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हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

( ४२८ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- शोफश्च सदोषे वातपैत्तिकम् ॥ कफजे सघनं शीतं क्रिमिजेऽसृग्- प्रवाहनम् ॥ २ ॥ आत्रेयजी कहते हैं-हे बुद्धिमान् वैद्य ! नासिकाका रोग क्रिमिन और दोषज तथा रक्तज होता है उनके लक्षणोंको सुनो ॥ १ ॥ वातसे उपजेमें शिरमें पीड़ा होती है और वातपित्तसे उपजेमें शोजा होता है, कफके नासा रोगमें कड़ाई और ठंढकपना होती है, क्रिमिसे उपजे नासारोगमें रुधिर बहता है ॥ २ ॥ अथ नासारोगचिकित्सा । नासापाके गुडशुण्ठ्या वातिके नस्यमेव च ॥ शर्कराघृतयष्ट्या च पैत्तिके नस्यमेव च ॥ ३॥ श्लैष्मिके सुरसावासारसेन विहि- तञ्च तत् ॥ विडङ्गहिङ्गुमगधाः क्रिमिदोषे हिता मताः ॥ ४ ॥ रक्तजेऽसृग्विरेकश्च शिरोरोगस्योपक्रमे ॥ ५ ॥ इत्यात्रेयभा- षिते हारीतोत्तरे तृतीयस्थाने नासारोगचिकित्सानाम द्विच- त्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४२ ॥ वातके नासापाक रोगमें गुड, सूंठ इनकी नस्य देवे, पित्तके रोगमें खांड़, घृत, मुल- हटी, इनकी नस्य देनी श्रेष्ठ है ॥ ३ ॥ कफके नासारोगमें तुलसी, वांसा, इनके रसकी नस्य देनी श्रेष्ठ है ॥ ४ ॥ क्रिमिदोषके रोगमें वायविडंग, हींग पीपली, इनकी नस्य देनी श्रेष्ठ है, रक्तसे उपजे नासारोगमें रुधिरकी फस्त खुलावे, शिरोरोगके अनु- सार कर्म करे ॥ ५ ॥ इति बेरीनिवा० हारीतसंहिताभाषाटीकायां नासारोगचिकित्सा- नाम द्विचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४२ ॥ त्रिचत्वारिंशोऽध्यायः ४३. अथ इन्द्रलुप्तरोगका लक्षण । आत्रेय उवाच ॥ केशघ्नस्य चिकित्सां तु शृणु हारीत साम्प्र- तम् ॥ रूक्षं सपाण्डुरं वातात्पित्ताद्रक्तं सदाहकम् ॥ १ ॥ कफा- न्वितं भवेत् स्निग्धं रक्तात् पाकं व्रजन्ति तत्॥सन्निपातेन सदृशं जायते सर्वलक्षणम् ॥ २ ॥

अ० ४३ ] भाषाटीकासमेता । ( ४२९ ) आत्रेयजी कहते हैं-हे हारीत ! अब इंद्रलुप्त अर्थात् बालोंका नाश होता है उसकी चिकित्सा कहते हैं, वातदोषसे रूखा और पांडुवर्ण होजाता है पित्तसे रक्तवर्ण और दाह होती है ॥ १ ॥ कफसे चिकना वर्ण होता है और रक्तदोषसे स्थान पकजाता है सन्निपातके इंद्रलु- समें सब लक्षण मिलते हैं ॥ २ ॥ इंद्रलुप्तरोगकी चिकित्सा । गुडेन सुरसाशुण्ठीमातुलुङ्गरसेन तु ॥ केशघ्ने वातसम्भूते धाव- नञ्च प्रशस्यते ॥३॥ त्रिफलावचारोहीतं गुडेनापि प्रपेषितम्॥ धावनं कफसम्भूते चैन्द्रलुप्ते प्रशस्यते ॥ ४ ॥ पैत्तिके च हितं दुग्धं नवनीतान्वितं तथा॥शिताशिवाफलं यष्टी पैत्तिके धावनं मतम् ॥५॥ भृङ्गराजरसं ग्राह्यं शृंगवेररसं तथा ॥ सौवीरकरसे- नापि तिलान् पिष्ट्वा प्रलेपनम् ॥ पश्चात्कार्यं पुरुषेण स्नानमु- ष्णेन वारिणा ॥६॥ धवार्जुनकदम्बस्य शिरीषमपि रोहितम् ॥ क्वाथमेषां शिरोदग्धं शमयेदिन्द्रलुप्तकम् ॥ ७ ॥ कुरबकस्य पुष्पेण जपायाःकुसुमेन च॥घृष्टस्य चेन्द्रलुप्तस्य कृतमेव निवा- रणम् ॥८॥ पैत्तिकानि च लिङ्गानि दृष्ट्वा दुग्धेन धावनम् ॥ शीतलानि प्रदेयानि पैत्तिकेन विधीयते ॥९॥ धत्तूरपत्राणि च मागधीनां निशाविशालागृहधूमकुष्ठम् ॥ घृतेन युक्तञ्च जलेन पिष्टं शिरःप्रलेपे क्षतवारणं स्यात् ॥१०॥पित्तैःकृते दोषयुते च रोगे पटोलपत्रं पिचुमन्दकं वा ॥ तथामलक्याः फलमेव पिष्ट्वा घृतेन खण्डेन प्रलेपनञ्च ॥ ११ ॥ निवार्य्यते मस्तकजं क्षतञ्च शिरोऽर्त्तिसंघान्विनिहन्ति चैतत् ॥ गजेन्द्रदन्तस्य मषीं गृहीत्वा प्रलेपनं वा नवनीतकेन ॥ १२ ॥ तिलार्क- भल्लातकदग्धमाषक्षारस्य लेपो नवनीतकेन॥ सर्पस्य क्षारस्य तथा प्रयोगः खल्लाटके केशचयं करोति ॥ १३ ॥ इत्यात्रेय- भाषिते हारीतोत्तरे तृतीयस्थाने इन्द्रलुप्तचिकित्सा नाम त्रिचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४३ ॥ Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu

( ४३० ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- वातसे उपजे इन्द्रलुप्त रोगमें गुड, तुलसी, सूंठ, बिजौराका रस, इनका लेप करना चाहिये ॥ ३ ॥ त्रिफला, वच, बहेडा, गुड़, इनको पीस कफसे उपजे इंद्रलुप्तको धोवना श्रेष्ठ है ॥ ४ ॥ पित्तके इंद्रलुप्तमें दूध, नौनीघृत, मिसरी, आंवला, मुलहटीको पीस धोना श्रेष्ठ है ॥ ५ ॥ भंगराका रस, अदरखका रस, कांजीका रस, इन्होंमें तिलोंको पीस लेप कर पीछे गरम जलसे स्नान करे ॥ ६ ॥ धव, अर्जुनवृक्ष, कदंब, शिरस, बहेडा, इनका काथ बना धोनेसे शिरके दाद, इन्द्रलुप्त इनकी शांति होती है ॥ ७ ॥ रक्तकोरंटा, जासवंद, इनके पुष्पों- को घिस लेप करनेसे इन्द्रलुप्तका नाश होता है॥८॥ पित्तसे उपजे इंद्रलुप्तमें दूधसे धोवना श्रेष्ठ है और शीतल वस्तु देवे पित्तको करनेवाले इलाज नहीं करे ॥ ९ ॥ धतूराके पत्ते, पीपल, हलदी, इंद्रायण, वरका धूवां, कूठ इनको जलमें पीस घृतमें मिला शिरपे लेप करनेसे इन्द्रलुप्तक नाश होता है ॥ १० ॥ पित्त दोषसे उपजे इंद्रलुप्त रोगमें परवलके पत्ते, नींव, आँवलाका फल, इनको पीस घृत और खांड मिला लेप करनेसे ॥ ११ ॥ मस्तकपै उपजा केशनाशरोग दूर होता है और यह लेप शिरकी पीडाओके समूहोंका नाश करता है और हस्ती दांतको फूकि उसकी स्याहीको नौनीघृतमें मिला लेप करनेसे ॥ १२ ॥ अथवा तिल, आक, भिलावा, उड़द इनको दग्ध करि इनके खारको नौनीघृतमें मिला लेप करनेसे तथा विधिसे निकासा हुआ सर्पके खारका लेप करनेसे गंजे शिरपे केशोंके समूह बढ़ जाते हैं ॥ १३ ॥ इति बेरीनिवासिबुधशिवसहायसूनुवैद्यरविदत्त० हारीतसंहिताभाषाटीकायां इन्द्रलुप्तचिकित्सानाम त्रिचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४३ ॥ चतुश्चत्वारिंशोऽध्यायः ४४. अथ कर्णरोगलक्षण । आत्रेय उवाच ॥ शेषेण वा तोयभृतेन वापि मलेन वा चाति भवेद्रुजा च ॥ उच्छ्वासरोधाद्भवते तथापि वातादिकैर्वा कुपितै- रथापि ॥ १ ॥ संसर्गदोषैरपि सर्वदोषैः क्रिमिव्रणेनापि तथैव चान्या ॥ संजायते कर्णरुजा नरस्य शृणोति तेनापि बहुस्वनां- श्च ॥२॥निःस्वानमेघध्वनिदन्तशब्दान् शूलं सदाहं च शिरो- व्यथा च ॥ वेणुस्वनं वत्स शृणोति सर्वं पित्तेन तं विद्धि भिषग्वरिष्ठ ॥ ३ ॥ तथा च मूर्च्छा प्रतनौति शब्दं मेघस्वनं वा कफजे शृणोति ॥ ४ ॥ क्रिमिदोषे स्रवेत्पूयं सरक्तं वाति

अ० ४४ ] भाषाटीकासमेता । ( ४३१ ) सत्तम ॥ तथाचैवाभिघातेन जायते तीव्रवेदना ॥ ५ ॥ क्षतेन पूयं स्रवते बाल्याद्भवति चापरः ॥ तश्चापि लूतिदोषेण जायते कर्णजा रुजा ॥ ६ ॥ आत्रेयजी कहते हैं--कानमें शोथ हो, जल शेष रहजावे और मैल हो उससे अति पीडा होनेसे ऊंचे श्वासके रोकनेसे तथा वातादिक दोषोंके कुपित होनेसे संसर्गदोषोंसे, सन्निपातसे अथवा क्रिमियोंसे उपजे व्रण होनेसे मनुष्यके कानमें अत्यंत पीडा हो जाती है उससे बहुतसे शब्दोंको सुनता है॥२॥शब्दोंको मेघके गर्जनके समान और दांतोंके चाबनेके शब्दके समान सुनै शूल हो दाहहो शिरमें पीडा हो वह सब कुछ वीनके शब्दके समान सुनता है हे उत्तम वैद्य ! उसरोगको पित्तसे उपजा जानो ॥३॥शब्द सुननेसे मूर्च्छासीहो और मेघके गर्जनेसरीखा शब्द सुनै ये कफसे उपजे कर्णरोगके लक्षण हैं ॥ ४ ॥ क्रिमिदोषसे उपजे कर्णरोगमें रक्त सहित पीव गिरे और चोटसे उपजेमें तीव्र पीडा होती है ॥५॥ क्षतसे उपजेमें पीव गिरे और बालअवस्थामें लूतिरोगसे उपजे कर्णरोगमें पीडा उत्पन्न होती है ॥ ६ ॥ अथ कर्णरोगकी चिकित्सा । न कर्णरोगे जलपूरणञ्च न चूर्णमेतत्कथितं विधिज्ञैः॥तैलं हितं स्वेदनमेव कर्णे सबाष्पबिन्दुश्च हितो मतश्च ॥ ७ ॥ सैन्धवं समुद्रफेनश्च सूक्ष्मचूर्णं च कारयेत् ॥ सौवीरकरसेनापि वातिके कर्णपूरणम् ॥ ८ ॥ आर्द्रसौवीररसं शुण्ठीसैन्धवगुग्गुलम् ॥ माषकुलमाषरसेन तैलं पक्वातिचोष्णकम् ॥ ९ ॥ कटुतुम्बेन- धार्येत कर्णरोगे प्रशस्यते ॥१०॥ यष्टीमधुकुष्ठमरिष्टपत्रं निशा विशालासुमनःप्रवालाः॥विपाचितं कर्णभवे च शूले सपैत्तिके वा घृतमेव शस्तम् ॥ ११॥ ब्राह्मीरसं सैन्धवकं विडङ्गं सभृङ्गराजस्य घृतेन युक्तम्॥तथैव सौवीररसञ्च पथ्या शृतं च वस्त्रे परिपूर्ण- मेतत् ॥ १२ ॥ हितं भवेत्तच्छ्रुतिपूरणाय पूयं सरक्तं क्रिमिजं निहन्ति ॥ १३ ॥ सर्वे प्रोक्ताः शिरोरोगास्तैलानि च घृतानि च ॥ जात्यादिकान्वा युञ्जीत शिरोरोगविदांवरः॥१४॥वात- १ 'सौवीरं काञ्जिके स्रोतोऽञ्जने च बदरीफले' इति मेदिनी ।

( ४३२ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- हारीणि पथ्यानि विदाहीनि गुरुणि च ॥ १५ ॥ इत्यात्रेयभा- षिते हारीतोत्तरे तृतीयस्थाने कर्णरोगचिकित्सानाम चतुश्चत्वा- रिंशोऽध्यायः ॥ ४४ ॥ कानके रोगमें जल पूरना और चूर्ण पूरना हित नहीं कहा है। कानरोगमें तैल पूरना और पसीना दिवाना हित है और भाफ दिवानेका कर्म हित कहा है ॥ ७ ॥ सेंधानमक, समुद्रफेन, इनका बारीक चूर्ण बना कांजीके रसमें मिला वातसे उपजे कानके रोगमें हित है ॥ ८ ॥ ओदेवेरोंका रस, सोंठ, सेंध्वानमक, गूगल, उड़दोंके बाकले इनमें तेलको पका गरम गरम ॥ ९ ॥ उस तेलके पुरानेसे कानका रोग दूर होता है इस तेलको कडुई तुंबीमें घालके घरे ॥ १० ॥ मुलहटी, कूंठ, नींवके पत्ते, हलदी, इन्द्रायणके पुष्प तथा कोमल २ पत्ते, इनमें घृतको पका पित्तसे उपजे कर्णशूलमें पूरण करना श्रेष्ठ है ॥ ११ ॥ ब्राह्मीका रस सेंधानमक, वायविडंग, मंगरेका रस, घृत, कांजीका रस, हरडै, इनको पका पीछे वस्त्रमें छान कानमें पूरनेसे ॥ १२ ॥ क्रिमियोंसे उपजी कानमें रक्तसहित पीवका नाश होता है और कानमें पूरन करनेमें यह हित कहा है ॥ १३ ॥ जितने शिरके रोग कहे हैं उनमें तैल और घृतमें सिद्ध किये हुए औषधोंको बरते ॥ १४ ॥ वातको हरनेवाले विदाही तथा भारी ऐसे भोजन पथ्य कहे हैं ॥ १५ ॥ इति चेरीनिवासिबुधाशिवसहायसूनुवैद्यरविदत्तशास्त्र्यनुवादितहारीतसंहिताभाषाटीकायां तृतीयस्थाने कर्णरोगचिकित्सानाम चतुश्चत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४४ ॥ पञ्चचत्वारिंशोऽध्यायः ४५. 𑁍⊱•••⊰𑁍⊱•••⊰𑁍 अथ नेत्ररोगकी चिकित्सा । आत्रेय उवाच॥ उष्णतिक्षारकटुकैरभिघातेन वा पुनः॥ सूक्ष्म- वस्त्रेक्षणेनापि दोषाः कुप्यन्ति नेत्रजाः॥ १॥ सहजा य पराजेया वक्ष्यामि शृणु लक्षणम्॥ रूक्षः कण्डूश्च तोदश्च शुष्कशीतास्रस- न्ततिः ॥ २ ॥ वातिकं तं विजानीयात्पैत्तिकं शृण्वतः परम् ॥ ॥३॥ सरक्ते सदाहे नेत्र उष्णस्रावश्च पैत्तिके ॥ शोफकण्डू सन्नि- पाते शीतजाड्ये कफात्मके ॥४॥ द्वन्द्वजो मिश्रालिङ्गैश्च सर्वैस्तैः सान्निपातिके ॥ एतद्धि लक्षणं ज्ञात्वा चोपचारं शृणुष्व मे ॥५॥

अ० ४९] भाषाटीकासमेता । (४३३) आत्रेयजी कहते हैं-गरम, अतिखारा, चर्चरा ऐसे भोजनोंसे तथा अभिघातसे और सूक्ष्म वस्त्र देखनेसे नेत्रमें रहनेवाले दोष कुपित हो जाते हैं ॥ १ ॥ जो स्वभावसे ही उत्पन्न होते हैं वे कष्टसाध्य होते हैं । अब उनके लक्षणोंको सुनो । नेत्र रूखा हो, खाज हो, पीडा हो, शुष्क हो और शीतल रुधिर झिरे ॥ २ ॥ वह वातका नेत्ररोग जानना । अब पित्तके लक्षणोंको सुन ॥ ३ ॥ पित्तसे उपजे नेत्ररोगमें गरम २ जल गिरे और लाल तथा दाह सहित नेत्र हों,कफके नेत्ररोगमें शीतल और जडता हो, सन्निपातके नेत्ररोगमें शोजा और खाज होती है॥४॥दो दोषोंसे उपजे नेत्ररोगमें मिले हुए लक्षण होते हैं और सन्निपातके नेत्ररोगमें सब लक्षण मिलते हैं, ऐसे विलक्षण रोगको जानके उसकी चिकित्साको मुझसे सुनो ॥ ५ ॥ अथ नेत्ररोगकी चिकित्सा । शुण्ठीसुराह्वसुरसाः सह काञ्जिकेन चोष्णेन धावनमिदं सह पै- त्तिकेच॥श्लेष्मोद्भवे त्रिफलकल्कमिदं समूत्रं शस्तं जनैश्च कथितं न विचिन्तनीयम् ॥ ६ ॥ शुण्ठी शटी च रजनी त्रिफला सनिम्बा पत्राणि सैन्धवयुतानि तुषाम्लकेन ॥ शस्तं वदन्ति नयनेषु स- सन्निपाते रक्तोद्भवे च सरुजे च तथा च शस्तम् ॥७॥ फलत्रिकं चारुनिशासु धूमो वचासु वर्षाभवसैन्धवेन ॥ प्रलेपनं श्लेष्मभवे विकारे सवातिके वा हितमेव शस्तम् ॥८॥ शुण्ठीसैन्धवतक्रेण ताम्रभाण्डे विघर्षितम् ॥ अपामार्गस्य मूलं वा मूलं धत्तूरकस्य वा ॥ ९ ॥ अञ्जनञ्च हितं तेषां वातनेत्रामयापहम् ॥१०॥ दुग्धो- त्पन्नं नवनीतं यष्टी निम्बस्तिलाश्च संयोज्याः ॥ त्रिफला गुडसं- युक्ता लेपनं कफनेत्ररोगघ्नम् ॥ ११ ॥ शुण्ठी सैन्धवतुत्थं मा- गधिका ताम्रभाजने घृष्टम् ॥ दध्ना घृतेनाञ्जनकं निहन्ति सर्वांश्च नेत्ररोगान्वै ॥ १२ ॥ वातपित्तकफदोषसम्भवान्नेत्रयोर्बहुव्यथां विनाशकः ॥ एक एव हरति प्रयोजितः शिग्रुपल्लवरसः स- माक्षिकः ॥ १३ ॥ सोंठ, देवदार, तुलसी इनको कांजीमें काथ बना गरम २ से पित्तके उपजे नेत्ररोगमें नेत्रोंका धोवना श्रेष्ठ है और कफसे उपजे नेत्ररोगमें त्रिफलाके कल्कको गोमूत्रमें पका धोवना श्रेष्ठ है ऐसे अन्य वैद्योंने भी कहा है ॥ ६ ॥ सोंठ, कचूर, हलदी, त्रिफला, नीमके पत्ते, सेंधानमक, इनको जवोंकी कांजीमें सिद्ध कर सन्निपातसे उपजे नेत्ररोग तथा रक्तसे उपजे हुए पीडासहित २८

(४३४) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- रोगमें धोवना श्रेष्ठ है ॥ ७ ॥ त्रिफला, दारुहलदी, घरका धूंवा, वच, सांठी, सेंधानमक इनका लेपं करनेसे कफसे उपजा अथवा वातसे उपजा नेत्ररोग दूर होता है ॥ ८ ॥ सोंठ, सेंधानमक इनको तांबेके पात्रमें तक्रके संग घिस अंजन घाले अथवा ऊंगाकी जड तथा धतूरेकी जडको घिस ॥ ९ ॥ अंजन घालनेसे सब प्रकारके नेत्ररोगोंका नाश होता है ॥ १० ॥ दूधसे उत्पन्न हुआ नौनीघृत, मुलहटी, नींब, तिल, त्रिफला, गुड़, इन सबोंको मिला पीसि लेप करनेसे कफसे उपजा नेत्ररोग नाश होता है ॥ ११ ॥ सोंठ, सेंधानमक, नीलाथोता, पीपली इनको तांबाके पात्रमें घिस, दही और घृतके संग नेत्रमें आंजनेसे नेत्रके सब रोगोंका नाश होता है ॥ १२ ॥ वात, पित्त, कफ इन दोषोंसे उपजे हुए नेत्ररोगकी बहुतसी पीडाका नाश शीघ्रही होता है और एक सहिंजनेके पत्तोंके रसमें ही शहद मिला नेत्रोंमें आंजनेसे सब नेत्ररोग दूर होते हैं ॥ १३ ॥ अथ नेत्रके फूलेकी चिकित्सा । मिथ्याहारविहारैस्तु नेत्रे पुष्पञ्च जायते ॥ प्रथमं सुखसाध्यं स्याद्वितीयं कष्टसाध्यकम् ॥ १४ ॥ तृतीयं शस्त्रसाध्यं तु चतुर्थं तदसाध्यकम् ॥ १५॥ शङ्खपुष्पं तथा रोध्रं शङ्खनाभिर्मनःशिला॥ काञ्जिकेन तु संपिष्टा छायाशुष्का भिषग्वर ॥ १६ ॥ वातिके काञ्जिकेनापि पैत्तिके पयसा हिता ॥ श्लेष्मले मूत्रसंयुक्ता पुष्प- स्याञ्जनेके हिता ॥ १७ ॥ भृङ्गराजरसेनापि त्रिदोषशमने हिता ॥ हरीतकी वचा कुष्ठं पिप्पली मरिचानि च ॥ १८ ॥ विभीतकस्य मज्जा वा शङ्खनाभिर्मनःशिला ॥ एतानि सम- भागानि अजाक्षीरेण पेषयेत् ॥ १९ ॥ नाशयेत्तिभिरं कण्डू- पाटलान्यर्बुदानि च ॥ हन्ति पुष्पं सपटनं रात्र्यन्धञ्च निय- च्छति ॥ २० ॥ क्षताभिघाति शोकेन अग्निदग्धं च वा पुनः ॥ काचञ्च नीलिका चैव सिद्धिमिच्छन्ति नेत्रयोः ॥ २१ ॥ अपथ्य आहारविहार करनेसे नेत्रमें फूला होजाता है। एक तो सुखसाध्य होता है और दूसरा कष्टसाध्य होता है ॥ १४ ॥ और तीसरा शस्त्रसाध्य होता है, चौथा असाध्य होता है ॥ १५ ॥ हे उत्तमवैद्य ! शंखपुष्पी, लोध, शंखकी नाभि इनको कांजीमें पीस छायामें सुखा ॥ १६ ॥ उस अंजनको वातके फुलेमें कांजीके संग और पित्तमें दूधके संग कफकेमें गोमूत्रमें घिस नेत्रमें घालना हित है ॥ १७ ॥ त्रिदोषसे उपजे फूलेमें भंगरेंगे रसके संग घालै और हरड़ै, वच, कूठ, पीपल, मिर्च ॥ १८ ॥ बहेड़ेकी मज्जा, शंखकी नामि,

अ० ४९ ] भाषाटीकासमेता । ( ४३५ ) मनशिल, इनको समान भाग ले बकरीके दूधमें पीस ॥ १९ ॥ अंजन घालनेसे तिमि- ररोग, नेत्रकी खाज, नेत्रके पटलदोष, अर्बुद रोग, नेत्रका फूला, पटलमें प्राप्त हुआ फूला, रतौंधा, इनका नाश होता है ॥ २० ॥ चोटआदिके अभिघातसे, शोकसे, तथा अग्निसे दग्ध हुआ काचपटल और नीलिका इन नेत्ररोगोंकी भी सिद्धि होजाती है ॥ २१ ॥ अथ नेत्रपटलका लक्षण । बाल्याद्दोषबलादेव दुष्टाहाराभिषेवणात् ॥ वार्द्धक्याच्च पटलं स्यात्तस्य वक्ष्यामि लक्षणम् ॥ २२ ॥ वातात्सकश्मलं रूक्षं पित्तान्नीलं च पीतकम्॥ कफेन शुभ्रं सघनं रक्तान्नारक्तकं विदुः ॥२३॥ सन्निपातादिलिङ्गश्च अतो वक्ष्यामि भेषजम् ॥२४ ॥ बालक अवस्थासे दोषके बलसे और दूषित भोजन खानेसे वृद्ध अवस्थामें नेत्रमें पटल होजाता है तिसके लक्षणको कहते हैं ॥ २२ ॥ वातसे उपजा मैला हो और पित्तसे नीला- वर्णवाला हो अथवा पीला हो और कफसे करडा हो, सफेद हो और रक्तके दोषसे लाल पटल होजाता है ॥ २३ ॥ और सन्निपातसे उपजे हुएमें मिले हुए लक्षण होते हैं अब इन्होंकी औषधको कहते हैं ॥ २४ ॥ अथ नेत्रपटलचिकित्सा । शुण्ठीवचारजनितुत्थमनःशिला चशोभाञ्जनाञ्जनविशालजटा च शंखम्॥वास्तूकमूलमधुसैन्धवकट्फलानां सौवीरकेण परि- मर्दनवर्तिरेषा ॥२५॥ छायाविशुष्कनयनाञ्जनके प्रशस्तं नाशं नयेत्पटलनेत्ररोगसङ्घात् ॥२६॥साञ्जना कट्फला चैव हरी- तकि मनःशिला॥गुडेन कट्फलश्चापि निहन्ति नेत्रप्रच्छदम् ॥ २७ ॥ महाविभीतकफलस्य च शङ्खनाभि घृष्टं ससैन्धवयुतं पयसाम्लकेन॥वर्तिर्गुडेन नयनाञ्जनके हिता च पित्तप्रसूतपट- लस्य निवारणश्च ॥ २८ ॥ सोंठ, वच, हलदी, नीलाथोथा, मनसिल, सहिंजना, काला सुरमा, इंद्रायण, जटामांसी, शंख, बथुवाकी जड, शहद, सेंधानमक, कायफल इनको कांजीमें खरल करि बत्ती बना ॥ २५ ॥ छायामें सुखा नेत्रोंमें आंजनी श्रेष्ठ कही है. पटलरोग, अन्य नेत्र रोगोंका समूह इनको नाश करती है ॥ २६ ॥ और काला सुरमा, कायफल, हरड़ै, मनसिल इनको Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu

( ४३६ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने-

पीस आंजनेसे अथवा गुड़के संग कायफलको पीस नेत्ररोगोंका नाश होता है ॥ २७ ॥ बडा बहेड़ा, शंखकी नाभी, सेंधामक इनको दूधमें तथा कांजीमें घिस पीछे गुड़ मिला बत्ती बना नेत्रमें आंजनेसे नेत्रके पटल रोगका नाशहोता है ॥ २८ ॥ नेत्ररोगमें वर्ज्य। सधूमञ्च सवातञ्च रूक्षमुष्णादिकं तथा ॥ कटुकाम्लं व्यवायञ्च वर्जयेन्नेत्ररोगिणाम् ॥ २९ ॥ इत्यात्रेयभाषिते हारीतोत्तरे तृतीयस्थाने नेत्ररोगचिकित्सानाम पञ्चचत्वारिंशोऽध्यायः ४५ नेत्ररोगवालेको धुवांसहित वायु रूक्षा और गर्म भोजन कडुआ तथा खट्टा भोजन और मैथुन करना ये वर्ज देने चाहिये ॥ २९ ॥ इति वेरीनिवासिबुधशिवसहायसूनुवैद्यरविदत्तशास्त्र्यनुवादितहारीतसंहिताभाषाटीकायां तृतीयस्थाने नेत्ररोगचिकित्सानाम पंचचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४५ ॥ षट्चत्वारिंशोऽध्यायः ४६. अथ मुखरोगकी चिकित्सा ! आत्रेय उवाच ॥ ओष्ठौ च स्फुटितौ यस्य वातिवाहेन वाति- कात् ॥ तस्य सर्पिर्भक्षणञ्च ओष्ठदारणवारणे ॥१॥ सदाहञ्च भवेत्सौख्यं पैत्तिकं तं विनिर्दिशेत् ॥ २ ॥ आत्रेयजी कहते हैं--जिससे ओष्ठ फटे रहे वायु बहै वह वातसे उपजा मुखरोग जानना वहां मुख फटे हुएको निवारणकेवास्ते घृतकी मालिस करे ॥ १ ॥ दाहहो कभी शीतता उठे तहां पित्तसे उपजा रोग जानना ॥ २ ॥ ओष्ठ रोगकी चिकित्सा ! मधुना नवनीतेन ओष्ठयोर्म्रक्षणं मतम् ॥ लेपनं चोष्ठरोगेषु शर्करासहितं दधि॥३॥ सरक्तमोष्ठरोगञ्च दृष्ट्वा रक्तावसेचनम्॥ धवार्जुनकदम्बानां प्रलेपः स्यात्सुखावहः ॥ ४ ॥ यहां नैनीघृत शहद इनकी मालिस करना श्रेष्ठ है और इन पित्तके ओष्ठरोगोंमें खांड़, दही, इनकी मालिस करना श्रेष्ठ है ॥ ३ ॥ रक्तसहित ओष्ठरोग जानके रक्त निकलना श्रेष्ठ है और धव, अर्जुनवृक्ष, कदंव इनका लेप करना श्रेष्ठ है ॥ ४ ॥

अ० ४६ ] भाषाटीकासमेता । (४३७) अथ दंतरोगलक्षण । कृष्णा दन्तावलिर्यस्य दन्तमूलं च वातिकात् ॥ चलनं वा प्रहश्येत वातिकञ्च विनिर्दिशेत् ॥ ५ ॥ पैत्तिकात्पित्तवाहञ्च दंतमांसं विनिर्दिशेत् ॥ श्लैष्मिके दन्तपाके च शोफः स्याच्छ्वे- तता भृशम् ॥ ६॥ रक्तजे जायते कण्डू रक्तस्रावश्च दृश्यते ॥ सूयते दन्तमांसञ्च सरक्ते दन्तपुटे तथा ॥७ ॥ सचिद्रं दन्तम्- लञ्च सबलं शूलमेव च ॥ दन्तमांसं विशीर्येत क्रिमिजा दन्त- रुग्भवेत् ॥ ८ ॥ जिसके दांत और दांतोंकी जड काली होजावे और दांत हिलने लगजावें वह वातसे उपजा रोग जानना ॥ ५ ॥ पित्तसे उपजेमें पित्त बहै, दांतोंमें मांस बढ़ जावे और कफसे उपजे दंतपाकरोगमें शोजा हो और बहुतसे सफेद होजावे ॥ ६ ॥ रक्तसे उपजेमें खाजहो रक्तस्रावहो और दांतोंके मांससे शोजाहो और दांतोंके पुट रक्त हो ॥ ७ ॥ दांतोंकी मूल छिद्रसहित दीखै और अत्यंत शूल हो और दांतोंका मांस विखर जावे वह क्रिमिज दंतरोग जानना ॥ ८ ॥ अथ दंतरोगचिकित्सा । वचायवानीसहचित्रकेण सिन्धूत्थविश्वासहसिन्धुवारम्॥कल्कं तथोष्णञ्च सदन्तरोगे मुखे च गण्डूषशतानि पञ्च ॥९॥ सर्वेषु मुखरोगेषु हितमेतत्प्रशस्यते ॥ वचासैन्धवशुण्ठ्या च घषणं दन्तमूलके॥१०॥यवानीं च वचां रात्रौ दन्तमूले च धारयेत्॥ पित्तजदन्तरोगेषु नवनीतं सशर्करम् ॥११॥धात्रीफलेन संघृष्टं दन्तरोगनिवारणम्॥ श्लैष्मिकदन्तरोगेषु हरीतक्या गुडेन वा ॥१२॥ घर्षणं च प्रशस्तं च त्रिफलाक्वाथसंयुक्तम् ॥ अहिमार- कमूलस्य क्वाथो गण्डूषधारणात् ॥ १३॥ खदिरस्य तथा क्वाथो यवानीक्वाथ एव वा॥क्वाथश्च निम्बमूलस्य दन्तरोग- निवारणः ॥ १४ ॥ रक्तजे च विकारे च घर्षो लवणसर्षपैः ॥ रक्तञ्च स्रावयेत्तस्य दृष्टमोष्ठपुटे च तत् ॥ १५ ॥ विडङ्गं हिङ्गु

( ४३८ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- सिन्धुश्च वचाचूर्णेन घर्षयेत् ॥ क्रिमिजदन्तरोगेषु हितमेतत्प्र- शस्यते ॥ १६ ॥ वच, अजमान, चीता, सेंधानमक, सूंठ, संभालू, इनका कल्क बना गरम २ दंत रोगमें लेपित करे और मुखमें पांचसौ कुल्ले करे ॥ ९ ॥ सब मुखरोगोंमें यही विधि करनी श्रेष्ठ है और वच, सेंधानमक, सूंठ, इनको दांतोंकी जडमें घिसे ॥ १० ॥ अजमान, वचको रात्रीमें दांतोंकी जड़में धारण करे और पित्तसे उपजे दंतरोगोंमें नौनीघृत खांड इनको लगावे ॥ ११ ॥ आंवलाके फलको घिसके लगानेसे दंतरोगोंका निवारण होता है और कफसे उपजे दंतरोगमें हड्डे, गुड इनको घिस ॥ १२ ॥ त्रिफलाके क्वाथमें मिला दांतोंके लगानेसे दंतरोग दूर होता है और रियांकी जड़का काथ बना कुल्ले करे ॥ १३ ॥ तथा खैरका काथ, अजमानका क्वाथ, नींवकी जड़का क्वाथ इनसे दंतरोगका निवारण होता है ॥ १४ ॥ रक्तसे उपजे दंतरोगमें नमक, सेंधानमकसे दांतोंको घिसै और ओष्ठपुटमांससे रक्तको निरवावे ॥ १५ ॥ बायविडंग, हिंग, सेंधानमक, वच, इनके चूर्णको दांतोंमें घिसे और क्रिमिज दंतरोगमें भी यही विधि करनी हित है ॥ १६ ॥ अथ जिह्वारोग लक्षण । जिह्वायां पिटिका यस्य जिह्वापाकं विनिर्दिशेत् ॥ वातिके सरुजा कृष्णा पित्तेन दाहसंयुता॥१७॥श्लेष्मणा सघना श्वेता सर्वे वै सान्निपातिके ॥ १८ ॥ जिसकी जिह्वापै पिड़िका हों वह जिह्वापाक जानना । वातसे उपजी पिड़िका पीडा- सहित होती है और काली होती है पित्तसे दाह करके युक्त हों ॥१७॥ कफसे कड़ी हो सफेद वर्णवाली हो और सन्निपातसे उपजी पिड़िकाओंमें सब लक्षण मिलते हैं ॥ १८ ॥ अथ जिह्वारोगचिकित्सा । वचाभयाविडङ्गानि शुण्ठी सौवर्चलं कणा॥ घृतेन युक्तं जिह्वा- यां घर्षणं वातिके गदे ॥१९ ॥ काञ्जिकेन तु तक्रेण सोष्णग- ण्डूषधारणम्॥यष्टीकं चन्दनं मुस्ता मागधी मधुसंयुतम्२०॥ लेपनं पैत्तिके दोषे जिह्वास्फोटकवारणम् ॥ दुग्धेन च शीते- नापि हन्ति गण्डूषधारणम् ॥२१॥ दन्तरोगे तथा जिह्वापाके तच्च हितं विदुः ॥ रोध्रार्जुनकदम्बानां क्वाथश्चोष्णः सुखावहः॥ Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu

अ० १६ ] भाषाटीकासमेता । (४३९) ॥२२॥ श्लेष्मोद्भवे मुखपाके हितं गण्डूषधारणम् ॥ रक्तजेषु विकारेषु रक्तस्रावं च कारयेत् ॥२३॥ कण्टकेनापि जिह्वायाश्ची- रयित्वा च लेपनम् ॥ मूर्वामुस्ताभयाशुण्ठीमागधीरजनीद्वयम् ॥२४॥ गुडेन मधुना युक्तं लेपनं रक्तजिह्वके ॥ मरिचञ्च वचा कुष्ठं हरीतक्याश्च चूर्णितम् ॥ घर्षणं श्लेष्मणि जाते जिह्वापाके हितं विदुः ॥ २५ ॥ वच, हरडै, बायविडंग, सोंठ, कालानमक, पीपली इनको घृतमें युक्त कर जिह्वापै घिसनेसे वातसे उपजा जिह्वारोग दूर होता है ॥ १९ ॥ कांजी, तक्रको गरम २ कर कुल्ले करे और मुलहटी, चन्दन, नागरमोथा, पीपलीको पीस शहदमें मिला ॥ २० ॥ लेप करनेसे पित्तदोषसे उपजा जिह्वास्फोटक रोग दूर होता है और ठंढे २ दूधके कुल्ले धारण करना ॥ २१ ॥ दंतरोग, जिह्वापाकमें हित है और लोध, अर्जुनवृक्ष कदंबका क्वाथ सुखसे सुहाता हुआ गरम २ मुखमें धारण करना ॥ २२ ॥ कफसे उपजे मुखपाक रोगमें हित है और रक्तसे उपजे विकारोंमें रक्त निकालना श्रेष्ठ है ॥ २३ ॥ काँटेसे जिह्वाको चीरके वहां मूर, नागरमोथा, हरडै, सूंठ, पीपली, दोनों हलदी ॥ २४ ॥ गुड, शहद, इनको मिला रक्तसे उपजे जिह्वारोगपै लेप करे और मिरच, वच, कूठका चूर्ण बना कफसे उपजे जिह्वारोगमें मसलना हित है ॥ २५ ॥ अथ गलगण्डरोगके लक्षण । तिलपिच्छिलगौल्यादिसेवनात्तिद्रवाद्यपि ॥ नवोदकेन कफजो जायते घण्टिकागदः ॥ २६ ॥ जिह्वामूले कण्ठसन्धौ श्लेष्मरक्त- समुद्भवः ॥ तेनास्यशोषो जडता ज्वरो मन्दश्च जायते ॥२७॥ शिरोव्यथारुचिस्तन्द्रा तथास्य जडता भवेत् ॥ तिल और झागोंवाला तथा गुल्ली बंधनेवाला और पतला ऐसे भोजनके सेवनेसे और नवीन जलसे कफसे उपजा हुआ घण्टिका संज्ञक रोग हो जाता है ॥ २६ ॥ जिह्वाकी मूलमें कंठकी सन्धिमें कफरक्तसे उपजा हुआ यह रोग होता है उससे मुखमें शोष हो, जडता हो, मन्दज्वर हो ॥ २७ ॥ शिरमें पीडा हो, अरुचि हो, तंद्रा हो, मुखमें जडता हो ॥ अथ गलगण्ड रोगकी चिकित्सा । तर्जन्यां कण्ठमध्ये तु संपीड्य रक्तपन्थिका ॥ २८ ॥ परिस्रुतं तथा रक्तं तदा विम्लापनं हितम् ॥ वचाञ्च मरिचं कृष्णाचूर्णं

( ४४० ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- तत्र निधापयेत् ॥२९॥ मर्दनं स्यात्कण्ठदेशे तेन ग्रन्थिर्विली- यते ॥ धान्यनागरजीमूतवचा ह्येताः समांशकाः ॥३०॥ क्वाथ- स्वेदो घण्टिकाया मुखे गण्डूषधारणम्॥दिवारात्रौ वचाग्रन्थि मुखे संधारयेद्भिषक् ॥ ३१॥ तेन सौख्यं भवेत्तस्य मुखरोगा- द्विमुच्यते ॥ ३२ ॥ तर्जनी अंगुलीसे कंठके मध्यमें रक्तकी ग्रंथीको पीडित करे ॥ २८ ॥ जब रक्त निकल जावे तब विम्लापन कर्म करना हित है । वहां वच, मिर्च, पीपल इनके चूर्णको बुरकावे ॥ २९ ॥ कंठके मध्यमें मर्दन करे इससे वह ग्रंथि शांत हो जाती है और धन- नियां, सूंठ, नागरमोथा, वच इन औषधोंको समान भाग ले ॥ ३० ॥ क्वाथ बना पसीना दिवावे और गड्डुरोगवाले पुरुषके मुखमें इस क्वाथके कुल्ले करवावे ॥ ३१ ॥ दिनराति मुखमें वचको धारण करावे ऐसे करवानेसे रोगीको सुख उत्पन्न होता है और मुखरोगसे छुट जाता है ॥ ३२ ॥ अथ गलशुंडिका रोगके लक्षण । गले घण्टिकामार्गे च रक्तश्लेष्मविकारजा॥लम्बिका वर्धते नृणां विज्ञेया गलशुण्डिका ॥३३॥ रुन्धते चास्य मार्गञ्च नेत्रस्रावः प्रदृश्यते ॥ शिरोऽर्त्तिः श्वासकासश्च ज्वरेणैव प्रपच्यते ॥३४॥ मनुष्योंके गलमें घाटीके मार्गमें रक्तकफके विकारसे उपजी हुई लंबी ग्रंथि हो जाती है यह गलशुंडिका रोग कहाता है ॥ ३३ ॥ वह रोग मुखके मार्गको रोक लेता है और नेत्रों- में स्राव होता है, शिरमें पीडा हो, श्वास हो, खांसी हो, ज्वरकी तरह बाधा हो ऐसा यह रोग होता है ॥ ३४ ॥ अथ गलशुंडिकारोगकी चिकित्सा । आशुकारी महाप्राज्ञःशीघ्रं कुर्य्यात्प्रतिक्रियाम्॥शस्त्रेण शुण्डि- कां छित्त्वा कुर्य्याद्विम्लापनं हितम्॥३५॥मागधी मरिचं पथ्या वचाधान्ययवानिकाः ॥ क्वाथः सोष्णःस्वेदमायाद्गलशुण्डोप- शान्तये ॥३६॥ दिवा रात्रौ यवान्याश्च मुखे संधारणं हितम् ॥ मर्दनं कण्ठदेशे तु तेन संपद्यते सुखम् ॥ ३७॥ सिद्धार्थकं वचा कुष्ठं रजनी पारिभद्रकम् ॥ गृहधूमं सलवणं कण्ठे वा लेपनं हि-

अ० ४७.] भाषाटीकासमेता । ( ४४१ ) तम् ॥ ३८ ॥ ज्वरे प्रोक्तानि पथ्यानि यानि तानि महामते ॥ न गौल्थं पिच्छिलं सेव्यं तैलं नैव गलामये ॥ ३९ ॥ इति गलशुण्डिकाचिकित्सा ॥ इत्यात्रेयभाषिते हारीतोत्तरे तृतीय- स्थाने मुखरोगचिकित्सानाम षट्चत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४६ ॥ शीघ्रकार्य करनेवाला महान् वैद्य इस रोगका इलाज शीघ्रही करे, शस्त्रसें गलशुंडिकाको छेदन कर विम्लापन कर्म करना हित है ॥ ३५ ॥ पीपली, मिर्च, हरडै, वच, धनियां, अजमान इनका काथ बना इससे पसीना दिवानेसे गलशुंडिकारोगकी शांति होती है ॥ ३६ ॥ दिनराति अजमानको मुखमें धारण रखना हित है और कण्ठकी जगह मर्दन करना हित है इससे रोगीको सुख उत्पन्न होता है ॥ ३७ ॥ सरसों, वच, कूठ, हलदी, नींव, घरका धुआं, नमकका लेप कंठपै करना हित है ॥ ३८ ॥ और हे महामते ! ज्वरमें कहे हुए जो पथ्य हैं उनको करे और गलरोगमें गुल्ली बंधनेवाला तथा पिच्छल भोजन और तैलको नहीं सेवे ॥ ३९ ॥ इति वेरिनिवासिबुधशिवसहायसूनुवैद्यरविदत्तशास्त्र्यनुवादितहारीतसंहिताभाषाटीकायां तृतीयस्थाने मुखरोगचिकित्सानाम षट्चत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४६ ॥ सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः ४७. अथ वृद्धक्षीणानां वाजीकरण । आत्रेय उवाच ॥ क्लैब्यं पञ्चविधं प्रोक्तं समासेन शृणुष्व मे॥ ॥ १ ॥ निरोधादतिव्यवायेन वयःश्रान्तेऽपि मानवे ॥ जायते रेतसो हानिः क्लीबत्वञ्चापि जायते ॥२॥ त्रिविधं जायते क्लैब्यं मानसं रेतसः क्षयात् ॥ सहजं शुष्कसंस्वेदाज्जायते क्लीबता नरे ॥३॥ यस्य वै ममता चित्ते दृष्ट्वा स्त्रीणां विरागिताम्॥स्पर्शने स्वेदकं पञ्च तत्साध्यं मानसं स्मृतम् ॥४॥ यस्य विद्वेषतः स्त्री- णां व्यवायेन मनःक्षितिः ॥ ध्वजभङ्गो भवेच्छीघ्रं तत्क्लैब्यं रेतसःक्षयात् ॥ ५ ॥ समप्रकृतिर्यस्यान्यः सोऽप्यसाध्यतमः स्मृतः ॥ मनःक्षये मनोद्रेको मुग्धस्त्रीसहसङ्गमः ॥ ६ ॥

( ४५२ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- सरागविभ्रमकथालापैः संवर्द्धते मनः ॥ शुक्रक्षये शुक्रवृद्धिं कथयिष्यामि साम्प्रतम् ॥ ७ ॥ आत्रेयजी कहते हैं-नपुंसकपना पांचप्रकारका होता है सो संक्षेपमात्रसे कहते हैं सुनो ॥ १ ॥ मैथुनके रोकनेसे अथवा ज्यादे मैथुन करनेसे अवस्थाकी हार होनेसे मनुष्योंके वीर्य्यकी हानि हो नपुंसकपना होजाता है ॥ २ ॥ मनुष्योंके तीनप्रकारका नपुंसकपना होता है मानस, वीर्य्यक्षय, और शुष्क पसीनासे उपजा सहज ॥ ३ ॥ ऐसे होता है जिस पुरुषके स्त्रियोंके विरागभाव देखिके मनमें ममता हो, स्पर्श करनेमें पसीना आजावे यह मानस कहाता है सो सुखसाध्य होता है ॥ ४ ॥ और जिसके द्वेषयुक्त स्त्रियोंके संग मैथुन करनेसे मनकी हानि होजाती है और जिसके शीघ्रही लिंगका भंग होजाय वह वीर्य्यक्षय होनेसे नपुंस- कपना होता है उसे ध्वजभंग कहते हैं ॥ ५ ॥ और जिसकी सदा समान प्रकृति रहे अर्थात् कभी चैतन्यता हो ही नहीं वह असाध्यरोग कहाता है। मनके क्षय होनेमें मनको बढावे और सुन्दर भोली स्त्रीके संग विषय करवावै ॥ ६ ॥ और स्नेहसहित विभ्रमके वचन, स्त्रियोंकी कथाके आलाप इनसे मनको बढावे और वीर्य्यक्षयके नपुंसकपनेमें वीर्य्यवर्द्धक औषधोंको कहते हैं ॥ ७ ॥ अथ शुक्रवृद्धिके उपाय । विदारिकागोक्षुरमूषकानां धात्रीफलं स्यात्सहसैन्धवानाम् ॥ समानि चैतानि च मागधीनां युक्तं सिताढ्यं पयसा पिबेच्च॥८॥ विषं बृहत्यौ मगधात्रिकण्टास्तथात्मगुप्ता सशतावरी च॥ सश- करं गोपयसो घृतेन पानं नराणां प्रकरोति बीजम् ॥९॥ यव- गोधूममाषाणां निस्तुषाणाञ्च चूर्णकम् ॥ दुग्धेनेक्षुरसेनापि संस्कृत्य तु घृतेन तु ॥१०॥ पाचितं वटकश्रेष्ठं भक्षयेत्प्रातरु- त्थितः ॥ तस्योपरि पयःपानं पिप्पलीशर्करान्वितम् ॥११॥ यवक्षारविदारीञ्च माषचूर्ण तथा यवान्॥मरिचानां सिताढ्यञ्च घृतानाञ्च प्रपोलिकाम् ॥१२ ॥ पाचयेद्भक्षयेत्प्रातः पयःपानं तथोपरि ॥ वीर्य्यञ्च कुरुते पुंसां वनिता रमते भृशम् ॥१३॥ गुडूची शतमूली च स्वयंगुप्ता बला तथा ॥ १४॥ शाल्मली मुसलीमूलं चूर्णं गोपयसान्वितम् ॥ पानं नराणां श्रेष्ठं तु बीजमिन्द्रियकारकम् ॥ १५ ॥

अ० ४७] भाषाटीकासमेता । (४४३) विदारीकंद, गोखरू, मूघापर्णी, आंवला, सेंधानमक, पीपली इनको समान भाग ले मिश्री मिला गौके दूधके संग पीवे ॥ ८ ॥ अतीश, दोनों कटेहली, पीपली, गोखरू, और कौंचके बीज, शतावरी, इनका चूर्ण बना खांड मिला पीछे गौके दूध घृतके संग पीनेसे मनुष्योंके वीर्यवृद्धि होती है ॥ ९ ॥ जब, गेहूँ, उड़द इनके तुष उतारि चूर्ण बना पीछे दूधमें और ईंखके रसमें मिला घृतमें ॥ १० ॥ पका उनको प्रातःकाल उठके खाये और उसके ऊपर पीपली, खांड इनसे युक्त दूधको पीवे ॥ ११ ॥ जवाखार, विदारीकंद, उडदोंका चूर्ण, जब, मिर्च, इनका चूर्ण बना मिश्री मिला पीछे पोली बना घृतमें सिद्ध करलेवे इन पोलियोंको ॥ १२ ॥ प्रातःकाल भक्षण करे और ऊपरसे दूध पीवे ऐसे करनेसे पुरुषोंका वीर्य बढता है और स्त्रीके संग बहुतसा रमण करता है ॥ १३ ॥ गिलोय, शतावरी, कौंचके बीज, खरेहटी ॥ १४ ॥ सेमर, मुसलीकी जड़ इनका चूर्ण बना गौके दूधके संग पीना श्रेष्ठ है और मनुष्योंकी इंद्रियमें वीर्यको बढानेवाला है ॥ १५ ॥ अथ विदार्यादि औषध । विदारिकन्दांशुमती बृहत्यौ काकोलिका भीरु पुनर्नवे द्वे ॥ शृङ्गाटकं मागधिका बला च चूर्णं सिताह्वं सितया प्रयोज्यम्॥ ॥१६॥जीर्णे पयः पायसमेव योज्यं करोति पुंसां बलमेवमो- जः॥स्त्रीणां सहस्रंभजतेऽपि षण्ढो मासद्वये प्रस्तुतमेव शस्तम् १७ विदारीकंद, शालवन, दोनों कटेहली, काकोली, शतावरी, दोनों प्रकारकी सांठी, सिंघाड़ा, पीपली, खरेहटी इनका चूर्ण बना मिश्री मिला ॥ १६ ॥ दूधके संग पीनेसे पुरुषोंके बल और वीर्य बढता है और हीजडा हो वहभी हजारों स्त्रियोंके संग रमणकर सकता है, दो महीनेतक इस औषधका सेवन श्रेष्ठ है ॥ १७ ॥ अथ शुक्रवृद्धिमें वर्ज्य । वर्जयेत्कटुकं चाम्लं तीक्ष्णं चोष्णं विदाहि च॥ रूक्षं वापि च सौवीरं प्रोक्तानि चेन्द्रियक्षतौ ॥१८॥ पलाण्डुयवनं कन्दांस्त- लान्माषान्यथाबलम् ॥ तथौदनं विशालीनां दुग्धं चेक्षुरसं तथा॥१९॥वास्तुकं चिलकानाञ्च पथ्ये शुक्रक्षयादपि॥वर्जित्वा सूरणं शुण्ठीं योगयुक्तो न योजयेत् ॥ २० ॥ इत्यात्रेयभा- षिते हारीतोत्तरे तृतीयस्थाने वाजीकरणं नाम सप्तचत्वा- रिंशोऽध्यायः ॥ ४७ ॥ Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu

( ४५४ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- चर्चरा, खट्टा, तीक्ष्ण ऐसे भोजनको वर्ज दे और गरम, विदाही, रूषा ऐसा भोजन, कांजी इनको वीर्यक्षयमें वर्ज देवे ॥ १८ ॥ प्याज, तथा अन्यकंद, उड़द, और शालीसंज्ञक चावलों- का भात, दूध, ईखका रस ॥ १९ ॥वथुआका शाक और चिल्लक अर्थात् अन्य बथुआका भेद इनको अग्नि बलके अनुसार खावे ये वीर्यक्षयमें पथ्य हैं और जमीकंद, सोंठ, इनको नहीं देवे ॥ २० ॥ इति बेरीनिवासिबुधशिवसहायसूनुवैद्यरविद्त्तशास्त्र्यनुवादितहारीतसंहिताभाषाटीकायां तृतीयस्थाने वाजीकरणं नाम सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४७ ॥ अष्टचत्वारिंशोऽध्यायः ४८. अथ वन्ध्यारोगके लक्षण । आत्रेय उवाच॥वन्ध्या स्यात्षट्प्रकारेण बाल्येनाप्यथवापुनः॥ गर्भकोशस्य भङ्गाद्वातथाधातुक्षयादपि॥१॥जायतेनचगर्भस्य सम्भृतिश्च कदाचन॥ काकबन्ध्या भवेच्चैका अनपत्या द्विती- यका ॥२॥ गर्भस्रावी तृतीयाऽथ कथिता मुनिसत्तमैः ॥ मृत- वत्सा चतुर्थी स्यात्पञ्चमी च बलक्षयात् ॥३॥ तस्योपक्रमणं- वक्ष्ये येन सा लभते सुतम् ॥ ४ ॥ अजातरजसां स्त्रीणां क्रियते यदि मैथुनम्॥ तेनैव गर्भसंकोचं भगत्वमुपगच्छति ॥ ॥५॥ तेन स्त्री भवते वन्ध्या गर्भं गृह्णाति नो भृशम् ॥ सा च कष्टेन भवति रामा गर्भवती भिषक् ॥६॥ औषधैश्चोपचारैश्च सिद्धिश्चापि न संशयः॥अनपत्यबलेनापि जायते भिषजां वर ॥७॥न भवेत्काकबन्ध्या च अनपत्यापि सिध्यति॥सिध्यन्ती क्षीणधातुत्वाज्जायते सा भिषग्वर ॥ ८ ॥ आत्रेयजी कहतें हैं-वंध्या रोग छह प्रकारका होता है, बालक अवस्था में गर्भक्रोशके भंग होजानेसे अथवा धातुके क्षय होनेसे ॥ १ ॥ गर्भ कदाचित्भी नहीं ठहरता है और एक तो काकबन्ध्या होती है दूसरी अनपत्या होती है॥ २ ॥ तीसरी गर्भस्रावी होती है, चौथी मृतवत्सा होती है और पांचवीं बलके क्षय होनेसे होती है ॥३॥ अब इनकी चिकित्सा कहते हैं जिसकरके सुख उत्पन्न होता है ॥ ४ ॥ जो यदि रजस्वला नहीं हुई हो ऐसी स्त्रीके संग मैथुन कर लेवे तो गर्भस्थान भगमें संकोचको प्राप्त हो जाता है ॥ ५ ॥ उसकरके स्त्री वंध्या हो जाती है विशेषकरिके गर्भको धारण नहीं करती है हे वैद्य ! वह स्त्री

अ० ४८ ] भाषाटीकासमेता । (४४५) कष्टसे गर्भवती होती है ॥ ६ ॥ हे उत्तम वैद्य ! जो अनपत्या वंध्या होती है वह औषधोंसे गर्भवती होती है ॥ ७ ॥ फिर वह काकवंध्या भी नहीं होती और अनपत्या भी नहीं होती है और जो क्षीणधातु होनेसे वंध्या हो वह भी औषधोंसे गर्भवती हो जाती है ॥ ८ ॥ अथ वंध्यारोगको दूर करनेवाले औषध । चन्दनोशीरमञ्जिष्ठापटोलं घनवालकम् ॥ मधुकं मधुयष्टी च तथा लोहितचन्दनम् ॥ ९ ॥ सारिवा जीरकं मुस्तं पद्मकञ्च पुनर्नवा ॥ क्षीरेण शर्करायुक्तं पानं पित्तोद्भवे गदे ॥ १० ॥ ज्ञात्वा योनिविशुद्धिश्च तत्र दद्यान्महौषधम् ॥ चन्दनोशीरम- ञ्जिष्ठा गिरिकर्णी सिता तथा ॥ ११ ॥ क्षीरेणालोडिता पित्ते पुष्पसिद्धिं करिष्यति ॥ १२ ॥ चंदन, खश, मँजीठ, परवल, नागरमोथा, नेत्रवाला, महुआवृक्ष, मुलहटी, लालचंदन ॥ ९ ॥ अनंतमूल, जीरा, नागरमोथा, पद्माख, इनको दूधमें मिला खांड मिला पान करना पित्तसे उपजे वंध्यारोगमें हित है ॥ १० ॥ योनिकी शुद्धिको जानके पीछे ये महान् उत्तम औषध देनी चाहिये । चंदन, खश, मंजीठ, सफेद गोकर्णी, मिश्री ॥११॥ इनको दूधमें मिला घोटि पीनेसे पित्तसे उपजे रोगमें स्त्रीके पुष्प होते हैं ॥ १२ ॥ त्रिदोषदूषितरजकी चिकित्सा । रजोरक्तं परीक्षेत वातपित्तकफात्मकम् ॥ सरुजञ्च सकृष्णञ्च पक्कजम्बूनिभं च यत् ॥ वातेन बाधितं पुष्पं तच्च संलक्षयेद्बुधः ॥ १३ ॥ तस्य नागरपिप्पल्‍यौ मुस्ताधन्वयवासकम् ॥ बृहत्यौ पाटला चैव क्वाथः सगुडको दधि ॥ १४ ॥ सप्ताहं पाययेद्धी- मान्यावत्स्रवति शोणितम्॥विशुद्धे च तथा रक्ते पाययेत्पय- सान्वितम् ॥ १५ ॥ श्वेता च गिरिकर्णी च श्वेता गुञ्जा पुन- र्नवा ॥ तेन सा लभते गर्भं मासमेकं प्रयोगतः ॥ १६ ॥ वात, कफ, पित्त इनसे दूषित रजस्वलाके रक्तको जाने । पीडासहित और कृष्णवर्णवाला पकेहुए जामनके फलके समान वर्णवाला ऐसे रक्तको वातके कोपसे उपजा हुआ जाने ॥ १३ ॥ सोंठ, पीपली, नागरमोथा, धमासा, दोनों कटेहली, पाड़लवृक्ष, इनका क्वाथ बना गुड़ और दही मिला ॥ १४ ॥ रजस्वलाकालमें सात दिनतक पिलावे और रक्त शुद्ध होजावे तब इस

( ४४६ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- काथको दूधके संग पीवे ॥ १५ ॥ सफेद गोकर्णी, सफेद चिरमठी, सफेद सांठी इनको एक महीना तक पीवे तो वंध्या स्त्री गर्भको प्राप्त हो जाती है ॥ १६ ॥ अथ पित्तदूषितरजकी चिकित्सा । जपाकुसुमसदृशं कुसुम्भरससन्निभम्॥ दाहशोषमूत्रकृच्छ्रयुक्तं तत् पित्तदूषितम् ॥ १७॥ चन्दनोशीरमञ्जिष्ठापटोलं घनवाल- कम् ॥ मधुकं यष्टिमधुकं तथा लोहितचन्दनम् ॥ १८ ॥ पद्म- कं पुनर्नवे द्वे शारिवा जीरकं घनम् ॥ क्षीरेण शर्करायुक्तं पानं पित्तकृते गदे ॥ १९ ॥ ज्ञात्वा योनिविशुद्धिश्च तत्र दद्यान्म- हौषधम् ॥ श्वेतार्क मूलं पयसा श्वेता च गिरिकर्णिका ॥ २० ॥ श्वेताद्रिकर्णीमूलञ्च पानं गोक्षीरसंयुतम् ॥ बन्ध्यानां गर्भज- ननं भवेत्तल्लक्षणान्वितम् ॥ २१ ॥ पुष्पके समान तथा कसुंभाके रंगके समान वर्णवाला रजका रक्त हो, दाह हो, शोष हो, मूत्रकृच्छ्र हो, वह पित्तदूषित रक्त जानना ॥ १७ ॥ चंदन, खश, मँजीठ, परवल, नागरमोथा, नेत्रवाला, महुआ, मुलहटी, लाल चन्दन ॥ १८ ॥ पद्माक, दोनों सांठी, अनंतमूल, भद्रमोथा इनको दूधमें मिला खांड मिला पित्तसे उपजे रोगमें पीना हित है ॥ १९ ॥ पीछे योनिकी शुद्धिको जानके आगे कही हुई ये महान् औषध देनी चाहिये। सफेद आककी जड़,दूधी, सफेद गोकर्णी ॥ २ ॥ सफेद गोकर्णीकी जड इनको गौके दूधके संग पीवे और सफेद कटेहलीकी जड़को दूधके संग पीनेसे वन्ध्या स्त्रीको गर्भ रहता है ॥ २१ ॥ अथ कफदुष्टरजकी चिकित्सा । सघनं पिच्छलं चापि जाड्यं स्यान्मूत्ररोधनम् ॥ आलस्य- तन्द्रा निद्रा च कफदुष्टं रजो विदुः ॥ २२ ॥ त्रिफला गिरि- कर्णी च तथारग्वधवत्सकौ ॥ पयसा पयसा पानं स्त्रीणां च गर्भकारणम् ॥ २३ ॥ पलाद्यं चन्दनाद्यं च द्राक्षाद्यं चूर्णमेव च ॥ दापयेद् गर्भजननं नारीणां भिषगुत्तमः ॥ २४ ॥ खण्ड- काद्यञ्च चूर्ण च नारीणां भिषगुत्तमः॥पुनर्नवाद्यं देयं वा स्त्रीणां गर्भप्रदायकम् ॥ २५ ॥ करडा २ झागोंवाला, जडरूप, मूत्रको रोकनेवाला,ऐसा रक्त गिरे और आलस्य हो निद्रा हो

अ० ४९ ] भाषाटीकासमेता । ( ४४७ ) तंद्रा हो वह कफसे दूषित हुआ रक्त जानना ॥ २२ ॥ त्रिफला, गोकर्णी, अमलतास, कूडाकी छाल, दूधी, इनको दूधके संग पीनेसे स्त्रियोंके गर्भस्थिति होती है ॥ २३ ॥ पहले कहा- हुआ बलआदिक चन्दनादिक और द्राक्षादिक चूर्णके देनेसे हे उत्तमवैद्य ! गर्भस्थिति होती है ॥ २४ ॥ हे उत्तमवैद्य ! खण्डकाद्य चूर्ण अथवा पुनर्नवाद्य चूर्ण देनेसे स्त्रियोंको गर्भस्थिति होती है ॥ २५ ॥ अथ स्त्रियोंके गर्भार्थ पथ्य । अथ पथ्यं प्रवक्ष्यामि स्त्रीणां च शृणु पुत्रक ॥ कञ्चरं सूरणं चैव तथा चाम्लं च काञ्जिकाम् ॥ २६ ॥ विदाहिकं च तीव्व्रं च स्त्रीणां दूरे परित्यजेत् ॥ वन्ध्याकर्कटकीमूलं लांगली कटु- तुम्बिका ॥ २७ ॥ देवदाली द्विबृहती सूर्य्यवल्ली च भी- रुका ॥ निर्माल्यं माल्यवस्त्रञ्च तथा स्यादृत्तुसङ्गमः ॥ २८ ॥ अन्यस्त्रीस्नातमुदकं स्त्रीणां पथ्यमुपक्रमः ॥ २९ ॥ इत्यात्रे- यभाषिते हारीतोत्तरे तृतीयस्थाने वन्ध्योपक्रमो नामाष्टच- त्वांरिशोऽध्यायः ॥ ४८ ॥ और हे पुत्र ! अब स्त्रियोंके वास्ते पथ्य कहते हैं । कचरी, जमीकन्द, चूकाका शाख, कांजी, ॥ २६ ॥ विदाही और तीक्ष्ण ऐसे भोजन स्त्रियोंको दूरसे ही त्याग देने चाहिये और बांझ ककोड़ीकी जड़, कलहारी, कड़ई तुंबी ॥ २७ ॥ देवदाली, दोनों कटेहली, सूर्य्यमुखी, शतावरी, ये वस्तु वन्ध्यास्त्रीको पथ्य हैं और जिस स्त्रीके बालक होते हों उसका जूठा भोजन आदिक और उसका वस्त्र और उसका रजस्वला अवस्थामें स्पर्श ॥ २८ ॥ उसका ऋतुसम- यमें स्नान किया हुआ जल, ऋतुसमयमें अपने पतिके संग भोग ये पथ्य है ॥ २९ ॥ इति बेरीनिवासिबुधशिवसहायसूनुवैद्यरविदत्तशास्त्र्यनुवादितहारीतसंहिताभाषाटीकायां तृतीयस्थाने वन्ध्योपक्रमो नामाष्टचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४८ ॥ एकोनपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४९. अथ गर्भोपचारविधि । आत्रेय उवाच ॥ प्रथमे मासि यष्टीमधुपरूषकं मधुपुष्पाणि यथा लाभम् ॥ नवनीतेन पयो मधु मधुरं पाययेच्च ॥ १ ॥