चोपसर्गहृत् ॥१७॥ उपसर्गे ज्वरस्तीव्रो रक्तमूत्रं प्रजा- यते ॥ तस्य वक्ष्याम्युपचारं येन संपद्यते सुखम् ॥ १८ ॥ पटोलं पर्पटं शुण्ठी मुस्ता च खदिरं समम् ॥ कल्को मधुयुतः पाने हितः स्याज्ज्वरनाशनः ॥१९॥ चन्दनोशीरमञ्जिष्ठा पु- ष्करं दन्तधावनम् ॥ क्वाथपानं मधुयुतमुपसर्गज्वरापहम् २०॥ वमने चातिसारे च दाडिमं कुटजस्तथा॥ मधुदधान्वितं पान- मतिसारनिवारणम् ॥ २१ ॥ शेषाश्च क्षुद्रिकाः प्रोक्ताः क्रिया चात्र विधेयका ॥ एका क्रिया मसूरिके कर्त्तव्या सुविधानतः ॥ २२ ॥ वातलानि च सर्वाणि तथा रूक्षाणि कोविदः ॥ स्त्री- सङ्गं रूक्षशोकञ्च दूरतः परिवर्जयेत् ॥ २३ ॥ ज्वरे प्रोक्तानि पथ्यानि तानि चात्र प्रदापयेत्॥एवं त्रिसप्तरात्रेण सुखं सम्प- द्यते नरः ॥ २४ ॥ ततोऽभिषेकः कर्त्तव्यः कृत्वा मङ्गलवाच- नम् ॥ नूतनानि च सूक्ष्माणि वस्त्राणि च सितानि च ॥२५॥ परिधाप्य होमकार्य्यमिष्टभोज्यं विधेयकम् ॥२६॥ इत्यात्रेय- भाषिते हारीतोत्तरे तृतीयस्थाने उपसर्गचिकित्सानाम चतु- स्त्रिशोऽध्यायः ॥ ३४ ॥ उपसर्गरोगमें घोर उपद्रवको देखिके पसीना नहीं दे, मर्दन नहीं करे और लेप भी नहीं करे पंडित जनोंने ऐसे जानना ॥ १५ ॥ वनके आरनोंकी राख और तेल करके चालन कर्म करना हित है, तेलसेभी मालिस और लेप नहीं करवावे ॥ १६ ॥ चंदन, महुआ, लोध, बड़, कमल, अनंतमूल, इनका कल्क बना शहदके संग पीनेसे उपसर्गरोगका नाश होता है ॥ १७॥ उपस- र्गरोगमें तीव्रज्वरहो लालमूत्र उतरै उसकी चिकित्सा कहते हैं जिससे सुख उत्पन्न होवे ॥१८॥ परवल, पित्तपापड़ा, सोंठ, नागरमोथा, खैर इनको समान भाग ले कल्क बना शहद मिला पीनेसे ज्वरका नाश होता है और यह हित है ॥ १९ ॥ चंदन, खश, मँजीठ, पोहकरमूल इनके क्वाथसे दांतोंका धोवना और इसमें शहद मिला पीनेसे उपसर्गरोगमें उपजे ज्वरका नाश होता है ॥ २० ॥ वमन, अतीसार इनमें अनारदाना इंद्रजौ इनका क्वाथ और शहद,दही इनके पीनेसे अतीसारका नाश होता है॥ २१॥ और बाकीके रहे सब क्षुद्ररोगमें यही क्रिया करनी। यह क्रिया
( ४०४ ) हारीतसंहिता । [तृतीयस्थाने- उत्तम विधानसे मसूरिका रोगमें करनीचाहिये ॥२२॥ और सब वातवाले पदार्थ तथा रूखे पदार्थ स्त्रीसंग, शोक इनको वैद्यजन दूरसेही वर्ज देवे ॥ २३ ॥ ज्वरमें कहेहुए जो पथ्य हैं उनको यहां करवावे इसप्रकार करनेसे तीन रात्रिमें अथवा सात रात्रिमें सुख उत्पन्न होता है ॥ २४ ॥पीछे स्वस्तिवाचन करवाके अभिषेक अर्थात् स्नान करवावे नवीन तथा बारीक सफेद वस्त्रोंको ॥ २५ ॥ धारण कर होम करवा इच्छा पूर्वक भोजन करे ॥ २६ ॥ इति वेरीनिवासिबुधशिवसहायसूनुवैद्यरविदत्तशास्त्र्यनुवादितहारीतसंहिताभाषाटीकायां तृतीयस्थाने उपसर्गचिकित्सानाम चतुस्त्रिंशोऽध्यायः॥ ३४ ॥ पञ्चत्रिंशोऽध्यायः ३५. व्रणचिकित्सा । आत्रेय उवाच॥अथातः संप्रवक्ष्यामि व्रणानां तु चिकित्सितम्॥ व्रणाश्चानेकधा प्रोक्ता नानाधातुविकारिणः ॥१॥ दुष्टाम्बुपा- नाशनसेवनाच्च क्रोधातिभाराद्व्यसनेन वापि ॥ संजायते दुष्ट- व्रणोऽपि घोरश्चान्येन रक्तस्य हि दूषणेन ॥ २ ॥ वातेन पित्तेन कफेन वापि द्वन्द्वेन वा दोषसमुच्चयेन ॥ मांसं प्रहृष्य रुधिरं विकीर्य्य संजायते दुष्टव्रणोऽपि घोरः॥३॥त्वग्रक्तानि समेदांसि प्रदूष्यास्थिसमाश्रितः ॥ दोषाः शोफं शनैर्घोरं जनयन्त्युद्धता भृशम्॥४॥सरक्तञ्च सशूलञ्च रुजावच्च सवेपथु॥रूक्षं वा वात- सम्भूतं विज्ञेयं सरुजं व्रणम् ॥ ५ ॥ तप्तदाहज्वरः सृष्टः स्पर्शनं सहते तु यः ॥ शीतः सौख्यं लघुपाकी पित्तात्संजायते व्रणः ॥ ॥६ ॥ कठिनो वर्तुलाकारो घोरः पीतोऽल्पवेदनः॥ उष्णसहः स्निग्धतरश्चिरपाकी कफव्रणः ॥ ७॥ सर्वैर्लिङ्गैर्विजानीयात्सन्नि- पातसमुद्भवम् ॥ द्वन्द्वजे द्वयदोषस्तु दोषे चापि प्रदृश्यते ॥८॥ अभिघातसमुद्भूता विज्ञेयास्ते चतुर्विधाः ॥ अन्ये नाडीव्रणा ये स्युः सवाताश्च सवेदनाः ॥९॥ अन्ये तु स्रोतसां मध्ये तेषां शृणु चिकित्सितम् ॥ प्रथमं मण्डविस्रावो द्वितीयं स्वेदनं स्मृ-
[अ० ३५] भाषाटीकासमेता । ( ४०५ )
त्म् ॥१०॥ तृतीयं पाचनं प्रोक्तं पाचिते पाटनं तथा ॥ शोध- नञ्च प्रयोक्तव्यं तथा रोहणमेव च ॥ ११ ॥ पश्चात्क्रमस्तथैव स्याद्व्रणानां हितकारकः॥ रास्त्रा वचा तथा शुण्ठी मातुलुङ्ग- रसस्तथा ॥ १२ ॥ काञ्जिकेन सममेकधावनं वातिके व्रणे ॥ यष्टीमधुकमञ्जिष्ठापटोलनिम्बपत्रकैः ॥ १३ ॥ दुग्धेन कथितं शीतं धावनं पैत्तिके व्रणे ॥ १४ ॥ त्रिफला च कदम्बञ्च तथा जम्बु कपित्थकम् ॥ क्वाथः सोष्णकफोद्भूते व्रणे धावनमुत्तमम् ॥ १५॥ मातुलुङ्गाग्निमन्थौ च मूलं वा काञ्जिकेन च ॥ सुर- दारु तथा शुण्ठीलेपो वातव्रणे हितः ॥ १६ ॥ नलम्मूर्वा च मधुकं चन्दनं रक्तचन्दनम् ॥ पिष्टं तण्डुलतोयेन पित्तव्रणवि- नाशनम् ॥ १७ ॥ अंकोलकाश्च रोध्रश्च कदम्बार्जुनवेतसाः ॥ पारिभद्रदलानां तु पिष्ट्वा व्रणविलेपनम् ॥ १८ ॥ पार्क गते व्रणे वापि गम्भीरे सरुजेऽथवा ॥ सरन्ध्रे शोधनं कार्य्य धा- वनं तु भिषग्वरैः ॥ १९ ॥ करञ्जधवनिम्बानां कदम्बार्जुन- वेतसैः ॥ पादावशेषे क्वाथेन गम्भीरव्रणधावनम् ॥ २० ॥ मञ्जिष्ठा च तथा लाक्षारसश्चैव मनःशिला ॥ निशायुगे समा- युक्तं पिष्ट्वा वस्त्रपरिस्रुतत् ॥ २१ ॥ मधुयुक्तं शोधनञ्च व्रणानां हितकारकम् ॥ निम्बपत्राणि संक्षिप्य मधुना व्रणशोधनम् ॥ २२ ॥ निम्बपत्रतिलक्षौद्रं दार्बीमधुकसंयुक्तम् ॥ तथा तिलानां कल्कञ्च शोधनञ्च व्रणेषु च ॥ ॥ २३ ॥ ति- लका निम्बसीतस्य पत्राणि सुमनासु च ॥ कषायश्च हित- श्चैव व्रणानां शोधनेषु च ॥ २४ ॥ विशुद्धञ्च व्रणं ज्ञात्वा म्रक्षयेच्च व्रणं च तत् ॥ नवनीतेन वा श्रेष्ठं न तेन दहते व्रणः ॥ २५ ॥ आत्रेयजी कहते हैं-अब व्रणोंकी चिकित्साको कहेंगे-अनेक प्रकारकी धातुओंके विकारवाले अनेक प्रकारके व्रण कहे हैं ॥ १ ॥ दूषित जल और अन्नके सेवनसे, क्रोधसे,
( ४०६ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- अत्यंत बोझाके उठानेसे, किसीबातके व्यसनसे मनुष्योंके घोर दुष्ट व्रण हो जाता है अथवा दूषित रक्तसे घोर व्रण होता है ॥ २ ॥ वातसे, पित्तसे, कफसे अथवा दोषोंसे तथा सब दोषोंके मिलापसे मांसमें प्रहर्ष होके रुधिर विखरके घोर दुष्ट व्रण हो जाता है ॥ ३ ॥ और त्वचा, रक्त, मेद इनको दूषित कर अस्थियोंके आश्रय होके उठेहुए दोष शनैः शनैः अत्यंत शोजाको उत्पन्न कर देते हैं ॥ ४ ॥ वहां रक्तसहित शूलसहित पीड़ा होती है और कंपना होती है तहां रूखाव्राण हो वह वातसे उपजा जानना ॥ ५॥ और जो तप्तदाहज्वर इसे युक्त हो और स्पर्शको सहै और जिसमें शीतसे सुख हो, शीघ्र पाक हो वह पित्तसे उपजा व्रण होता है॥ ॥ ६ ॥ कठिन हो, गोल आकार हो, घोर हो, शीतल हो, थोडी पीडा हो, गरम वस्तुको सहै, अति चिकना हो, बहुत कालमें पके वह कफसे उपजा व्रण जानना ॥ ७ ॥ जो सब लक्षण मिलते हों तो वह सन्निपातसे उपजा व्रण जानना और दो दोषोंसे उपजे व्रणमें दो दोषोंके लक्षण मिलते हैं ॥ ८ ॥ चोट आदिसे उपजे हुए चार प्रकारके व्रण होते हैं और अन्य जो नाडीव्रण होते हैं वे पीडासहित और वातसहित होते हैं ॥ ९ ॥ अन्य व्रण स्रोतोंमें होते हैं उनकी चिकित्साको सुनो। पहले तो उठते ही मांडका तरडा दे जिसे शायद बैठ ही जावे पीछे पसीना दिवावे अर्थात् अग्नि या गरम पदार्थसे सेंके ॥ १० ॥ फिर तीसरे पकावे पक जावे तब व्रणके फाड़नेकी विधि कही है, पीछे शोधन करे, पीछे व्रणको भरे ॥ ११ ॥ पीछे व्रणको हित करनेवाला क्रम करना चाहिये । रास्ना, वच, सूंठ बिजौरेका रस ॥ १२ ॥ कांजी इनसे धोवना वातके व्रणमें हित है और मुलहटी, महुआ, मजीठ, परवल, नींबके पत्ते ॥ १३ ॥ इनको दूधमें मिला काथ बना, शीतलकर पित्तका व्रण धोवना चाहिये ॥ १४ ॥ त्रिफला, कदंब, जामन, कैथा इनका काथ बना गरम २ से कफसे उपजा व्रण धोवना चाहिये ॥ १५ ॥ और बिजौरा, अरणी, मूली, कांजी, देवदार, सूठ इनका लेप करना वातव्रणमें हित है ॥ १६ ॥ नड, मूर्वा, मुलहटी, चन्दन, लाल चन्दन, इनको चावलोंके धोवनके जलमें पीस लेप करनेसे पित्तके व्रणका नाश होता है ॥ ॥ १७ ॥ और अंकोल, लोध्र, कदंब, अर्जुन वृक्ष, वेत, नींबके पत्ते इनको पीस व्रणपै लेप करे ॥ १८ ॥ और वण पकजावे अथवा गंभीर हो जावे, पीडासहित हो अथवा छेद हो रहा हो वहां वैद्यजनोंको शोधन और धावन करना चाहिये ॥ १९ ॥ करंजुआ, धव, नींब, कदंब, अर्जुन और वेत इनका चतुर्थांश काथ रहे तब उससे गंभीर व्रणको शोधन करे ॥ २० ॥ मंजीठ, लाखका रस, मनसिल रस, मनसिल, दोनों प्रकारकी हलदी इनको समान भागले बकरेके मूत्रमें पीस शहद मिला लेप करनेसे व्रणोंका शोधन होता है यह हित है और नींबके पत्तोंको पीस शहद मिला लेप करनेसे व्रणोंका शोधन होता है ॥ २१ ॥ २२ ॥ और नींबके पत्ते, तिल, शहद, दारुहलदी, तिलोंका कल्क इनके लेप करनेसे व्रणोंका शोधन होता है ॥ २३ ॥ तिल, नींब, बहेडा इनके पत्ते और पुष्पोंका
अ० ३६ ] भाषाटीकासमेतं । ( ४०७ ) काथ बना सेक करनेसे व्रणोंका शोधन होता है ॥ २४ ॥ पीछे शुद्धहुए व्रणको जानके व्रणको नौनी घृतसे धोलेवे अर्थात् नौनी घृत धोके लगावे, नौनी घृत श्रेष्ठ है इससे व्रण भर- जाता है और दाह नहीं होता ॥ २५ ॥ अथ जात्यादि घृत । जातीकरञ्जपिचुमन्दपटोलमत्र यष्टीमधुश्च रजनी कटुरोहिणी च ॥ मञ्जिष्ठकोत्पलमुशीरकरञ्जबीजं स्यात्सारिवा त्रिवृन्माग- धिका समांशा ॥२६॥पक्वं घृते विहितमस्ति व्रणे प्रशस्तं नाडी गते च सरुजे च सशोणिते च॥लूताविसर्पमपि हन्ति गभीर- येञ्च व्रणाः सदाहकठिना अपिरोहयन्ति॥२७॥ इति जात्यादि घृतम्॥इत्यात्रेयभाषिते हारीतोत्तरे तृतीयस्थाने व्रणचिकित्सा नाम पञ्चत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३५ ॥ जावित्री, करंजुवा, नींव, परवल, मुलहटी, हलदी, कुटकी, हर्र, मँजीठ, कमल, खश, करंजु- वाके बीज, अनंतमूल, निशोत, पीपल, इनको समान भाग ले ॥ २६ ॥ इनको घृतमें पकालेवे यह घृत व्रणमें हित है और पीडा सहित तथा रक्तसहित नाडीव्रण, लूत, विसर्परोग इनको, नाश करता है और इससे दाहसहित तथा कठिन ऐसा व्रण भरजाता है ॥ २७ ॥ इति बेरीनिवासिबुधशिवसहायसूनुवैद्यरविदत्तशास्त्र्यनुवादितहारीतसंहिताभाषाटीकायां तृतीयस्थाने व्रणचिकित्सानाम पंचत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३५ ॥ षट्त्रिंशोऽध्यायः ३६. अथ श्लीपदरोगका निदान तथा लक्षण । आत्रेय उवाच॥व्रणोक्तरूपचारैश्च जायते श्लीपदं तथा ॥ वातेन स्फुटितं रूक्षं श्यामञ्चापि प्रदृश्यते ॥ १ ॥ सदाहपाकं पित्तेन सज्वरञ्चैव दृश्यते॥श्लेष्मणा जायते स्निग्धं घनं शोफसमन्वि- तम् ॥२॥ सन्निपातेन सर्वाणि जायन्ते भिषजांवर ॥ मेदाश्रितं तु वाल्मीकं वल्मीकवत् प्रदृश्यते॥३॥ सहश्यानि च चिह्नानि वातिकोत्थानि लक्षयेत्॥क्रियास्तस्य व्रणोक्ताश्च कारयेद्विधि- पूर्विकाः ॥ ४ ॥ जात्यादि च घृतं शस्तं तथैवालेपनानि च ॥
(४०८) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- पुनः प्रलेपनं कार्यं धवार्जुनकदम्बकैः ॥५॥ गिरिकर्णिकामू- लञ्च तथा वृक्षादनीमपि ॥ पिष्ट्वा प्रलेपनं कार्यं वाल्मीकश्ली- पदस्य च ॥ ६ ॥ सूरणकन्दकं पिष्ट्वा मधुना च घृतेन च ॥ लेपनं च हितं तस्य वाल्मीकश्लीपदापहम् ॥७॥ इत्यात्रेयभा- षिते हारीतोत्तरे तृतीयस्थाने श्लीपदचिकित्सा नाम षट्त्रिंशो- ऽध्यायः ॥ ३६ ॥ व्रणमें कहेहुए उपचारोंकरके श्लीपदसंज्ञकरोग हो जाता है, वातसे उपजा श्लीपद स्फुटित हो, रूखा हो, श्याम वगवाला हो ॥ १ ॥ पित्तसे उपजे श्लीपद रोगमें दाहहो, पाकहो और ज्वर होता है और कफसे उपजा श्लीपदरोग चिकनाहो करडाहो शोजासे युक्त होता है ॥ २ ॥ सन्निपातसे उपजे श्लीपद रोगमें सब लक्षण मिलते हैं और मेदके आश्रय हुआ यह रोग सर्पकी बँवईके समान लक्षणोंवाला होता है ॥ ३ ॥ और वातसे उपजे इस रोगमें समान लक्षण होते हैं उसकी क्रिया व्रणमें कहीहुई करना चाहिये ॥ ४ ॥ और पहले कहाहुआ जात्यादिघृत लेप करनेमें हित है और धव, अर्जुनवृक्ष, कंदंब, ॥ ५ ॥ गिरिकर्णिकाकी मूल, अमरवेल, इनको पीस लेप करनेसे वल्मीकसंज्ञक श्लीपदरोगका नाश होता है ॥ ६ ॥ जमीकंदको पीस शहद और घृतमें मिला लेप करनेसे वल्मीकसंज्ञक श्लीपदरोगका नाश होता है ॥ ७ ॥ इति वेरीनिवार्सबुधशिवसहायसूनुवैद्यरविदत्तशास्त्र्यनुवादितहारीतसंहिताभाषाटीकायां तृतीयस्थाने श्लीपदचिकित्सानाम षट्त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३६ ॥ सप्तत्रिंशोऽध्यायः ३७. अथ अर्बुदरोगकी चिकित्सा । वाताभिघातपवनाद्व्रणाद्वापि तथा पुनः॥ रक्तनाड्यः प्ररोहन्ति रुन्धन्ति च तथा पुनः ॥१॥ तेन रक्तस्य मार्गस्तु रुध्यते तेन जायते ॥ अर्बुदञ्च महास्थूलं मार्गरोधाच्च जायते ॥२॥ वाता- न्मृदुच परुषं कफाच्च घनशीतलम् ॥पित्तेन दाहपाकार्यं विजा- नीयं विचक्षणैः॥३॥सन्निपातेन कठिनं घनं पाषाणसन्निभम्॥ वृद्धिंमच्च गंडुकं स्यादासाध्यं तद्भिषग्वर ॥४॥ तस्यादौ पाटनं
कार्य्यं मर्मस्थानञ्च वर्जयेत् ॥ सैन्धवेन घृतेनापि कुर्य्यात्त- स्यानुलेपनम् ॥ ५ ॥ सूरणं कन्दकं दग्ध्वा घृतेन च गुडेन च ॥ लेपनं चार्बुदानाञ्च नाशनञ्च भिषग्वर ॥ ६ ॥ शेषा व्रणक्रिया प्रोक्ता शस्ता वार्बुदशान्तये ॥ वातघ्नानि च पथ्यानि हितानि मधुराणि च ॥७॥ इत्यात्रेयभाषिते हारीतोत्तरे तृती- यस्थाने अर्बुदचिकित्सानाम सप्तत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३७ ॥ आत्रेयजी कहते हैं-चोटके अभिघातसे और वायुसे तथा व्रणसे रक्तकी नाड़ी भरजाती और रुकजाती है ॥ १ ॥ उससे रक्तका मार्ग रुकजाता है सो मार्गके रुकनेसे महास्थूल अर्बुदरोग हो जाता है ॥ २ ॥ वातसे उपजा अर्बुद रोग कोमल हो और खरदरा हो और कफसे कडा और शीतल होता है और पित्तसे उपजेमें दाह और पाक होता है ऐसा वैद्यजनोंको जानना चाहिये ॥ ३ ॥ सन्निपातसे उपजा कठिन और पत्थरके समान कड़ा होता है हे वैद्यजन! बढनेवाला और गोलीसरीखा यह अर्बुदरोग असाध्य होता है॥४॥उस रोगकी आदिमें मर्मस्थानको वर्जके फाडनेकी विधि करनी चाहिये पीछे सैंधानमक घृत इनका लेप करना चाहिये ॥ ५ ॥ जमीकंदको दग्ध कर घृत और गुडमें मिला लेप करनेसे अर्बुदरोगोंका नाश होतां है ॥ ६ ॥ बाकीकी व्रणमें कही हुई क्रिया करनी यह श्रेष्ठ है और वातको नाश करनेवाले मधुर पदार्थ हित कहे हैं और पथ्य हैं ॥ ७ ॥ इति बेरीनिवासिबुधशिवसहायसूनुवैद्यरविदत्तशास्त्र्यनुवादितहारीतसंहिताभाषाटीकायां तृतीयस्थाने अर्बुदचिकित्सानाम सप्तत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३७ ॥ अष्टत्रिंशोऽध्यायः ३८. अथ लूत तथा गंडमाला रोगका निदान और लक्षण । आत्रेय उवाच ॥ इति व्रणक्रिया प्रोक्ता समासेन भिषग्वर ॥ यथायोगं चोपचारं ज्ञात्वा सम्यगुपाचरेत् ॥१॥ दुष्टाम्बुपानक कद्वन्ननिषेवणाच्च संजायते चक्रमिसम्भवगण्डमाला॥सामारुते च कफपित्तभवे विकारे संसर्पते क्रिमिजदोषगणश्च गण्डात्॥२॥ वातेन वातसदृशानि च लक्षणानि पित्तेन दाहसरुजव्रणशोष-