भारतकोश
संग्रह पर लौटें

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

८४ श्रीमद्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे


भार्याको साथमें लिये उपवनमें इस प्रकार विहार कर रहे थे, जैसे इन्द्र इन्द्राणीके साथ विहार कर रहे हों ॥ २ ॥

ततः पिपीलिकरुतं स शुश्राव नराधिपः।
कामिनीं कामिनस्तस्य याचतः क्रोशतो भृशम् ॥ ३ ॥

उसी समय राजाने एक चींटेका स्वर सुना, जो कामके वशमें होकर अपनी कामिनी चींटीसे बहुत गिड़गिड़ाकर प्रार्थना कर रहा था ॥ ३ ॥

श्रुत्वा तु याच्यमानां तां क्रुद्धां सूक्ष्मां पिपीलिकाम्।
ब्रह्मदत्तो महाहासमकस्मादेव चाहसत् ॥ ४ ॥

छोटी-सी चींटी कुपित हो मान किये बैठी है और चींटा उससे याचना कर रहा है, यह देख-सुनकर ब्रह्मदत्त अचानक ही बड़े जोरसे हँस पड़े ॥ ४ ॥

ततः सा संनतिर्दीना व्रीडितेवाभवत् तदा।
निराहारा बहुतिथं बभूव वरवर्णिनी ॥ ५ ॥

उस समय सुन्दरी रानी संनति लज्जित-सी हो गयी और दीन होकर बहुत दिनोंतक उसने खाना-पीना तक छोड़ दिया ॥

प्रसाद्यमाना भर्त्रा सा तमुवाच शुचिस्मिता।
त्वया च हसिता राजन् नाहं जीवितुमुत्सहे ॥ ६ ॥

जब पतिदेव उसे मनाने लगे, तब पवित्र मुसकानवाली संनतिने उनसे कहा—'राजन् ! आपने मेरी हँसी उड़ायी है, अतः मैं जीवित रहना नहीं चाहती' ॥ ६ ॥

स तत्कारणमाचख्यौ न च सा श्रद्दधाति तत्।
उवाच चैनं कुपिता नैष भावोऽस्ति मानुषे ॥ ७ ॥

तब राजाने हँसनेका कारण बताया, परंतु संनतिने उस बातपर विश्वास नहीं किया और कोपमें भरकर कहा—'मनुष्यमें ऐसी शक्ति (सब प्राणियोंकी बोलीको समझनेकी शक्ति) नहीं हो सकती ॥ ७ ॥

को वै पिपीलिकरुतं मानुषो वेत्तुमर्हति।
ऋते देवप्रसादाद् वा पूर्वजातिकृतेन वा ॥ ८ ॥
तपोबलेन वा राजन् विद्यया वा नराधिप।

'राजन् ! देवताओंकी कृपा, पूर्वजन्ममें किये हुए तप अथवा विद्या (योगशक्ति) के बिना ऐसा कौन मनुष्य है, जो चींटीकी बोलीको समझ सके ॥ ८½ ॥

यद्येष वै प्रभावस्ते सर्वसत्त्वरुतज्ञता ॥ ९ ॥
यथाहमेतज्जानीयां तथा प्रत्याययस्व माम्।

'यदि आपमें सब प्राणियोंकी भाषाको समझनेकी शक्ति है, तो मैं जिस प्रकार इस बातको समझ सकूँ, उस प्रकार मुझे विश्वास दिलाइये ॥ ९½ ॥

प्राणान् वापि परित्यक्ष्ये राजन् सत्येन ते शपे ॥ १० ॥

'राजन् ! यदि आप ऐसा न करेंगे तो मैं आपसे सत्यकी शपथ खाकर कहती हूँ, अपने प्राण त्याग दूँगी' ॥ १० ॥

तत् तस्या वचनं श्रुत्वा महिष्याः परुषाक्षरम्।
स राजा परमापन्नो देवश्रेष्ठमगात् ततः ॥ ११ ॥
शरण्यं सर्वभूतेशं भक्त्या नारायणं हरिम्।
समाहितो निराहारः षड्रात्रेण महायशाः ॥ १२ ॥

रानीके इन कठोर शब्दोंको सुनकर राजा बड़ी विपत्तिमें पड़ गये। तब उन्होंने शरणागत-रक्षक, समस्त प्राणियोंके स्वामी, देवश्रेष्ठ भगवान् नारायण हरिकी शरण ली। उन महायशस्वी महात्मा राजाको निराहार रह भक्तिपूर्वक समाहितचित्तसे उपासना करते हुए छः रातें बीत गयीं ॥ ११-१२ ॥

ददर्श दर्शने राजा देवं नारायणं प्रभुम्।
उवाच चैनं भगवान् सर्वभूतानुकम्पकः ॥ १३ ॥

छठी रातमें राजाने प्रभु नारायणदेवका दर्शन किया। समस्त प्राणियोंपर अकारण दया करनेवाले भगवान्‌ने राजासे कहा—॥ १३ ॥

ब्रह्मदत्त प्रभाते त्वं कल्याणं समवाप्स्यसि।
इत्युक्त्वा भगवान् देवस्तत्रैवान्तरधीयत ॥ १४ ॥

'ब्रह्मदत्त ! प्रातःकाल होनेपर तुझे कल्याणकी प्राप्ति होगी।' इतनी बात कहकर भगवान् वहीं अन्तर्धान हो गये ॥

चतुर्णां तु पिता योऽसौ ब्राह्मणानां महात्मनाम्।
श्लोकं सोऽधीत्य पुत्रेभ्यः कृतकृत्य इवाभवत् ॥ १५ ॥

इधर जो चारों महात्मा ब्राह्मणोंके पिता थे, वे पुत्रोंसे श्लोक सीखकर कृतकृत्य-से हो गये ॥ १५ ॥

स राजानमथान्विच्छन्सहमन्त्रिणमच्युतम्।
न ददर्शान्तरं किंचिच्छ्लोकं श्रावयितुं तदा ॥ १६ ॥

वे धर्मसे कभी च्युत न होनेवाले राजा ब्रह्मदत्त तथा उसके मन्त्रियोंको खोजने लगे, परंतु उन्हें श्लोक सुनानेका कोई अवसर न मिला ॥ १६ ॥

अथ राजा सरःस्नातो लब्ध्वा नारायणाद् वरम्।
प्रविवेश पुरीं प्रीतो रथमारुह्य काञ्चनम् ॥ १७ ॥

इतनेमें भगवान् नारायणसे वर पाकर राजा सरोवरमें स्नान करके सुवर्णजटित रथमें बैठे और प्रसन्नतापूर्वक अपनी नगरीमें प्रवेश करने लगे ॥ १७ ॥

तस्य रश्मीन् प्रत्यगृह्णात् कण्डरीको द्विजर्षभः।
चामरं व्यजनं चापि बाभ्रव्यः समवीक्षिपत् ॥ १८ ॥

उस समय ब्राह्मणश्रेष्ठ कण्डरीकने अपने हाथमें ब्रह्मदत्तके घोड़ोंकी वागडोर ले रखी थी और बाभ्रव्य-पुत्र पाञ्चाल उनके ऊपर चँवर और व्यजन (पंखा) डुला रहे थे ॥ १८ ॥

इदमन्तरमित्येव ततः स ब्राह्मणस्तदा।
श्रावयामास राजानं श्लोकं तं सचिवौ च तौ ॥ १९ ॥

हरिवंशपर्व ] चतुर्विंशतितमोऽध्यायः [ ८५


'यही अवसर है' यह समझकर वे ब्राह्मण राजाको और उनके दोनों मन्त्रियोंको उसी समय श्लोक सुनाने लगे ॥१९॥

सप्त व्याधा दशार्णेषु मृगाः कालञ्जरे गिरौ ।
चक्रवाकाः शरद्वीपे हंसाः सरसि मानसे ॥ २० ॥
तेऽभिजाताः कुरुक्षेत्रे ब्राह्मणा वेदपारगाः ।
प्रस्थिता दीर्घमध्वानं यूयं किमवसीदथ ॥ २१ ॥

'जो दशार्ण देशमें व्याध, कालञ्जर पर्वतपर मृग, शरद्वीपमें चक्रवाक तथा मानस-सरोवरमें हंस हुए थे, उनमेंसे हम चार तो कुरुक्षेत्रमें वेद-पारगामी कुलीन ब्राह्मण होकर दीर्घमार्गपर चले आये हैं, (अर्थात् योगसाधना करके मुक्त हो गये। अब शेष बचे हुए) तुम (तीन व्यक्ति योगमार्गसे भ्रष्ट होकर) क्यों कष्ट पा रहे हो ?' ॥ २०-२१ ॥

तच्छ्रुत्वा मोहमगमद् ब्रह्मदत्तो नराधिपः ।
सचिवश्चास्य पाञ्चाल्यः कण्डरीकश्च भारत ॥ २२ ॥

भारत ! राजा ब्रह्मदत्त वह श्लोक सुनकर मूर्च्छित हो गये और उनके मन्त्री पाञ्चाल तथा कण्डरीककी भी वही दशा हुई ॥ २२ ॥

स्रस्तरश्मिप्रतोदौ तौ पतितव्यजनावुभौ ।
दृष्ट्वा बभूवुरस्वस्थाः पौराश्च सुहृदस्तथा ॥ २३ ॥

कण्डरीकके हाथमेंसे चाबुक और बागडोर छूट गयीं तथा पाञ्चालके हाथमेंसे भी चँवर और पंखा छूटकर नीचे गिर पड़े। नगरनिवासी और मित्रवर्ग राजा तथा दोनों मन्त्रियोंकी इस दशाको देखकर खिन्न हो गये ॥ २३ ॥

मुहूर्तमिव राजा स सह ताभ्यां रथे स्थितः ।
प्रतिलभ्य ततः संज्ञां प्रत्यागच्छदरिंदमः ॥ २४ ॥

दोनों मन्त्रियोंसहित शत्रुदमन राजा ब्रह्मदत्त रथमें दो घड़ीतक मूर्च्छित पड़े रहे । तत्पश्चात् उन्हें होश आया और ये अपने नगरमें लौट आये ॥ २४ ॥

ततस्ते तत्सरः स्मृत्वा योगं तमुपलभ्य च ।
ब्राह्मणं विपुलैरर्थैर्भोगैश्च समयोजयन् ॥ २५ ॥

तदनन्तर उन तीनोंको उस सरोवरका ध्यान आ गया और अपने पूर्व-जन्मके योगका भी स्मरण होने लगा। तब उन्होंने उस ब्राह्मणको बहुत-सा धन और भोग-पदार्थ दिये ॥ २५ ॥

अभिषिच्य स्वराज्ये तु विष्वक्सेनमरिंदमम् ।
जगाम ब्रह्मदत्तोऽथ सदारो वनमेव ह ॥ २६ ॥

फिर ब्रह्मदत्तने अपने राज्यपर शत्रुदमन विष्वक्सेनका अभिषेक किया और अपनी स्त्रीको साथमें लेकर वनको चल दिये ॥ २६ ॥

अथैनं संततिर्धीरा देवलस्य सुता तदा ।
उवाचं परमप्रीता योगाद् वनगतं नृपम् ॥ २७ ॥

तदनन्तर योग-साधन करनेके लिये वनमें आये हुए राजा ब्रह्मदत्तसे देवलकी पुत्री धीरस्वभावा संततिने परम प्रसन्न होकर कहा— ॥ २७ ॥

जानन्त्या ते महाराज पिपीलिकरुतज्ञताम् ।
चोदितः क्रोधमुद्दिश्य सक्तः कामेषु वै मया ॥ २८ ॥

महाराज ! मैं यह बात जानती थी कि आप चींटीकी बोलीको समझ सकते हैं, तब भी मैंने आपको संसारके भोगोंमें आसक्त देख यह क्रोधका नाटक रचकर आपको योगकी ओर प्रेरित किया है ॥ २८ ॥

इतो वयं गमिष्यामो गतिमिष्टामनुत्तमाम् ।
तव चान्तर्हितो योगस्ततः संस्मारितो मया ॥ २९ ॥

अब हम परम उत्तम अभीष्ट गतिको प्राप्त करेंगे, इसी उद्देश्यसे मैंने आपको भूले हुए योगका स्मरण दिलाया है ॥ २९ ॥

स राजा परमप्रीतः पत्न्याः श्रुत्वा वचस्तदा ।
प्राप्य योगं बलादेव गतिं प्राप सुदुर्लभाम् ॥ ३० ॥

तब अपनी पत्नीकी यह बात सुनकर राजा बड़े प्रसन्न हुए और योग-साधना करके उन्होंने उसके बलसे ही परम दुर्लभ गति पायी ॥ ३० ॥

कण्डरीकोऽपि धर्मात्मा सांख्ययोगमनुत्तमम् ।
प्राप्य योगगतिः सिद्धो विशुद्धस्तेन कर्मणा ॥ ३१ ॥

धर्मात्मा कण्डरीक भी परमश्रेष्ठ सांख्ययोगका ज्ञान पाकर योगका आश्रय ले उसके साधनसे शुद्ध एवं सिद्ध (मुक्त) हो गये ॥ ३१ ॥

क्रमं प्रणीय पाञ्चाल्यः शिक्षां चोत्पाद्य केवलाम् ।
योगाचार्यगतिं प्राप यशश्चाग्र्यं महातपाः ॥ ३२ ॥

महातपस्वी पाञ्चालने भी वैदिकोंमें प्रसिद्ध क्रमपाठकी विधि एवं विशुद्ध 'शिक्षा' (नामक वेदाङ्ग अथवा योगविषयक शिक्षा) की रचना करके योगाचार्यकी गति (मोक्ष) तथा उत्तम यश प्राप्त किया ॥ ३२ ॥

एवमेतत् पुरावृत्तं मम प्रत्यक्षर्माच्युत ।
तद् धारयस्व गाङ्गेय श्रेयसा योक्ष्यसे ततः ॥ ३३ ॥

(मार्कण्डेयजी कहते हैं—) अच्युत भीष्म ! प्राचीन कालमें घटित हुआ यह श्राद्ध-माहात्म्य-सूचक वृत्तान्त मैंने प्रत्यक्ष देखा है। तुम भी इसे धारण करो तो तुम्हारा कल्याण होगा ॥ ३३ ॥

ये चान्ये धारयिष्यन्ति तेषां चरितमुत्तमम् ।
तिर्यग्योनिषु ते जातु न गमिष्यन्ति कर्हिचित् ॥ ३४ ॥

८६श्रीमहाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

जो दूसरे सज्जन भी इन वाग् दुष्ट आदिके उत्तम चरित्रको सुनेंगे, वे भी कभी तिर्यग्-योनिमें उत्पन्न न होंगे ॥ ३४ ॥

श्रुत्वा चेदमुपाख्यानं महार्थं महतां गतिम्।
योगधर्मो हृदि सदा परिवर्तति भारत ॥ ३५ ॥

भारत ! महात्माओंकी सद्गति देनेवाले इस महत्त्वमय उपाख्यानको सुननेसे हृदयमें योग-धर्म पूर्णरूपसे प्रकाशित होने लगता है ॥ ३५ ॥

स तेनैवानुबन्धेन कदाचिल्लभते शमम्।
ततो योगगतिं याति शुद्धां तां भुवि दुर्लभाम् ॥ ३६ ॥

हृदयमें उस योगधर्मको धारण करनेसे ही मनुष्य कभी शान्ति-लाभ करता है; फिर उसे पृथ्वीमें दुर्लभ योगियोंकी शुद्ध-गति प्राप्त होती है ॥ ३६ ॥


वैशम्पायन उवाच

एवमेतत् पुरा गीतं मार्कण्डेयेन धीमता।
श्राद्धस्य फलमुद्दिश्य सोमस्याप्यायनाय वै ॥ ३७ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—प्राचीन कालमें बुद्धिमान् मार्कण्डेयजीने श्राद्धके फलको लक्ष्यमें रखकर सोम (चन्द्रमा) का आप्यायन (पोषण) करनेके लिये यह ऐसी कथा कही थी ॥ ३७ ॥

सोमो हि भगवान् देवो लोकस्याप्यायनं परम्।
वृष्णिवंशप्रसङ्गेन तस्य वंशं निबोध मे ॥ ३८ ॥

भगवान् सोम ही लोकोंको परम तृप्ति देनेवाले हैं। अब वृष्णिवंशके प्रसङ्गमें तुम चन्द्रवंशका वर्णन सुनो—॥ ३८ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलेषु हरिवंशे हरिवंशपर्वणि पितृकल्पसमाप्तिर्नाम चतुर्विंशोऽध्यायः ॥ २४ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारत खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत हरिवंशपर्वमें पितृकल्पका उपसंहारनामक चौबीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥२४॥


पञ्चविंशतितमोऽध्यायः

चन्द्रमाकी उत्पत्ति और राजसूय यज्ञ, देवासुरसंग्राम तथा बुधकी उत्पत्ति

वैशम्पायन उवाच

पिता सोमस्य वै राजन् जज्ञेऽत्रिर्भगवानृषिः।
ब्रह्मणो मानसात् पूर्वं प्रजासर्गं विधित्सतः ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! प्राचीन कालमें ब्रह्माजीने प्रजाकी सृष्टि करनेका विचार किया। उस समय उनके मानसिक संकल्पसे सोम (चन्द्रमा) के पिता भगवान् अत्रि ऋषि उत्पन्न हुए ॥ १ ॥

तत्रात्रिः सर्वभूतानां तस्थौ स्वतनयैर्युतः।
कर्मणा मनसा वाचा शुभान्येव चचार सः ॥ २ ॥

अत्रि ऋषि भी प्रजाकी सृष्टिमें ही संलग्न हुए। वे तथा उनके पुत्र मन, वाणी और कर्मसे सब प्राणियोंका कल्याण करनेवाले कार्य ही करते थे ॥ २ ॥

अहिंस्रः सर्वभूतेषु धर्मात्मा संशितव्रतः।
काष्ठकुड्यशिलाभूत ऊर्ध्वबाहुर्महाद्युतिः ॥ ३ ॥
अनुत्तरं नाम तपो येन तप्तं महत् पुरा।
त्रीणि वर्षसहस्राणि दिव्यानीति हि नः श्रुतम् ॥ ४ ॥

हमने सुना है कि प्राचीन कालमें प्रशंसनीय व्रतका पालन करनेवाले, महातेजस्वी, धर्मात्मा अत्रि ऋषिने तीन हजार दिव्य वर्षोंतक अपनी भुजाएँ ऊपर उठाकर काष्ठ, दीवार और पत्थरके समान निश्चल रहकर किसी प्राणीको तनिक भी कष्ट पहुँचाये बिना ही अनुत्तर* नामक महान् तप किया था ॥ ३-४ ॥


* १. जिससे उत्कृष्ट दूसरा कोई तप नहीं है, उसे 'अनुत्तर' कहते हैं।


तत्रोध्वंरेतसस्तस्य स्थितस्यानिनिमिपस्य ह।
सोमत्वं तनुरापेदे महासत्त्वस्य भारत ॥ ५ ॥

भारत ! अत्रि ऋषि महान् सत्त्वगुणसे सम्पन्न थे। वे एक-टक देखते हुए ऊर्ध्वरेता (ब्रह्मचारी) रहकर सोमकी भावनासे खड़े-खड़े तपस्या करते थे, अतः उनका शरीर सोमरूपमें परिणत हो गया ॥ ५ ॥

ऊर्ध्वमाचक्रमे तस्य सोमत्वं भावितात्मनः।
नेत्राभ्यां वारि सुस्राव दशधा द्योतयद् दिशः ॥ ६ ॥

शुद्ध अन्तःकरणवाले मुनिके नेत्रोंसे वह सोमरूप तेज, जलरूपमें बह निकला और दसों दिशाओंको प्रकाशित करता हुआ आकाशमें चढ़ने लगा ॥ ६ ॥

तं गर्भं विधिना दृष्ट्वा दश देव्यो दधुस्तदा।
समेत्य धारयामासुर्न च ताः समशक्नुवन् ॥ ७ ॥

तब प्रसन्नतामें भरी हुई दस दिशारूपी देवियोंने सम्मिलित हो उस तेजको अपने गर्भमें विधिपूर्वक धारण किया, परंतु वे उस तेजको धारण करनेमें समर्थ न हो सकीं ॥ ७ ॥

स ताभ्यः सहसैवाथ दिग्भ्यो गर्भः प्रभान्वितः।
पपात भासयँल्लोकाञ्छीतांशुः सर्वभावनः ॥ ८ ॥

तब (औषध आदिके द्वारा) सब लोकोंको पुष्ट करनेवाला शीतल किरणोंसे सुशोभित वह प्रकाशमान गर्भ लोकोंको

हरिवंशपर्व ] पञ्चविंशतितमोऽध्यायः [ ८७


प्रकाशित करता हुआ दिग्देवियोंके उदरसे सहसा गिर पड़ा ॥ ८ ॥

यदा न धारणे शक्तास्तस्य गर्भस्य ता दिशः।
ततस्ताभिः सहैवाशु निपपात वसुंधराम् ॥ ९ ॥

जब दिशाएँ उस गर्भके तेजको न रोक सकीं, तो वह गर्भ उनके साथ ही पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ ९ ॥

पतितं सोममालोक्य ब्रह्मा लोकपितामहः।
रथमारोपयामास लोकानां हितकाम्यया ॥ १० ॥

सोमको गिरा हुआ देख लोकपितामह ब्रह्माजीने संसारका हित करनेकी भावनासे उसे रथपर रख लिया ॥ १० ॥

स हि वेदमयस्तात धर्मात्मा सत्यसंग्रहः।
युक्तो वाजिसहस्रेण सितेनेति हि नः श्रुतम् ॥ ११ ॥

तात ! हमने सुना है कि वह रथ वेदमय, धर्मस्वरूप तथा सत्यसे नियन्त्रित था। उसमें एक हजार श्वेत घोड़े जुते हुए थे ॥ ११ ॥

तस्मिन् निपतिते देवाः पुत्रेऽत्रेः परमात्मनि।
तुष्टुवुर्ब्रह्मणः पुत्रा मानसाः सप्त ये श्रुताः ॥ १२ ॥

अत्रिपुत्र भगवान् सोमके गिरनेपर ब्रह्माजीके सुप्रसिद्ध सात मानस पुत्र उनकी स्तुति करने लगे ॥ १२ ॥

तथैवाङ्गिरसस्तत्र भृगोरेवात्मजैः सह।
ऋग्भिर्यजुर्भिर्बहुभैरथर्वाङ्गिरसैरपि ॥ १३ ॥

अङ्गिरा-गोत्री भृगु ऋषि और उनके पुत्र ऋग्वेद, यजुर्वेद (सामवेद) और अथर्ववेदकी अनेक श्रुतियोंसे सोमकी स्तुति करने लगे ॥ १३ ॥

तस्य संस्तूयमानस्य तेजः सोमस्य भास्वतः।
आप्यायमानं लोकांस्त्रीन् भासयामास सर्वशः ॥ १४ ॥

( १. 'अंशुंरंशुष्टे देव सोमाप्यायताम्' इत्यादि मन्त्रोंके द्वारा ) स्तुति करनेपर पुष्ट हुआ प्रकाशमान सोमका तेज तीनों लोकोंको सर्वथा प्रकाशित करने लगा ॥ १४ ॥

स तेन रथमुख्येन सागरान्तां वसुंधराम्।
त्रिःसप्तकृत्वोऽतिशयाच्चकाराभिप्रदक्षिणम् ॥ १५ ॥

तब उन परम यशस्वी (ब्रह्माजी) ने उस (सोमवान्) श्रेष्ठ रथमें बैठकर समुद्रतककी पृथ्वीकी इक्कीस बार प्रदक्षिणा की ॥ १५ ॥

तस्य यच्च्यावितं तेजः पृथिवीमन्वपद्यत।
ओषध्यस्ताः समुद्भूतास्तेजसा प्रज्वलन्त्युत ॥ १६ ॥

उस समय (रथके वेगसे छलककर) सोमका जो तेज पृथ्वीपर टपकने लगा, उस तेजसे प्रकाशपूर्ण ओषधियाँ उत्पन्न हुईं ॥ १६ ॥


१. अर्थात् हे चन्द्रदेव ! आपकी प्रत्येक किरण परिपुष्ट हो।


ताभिर्धार्यन्तस्त्रयो लोकाः प्रजाश्चैव चतुर्विधाः।
पोष्टा हि भगवान् सोमो जगतो जगतीपते ॥ १७ ॥

उन ओषधियोंसे भूलोक, भुवर्लोक और स्वर्गलोक—इन तीनों लोकोंका और जरायुज, अण्डज, स्वेदज और उद्भिज्ज—इन चार प्रकारकी प्रजाओंका पालन होता रहता है। राजन् ! इस प्रकार भगवान् सोम सम्पूर्ण जगत्‌का पोषण करते हैं ॥ १७ ॥

स लब्धतेजा भगवान् संस्तवैस्तैश्च कर्मभिः।
तपस्तेपे महाभाग पद्मानां दशतीर्दश ॥ १८ ॥

महाभाग ! उन स्तुतिरूप कर्मोंसे तेजस्वी होकर भगवान् सोमने एक हजार पद्म वर्षोंतक तप किया ॥ १८ ॥

हिरण्यवर्णा या देव्यो धारयन्त्यात्मना जगत्।
निधिस्तासामभूद्देवः प्रख्यातः स्वेन कर्मणा ॥ १९ ॥

चाँदीके समान शुक्ल वर्णवाली जो जलकी अधिष्ठात्री देवियाँ अपने स्वरूपभूत जलसे जगत्‌का पालन करती हैं, चन्द्रदेव उनकी निधि हुए। वे अपने कर्मोंसे विख्यात हैं ॥ १९ ॥

ततस्तस्मै ददौ राज्यं ब्रह्मा ब्रह्मविदां वरः।
बीजौषधीनां विप्राणामपां च जनमेजय ॥ २० ॥

जनमेजय ! तदनन्तर ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ ब्रह्माजीने चन्द्रमाको बीज, ओषधि, ब्राह्मण और जलका राजा बना दिया ॥ २० ॥

सोऽभिषिक्तो महाराज राजराज्येन राजराट्।
लोकांस्त्रीन् भासयामास स्वभासा भास्वतां वरः ॥ २१ ॥

महाराज ! जब प्रकाशवानोंमें श्रेष्ठ चन्द्रमाका इन चारोंके राज्यपर सम्राट्‌के रूपमें अभिषेक हो गया, तब (सम्राट्) चन्द्रमा अपनी कान्तिसे तीनों लोकोंको प्रकाशित करने लगे ॥ २१ ॥

सप्तविंशतिमिन्दोस्तु दाक्षायण्यो महाव्रताः।
ददौ प्राचेतसो दक्षो नक्षत्राणीति या विदुः ॥ २२ ॥

उस समय प्रचेताओंद्वारा दक्षने अपनी महाव्रतधारिणी सत्ताईस कन्याएँ चन्द्रमाको ब्याह दीं, जिन्हें विद्वान् पुरुष सत्ताईस नक्षत्रोंके रूपमें जानते हैं ॥ २२ ॥

स तत् प्राप्य महद्राज्यं सोमः सोमवतां वरः।
समाजह्रे राजसूयं सहस्रशतदक्षिणम् ॥ २३ ॥

इस बड़े भारी राज्यको पाकर पितृदेवताओंमें श्रेष्ठ सोमने राजसूय यज्ञका अनुष्ठान किया, जिसमें उन्होंने एक लाख गौएँ दक्षिणामें दी थीं ॥ २३ ॥

होतास्य भगवानत्रिरध्वर्युर्भगवान् भृगुः।
हिरण्यगर्भश्चोद्गाता ब्रह्मा ब्रह्मत्वमेयिवान् ॥ २४ ॥

सोमके (उस यज्ञमें) भगवान् अत्रि होता बने। भगवान् भृगु अध्वर्यु, हिरण्यगर्भ उद्गाता तथा वसिष्ठजी ब्रह्मा बने ॥ २४ ॥

८८ श्रीमद्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे

सदस्यस्तत्र भगवान् हरिनारायणः स्वयम्।
सनत्कुमारप्रमुखैराद्यैर्ब्रह्मर्षिभिर्वृतः ॥ २५॥
उस यज्ञमें सनत्कुमार आदि प्राचीन ब्रह्मर्षियोंने स्वयं भगवान् नारायण हरिको ही सदस्य बनाया था॥ २५॥

दक्षिणामददात् सोमस्त्रील्लोकानिति नः श्रुतम्।
तेभ्यो ब्रह्मर्षिमुख्येभ्यः सदस्येभ्यश्च भारत ॥ २६॥
भारत ! हमने सुना है कि उन ब्रह्मर्षियोंमें श्रेष्ठ सदस्योंको सोमने तीनों लोक दक्षिणामें दे दिये थे॥ २६॥

तं सिनिञ्च कुहूश्चैव द्युतिः पुष्टिः प्रभा वसुः।
कीर्तिर्धृतिश्च लक्ष्मीश्च नव देव्यः सिषेविरे॥ २७॥
उस समय सिनोवाली, कुहू, द्युति, पुष्टि, प्रभा, वसु, कीर्ति, धृति और लक्ष्मी (शोभा)—ये नौ देवियाँ नित्यप्रति चन्द्रमाकी सेवामे लगी रहती थीं॥ २७॥

प्राप्यावभृथमव्यग्रः सर्वदेवर्षिपूजितः।
विरराजाधिराजेन्द्रो दशधा भासयन् दिशः॥ २८॥
इस प्रकार सभी ऋषि और देवताओंसे सत्कार पाकर द्विजराज चन्द्रमाने अवभृथ स्नान किया, फिर वे दसों दिशाओंको प्रकाशित करने लगे॥ २८॥

तस्य तत् प्राप्य दुष्प्राप्यमैश्वर्यं मुनिसत्कृतम्।
विवभ्राम मतिस्तात विनयादनयाऽऽहता॥ २९॥
तात ! मुनियोंद्वारा सम्मानित उस दुर्लभ ऐश्वर्यको पाकर चन्द्रमाकी बुद्धि विनयसे भ्रष्ट हो गयी और उसे अनीतिने घेर दबाया॥ २९॥

बृहस्पतेः स वै भार्यां तारां नाम यशस्विनीम्।
जहार तरसा सर्वानवमत्याङ्गिरःसुतान्॥ ३०॥
तब उन्होंने अङ्गिराके सब पुत्रोंका तिरस्कार करके बृहस्पतिकी यशस्विनी भार्या ताराका बलपूर्वक अपहरण कर लिया॥ ३०॥

स याच्यमानो देवैश्च तथा देवर्षिभिः सह।
नैव व्यसर्जयत् तारां तस्मा आङ्गिरसे तदा।
स संरब्धस्ततस्तस्मिन् देवाचार्यो बृहस्पतिः॥ ३१॥
देवताओं तथा देवर्षियोंके याचना करनेपर भी उन्होंने बृहस्पतिकी स्त्री उनको नहीं लौटायी। तब तो देवताओंके आचार्य बृहस्पतिजी उनके ऊपर अत्यन्त कुपित हो उठे॥

उशना तस्य जग्राह पाष्णििमाङ्गिरसस्तदा।
स हि शिष्यो महातेजाः पितुः पूर्वो बृहस्पतेः॥ ३२॥
उस समय शुक्राचार्यने चन्द्रमाका पक्ष लिया और रुद्रने बृहस्पतिका; क्योंकि महातेजस्वी रुद्र बृहस्पतिके पिता अङ्गिराके शिष्य थे॥ ३२॥

तेन स्नेहेन भगवान् रुद्रस्तस्य बृहस्पतेः।
पाष्णिग्राहोऽभवद् देवः प्रगृह्याजगवं धनुः॥ ३३॥
उसी गुरुभाईके स्नेहसे भगवान् शिव अपना आजगव नामक धनुष लेकर बृहस्पतिजीके पाष्णिग्राह (सहायक) बने थे॥ ३३॥

तेन ब्रह्मशिरो नाम परमास्त्रं महात्मना।
उद्दिश्य दैत्यानुत्सृष्टं येनैषां नाशितं यशः॥ ३४॥
महात्मा रुद्रने दैत्योंको लक्ष्य करके ब्रह्मशिर नामक श्रेष्ठ अस्त्र छोड़ा, जिसने उन (दैत्यों) के सारे यशपर ही पानी फेर दिया॥ ३४॥

तत्र तद् युद्धमभवत् प्रख्यातं तारकामयम्।
देवानां दानवानां च लोकक्षयकरं महत्॥ ३५॥
वहाँ ताराके लिये देवताओं और दानवोंमें बड़ा भारी युद्ध हुआ, जो तारकामय महासंग्रामके नामसे प्रसिद्ध है। इसमें संसारका बड़ा भारी संहार हुआ॥ ३५॥

तत्र शिष्टास्तु ये देवास्तुषिताश्चैव भारत।
ब्रह्माणं शरणं जग्मुरादिदेवं सनातनम्॥ ३६॥
भारत ! इस युद्धमें मरनेसे बचे हुए देवता और तुषितगण आदिदेव सनातन ब्रह्माजीकी शरणमें गये॥ ३६॥

ततो निवार्योशनसं रुद्रं ज्येष्ठं च शङ्करम्।
ददावङ्गिरसे तारां स्वयमेव पितामहः॥ ३७॥
तब ब्रह्माजीने शुक्राचार्य तथा रुद्रोंमें ज्येष्ठ शङ्करको भी समझा-बुझाकर युद्ध करनेसे रोका; फिर उन्होंने स्वयं ही ताराको लाकर बृहस्पतिजीको दिया॥ ३७॥

तामन्तःप्रसवां दृष्ट्वा तारां प्राह बृहस्पतिः।
मदीयायां न ते योनौ गर्भो धार्यः कथंचन॥ ३८॥
उस समय ताराको गर्भवती देख बृहस्पतिजीने कहा—'तुझे मेरे क्षेत्रमें किसी तरह पराया गर्भ नहीं धारण करना चाहिये'॥ ३८॥

अयोनावुत्सृजन् तं सा कुमारं दस्युहन्तमम्।
इषीकास्तम्बमासाद्य ज्वलन्तमिव पावकम्॥ ३९॥
तब ताराने अयोग्य स्थान—सींकोंके झुरमुटमें जाकर प्रज्वलित अग्निके समान तेजस्वी उस भारी दस्युहन्ता कुमारको उत्पन्न किया॥ ३९॥

जातमात्रः स भगवान् देवानामक्षिपद् वपुः।
ततः संशयमापन्ना इमामकथयन् सुराः॥ ४०॥
उस ऐश्वर्यवान् कुमारने उत्पन्न होते ही अपने शरीरकी कान्तिसे देवताओंका तेज फीका कर दिया। तब तो देवता संदेहमें पड़कर तारासे कहने लगे—॥ ४०॥

सत्यं ब्रूहि सुतः कस्य सोमस्याथ बृहस्पतेः।
पृच्छ्यमाना यदा देवैर्नाह सा साध्वसाधु वा॥ ४१॥
तदा तां शप्तुमारब्धः कुमारो दस्युहन्तमः।
तं निवार्य ततो ब्रह्मा तारां पप्रच्छ संशयम्॥ ४२॥

हरिवंशपर्व ] षड्विंशोऽध्यायः [ ८९

'अरी ! सच बता, यह पुत्र चन्द्रमाका है अथवा बृहस्पतिका ?' परंतु देवताओंके पूछनेपर भी जब उसने भला-बुरा कुछ उत्तर न दिया, तब वह दस्युहन्ता कुमार उसे शाप देनेके लिये तैयार हो गया । उस समय ब्रह्माजीने उसे रोककर तारासे इस संदेहको पूछा—॥४१-४२॥

यदन्न तथ्यं तद् ब्रूहि तारे कस्य सुतस्त्वयम् ।
सा प्राञ्जलिरुवाचेदं ब्रह्माणं वरदं प्रभुम् ॥ ४३ ॥

'तारे ! यह किसका पुत्र है—इस बातको तू ठीक-ठीक बता।' तब उसने दोनों हाथ जोड़कर वर देनेवाले प्रभु ब्रह्माजीसे कहा—॥ ४३ ॥

सोमस्येति महात्मानं कुमारं दस्युहन्तमम् ।
ततस्तं मूर्ख्युपाघ्राय सोमो धाता प्रजापतिः ॥ ४४ ॥
बुध इत्यकरोन्नाम तस्य पुत्रस्य धीमतः ।
प्रतिकूलं च गगने समभ्युत्तिष्ठते बुधः ॥ ४५ ॥

'प्रभो ! यह सोमका ही पुत्र है।' तब उस गर्भको धारण करानेवाले प्रजापति चन्द्रमाने उस महामना दस्युहन्ता कुमारका मस्तक सूँघकर उस बुद्धिमान् पुत्रका नाम 'बुध' रखा । यह बुध जब आकाशमें उदय होता है, तब प्रतिकूल चेष्टा (उत्पात) किया करता है ॥ ४४-४५ ॥

उत्पादयामास ततः पुत्रं वै राजपुत्रिका ।
तस्यापत्यं महाराजो बभूवैलः पुरूरवाः ॥ ४६ ॥

तदनन्तर वैराज मनुकी पुत्री इलाने बुधसे एक पुत्र उत्पन्न किया । उनके वे पुत्र महाराज पुरूरवा हुए ॥ ४६ ॥

उर्वश्यां जज्ञिरे यस्य पुत्राः सप्त महात्मनः ।
प्रसह्य धर्षितस्तत्र सोमो वै राजयक्ष्मणा ॥ ४७ ॥

महात्मा पुरूरवाके उर्वशीके गर्भसे सात पुत्र उत्पन्न हुए । इधर सोमको हठात् राजयक्ष्माने धर दबाया ॥ ४७ ॥

ततो यक्ष्माभिभूतस्तु सोमः प्रक्षीणमण्डलः ।
जगाम शरणार्थाय पितरं सोऽत्रिमेव तु ॥ ४८ ॥

यक्ष्मासे ग्रस्त होनेपर चन्द्रमाका मण्डल क्षीण होने लगा, तब वे अपने पिता अत्रिकी शरणमें पहुँचे ॥४८॥

तस्य तत्तापशमनं चकारात्रिर्महातपाः ।
स राजयक्ष्मणा मुक्तः श्रिया जज्वल सर्वतः ॥ ४९ ॥

महातपस्वी अत्रिने उनके तापको दूर कर दिया । वे (चन्द्रमा) राजयक्ष्मा रोगसे मुक्त होकर सब ओरसे प्रकाशित हो उठे ॥ ४९ ॥

एवं सोमस्य वै जन्म कीर्तितं कीर्तिवर्धनम् ।
वंशमस्य महाराज कीर्त्यमानं च मे शृणु ॥ ५० ॥

महाराज ! इस प्रकार मैंने तुमसे चन्द्रमाके जन्मका वर्णन किया, जो कीर्तिको बढ़ानेवाला है । अब मेरे द्वारा चन्द्रमाके वंशका वर्णन सुनो ॥ ५० ॥

धन्यमारोग्यमायुष्यं पुण्यं संकल्पसाधनम् ।
सोमस्य जन्म श्रुत्वैव पापेभ्यो विप्रमुच्यते ॥ ५१ ॥

मनुष्य चन्द्रमाके जन्मको सुनते ही सब पापोंसे मुक्त हो जाता है । यह चन्द्रमाके जन्मकी कथा धन, आयु, आरोग्य और पुण्य देनेवाली है । इसे सुननेसे मनुष्यके सारे संकल्प—मनोरथ सिद्ध हो जाते हैं ॥ ५१ ॥

इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे हरिवंशपर्वणि सोमोत्पत्तिकथने पञ्चविंशोऽध्यायः ॥ २५ ॥

इस प्रकार श्रीमन्महाभारत खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत हरिवंशपर्वमें चन्द्रमाकी उत्पत्तिका वर्णनविषयक पचीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २५ ॥


षड्विंशोऽध्यायः

महाराज पुरूरवाके चरित्र और वंशका वर्णन, राजा पुरूरवाका त्रेताग्निकी रचना करना और गन्धर्वोंके लोकमें जाना

वैशम्पायन उवाच

बुधस्य तु महाराज विद्वान् पुत्रः पुरूरवाः ।
तेजस्वी दानशीलश्च यज्वा विपुलदक्षिणः ॥ १ ॥
ब्रह्मवादी पराक्रान्तः शत्रुभिर्युधि दुर्जयः ।
आहर्ता चाग्निहोत्रस्य यज्ञानां च महीपतिः ॥ २ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—महाराज ! बुधके विद्वान् पुत्र पुरूरवा हुए, जो तेजस्वी, दानशील, यज्ञकर्ता, बहुत-सी दक्षिणा देनेवाले, ब्रह्मवादी, युद्धमें पराक्रम दिखानेवाले और शत्रुओंसे दुर्जय थे । वे राजा अग्निहोत्र और यज्ञोंके अनुष्ठान करनेवाले थे ॥ १-२ ॥

सत्यवादी पुण्यमतिः काम्यः संवृतमैथुनः ।
अतीव त्रिषु लोकेषु यशसाप्रतिमस्तदा ॥ ३ ॥

राजा पुरूरवा सत्यभाषी और पवित्र विचारवाले थे । उनका रूप बड़ा सुन्दर था और वे गुप्त रूपसे सहवास करनेवाले थे । वे अपने समयमें तीनों लोकोंमें अनुपम यशस्वी थे ॥ ३ ॥

तं ब्रह्मवादिनं क्षान्तं धर्मज्ञं सत्यवादिनम् ।
उर्वशी वरयामास हित्वा मानं यशस्विनी ॥ ४ ॥

९०श्रीमद्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

उन ब्रह्मवादी, क्षमापरायण, धर्मज्ञ तथा सत्यभाषी राजा-को यशस्विनी उर्वशी अप्सराने गर्वका परित्याग करके पतिरूपमें वरण कर लिया था ॥ ४ ॥

तया सहावसद् राजा वर्षाणि दश पञ्च च ।
पञ्च षट् सप्त चाष्टौ च दश चाष्टौ च भारत ॥ ५ ॥
वने चैत्ररथे रम्ये तथा मन्दाकिनीतटे ।
अलकायां विशालायां नन्दने च वनोत्तमे ॥ ६ ॥
उत्तरांश्च कुरून् प्राप्य मनोरथफलद्रुमान् ।
गन्धमादनपादेषु मेरुपृष्ठे तथोत्तरे ॥ ७ ॥

भारत ! राजा पुरूरवा उस अप्सराके साथ दस वर्षतक रमणीय चैत्ररथ वनमें, पाँच वर्षतक मन्दाकिनीके तटपर बसी हुई अलकापुरीमें, पाँच वर्षतक बदरीनारायणके वनोंमें, छः वर्षतक उत्तम उपवन नन्दनवनमें, सात वर्षतक मनोरथरूप फलको देनेवाले वृक्षोंसे परिपूर्ण उत्तरकुरुदेशमें, आठ वर्षतक गन्धमादन पर्वतके शिखरोंपर, दस वर्षतक मेरुपर्वतपर तथा आठ वर्षतक उत्तरांचलपर विहार करते रहे ॥ ५-७ ॥

एतेषु वनमुख्येषु सुरैराचरितेषु च ।
उर्वश्या सहितो राजा रेमे परमया मुदा ॥ ८ ॥

राजा पुरूरवा उर्वशीको साथमें लेकर देवताओंसे सेवित इन मुख्य-मुख्य वनोंमें बड़े आनन्दके साथ विहार किया करते थे ॥ ८ ॥

देशे पुण्यतमे चैव महर्षिभिरभिष्टुते ।
राज्यं च कारयामास प्रयागे पृथिवीपतिः ॥ ९ ॥

पृथिवीपति पुरूरवा (उर्वशीके साथ) महर्षियोंसे प्रशंसित परम पवित्र देश प्रयागमें राज्य करते थे ॥ ९ ॥

तस्य पुत्रा बभूवुस्ते सप्त देवसुतोपमाः ।
दिवि जाता महात्मान आयुर्धीमानमावसुः ॥ १० ॥
विश्वायुश्चैव धर्मात्मा श्रुतायुश्च तथापरः ।
दृढायुश्च वनायुश्च शतायुश्चोर्वशीसुताः ॥ ११ ॥

राजाके द्वारा उर्वशीके गर्भसे स्वर्गमें देव-पुत्रोंके तुल्य आयु, बुद्धिमान् अमावसु, धर्मात्मा विश्वायु, श्रुतायु, दृढायु, वनायु और शतायु नामक सात पुत्र उत्पन्न हुए, जो सभी महान् आत्मबलसे सम्पन्न थे ॥ १०-११ ॥

जनमेजय उवाच
गान्धर्वी चोर्वशी देवी राजानं मानुषं कथम् ।
देवानुत्सृज्य सम्प्राप्ता तन्मे ब्रूहि बहुश्रुत ॥ १२ ॥

जनमेजयने पूछा—बहुश्रुत वैशम्पायनजी ! उर्वशीदेवी तो अप्सरा थी, फिर देवताओंका परित्याग कर वह मनुष्य राजाके पास क्योंकर आयी ? यह मुझे बताइये ॥ १२ ॥

वैशम्पायन उवाच
ब्रह्मशापाभिभूता सा मानुषं समपद्यत ।
ऐलं तु सा वरारोहा समयात् समुपस्थिता ॥ १३ ॥

वैशम्पायनजीने कहा—राजन् ! ब्रह्मशापके कारण उर्वशीको मनुष्यलोकमें आना पड़ा था। वह सुन्दर अङ्गोंवाली उर्वशी कुछ शर्तोंके साथ इला-नन्दन पुरूरवाके पास रही थी ॥ १३ ॥

आत्मनः शापमोक्षार्थं समयं सा चकार ह ।
अनग्नदर्शनं चैव सकामायां च मैथुनम् ॥ १४ ॥
द्वौ मेषौ शयनाभ्याशे सदा बद्धौ च तिष्ठतः ।
घृतमात्रो तथाऽऽहारः कालमेकं तु पार्थिव ॥ १५ ॥

भूपाल ! उसने अपने शापसे छूटनेके लिये यह शर्त करा ली थी कि 'मैं आपको नंगा न देखूँ, मेरे सकाम होनेपर ही आप सहवास करें, मेरे पलंगके पास सदा दो मेंढ़ बँधे रहेंगे और मैं दिनमें एक बार थोड़ा-सा घृतमात्र भोजन करूँगी ॥१४-१५॥

यद्येष समयो राजन् यावत्कालं च ते दृढः ।
तावत्कालं तु वत्स्यामि त्वत्तः समय एष नः ॥ १६ ॥

'राजन् ! जबतक इन प्रतिज्ञाओंका आप दृढ़ताके साथ पालन करते रहेंगे, तबतक मैं आपके पास रहूँगी—यह मैं आपसे प्रतिज्ञा करती हूँ' ॥ १६ ॥

तस्यास्तं समयं सर्वं स राजा समपालयत् ।
एवं सा वसते तत्र पुरूरवसि भामिनी ॥ १७ ॥

राजा उसकी सब शर्तोंका पालन करने लगे। इस प्रकार वह श्रेष्ठ अप्सरा पुरूरवाके यहाँ रहने लगी ॥ १७ ॥

वर्षाण्येकोनषष्टिस्तु तत्सक्ता शापमोहिता ।
उर्वश्यां मानुषस्थायां गन्धर्वाश्चिन्तयान्विताः ॥ १८ ॥

शापके कारण उर्वशीको जब राजामें आसक्त होकर रहते हुए उनसठ वर्ष बीत गये, तब गन्धर्वोंको मनुष्योंके बीच बसनेवाली उर्वशीकी चिन्ता हुई ॥ १८ ॥

गन्धर्वा ऊचुः
चिन्तयध्वं महाभागा यथा सा तु वराङ्गना ।
समागच्छेत् पुनर्देवानुर्वशी स्वर्गभूषणम् ॥ १९ ॥

गन्धर्वोंने कहा—महाभागो ! वराङ्गना उर्वशी देवताओंमें फिर किस प्रकार आवे ? इसका उपाय सोचो; क्योंकि वह स्वर्गका भूषण है ॥ १९ ॥

ततो विश्वावसुर्नाम तत्राह वदतां वरः ।
मया तु समयस्ताभ्यां क्रियमाणः श्रुतः पुरा ॥ २० ॥

तब वक्ताओंमें श्रेष्ठ विश्वावसु नामक गन्धर्वने कहा—'उन दोनोंने पहले जो प्रतिज्ञाएँ की थीं, उन्हें मैंने सुना है ॥

व्युत्क्रान्तसमयं सा वै राजानं त्यक्ष्यते यथा ।
तदहं वेद्म्यशेषेण यथा भेत्स्यत्यसौ नृपः ॥ २१ ॥

'राजाके प्रतिज्ञा भङ्ग करनेपर वह उसे छोड़ देगी। उस राजाकी प्रतिज्ञा जिस प्रकार टूटेगी, मैं उसे भी भलीभाँति जानता हूँ ॥ २१ ॥

हरिवंशपर्व ] षड्विंशोऽध्यायः ९१


ससहायो गमिष्यामि युष्माकं कार्यसिद्धये ।
एवमुक्त्वा गतस्तत्र प्रतिष्ठानं महायशाः ॥ २२ ॥

'तुम्हारे कामको सिद्ध करनेके लिये अपने सहायकोंको साथ लेकर मैं वहाँ जाऊँगा।' यों कहकर वह महायशस्वी गन्धर्व प्रतिष्ठानपुर (झूँसी-प्रयाग) में गये ॥ २२ ॥

निशायामथ चागम्य मेषमेकं जहार सः।
मातृवद् वर्तते सा तु मेषयोश्चारुहासिनी ॥ २३ ॥

वहाँ आकर उन्होंने रातमें एक भेड़ चुरा ली। मनोहर हासवाली वह उर्वशी उन भेड़ोंपर माताके समान स्नेह करती थी ॥ २३ ॥

गन्धर्वागमनं श्रुत्वा शापान्तं च यशस्विनी।
राजानमब्रवीत् तत्र पुत्रो मेऽह्रियतेति सा ॥ २४ ॥

यशस्विनी उर्वशीने गन्धर्वोंके आगमनको सुनकर विचारा कि अब मेरे शापके अन्त होनेका समय आ गया, तब उसने राजासे कहा—'राजन् ! मेरे एक बच्चेको चोर चुरा ले गये' ॥

एवमुक्तो विनिश्चित्य नग्नो नैवोदतिष्ठत।
नग्नं मां द्रक्ष्यते देवी समयो वितथो भवेत् ॥ २५ ॥

यह कहनेपर भी वह यह विचारकर नंगा नहीं उठा कि यदि यह देवी मुझे नंगा देख लेगी तो मेरी प्रतिज्ञा झूठी हो जायगी ॥ २५ ॥

ततो भूयस्तु गन्धर्वा द्वितीयं मेषमाददुः।
द्वितीये तु हृते मेषे ऐलं देव्यब्रवीदिदम् ॥ २६ ॥

इतनेहीमें गन्धर्व पुनः दूसरे भेंड़को भी उठा ले गये। दूसरे भेंड़के चुराये जानेपर देवी उर्वशीने पुरूरवासे यह कहा—॥ २६ ॥

पुत्रो मेऽपहृतो राजन्ननाथाया इव प्रभो।
एवमुक्तस्तथोत्थाय नग्नो राजा प्रधावितः ॥ २७ ॥
मेषयोः पदमन्विच्छन् गन्धर्वैर्विद्युदप्यथ।
उत्पादिता सुमहती ययौ तद्भवनं महत् ॥ २८ ॥
प्रकाशितं वै सहसा ततो नग्नमवैक्षत।
नग्नं दृष्ट्वा तिरोभूता साऽप्सरा कामरूपिणी ॥ २९ ॥

'सामर्थ्यशाली राजन् ! अनाथ स्त्रीके समान मेरे पुत्रोंको छीन लिया गया।' यो उर्वशीके कहनेपर राजा नंगे ही उठकर भेड़ोंके पैरके चिह्नका अनुसरण करते हुए दौड़े। इसी समय गन्धर्वोंने बड़ी भारी बिजली चमकायी। उस समय वह विशाल भवन एक साथ प्रकाशित हो गया। तब तो उर्वशीने राजाको नंगा देख लिया। वह कामरूपिणी अप्सरा राजाको नंगा देखते ही अन्तर्धान हो गयी ॥ २७-२९ ॥

उत्सृष्टावुरणौ दृष्ट्वा राजा गृहागतो गृहे।
अपश्यन्नुर्वशीं तत्र विललाप सुदुःखितः ॥ ३० ॥

उधर राजा भी (गन्धर्वोंके) छोड़े हुए भेड़ोंको देख उन्हें साथ लेकर घरमें घुसे, पर वहाँ उन्हें उर्वशी नहीं दिखायी दी। तब वे परम दुःखित हो विलाप करने लगे ॥ ३० ॥

चचार पृथिवीं सर्वां मार्गमाण इतस्ततः।
अथापश्यत् स तां राजा कुरुक्षेत्रे महाबलः ॥ ३१ ॥
प्लक्षतीर्थे पुष्करिण्यां हैमवत्यां समाप्लुताम्।
क्रीडन्तीमप्सरोभिश्च पञ्चभिः सह शोभनाम् ॥ ३२ ॥

फिर वे उर्वशीको खोजते हुए पृथ्वीपर सर्वत्र घूमने लगे। कुछ समयके अनन्तर उन महाबली नरेशने उस शोभामयी अप्सराको कुरुक्षेत्रके प्लक्षतीर्थकी हैमवती नामवाली पुष्करिणीमें स्नानकर अपनी पाँच सखियोंके साथ क्रीड़ा करते देखा ॥ ३१-३२ ॥

तां क्रीडन्तीं ततो दृष्ट्वा विललाप सुदुःखितः।
सा चापि तत्र तं दृष्ट्वा राजानमविदूरतः ॥ ३३ ॥
उर्वशी ताः सखीः प्राह स एष पुरुषोत्तमः।
यस्मिन्नहमवात्सं वै दर्शयामास तं नृपम् ॥ ३४ ॥

क्रीड़ा करती हुई उर्वशीको देखकर राजा दुःखित होकर विलाप करने लगे। इधर उर्वशीने भी उस राजाको समीप ही देखकर अपनी सखियोंसे राजाको दिखाया और कहा—'ये वे ही पुरुषोत्तम हैं, जिनके पास मैं रही थी' ॥ ३३-३४ ॥

समाविग्नास्तु ताः सर्वाः पुनरेव नराधिपः।
जाये ह तिष्ठ मनसा घोरे वचसि तिष्ठ ह ॥ ३५ ॥
एवमादीनि सूक्तानि परस्परमभाषत।
उर्वशी चाब्रवीदैलं सगर्भाहं त्वया प्रभो ॥ ३६ ॥

उस समय वे सभी अप्सराएँ (उर्वशीके पुनर्गमनकी आशङ्कासे) घबरा गयीं। इधर राजा उससे फिर कहने लगे—'प्रिये ! तू थोड़ा ठहर, ओ कठोर हृदयवाली ! ठहर जा और अपने वचनोंपर दृढ़ रह !' इस प्रकार वैदिक सूक्तोंको वे दोनों एक दूसरेके प्रति उत्तर-प्रत्युत्तरके रूपमें कहने लगे। उस समय उर्वशीने इला-पुत्र पुरूरवासे कहा—'प्रभो ! मैं आपके द्वारा गर्भवती हूँ ॥ ३५-३६ ॥

संवत्सरात् कुमारास्ते भविष्यन्ति न संशयः।
निशामेकां च नृपते निवत्स्यसि मया सह ॥ ३७ ॥

'राजन् ! निस्सन्देह एक-एक वर्षपर मेरे गर्भसे आपके कुमार उत्पन्न होंगे तथा प्रतिवर्ष एक रात्रि आप मेरे साथ रह सकेंगे' ॥ ३७ ॥

हृष्टो जगाम राजाथ स्वपुरं तु महायशाः।
गते संवत्सरे भूय उर्वशी पुनरागमत् ॥ ३८ ॥

तब वे महायशस्वी राजा प्रसन्न हो गये और अपने

९२श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

नगरमें आ गये। वर्ष समाप्त होनेपर उर्वशी उनके पास फिर आयी ॥ ३८ ॥

उषितश्च तया सार्द्धमेकरात्रं महायशाः ।
उर्वश्याथाब्रवीद्दैलं गन्धर्वा वरदास्तव ॥ ३९ ॥
महायशस्वी पुरूरवा उसके साथ एक रात्रि रहे। तदनन्तर उर्वशीने पुरूरवासे कहा—'गन्धर्व आपको वर देना चाहते हैं ॥ ३९ ॥

तान् वृणीष्व महाराज ब्रूहि चैनांस्त्वमेव हि ।
वृणीष्व समतां राजन् गन्धर्वाणां महात्मनाम् ॥ ४० ॥
'महाराज ! अब आप वर माँग लीजिये। आप इनसे इन महात्मा गन्धर्वोंकी समता माँग लीजिये' ॥ ४० ॥

तथेत्युक्त्वा वरं वव्रे गन्धर्वांश्च तथास्त्विति ।
पूरयित्वाग्निना स्थालीं गन्धर्वाश्च तमब्रुवन् ॥ ४१ ॥
तब पुरूरवाने 'बहुत अच्छा' कहकर गन्धर्वोंसे वर माँग लिया। तब गन्धर्वोंने 'बहुत अच्छा, ऐसा ही होगा,' कहकर एक थालीमें अग्नि भरकर पुरूरवासे कहा—॥ ४१ ॥

अनेनेष्ट्वा च लोकान्नः प्राप्स्यसि त्वं नराधिप ।
तानादाय कुमारांस्तु नगरायोपचक्रमे ॥ ४२ ॥
'राजन् ! इस अग्निसे यज्ञ करके तुम हमारे लोकोंमें आ जाओगे।' तब वे राजा (अग्नि और) अपने पुत्रोंको लेकर नगरकी ओर चले ॥ ४२ ॥

निक्षिप्याग्निमरण्ये तु सपुत्रस्तु गृहं ययौ ।
स त्रेताग्निं तु नापश्यदश्वत्थं तत्र दृष्टवान् ॥ ४३ ॥
(मार्गमें) उन्होंने वनमें अग्निको रख दिया और अपने पुत्रोंको लेकर घरमें प्रवेश किया। फिर वनमें जानेपर वहाँ उन्होंने अग्निको नहीं देखा; किंतु उसकी जगह एक पीपलके वृक्षको खड़ा देखा ॥ ४३ ॥

शमीजातं तु तं दृष्ट्वा अश्वत्थं विस्मितस्तदा ।
गन्धर्वेभ्यस्तदाशंसदग्निनाशं ततस्तु सः ॥ ४४ ॥
तब वे राजा (अग्निको अपने गर्भमें छिपानेवाले) शमी (जंड) के वृक्षमेंसे उत्पन्न हुए पीपलको देखकर विस्मयमें पड़ गये और उन्होंने गन्धर्वोंसे अग्निके न दीखनेका वृत्तान्त कहा ॥ ४४ ॥

श्रुत्वा तमर्थमखिलमरणीं तु समादिशन् ।
अश्वत्थादरणीं कृत्वा मथित्वाग्निं यथाविधि ॥ ४५ ॥
मथित्वाग्निं त्रिधा कृत्वा अयजत् स नराधिपः ।
इष्ट्वा यज्ञैर्बहुविधैर्गन्तस्तेषां सलोकताम् ॥ ४६ ॥
गन्धर्वोंने सब बातको सुनकर कहा, 'तुम पीपलकी अरणी बना लो' तब उन्होंने पीपलकी अरणी बनाकर शास्त्रीय विधिके अनुसार उन अरणियोंको मथकर अग्निको उत्पन्न किया। फिर उस अग्निके तीन विभाग किये। तदनन्तर उस अग्निसे उन्होंने यजन किया था। वे उस त्रेताग्निसे अनेक प्रकारके यज्ञ कर गन्धर्वोंकी समानता पाकर गन्धर्वोंके लोकमें पहुँच गये ॥ ४५-४६ ॥

गन्धर्वेभ्यो वरं लब्ध्वा त्रेताग्निं समकारयत् ।
एकोऽग्निः पूर्वमेवासीदैलेस्त्रेतामकारयत् ॥ ४७ ॥
राजा पुरूरवाने गन्धर्वोंसे वर पाकर त्रेताग्निकी रचना की थी। पहले अग्नि एक ही था, पुरूरवाने उसको तीन बनाया था ॥ ४७ ॥

एवंप्रभावो राजासीदैलस्तु नरसत्तम ।
देशे पुण्यतमे चैव महर्षिभिरभिष्टुते ॥ ४८ ॥
राज्यं स कारयामास प्रयागे पृथिवीपतिः ।
उत्तरे जाह्नवीतीरे प्रतिष्ठाने महायशाः ॥ ४९ ॥
नरश्रेष्ठ ! राजा पुरूरवा ऐसे प्रतापी थे। उन महायशस्वी पृथ्वीपतिने गङ्गाके उत्तर तटपर बसे हुए महर्षियोंसे प्रशंसित परम पवित्र प्रतिष्ठान (झूँसी—प्रयाग) में राज्य किया था ॥ ४८-४९ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे हरिवंशपर्वणि ऐलोत्पत्तिर्नाम षड्विंशोऽध्यायः ॥ २६ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारत खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत हरिवंशपर्वमें पुरूरवाकी उत्पत्तिविषयक छब्बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २६ ॥


सप्तविंशोऽध्यायः

पुरूरवाके द्वितीय पुत्र अमावसुके वंशका वर्णन, विश्वामित्र और परशुरामकी उत्पत्ति

वैशम्पायन उवाच

ऐलपुत्रा बभूवुस्ते सर्वे देवसुतोपमाः ।
दिवि जाता महात्मान आयुर्धीमानमावसुः ॥ १ ॥
विश्वायुश्चैव धर्मात्मा श्रुतायुश्च तथापरः ।
दृढायुश्च वनायुश्च शतायुश्चोर्वशीसुताः ॥ २ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! पुरूरवाके सभी पुत्र देवकुमारोंके तुल्य थे। वे सब महात्मा उर्वशीके गर्भसे स्वर्गमें उत्पन्न हुए थे। (उनके नाम इस प्रकार हैं—) आयु, बुद्धिमान् अमावसु, धर्मात्मा विश्वायु, श्रुतायु, दृढायु, वनायु और शतायु ॥ १-२ ॥

अमावसोश्च दायादो भीमो राजाथ नग्नजित् ।
श्रीमान् भीमस्य दायादो राजासीत् काञ्चनप्रभः ।

हरिवंशपर्व ] सप्तविंशोऽध्यायः ९३


विद्वांस्तु काञ्चनस्यापि सुहोत्रोऽभून्महाबलः ॥ ३ ॥
अमावसुके राजा भीम और नग्नजित् नामक पुत्र हुए थे। भीमके पुत्र श्रीमान् राजा काञ्चनप्रभ हुए। काञ्चनके महाबली पुत्र सुहोत्र हुए, जो बड़े विद्वान् थे ॥ ३ ॥

सौहोत्रिरभवज्जह्नुः केशिन्या गर्भसम्भवः ।
आजहे यो महत्सत्रं सर्वमेधमहामखम् ॥ ४ ॥
सुहोत्रके केशिनीके गर्भसे जह्नु नामक पुत्र हुए। उन्होंने सर्वमेध नामक महायज्ञका अनुष्ठान किया था (जिसमे बहुत बड़ा 'अन्नसत्र' होता है) ॥ ४ ॥

पतिलोभेन यं गङ्गा पतित्वेऽभिससार ह ।
नेच्छतः प्लावयामास तस्य गङ्गा च तत्सदः ।
स तया प्लावितं दृष्ट्वा यज्ञवाटं समन्ततः ॥ ५ ॥
सौहोत्रिरब्रवीद् गङ्गां क्रुद्धो भरतसत्तम ॥ ६ ॥
गङ्गाजी उनको पति बनानेके लोभसे उनके समीप गयी थीं; परंतु जब उन्होंने इस बातकी इच्छा न की, तब गङ्गाजीने उनकी सभाको जलसे भर दिया था। भरतसत्तम ! सुहोत्र-पुत्र जह्नुने अपने यज्ञवाटको गङ्गाजीके द्वारा डूबता हुआ देख क्रोधमे भरकर गङ्गाजीसे कहा—॥ ५-६ ॥

एष ते विफलं यत्नं पिवन्नम्भः करोम्यहम् ।
अस्य गङ्गेऽवलेपस्य सद्यः फलमवाप्नुहि ॥ ७ ॥
'गङ्गे ! मैं तेरे इस जलको पीकर तेरे यत्नको व्यर्थ किये देता हूँ। तू अपने अभिमानका फल शीघ्र ही पा ले' ॥ ७ ॥

राजर्षिणा ततः पीतां गङ्गां दृष्ट्वा महर्षयः ।
उपनिन्युर्महाभागां दुहितृत्वेन जाह्नवीम् ॥ ८ ॥
तदनन्तर उन राजर्षिने गङ्गाजीको पी लिया। यह देखकर महर्षियोंने महाभागा गङ्गाजीको उनकी पुत्री मानकर (उनका नाम) जाह्नवी रख दिया ॥ ८ ॥

युवनाश्वस्य पुत्रीं तु कावेरीं जह्नुरावहत् ।
युवनाश्वस्य शापेन गङ्गार्धेन विनिर्ममे ।
कावेरीं सरितां श्रेष्ठां जह्नोर्भार्यामनिन्दिताम् ॥ ९ ॥
जह्नुने युवनाश्वकी पुत्री कावेरीसे विवाह किया था, जिसे युवनाश्वके शापसे गङ्गाने अपने ही आधे भागद्वारा प्रकट किया था; इस प्रकार सरिताओंमें श्रेष्ठ साध्वी कावेरी जह्नुकी भार्या हुई ॥ ९ ॥

जह्नुस्तु दयितं पुत्रं सुनहं नाम धार्मिकम् ।
कावेर्यां जनयामास अजकस्तस्य चात्मजः ॥ १० ॥
जह्नुने कावेरीके गर्भसे सुनह नामक धार्मिक पुत्रको उत्पन्न किया। सुनहके पुत्र अजक हुए ॥ १० ॥

अजकस्य तु दायादो बलाकाश्वो महीपतिः ।
बभूव मृगयाशीलः कुशस्तस्यात्मजोऽभवत् ॥ ११ ॥
अजकके पुत्र राजा बलाकाश्व हुए। उनको मृगयाका व्यसन था। उनके पुत्र कुश हुए ॥ ११ ॥

कुशपुत्रा बभूवुर्हि चत्वारो देववर्चसः ।
कुशिकः कुशनाभश्च कुशाम्बो मूर्तिमांस्तथा ॥ १२ ॥
कुशके देवताओके समान कान्तिमान् कुशिक, कुशनाभ, कुशाम्ब और मूर्तिमान् नामक चार पुत्र उत्पन्न हुए ॥ १२ ॥

पह्लवैः सह संवृद्धिं राजा वनचरैस्तदा ।
कुशिकस्तु तपस्तेपे पुत्रमिन्द्रसमप्रभम् ।
लभेषमिति तं शक्रास्त्रासादभ्येत्य जज्ञिवान् ॥ १३ ॥
राजा कुशिक वनवासी पह्लवोंके साथ पलकर बड़े हुए थे। उन्होंने इन्द्रके समान प्रभाववाले पुत्रको पानेकी इच्छासे तप करना आरम्भ कर दिया। तब इन्द्र उनके भयसे स्वयं ही उनके यहाँ पुत्र बनकर उत्पन्न हो गये ॥ १३ ॥

पूर्णे वर्षसहस्रे वै तं तु शक्रो ह्यपश्यत ।
अत्युग्रतपसं दृष्ट्वा सहस्राक्षः पुरंदरः ॥ १४ ॥
समर्थः पुत्रजनने स्वमेवांशमवासयत् ।
पुत्रत्वे कल्पयामास स देवेन्द्रः सुरोत्तमः ॥ १५ ॥
राजा कुशिकको जब (तप करते) एक हजार वर्ष पूरे हो गये, तब इन्द्रका ध्यान कुशिककी ओर गया, हजार नेत्रों-वाले पुरन्दर इन्द्रने राजाको अति उग्र तप करके पुत्र उत्पन्न करनेमे समर्थ देख उन (के वीर्य) मे अपने अंशको स्थापित कर दिया। इस प्रकार देवेन्द्र सुरोत्तम कुशिकके पुत्र बने थे ॥ १४-१५ ॥

स गाधिरभवद् राजा मघवान् कौशिकः स्वयम् ।
पौरुकुत्स्यभवद् भार्या गाधिस्तस्यामजायत ॥ १६ ॥
इस प्रकार इन्द्र स्वयं (कुशिकके पुत्र) कौशिक गाधि बनकर उत्पन्न हुए थे। राजा कुशिककी पत्नी पुरुकुत्सकी पुत्री थी, उसके गर्भसे ही गाधि उत्पन्न हुए थे ॥ १६ ॥

गाधेः कन्या महाभागा नाम्ना सत्यवती शुभा ।
तां गाधिर्भृगुपुत्राय ऋचीकाय ददौ प्रभुः ॥ १७ ॥
गाधिकी महाभाग्यवती शुभ कन्याका नाम सत्यवती था, राजा गाधिने सत्यवतीका विवाह भृगुपुत्र ऋचीकके साथ कर दिया था ॥ १७ ॥

तस्याः प्रीतोऽभवद् भर्ता भार्गवो भृगुनन्दनः ।
पुत्रार्थे कारयामास चरुं गाधेस्तथैव च ॥ १८ ॥
सत्यवतीके स्वामी भृगुवंशी ऋचीकने अपनी पत्नीके ऊपर प्रसन्न होकर उसके और गाधिके लिये पुत्र देनेवाला चरु बनाया ॥ १८ ॥

उवाचाहूय तां भर्ता ऋचीको भार्गवस्तदा ।
उपयोज्यश्चरुर्ह्ययं त्वया मात्रा त्वयं तव ॥ १९ ॥
तदनन्तर सत्यवतीके स्वामी भृगुवंशी ऋचीकने सत्यवतीको

९४श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

बुलाकर कहा—‘तू इस चरुका उपयोग करना और इस (दूसरे) चरुका उपयोग करनेके लिये अपनी मातासे कहना ॥ १९॥
तस्यां जनिष्यते पुत्रो दीप्तिमान् क्षत्रियर्षभः।
अजेयः क्षत्रियैर्लोके क्षत्रियर्षभसूदनः ॥ २० ॥
‘तुम्हारी माताके जो पुत्र होगा, वह क्षत्रियोंमें श्रेष्ठ, दीप्तिमान्, संसारमें क्षत्रियोंसे अजेय और बड़े-बड़े क्षत्रियोंको दबानेवाला होगा ॥ २० ॥
तवापि पुत्रं कल्याणि धृतिमन्तं तपोनिधिम्।
शमात्मकं द्विजश्रेष्ठं चरुरेव विधास्यति ॥ २१ ॥
‘कल्याणि ! यह चरु तुम्हें भी धैर्यधारी तपोनिधि शान्तस्वरूप द्विजश्रेष्ठ पुत्र देगा’ ॥ २१ ॥
एवमुक्त्वा तु तां भार्यामृचीको भृगुनन्दनः।
तपस्यभिरतो नित्यमरण्यं प्रविवेश ह ॥ २२ ॥
सदा तपस्यामें ही तत्पर रहनेवाले भृगुनन्दन ऋचीक अपनी पत्नीसे इस प्रकार कहकर (तप करनेके लिये) वनमें चले गये ॥ २२ ॥
गाधिः सदारस्तु तदा ऋचीकावासमभ्यगात्।
तीर्थयात्राप्रसङ्गेन सुतां द्रष्टुं जनेश्वरः॥ २३ ॥
उसी समय राजा गाधि अपनी भार्याके साथ तीर्थयात्राके प्रसङ्गसे अपनी पुत्रीको देखनेके लिये ऋचीक ऋषिके आश्रमपर आये ॥ २३ ॥
चरुद्वयं गृहीत्वा तदृषेः सत्यवती तदा।
चरुमादाय यत्नेन सा तु मात्रे न्यवेदयत् ॥२४ ॥
तब सत्यवतीने ऋषिके दिये हुए दोनों चरुओंको ग्रहण करके उन्हें यत्नपूर्वक अपनी माताके सामने लाकर रख दिये ॥ २४॥
माता व्यत्यस्य दैवेन दुहित्रे स्वं चरुं ददौ।
तस्याश्चरुमथाज्ञानादात्मसंस्थं चकार ह ॥ २५ ॥
तब दैववश माताने चरु बदलकर पुत्रीको अपना चरु दे दिया और उसने अज्ञानवश पुत्रीके चरुको स्वयं खा लिया ॥ २५ ॥
अथ सत्यवती गर्भं क्षत्रियान्तकरं तदा।
धारयामास दीप्तेन वपुषा घोरदर्शनम् ॥ २६ ॥
तदनन्तर सत्यवतीने क्षत्रियोंका संहार करनेवाले गर्भको धारण कर लिया, जो अपने शरीरकी कान्तिके कारण घोर (क्रूर) दीखने लगा॥ २६ ॥
तामृचीकस्ततो दृष्ट्वा योगेनाभ्यनुसृत्य च।
तामब्रवीद् द्विजश्रेष्ठः स्वां भार्यां वरवर्णिनीम् ॥ २७ ॥
उसको देखकर ऋषिने ध्यानके द्वारा सारी बातोंको जान लिया। फिर द्विजश्रेष्ठ ऋचीक ऋषि अपनी श्रेष्ठ अङ्गोंवाली भार्यासे कहने लगे—॥ २७ ॥
मात्रासि वञ्चिता भद्रे चरुव्यत्यासहेतुना।
जनिष्यति हि पुत्रस्ते क्रूरकर्मातिदारुणः ॥ २८ ॥
भ्राता जनिष्यते चापि ब्रह्मभूतस्तपोधनः।
विश्वं हि ब्रह्म तपसा मया तस्मिन् समर्पितम् ॥ २९ ॥
‘भद्रे ! माताने तुझे ठग लिया है, चरुमें उलट-फेर होनेसे तेरा पुत्र अत्यन्त दारुण क्रूर कार्य करनेवाला होगा और तेरा भाई तपस्याका धनी एवं ब्रह्मस्वरूप होगा, मैंने तपके द्वारा उस (चरु) में सारा वेद भर दिया था’ ॥ २८-२९ ॥
एवमुक्ता महाभागा भर्त्रा सत्यवती तदा।
प्रसादयामास पतिं पुत्रो मे नेदृशो भवेत्।
ब्राह्मणापसदस्तत्र इत्युक्तो मुनिरब्रवीत् ॥ ३० ॥
पतिके इस प्रकार कहनेपर महाभाग्यवती सत्यवती स्वामीको प्रसन्न करके बोली—‘मेरा पुत्र ऐसा ब्राह्मणाधम न हो।’ तब मुनिने उससे कहा—॥ ३० ॥
नैष संकल्पितः कामो मया भद्रे तथास्त्विति।
उग्रकर्मा भवेत् पुत्रः पितुर्मातृश्च कारणात्।
पुनः सत्यवती वाक्यमेवमुक्ताब्रवीदिदम् ॥ ३१ ॥
‘भद्रे ! पिता अथवा माताके कारण ही पुत्र क्रूर कर्म करनेवाला हो जाता है, मैंने तो उग्र कर्म करनेवाले पुत्रकी कामना नहीं की थी (परंतु तेरी ही असावधानीसे चरुका उलट-फेर हो गया है अतएव ऐसा ही पुत्र होगा)।’ इस प्रकार कहनेपर सत्यवतीने फिर कहा—॥ ३१ ॥
इच्छँल्लोकानपि मुने सृजेथाः किं पुनः सुतम्।
शमात्मकंऋजुं त्वं मे पुत्रं दातुमर्हसि ॥ ३२ ॥
‘मुने ! आप चाहें तो तीनों लोकोंका निर्माण कर सकते हैं, फिर पुत्रकी तो बात ही क्या ? आप तो मुझे शमपरायण सरल पुत्र ही प्रदान करें’ ॥ ३२ ॥
काममेवंविधः पौत्रो मम स्यात्तव च प्रभो।
यद्यन्यथा न शक्यं वै कर्तुमेतद् द्विजोत्तम ॥ ३३ ॥
‘प्रभो ! द्विजश्रेष्ठ ! यदि इस बातको पलटा न जा सके तो भले ही आपका और मेरा पौत्र ऐसा हो जाय’ ॥ ३३ ॥
ततः प्रसादमकरोत्स तस्यास्तपसो बलात्।
भद्रे नास्ति विशेषो मे पौत्रे च वरवर्णिनि।
त्वया यथोक्तं वचनं तथा भद्रं भविष्यति ॥ ३४ ॥
तब उन्होंने अपने तपोबलसे उसके ऊपर अनुग्रह किया और कहा—‘भद्रे ! वरवर्णिनि ! मैं (पुत्रमें और) पौत्रमे कुछ भेद नहीं समझता, अतः तूने जो कहा है, वह वैसा ही होगा’ ॥ ३४ ॥
ततः सत्यवती पुत्रं जनयामास भार्गवम्।
तपस्यभिरतं दान्तं जमदग्निं शमात्मकम् ॥ ३५ ॥

हरिवंशपर्व ] सप्तविंशोऽध्यायः [ ९५


तदनन्तर सत्यवतीने भृगुवंशी जमदग्निको जन्म दिया, जो तपस्यापरायण, जितेन्द्रिय तथा शम (मनोनिग्रह) से सम्पन्न थे ॥ ३५ ॥
भृगोश्चरुविपर्यासे रौद्रवैष्णवयोः पुरा ।
यजनाद् वैष्णवेऽर्थांशे जमदग्निरजायत ॥ ३६ ॥
भृगुवंशी ऋचीक मुनिने पूर्वकालमे जो देवताओंकी आराधना की थी, उसीके प्रभावसे रुद्र और विष्णुके अंशभूत उन दोनों चरुओंमे उलट-फेर हो जानेपर भी वैष्णव चरुके अंशसे शान्तस्वभाव जमदग्नि मुनिका जन्म हुआ ॥ ३६ ॥
सा हि सत्यवती पुण्या सत्यधर्मपरायणा ।
कौशिकीति समाख्याता प्रवृत्तेयं महानदी ॥ ३७ ॥
सत्यवती सत्य-धर्ममें तत्पर रहनेवाली पुण्यात्मा स्त्री थी। यही कौशिकी नामसे विख्यात महानदी हुई ॥ ३७ ॥
इक्ष्वाकुवंशप्रभवो रेणुर्नाम नराधिपः ।
तस्य कन्या महाभागा कामली नाम रेणुका ॥ ३८ ॥
इक्ष्वाकुवंशमें रेणु नामवाले एक नरेश थे। उनकी कन्या महाभागा रेणुका थी, जिसका दूसरा नाम कामली भी था ॥
रेणुकायां तु कामल्यां तपोविद्यासमन्वितः ।
आर्चीको जनयामास जामदग्न्यं सुदारुणम् ॥ ३९ ॥
सर्वविद्यानुगं श्रेष्ठं धनुर्वेदस्य पारगम् ।
रामं क्षत्रियहन्तारं प्रदीप्तमिव पावकम् ॥ ४० ॥
उस रेणुका या कामलीके गर्भसे तपस्वी एवं विद्वान् ऋचीकपुत्र जमदग्निने अत्यन्त कठोर स्वभाववाले परशुरामजीको प्रकट किया, जो समस्त विद्याओंमें पारङ्गत, धनुर्वेदमें प्रवीण, क्षत्रियकुलका संहार करनेवाले तथा प्रज्वलित अग्निके समान तेजस्वी थे ॥ ३९-४० ॥
और्वस्यैवमृचीकस्य सत्यवत्यां महायशाः ।
जमदग्निस्तपोवीर्याज्जज्ञे ब्रह्मविदां वरः ॥ ४१ ॥
इस प्रकार और्व नामसे प्रसिद्ध ऋचीक मुनिके तपोबलसे उनकी पत्नी सत्यवतीके गर्भसे ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ महायशस्वी जमदग्निका प्रादुर्भाव हुआ ॥ ४१ ॥
मध्यमश्च शुनःशेपः शुनःपुच्छः कनिष्ठकः ।
विश्वामित्रं तु दायादं गाधिः कौशिकनन्दनः ॥ ४२ ॥
जनयामास पुत्रं तु तपोविद्याशमात्मकम् ।
प्राप्य ब्रह्मर्षिसमतां योऽयं सप्तर्षितां गतः ॥ ४३ ॥
ऋचीकके मझले पुत्र शुनःशेप और छोटे पुत्र शुनःपुच्छ थे। इधर कौशिकनन्दन महाराज गाधिने विश्वामित्रको पुत्ररूपमें प्रकट किया, जो तपस्वी, विद्वान् और शान्त थे। वे ब्रह्मर्षिकी समता पाकर सप्तर्षियोंमें प्रतिष्ठित हुए हैं ॥ ४२-४३ ॥
विश्वामित्रस्तु धर्मात्मा नाम्ना विश्वरथः स्मृतः ।
जज्ञे भृगुप्रसादेन कौशिकाद् वंशवर्धनः ॥ ४४ ॥
धर्मात्मा विश्वामित्रका दूसरा नाम विश्वरथ था। वे कुशिकवंशी राजा गाधिके यहाँ भृगुवंशी ऋचीक मुनिकी कृपासे उत्पन्न हुए थे और अपने वंशका विस्तार करनेवाले थे ॥
विश्वामित्रस्य च सुता देवरातादयः स्मृताः ।
प्रख्यातास्त्रिषु लोकेषु तेषां नामानि मे शृणु ॥ ४५ ॥
विश्वामित्रके देवरात आदि बहुत-से पुत्र कहे गये हैं, जो तीनों लोकोंमें विख्यात थे। उनके नाम मुझसे सुनो ॥
देवश्रवाः कतिश्चैव यस्सात्यायनाः स्मृताः ।
शालाहत्यां हिरण्याक्षो रेणोजज्ञेऽथ रेणुमान् ॥ ४६ ॥
सांकृतिर्गालवश्चैव मुद्गलश्चेति विश्रुताः ।
मधुच्छन्दो जयश्चैव देवलश्च तथाष्टकः ॥ ४७ ॥
कच्छपो हरितश्चैव विश्वामित्रस्य वै सुताः ।
तेषां ख्यातानि गोत्राणि कौशिकानां महात्मनाम् ॥ ४८ ॥
देवश्रवा, कात्यायन गोत्रके प्रवर्तक कति और हिरण्याक्ष— ये तीनों शालावतीके गर्भसे उत्पन्न हुए थे। उनकी दूसरी स्त्रीका नाम रेणु था, जिससे रेणुमान्, सांकृति, गालव, मुद्गल, मधुच्छन्द, जय तथा देवल उत्पन्न हुए थे। अष्टक ( दृषद्वती या माधवीका पुत्र था ), कच्छप और हरित भी विश्वामित्रके ही पुत्र थे। इन कौशिकवंशी महात्माओंके प्रसिद्ध गोत्र इस प्रकार हैं ॥ ४६-४८ ॥
पाणिनो बभ्रवश्चैव ध्यानजप्यास्तथैव च ।
पार्थिवा देवराताश्च शालङ्कायनबाष्कलाः ॥ ४९ ॥
लोहिता यामदूताश्च तथा कारीषवः स्मृताः ।
सौश्रुताः कौशिका राजंस्तथान्ये सैन्धवायनाः ॥ ५० ॥
देवला रेणवश्चैव याज्ञवल्क्याघमर्षणाः ।
औदुम्बरा ह्यभिष्णातास्तारकायनचुञ्चुलाः ॥ ५१ ॥
शालाहत्या हिरण्याक्षाः सांकृत्या गालवास्तथा ।
वादरायणिनश्चान्ये विश्वामित्रस्य धीमतः ॥ ५२ ॥
राजन् ! पाणिन, बभ्रु, ध्यानजप्य, पार्थिव, देवरात, शालङ्कायन, बाष्कल, लोहित, यामदूत, कारीषु, सौश्रुत, कौशिक, सैन्धवायन, देवल, रेणु, याज्ञवल्क्य, अघमर्षण, औदुम्बर, अभिष्ण्णात, तारकायन, चुञ्चुल, शालावत्य, हिरण्याक्ष, सांकृत्य, गालव तथा बादरायणि—ये तथा और भी बहुत-से बुद्धिमान् विश्वामित्रके पुत्र थे ॥ ४९-५२ ॥
ऋष्यन्तरविवाहाश्च कौशिका बहवः स्मृताः ।
पौरवस्य महाराज ब्रह्मर्षेः कौशिकस्य च ।
सम्बन्धोऽप्यस्य वंशेऽस्मिन्ब्रह्मक्षत्रस्य विश्रुतः ॥ ५३ ॥
कौशिकगोत्री ब्राह्मणोंकी संख्या बहुत है। वे अन्य ऋषियोंके कुलमें विवाह-सम्बन्ध स्थापित करनेके योग्य हैं। महाराज ! राजर्षि पौरव तथा ब्रह्मर्षि कौशिकके कुलमें सम्बन्ध हुआ है। इस प्रकार इस वंशमें ब्राह्मणों तथा क्षत्रियोंका परस्पर वैवाहिक सम्बन्ध विख्यात है ॥ ५३ ॥

९६ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे

विश्वामित्रात्मजानां तु शुनःशेपोऽग्रजः स्मृतः ।
भार्गवः कौशिकत्वं हि प्राप्तः स मुनिसत्तमः ॥ ५४ ॥
विश्वामित्रके पुत्रोंमें शुनःशेप सबसे बड़े माने गये हैं। मुनिश्रेष्ठ शुनःशेपका जन्म यद्यपि भृगुकुलमें हुआ था तथापि वे कौशिकगोत्री हो गये ॥ ५४ ॥

विश्वामित्रस्य पुत्रस्तु शुनःशेपोऽभवत् किल ।
हरिदश्वस्य यज्ञे तु पशुत्वे विनियोजितः ॥ ५५ ॥
देवैर्दत्तः शुनःशेपो विश्वामित्राय वै पुनः ।
देवैर्दत्तः स वै यस्माद् देवरातस्ततोऽभवत् ॥ ५६ ॥
कहते हैं, राजा हरिदश्व (हरिश्चन्द्र) के यज्ञमें शुनःशेप पशु बनाकर लाये गये थे। उसी समय वे विश्वामित्रके पुत्र हुए। देवताओंने विश्वामित्रके हाथमें पुनः शुनःशेपको दे दिया था। देवताओंद्वारा प्रदत्त होनेके कारण वे ('देवैः रातः' इस व्युत्पत्तिके अनुसार) देवरात नामसे विख्यात हुए ॥

देवरातादयः सप्त विश्वामित्रस्य वै सुताः ।
दृषद्वतीसुतश्चापि विश्वामित्रात् तथाष्टकः ॥ ५७ ॥
विश्वामित्रके देवरात आदि सात प्रमुख पुत्र थे। उन्हींसे अष्टकका भी जन्म हुआ था, जो दृषद्वतीका पुत्र था ॥

अष्टकस्य सुतो लौहिः प्रोक्तो जह्नुगणो मया ।
अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि वंशमायोर्महात्मनः ॥ ५८ ॥
अष्टकका पुत्र लौहि बताया गया है। इस प्रकार मैंने जह्नुकुलका वर्णन किया। इसके बाद महात्मा आयुके वंशका वर्णन करूँगा ॥ ५८ ॥

इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे हरिवंशपर्वण्यमावसुवंशकीर्तनं नाम सप्तविंशोऽध्यायः ॥ २७ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारत खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत हरिवंशपर्वमें अमावसुके वंशका वर्णनविषयक सत्ताईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २७ ॥


अष्टाविंशोऽध्यायः

राजा रजि और उनके पुत्रोंका चरित्र, इन्द्रका अपने स्थानसे भ्रष्ट होकर पुनः उसपर प्रतिष्ठित होना

वैशम्पायन उवाच
आयोः पुत्रास्तथा पञ्च सर्वे वीरा महारथाः ।
स्वर्भानुतनुयायां च प्रभायां जज्ञिरे नृप ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—नरेश्वर ! स्वर्भानुकुमारी प्रभा आयुकी पत्नी थी। उसके गर्भसे आयुके पाँच पुत्र उत्पन्न हुए, जो सब-के-सब वीर और महारथी थे ॥ १ ॥

नहुषः प्रथमं जज्ञे वृद्धशर्मा ततः परम् ।
रम्भो रजिरनेनाश्च त्रिषु लोकेषु विश्रुताः ॥ २ ॥
उनमें सबसे पहले नहुषका जन्म हुआ। तत्पश्चात् वृद्धशर्मा उत्पन्न हुए। तदनन्तर क्रमशः रम्भ, रजि और अनेना प्रकट हुए। ये तीनों लोकोंमें विख्यात थे ॥ २ ॥

रजिः पुत्रशतानीह जनयामास पञ्च वै ।
राजेयमिति विख्यातं क्षत्रमिन्द्रभयावहम् ॥ ३ ॥
रजिने पाँच सौ पुत्रोंको जन्म दिया। वे सभी क्षत्रिय राजेय नामसे विख्यात हुए। उनसे इन्द्र भी डरते थे ॥ ३ ॥

यत्र देवासुरे युद्धे समुत्पन्ने सुदारुणे ।
देवाश्चैवासुराश्चैव पितामहमथाब्रुवन् ॥ ४ ॥
आवयोर्भगवन् युद्धे को विजेता भविष्यति ।
ब्रूहि नः सर्वभूतेश श्रोतुमिच्छामि ते वचः ॥ ५ ॥
पूर्वकालमें देवताओं तथा असुरोंमें अत्यन्त भयंकर युद्ध आरम्भ होनेपर उन दोनों पक्षोंके लोगोंने पितामह, ब्रह्माजीसे पूछा—'भगवन् ! सर्वभूतेश्वर ! बताइये, हम दोनोंके युद्धमें कौन विजयी होगा ? हम इस विषयमें आपकी यथार्थ बात सुनना चाहते हैं' ॥ ४-५ ॥

ब्रह्मोवाच
येषामर्थाय संग्रामे राजिरात्तायुधः प्रभुः ।
योत्स्यते ते जयिष्यन्ति त्रींल्लोकान्नात्र संशयः ॥ ६ ॥
ब्रह्माजीने कहा—शक्तिशाली राजा रजि हाथमें हथियार लेकर जिनके लिये संग्रामभूमिमें खड़े हो युद्ध करेंगे, वे तीनों लोकोंपर विजय प्राप्त कर लेंगे। इसमें संशय नहीं है ॥ ६ ॥

यतो रजिर्धृतिस्तत्र श्रीश्च तत्र यतो धृतिः ।
यतो धृतिश्च श्रीश्चैव धर्मस्तत्र जयस्तथा ॥ ७ ॥
जिस पक्षमें रजि हैं, उधर ही धृति है जहाँ धृति है वहीं लक्ष्मी है तथा जहाँ धृति और लक्ष्मी हैं वहीं धर्म एवं विजय है ॥ ७ ॥

ते देवदानवाः प्रीता देवेनोक्ता रजेर्जये ।
अभ्ययुर्जयमिच्छन्तो वृण्वाना भरतर्षभ ॥ ८ ॥
भरतकुलभूषण जनमेजय ! रोजिक विजयके विषयमें ब्रह्माजीके ऐसा कहनेपर देवता और दानव प्रसन्न हो अपनी-अपनी विजय चाहते हुए रजिका वरण करनेके लिये उनके पास गये ॥ ८ ॥

स हि स्वर्भानुदौहित्रः प्रभायां समपद्यत ।
राजा परमतेजस्वी सोमवंशप्रवर्धनः ॥ ९ ॥
वे राहुके दौहित्र थे। राहुकी पुत्री प्रभाके गर्भसे उनका जन्म हुआ था। सोमवंशकी वृद्धि करनेवाले वे राजा रजि बड़े तेजस्वी थे ॥ ९ ॥

हरिवंशपर्व ] अष्टाविंशोऽध्यायः ९७


ते हृष्टमनसः सर्वे रजिं देवाश्च दानवाः।
ऊचुरस्मज्जयाय त्वं गृहाण वरकार्मुकम् ॥ १० ॥

समस्त देवता और दानव दोनों प्रसन्नचित्त हो रजिंके पास जाकर बोले—'राजन् ! आप हमारी विजयके लिये अपना श्रेष्ठ धनुष धारण कीजिये' ॥ १० ॥

अथोवाच रजिस्तत्र तयोर्वै देवदैत्ययोः।
स्वार्थज्ञः स्वार्थमुद्दिश्य यशः स्वं च प्रकाशयन् ॥ ११ ॥

तब स्वार्थको समझनेवाले रजिने वहाँ स्वार्थको सामने रखकर अपने यशको प्रकाशमे लाते हुए देवता और दानव दोनों पक्षके लोगोंसे कहा ॥ ११ ॥

रजिरुवाच

यदि दैत्यगणान् सर्वाञ्जित्वा शक्रपुरोगमाः।
इन्द्रो भवामि धर्मेण ततो योत्स्यामि संयुगे ॥ १२ ॥

रजि बोले—इन्द्रादि देवताओ ! यदि मैं समस्त दैत्योंको जीतकर धर्मतः इन्द्र हो सकूँ तो तुम्हारी ओरसे रणभूमिमें युद्ध करूँगा ॥ १२ ॥

देवाः प्रथमतॊ भूयः प्रत्युचुर्हृष्टमानसाः।
एवं यथेष्टं नृपते कामः सम्पद्यतां तव ॥ १३ ॥

यह सुनकर देवताओँने फिर प्रसन्नचित्त हो पहले ही उत्तर दिया—'नरेश्वर ! ऐसा ही होगा। तुम्हारी अभीष्ट कामना पूर्ण हो' ॥ १३ ॥

श्रुत्वा सुरगणानां तु वाक्यं राजा रजिस्तदा।
पप्रच्छासुरमुख्यांस्तु यथा देवानपृच्छत ॥ १४ ॥

देवताओँकी यह बात सुनकर उस समय राजा रजिने मुख्य-मुख्य असुरोंसे भी वैसी ही बात पूछी जैसी देवताओँसे पूछी थी ॥ १४ ॥

दानवा दर्पपूर्णास्तु स्वार्थमेवानुगम्य ह।
प्रत्युचुस्ते नृपवरं साभिमानमिदं वचः ॥ १५ ॥

तब अहंकारी दानवों ने स्वार्थको ही सामने रखकर अनुसरण करते हुए उन नृपश्रेष्ठको अभिमानपूर्वक यों उत्तर दिया— ॥ १५ ॥

अस्माकमिन्द्रः प्रह्लादो यस्यार्थे विजयामहे।
अस्मिंस्तु समये रजिंस्तिष्ठेथा राजसत्तम ॥ १६ ॥

'राजशिरोमणे ! हमारे इन्द्र तो प्रह्लाद ही हैं, जिनके लिये हम विजय प्राप्त करना चाहते हैं। राजन् ! आपको इसी शर्तपर हमारे पक्षमें खड़ा होना चाहिये' ॥ १६ ॥

स तथेति ब्रुवन्नेव दैवतैरप्यभिचोदितः।
भविष्यसीन्द्रो जित्वैवं दैवैरुक्तस्तु पार्थिवः।
जघान दानवान् सर्वान् ये वध्या वज्रपाणिनः ॥ १७ ॥

वे 'बहुत अच्छा' कहकर असुरोंकी बात मानना ही चाहते थे कि देवताओँने फिर उन्हें अपने पक्षमें आनेके लिये प्रेरणा देते हुए कहा—'राजन् ! तुम इस प्रकार विजय पाकर हमारे इन्द्र हो जाओगे।' देवताओँके ऐसा कहनेपर राजा रजिने उन समस्त दानवोंका संहार कर डाला, जो वज्रपाणि इन्द्रके द्वारा मारे जाने योग्य थे ॥ १७ ॥

स विप्रणष्टां देवानां परमश्रीः श्रियं वशी।
निहत्य दानवान् सर्वानाजहार रजिः प्रभुः ॥ १८ ॥

मनको वशमे रखनेवाले परमकान्तिमान् एवं शक्तिशाली राजा रजिने समस्त दानवोंका संहार करके देवताओँकी खोयी हुई सम्पत्तिको फिर वापस ला दिया ॥ १८ ॥

ततो रजिं महावीर्यं देवैः सह शतक्रतुः।
रजेः पुत्रोऽहमित्युक्त्वा पुनरेवाब्रवीद् वचः ॥ १९ ॥

तब देवताओंसहित इन्द्रने अपनेको रजिका पुत्र बताकर उन महापराक्रमी रजिसे पुनः इस प्रकार कहा— ॥ १९ ॥

इन्द्रोऽसि तात देवानां सर्वेषां नात्र संशयः।
यस्याहमिन्द्रः पुत्रस्ते ख्यातिं यास्यामि कर्मभिः ॥ २० ॥

'तात ! आप हम सब देवताओँके इन्द्र हैं, इसमें संशय नहीं है; क्योंकि मैं इन्द्र आजसे आपके इन वीरोचित कर्मोंद्वारा अनुगृहीत हो आपका पुत्र कहलाऊँगा। आपके पुत्र-रूपमें ही मेरी ख्याति होगी' ॥ २० ॥

स तु शक्रवचः श्रुत्वा वञ्चितस्तेन मायया।
तथेत्येवाब्रवीद् राजा प्रीयमाणः शतक्रतुम् ॥ २१ ॥

इन्द्रकी यह बात सुनकर उनकी मायासे वञ्चित हो महाराज रजिने 'तथास्तु' कह दिया। वे इन्द्रपर बहुत प्रसन्न थे ॥ २१ ॥

तस्मिंस्तु देवसदृशे दिवं प्राप्ते महीपतौ।
दायाद्यमिन्द्रादाजह्रुराचारात् तनया रजेः ॥ २२ ॥

उन देवोपम भूपाल रजिंके ब्रह्मलोकवासी हो जानेपर उनके पुत्रोंने लोकव्यवहारके अनुसार इन्द्रसे अपना दायभाग माँगा और बलपूर्वक ले लिया ॥ २२ ॥

पञ्चपुत्रशतान्यस्य तद्वै स्थानं शतक्रतोः।
समाक्रमन्त बहुधा स्वर्गलोकं त्रिविष्टपम् ॥ २३ ॥

रजिका पाँच सौ पुत्र थे। उन्होंने इन्द्रके त्रिविष्टप नामसे प्रसिद्ध स्वर्गलोकपर बारंबार आक्रमण करके उसे ले लिया ॥ २३ ॥

ततो बहुतिथे काले समतीते महाबलः।
हृतराज्योऽब्रवीच्छक्रो हृतभागो बृहस्पतिम् ॥ २४ ॥

तदनन्तर बहुत समय बीत जानेपर राज्य और यज्ञभाग-से वञ्चित हो अत्यन्त दुर्बल हुए इन्द्रने एक दिन एकान्तमें बृहस्पतिजीसे कहा ॥ २४ ॥

९८श्रीमहाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

इन्द्र उवाच

बदरीफलमात्रं वै पुरोडाशं विधत्स्व मे।
ब्रह्मर्षे येन तिष्ठेयं तेजसाऽऽप्यायितः सदा ॥ २५ ॥

इन्द्र बोले—ब्रह्मर्षे ! आप एक बेरके बराबर भी पुरोडाशखण्डकी व्यवस्था मेरे लिये कर दें, जिससे मैं भी सदा तेजसे परिपुष्ट होता रहूँ ॥ २५ ॥

ब्रह्मन् कृशोऽहं विमना हृतराज्यो हृताशनः ।
हतौजा दुर्बलो मूढो रजिपुत्रैः कृतः प्रभो ॥ २६ ॥

ब्रह्मन् ! प्रभो ! रजिके पुत्रोंने मेरा राज्य और भोजन छीनकर मुझे अत्यन्त कृश, खिन्नचित्त, हतोत्साह, दुर्बल एवं मूढ़ बना दिया है ॥ २६ ॥

बृहस्पतिरुवाच

यद्येवं चोदितः शक्र त्वयास्यां पूर्वमेव हि ।
नाभविष्यत्त्वत्प्रियार्थमकर्तव्यं ममानघ ॥ २७ ॥

बृहस्पतिजीने कहा—निष्पाप इन्द्र ! यदि ऐसी बात है तो तुम्हें मुझसे पहले ही यह कहना चाहिये था। तुम्हारा प्रिय करनेके लिये ऐसा कोई कार्य नहीं है, जो मैं न कर सकूँ ॥ २७ ॥

प्रयतिष्यामि देवेन्द्र त्वत्प्रियार्थे न संशयः ।
यथा भागं च राज्यं च नचिरात्प्रतिलप्स्यसे ॥ २८ ॥

देवेन्द्र ! मैं तुम्हारे प्रिय मनोरथकी सिद्धिके लिये निःसंदेह ऐसा प्रयत्न करूँगा, जिससे तुम अपना राज्य और यज्ञभाग शीघ्र प्राप्त कर लोगे ॥ २८ ॥

तथा तात करिष्यामि मा भूत् ते विक्लवं मनः ।
ततः कर्म चकारास्य तेजसो वर्धनं तदा ॥ २९ ॥

तात ! तुम जैसा चाहते हो वैसा ही करूँगा। तुम्हारा मन व्याकुल न हो। ऐसा कहकर बृहस्पतिजीने उस समय इन्द्रके तेजको बढ़ानेवाले कर्मका अनुष्ठान किया ॥ २९ ॥

तेषां च बुद्धिसम्मोहमकरोद् द्विजसत्तमः ।
नास्तिकादार्थशास्त्रं हि धर्मविद्वेषणं परम् ॥ ३० ॥

द्विजश्रेष्ठ बृहस्पतिने रजिके पुत्रोंकी बुद्धिमें मोह उत्पन्न करनेके लिये ऐसे शास्त्रका निर्माण किया, जो नास्तिकवादसे परिपूर्ण तथा धर्मके प्रति अत्यन्त द्वेष उत्पन्न करनेवाला था ॥ ३० ॥

परमं तर्कशास्त्राणामसतां तन्मनोऽनुगम् ।
न हि धर्मप्रधानानां रोचते तत्कथान्तरे ॥ ३१ ॥

केवल तर्कके आधारपर अपने सिद्धान्तका प्रतिपादन करनेवाले शास्त्रोंमें वह उत्कृष्ट माना गया है। बृहस्पतिका वह नास्तिक दर्शन दुष्ट पुरुषोंके ही मनको अधिक भाता है। धर्मप्रधान पुरुषोंको बातचीतके प्रसंगमें भी उसकी चर्चा नहीं सुहाती है ॥ ३१ ॥

ते तद् वृहस्पतिकृतं शास्त्रं श्रुत्वाल्पचेतसः ।
पूर्वोक्तधर्मशास्त्राणामभवन् द्वेषिणः सदा ॥ ३२ ॥

बृहस्पतिके उस शास्त्रको सुनकर वे मन्दबुद्धि रजिपुत्र पहलेके धर्मशास्त्रोंसे सदा द्वेष रखने लगे ॥ ३२ ॥

प्रवक्तुर्न्यायरहितं तन्मतं बहु मेनिरे ।
तेनाधर्मेण ते पापाः सर्व एव क्षयं गताः ॥ ३३ ॥

वक्ताका वह न्यायरहित मत उन्हें बहुत उत्तम जान पड़ने लगा। उसी अधर्मसे वे सब पापी नष्ट हो गये ॥ ३३ ॥

त्रैलोक्यराज्यं शक्रस्तु प्राप्य दुष्प्रापमेव च ।
बृहस्पतिप्रसादाद्धि परां निर्वृतिरभ्ययात् ॥ ३४ ॥

इस तरह बृहस्पतिकी कृपासे त्रिलोकीका वह दुर्लभ राज्य पाकर इन्द्र बड़े प्रसन्न हुए ॥ ३४ ॥

ते यदा तु सुसम्भूढा रागोन्मत्ता विधर्मिणः ।
ब्रह्मद्विषश्च संवृत्ता हतवीर्यपराक्रमाः ॥ ३५ ॥
ततो लेभे सुरैश्वर्यमिन्द्रः स्थानं तथोत्तमम् ।
हत्वा रजिसुतान् सर्वान् कामक्रोधपरायणान् ॥ ३६ ॥

वे रजिके पुत्र जब नास्तिकवादका आश्रय ले विवेकशून्य, रागोन्मत्त, धर्मके विपरीत चलनेवाले, ब्रह्मद्रोही, शक्तिहीन और पराक्रमशून्य हो गये, तब काम-क्रोधमें तत्पर रहनेवाले उन समस्त रजिपुत्रोंको मारकर इन्द्रने देवताओंका ऐश्वर्य और उत्तम स्थान प्राप्त कर लिया ॥ ३५-३६ ॥

य इदं च्यावनं स्थानात् प्रतिष्ठां च शतक्रतोः ।
शृणुयाद् धारयेद्वापि न स दौरात्म्यमाप्नुयात् ॥ ३७ ॥

जो इन्द्रके अपने स्थानसे भ्रष्ट होने और पुनः उसपर प्रतिष्ठित होनेके इस प्रसङ्गको सुनता और अपने हृदयमें धारण करता है, उसके मनमें कभी दुर्भावना नहीं आती ॥ ३७ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे हरिवंशपर्वणि आयोर्वंशकीर्तनं नामाष्टाविंशोऽध्यायः ॥ २८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत हरिवंशपर्वमें आयुके वंशका वर्णनविषयक अट्ठाईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २८ ॥

हरिवंशपर्व ] एकोनत्रिंशोऽध्यायः ९९


एकोनत्रिंशोऽध्यायः

अनेनाके वंशका वर्णन, धन्वन्तरिका काशिराज धन्वके यहाँ पुत्ररूपमें अवतार, दिवोदासके राज्यकालमें भगवान् शिवकी आज्ञासे गणेश्वर निकुम्भके द्वारा वाराणसीको जनशून्य बनानेका प्रयत्न, वहाँ शिव और पार्वतीका निवास, दिवोदासका वाराणसीपर अधिकार और अलर्ककी प्रशंसा

वैशम्पायन उवाच
रम्भोऽनपत्यस्त्वासीद् वंशं वक्ष्याम्यनेनसः ।
अनेनसः सुतो राजा प्रतिक्षत्रो महायशाः ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! आयुपुत्र रम्भके कोई संतान नहीं हुई। अब मैं अनेनाके वंशका वर्णन करूँगा। अनेनाके पुत्र महायशस्वी राजा प्रतिक्षत्र हुए ॥ १ ॥

प्रतिक्षत्रसुतश्चापि सञ्जयो नाम विश्रुतः।
सञ्जयस्य जयः पुत्रो विजयस्तस्य चात्मजः ॥ २ ॥

प्रतिक्षत्रके पुत्र सञ्जय नामसे विख्यात हुए। सञ्जयके पुत्र जय और जयके पुत्र विजय हुए ॥ २ ॥

विजयस्य कृतिः पुत्रस्तस्य हर्यश्वतः सुतः।
हर्यश्वतसुतो राजा सहदेवः प्रतापवान् ॥ ३ ॥

विजयके पुत्र कृति, कृतिके हर्यश्व और हर्यश्वके पुत्र प्रतापी राजा सहदेव हुए ॥ ३ ॥

सहदेवस्य धर्मात्मा नदीन इति विश्रुतः।
नदीनस्य जयत्सेनो जयत्सेनस्य संकृतिः ॥ ४ ॥

सहदेवका धर्मात्मा पुत्र नदीन नामसे विख्यात हुआ। नदीनका पुत्र जयत्सेन और जयत्सेनका संकृति था ॥ ४ ॥

संकृतेरपि धर्मात्मा क्षत्रधर्मा महायशाः।
अनेनसः समाख्याताः क्षत्रवृद्धस्य मे श्रृणु ॥ ५ ॥

संकृतिके पुत्र महायशस्वी धर्मात्मा क्षत्रधर्मा हुए। यहाँ-तक अनेनाके पुत्रोंका वर्णन हुआ। अब मुझसे क्षत्रवृद्धकी संततिका वर्णन सुनो ॥ ५ ॥

क्षत्रवृद्धात्मजस्तत्र सुनहोत्रो महायशाः ।
सुनहोत्रस्य दायादास्त्रयः परमधार्मिकाः ॥ ६ ॥
काशः शलश्च द्वावेतौ तथा गृत्समदः प्रभुः।
पुत्रो गृत्समदस्यापि शुनको यस्य शौनकाः ॥ ७ ॥

क्षत्रवृद्धके पुत्र महायशस्वी सुनहोत्र हुए। सुनहोत्रके परम धार्मिक तीन पुत्र थे—काश, शल और प्रभावशाली गृत्समद। गृत्समदके पुत्र शौनक हुए, जिससे शौनक-वंशका विस्तार हुआ ॥ ६-७ ॥

ब्राह्मणाः क्षत्रियाश्चैव वैश्याः शूद्रास्तथैव च।
शालात्मजश्चार्ष्टिषेणस्तनयस्तस्य काशकः ॥ ८ ॥

शौनक-वंशमें ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र सभी वर्णोंके लोग हुए। शलके पुत्रका नाम आर्ष्टिषेण था। उनके पुत्र काशक हुए ॥ ८ ॥

काशस्य काशयो राजन् पुत्रो दीर्घतपास्तथा।
धन्वस्तु दीर्घतपसो विद्वान् धन्वन्तरिस्ततः ॥ ९ ॥

राजन्! काशके वंशज (पुत्र) काशि कहलाये। इनमें दीर्घतपा सबसे प्रथम पुत्र थे। दीर्घतपाके धन्व और धन्व-से विद्वान् धन्वन्तरिका प्रादुर्भाव हुआ ॥ ९ ॥

तपसोऽन्ते सुमहतो जातो वृद्धस्य धीमतः।
पुनर्धन्वन्तरिर्देवो मानुषेष्विह जज्ञिवान् ॥ १० ॥

अपनी महान् तपस्या पूरी करके अन्तमें धन्वन्तरि देवने बुद्धिमान् एवं वृद्ध राजा धन्वके यहाँ इस मनुष्यरूपमें पुनः जन्म ग्रहण किया ॥ १० ॥

जनमेजय उवाच
कथं धन्वन्तरिर्देवो मानुषेष्विह जज्ञिवान्।
एतद् वेदितुमिच्छामि तन्मे ब्रूहि यथातथम् ॥ ११ ॥

जनमेजयने पूछा—ब्रह्मन् ! धन्वन्तरि देव इस मनुष्य-लोकमें किस प्रकार उत्पन्न हुए? यह मैं जानना चाहता हूँ। अतः यह प्रसङ्ग मुझे ठीक-ठीक बताइये ॥ ११ ॥

वैशम्पायन उवाच
धन्वन्तरेः सम्भवोऽयं श्रूयतां भरतर्षभ ।
जातः स हि समुद्रात्तु मथ्यमाने पुरामृते ॥ १२ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं--भरतश्रेष्ठ ! धन्वन्तरिके जन्मका यह प्रसङ्ग सुनो। वे पूर्वकालमें अमृतमन्थनके समय समुद्रसे प्रकट हुए थे ॥ १२ ॥

उत्पन्नः कलशात् पूर्वं सर्वतश्च श्रिया वृतः।
अभ्यसन् सिद्धिकार्यं हि विष्णुं दृष्ट्वा हि तस्थिवान् ॥ १३॥

पहले जब वे समुद्रसे प्रकट हुए, उस समय भगवान् विष्णुके नामोंका जप और आरोग्य-साधक कार्यका चिन्तन करते हुए सब ओरसे दिव्य कान्तिसे प्रकाशित हो रहे थे। वे अपने सामने भगवान् विष्णुको देखकर खड़े हो गये ॥

अब्जस्त्वमिति होवाच तस्मादब्जस्तु स स्मृतः।
अब्जः प्रोवाच विष्णुं वै तव पुत्रोऽस्मि वै प्रभो ॥ १४ ॥
विधत्स्व भागं स्थानं च मम लोके सुरेश्वर।
एवमुक्तः स दृष्ट्वा वै तथ्यं प्रोवाच तं प्रभुः ॥ १५ ॥

१००श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

भगवान् विष्णुने उनसे कहा—'तुम अप् अर्थात् जलसे प्रकट हुए हो, इसलिये अब्ज हो।' उनके ऐसा कहनेसे वे अब्ज कहलाने लगे । उस समय अब्जने भगवान् विष्णुसे कहा—'प्रभो ! मैं आपका पुत्र हूँ। सुरेश्वर ! मेरे लिये यज्ञभागकी व्यवस्था कीजिये और लोकमें मेरे लिये कोई स्थान दीजिये।' उनके ऐसा कहनेपर भगवान् विष्णुने उनकी ओर देखकर यह यथार्थ बात कही—॥ १४-१५ ॥

कृतो यज्ञविभागो हि यज्ञियैर्हि सुरैः पुरा।
देवेषु विनियुक्तं हि विद्धि होत्रं महर्षिभिः॥ १६॥

'पूर्वकालमें यज्ञसम्बन्धी देवताओंने यज्ञका विभाग कर लिया है। महर्षियोंने हवनीय पदार्थोंका देवताओंके लिये ही विनियोग किया है। इस बातको तुम अच्छी तरह समझ लो ॥

न शक्यमुपहोमा यै तुभ्यं कर्तुं कदाचन।
अर्वाग्भूतोऽसि देवानां पुत्र त्वं तु नहीश्वरः ॥ १७ ॥

'बेटा ! तुम्हें छोटे-मोटे उपहोम कभी नहीं अर्पित किये जा सकते (क्योंकि वे तुम्हारे योग्य नहीं हैं)। तुम देवताओंसे पीछे उत्पन्न हुए हो। अतः तुम्हारे लिये वेद-विरुद्ध यज्ञभागकी कल्पना नहीं की जा सकती और वैदिक यज्ञभाग पानेके तुम अधिकारी नहीं हो ॥ १७ ॥

द्वितीयायां तु सम्भूतौ लोके ख्यातिं गमिष्यसि।
अणिमादिश्च ते सिद्धिर्गर्भस्थस्य भविष्यति ॥ १८॥

'दूसरे जन्ममें तुम संसारमें विख्यात होओगे। वहाँ गर्भावस्थामें ही तुम्हें अणिमा आदि सिद्धि प्राप्त हो जायगी ॥ १८॥

तेनैव त्वं शरीरेण देवत्वं प्राप्स्यसे प्रभो।
चरुमन्त्रैर्यतैर्जप्यैर्यक्ष्यन्ति त्वां द्विजातयः ॥ १९॥

'प्रभो ! तुम उसी शरीरसे देवत्व प्राप्त कर लोगे और ब्राह्मणलोग चरु, मन्त्र, व्रत एवं जपनीय मन्त्रोंद्वारा तुम्हारा यजन करेंगे ॥ १९ ॥

अष्टधा त्वं पुनश्चैवमायुर्वेदं विधास्यसि।
अवश्यभावी ह्यर्थोऽयं प्राग्दृष्टस्त्वब्जयोनिना ॥ २०॥

'फिर तुम उस जन्ममें आयुर्वेदको आठ भागोंमें विभक्त करके उसे आठ अङ्गोंसे युक्त * बना दोगे, यह बात अवश्य होनेवाली है। कमलयोनि ब्रह्माजीने इसे पहलेसे ही देख लिया है ॥ २० ॥

तृतीयं द्वापरं प्राप्य भविता त्वं न संशयः।
इमं तस्मै वरं दत्त्वा विष्णुरन्तर्दधे पुनः ॥ २१ ॥

'दूसरा द्वापर आनेपर तुम संसारमें प्रकट होओगे, इसमें संशय नहीं है।' धन्वन्तरिको यह वर देकर भगवान् विष्णु फिर अन्तर्धान हो गये ॥ २१ ॥

द्वितीये द्वापरं प्राप्ते सौनहोत्रिः स काशिराट्।
पुत्रकामस्तपस्तेपे धन्वो दीर्घं तपस्तदा ॥ २२॥

जब दूसरा द्वापर आया, तब सुनहोत्रके पुत्र काशिराज धन्व पुत्रकी कामनासे दीर्घकालीन तपस्या करने लगे ॥ २२ ॥

प्रपद्ये देवतां तां तु या मे पुत्रं प्रदास्यति।
अब्जं देवं घृतार्थाय तदाऽऽराधितवान् नृपः ॥ २३ ॥

उन्होंने मन-ही-मन सोचा कि 'मैं उस देवताकी शरण लूँ, जो मुझे पुत्र प्रदान करेगा।' ऐसा विचारकर राजाने पुत्रके लिये अब्जदेव (भगवान् धन्वन्तरि) की आराधना की ॥ २३ ॥

ततस्तुष्टः स भगवानब्जः प्रोवाच तं नृपम्।
यदिच्छसि वरं ब्रूहि तत् ते दास्यामि सुव्रत ॥ २४ ॥

उस आराधनासे संतुष्ट होकर भगवान् अब्ज राजा धन्वसे बोले—'उत्तम व्रतका पालन करनेवाले नरेश ! तुम जो वर प्राप्त करना चाहते हो, उसे बताओ। वह मैं तुम्हें दूँगा' ॥

नृप उवाच
भगवन् यदि तुष्टस्त्वं पुत्रो मे ख्यातिमान् भव।
तथेति समुक्त्वाय तत्रैवान्तरधीयत ॥ २५ ॥

राजा बोले—भगवन् ! यदि आप मुझसे संतुष्ट हैं तो मेरे पुत्र हो जायें और इसी रूपमें आपकी ख्याति हो । तब 'तथास्तु' कहकर भगवान् धन्वन्तरि वहीं अन्तर्धान हो गये ॥

तस्य गेहे समुत्पन्नो देवो धन्वन्तरिस्तदा।
काशिराजो महाराज सर्व्ररोगप्रणाशनः ॥ २६ ॥

महाराज ! तदनन्तर धन्वन्तरिदेव धन्वके घरमें अवतीर्ण हुए । काशिराज धन्वन्तरि समस्त रोगोंका नाश करनेमें समर्थ थे ॥ २६ ॥


*-वैद्यकमें आयुर्वेदके आठ अङ्ग इस प्रकार बताये गये हैं—

कायबालग्रहोर्ध्वाङ्गशल्यदंष्ट्राजरावृषान् ।
अष्टावङ्गानि तस्याहुश्चिकित्सा येषु संश्रिता ॥

१-कायचिकित्सा, २-बालचिकित्सा, ३-ग्रहचिकित्सा, ४-ऊर्ध्वाङ्गचिकित्सा, ५-शल्यचिकित्सा, ६-दंष्ट्राचिकित्सा, ७-जराचिकित्सा और ८-वृषचिकित्सा—ये आठ प्रकारकी चिकित्साएँ हैं । पूर्वोक्त काय, बाल आदि जो आठ अङ्ग हैं, उनपर ही चिकित्सा अवलम्बित होती है। शारीरिक रोगोंके निदान और उपचारको कायचिकित्सा कहते हैं। बालकोंके रोगोंका विचार और उन्हें दूर करनेके उपाय आदि बालचिकित्साके अन्तर्गत हैं। भूत, प्रेत, पिशाच आदिके आवेशसे होनेवाली पीड़ाको समझना और विभिन्न प्रकारके उपचारोंद्वारा उसे दूर करना ग्रहचिकित्सा है। सिर, नेत्र आदि ऊपरके अङ्गोंकी बीमारीको दूर करनेकी चेष्टा एवं विधि ऊर्ध्वाङ्गचिकित्सा कहलाती है। अस्त्र-शस्त्रोंके आघात आदिसे होनेवाले घावको चीर-फाड़कर ठीक करनेकी जो क्रिया है, उसे शल्य-चिकित्सा कहते हैं। सर्पदंशन आदि जङ्गम तथा अफीम आदि स्थावर विषको दूर करनेका उपचार दंष्ट्राचिकित्सा है। रसायन आदिके द्वारा बुढ़ापाको रोकना या उसे दूर करना जराचिकित्सा है। वाजीकरण तन्त्रको ही वृषचिकित्सा कहते हैं।

हरिवंशपर्व ] [ एकोनत्रिंशोऽध्यायः १०१

आयुर्वेदं भरद्वाजात् प्राप्येह भिषजां क्रियाम् । तमष्टधा पुनर्व्यस्य शिष्येभ्यः प्रत्यपादयत् ॥ २७ ॥ उन्होंने मुनिवर भरद्वाजसे आयुर्वेद तथा चिकित्साकर्मका ज्ञान प्राप्त करके उसे आठ भागोंमें विभक्त किया और उन सबकी विस्तृत विवेचना की । फिर बहुतसे शिष्योंको उस अष्टाङ्गयुक्त आयुर्वेदकी शिक्षा दी ॥ २७ ॥

धन्वन्तरेस्तु तनयः केतुमानिति विश्रुतः । अथ केतुमतः पुत्रो वीरो भीमरथः स्मृतः ॥ २८ ॥ धन्वन्तरिके पुत्र केतुमान् नामसे विख्यात हुए । केतुमान्के वीर पुत्रका नाम भीमरथ था ॥ २८ ॥

सुतो भीमरथस्यापि दिवोदासः प्रजेश्वरः । दिवोदासस्तु धर्मात्मा वाराणस्यधिपोऽभवत् ॥ २९ ॥ भीमरथके पुत्र धर्मात्मा राजा दिवोदास हुए, जो वाराणसीपुरीके स्वामी थे ॥ २९ ॥

एतस्मिन्नेव काले तु पुरीं वाराणसीं नृप । शून्यां निवासयामास क्षेमको नाम राक्षसः ॥ ३० ॥ नरेश्वर ! राजा दिवोदासके राज्यकालमें ही शापवश वाराणसीपुरी जनशून्य हो गयी थी, जिसे पीछे भगवान् रुद्रके अनुचर क्षेमक नामक राक्षसने बसाया था ॥ ३० ॥

शप्ता हि सा मतिमता निकुम्भेन महात्मना । शून्या वर्षसहस्रं वै भविष्री नात्र संशयः ॥ ३१ ॥ भगवान् रुद्रके पार्षद बुद्धिमान् महात्मा निकुम्भने यह शाप दे दिया था कि 'वाराणसीपुरी एक हजार वर्षांतक जनशून्य बनी रहेगी । इसमें संशय नहीं है' ॥ ३१ ॥

तस्यां तु शप्तमात्रायां दिवोदासः प्रजेश्वरः । विषयान्ते पुरीं रम्यां गोमत्यां संन्यवेशयत् ॥ ३२ ॥ उस पुरीके शापग्रस्त हो जानेपर राजा दिवोदासने अपने राज्यकी सीमापर गोमती नदीके किनारे एक रमणीय नगरी बसायी ॥ ३२ ॥

भद्रश्रेण्यस्य पूर्वं तु पुरी वाराणसीत्यभूत् । भद्रश्रेण्यस्य पुत्राणां शतमुत्तमधन्विनाम् ॥ ३३ ॥ हत्वा निवेशयामास दिवोदासो नरर्षभः । भद्रश्रेण्यस्य तद् राज्यं हृतं तेन बलीयसा ॥ ३४ ॥ पहले वाराणसीपुरी (यदुवंशी महिष्मान्‌के पुत्र) भद्रश्रेण्यके अधिकारमें थी । भद्रश्रेण्यके सौ पुत्र थे, जो श्रेष्ठ धनुर्धर माने जाते थे नरश्रेष्ठ दिवोदासने उन सबको मारकर वहाँ अपना राज्य स्थापित किया । उन महाबली नरेशने भद्रश्रेण्यके उस राज्यका बलपूर्वक अपहरण कर लिया ॥ ३३-३४ ॥

जनमेजय उवाच वाराणसीं निकुम्भस्तु किमर्थं शप्तवान् प्रभुः । निकुम्भकश्च धर्मात्मा सिद्धिक्षेत्रं शशाप यः ॥ ३५ ॥ जनमेजयने पूछा—मुने ! वाराणसी तो सिद्धिक्षेत्र (मोक्षधाम) है और प्रभावशाली निकुम्भ बड़े धर्मात्मा हैं। फिर उन्होंने उस पुरीको शाप किस लिये दिया ? ॥ ३५ ॥

वैशम्पायन उवाच दिवोदासस्तु राजर्षिर्नगरीं प्राप्य पार्थिवः । वसति स्म महातेजाः स्फीतायां तु नराधिपः ॥ ३६ ॥ वैशम्पायनजीने कहा—राजन् ! महातेजस्वी, नरेश्वर राजर्षि दिवोदास वाराणसी नगरीको पाकर वहाँके राजा हो गये । वे उस समृद्धिशालिनी नगरीमें सदा ही निवास करते थे ॥ ३६ ॥

एतस्मिन्नेव काले तु कृतदारो महेश्वरः । देव्याः स प्रियकामस्तु न्यवसच्छ्वशुरान्तिके ॥ ३७ ॥ इन्हीं दिनों भगवान् शङ्कर विवाह करके देवी पार्वतीका प्रिय करनेकी इच्छासे अपने श्वशुरके पास ही निवास करते थे ॥ ३७ ॥

देवाज्ञया पार्षदा ये त्वधिरूपास्तपोधनाः । पूर्वोक्तैरुपदेशैश्च तोषयन्ति स्म पार्वतीम् ॥ ३८ ॥ उस समय महादेवजीकी आज्ञासे उनके सुयोग्य पार्षद, जो तपस्याके धनी थे, उनके पहले दिये हुए उपदेशके अनुसार पार्वतीदेवीको संतुष्ट करते रहते थे ॥ ३८ ॥

हृष्यते चै महादेवी मेना नैव प्रहृष्यति । जुगुप्सत्यसकृत् तां वै देवीं देवं तथैव सा ॥ ३९ ॥ इससे महादेवी पार्वती तो प्रसन्न रहती थीं, परंतु उनकी माता मेनाको संतोष नहीं होता था । वे महादेवी पार्वती तथा भगवान् शङ्करकी बारंबार निन्दा ही करती थीं ॥ ३९ ॥

सपार्षदस्त्वनाचारस्तव भर्ता महेश्वरः । दरिद्रः सर्वदैवासौ शीलं तस्य न वर्तते ॥ ४० ॥ उन्होंने एक दिन कहा—'उमे ! तेरे पति महादेव और उनके पार्षद सभी अनाचारी हैं । साथ ही वे भोलेनाथ सदाके दरिद्र हैं । शील तो उनमें नाममात्रको भी नहीं है' ॥ ४० ॥

मात्रा तथोक्ता वरदा स्त्रीस्वभावान्न चुक्रुधे । स्मितं कृत्वा च वरदा भवपार्श्वमथागमत् ॥ ४१ ॥ वरदायिनी उमा माताके ऐसा कहनेपर स्त्रीस्वभाववश कुपित हो उठीं और किंचित् मुसकराकर महादेवजीके पास आयीं ॥ ४१ ॥

विवर्णवदना देवी महादेवमभाषत । नेह वत्स्याम्यहं देव नय मां स्वं निकेतनम् ॥ ४२ ॥

१७२ श्रीमहाभारते खिलभागे [ हरिवंशे

उस समय उनका मुख मलिन हो रहा था। निकट आकर देवीने महादेवजीसे कहा—'देव ! अब मैं यहाँ (नैहरमें) नहीं रहूँगी। आप मुझे अपने घर ले चलें' ॥ ४२ ॥

तथा कर्तुं महादेवः सर्वलोकानवैक्षत । वासार्थं रोचयामास पृथिव्यां कुरुनन्दन ॥ ४३ ॥ वाराणसीं महातेजाः सिद्धिक्षेत्रं महेश्वरः ।

कुरूनन्दन ! पार्वतीजीके कथनानुसार कार्य करनेके लिये महादेवजीने सम्पूर्ण लोकोंपर दृष्टिपात किया। उन महातेजस्वी महेश्वरने पृथ्वीपर अपने रहनेके लिये सिद्धिक्षेत्र वाराणसीपुरीको पसंद किया ॥ ४३½ ॥

दिवोदासेन तां ज्ञात्वा निविष्टां नगरीं भवः ॥ ४४ ॥ पार्श्वे तिष्ठन्तमाहूय निकुम्भमिदमब्रवीत् ।

परंतु उस नगरीमें राजा दिवोदास निवास करते हैं, यह जानकर महादेवजीने अपने पास खड़े हुए निकुम्भसे इस प्रकार कहा—॥ ४४½ ॥

गणेश्वर पुरीं गत्वा शून्यां वाराणसीं कुरु ॥ ४५ ॥ मृदुनैवाभ्युपायेन ह्यतिवीर्यः स पार्थिवः ।

'गणेश्वर ! तुम जाकर वाराणसीपुरीको मनुष्योंसे सूनी कर दो; परंतु इसके लिये कोमल उपायसे ही काम लेना, क्योंकि वे राजा दिवोदास बड़े बलवान् हैं' ॥ ४५½ ॥

ततो गत्वा निकुम्भस्तु पुरीं वाराणसीं तदा ॥ ४६ ॥ स्वप्ने निदर्शयामास कण्डुकं नाम नापितम् । श्रेयस्तेऽहं करिष्यामि स्थानं मे रोचयानघ ॥ ४७ ॥ मद्रूपां प्रतिमां कृत्वा नगरान्ते तथैव च । ततः स्वप्ने यथोद्दिष्टं सर्वं कारितवान् नृप ॥ ४८ ॥

तब निकुम्भने वाराणसीपुरीमें जाकर कण्डुक नाईको स्वप्नमें दर्शन दिया और कहा—'अनघ ! तू नगरकी सीमापर मेरी प्रतिमा बनाकर मेरे लिये निवासस्थानकी व्यवस्था कर। ऐसा करनेसे मैं तेरा कल्याण करूँगा।' नरेश्वर ! तब उस नाईने स्वप्नमें जैसा कहा गया था उसके अनुसार सब कुछ किया और कराया ॥ ४६–४८ ॥

पुरीद्वारे तु विज्ञाप्य राजानं च यथाविधि । पूजां तु महतीं तस्य नित्यमेव प्रयोजयत् ॥ ४९ ॥

राजाको सूचना देकर उसने नगरके द्वारपर विधिपूर्वक निकुम्भ-प्रतिमाकी स्थापना की । फिर वह प्रतिदिन बड़े समारोहके साथ उस प्रतिमाकी पूजा करने लगा ॥ ४९ ॥

गन्धैश्च धूपमाल्यैश्च प्रोक्षणीयैस्तथैव च । अन्नपानप्रयोगैश्च अत्यद्भुतमिवाभवत् ॥ ५० ॥

गन्ध, पुष्प, माला, धूप, प्रोक्षणीय जल तथा अन्न-पान आदि अर्पण करके वह नाई निकुम्भकी पूजा करता था। यह वहाँ अत्यन्त अद्भुत-सी बात हुई ॥ ५० ॥

एवं सम्पूज्यते तत्र नित्यमेव गणेश्वरः । ततो वरसहस्रं तु नागराणां प्रयच्छति । पुत्रान् हिरण्यमायुश्च सर्वान् कामांस्तथैव च ॥ ५१ ॥

इस प्रकार वहाँ नित्य ही निकुम्भनामक गणेशकी पूजा होती और वे नागरिकोंको सहस्रों वर प्रदान करते थे । पुत्र, सुवर्ण, आयु तथा सम्पूर्ण मनोवाञ्छित वस्तुएँ सबको देते थे ॥ ५१ ॥

राज्ञस्तु महिषी श्रेष्ठा सुयशा नाम विश्रुता । पुत्रार्थमागता देवी साध्वी राज्ञा प्रचोदिता ॥ ५२ ॥

राजा दिवोदासकी श्रेष्ठ महारानी सुयशा नामसे विख्यात थीं। राजाकी आज्ञा लेकर वे साध्वी महारानी पुत्रकी कामनासे वहाँ आयीं ॥ ५२ ॥

पूजां तु विपुलां कृत्वा देवी पुत्रमयाचत । पुनः पुनरथागत्य बहुशः पुत्रकारणात् ॥ ५३ ॥

वहाँ जाकर बड़े विस्तारके साथ पूजा करके देवी सुयशाने निकुम्भसे पुत्रके लिये याचना की । उन्होंने बारंबार आकर पूजन किया और अनेक बार पुत्रके लिये प्रार्थना की ॥ ५३ ॥

न प्रयच्छति पुत्रं हि निकुम्भः कारणेन हि । राजा तु यदि नः क्रुध्येत् कार्यसिद्धिस्ततो भवेत् ॥ ५४ ॥

परंतु निकुम्भ कारणवश उन्हें पुत्र नहीं देते थे। उन्होंने सोचा—'यदि राजा किसी तरह हमपर कुपित हो जाय तो हमारा काम बन जाय' ॥ ५४ ॥

अथ दीर्घेण कालेन क्रोधो राजानमाविशत् । भूत एष महान् द्वारि नागराणां प्रयच्छति ॥ ५५ ॥ प्रीतो वरान् वै शतशो मम किं न प्रयच्छति । मामकैः पूज्यते नित्यं नगर्यो मे सदैव हि ॥ ५६ ॥ विज्ञापितो मयात्यर्थं देव्या मे पुत्रकारणात् । न ददाति च पुत्रं मे कृतघ्नः केन हेतुना ॥ ५७ ॥ ततो नार्हति सत्कारं मत्सकाशाद् विशेषतः । तस्मात्तु नाशयिष्यामि स्थानमस्य दुरात्मनः ॥ ५८ ॥

तदनन्तर दीर्घकालके पश्चात् राजाके मनमें क्रोध हुआ। वे सोचने लगे—'मेरे नगरके द्वारपर बैठा हुआ यह महान् भूत प्रसन्न होकर नागरिकोंको सैकड़ों प्रकारके वर देता है, परंतु मुझे क्यों नहीं देता ? सदा मेरी ही नगरीमें, मेरे ही लोग इसकी नित्य पूजा करते हैं। मैंने भी देवीको पुत्र प्रदान करनेके लिये बार-बार निवेदन किया; परंतु यह कृतघ्न न जाने किस कारणसे मुझे पुत्र नहीं दे रहा है। अतः अब यह विशेषतः मुझसे सत्कार पानेके योग्य नहीं रहा। इसलिये इस दुरात्माके स्थानका मैं नाश कर दूँगा' ॥ ५५–५८ ॥

एवं स तु विनिश्चित्य दुरात्मा राजकिल्बिषी । स्थानं गणपतेस्तस्य नाशयामास दुर्मतिः ॥ ५९ ॥

हरिवंशपर्व ] एकोनत्रिंशोऽध्यायः १०३

ऐसा निश्चय करके दुरात्मा, दुर्बुद्धि एवं पापी राजाने गणपति निकुम्भके उस स्थानको नष्ट करा दिया ॥ ५९ ॥

भग्नमायतनं दृष्ट्वा राजानमशपत् प्रभुः ।
यस्मादनपराधस्य त्वया स्थानं विनाशितम् ।
पुर्यकस्मादियं शून्या तव नूनं भविष्यति ॥ ६० ॥

अपने वासस्थानको भग्न हुआ देख भगवान् निकुम्भने राजाको शाप देते हुए कहा—'राजन् ! तुमने बिना किसी अपराधके मेरे स्थानको नष्ट कराया है, इसलिये निश्चय ही तुम्हारी यह नगरी अकस्मात् जनशून्य हो जायगी' ॥ ६० ॥

ततस्तेन तु शापेन शून्या वाराणसी तदा ।
शप्त्वा पुरीं निकुम्भस्तु महादेवमथागमत् ॥ ६१ ॥

तदनन्तर उस शापसे उस समय वाराणसीपुरी सूनी हो गयी । उस पुरीको शाप देकर निकुम्भ महादेवजीके पास चले गये ॥ ६१ ॥

अकस्मात् तु पुरी सा तु विद्रुता सर्वतोदिशम् ।
तस्यां पुर्यां ततो देवो निर्ममे पदमात्मनः ॥ ६२ ॥

वाराणसीमे रहनेवाले सब लोग अकस्मात् सम्पूर्ण दिशाओंमें भाग गये । तब महादेवजीने उस पुरीमें अपना निवासस्थान बनाया ॥ ६२ ॥

रमते तत्र वै देवो रममाणो गिरेः सुताम् ।
न रतिं तत्र वै देवी लभते गृहविस्मयात् ।
वत्स्याम्य न पुर्यां तु देवी देवमथाब्रवीत् ॥ ६३ ॥

फिर वे भगवान् शिव गिरिराजनन्दिनी उमाका मनोरञ्जन करते हुए वहाँ आनन्दपूर्वक रहने लगे । परंतु देवी पार्वतीका मन वहाँ नहीं लगता था, क्योंकि वहाँ कोई निश्चित गृह न होनेसे वे विस्मयमें पड़ी रहती थीं । (अथवा पिताके घरके लिये उत्कण्ठित होनेके कारण देवीको वहाँ प्रसन्नता नहीं प्राप्त होती थी ।) उन्होंने महादेवजीसे कहा—'भगवन् ! मैं इस पुरीमे नहीं रहूँगी (आप मेरे घरको चलिये) ' ॥ ६३ ॥

देव उवाच

नाहं वेश्मनि वत्स्यामि अविमुक्तं हि मे गृहम् ।
नाहं तत्र गमिष्यामि गच्छ देवि गृहं प्रति ॥ ६४ ॥

महादेवजी बोले—देवि ! मैं और किसी घरमें नहीं रहूँगा । यह अविमुक्त क्षेत्र ही मेरा घर है । अतः मैं वहाँ नहीं चलूँगा । तुम जाना चाहो तो अपने उस घरको जाओ ॥ ६४ ॥

हसन्नुवाच भगवांस्त्र्यम्बकस्त्रिपुरान्तकः ।
तस्मात् तदविमुक्तं हि प्रोक्तं देवेन वै स्वयम् ॥ ६५ ॥
एवं वाराणसी शप्ता अविमुक्तं च कीर्तितम् ॥ ६६ ॥

त्रिपुरोंका विनाश करनेवाले त्रिनेत्रधारी भगवान् शिवने हँसते हुए पूर्वोक्त बात कही थी । महादेवजीने स्वयं ही उस क्षेत्रको अविमुक्त कहा था, इसलिये वह अविमुक्त नामसे प्रसिद्ध हो गया । इस तरह वाराणसीपुरीको शाप प्राप्त हुआ और उसे अविमुक्त क्षेत्र कहा गया ॥ ६५-६६ ॥

यस्मिन् वसति वै देवः सर्वदेवनमस्कृतः ।
युगेषु त्रिषु धर्मात्मा सह देव्या महेश्वरः ॥ ६७ ॥

सर्वदेववन्दित धर्मात्मा देव महेश्वर सत्ययुग आदि तीन युगोंमे देवी पार्वतीके साथ उस अविमुक्त क्षेत्रमे प्रत्यक्ष निवास करते हैं ॥ ६७ ॥

अन्तर्धानं कलौ याति तत्पुरं हि महात्मनः ।
अन्तर्हिते पुरे तस्मिन् पुरी सा वसते पुनः ।
एवं वाराणसी शप्ता निवेशं पुनरागता ॥ ६८ ॥

कलियुग आनेपर महात्मा महादेवजीका वह नगर अदृश्य हो जाता है । उसके अदृश्य हो जानेपर वाराणसीपुरी फिरसे बसती है । इस प्रकार वाराणसी नगरी शापग्रस्त होकर उजड़ी और पुनः बसी थी ॥ ६८ ॥

भद्रश्रेण्यस्य पुत्रो वै दुर्दम नाम विश्रुतः ।
दिवोदासेन बालेति घृणया स विवर्जितः ॥ ६९ ॥

भद्रश्रेण्यका एक पुत्र दुर्दम नामसे विख्यात था । दिवोदासने उसे बालक समझकर दयावश जीवित छोड़ दिया था ॥ ६९ ॥

हैहयस्य तु दायाद्यं कृतवान् वै महीपतिः ।
आजह्रे पितृदायाद्यं दिवोदासहतं बलात् ॥ ७० ॥

उस राजाने हैहयका पुत्र होना स्वीकार किया और उन्हींकी सहायतासे उसने दिवोदासद्वारा बलपूर्वक अपहृत हुई अपनी पैतृक सम्पत्तिको फिर वापस लौटाया ॥ ७० ॥

भद्रश्रेण्यस्य पुत्रेण दुर्दमैन महात्मना ।
वैरस्यान्तं महाराज क्षत्रियेण विधित्सता ॥ ७१ ॥

महाराज ! भद्रश्रेण्यका महामनस्वी पुत्र दुर्दम एक वीर क्षत्रिय था । उसने बैरका बदला लेनेके लिये ही वैसा किया था ॥ ७१ ॥

दिवोदासाद् दृषद्वत्यां वीरो जज्ञे प्रतर्दनः ।
तेन पुत्रेण बालेन प्रहृतं तस्य वै पुनः ॥ ७२ ॥

दिवोदास के द्वारा उनकी पत्नी दृषद्वतीके गर्भसे वीर प्रतर्दनका जन्म हुआ । उस राजकुमारने बालक होनेपर भी दुर्दमसे पुनः राज्य छीन लिया ॥ ७२ ॥

प्रतर्दनस्य पुत्रौ द्वौ वत्सभर्गौ बभूवतुः ।
वत्सपुत्रो ह्यलर्कस्तु संनतिस्तस्य चात्मजः ॥ ७३ ॥

प्रतर्दनके दो पुत्र थे—वत्स और भार्ग । वत्सके पुत्र अलर्क और अलर्कके संनति हुए ॥ ७३ ॥