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विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

विष्णुपर्व ] द्वाविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ७१३


स्निग्धाञ्जनचयप्रख्यः शङ्खचक्रगदाधरः ।
प्रध्माय बहुशः शङ्खमयुध्यत जनार्दनः ॥ ६८ ॥
चिकनी अञ्जनराशिके समान कान्तिमान् जनार्दन अपने हाथोंमें शङ्ख, चक्र और गदा लिये हुए थे। वे बारंबार शङ्ख बजाकर युद्ध करने लगे ॥ ६८ ॥

पक्षप्रहारनिहता नखतुण्डाग्रदारिताः ।
नीता वैवस्वतपुरं वैनतेयेन धीमता ॥ ६९ ॥
बुद्धिमान् विनतानन्दन गरुड़ने बहुत-से दानवोंको पंजों और चोंचके अग्रभागसे विदीर्ण करके तथा कितनोंको पंखोंके प्रहारसे हनाहत करके यमलोक पहुँचा दिया ॥ ६९ ॥

तैर्हन्यमानं दैत्यानामनीकं भीमविक्रमम् ।
अभज्यत तदा संख्ये बाणवर्षसमाहतम् ॥ ७० ॥
उन चारोंके द्वारा मारी जाती हुई भयानक पराक्रम-वाली दैत्य-सेनाके पाँव उखड़ गये। वह युद्धस्थलमें बाणोंकी वर्षासे क्षत विक्षत हो गयी थी ॥ ७० ॥

भज्यमानेष्वनीकेषु त्रातुकामः समभ्ययात् ।
ज्वरस्त्रिपादस्त्रिशिराः षड्भुजो नवलोचनः ॥ ७१ ॥
भस्मप्रहरणो रौद्रः कालान्तकयमोपमः ।
नदन् मेघसहस्रेण तुल्यो निर्घातनिःस्वनः ॥ ७२ ॥
जब इस प्रकार सारी सेनाएँ भागने लगीं, तब उनकी रक्षा करनेके लिये त्रिशिरा नामक ज्वर सामने आया। उसके तीन पैर, तीन सिर, छः बाँहें और नौ आँखें थीं। भस्म ही उसका आयुध था। वह काल, अन्तक और यमके समान भयंकर दिखायी देता था। वह जब सिंहनाद करता, तब गर्जते हुए हजारों मेघोंके समान प्रतीत होता था। उसकी आवाज वज्रकी गड़गड़ाहटके समान जान पड़ती थी ॥

निःश्वसञ्जृम्भमाणश्च निद्रान्विततनुर्भृशम् ।
नेत्राभ्यामाकुलं वक्त्रं मुहुः कुर्वन् भ्रमन् मुहुः ॥ ७३ ॥
वह बारंबार लंबी साँस खींचता और जँभाई लेता था। उसका शरीर निद्रासे अत्यन्त आकुल प्रतीत होता था। वह बारंबार घूमता और अपने दोनों नेत्रोंसे युक्त मुखको व्यथासे व्याकुल बना लेता था ॥ ७३ ॥

संहृष्टरोमा ग्लानाक्षो भग्नचित्त इव श्वसन् ।
हलायुधमभिक्रुद्धः साक्षेपमिदमब्रवीत् ॥ ७४ ॥
उसके रोंगटे खड़े हो रहे थे। नेत्र आदि इन्द्रियाँ गली जा रही थीं। वह भग्नचित्त (हतोत्साह) सा होकर साँस लेता था। उसने क्रोधमें भरकर हलधरसे यह आक्षेपयुक्त बात कही—॥ ७४ ॥

किमेवं बलमत्तोऽसि न मां पश्यसि संयुगे ।
तिष्ठ तिष्ठ न मे जीवन् मोक्ष्यसे रणमूर्धनि ॥ ७५ ॥
'तुम क्यों इस प्रकार बलसे उन्मत्त हो रहे हो ? क्या इस युद्धस्थलमें तुम मुझे नहीं देखते हो ? खड़े रहो, खड़े रहो ! आज इस युद्धके मुहानेपर तुम मेरे हाथसे जीवित नहीं छूट सकोगे' ॥ ७५ ॥

इत्येवमुक्त्वा प्रहसन् हलायुधमुपादवत् ।
युगान्ताग्निनिभैर्घोरैर्मुष्टिभिर्जनयन् भयम् ॥ ७६ ॥
ऐसा कहकर जोर-जोरसे हँसते हुए त्रिशिराने हल नामक आयुध धारण करनेवाले बलरामजीपर आक्रमण किया। वह प्रलयाग्निके समान अपने भयानक मुक्कोंसे भय उत्पन्न कर रहा था ॥ ७६ ॥

चरतस्तत्र संग्रामे मण्डलानि सहस्रशः ।
रौहिणेयस्य शीघ्रेण नावस्थानमदृश्यत ॥ ७७ ॥
रोहिणीकुमार बलभद्र वहाँ संग्राममें सहस्रों पैंतरे बदलते हुए शीघ्रतापूर्वक विचर रहे थे। अतः कहीं उनका ठहरना उसे नहीं दिखायी दिया ॥ ७७ ॥

तस्य भस्म तदा क्षिप्तं ज्वरेणाप्रतिमौजसा ।
शैघ्याद् वक्षो निपतितं शरीरे पर्वतोपमे ॥ ७८ ॥
तब उस अप्रतिम बलशाली ज्वरने बड़ी फुर्तीसे उनके ऊपर भस्म फेंका, जो उनके पर्वताकार शरीरमे छातीपर जाकर गिरा ॥ ७८ ॥

तद् भस्म वक्षसस्तस्य मेरोः शिखरमागमत् ।
प्रदीप्तं पतितं तत्र गिरिशृङ्गं व्यदारयत् ॥ ७९ ॥
वह भस्म उनकी छातीसे मेरुपर्वतके शिखरपर आ गिरा। वहाँ गिरते ही वह प्रज्वलित हो उठा और उसने उस पर्वत शिखरको विदीर्ण कर डाला ॥ ७९ ॥

शेषेण चापि जज्वल भस्मना कृष्णपूर्वजः ।
निःश्वसञ्जृम्भमाणश्च निद्रान्विततनुर्भृशम् ॥ ८० ॥
जो भस्म उनके वक्षःस्थलपर शेष रह गया, उतनेहीसे श्रीकृष्णके बड़े भैया जलने लगे। वे बारंबार साँस और जँभाई लेने लगे। उनका शरीर निद्रासे अत्यन्त अभिभूत हो गया ॥ ८० ॥

नेत्रयोराकुलत्वं च मुहुः कुर्वन् भ्रमंस्तथा ।
संहृष्टरोमा ग्लानाक्षः क्षिप्तचित्त इव श्वसन् ॥ ८१ ॥
वे बारंबार नेत्रोंसे व्याकुलता प्रकट करने और चक्कर काटने लगे। उनके शरीरमें रोमाञ्च हो आया। उनकी नेत्र आदि इन्द्रियाँ गलने लगीं। वे विक्षिप्तचित्त-से होकर लंबी साँस खींचने लगे ॥ ८१ ॥

ततो हलधरो भग्नः कृष्णमाह विचेतनः ।
कृष्ण कृष्ण महाबाहो प्रदीप्तोऽस्म्यभयं कुरु ॥ ८२ ॥
दह्यामि सर्वतस्तात कथं शान्तिर्भवेन्मम ।
उस समय हलधरने हतोत्साह एवं अचेत होकर श्रीकृष्ण-से कहा—'कृष्ण ! कृष्ण ! महाबाहो ! मैं जल रहा हूँ। मेरा भय दूर करो। तात ! मेरे शरीरमें सब ओरसे जलन हो रही है। मुझे किस तरह शान्ति प्राप्त हो' ॥ ८२ १/२ ॥

इत्येवमुक्ते वचने बलेनामिततेजसा ॥ ८३ ॥
प्रहस्य वचनं प्राह कृष्णः प्रहरतां वरः ।
न भेतव्यमितीत्युक्त्वा परिष्वक्तो हलायुधः ॥ ८४ ॥
कृष्णेन परमस्नेहात् ततो दाहात् प्रमुच्यत ।
अमिततेजस्वी बलदेवने जब ऐसी बात कही, तब प्रहार करनेवालोंमें श्रेष्ठ श्रीकृष्णने उनसे हँसकर कहा—'भैया !

७१४श्रीमहाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

डरो मत।' ऐसा कहकर श्रीकृष्णने बड़े स्नेहके साथ हलधरको हृदयसे लगाया। फिर तो वे तत्काल ही उस दाहसे मुक्त हो गये ॥ ८३-८४ १/२ ॥

मोक्षयित्वा बलं तत्र दाहात् तु मधुसूदनः ॥ ८५ ॥
प्रोवाच परमक्रुद्धो वासुदेवो ज्वरं तदा ।
बलरामजीको वहाँ ज्वरजनित दाहसे मुक्त करके अत्यन्त कुपित हुए वसुदेवनन्दन मधुसूदनने उस समय उस ज्वरसे कहा ॥ ८५ १/२ ॥

श्रीभगवानुवाच
एह्येहि ज्वर युध्यस्व या ते शक्तिर्महामृधे ॥ ८६ ॥
यच्च ते पौरुषं सर्वं तद् दर्शयतु नो भवान् ।
श्रीभगवान् बोले—ज्वर ! आओ, आओ, युद्ध करो। तुम्हारी जो शक्ति है और तुममें जो पुरुषार्थ है, वह सब हमें इस महासमरमें दिखाओ ॥ ८६ १/२ ॥

सव्येतराभ्यां बाहुभ्यामेवमुक्तो ज्वरस्तदा ॥ ८७ ॥
चिक्षेपाग्निं महत् भस्म ज्वालागर्भं महाबलः ।
उनके ऐसा कहनेपर उस महाबली ज्वरने अपनी दोनों दाहिनी भुजाओंसे उनके ऊपर वह महान् भस्म फेंका, जिसके भीतर ज्वाला छिपी हुई थी ॥ ८७ १/२ ॥

ततः प्रदीप्तगात्रस्तु मुहूर्तमभवत् प्रभुः ॥ ८८ ॥
कृष्णः प्रहरतां श्रेष्ठः शमं चाग्निर्गतस्ततः ।
उस भस्मसे दो घड़ीके लिये प्रहार करनेवालोंमें श्रेष्ठ भगवान् श्रीकृष्णका सारा शरीर जल उठा; परंतु फिर वह आग अपने-आप बुझ गयी ॥ ८८ १/२ ॥

ततस्तैर्भुजगाकारैर्बाहुभिस्तु त्रिभिस्तदा ॥ ८९ ॥
जघान कृष्णं ग्रीवायां मुष्टिनैकेन चोरसि ।
तब उस त्रिशिराने अपनी तीन सर्पाकार भुजाओंसे श्रीकृष्णके कण्ठमें प्रहार किया और एक मुक्केसे उनकी छातीपर चोट की ॥ ८९ १/२ ॥

स सम्प्रहारस्तुमुलस्तयोः पुरुषसिंहयोः ॥ ९० ॥
ज्वरस्य तु महायुद्धे कृष्णस्य तु महौजसः ।
पर्वतेषु पतन्तीनामशनीनामिव स्वनः ॥ ९१ ॥
(फिर श्रीकृष्ण भी उस ज्वरको पीटने लगे।) उस महायुद्धमें ज्वर और महातेजस्वी श्रीकृष्ण दोनों पुरुषसिंहोंमें भयंकर मुष्टिका प्रहार होने लगा । उसका शब्द पर्वतोंपर गिरती हुई बिजलियोंकी गड़गड़ाहटके समान प्रतीत होता था॥

कृष्णज्वरभुजाघातैर्युद्धमासीत् सुदारुणम् ।
नैवमेवं प्रहर्तव्यमिति तत्र महास्वनः ।
मुहूर्तमभवद् युद्धमन्योन्यं तु महात्मनोः ॥ ९२ ॥
श्रीकृष्ण और ज्वर दोनोंमें भुजाओंके आघातसे अत्यन्त भयंकर युद्ध हो रहा था। 'ऐसे नहीं, ऐसे प्रहार करना चाहिये' यह शब्द वहाँ बड़े जोर-जोरसे सुनायी देता था। इस प्रकार उन दोनों महात्माओंमें दो घड़ीतक परस्पर युद्ध चलता रहा॥

ततो ज्वरं कनकविचित्रभूषणं
न्यपीडयद् भुजयुगलेन संयुगे ।
जगत्क्षयं समुपनयञ्जगत्पतिः
शरीरधृग् गगनचरं महामृधे ॥ ९३ ॥
तदनन्तर मानवशरीर धारण करके प्रकट हुए जगदीश्वर श्रीहरिने उस महासमरमें सोनेके विचित्र आभूषणोंसे विभूषित उस आकाशचारी ज्वरको अपनी दोनों भुजाओंसे धर दबाया। उस समय ऐसा जान पड़ता था कि वे जगदीश्वर सारे संसारका संहार कर डालेंगे ॥ ९३ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि कृष्णज्वरयुद्धे द्वाविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें श्रीकृष्ण और ज्वरका युद्धविषयक एक सौ बाईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२२ ॥


त्रयोविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः

श्रीकृष्णसे पराजित हुए ज्वरका उनकी शरणमें जाना, उनसे वर पाना और उनकी आज्ञा शिरोधार्य कर रणभूमिसे हट जाना

वैशम्पायन उवाच
मृतमित्यभिविज्ञाय ज्वरं शत्रुनिषूदनः ।
कृष्णो भुजबलाभ्यां तु चिक्षेपाथ महीतले ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! उस ज्वरको मरा हुआ जानकर शत्रुसूदन श्रीकृष्णने अपनी बलिष्ठ भुजाओंसे उठाकर उसे पृथ्वीपर फेंक दिया ॥ १ ॥

मुक्तमात्रः स बाहुभ्यां कृष्णदेहं विवेश ह ।
अमुक्त्वा विग्रहं तस्य कृष्णस्याप्रतिमौजसः ॥ २ ॥
श्रीकृष्णकी भुजाओंसे छूटते ही वह उनके शरीरके भीतर घुस गया; वह अमिततेजस्वी श्रीकृष्णके श्रीविग्रहको छोड़कर न जा सका ॥ २ ॥

स ह्याविष्टस्तथा तेन ज्वरेणाप्रतिमौजसा ।
कृष्णः स्खलन्निव मुहुः क्षितौ गाढं व्यवर्तत ॥ ३ ॥
उस अप्रतिम बलशाली ज्वरसे आविष्ट होकर श्रीकृष्ण बारंबार लड़खड़ाते हुए-से पृथ्वीपर बैठ गये और जोर-जोरसे लोटने लगे ॥ ३ ॥

[विष्णुपर्व ] त्रयोविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ७१५


जृम्भते श्वसते चैव वल्गते च पुनः पुनः।
रोमाञ्चोत्थितगात्रश्च निद्रया चाभिभूयते ॥ ४ ॥
वे बारंबार जँभाई लेते, लंबी साँस खींचते और उछलते-कूदते थे; उनके सम्पूर्ण अङ्गोंमें रोमाञ्च हो आया और वे निद्रासे अभिभूत होने लगे ॥ ४ ॥

ततः स्थैर्यं समालम्ब्य कृष्णः परपुरंजयः ।
विकुर्वति महायोगी जम्भमाणः पुनः पुनः ॥ ५ ॥
तदनन्तर किसी तरह स्थिरता धारण करके शत्रुनगरीपर विजय पानेवाले महायोगी श्रीकृष्ण बारंबार जँभाई लेते हुए विकारको प्राप्त होने लगे ॥ ५ ॥

ज्वराभिभूतमात्मानं विज्ञाय पुरुषोत्तमः ।
सोऽसृजज्ज्वरमन्यं तु पूर्वज्वरविनाशनम् ॥ ६ ॥
अपने आपको ज्वरसे आक्रान्त हुआ जान पुरुषोत्तम श्रीहरिने दूसरे ज्वरकी सृष्टि की, जो पूर्व ज्वरका विनाश करनेवाला था ॥ ६ ॥

घोरं वैष्णवमत्युग्रं सर्वप्राणिभयंकरम् ।
संसृष्टवान् स तेजस्वी तं ज्वरं भीमविक्रमम् ॥ ७ ॥
तेजस्वी श्रीकृष्णने जिस भयानक पराक्रमी ज्वरकी सृष्टि की थी, वह घोर वैष्णव ज्वर अत्यन्त उग्र तथा समस्त प्राणियोंके लिये भयङ्कर था ॥ ७ ॥

ज्वरः कृष्णविसृष्टस्तु गृहीत्वा तं ज्वरं बलात् ।
कृष्णाय हृष्टः प्रायच्छत् तं जग्राह ततो हरिः ॥ ८ ॥
श्रीकृष्णद्वारा रचे गये उस ज्वरने पूर्वोक्त त्रिशिरा ज्वरको बलपूर्वक पकड़कर बड़े हर्षके साथ उसे श्रीकृष्णको समर्पित कर दिया। तब श्रीहरिने पुनः उस ज्वरको पकड़ लिया ॥ ८ ॥

ततस्तं परमक्रुद्धो वासुदेवो महाबलः ।
स्वगात्रात् स्वज्वरेणैव निष्कासयत वीर्यवान् ॥ ९ ॥
तब अत्यन्त क्रोधमें भरे हुए महाबली पराक्रमी भगवान् वासुदेवने अपने ज्वरके द्वारा ही त्रिशिरा ज्वरको अपने शरीरसे निकलवा दिया ॥ ९ ॥

आविध्य भूतले चैनं शतधा कर्तुमुद्यतः ।
व्याघोषत ज्वरस्तत्र भोः परित्रातुमर्हसि ॥ १० ॥
तत्पश्चात् वे उसे पृथ्वीपर घुमाकर उसके सौ टुकड़े कर देनेको उद्यत हो गये, तब वहाँ उस ज्वरने यह पुकार की, 'प्रभो ! आप मेरी रक्षा करें' ॥ १० ॥

आविध्यमाने तस्मिंस्तु कृष्णेनामिततेजसा ।
अशरीरा ततो वाणी ह्यन्तरिक्षादभाषत ॥ ११ ॥
अमिततेजस्वी श्रीकृष्णके द्वारा उस ज्वरके घुमाये जाते समय आकाशसे शरीररहित वाणीने इस प्रकार कहा—॥११॥

कृष्ण कृष्ण महाबाहो यदूनां नन्दिवर्धन ।
मा वधीर्ज्वरमेनं तु रक्षणीयस्त्वयानघ ॥ १२ ॥
'कृष्ण ! कृष्ण !! महाबाहो !!! यदुकुलका आनन्द बढ़ानेवाले निष्पाप श्रीकृष्ण ! आप इस ज्वरका वध न कीजिये, यह आपके द्वारा रक्षणीय है' ॥ १२ ॥

इत्येवमुक्ते वचने तं मुमोच हरिः स्वयम् ।
भूतभव्यभविष्यस्य जगतः परमो गुरुः ॥ १३ ॥
आकाशवाणीके ऐसा कहनेपर भूत, भविष्य और वर्तमान जगत्‌के परम गुरु साक्षात् श्रीहरिने उसे छोड़ दिया ॥ १३ ॥

कृष्णस्य पादयोर्मूर्ध्ना शरणं सोऽगमज्ज्वरः ।
एवं मुक्तो हृषीकेशं ज्वरो वाक्यमथाब्रवीत् ॥ १४ ॥
उनके हाथसे इस प्रकार मुक्त होकर वह ज्वर श्रीकृष्णके दोनों चरणोंमें मस्तक रखकर उन्हींकी शरणमें गया और उन भगवान् हृषीकेशसे इस प्रकार बोला—॥ १४ ॥

शृणुष्व मम गोविन्द विज्ञाप्यं यदुनन्दन ।
यो मे मनोरथो देव तं त्वं कुरु महाभुज ॥ १५ ॥
'गोविन्द ! यदुनन्दन ! मेरा निवेदन सुनिये । देव ! महाबाहो ! मेरा जो मनोरथ है, उसे पूर्ण कीजिये ॥ १५ ॥

अहमेको ज्वरस्तात नान्यो लोके ज्वरो भवेत् ।
त्वत्प्रसादाद्धि देवेश वरमेनं वृणोम्यहम् ॥ १६ ॥
'तात ! देवेश्वर ! संसारमें मैं एक ज्वर हूँ, अब मेरे सिवा दूसरा कोई ज्वर न हो। आपकी कृपासे मैं इस वरको माँगता हूँ' ॥ १६ ॥

देव उवाच
एवं भवतु भद्रं ते यथा त्वं ज्वर काङ्क्षसे ।
वरार्थिनां वरो देयो भवांश्च शरणं गतः ॥ १७ ॥
श्रीभगवान्ने कहा— ज्वर ! तुम्हारा भला हो, तुम जैसा चाहते हो, ऐसा ही हो।' मेरे लिये सभी वरार्थियोंको वर देना उचित है, तुम तो वरार्थी होकर मेरी शरणमें आये हो ( अतः तुम विशेष कृपाके पात्र हो ) ॥ १७ ॥

एक एव ज्वरो लोके भवानस्तु यथा पुरा ।
योऽयं मया ज्वरः सृष्टो मय्येवैष प्रलीयताम् ॥ १८ ॥
तुम पहलेकी ही भाँति संसारमें एक ही ज्वरके रूपमें रहो । मैंने जो इस ज्वरकी सृष्टि की है, यह फिर मुझमें ही लीन हो जाय ॥ १८ ॥

वैशम्पायन उवाच
एवमुक्ते तु वचने ज्वरं प्रति महायशाः ।
कृष्णः प्रहरतां श्रेष्ठः पुनर्वाक्यमुवाच ह ॥ १९ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय ! उस ज्वरके प्रति ऐसी बात कहकर प्रहार करनेवालोंमें श्रेष्ठ महायशस्वी श्रीकृष्ण पुनः इस प्रकार बोले ॥ १९ ॥

वासुदेव उवाच
शृणुष्व ज्वर संदेशं यथा लोके चरिष्यसि ।
सर्वजातिषु विश्रब्धं यथा स्थावरजङ्गमे ॥ २० ॥
वासुदेवने कहा— ज्वर ! मेरा संदेश सुनो, जिसके अनुसार तुम चराचर जगत्में सभी जातिके प्राणियोंके भीतर बेखटके विचरण करोगे ॥ २० ॥

तृतीयो यश्च ते भागो मानुषेषूपपत्स्यते ।

७१६ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे त्रिधा विभज्य चात्मानं मन्प्रियं यदि काङ्क्षसे । चतुष्पादान् भजैकेन द्वितीयेन च स्थावरान् ॥ २१ ॥ तृतीयो यश्च ते भागो मानुषेषूपपत्स्यते । त्रिधाभूतं वपुः कृत्वा पक्षिषु त्वं भव ज्वर ॥ २२ ॥ चतुर्थो यस्तृतीयस्य भविष्यति स ते ध्रुवम् । एकान्तरस्तृतीयस्तु स वै चातुर्थिको ज्वरः ॥ २३ ॥ यदि तुम मेरा प्रिय करना चाहते हो तो अपने आप- को तीन भागोंमें विभक्त करके एक भागसे चौपायोंका आश्रय लो, द्वितीय भागसे वृक्ष, पर्वत आदि स्थावर वस्तुओंका सेवन करो तथा तुम्हारा जो तीसरा भाग है, वह मनुष्योंमें रहने योग्य होगा । ज्वर ! इस प्रकार तुम अपने स्वरूपको तीन भागोंमें बाँटकर उपर्युक्त स्थानोंमें रहो तथा तुम्हारे तीसरे भागका जो एक चौथाई अंश है, वह पक्षियोंमें अटल भावसे स्थित होगा । यह तीसरी श्रेणीका जो ज्वर है, वह एक दिनका अन्तर देकर आनेपर एकान्तर या अँतरया कहलायेगा, दो दिनका अन्तर देनेपर तिजरा और तीन दिन- का अन्तर देकर आनेपर वही चातुर्थिक (चौथिया ज्वर) कहलायेगा ॥ २१-२३ ॥ मानुषेष्वभिभेदेन वस त्वं प्रविभज्य वै । जातिष्वथावशेषासु निवंस त्वं शृणुष्व मे ॥ २४ ॥ इन भेद-उपभेदोंके साथ अपने रूपका विभाजन करके तुम मनुष्योंमें निवास करो । साथ ही, जो शेष जातियाँ हैं, उनमें भी तुम वास करो । किस तरह ? यह मुझसे सुनो-॥ वृक्षेषु कीटरूपेण तथा संकोचपत्रकः । पाण्डुपत्रश्च विख्यातः फलेष्वातूर्यमेव च ॥ २५ ॥ वृक्षोंमें तुम कीटरूपसे निवास करो, इसके सिवा वहाँ तुम संकोचपत्रक और पाण्डुपत्रक नामसे विख्यात होगे (वृक्षोंके जो पत्ते सिकुड़ने लगते हैं, यह उनमें संकोचपत्रक नामक ज्वर है और जो उनके पत्ते पीले पड़ने लगते हैं, यह उनमें पाण्डुपत्रक नामक ज्वर है) तथा वृक्षोंके फलोंमें आतूर्यनामसे तुम्हारी ख्याति होगी (फलोंके एक देशमें जाली पड़ जानेसे जो वे फल सिकुड़ने या सूखने लगते हैं, यह उनमें आतूर्यनामक ज्वरका लक्षण है) ॥ २५ ॥ अपां तु नीलिकां विद्याच्छिखोद्भेदेन बर्हिणाम् । पद्मिन्यादौ हिमो भूत्वा पृथिव्यामपि चोपरः ॥ २६ ॥ गैरिकः पर्वतेष्वेव मत्प्रसादाद् भविष्यसि । जलोंमें नीलिकाको ज्वर समझना चाहिये । मोरोंके सिरपर जो शिखा फूट निकलती है, उसीके रूपमें उनके भीतर तुम्हारा वास होगा । तुम कमलिनी आदिपर हिम (पाला), पृथ्वीमें ऊपर तथा पर्वतोंपर गेरू होकर मेरी कृपासे वहाँ निवास करोगे ॥ २६३ ॥ गोष्वपस्मारको भूत्वा खोरकश्च भविष्यसि ॥ २७ ॥ एवं त्वं बहुरूपेण भविष्यसि महीतले । गौओंमें अपस्मार ( कम्पन) और खोरक (खुर- रोग ) होकर रहोगे । इस प्रकार तुम पृथ्वीपर बहुत-से रूपोंमें प्रकट होओगे ॥ २७३ ॥ दर्शनात् स्पर्शनाच्चापि प्राणिनां वधमेष्यसि ॥ २८ ॥ ऋते देवमनुष्याणां नान्यस्त्वां विसहिष्यति । तुम अपने दृष्टिपात और स्पर्शसे भी प्राणियोंका वध कर डालोगे । देवता और मनुष्योंके सिवा दूसरा कोई तुम्हारा वेग नहीं सह सकेगा ॥ २८३ ॥ वैशम्पायन उवाच कृष्णस्य वचनं श्रुत्वा ज्वरो हृष्टमना ह्यभूत् ॥ २९ ॥ प्रोवाच वचनं किंचित् प्रणमित्वा कृताञ्जलिः । वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! श्रीकृष्णकी यह बात सुनकर ज्वरका मन प्रसन्न हो गया । उसने हाथ जोड़कर प्रणाम करके कुछ बात कही ॥ २९३ ॥ ज्वर उवाच सर्वजातिप्रभुत्वेन कृतो धन्योऽस्मि माधव ॥ ३० ॥ भूयश्च ते वचः कर्तुमिच्छामि पुरुषर्षभ । तदाज्ञापय गोविन्द किं करोमि महाभुज ॥ ३१ ॥ ज्वर बोला—पुरुषप्रवर माधव ! आपने सभी जातिके प्राणियोंपर मेरी प्रभुता स्थापित करके मुझे धन्य कर दिया । महाबाहु गोविन्द ! अब मैं पुनः आपकी आज्ञाका पालन करना चाहता हूँ । अतः आज्ञा दीजिये, मैं आपकी क्या सेवा करूँ ॥ ३०-३१ ॥ अहमसुरकुलप्रमाथिना त्रिपुरहरेण हरेण निर्मितः । रणशिरसि विनिर्जितस्त्वया प्रभुरसि देव तवास्मि किंकरः ॥ ३२ ॥ देव ! असुरकुलनाशक और त्रिपुरसंहारक भगवान् हरने मेरी सृष्टि की है, आज युद्धके मुहानेपर आपने मुझे पराजित कर दिया । अतः आप मेरे प्रभु हैं और मैं आपका किङ्कर हूँ ॥ ३२ ॥ धन्योऽस्म्यनुगृहीतोऽस्मि यत् त्वया मत्प्रियं कृतम् । आज्ञापय प्रियं किं ते चक्रायुध करोम्यहम् ॥ ३३ ॥ चक्रधारी श्रीकृष्ण ! आपने जो मेरा प्रिय किया, इससे मैं धन्य हो गया । आपके अनुग्रहका पात्र बन गया, अब आज्ञा दीजिये, मैं आपका कौन सा प्रिय कार्य सम्पन्न करूँ ? ॥ वैशम्पायन उवाच ज्वरस्य वचनं श्रुत्वा वासुदेवोऽब्रवीद् वचः । अभिसंधिं शृणुष्वाद्य यत्त्वां वक्ष्यामि निश्चयात् ॥३४॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन् ! ज्वरका यह वचन सुनकर वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णने कहा—'ज्वर ! मैं क्या चाहता हूँ; यह सुनो । मैं निश्चित रूपसे तुमसे जो कुछ कहता हूँ, उसपर ध्यान दो' ॥ ३४ ॥ श्रीभगवानुवाच महाहवे तव मम च द्वयोरिमं पराक्रमं भुजबलकेवलाश्रयोः ।

विष्णुपर्व ] चतुर्विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ७१७


प्रणम्य मामेकमनाः पठेत् तु यः
स वै भवेज्ज्वर विगतज्वरो नरः ॥ ३५ ॥

**श्रीभगवान् बोले—**ज्वर ! इस महासमरमें केवल बाहुबल ही हमारा-तुम्हारा अस्त्र रहा है; जो मुझे प्रणाम करके एकचित्त होकर हम दोनोंके इस पराक्रमका पाठ करे, वह मनुष्य अवश्य ज्वररहित हो जाय ॥ ३५ ॥

त्रिपाद् भस्मप्रहरणस्त्रिशिरा नवलोचनः ।
स मे प्रीतः सुखं दद्यात् सर्वामयपतिर्ज्वरः ॥ ३६ ॥

जिसके तीन पैर हैं, भस्म ही आयुध है, तीन सिर हैं और नौ नेत्र हैं, वह समस्त रोगोंका अधिपति ज्वर प्रसन्न होकर मुझे सुख प्रदान करे ॥ ३६ ॥

आद्यन्तवन्तः कवयः पुराणाः
सूक्ष्मा बृहन्तोऽप्यनुशासितारः ।
सर्वाञ्ज्वरान् घ्नन्तु ममानिरुद्ध-
प्रद्युम्नसंकर्षणवासुदेवाः ॥ ३७ ॥

जगत्के आदि और अन्त जिनके हाथोंमें हैं, जो ज्ञानी, पुराणपुरुष, सूक्ष्मस्वरूप, परम महान् और सबके अनुशासक हैं, वे अनिरुद्ध, प्रद्युम्न, संकर्षण और भगवान् वासुदेव सम्पूर्ण ज्वरोंका नाश करें (इस प्रकार प्रार्थना करनेवालोंका ज्वर दूर हो जाय) ॥ ३७ ॥

वैशम्पायन उवाच
एवमुक्तस्तु कृष्णेन ज्वरः साक्षान्महात्मना ।
प्रोवाच यदुशार्दूलमेवमेतद् भविष्यति ॥ ३८ ॥

**वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन् ! साक्षात् महात्मा श्रीकृष्णके ऐसा कहनेपर ज्वरने उन यदुश्रेष्ठसे कहा—'यह ऐसा ही होगा'॥

वरं लब्ध्वा ज्वरो हृष्टः कृष्णाच्च समयं पुनः ।
प्रणम्य शिरसा कृष्णमपक्रान्तस्ततो रणात् ॥ ३९ ॥

श्रीकृष्णसे वर पाकर और उनकी शर्तको स्वीकार करके ज्वरको बड़ा हर्ष हुआ। वह मस्तक झुकाकर श्रीकृष्णको प्रणाम करनेके अनन्तर उस रणक्षेत्रसे दूर चला गया ॥ ३९ ॥

इति श्रीमद्भारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि ज्वरकृष्णसंवादे त्रयोविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें ज्वर और श्रीकृष्णका संवादविषयक एक सौ तेईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२३ ॥


चतुर्विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः

बाणासुरकी सेनाका पलायन, भगवान् शङ्करका अपने गणोंके साथ युद्धके लिये आगमन, भगवान् श्रीकृष्ण और रुद्रका युद्ध तथा बाणासुरका युद्धभूमिमें पदार्पण

वैशम्पायन उवाच
ततस्ते त्वरिताः सर्वे त्रयस्त्रय इवाग्नयः ।
वैनतेयमथारुह्य युध्यमाना रणे स्थिताः ॥ १ ॥

**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय ! तदनन्तर तीन अग्नियोंके समान वे सब तीनों वीर बड़ी उतावलीके साथ गरुड़पर आरूढ़ हो शत्रुओंके साथ युद्ध करते हुए रणभूमिमें डटे रहे ॥ १ ॥

ततः सर्वाण्यनीकानि बाणवपरवारिणः ।
अर्दयन् वैनतेयस्था नदन्तोऽतिबलाद् रणे ॥ २ ॥

गरुड़पर चढ़े हुए उन वीरोंने सिंहनाद करके बाणासुरकी समस्त सेनाओंको अपनी बाणवर्षासे ढक दिया और अत्यन्त बलपूर्वक उन्हें पीड़ा देना आरम्भ किया ॥ २ ॥

चक्राङ्गलपत्तैिश्च बाणवर्षैश्च पीडितम् ।
संचुकोप महानीकं दानवानां दुरासदम् ॥ ३ ॥

चक्र और हलकी मारसे तथा बाणोंकी वर्षासे पीड़ित होकर दानवोंकी वह दुर्जय विशाल सेना अत्यन्त कुपित हो उठी ॥ ३ ॥

कक्षेऽग्निरिव संवृद्धः शुष्केन्धनसमीरितः ।
कृष्णबाणाग्निरुद्गतो विवृद्धिं परमां गतः ॥ ४ ॥

जैसे तिनकोंके बोझमें आग लग जाय और सूखे ईंधनका सहारा पाकर वह और भी बढ़ जाय उसी प्रकार श्रीकृष्णके बाणोंसे जो अग्नि प्रकट हुई, वह अत्यन्त वृद्धिको प्राप्त होने लगी ॥ ४ ॥

दानवानां सहस्राणि तस्मिन् समरमूर्धनि ।
युगान्ताग्निरिवार्चिष्मान् दहमानो व्यराजत ॥ ५ ॥

वह उस युद्धके मुहानेपर सहस्रों दानवोंको दग्ध करती हुई ज्वाला-मालाओंसे मण्डित प्रलयाग्निके समान प्रकाशित हो रही थी ॥ ५ ॥

तां दीर्यमाणां महतीं नानाप्रहरणार्दिताम् ।
सेनां बाणः समासाद्य वारयन् वाक्यमब्रवीत् ॥ ६ ॥

नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंसे पीड़ित हो भागती हुई उस विशाल सेनाके पास पहुँचकर बाणासुर उसे रोकता हुआ इस प्रकार बोला—॥ ६ ॥

लाघवं समुपागम्य किमर्थं भयविह्वलाः ।
दैत्यवंशसमुत्पन्नाः पलायध्वं महाहवात् ॥ ७ ॥

'वीरो ! तुम दैत्यवंशमें उत्पन्न होकर भी किसलिये लघुता (कायरता) का आश्रय ले भयसे व्याकुल हो इस महासमरसे पलायन कर रहे हो ॥ ७ ॥

कवचासिगदाप्रासखड्गचर्मपरश्वधान् ।
उत्सृज्योत्सृज्य गच्छन्ति किं भवन्तोऽन्तरिक्षगाः ॥ ८ ॥

'कवच, खड्ग, गदा, प्रास, ढाल, तलवार और फरसे फेंक-फेंककर तुम आकाशमार्गसे क्यों भागे जा रहे हो ॥ ८ ॥

स्वजातिं चैव भावं च हरसंसर्गमेव च ।
मानयद्भिर्न गन्तव्यमेषो ह्यहमवस्थितः ॥ ९ ॥

७१८श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

'अपनी जातिका, अपने वीरभावका तथा भगवान् शङ्करके साथ हमारा जो सम्पर्क है उसका सम्मान करते हुए तुमलोगोंको यहाँसे हटना नहीं चाहिये; देखो ! यह मैं युद्ध-भूमिमें डटा हुआ हूँ' ॥ ९ ॥
एवमुच्चरितं वाक्यं शृण्वन्तस्तदचिन्तयन् ।
अपाक्रामन्त ते सर्वे दानवा भयमोहिताः ॥ १० ॥
इस प्रकार कहे गये उत्साहवर्धक वाक्यको सुनते हुए भी उसकी परवा न करके वे समस्त दानव भयसे मोहित होकर भाग चले ॥ १० ॥
प्रमाथगणशेषं तु तदनीकमतिष्ठत ।
भग्नावशेषं युद्धाय पुनश्चक्रे मनस्तदा ॥ ११ ॥
अब उस सेनामें केवल प्रमथगण शेष रह गये; उन्हींको लेकर वह सेना वहाँ खड़ी थी। उस समय भागनेसे बचे-खुचे सैनिकोंने पुनः युद्धमें मन लगाया ॥ ११ ॥
कुम्भाण्डो नाम बाणस्य सखामात्यश्च वीर्यवान् ।
भग्नं स्वबलमालोक्य इदं वचनमब्रवीत् ॥ १२ ॥
बाणासुरके मन्त्री और सखा पराक्रमी कुम्भाण्डने अपनी सेनामें भगदड़ मची देख यह बात कही—॥ १२ ॥
एष बाणः स्थितो युद्धे शंकरोऽयं गुहस्तथा ।
किमर्थं बलमुत्सृज्य भवन्तो यान्ति मोहिताः ॥ १३ ॥
'वीरो ! ये राजा बाणासुर युद्धमें स्थित हैं। ये भगवान् शङ्कर और कार्तिकेयजी भी यहाँ विराजमान हैं। फिर तुम लोग मोहग्रस्त हो अपनी सेनाको छोड़कर किसलिये भाग रहे हो' ॥
प्राणांस्त्यक्त्वा पलायन्ते सर्वे दानवपुङ्गवाः ।
एवं कुम्भाण्डवाक्यं ते शृण्वन्तो भयविह्वलाः ।
चक्राग्निभयवित्रस्ताः सर्वे यान्ति दिशो दश ॥ १४ ॥
कुम्भाण्डका ऐसा वचन सुनते हुए भी वे समस्त दानवशिरोमणि भयसे व्याकुल हो प्राणोंका मोह छोड़कर पलायन करने लगे। वे सब-के-सब श्रीकृष्णकी चक्राग्निके भयसे थर्रा उठे थे; अतः दसों दिशाओंकी ओर भागे चले जा रहे थे ॥
भग्नं बलं ततो दृष्ट्वा कृष्णेनामिततेजसा ।
संरक्तनयनः स्थाणुर्युद्धाय पर्यवर्तत ॥ १५ ॥
तदनन्तर अमित तेजस्वी श्रीकृष्णके द्वारा दानवसेना-में भगदड़ पड़ी देख भगवान् शङ्कर क्रोधसे लाल आँखें किये स्वयं युद्धके लिये उपस्थित हुए ॥ १५ ॥
बाणसंरक्षणं कर्तुं रथमास्थाय सुप्रभम् ।
देवः कुमारश्च तथा रथेनाग्निसमेन वै ॥ १६ ॥
वे बाणासुरकी रक्षा करनेके लिये उत्तम प्रभासे युक्त रथपर आरूढ़ होकर आये थे; साथ ही कुमार स्कन्ददेव भी अग्निके समान तेजस्वी रथके द्वारा वहाँ उपस्थित हुए थे ॥ १६॥
नन्दीश्वरसमायुक्तं रथमास्थाय वीर्यवान् ।
संदष्टौष्ठपुटो रुद्रः प्राधावत यतो हरिः ॥ १७ ॥
नन्दीश्वरसे संयुक्त रथपर आरूढ़ हो पराक्रमी भगवान् रुद्र अपने ओष्ठको दाँतोंसे दबाकर उसी ओर दौड़े; जहाँ श्रीहरि विद्यमान थे ॥ १७ ॥
पिबन्निव तदाकाशं सिंहयुक्तो महास्वनः ।
रथो भाति घनोन्मुक्तः पौर्णमास्यां यथा शशी ॥ १८ ॥
सिंहोंसे जुता हुआ उनका रथ ऐसी तीव्रगतिसे दौड़ रहा था, मानो आकाशको पिये लेता हो। उससे बड़ी भारी घरघराहट हो रही थी। वह रथ ऐसा जान पड़ता था, मानो मेघोंके आवरणसे मुक्त हुआ पूर्णमासीका चन्द्रमा प्रकाशित हो रहा हो ॥ १८ ॥
ततो गणसहस्रैस्तु नानारूपैर्भयावहैः ।
नदद्भिर्विविधान् नादान् रथो देवस्य शोभयन् ॥ १९ ॥
तत्पश्चात् नाना प्रकारके सिंहनाद करते हुए नाना रूप-धारी सहस्रों भयंकर गणोंके साथ महादेवजीका रथ रणभूमिकी शोभा बढ़ाने लगा ॥ १९ ॥
केचित् सिंहमुखास्तत्र तथा व्याघ्रमुखाः परे ।
नागाश्वोष्ट्रमुखास्तत्र प्रवेपुरतिपीडिताः ॥ २० ॥
भगवान् शिवके गणोंमें कोई सिंहके समान मुखवाले थे तो कोई व्याघ्रके समान; कितनोंके मुख हाथी, घोड़े और ऊँटके समान थे; ये सब श्रीकृष्णके बाणोंसे अत्यन्त पीड़ित होकर थर थर काँपने लगे ॥ २० ॥
व्यालयज्ञोपवीताश्च केचित् तत्र महाबलाः ।
खरोष्ट्रगजवक्त्राश्च अश्वग्रीवाश्च संस्थिताः ॥ २१ ॥
उनमेंसे कितने ही महाबली प्रमथगणोंने सर्पमय यज्ञो-पवीत धारण कर रखे थे; कितनोंके मुख गधे, ऊँट और हाथियोंके समान थे, कितने ही घोड़ोंकी-सी गर्दन लिये खड़े थे ॥ २१ ॥
छागमार्जारवक्त्राश्च मेषवक्त्रास्तथा परे ।
चीरिणः शिखिनश्चान्ये जटिलोर्ध्वशिरोरुहाः ॥ २२ ॥
भग्नाः परिपतन्ति स्म शङ्खदुन्दुभिनिःस्वनैः ।
अन्य शिवगणोंके मुख भेड़, बकरे और बिलावोंके समान थे; कितने ही चीर वस्त्र धारण किये हुए थे, कितनोंके मस्तकपर शिखा सुशोभित हो रही थीं; बहुतोंने जटाएँ बढ़ा रखी थीं और कितनोंके सिरके बाल ऊपरकी ओर उठे हुए थे। श्रीकृष्णके बाणोंसे घायल हो इन सबके पाँव उखड़ गये। ये शङ्ख एवं दुन्दुभियोंके शब्द सुनकर ही रणभूमिमें गिर पड़ते थे ॥ २२ १/२ ॥
केचित् सौम्यमुखास्तत्र दिव्यैः शस्त्रैरलंकृताः॥ २३ ॥
नानापुष्पकृतापीड़ा नानाप्रहरणाद्युधाः ।
कितने ही शिवगणोंके मुख सौम्य थे, वे वहाँ दिव्य अस्त्र-शस्त्रोंसे सुशोभित होते थे। उन्होंने भाँति-भाँतिके फूलोंके मुकुट धारण किये थे और उनके आयुध भी अनेक प्रकारके थे ॥ २३ १/२ ॥
वामना विकटाश्चैव सिंहव्याघ्रपरिच्छदाः ॥ २४ ॥
रुधिराद्र्रैमहावक्त्रैर्महादंष्ट्रा बलिप्रियाः ।
कितने ही गण बौने और विकट आकारवाले थे; उन्होंने सिंहों और व्याघ्रोंकी खालोंसे अपने शरीरको ढक रखा था। कितनोंकी दाढ़ें बहुत बड़ी थीं और वे खूनसे

विष्णुपर्व ] चतुर्विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ७१९

भीगे हुए विशाल मुखोंसे युक्त थे। उन्हें बलि अधिक प्रिय थी ॥ २४ १/२ ॥
देवं सम्परिवार्याथ महाशत्रुप्रमर्दनम् ॥ २५ ॥
लीलायमानास्तिष्ठन्ति संग्रामाभिमुखोन्मुखाः ।
ये सब-के-सब बड़े-बड़े शत्रुओंका मर्दन करनेवाले महादेवजीको चारों ओरसे घेरकर लीलापूर्वक संग्रामके लिये उत्सुक हो मुँह ऊपर किये खड़े थे ॥ २५ १/२ ॥
ततो दिव्यं रथं दृष्ट्वा रुद्रस्याक्लिष्टकर्मणः ॥ २६ ॥
कृष्णो गरुडमास्थाय ययौ रुद्राय संयुगे ।
तदनन्तर अनायास ही महान् कर्म करनेवाले रुद्रदेवके दिव्य रथको देखकर गरुड़पर बैठे हुए श्रीकृष्ण भी भगवान् रुद्रके साथ युद्ध करनेके लिये गये ॥ २६ १/२ ॥
वैनतेयस्थमास्यन्तमायान्तंमग्रणीं हरिम् ॥ २७ ॥
विव्याध कुपितो बाणैर्नाराचानां शतेन सः ।
गरुड़की पीठपर बैठकर आते हुए यादवकुलके अग्रणी श्रीहरिको क्रोधमें भरे हुए भगवान् शिवने सौ नाराचोंसे घायल कर दिया ॥ २७ १/२ ॥
स शरैरर्दितस्तेन हरेणाक्लिष्टकर्मणा ॥ २८ ॥
हरिर्जग्राह कुपितो ह्यस्त्रं पार्जन्यमुत्तमम् ।
बिना क्लेशके ही बड़े-बड़े कर्म करनेवाले महादेवजीके द्वारा बाणोंसे पीड़ित किये जानेपर क्रोधमें भरे हुए श्रीहरिने उत्तम पार्जन्यास्त्र हाथमे लिया ॥ २८ १/२ ॥
प्रचचाल ततो भूमिर्विष्णुरुद्रप्रपीडिता ॥ २९ ॥
नागाश्चोर्ध्वमुखास्तत्र विचेलुरभिपीडिताः ।
उस समय भगवान् विष्णु और रुद्रके भारसे अत्यन्त पीड़ित हुई भूमि काँपने लगी । आठों दिग्गज ऊपर मुँह किये पीड़ा पाकर विचलित हो उठे ॥ २९ १/२ ॥
पर्वताः पतितास्तत्र जलधाराभिराप्लुताः ॥ ३० ॥
केचिन्मुमुचिरे तत्र शिखराणि समन्ततः ।
बहुत-से पर्वत जलकी धाराओंसे आप्लावित हो वहाँ धराशायी हो गये । कितने ही सब ओरसे अपने शिखरोंका परित्याग करने लगे ॥ ३० १/२ ॥
दिशश्च प्रदिशश्चैव भूमिरकाशमेव च ॥ ३१ ॥
प्रदीप्तानीव दृश्यन्ते स्थाणुकृष्णसमागमे ।
समन्ततश्च निर्घाताः पतन्ति धरणीतले ॥ ३२ ॥
भगवान् शिव और कृष्णके संघर्षके समय दिशाएँ, विदिशाएँ, पृथ्वी और आकाश—ये सभी प्रज्वलित-से दिखायी देते थे । भूतलपर सब ओरसे वज्रपात होने लगा ॥ ३१-३२ ॥
शिवाश्चैवाशिवान् नादान् नदन्ते भीमदर्शनाः ।
वासवश्चानदन् घोरं रुधिरं चाप्यवर्षत ॥ ३३ ॥
भयानक दिखायी देनेवाली गीदड़ियाँ अमङ्गलसूचक बोली बोलने लगीं । इन्द्र घोर गर्जना करते हुए रक्तकी वर्षा करने लगे ॥ ३३ ॥
उल्का च बाणसैन्यस्य पुच्छेनावृत्य तिष्ठति ।
प्रववौ मारुतश्चापि ज्योतींष्याकुलतां ययुः ॥ ३४ ॥
प्रभाहीनास्तथौषध्यो न चरन्त्यन्तरिक्षगाः ।
उल्का बाणासुरकी सेनाके पुच्छभागको आवृत करके स्थित हुई थी। वायु प्रचण्ड गतिसे बह रही थी और तारे व्याकुलताको प्राप्त हो रहे थे । ओषधियाँ निस्तेज हो गयीं और आकाशचारी प्राणी आकाशमें विचरण नहीं करते थे ॥
एतस्मिन्नन्तरे ब्रह्मा सर्वदेवगणैर्वृतः ॥ ३५ ॥
त्रिपुरान्तकमुद्यन्तं ज्ञात्वा रुद्रमुपागमत् ।
इसी बीचमें समस्त देवताओंसे घिरे हुए ब्रह्माजी त्रिपुरनाशक रुद्रको युद्धके लिये उद्यत जानकर वहाँ आये ॥
गन्धर्वाप्सरसश्चैव यक्षा विद्याधरास्तथा ॥ ३६ ॥
सिद्धचारणसंघाश्च पश्यन्तोऽथ दिवि स्थिताः।
गन्धर्व, अप्सरा, यक्ष, विद्याधर, सिद्ध और चारणोंके समुदाय भी वह युद्ध देखनेके लिये आकाशमें खड़े हो गये ॥ ३६ १/२ ॥
ततः पार्जन्यमस्त्रं तत् क्षिप्तं रुद्राय विष्णुना ॥ ३७ ॥
ययौ ज्वलन्नथ तदा यतो रुद्रो रथस्थितः ।
इसी समय भगवान् श्रीकृष्णने रुद्रदेवपर पार्जन्यास्त्रका प्रहार किया । वह अस्त्र प्रज्वलित होकर उसी ओर चला, जहाँ रुद्रदेव रथपर विराजमान थे ॥ ३७ १/२ ॥
ततः शतसहस्राणि शराणां नतपर्वणाम् ॥ ३८ ॥
निपेतुः सर्वतो दिग्भ्यो यतो हररथः स्थितः ।
फिर तो जहाँ भगवान् शङ्करका रथ खड़ा था, वहाँ सभी दिशाओंसे झुकी हुई गाँठवाले लाखों बाण गिरने लगे ॥
अथाग्नेयं महारौद्रमस्त्रमस्त्रविदां वरः ॥ ३९ ॥
मुमोच रुषितो रुद्रस्तदद्भुतमिवाभवत् ।
तब रोषमें भरे हुए अस्त्रवेत्ताओंमें श्रेष्ठ रुद्रदेवने वहाँ महा-रौद्र आग्नेयास्त्रका प्रयोग किया । वह अद्भुत-सा प्रतीत हुआ ॥
ततो विशीर्णदेहास्ते चत्वारोऽपि समन्ततः ॥ ४० ॥
नादृश्यन्त शरैश्छन्ना दह्यमानाश्च वह्निना ।
सिंहनादं ततश्चक्रुः सर्व एवासुरोत्तमाः ॥ ४१ ॥
उससे उन चारोंके शरीर सब ओरसे क्षत विक्षत हो गये । वे बाणोंसे आच्छादित हो आगसेजलते हुए अदृश्य हो गये । यह देख सभी असुरप्रवर वीर वहाँ सिंहनाद करने लगे ॥
हतोऽयमिति विज्ञाय आग्नेयास्त्रेण वै तदा ।
ततस्तद् विसहित्वाऽऽजौ ह्यस्त्रमस्त्रविदां वरः ॥४२॥
जग्राह वारुणं सोऽस्त्रं वासुदेवः प्रतापवान् ।
उन्होंने यह समझ लिया था कि श्रीकृष्ण आग्नेयास्त्रसे मारे गये । तदनन्तर युद्धस्थानमें उस अस्त्रकी चोट सहकर अस्त्रवेत्ताओंमें श्रेष्ठ प्रतापी वासुदेवने वारुणास्त्र उठाया ॥
प्रयुक्ते वासुदेवेन वारुणास्त्रेऽतितेजसि ॥ ४३ ॥
आग्नेयं प्रशमं यातमस्त्रं वारुणतेजसा ।
वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णद्वारा अत्यन्त तेजस्वी वारुणास्त्रका प्रयोग होनेपर उसके तेजसे भगवान् शङ्करका आग्नेयास्त्र शान्त हो गया ॥ ४३ १/२ ॥
तस्मिन् प्रतिहते त्वस्त्रे वासुदेवेन संयुगे ॥ ४४ ॥
पैशाचं राक्षसं रौद्रं तथैवाङ्गिरसं भवः ।
मुमोचास्त्राणि चत्वारि युगान्ताग्निनिभानि वै ॥ ४५ ॥

७२० श्रीमहाभारते खिलभागे [ हरिवंशे

उस युद्धस्थलमें भगवान् वासुदेवद्वारा उस आग्नेयास्त्रके प्रतिहत हो जानेपर भगवान् शिवने पैशाच, राक्षस, रौद्र तथा आङ्गिरस नामक चार अस्त्र छोड़े, जो प्रलयाग्निके समान तेजस्वी थे ॥ ४४-४५ ॥

वायव्यमथ सावित्रं वासवं मोहनं तथा।
अस्त्राणां वारणार्थाय वासुदेवो व्यमुञ्चत ॥ ४६॥
तब भगवान् वासुदेवने उक्त चारों अस्त्रोंका निवारण करनेके लिये क्रमशः वायव्यास्त्र, सावित्रास्त्र, ऐन्द्रास्त्र तथा मोहनास्त्रका प्रयोग किया ॥ ४६ ॥

अस्त्रैश्चतुर्भिंश्चत्वारि वारयित्वाशु माधवः।
मुमोच वैष्णवं सोऽस्त्रं व्यादितास्यान्तकोपमम् ॥४७॥
उन चारों अस्त्रोंसे उनके चारों अस्त्रोंका तत्काल निवारण करके लक्ष्मापति श्रीकृष्णने वैष्णवास्त्रका प्रयोग किया जो मुँह बाये हुए कालके समान प्रतीत होता था ॥ ४७ ॥

वैष्णवास्त्रे प्रयुक्ते तु सर्व एवासुरोत्तमाः।
भूतयक्षगणाश्चैव बाणानीकं च सर्वशः ॥ ४८ ॥
दिशः सर्वाः प्राद्रवन्त भयमोहेन विह्वलाः।
वैष्णवास्त्रका प्रयोग होनेपर सभी असुरशिरोमणि वीर भूत, यक्षगण एव बाणकी सारी सेना—ये सभी भय और मोहसे व्याकुल हो सम्पूर्ण दिशाओंकी ओर भाग गये ॥ ४८ ॥

प्रमाथगणभूयिष्ठे दीर्णे सैन्ये महासुरः ॥ ४९ ॥
निर्जगाम ततो बाणो युद्धयायाभिमुखस्त्वरन् ।
जिसमें प्रमथगणोंकी अधिकता थी, उस सेनाके भी पलायन कर जानेपर महान् असुर बाण युद्धके लिये उत्सुक हो बड़ी उतावलीके साथ निकला ॥ ४९ ॥

भीमप्रहरणैर्घोरैर्दैत्यैश्च सुमहायलैः।
वृतो महारथैर्वीरैर्वज्रीव सुरसत्तमैः ॥ ५० ॥
जैसे वज्रधारी इन्द्र श्रेष्ठ देवताओंसे घिरे होते हैं, उसी प्रकार वह भयकर अस्त्र-शस्त्रवाले महाबली एवं वार महारथी घोर दैत्योंसे घिरा हुआ था ॥ ५० ॥

वैशम्पायन उवाच
जपैश्च मन्त्रैश्च तथौषधीभि-
र्महात्मनः स्वस्त्ययनं प्रचक्रुः।
स तत्र वस्त्राणि शुभाश्च गावः
फलानि पुष्पाणि तथैव निष्कान् ॥ ५१ ॥
वलेः सुतो ब्राह्मणेष्यः प्रयच्छन्
विराजते तेन यथा धनेशः।
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! उस समय ब्राह्मण-लोग जप, मन्त्र और औषधियोंद्वारा महामनस्वी बाणासुरके लिये स्वस्तिवाचन कर रहे थे और बलिकुमार बाण उन ब्राह्मणोंके लिये बहुत-से वस्त्र, शुभलक्षणा गौएँ, फल, फूल तथा स्वर्ण-मुद्राएँ देता हुआ धनाध्यक्ष कुवेरके समान शोभा पाता था ॥

सहस्रसूर्यो बहुकिङ्किणीकः
परार्ध्यजाम्बूनदरत्नचित्रः ॥ ५२ ॥
सहस्रचन्द्रायुततारकश्च
रथो महानग्निरिवावभाति।
तमास्थितो दानवसंगृहीतं
महाध्वजं कार्मुकधृक् स बाणः॥ ५३ ॥
उसके विशाल रथमें सहस्रों सूर्योंके चिह्न बने थे, बहुत-सी छोटी-छोटी घंटियाँ लगी थीं। वह बहुमूल्य सुवर्ण तथा रत्नोंसे सुसज्जित होकर विचित्र शोभा धारण करता था। उसमें सहस्रों चन्द्रमा तथा दस हजार तारोंके चिह्न बने थे। वह महान् रथ अग्निके समान प्रकाशित हो रहा था। दानव कुम्भाण्डने उस रथकी रास अपने हाथमें ले रखी थी। उसपर विशाल ध्वजा फहरा रही थी और उसपर बैठे हुए बाणासुरने हाथमें धनुष ले रखा था ॥ ५२-५३ ॥

उद्धर्तिष्यन् यदुपूङ्गवाना-
मर्ताय रौद्रं स विभर्ति रूपम्।
स मन्युमान् वीररथौघसंकुलो
विनिर्ययौ तान् प्रति दैत्यसागरः ॥ ५४ ॥
वातप्रवृद्धस्तु तरङ्गसंकुलो
यथार्णवो लोकविनाशनाय।
वह उन यदुपूङ्गव वीरोंका संहार कर डालनेके लिये उद्यत हो अत्यन्त भयंकर रूप धारण किये हुए था, क्रोधमें भरा था और वीर रथियोंके समुदायसे घिरा हुआ था। वह दैत्यसागर उन यादववीरोंकी ओर बढ़ चला; ठीक उसी तरह, जैसे वायुके वेगसे बढ़ा हुआ उत्ताल तरंगोंस व्याप्त महासागर समस्त लोकोंका विनाश करनेके लिये अग्रसर हो रहा हो ॥

भीमानि संत्रासकरैर्वपुर्भि-
स्तान्यग्रतो भान्ति बलानि तस्य ॥ ५५ ॥
महारथान्युच्छ्रितकार्मुकानि
सपर्वतानीव वनानि राजन्।
विनिःसृतः सागरतोयवासा-
दत्यद्भुतश्चाहवद्रष्टुकामः ॥ ५६ ॥
लोगोंके मनमें त्रास उत्पन्न करनेवाले शरीरोंके द्वारा भयंकर प्रतीत होनेवाली बहुत-सी सेनाएँ उसके आगे-आगे चल रही थीं। राजन् ! विशाल रथों और उठे हुए धनुषोंसे युक्त वे सेनाएँ पर्वतसहित वनोंके समान प्रतीत होती थीं। अत्यन्त अद्भुत रूपवाला बाणासुर वह युद्ध देखनेके लिये समुद्रके निकटवर्ती वासस्थानसे निकलकर चला ॥ ५५-५६ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि रुद्रकृष्णयुद्धे चतुर्विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें भगवान् रुद्र और श्रीकृष्णका युद्धविषयक एक सौ चौबीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२४ ॥

[विष्णुपर्व ] पञ्चविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ७२१


पञ्चविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः

श्रीकृष्णके जृम्भास्त्रसे भगवान् शङ्करका जँभाईके वशीभूत होना, ब्रह्माजीके द्वारा शिवजीको विष्णुके साथ उनकी एकताका स्मरण दिलाना तथा ब्रह्माजीके पूछनेपर मार्कण्डेयजीका हरिहरकी एकता स्थापित करते हुए माहात्म्यसहित हरिहरात्मक स्तोत्रका वर्णन करना

वैशम्पायन उवाच
अन्धकारीकृते लोके प्रदीप्ते त्र्यम्बके तथा।
न नन्दी नापि च रथो न रुद्रः प्रत्यदृश्यत ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! वैष्णवास्त्रका प्रयोग होनेपर जब सम्पूर्ण जगत्में अन्धकार छा गया और भगवान् शङ्कर उसके तेजसे जलने-से लगे, उस समय उस अस्त्रसे आच्छादित होनेके कारण न नन्दी, न रथ और न रुद्रदेव ही दिखायी देते थे ॥ १ ॥

द्विगुणं दीप्तदेहस्तु रोषेण च बलेन च।
त्रिपुरान्तकरो बाणं जग्राह स चतुर्मुखम् ॥ २ ॥

तब रोष और बलसे त्रिपुरान्तकारी भगवान् शिवका शरीर दुगुना दमक उठा। उन्होंने चार फलवाला बाण अपने हाथमें लिया ॥ २ ॥

संदधत् कार्मुकं चैव क्षेप्तुकामस्त्रिलोचनः।
विज्ञातो वासुदेवेन चित्तज्ञेन महात्मना ॥ ३ ॥

वे भगवान् त्रिलोचन उस बाणको धनुषपर रखकर छोड़ना ही चाहते थे कि सबके मनकी बात जाननेवाले महात्मा वासुदेवने उनके मनोभावको समझ लिया ॥ ३ ॥

जम्भणं नाम सोऽप्यस्त्रं जग्राह पुरुषोत्तमः।
हरं संजृम्भयामास क्षिप्रकारी महाबलः ॥ ४ ॥

फिर तो शीघ्रकारी महाबली पुरुषोत्तम श्रीकृष्णने जृम्भणास्त्र उठाया और उसके द्वारा महादेवजीको जृम्भासे अभिभूत कर दिया ॥ ४ ॥

सशरः सधनुश्चैव हरस्तेनाशु जृम्भितः।
संज्ञां न लेभे भगवान् विजेतसुररक्षसाम् ॥ ५ ॥

इससे भगवान् शिव शीघ्र ही धनुष और बाण लिये जँभाई लेने लगे; असुरों और राक्षसोंपर विजय पानेवाले भगवान् शिवको उस समय सुध-बुध न रही ॥ ५ ॥

सशरं सधनुष्कं च दृष्ट्वाऽऽत्मानं विजृम्भितम् ।
बलोन्मत्तोऽथ बाणोऽसौ शर्वं चोदयतेऽसकृत् ॥ ६ ॥

धनुष और बाणसहित आत्मस्वरूप शिवको जँभाईके वशीभूत हुआ देख बलोन्मत्त बाणासुर बारंबार उन्हें युद्धके लिये प्रेरित करने लगा ॥ ६ ॥

ततो ननाद भूतात्मा स्निग्धगम्भीरया गिरा।
प्रध्मापयामास तदा कृष्णः शङ्खं महाबलः ॥ ७ ॥

तब सम्पूर्ण भूतोंके आत्मा महाबली भगवान् श्रीकृष्णने स्निग्ध गम्भीर वाणीमें सिंहनाद किया और जोर-जोरसे शङ्ख बजाया ॥ ७ ॥

पाञ्चजन्यस्य घोषेण शार्ङ्गविस्फूर्जितेन च।
देवं विजृम्भितं दृष्ट्वा सर्वभूतानि तत्रसुः ॥ ८ ॥

पाञ्चजन्य शङ्खके गम्भीर घोषसे, शार्ङ्ग-धनुषकी टङ्कारसे तथा महादेवजीको जृम्भाके वशीभूत देखकर समस्त प्राणी थर्रा उठे ॥ ८ ॥

एतस्मिन्नन्तरे तत्र रुद्रस्य पार्षदा रणे।
मायायुद्धं समाश्रित्य प्रद्युम्नं पर्यवारयन् ॥ ९ ॥

इसी बीचमें रुद्रदेवके पार्षदोंने मायायुद्धका आश्रय ले रणभूमिमें प्रद्युम्नको घेर लिया ॥ ९ ॥

सर्वांस्तु निद्रावशगान् कृत्वा मकरकेतुमान् ।
दानवान् नाशयत् तत्र शरजालेन वीर्यवान् ।
प्रमाथगणभूयिष्ठांस्तत्र तत्र महाबलान् ॥ १० ॥

परंतु पराक्रमी मकरध्वज प्रद्युम्नने उन सबको निद्राके वशीभूत करके वहाँ बाणसमूहोंद्वारा महाबली दानवोंका—जिनमें प्रमथगणोंकी संख्या अधिक थी—विनाश कर डाला॥ १० ॥

ततस्तु जृम्भमाणस्य देवस्याक्लिष्टकर्मणः।
ज्वाला प्रादुरभूद् वक्त्राद् दहन्तीव दिशो दश ॥ ११ ॥

तदनन्तर अनायास ही महान् कर्म करनेवाले तथा जृम्भाके वशीभूत हुए महादेवजीके मुखसे एक आगकी ज्वाला प्रकट हुई, जो सम्पूर्ण दिशाओंको दग्ध करती हुई-सी प्रतीत होती थी ॥ ११ ॥

ततस्तु धरणीदेवी पीड्यमाना महात्मभिः।
ब्रह्माणं विश्वधातारं वेपमानाभ्युपागमत् ॥ १२ ॥

उस समय उन महात्माओंसे पीड़ित हुई पृथिवीदेवी काँपती हुई विश्व-स्रष्टा ब्रह्माजीकी शरणमें गयी ॥ १२ ॥

पृथिव्युवाच
देवदेव महाबाहो पीड्यामि परौजसा।
कृष्णरुद्रभराक्रान्ता भविष्यार्काणवा पुनः ॥ १३ ॥

पृथिवी बोली—देवाधिदेव ! महाबाहो ! मैं महान् ओज (बल-पराक्रम) से पीड़ित हूँ। भगवान् श्रीकृष्ण और महादेवजीके भारसे आक्रान्त हो पुनः एकार्णवके जलमें निमग्न हो जाऊँगी-ऐसा जान पड़ता है ॥ १३ ॥

७२२श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

अविषह्यामिमं भारं चिन्तयस्व पितामह।
लघ्वीभूता यथा देव धारयेयं चराचरम्॥ १४॥

पितामह! मैं इस भारको अपने लिये असह्य मानती हूँ, आप इसपर विचार कीजिये। देव! ऐसा कोई उपाय कीजिये, जिससे मैं हलकी होकर चराचर जगत्‌को धारण कर सकूँ॥ १४॥

ततस्तु काश्यपीं देवीं प्रत्युवाच पितामहः।
मुहूर्तं धारयात्मानमाशु लघ्वी भविष्यसि॥ १५॥

तब पितामह ब्रह्माजीने काश्यपीदेवी (पृथ्वी) से इस प्रकार कहा—‘तू दो घड़ीतक किसी प्रकार अपने आपको रोके रह; फिर शीघ्र ही हलकी हो जायगी’॥ १५॥

वैशम्पायन उवाच
दृष्ट्वा तु भगवान् ब्रह्मा रुद्रं वचनमब्रवीत्।
स्पृष्टो महासुरवधः किं भूयः परिरक्ष्यते॥ १६॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! तब भगवान् ब्रह्माने रुद्रदेवसे मिलकर यह बात कही—‘(आपकी सम्मतिसे ही तो) बड़े-बड़े असुरोंका वध आरम्भ किया गया है, फिर आप स्वयं ही असुरवृन्दकी रक्षा क्यों करते हैं?॥१६॥

न च युद्धं महाबाहो तव कृष्णेन रोचते।
न च बुध्यसि कृष्णं त्वमात्मानं तु द्विधा कृतम्॥ १७॥

‘महाबाहो! श्रीकृष्णके साथ आपका युद्ध मुझे अच्छा नहीं लगता। आप श्रीकृष्णको समझ नहीं रहे हैं, आपका आत्मा ही (श्रीकृष्ण बनकर) दो रूपोंमें विभक्त हो गया है’॥ १७॥

ततः शरीरयोगाद्धि भगवानव्ययः प्रभुः।
प्रविश्य पश्यते कृत्स्नांस्त्रींल्लोकान् सचराचरान्॥ १८॥

ब्रह्माजीके इस प्रकार कहनेपर अविनाशी प्रभु भगवान् शिव शरीरके भीतर अन्तःकरणमें ध्यान लगाकर हृदयस्थित ब्रह्ममें प्रविष्ट हो, तीनों लोकोंके समस्त चराचर प्राणियोंका साक्षात्कार करने लगे॥ १८॥

प्रविश्य योगं योगात्मा वरांस्ताननुचिन्तयन्।
द्वारवत्यां यदुक्तं च तदनुस्मृत्य सर्वशः।
जगाद नोत्तरं किंचिन्निवृत्तो ह्यभवत् तदा॥ १९॥

योगस्वरूप भगवान् शङ्कर योगमें प्रवेश करके (समाधि लगाकर) पहलेके दिये हुए उन वरोंका चिन्तन करने लगे तथा द्वारकामें जो कुछ कहा था, उन सब बातोंका वारंवार स्मरण करके उन्होंने ब्रह्माजीको कोई उत्तर नहीं दिया; वे उस समय युद्धसे निवृत्त हो गये॥ १९॥

आत्मानं कृष्णयोनिस्थं पश्यत ह्येकयोनिजम्।
ततो निःसृत्य रुद्रस्तु न्यस्तवादोऽभवन्मृधे॥ २०॥

उन्होंने अपने-आपको सच्चिदानन्दस्वरूप श्रीकृष्णमय योनि (परब्रह्म) में स्थित देखा और अपनेको एक-अद्वितीय ब्रह्मस्वरूप योनिसे प्रकट हुआ जाना। तत्पश्चात् रुद्रदेव वहाँसे निकलकर युद्धसे अलग हो गये। उन्होंने उस रणक्षेत्रमें श्रीकृष्णके साथ वाद-विवाद या युद्धकी भावनाका परित्याग कर दिया॥ २०॥

ब्रह्माणं चाब्रवीद् रुद्रो न योत्स्ये भगवन्निति।
कृष्णेन सह संग्रामे लघ्वी भवतु मेदिनी॥ २१॥

तत्पश्चात् रुद्रने ब्रह्माजीसे कहा—‘भगवन्! अब मैं संग्रामभूमिमें श्रीकृष्णके साथ युद्ध नहीं करूँगा, अब यह पृथ्वी हलकी हो जाय’॥ २१॥

ततः कृष्णोऽथ रुद्रश्च परिष्वज्य परस्परम्।
परां प्रीतिमुपागम्य संग्रामादपजग्मतुः॥ २२॥

इसके बाद श्रीकृष्ण और रुद्र एक दूसरेसे मिलकर बहुत प्रसन्न हुए और आपसके संग्रामसे हट गये॥२२॥

न च तौ पश्यते कश्चिद् योगिनौ योगमागतौ।
एको ब्रह्मा तथा कृत्वा पश्यँल्लोकान् पितामहः॥ २३॥
उवाचैतन् समुद्दिश्य मार्कण्डेयं सनारदम्।
पार्श्वस्थं परिपप्रच्छ ज्ञात्वा वै दीर्घदर्शिनम्॥ २४॥

श्रीकृष्ण और रुद्र दोनों योगी हैं तथा दोनों एक दूसरेसे अभेद-सम्बन्धको प्राप्त हैं, इस बातको वहाँ दूसरे किसीने नहीं समझा; एकमात्र पितामह ब्रह्माने उन दोनोंका अभेद सम्बन्ध स्थापित करके उन्हें उसी भावसे देखा और सब लोगोंकी ओर देखते हुए इसी विषयको लेकर अपने बगलमें खड़े हुए नारद तथा मार्कण्डेयको दीर्घदर्शी जानकर इस प्रकार पूछा॥ २३-२४॥

पितामह उवाच
मन्दरस्य गिरेः पार्श्वे नलिन्यां भवकेशवौ।
रात्रौ स्वप्नान्तरे ब्रह्मन् मया दृष्टौ हराच्युतौ॥ २५॥

पितामह बोले—ब्रह्मन्! मैंने मन्दराचल पर्वतके पार्श्वभागमें रातको सोते समय सपनेमें एक सरोवरके तटपर श्रीकृष्ण और भगवान् शङ्करको देखा, जो तत्काल ही एक दूसरेके रूपमें बदल गये थे (अर्थात् श्रीकृष्णकी जगह शिव और शिवकी जगह श्रीकृष्ण हो गये थे)॥ २५॥

हरं च हरिरूपेण हरिं च हररूपिणम्।
शङ्खचक्रगदापाणिं पीताम्बरधरं हरम्॥ २६॥

मैंने हरको हरिरूपमें देखा और हरिको हररूपमें; भगवान् हरने हाथोंमें शङ्ख, चक्र और गदा ले रखी थी और उनके अङ्गोंपर पीताम्बर शोभा पा रहा था॥ २६॥

त्रिशूलपट्टिशधरं व्याघ्रचर्मधरं हरिम्।
गरुडस्थं चापि हरं हरिं च वृषभध्वजम्॥ २७॥

उधर श्रीहरि त्रिशूल और पट्टिश धारण किये वाघम्बर पहने हुए थे; भगवान् शङ्कर गरुड़पर बैठे थे और श्रीहरिने

विष्णुपर्व ] पञ्चविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ७२३


वृषभवाहन होकर अपनी ध्वजामें वृषभका चिह्न धारण किया था॥ २७॥

विस्मयो मे महान् ब्रह्मन् दृष्ट्वा तत् परमाद्भुतम्।
एतदाचक्ष्व भगवन् याथातथ्येन सुव्रत॥ २८॥

ब्रह्मन्! उत्तम व्रतका पालन करनेवाले महर्षे! वह अद्भुत दृश्य देखकर मुझे महान् विस्मय हुआ। भगवन्! आप इसके रहस्यका यथार्थरूपसे विवेचन करें॥ २८॥

मार्कण्डेय उवाच

शिवाय विष्णुरूपाय विष्णवे शिवरूपिणे।
यथान्तरं न पश्यामि तेन तौ दिशतः शिवम्॥ २९॥

मार्कण्डेयजी बोले—विष्णुरूपधारी शिव और शिवरूपधारी विष्णुको नमस्कार है। मैं इन दोनोंमें कोई अन्तर नहीं देखता, मेरे इस भावसे संतुष्ट होकर वे दोनों मुझे कल्याण प्रदान करें॥ २९॥

अनादिमध्यनिधनमेतदक्षरमव्ययम् ।
तदेव ते प्रवक्ष्यामि रूपं हरिहरात्मकम्॥ ३०॥

आदि, मध्य और अन्तसे रहित जो यह अविनाशी अक्षर ब्रह्म है, उसका स्वरूप हरिहरात्मक है, ब्रह्मन्! मैं आपके समक्ष उसी हरिहरात्मक ब्रह्मका वर्णन करूँगा॥ ३०॥

यो विष्णुः स तु वै रुद्रो यो रुद्रः स पितामहः।
एका मूर्तिस्त्रयो देवा रुद्रविष्णुपितामहाः॥ ३१॥

जो विष्णु हैं, वे ही रुद्र हैं और जो रुद्र हैं, वे ही ब्रह्मा हैं; इनका मूलस्वरूप तो एक ही है, परंतु ये कार्यभेदसे रुद्र, विष्णु और ब्रह्मा तीन देवता कहलाते हैं॥ ३१॥

वरदा लोककर्तारो लोकनाथाः स्वयम्भुवः।
अर्धनारीश्वरास्ते तु व्रतं तीव्रं समास्थिताः॥ ३२॥

ये सब-के-सब लोकस्रष्टा, वरदायक, जगन्नाथ, स्वयम्भू, अर्धनारीश्वर तथा तीव्र व्रतका आश्रय लेनेवाले हैं॥ ३२॥

यथा जले जलं क्षिप्तं जलमेव तु तद् भवेत्।
रुद्रं विष्णुः प्रविष्टस्तु तथा रुद्रमयो भवेत्॥ ३३॥

जैसे जलमें डाला हुआ जल जलरूप ही हो जाता है, उसी प्रकार रुद्रदेवमें प्रविष्ट हुए भगवान् विष्णु रुद्रमय हो जाते हैं॥ ३३॥

अग्निमग्निः प्रविष्टस्तु अग्नेरेव यथा भवेत्।
तथा विष्णुं प्रविष्टस्तु रुद्रो विष्णुमयो भवेत्॥ ३४॥

जैसे अग्निमे प्रविष्ट हुई अग्नि अग्निरूप ही होती है, उसी प्रकार विष्णुमे प्रविष्ट हुए रुद्रदेव विष्णुरूप ही होते हैं॥ ३४॥

रुद्रमग्निमयं विद्याद् विष्णुः सोमात्मकः स्मृतः।
अग्नीषोमात्मकं चैव जगत् स्थावरजंगमम्॥ ३५॥

रुद्रको अग्निस্বরূপ जाने और भगवान् विष्णु सोमस्वरूप माने गये हैं। इसीलिये यह समस्त चराचर जगत् अग्नीषोमात्मक कहलाता है॥ ३५॥

कर्तारौ चापहर्तारौ स्थावरस्य चरस्य तु।
जगतः शुभकर्तारौ प्रभविष्णू महेश्वरौ॥ ३६॥

यह हरि और हर ही समस्त चराचर जगत्के कर्त्ता, संहारक, शुभकारक तथा प्रभावशाली महेश्वर हैं॥ ३६॥

कर्तृकारणकर्तारौ कर्तृकारणकारकौ।
भूतभव्यभवौ देवौ नारायणमहेश्वरौ॥ ३७॥

ये नारायण और महेश्वरदेव कर्ता और कारणके भी आदि कर्ता हैं तथा कर्ता और कारणसे भी काम करानेवाले हैं। ये ही दोनों भूत, भविष्य और वर्तमानरूप हैं॥ ३७॥

जगतः पालकावेतावेतौ सृष्टिकरी स्मृतौ।
एते चैव प्रवर्षन्ति भान्ति वान्ति सृजन्ति च।
एतत् परतरं गुह्यं कथितं ते पितामह॥ ३८॥

ये ही जगत्के पालक और ये ही इसकी सृष्टि करनेवाले माने गये हैं। ये ब्रह्मा, विष्णु और शिव (मेघरूपसे जलकी) वर्षा करते हैं। (सूर्यरूपसे) प्रकाशित होते हैं और (वायुरूपसे) सर्वत्र गतिशील होते हैं। ये ही सृष्टि करते हैं। पितामह! यह मैंने आपसे परम गुह्य रहस्यका वर्णन किया है॥ ३८॥

यश्चैनं पठते नित्यं यश्चैनं शृणुयान्नरः।
प्राप्नोति परमं स्थानं विष्णुरुद्रप्रसादजम्॥ ३९॥

जो प्रतिदिन इस स्तोत्रका पाठ करता और जो इसे सुनता है, वह मनुष्य भगवान् विष्णु और रुद्रकी कृपासे परम पदको प्राप्त कर लेता है॥ ३९॥

देवौ हरिहरौ स्तोष्ये ब्रह्मणा सह संगतौ।
एतौ च परमौ देवौ जगतः प्रभवाप्ययौ॥ ४०॥

मैं ब्रह्माजीके साथ मिले हुए हरि और हर दोनों देवताओंकी स्तुति करूँगा। ये ही दोनों परम देव हैं और ये ही जगत्की सृष्टि तथा संहारके कारण हैं॥ ४०॥

रुद्रस्य परमो विष्णुर्विष्णोश्च परमः शिवः।
एक एव द्विधाभूतो लोके चरति नित्यशः॥ ४१॥

रुद्रके परमदेव विष्णु हैं और विष्णुके परमदेव शिव हैं। एक ही परमेश्वर दो रूपोंमे व्यक्त होकर सदा समस्त जगत्में विचरते रहते हैं॥ ४१॥

न विना शंकरं विष्णुर्न विना केशवं शिवः।
तस्मादेकत्वमायातो रुद्रोपेन्द्रौ तु तौ पुरा।
नमो रुद्राय कृष्णाय नमः संहतचारिणे॥ ४२॥

भगवान् शङ्करके बिना विष्णु नहीं हैं और विष्णुके

७२४श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

बिना शिव नहीं हैं। अतः वे दोनों रुद्र और विष्णु पूर्वकालसे ही एकत्वको प्राप्त हैं। संयुक्त अथवा एकरूप होकर विचरनेवाले भगवान् रुद्र एवं श्रीकृष्णको नमस्कार है॥

नमः षडर्धनेत्राय सङ्घिनेत्राय वै नमः।
नमः पिङ्गलनेत्राय पद्मनेत्राय वै नमः॥ ४३॥
त्रिनेत्रधारी शिवको नमस्कार है, साथ ही द्विनेत्रधारी श्रीकृष्णको नमस्कार है; पिङ्गलनेत्रवाले शिवको नमस्कार है और प्रफुल्ल कमलके समान नेत्रवाले श्रीकृष्णको नमस्कार है॥ ४३॥

नमः कुमारगुरवे प्रद्युम्नगुरवे नमः।
नमो धरणीधराय गङ्गाधराय वै नमः॥ ४४॥
कुमार कार्तिकेयके पिता भगवान् शिवको नमस्कार है, प्रद्युम्नके पिता भगवान् श्रीकृष्णको नमस्कार है; शेषरूपसे पृथ्वीको धारण करनेवाले श्रीहरिको प्रणाम है तथा सिरपर गङ्गाजीको धारण करनेवाले शिवको नमस्कार है॥ ४४॥

नमो मयूरपिच्छाय नमः केयूरधारिणे।
नमः कपालमालाय वनमालाय वै नमः॥ ४५॥
मस्तकपर मोरपङ्ख धारण करनेवाले श्रीकृष्णको नमस्कार है। सर्पोंका बाजूबंद धारण करनेवाले शिवको नमस्कार है। वनमालाधारी श्रीकृष्ण तथा कपालमालाधारी शिवको प्रणाम है॥ ४५॥

नमस्त्रिशूलहस्ताय चक्रहस्ताय वै नमः।
नमः कनकदण्डाय नमस्ते ब्रह्मदण्डिने॥ ४६॥
हाथमें त्रिशूल धारण करनेवाले श्रीशिवको नमस्कार है; एक हाथमें सुदर्शन चक्र धारण करनेवाले श्रीहरिको नमस्कार है। सोनेका दण्ड धारण करनेवाले श्रीहरिको और ब्रह्मदण्डधारी शिवको नमस्कार है॥ ४६॥

नमश्चर्मनिवासाय नमस्ते पीतवाससे।
नमोऽस्तु लक्ष्मीपतये उमायाः पतये नमः॥ ४७॥
वस्त्रकी जगह व्याघ्रचर्म धारण करनेवाले शिवको प्रणाम है। पीताम्बरधारी श्रीकृष्णको नमस्कार है, लक्ष्मीपति श्रीहरिको प्रणाम है और उमापति महादेवजीको नमस्कार है॥ ४७॥

नमः खट्वाङ्गधाराय नमो मुसलधारिणे।
नमो भस्माङ्गरागाय नमः कृष्णाङ्गधारिणे॥ ४८॥
खट्वाङ्गधारी शिवको प्रणाम है और मुसलधारी बलभद्रस्वरूप श्रीहरिको नमस्कार है, भस्ममय अङ्गराग धारण करनेवाले शिवको नमस्कार है तथा श्यामसुन्दर शरीरधारी श्रीहरिको प्रणाम है॥ ४८॥

नमः श्मशानवासाय नमः सागरवासिने।
नमो वृषभवाहाय नमो गरुडवाहिने॥ ४९॥
श्मशानवासी हर और समुद्रनिवासी हरिको बारंबार नमस्कार है। वृषभवाहन हर और गरुड़वाहन हरिको नमस्कार है॥ ४९॥

नमस्त्वनेकरूपाय बहुरूपाय वै नमः।
नमः प्रलयकर्त्रे च नमस्त्रैलोक्यधारिणे॥ ५०॥
अनेक अवतार धारण करनेवाले हरि और बहुत-से रूप धारण करनेवाले हरको नमस्कार है। प्रलयंकर रुद्र और त्रैलोक्यरक्षक विष्णुको नमस्कार है॥ ५०॥

नमोऽस्तु सौम्यरूपाय नमो भैरवरूपिणे।
विरूपाक्षाय देवाय नमः सौम्येक्षणाय च॥ ५१॥
सौम्यरूपधारी श्रीहरि और भैरवरूपधारी रुद्रदेवको नमस्कार है। विरूप नेत्रवाले महादेवजी तथा सौम्य दृष्टिवाले श्रीहरिको प्रणाम है॥ ५१॥

दक्षयज्ञविनाशाय बलेर्नियमनाय च।
नमः पर्वतवासाय नमः सागरवासिने॥ ५२॥
दक्षयज्ञका ध्वंस करनेवाले रुद्र तथा बलिको बाँधनेवाले वामनरूपधारी श्रीहरिको नमस्कार है। पर्वत-निवासी शिव और समुद्रवासी विष्णुको नमस्कार है॥ ५२॥

नमः सुररिपुघ्नाय त्रिपुरघ्नाय वै नमः।
नमोऽस्तु नरकघ्नाय नमः कामाङ्गनाशिने॥ ५३॥
देवद्रोहियोंका नाश करनेवाले श्रीहरिको प्रणाम है, त्रिपुरासुरके विनाशक रुद्रदेवको नमस्कार है; नरकासुरका विनाश करनेवाले विष्णुको नमस्कार है और कामदेवके शरीरको दग्ध कर डालनेवाले भगवान् शिवको नमस्कार है॥ ५३॥

नमस्त्वन्धकनाशाय नमः कैटभनाशिने।
नमः सहस्रहस्ताय नमोऽसंख्येयवाहवे॥ ५४॥
अन्धकासुरका नाश करनेवाले रुद्रको नमस्कार है, कैटभका वध करनेवाले विष्णुको नमस्कार है। सहस्रों हाथोंवाले विष्णु और असंख्य भुजाओंवाले शिवको नमस्कार है॥ ५४॥

नमः सहस्रशीर्षाय बहुशीर्षाय वै नमः।
दामोदराय देवाय मुञ्जमेखलिने नमः॥ ५५॥
सहस्रों मस्तकवाले श्रीहरि और बहुत-से मस्तकवाले भगवान् शिवको नमस्कार है। जिनके उदरमें यशोदा माताके द्वारा रस्सी बाँधी गयी, उन दामोदरदेवको नमस्कार है तथा कटिप्रदेशमें मूँजकी मेखला धारण करनेवाले भगवान् शिवको प्रणाम है॥ ५५॥

नमस्ते भगवन् विष्णो नमस्ते भगवञ्छिव।
नमस्ते भगवन् देव नमस्ते देवपूजित॥ ५६॥
भगवान् ! विष्णो ! आपको नमस्कार है। भगवान् !

विष्णुपर्व ] षड्विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ७२५

शिव ! आपको प्रणाम है। भगवान् ! महादेव ! आपको नमस्कार है। देवपूजित परमेश्वर ! आपको प्रणाम है ॥ ५६॥

नमस्ते सामभिर्गीत नमस्ते यजुभिः सह ।
नमस्ते सुरशत्रुघ्न नमस्ते सुरपूजित ॥ ५७ ॥
नमस्ते कर्मिणां कर्म नमोऽमितपराक्रम ।
हृषीकेश नमस्तेऽस्तु स्वर्णकेश नमोऽस्तु ते ॥ ५८ ॥

सामवेदके मन्त्रोंद्वारा गाये जानेवाले परमात्मन् ! आपको नमस्कार है। यजुर्वेदके साथ सम्बन्ध रखनेवाले देवता ! आपको प्रणाम है। आप ही कर्मपरायण पुरुषोंके कर्म हैं, आपको नमस्कार है। आपके पराक्रमकी कोई सीमा नहीं है—आपको नमस्कार है। देवद्रोहियोंका नाश करनेवाले श्रीकृष्ण ! आपको नमस्कार है। देवपूजित महादेव ! आपको प्रणाम है। हृषीकेश ! आपको नमस्कार है। सुनहरे केशवाले शिव ! आपको प्रणाम है ॥ ५७-५८ ॥

इमं स्तवं यो रुद्रस्य विष्णोश्चैव महात्मनः ।
समेत्य ऋषिभिः सर्वैः स्तुतौ स्तौति महर्षिभिः ॥ ५९ ॥
व्यासेन वेदविदुषा नारदेन च धीमता ।
भारद्वाजेन गर्गेण विश्वामित्रेण वै तथा ॥ ६० ॥
अगस्त्येन पुलस्त्येन धौम्येन तु महात्मना ।
य इदं पठते नित्यं स्तोत्रं हरिहरात्मकम् ॥ ६१ ॥
अरोगो बलवांश्चैव जायते नात्र संशयः।
श्रियं च लभते नित्यं न च स्वर्गात्निवर्तते ॥ ६२ ॥

वेदवेत्ता व्यास, बुद्धिमान् नारद, भारद्वाज, गर्ग, विश्वामित्र, अगस्त्य, पुलस्त्य और महात्मा धौम्य आदि समस्त ऋषि-महर्षियोंने एकत्र होकर जिनकी स्तुति की थी, उन्हीं भगवान् रुद्र और महात्मा विष्णुके इस स्तोत्रको पढ़कर जो उनकी स्तुति करता है तथा जो प्रतिदिन इस हरिहरात्मक स्तोत्रका पाठ करता है, वह इस जगत्में नीरोग और बलवान् होता है, इसमें संशय नहीं है। वह सदा लक्ष्मी (धन-सम्पत्ति) पाता है और स्वर्गसे कभी पीछे नहीं लौटता है ॥ ५९–६२॥

अपुत्रो लभते पुत्रं कन्या विन्दति सत्पतिम् ।
गुर्विणी शृणुते या तु वरं पुत्रं प्रसूयते ॥ ६३ ॥

पुत्रहीन पुरुष इसके पाठसे पुत्र पाता है, कुमारी कन्या श्रेष्ठ पति प्राप्त कर लेती है तथा जो गर्भवती स्त्री इसका श्रवण करती है, वह उत्तम पुत्रको जन्म देती है ॥ ६३ ॥

राक्षसाश्च पिशाचाश्च विघ्नानि च विनायकः ।
भयं तत्र न कुर्वन्ति यत्रायं पठ्यते स्तवः ॥ ६४ ॥

जहाँ प्रतिदिन इस स्तोत्रका पाठ किया जाता है, वहाँ राक्षस, पिशाच, विघ्न और विनायक भय नहीं उपस्थित करते हैं ॥ ६४ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि हरिहरात्मकस्तवो नाम पञ्चविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १२५॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें 'हरिहरात्मकस्तोत्र' विषयक एक सौ पचीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२५ ॥


षड्विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः

स्वामी कार्तिकेय और श्रीकृष्णके युद्धमें स्वामी कार्तिकेयकी पराजय, कोटवीदेवीका कार्तिकेयकी रक्षा करना, बाणासुर और श्रीकृष्णका युद्ध, श्रीकृष्णका बाणासुरकी हजार भुजाओंको काटना, महादेवजीका बाणासुरको महाकाल होनेका वरदान देना

जनमेजय उवाच
अपयाते ततो देवे कृष्णे चैव महात्मनि ।
पुनश्चासीत् कथं युद्धं परेषां लोमहर्षणम् ॥ १ ॥

जनमेजयने पूछा—ब्रह्मन् ! जब महादेवजी तथा महात्मा श्रीकृष्ण युद्धसे हट गये, तब पुनः शत्रुओंका रोमाञ्चकारी युद्ध किस प्रकार हुआ ? ॥ १ ॥

वैशम्पायन उवाच
कुम्भाण्डसंगृहीते तु रथे तिष्ठन् गुहस्तदा ।
अभिदुद्राव कृष्णं च बलं प्रद्युम्नमेव च ॥ २ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन् ! तब कुम्भाण्डद्वारा नियन्त्रित रथपर बैठे हुए कार्तिकेयजीने श्रीकृष्ण, बलराम तथा प्रद्युम्नपर एक साथ ही धावा किया ॥ २ ॥

ततः शरशतैरुग्रैस्तान् विव्याध रणे गुहः ।
अमर्षरोषसंक्रुद्धः कुमारः प्रवरो नदन् ॥ ३ ॥

अमर्ष और रोषसे अत्यन्त कुपित हुए सर्वश्रेष्ठ देवता कुमार कार्तिकेयने उस समय सिंहनाद करके सैकड़ों उग्र बाणोंद्वारा उन सबको रणभूमिमें घायल कर दिया ॥ ३ ॥

शरसंवृतगात्रास्ते त्रयस्त्रय इवाग्नयः ।
शोणितौघप्लुतैर्गात्रैः प्रायुध्यन्त गुहं ततः ॥ ४ ॥

उन तीनोंके सारे अङ्ग बाणोंसे आवृत हो गये। वे तीनों त्रिविध अग्नियोंके समान रक्तस्रवित अङ्गोंद्वारा ही कुमार कार्तिकेयके साथ युद्ध करने लगे ॥ ४ ॥

७२६ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे

ततस्ते युद्धमार्गज्ञास्त्रयस्त्रिभिरनुत्तमैः।
वायव्याग्नेयपार्जन्यैर्बिभिदुर्दिततेजसः ॥ ५ ॥
युद्धके मार्गोंका ज्ञान रखनेवाले उन तीनों उद्दीप्त तेजस्वी वीरोंने क्रमशः वायव्य, आग्नेय और पार्जन्यास्त्रोंका प्रयोग करके कुमारको क्षत-विक्षत कर दिया ॥ ५ ॥

तानस्त्रांस्त्रिभिरेवास्त्रैर्विनिवार्य स पावकिः।
शैलवारुणसावित्रैस्तान स विव्याध कोपवान् ॥ ६ ॥
परंतु क्रोधमें भरे हुए अग्निनन्दन कार्तिकेयने पार्वत, वारुण और सावित्र नामक तीन अस्त्रोंद्वारा उक्त तीनों अस्त्रोंको निवारण करके पुनः उन तीनों वीरोंको घायल कर दिया ॥ ६ ॥

तस्य दीप्तशरौघस्य दीप्तचापधरस्य च।
शरौधानस्त्रमायाभिर्ग्रसन्ति स्म महात्मनः।
यदा तदा गुहः क्रुद्धः प्रज्वलन्निव तेजसा ॥ ७ ॥
स्कन्दके बाणसमूह बड़े तेजस्वी थे। उन्होंने दीप्तिमान् धनुष धारण कर रखा था तो भी जब उन महात्माके चलाये हुए शर-समूहोंको वे तीनों वीर अपने अस्त्रोंकी मायासे नष्ट करने लगे, तब कार्तिकेयको बड़ा क्रोध हुआ। वे तेजसे प्रज्वलित-से हो उठे ॥ ७ ॥

अस्त्रं ब्रह्मशिरो नाम कालकल्पं दुरासदम्।
संदष्टौष्ठपुटः संख्ये जगृहे पावकिः प्रभुः ॥ ८ ॥
प्रभावशाली पावकनन्दन स्कन्दने युद्धस्थलमें अपने ओठको दाँतोंसे दबा लिया और ब्रह्मशिर नामक अस्त्र उठाया, जो कालके समान दुर्जय था ॥ ८ ॥

प्रयुक्ते ब्रह्मशिरसि सहस्रांशुसमप्रभे।
उग्रे परमदुर्घर्षे लोकक्षयकरे तथा ॥ ९ ॥
हाहाभूतेषु सर्वेषु प्रधावत्सु समन्ततः।
अस्त्रतेजःप्रमूढे तु विषण्णे जगति प्रभुः।
केशवः केशिमथनश्चक्रं जग्राह वीर्यवान् ॥ १० ॥
सर्वेषामस्त्रवीर्याणां वारणं घातनं तथा।
चक्रमप्रतिचक्रस्य लोके ख्यातं महात्मनः ॥ ११ ॥
सूर्यदेवके तुल्य तेजस्वी ब्रह्मशिर नामक परम दुर्जय लोकसंहारकारी उग्र अस्त्रका प्रयोग होनेपर सब ओर हाहाकार मच गया। सब लोग इधर-उधर भागने लगे और उस अस्त्रके तेजसे मोहित हुए सारे जगत्में विषाद छा गया। तब परम पराक्रमी केशिहन्ता भगवान् केशवने चक्र हाथमें लिया, जो सभी अस्त्रोंके बलका निवारण तथा नाश करनेवाला है, जिनके सामने विरोधियोंका मण्डल ठहर नहीं सकता है, उन महात्मा श्रीकृष्णका चक्र सारे संसारमें विख्यात है ॥ ९–११ ॥

अस्त्रं ब्रह्मशिरस्तेन निष्प्रभं कृतमोजसः।
घनैरिवातपापाये सवितुर्मण्डलं यथा ॥ १२ ॥
उस चक्रने अपने बलसे उस ब्रह्मशिरनामक अस्त्रको उसी प्रकार निस्तेज कर दिया, जैसे वर्षाकालमें मेघोंके छा जानेसे सूर्यमण्डल प्रभाहीन प्रतीत होता है ॥ १२ ॥

ततो निष्प्रभतां याते नष्टवीर्ये महौजसि।
तस्मिन् ब्रह्मशिरस्यस्त्रे क्रोधसंरक्तलोचनः ॥ १३ ॥
गुहः प्रजज्वाल रणे हविषेवाग्निरुल्बणः।
तदनन्तर उस महान् शक्तिशाली ब्रह्मशिर अस्त्रके निस्तेज और निर्बल हो जानेपर कार्तिकेयके नेत्र क्रोधसे लाल हो उठे। जैसे घीकी आहुति पाकर अग्नि प्रज्वलित हो उठती है, उसी प्रकार वे रणभूमिमें रोषसे जल उठे ॥ १३ ॥

शत्रुघ्नीं ज्वलितां दिव्यां शक्तिं जग्राह काञ्चनीम् १४
अमोघां दयितां घोरां सर्वलोकभयावहाम्।
तांप्रदीप्तां महोल्काभां युगान्ताग्निसमप्रभाम्।
घण्टामालाकुलां दिव्यां चिक्षेप रुषितो गुहः ॥ १५ ॥
ननाद बलवच्चापि नादं शत्रुभयंकरम्।
फिर तो उन्होंने सम्पूर्ण लोकोंको भय देनेवाली अपनी प्रिय शक्ति हाथमें ली, जो दिव्य सुवर्णमयी, अमोघ, भयङ्कर, सब ओरसे प्रज्वलित तथा शत्रुओंका संहार करनेमें समर्थ थी, वह दिव्य शक्ति आकाशमें बड़ी भारी उल्काके समान प्रज्वलित हो उठती थी, प्रलयकालके संवर्तक अग्निकी भाँति प्रकाशित होती थी तथा वह घण्टाओंकी मालाओंसे अलंकृत थी, रोषमें भरे हुए कार्तिकेयने उस शक्तिको चला दिया और बड़े जोरसे सिंहनाद किया, जो शत्रुओंके मनमें भय उत्पन्न करने-वाला था ॥ १४-१५ १/२ ॥

सा च क्षिप्ता तदा तेन ब्रह्मण्येन महात्मना ॥ १६ ॥
जृम्भमाणेव गगने सम्प्रदीप्तमुखी तदा।
अधावत महाशक्तिः कृष्णस्य वधकाङ्क्षिणी ॥ १७ ॥
उन ब्राह्मणभक्त महात्मा कार्तिकेयके द्वारा चलायी गयी वह शक्ति आकाशमें बढ़ने-सी लगी, उसका मुखभाग प्रज्वलित हो उठा, वह महाशक्ति श्रीकृष्णका वध करनेकी इच्छासे उनकी ओर दौड़ी ॥ १६-१७ ॥

भृशं विषण्णः शक्रोऽपि सर्वामरगणैर्वृतः।
शक्तिं प्रज्वलितां दृष्ट्वा दग्धः कृष्णेति चाब्रवीत् ॥ १८ ॥
उस समय प्रज्वलित होती हुई उस शक्तिको देखकर समस्त देवगणोंसे घिरे हुए इन्द्र भी अत्यन्त खिन्न हो गये और बोले—'हाय ! श्रीकृष्ण दग्ध हो गये' ॥ १८ ॥

तां समीपमनुप्राप्तां महाशक्तिं महामृधे।
हुङ्कारेणैव निर्भर्त्स्य पातयामास भूतले ॥ १९ ॥
परंतु श्रीकृष्णने उस महासमरमें अपने पास आयी हुई उस महाशक्तिको हुङ्कारसे ही तिरस्कृत करके पृथ्वीपर गिरा दिया ॥ १९ ॥

विष्णुपर्व ] षड्विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः [ ७२७


पतितायां महाशक्त्यां साधुसाध्विति सर्वशः ।
सिंहनादं ततश्चक्रुः सर्वे देवाः सवासवाः ॥ २० ॥
उस महाशक्तिके धराशायिनी हो जानेपर सब ओर साधु ! साधु !! (वाह ! वाह !!) की ध्वनि होने लगी। उस समय इन्द्रसहित समस्त देवता सिंहनाद करने लगे ॥ २० ॥

ततो देवेषु नर्दत्सु वासुदेवः प्रतापवान् ।
पुनश्चक्रं स जग्राह दैत्यान्तकरणं रणे ॥ २१ ॥
तदनन्तर जब देवता सिंहनाद कर रहे थे, उसी समय प्रतापी वासुदेवने पुनः चक्र हाथमें लिया, जो रणभूमिमें दैत्योंका विनाश करनेवाला है ॥ २१ ॥

व्याविध्यमाने चक्रे तु कृष्णेनाप्रतिमौजसा ।
कुमाररक्षणार्थाय बिभ्रती सुतनुं तदा ॥ २२ ॥
दिग्वासा देववचनात् प्रविष्टा तत्र कोटवी ।
लम्बमाना महाभागा भागो देव्यास्तथाष्टमः ।
चित्रा कनकशक्तिस्तु सा च नग्ना स्थितान्तरे ॥ २३ ॥
परंतु अप्रतिम बलशाली श्रीकृष्ण ज्यों ही चक्र घुमाने लगे, त्यों ही कुमारकी रक्षाके लिये महादेवजीकी आज्ञासे महाभागा कोटवी, जो देवी पार्वतीका आठवाँ भाग थी, सुन्दर शरीर धारण किये श्रीकृष्ण और कुमारके बीचमें आकर नंगी खड़ी हो गयी। वह आकाशमें निराधार लटक रही थी। वह विचित्र सुवर्णमयी शक्ति तथा वह देवी कोटवी दोनों ही (श्रीकृष्ण और कुमारके) बीचमें विद्यमान थीं ॥ २२-२३ ॥

अथान्तरात् कुमारस्य देवीं दृष्ट्वा महाभुजः ।
पराङ्मुखस्ततो वाक्यमुवाच मधुसूदनः ॥ २४ ॥
अपने और कुमारके बीचमें देवीको खड़ी हुई देख महाबाहु मधुसूदनने अपना मुख दूसरी ओर फेर लिया और कहा ॥ २४ ॥

श्रीभगवानुवाच
अपगच्छापगच्छ त्वं धिक् त्वामितिवचोऽब्रवीत्।
किमेवं कुरुषे विघ्नं निश्चितस्य वधं प्रति ॥ २५ ॥
**श्रीभगवान् बोले—**अरी ! हटो ! हटो !! तुम्हें धिक्कार. है। शत्रु का वध करनेके लिये दृढ़ निश्चय किये हुए मेरे उद्देश्यकी सिद्धिमें तुम इस प्रकार विघ्न क्यों डाल रही हो ॥ २५ ॥

वैशम्पायन उवाच
श्रुत्वैवं वचनं तस्य कोटवी तु तदा विभोः ।
नैव वासः समाधत्ते कुमारपरिरक्षणात् ॥ २६ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन् ! भगवान्‌की यह बात सुनकर भी कोटवीने उस समय कुमारकी रक्षाके लिये अपने अङ्गोंपर वस्त्र नहीं धारण किया ॥ २६ ॥

श्रीभगवानुवाच
अपवाह्य गुहं शीघ्रमपयाहि रणाजिरात् ।
स्वस्ति ह्येवं भवेदद्य योत्स्यतो योत्स्यता मया ॥ २७ ॥
**श्रीभगवान्‌ने कहा—**अरी ! तुम कार्तिकेयको शीघ्र हटाकर स्वयं भी समराङ्गणसे दूर चली जाओ, ऐसा करने-पर ही आज मेरे साथ युद्ध करते हुए कार्तिकेयका कल्याण होगा ॥ २७ ॥

तां च दृष्ट्वा स्थितां देवो हरिः संग्राममूर्धनि ।
संजहार ततश्चक्रं भगवान् वासवानुजः ॥ २८ ॥
कोटवीको युद्धके मुहानेपर खड़ी देख इन्द्रके छोटे भाई भगवान् श्रीहरिने अपने चक्रको पीछे लौटा लिया ॥ २८ ॥

एवं कृते तु कृष्णेन देवदेवेन धीमता ।
अपवाह्य गुहं देवी हरसांनिध्यमागता ॥ २९ ॥
देवाधिदेव बुद्धिमान् श्रीकृष्णके ऐसा करनेपर देवी कोटवी कार्तिकेयको वहाँसे हटाकर स्वयं भगवान् शङ्करके समीप चली गयी ॥ २९ ॥

एतस्मिन्नन्तरे चैव वर्तमाने महाभये ।
कुमारे रक्षिते देव्या बाणस्तं देशमाययौ ॥ ३० ॥
इसी बीचमें जब वह महान् भय उपस्थित हुआ और देवीने कुमारकी रक्षा कर ली, तब बाणासुर उस स्थानपर आया ॥

अपयान्तं गुहं दृष्ट्वा मुक्तं कृष्णेन संयुगात् ।
बाणश्चिन्तयते तत्र स्वयं योत्स्यामि माधवम् ॥ ३१ ॥
श्रीकृष्णके हाथोंसे जीवित छूटकर कुमार कार्तिकेय युद्ध-स्थलसे दूर हटे जा रहे हैं, यह देखकर बाणासुरने वहाँ यह निश्चय किया कि मैं स्वयं ही माधवके साथ युद्ध करूँगा ॥

वैशम्पायन उवाच
भूतयक्षगणाश्चैव बाणानीकं च सर्वशः ।
दिशं प्रदुद्रुवुः सर्वे भयमोहितलोचनाः ॥ ३२ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय ! उस समय भूतों और यक्षोंके समुदाय तथा बाणासुरके समस्त सैनिक भयसे कातर नेत्र होकर सम्पूर्ण दिशाओंकी ओर भागने लगे ॥

प्रमाथगणभूयिष्ठे सैन्ये दीर्णे महासुरः ।
निर्जगाम ततो बाणो युद्धायाभिमुखस्त्वरन् ॥ ३३ ॥
जिसमें प्रमथगणोंकी अधिकता थी, उस सेनामें भी दरार पड़ जानेपर बाणासुर युद्धके लिये उत्सुक हो बड़ी उतावलीके साथ निकला ॥ ३३ ॥

भीमप्रहरणैर्घोरैर्दैत्येन्द्रैः सुमहारथैः ।
महाबलैर्महावीर्यैर्वज्रीव सुरसत्तमैः ॥ ३४ ॥
जैसे वज्रधारी इन्द्र श्रेष्ठ देवताओंसे घिरे होते हैं, उसी प्रकार वह भयंकर आयुध धारण करनेवाले, घोर, महाबली, महावीर एवं महारथी दैत्यपतियोंसे घिरा हुआ था ॥ ३४ ॥

७२८श्रीमहाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

पुरोहिताः शत्रुवधं वदन्त- स्तथैव चान्ये श्रुतशीलवृद्धाः। जपैश्च मन्त्रैश्च तथौषधीभि- र्महात्मनः स्वस्त्ययनं प्रचक्रुः ॥ ३५ ॥ उस समय शास्त्रज्ञान और शीलमें बढ़े-चढ़े पुरोहित तथा दूसरे ब्राह्मणोंने उसके लिये शत्रुवधका आशीर्वाद देते हुए जप, मन्त्र और ओषधियोंद्वारा उस महामना दैत्यराजके लिये स्वस्तिवाचन किया ॥ ३५ ॥

ततस्तूर्यप्रणादैश्च भेरीणां तु महास्वनैः। सिंहनादैश्च दैत्यानां बाणः कृष्णमभिद्रवत् ॥ ३६ ॥ तदनन्तर वाद्योंकी ध्वनि, रणभेरियोंकी बड़ी भारी आवाज तथा दैत्योंके सिंहनादके साथ बाणासुरने श्रीकृष्णपर आक्रमण किया ॥ ३६ ॥

दृष्ट्वा बाणं तु निर्यातं युद्धायैव व्यवस्थितम्। आरुह्य गरुडं कृष्णो बाणायाभिमुखो ययौ ॥ ३७ ॥ बाणासुरको युद्धका ही निश्चय करके घरसे निकला देख गरुड़पर आरूढ़ हुए श्रीकृष्ण उसके सामने गये ॥ ३७ ॥

आयान्तमथ तं दृष्ट्वा यदूनामृषभं रणे। वैनतेयमथारूढं कृष्णमप्रतिमौजसम् ॥ ३८ ॥ अथ बाणस्तु तं दृष्ट्वा प्रमुखे प्रत्युपस्थितम्। उवाच वचनं क्रुद्धो वासुदेवं तरस्विनम् ॥ ३९ ॥ उस रणभूमिमें अप्रतिम बलशाली यदुकुलतिलक श्रीकृष्णको गरुड़पर आरूढ़ होकर आते देख बाणासुरने अपने सामने उपस्थित हुए उन वेगशाली भगवान् वासुदेवसे कुपित होकर कहा ॥ ३८-३९ ॥

बाण उवाच तिष्ठ तिष्ठ न मेऽद्य त्वं जीवन् प्रतिगमिष्यसि। द्वारकां द्वारकास्थांश्च सुहृदो द्रक्ष्यसे न च ॥ ४० ॥ बाणासुर बोला— अरे ! खड़े रहो ! खड़े रहो ! आज तुम जीवित नहीं लौट सकोगे और न द्वारका तथा द्वारकावासी सुहृदोंको ही देख सकोगे ॥ ४० ॥

सुवर्णवर्णान् वृक्षाग्रानद्य द्रक्ष्यसि माधव। मयाभिभूतः समरे मुमूर्षुः कालनोदितः ॥ ४१ ॥ माधव ! आज समरभूमिमें मेरे द्वारा पराजित हो तुम कालसे प्रेरित एवं मरणासन्न होकर वृक्षोंके अग्रभागको सुनहरे रंगका देखोगे ॥ ४१ ॥

अद्य बाहुसहस्रेण कथमष्टभुजो रणे। मया सह समागम्य योत्स्यसे गरुडध्वज ॥ ४२ ॥ गरुड़ध्वज ! तुम्हारे तो आठ ही भुजाएँ हैं, रणभूमिमें तुम मुझ सहस्रबाहुके साथ भिड़कर कैसे युद्ध करोगे ॥ ४२ ॥

अद्य त्वं वै मया युद्धे निर्जितः सहबान्धवः। द्वारकां शोणितपुरे निहतः संस्मरिष्यसि ॥ ४३ ॥ आज युद्धमें भाई-बन्धुओंसहित तुम मेरे द्वारा पराजित हो शोणितपुरमें मारे जाकर द्वारकाका स्मरण करोगे ॥ ४३ ॥

नानाप्रहरणोपेतं नानाङ्गदविभूषितम्। अद्य बाहुसहस्रं मे कोटिभूतं निशामय ॥ ४४ ॥ देखना, भाँति-भाँतिके आयुधोंसे युक्त और नाना प्रकारके बाजूबंदोंसे विभूषित ये मेरी सहस्र भुजाएँ आज किस तरह करोड़ों भुजाओंके समान हो जाती हैं ॥ ४४ ॥

गर्जतस्तस्य वाक्यौघा जलौघा इव सिन्धुतः। निश्चरन्ति महाघोरा वातोद्धूता इवोर्मयः ॥ ४५ ॥ गर्ज॑ना करते हुए उस दैत्यराजके मुखसे वे प्रवाहपूर्ण महाभयंकर वाक्यसमूह उसी तरह निकल रहे थे, जैसे प्रचण्ड पवनकी प्रेरणा पाकर समुद्रसे जलके प्रवाह और उत्ताल तरङ्गें उठती रहती हैं ॥ ४५ ॥

रोषपर्याकुले चैव नेत्रे तस्य वभूवतुः। जगद्विधक्षन्निव खे महासूर्य इवोदितः ॥ ४६ ॥ उसके दोनों नेत्र रोषसे व्याप्त हो उठे। वह ऐसा जान पड़ता था, मानो आकाशमें सम्पूर्ण जगत्‌को दग्ध कर डालनेकी इच्छा लेकर महान् सूर्य उदित हुआ हो ॥ ४६ ॥

तच्छ्रुत्वा नारदस्तस्य बाणस्यात्यूर्जितं वचः। जहास सुमहाहासं भिन्दन्निव नभस्तलम् ॥ ४७ ॥ बाणासुरका वह अत्यन्त ओजस्वी वचन सुनकर देवर्षि नारद आकाशको विदीर्ण करते हुए-से बड़े जोर-जोरसे अट्टहास करने लगे ॥ ४७ ॥

योगपट्टमुपाश्रित्य तस्थौ युद्धदिदृक्षया। कौतूहलोत्फुल्लदृशः कुर्वन् पर्यटते मुनिः ॥ ४८ ॥ वे मुनि योगपट्टका आश्रय लेकर युद्ध देखनेकी इच्छासे आकाशमें ठहरे हुए थे। वे अपने नेत्रोंको कौतूहलसे उत्फुल्ल (चकित) करते हुए वहाँ सब ओर घूमते थे ॥ ४८ ॥

श्रीकृष्ण उवाच बाण किं गर्जसे मोहाच्छूराणां नास्ति गर्जितम्। एह्येहि युध्यस्व रणे किं वृथा गर्जितेन ते ॥ ४९ ॥ श्रीकृष्ण बोले— बाण ! तू मोहवश क्यों गर्जना कर रहा है ? शूरवीर इस तरह गर्जते नहीं हैं। आ ! आ !! रण-भूमिमें युद्ध कर। तेरी इस व्यर्थ गर्जनासे क्या लाभ है ? ॥

यदि युद्धानि वचनैः सिद्ध्येयुर्दितिनन्दन। भवानेव जयेन्नित्यं बह्वबद्धं प्रजल्पति ॥ ५० ॥ दितिनन्दन ! यदि बातोंसे ही युद्धोंमें सफलता मिल जाय तो सदा तू ही विजयी हुआ करे; क्योंकि तू बहुत अंट-संट बातें बक रहा है ॥ ५० ॥

विष्णुपर्व ] षड्विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ७२९


एहोहि जय मां बाण जितो वा वसुधातले ।
चिरायावाङ्मुखो दीनः पतितः शेष्यसेऽसुरैः ॥ ५१ ॥

बाण ! आ ! आ !! मुझे युद्धमें जीत ले अथवा मेरे द्वारा पराजित हो तू ही पृथ्वीपर नीचे मुँह किये दीन-हीन हो चिरकालके लिये गिरकर असुरोंके साथ सो जायगा ॥ ५१ ॥

इत्येवमुक्त्वा बाणं तु मर्मभेदिभिराशुगैः ।
निर्बिभेद तदा कृष्णस्तममोघैर्महाशरैः ॥ ५२ ॥

ऐसा कहकर श्रीकृष्णने उस समय मर्मस्थानोंका भेदन करनेवाले शीघ्रगामी अमोघ महाबाणोंद्वारा बाणासुरको घायल कर दिया ॥ ५२ ॥

विनिर्भिन्नस्तु कृष्णेन मार्गणैर्मर्मभेदिभिः ।
स्मयन् बाणस्ततः कृष्णं शरवर्षैरवाकिरत् ॥ ५३ ॥

श्रीकृष्णके मर्मभेदी बाणोंद्वारा क्षत विक्षत हुए बाणासुरने मुसकराकर उन्हें भी बाणोंकी वर्षासे ढक दिया ॥ ५३ ॥

ज्वलद्भिरिव संयुक्तं तस्मिन् युद्धे सुदारुणे ।
ततः परिघनिस्त्रिंशैर्गदातोमरशक्तिभिः ॥ ५४ ॥
मुसलैः पट्टिशैश्चैव छादयामास केशवम् ।

उस अत्यन्त भयानक युद्धमें उन प्रज्वलित बाणोंसे विंधे हुए श्रीकृष्णको बाणासुरने फिर परिघ, खङ्ग, गदा, तोमर, शक्ति, मूसल और पट्टिशोंसे आच्छादित कर दिया ॥ ५४॥

स तु बाहुसहस्रेण गर्वितो दैत्यसत्तमः ॥ ५५ ॥
योधयामास समरे द्विबाहुमथ लीलया ।

अपनी सहस्र भुजाओंसे घमंडमें भरा हुआ दैत्यप्रवर बाणासुर लीलापूर्वक द्विबाहु बने हुए श्रीकृष्णके साथ समराङ्गणमें युद्ध करने लगा ॥ ५५॥

लाघवात्तु तस्य कृष्णस्य बलिसूनू रुषान्वितः ॥ ५६ ॥
ततोऽस्त्रं परमं दिव्यं तपसा निर्मितं महत् ।
यदप्रतिहतं युद्धे सर्वामित्रविनाशनम् ॥ ५७ ॥
ब्रह्मणा विहितं दिव्यं तन्मुमोच दितेः सुतः ।

श्रीकृष्णकी फुर्तीसे बलिपुत्र बाणासुरको बड़ा रोष हुआ। उस दैत्यने तपस्याद्वारा निर्मित एक परम दिव्य एवं महान् अस्त्रको, जो ब्रह्माजीके द्वारा रचा गया था, युद्धमे कभी प्रतिहत नहीं होता था और समस्त शत्रुओंका विनाश करनेमें समर्थ था, श्रीकृष्णपर छोड़ दिया ॥ ५६-५७॥

तस्मिन् मुक्ते दिशः सर्वास्तमःपिहितमण्डलाः॥ ५८ ॥
प्रादुरासन् सहस्राणि सुघोराणि च सर्वशः ।

उस अस्त्रके छूटते ही सम्पूर्ण दिशाओंका मण्डल अन्धकारसे आच्छन्न हो गया। सब ओर अत्यन्त भयंकर सहस्रों (अपशकुन) प्रकट होने लगे ॥ ५८॥

तमसा संवृते लोके न प्राज्ञायत किंचन ॥ ५९ ॥
साधु साध्विति वाणं तु पूजयन्ति स्म दानवाः ।
हा हा धिगिति देवानां श्रूयते वागुदीरिता ॥ ६० ॥

वहाँका सारा जगत् अन्धकारसे ढक जानेके कारण कुछ भी ज्ञात नहीं होता था। उस समय समस्त दानव 'साधु ! साधु !!' कहकर बाणासुरकी प्रशंसा करने लगे और देवताओंके मुखसे निकली हुई वाणी—'हाय ! हाय !! धिक्कार है।' इत्यादि रूपसे सुनायी देने लगी ॥ ५९-६० ॥

ततोऽस्त्रबलवेगेन सार्चिष्मन्त्यः सुदारुणाः ।
घोररूपा महावेगा निपेतुर्बाणवृष्टयः ॥ ६१ ॥

तत्पश्चात् उस अस्त्रके बल और वेगसे आगकी लपटोंसे युक्त परम दारुण बाणोंकी अत्यन्त वेगपूर्वक घोर वर्षा होने लगी ॥६१॥

नैव वाताः प्रवायंन्ति न मेघाः संचरन्ति च ।
अस्त्रे विसृष्टे बाणेन दह्यमाने च केशवे ॥ ६२ ॥

बाणासुरके उस अस्त्रके छूटते ही भगवान् केशव दग्ध-से होने लगे। उस समय आकाशमें न तो हवा चलती थी और न मेघोंका ही संचार होता था ॥ ६२ ॥

ततोऽस्त्रं सुमहावेगं जग्राह मधुसूदनः ।
पार्जन्यं नाम भगवान् कालान्तकनिभं रणे ॥ ६३ ॥

तब भगवान् मधुसूदनने उस रणभूमिमें काल और अन्तकके समान भयंकर तथा महान् वेगशाली पार्जन्यनामक अस्त्र उठाया और चला दिया ॥ ६३ ॥

ततो वितिमिरे लोके शराग्निः प्रशमं गतः ।
दानवा मोघसंकल्पाः सर्वेऽभूवंस्तदा भृशम् ॥ ६४ ॥

फिर तो जगत्का अन्धकार दूर हो गया, बाणासुरके बाणोंकी आग बुझ गयी और समस्त दानवोंके मनसूबे उस समय व्यर्थ हो गये ॥ ६४ ॥

दानवास्त्रं प्रशान्तं तु पर्जन्यास्त्रेऽभिमन्त्रिते ।
ततो देवगणाः सर्वे नदन्ति च हसन्ति च ॥ ६५ ॥

पार्जन्यास्त्रके अभिमन्त्रित होनेपर उस दानवास्त्रको शान्त हुआ देख समस्त देवता सिंहनाद करने और हँसने लगे॥

हते शस्त्रे महाराज दैतेयः क्रोधमूर्च्छितः ।
भूयः स छादयामास केशवं गरुडे स्थितम् ॥ ६६ ॥
मुसलैः पट्टिशैश्चैव च्छादयामास केशवम् ।

महाराज ! अपने अस्त्रके नष्ट हो जानेपर वह दैत्य क्रोधसे अचेत-सा हो गया। उसने गरुड़पर बैठे हुए श्रीकृष्णको पुनः मूसलों और पट्टिशोंकी वर्षासे ढक दिया ॥ ६६॥

तस्य तां तरसा सर्वो वाणवृष्टिं समुद्यताम् ॥ ६७ ॥
प्रहसन् वारयामास केशवः शत्रुसूदनः ।

शत्रुसूदन केशवने उसके द्वारा वेगपूर्वक की हुई उस सारी बाणवर्षाका हँसते-हँसते निवारण कर दिया ॥ ६७॥

७३०श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

केशवस्य तु बाणेन वर्तमाने महाहवे ॥ ६८ ॥
तस्य शार्ङ्गविनिर्मुक्तैः शरैरशनिसंनिभैः ।
तिलशस्तद्रथं चक्रे सोऽश्वध्वजपताकिनम् ॥ ६९ ॥

श्रीकृष्णका जब बाणासुरके साथ महान् युद्ध होने लगा, उस समय उन्होंने अपने शार्ङ्गधनुषसे छूटे हुए वज्र-तुल्य बाणोंद्वारा उसके अश्व, ध्वज और पताकासहित रथको तिल-तिल करके काट डाला ॥ ६८-६९ ॥

चिच्छेद कवचं कायान्मुकुटं च महाप्रभम् ।
कार्मुकं च महातेजा हस्तावापं च केशवः ॥ ७० ॥
विव्याध चैनमुरसि नाराचेन स्मयन्निव ।

तदनन्तर महातेजस्वी केशवने उसके शरीरसे कवचको, मस्तकसे महातेजस्वी मुकुटको तथा हाथसे धनुष और दस्तानेको काट गिराया; साथ ही हँसते हुए-से उन्होंने एक नाराचद्वारा उसकी छातीमें गहरी चोट पहुँचायी ॥ ७०१/२ ॥

स मर्माभिहतः संख्ये प्रमुमोहाल्पचेतनः ॥ ७१ ॥
तं दृष्ट्वा मूर्च्छितं बाणं प्रहारपरिपीडितम् ।
प्रासादवरश‍ृंगस्थो नारदो मुनिपुङ्गवः ॥ ७२ ॥
उत्थायापश्यत तदा कक्ष्यास्फोटनतत्परः ।
वादयानोनखांश्चैव दिष्ट्या दिष्ट्येति चाब्रवीत् ॥ ७३॥

युद्धस्थलमें वह मर्मभेदी आघात लगनेपर उसकी चेतना क्षीण हो चली और वह मूर्च्छित होकर गिर पड़ा। बाणासुरको श्रीकृष्णके प्रहारसे अत्यन्त पीड़ित एवं मूर्च्छित हुआ देख उसके महलके ऊँचे शिखरपर खड़े हुए मुनिवर नारद बार-बार उठकर उसकी ओर देखने लगे। उस समय वे अपनी भुजाओंपर ताल ठोंकते और नख बजाते हुए इस प्रकार कहने लगे—'अहोभाग्य ! अहोभाग्य !' ॥७१-७३॥

अहो मे सफलं जन्म जीवितं च सुजीवितम् ।
दृष्टं मे यदिदं चित्रं दामोदरपराक्रमम् ॥ ७४ ॥

'अहो ! आज मेरा जन्म सफल है ! यह जीवन उत्तम जीवन है; क्योंकि मैंने श्रीकृष्णका यह अद्भुत पराक्रम अपनी आँखों देख लिया ॥ ७४ ॥

जय बाणं महाबाहो दैतेयं देवकिल्बिषम् ।
यदर्थमवतीर्णोऽसि तत् कर्म सफलीकुरु ॥ ७५ ॥

'महाबाहो ! आप इस देवद्रोही दैत्य बाणासुरको पराजित कीजिये और जिसके लिये आपका अवतार हुआ है, उस कर्मको सफल बनाइये' ॥ ७५ ॥

एवं स्तुत्वा तदा देवं बाणैः खं द्योतयञ्छितैः ।
इतस्ततः सम्पतद्भिर्नारदो व्यचरद् रणे ॥ ७६ ॥

इस प्रकार भगवान् श्रीकृष्णकी स्तुति करके उस समय आकाशको प्रकाशित करते हुए नारदजी इधर-उधर पड़ते हुए तीखे बाणोंके साथ रणक्षेत्रमें विचरने लगे ॥ ७६ ॥

केशवस्य तु बाणेन वर्तमाने महाभये ।
प्रयुध्येतां ध्वजौ तत्र तावन्योन्यमभिद्रुतौ ।
युद्धं त्वभूद् वाहनयोरुभयोर्देवदैत्ययोः ॥ ७७ ॥

जब श्रीकृष्णका बाणासुरके साथ वह महाभयंकर संग्राम चल रहा था, उस समय वहाँ उन दोनोंके ध्वजचिह्न-वाहन एक दूसरेपर टूट पड़े और युद्ध करने लगे। भगवान् तथा दैत्य दोनोंके उन वाहनोंमें गहरी भिड़न्त हुई ॥ ७७ ॥

गरुडस्य च संग्रामो मयूरस्य च धीमतः ।
पक्षतुण्डप्रहारैस्तु चरणाग्रनखैस्तथा ॥ ७८ ॥

बुद्धिमान् गरुड़ और मयूरमें पंख, चोंच, पंजे, मुख और नखोंके प्रहारद्वारा युद्ध होने लगा ॥ ७८ ॥

अन्योन्यं जघ्नतुः क्रुद्धौ मयूरगरुडावुभौ ।
वैनतेयस्ततः क्रुद्धो मयूरं दीप्ततेजसम् ॥ ७९ ॥
जग्राह शिरसि क्षिप्रं तुण्डेनाभिपतंस्तदा ।
उत्क्षिप्य चैव पक्षाभ्यां निजघान महाबलः ॥ ८० ॥

मयूर और गरुड़ दोनों एक दूसरेपर क्रोधपूर्वक आघात करने लगे। तदनन्तर कुपित हुए महाबली गरुड़ने उड़कर अपनी चोंचसे उद्दीप्त तेजवाले मोरका मस्तक शीघ्रतापूर्वक पकड़ लिया और उसे उछाल-उछालकर दोनों पाँखोंसे मारना आरम्भ किया ॥ ७९-८० ॥

पद्भ्यां पार्श्वाभिघाताभ्यां कृत्वा घातान्यनेकशः।
आकृष्य चैनं तरसा विक्षिप्य च महाबलः ॥ ८१
निःसंज्ञं पातयामास गगनादिव भास्करम् ।

दोनों पैरोंसे अगल-बगलमें आघात करके महाबली गरुड़ने उसपर वारंवार प्रहार किये। वे उसे कभी वेगपूर्वक अपनी ओर खींचते और कभी पीछे ढकेलते थे, इस तरह उसे मूर्च्छित करके उन्होंने नीचे गिरा दिया, मानो आकाशसे सूर्यको धराशायी कर दिया गया हो ॥ ८११/२ ॥

मयूरे पतिते तस्मिन् पपातातिबलो भुवि ॥ ८२ ॥
बाणः समरसंविग्नश्चिन्तयन् कार्यमात्मनः ।

मोरके गिर जानेपर अत्यन्त बलशाली बाणासुर भी उस युद्धसे घबराकर अपने कर्तव्यका विचार करता हुआ पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ ८२१/२ ॥

मयातिबलमत्तेन न कृतं सुहृदां वचः ॥ ८३ ॥
पश्यतां देवदैत्यानां प्राप्तोऽस्म्यापदमुत्तमाम् ।

(वह सोचने लगा—) 'अहो ! मैंने अत्यन्त बलके घमंडमें आकर अपने हितैषी सुहृदोंकी बात नहीं मानी, इसलिये आज देवताओं और दैत्योंके देखते-देखते मैं इस भारी विपत्तिमे फँस गया हूँ' ॥ ८३१/२ ॥

[विष्णुपर्व] षड्विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ७३१

तं दीनमनसं ज्ञात्वा रणे बाणं सुविक्लवम् ॥ ८४ ॥
चिन्तयद् भगवान् रुद्रो बाणरक्षणमातुरः ।

रणभूमिमें बाणासुरको अत्यन्त व्याकुल और दीन-चित्त हुआ जान भगवान् रुद्र आतुर हो उसकी रक्षाका उपाय सोचने लगे ॥ ८४॥

ततो नन्दीं महादेवः प्राह गम्भीरया गिरा ॥ ८५ ॥
नन्दिकेश्वर याहि त्वं यतो बाणो रणे स्थितः ।
रथेनानेन दिव्येन सिंहयुक्तेन भास्वता ॥ ८६ ॥
बाणं संयोजयाशु त्वमलं युद्धाय बानघ ।

तत्पश्चात् महादेवजीने गम्भीर वाणीद्वारा नन्दीसे कहा— 'नन्दिकेश्वर ! जहाँ बाणासुर रणभूमिमें स्थित है, वहाँ जाओ और उसे सिंहोंद्वारा जुते हुए इस तेजस्वी दिव्य रथसे शीघ्र संयुक्त करो। निष्पाप नन्दिकेश्वर ! यह रथ युद्धके लिये पर्याप्त है ॥ ८५-८६॥

प्रमाथगणमध्येऽहं स्थास्यामि न हि मे मनः ॥ ८७ ॥
योद्धुं प्रभवते ह्यद्य बाणं संरक्ष गम्यताम् ।

'मैं यहाँ प्रमथगणोंके बीचमें रहूँगा। अब मेरा मन युद्ध करनेके लिये उत्साहित नहीं हो रहा है। तुम जाओ, बाणासुरकी रक्षा करो' ॥ ८७॥

तथेत्युक्त्वा ततो नन्दी रथेन रथिनां वरः ॥ ८८ ॥
यतो बाणस्ततो गत्वा बाणमाह शनैरिदम् ।
दैत्यामुं रथमातिष्ठ शीघ्रमेहि महाबल ॥ ८९ ॥
ततो युध्यस्व कृष्णं वै दानवान्तकरं रणे ।

तब 'बहुत अच्छा' कहकर रथियोंमें श्रेष्ठ नन्दी रथके द्वारा उस स्थानपर गये जहाँ बाणासुर विद्यमान था। वहाँ पहुँचकर उन्होंने बाणासुरसे धीरे-धीरे इस प्रकार कहा, 'महाबली दैत्य ! तुम शीघ्र आओ और इस रथपर आरूढ़ हो जाओ। तदनन्तर दानवोंका विनाश करनेवाले श्रीकृष्णके साथ समराङ्गणमे युद्ध करो' ॥ ८८-८९॥

आरुरोह रथं बाणो महादेवस्य धीमतः ॥ ९० ॥
आरूढः स तु बाणश्च तं रथं ब्रह्मनिर्मितम् ।
तं स्यन्दनमधिष्ठाय भवस्यामिततेजसः ॥ ९१ ॥
प्रादुश्चक्रे महारौद्रमस्त्रं सर्वास्त्रघातनम् ।
दीप्तं ब्रह्मशिरो नाम बाणः क्रुद्धोऽतिवीर्यवान् ॥ ९२ ॥

नन्दीकी यह बात सुनकर बाणासुर बुद्धिमान् महादेवजीके रथपर आरूढ़ हुआ। उन तेजस्वी महादेवजीके उस रथका निर्माण साक्षात् ब्रह्माजीने किया था, उसपर बैठे हुए अत्यन्त पराक्रमी बाणासुरने कुपित हो ब्रह्मशिर नामक महाभयंकर प्रज्वलित अस्त्रका प्रयोग किया, जो सम्पूर्ण अस्त्रोंका विनाश करनेवाला था ॥ ९०-९२ ॥

प्रदीप्ते ब्रह्मशिरसि लोकः क्षोभमुपागमत् ।
लोकसंरक्षणार्थं वै तत् सृष्टं ब्रह्मयोनिना ॥ ९३ ॥
तच्चक्रेण निहत्यास्त्रं प्राह कृष्णस्तरस्विनम् ।
लोके प्रख्यातयशसं बाणमप्रतिमं रणे ॥ ९४ ॥

उस ब्रह्मशिर अस्त्रके प्रज्वलित होते ही यह सम्पूर्ण जगत् क्षुब्ध हो उठा। ब्रह्मयोनि ब्रह्माने जगत्की रक्षाके लिये ही उस अस्त्रकी सृष्टि की थी। श्रीकृष्णने अपने चक्रद्वारा उस अस्त्रका विनाश करके वेगशाली विश्वविख्यात यशस्वी तथारणक्षेत्रमें अनुपम शक्तिशाली बाणासुरसे इस प्रकार कहा—॥

कत्थितानि क ते तात बाण किं न विकत्थसे ।
अयमस्मि स्थितो युद्धे युद्ध्यस्व पुरुषो भव ॥ ९५ ॥

'तात ! तुम्हारी वे बहकी-बहकी बातें कहाँ गयीं ? बाणासुर ! अब तुम बढ़-चढ़कर बातें क्यों नहीं बनाते हो ? देखो, यह मैं युद्धके लिये खड़ा हूँ, तुम मेरे साथ युद्ध करो और मर्द बनो ॥ ९५ ॥

कार्तवीर्यार्जुनो नाम पूर्वं बाहुसहस्रवान् ।
महाबलः स रामेण द्विबाहुः समरे कृतः ॥ ९६ ॥

'पूर्वकालमें कृतवीर्यका पुत्र अर्जुन सहस्र भुजाओंसे सम्पन्न था, किंतु परशुरामजीने समराङ्गणमें उस महाबली वीरको दो बाँहवाला बना दिया था ॥ ९६ ॥

तथा तवापि दर्पोऽयं बाहूनां वीर्यसम्भवः ।
एष ते दर्पशमनं करोमि रणमूर्धनि ॥ ९७ ॥

'उसी प्रकार तुम्हारा भी जो यह घमंड है, यह तुम्हारी सहस्र भुजाओंके बल-पराक्रमसे ही उत्पन्न हुआ है, अतः यह मैं युद्धके मुहानेपर तुम्हारा सारा घमंड चूर किये देता हूँ ॥

यावत् ते दर्पशमनं करोम्यद्य स्वबाहुना ।
तिष्ठेदानीं न मेऽद्य त्वं मोक्ष्यसे रणमूर्धनि ॥ ९८ ॥

'आज मैं अपनी एक बाँहसे जबतक तुम्हारा घमंड दूर न कर दूँ, तबतक इस समय तुम यहीं ठहरे रहो। आज युद्धके मुहानेपर तुम मेरे हाथसे जीवित नहीं छूट सकोगे' ॥

अथ तद् दुर्लभं दृष्ट्वा युद्धं परमदारुणम् ।
तत्र देवासुरसमे युद्धे नृत्यति नारदः ॥ ९९ ॥

तदनन्तर देवासुर-संग्रामके समान उस समराङ्गणमें वह अत्यन्त भयंकर और दुर्लभ युद्ध देखकर देवर्षि नारदजी नृत्य करने लगे ॥ ९९ ॥

निर्जिताश्च गणाः सर्वे प्रद्युम्नेन महात्मना ।
निष्क्षिप्तवादा युद्धस्य देवदेवं गताः पुनः ॥ १०० ॥

महात्मा प्रद्युम्नने वहाँ समस्त रुद्रगणोंको पराजित कर दिया, वे युद्धकी बातचीत करना छोड़कर पुनः देवाधिदेव महादेवजीके पास चले गये ॥ १०० ॥

७३२ | श्रीमद्भारते खिलभागे | [ हरिवंशे

स तच्चक्रं सहस्रारं नदन् मेघ इवोष्णगे।
जग्राह कृष्णस्त्वरितो वाणान्तकरणं रणे ॥१०१॥

तत्पश्चात् श्रीकृष्णने तुरंत ही वर्षाकालके मेघकी भाँति गर्जना करके अपना वह सहस्रार चक्र हाथमें ले लिया, जो रणभूमिमें बाणासुरका अन्त करनेमें समर्थ था ॥ १०१ ॥

तेजो यज्ज्योतिषां चैव तेजो वज्राशनेस्तथा।
सुरेशस्य च यत् तेजस्तच्चक्रे पर्यवस्थितम् ॥१०२॥

उस समय जो ग्रहों और नक्षत्रोंका तेज था, जो वज्र और अशनिका प्रभाव था तथा जो देवेश्वर इन्द्रका तेज था, वह सब उस चक्रमें स्थापित हो गया ॥ १०२ ॥

त्रेताग्नेश्चैव यत् तेजो यच्च वै ब्रह्मचारिणाम्।
ऋषीणां च ततो ज्ञानं तच्चक्रे समवस्थितम् ॥१०३॥

तीनों अग्नियों और ब्रह्मचारियोंका जो तेज है तथा ऋषियोंका जो ज्ञान है, वह सब उस चक्रमें स्थित हो गया ॥

पतिव्रतानां यत् तेजः प्राणाश्च मृगपक्षिणाम्।
यच्च चक्रधरेष्वस्ति तच्चक्रे संनिवेशितम् ॥१०४॥

पतिव्रताओंका जो तेज है, पशुओं और पक्षियोंके जो प्राण हैं तथा चक्रधारियोंमें जो बल है, वह सब उस चक्रमें समाविष्ट हो गया ॥ १०४ ॥

नागराक्षसयक्षाणां गन्धर्वाप्सरसामपि ।
त्रैलोक्यस्य च यत् प्राणं सर्वं चक्रे व्यवस्थितम् ॥१०५॥

नाग, राक्षस, यक्ष, गन्धर्व और अप्सराओंकी तथा त्रिलोकीकी जो प्राणशक्ति है, वह सब उस चक्रमें प्रतिष्ठित हुई ॥ १०५ ॥

तेजसा तेन संयुक्तं ज्वलन्निव च भास्करः।
वपुषा तेज आदत्ते बाणस्य प्रमुखे स्थितम् ॥१०६॥

उस तेजसे संयुक्त होकर वह चक्र जाज्वल्यमान सूर्यके समान उदीप्त हो उठा और सामने स्थित होकर अपने शरीरसे बाणासुरके तेजको ग्रहण करने लगा ॥ १०६ ॥

ज्ञात्वातितेजसा चक्रं कृष्णेनाभ्युदितं रणे।
अप्रमेयं ह्यविहतं रुद्राणी चाब्रवीच्छिवम् ॥१०७॥

रणक्षेत्रमें अति तेजस्वी श्रीकृष्णने अप्रमेय एवं अमोघ चक्र उठा लिया है, यह जानकर रुद्राणीने शिवजीसे कहा-॥

अजेयमेतत् त्रैलोक्ये चक्रं कृष्णेन धार्यते।
बाणं त्रायस्व देव त्वं यावच्चक्रं न मुञ्चति ॥१०८॥

'देव ! श्रीकृष्ण जिस चक्रको धारण करते हैं, वह तीनों लोकोंमें अजेय है, अतः जबतक वे उस चक्रको छोड़ नहीं देते हैं, तबतक ही यत्न करके बाणासुरकी रक्षा कीजिये' ॥१०८॥

ततस्त्र्यक्षो वचः श्रुत्वा देवीं लम्बामथाब्रवीत् ।
गच्छैहि लम्बे शीघ्रं त्वं बाणसंरक्षणं प्रति ॥१०९॥

पार्वतीजीका यह वचन सुनकर भगवान् त्रिलोचनने देवी लम्बासे कहा—'लम्बे ! तुम बाणासुरकी रक्षाके लिये शीघ्र जाओ' ॥ १०९ ॥

ततो योगं समाधाय अदृश्या हिमवत्सुता ।
कृष्णस्यैकस्य तद्रूपं दर्शन्ती पार्श्वमागता ॥११०॥

तब हिमवान्की पुत्री उमा योगका आश्रय ले अदृश्य हो श्रीकृष्णके पास गयीं, वे अपने उस स्वरूपका दर्शन एकमात्र श्रीकृष्णको ही करा रही थीं ॥ ११० ॥

चक्रोद्यतकरं दृष्ट्वा भगवन्तं रणाजिरे ॥
अन्तर्धानमुपागम्य त्यज्य सा वाससी पुनः ॥१११॥
परित्राणाय बाणस्य विजयाधिष्ठिता ततः।
प्रमुखे वासुदेवस्य दिग्वासाः कोटवी स्थिता ॥११२॥

समराङ्गणमें भगवान् श्रीकृष्णको हाथमें चक्र उठाये देख वे पुनः अदृश्य हो अपने वस्त्रका परित्याग करके बाणासुरकी रक्षाके लिये विजयाधिष्ठित हो कोटवी या लम्बाके रूपमें वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णके समक्ष नंगी खड़ी हो गयीं ॥

तां दृष्ट्वा पुनः प्राप्तां देवीं रुद्रस्य सम्मताम् ।
लम्बाद्वितीयां तिष्ठन्तीं कृष्णो वचनमब्रवीत् ॥११३॥
भूयः सामर्षताम्राक्षी दिग्वस्त्रावस्थिता रणे।
बाणसंरक्षणपरा हन्मि बाणं न संशयः ॥११४॥

रुद्रप्रिया पार्वती देवीको पुनः लम्बाके साथ आकर सामने खड़ी हुई देख श्रीकृष्णने इस प्रकार कहा—'फिर तुम अमर्षसे लाल आँखें किये रणभूमिमें आकर नंगी खड़ी हो गयीं और बाणासुरकी रक्षाके प्रयत्नमें लग गयीं, परंतु मैं बाणासुरको मारूँगा, इसमें संशय नहीं है' ॥ ११३-११४॥

एवमुक्ता तु कृष्णेन भूयो देव्यब्रवीदिदम् ।
जाने त्वां सर्वभूतानां स्रष्टारं पुरुषोत्तमम् ।
महाभागं महादेवमनन्तं नीलमव्ययम् ॥११५॥
पद्मनाभं हृषीकेशं लोकानामादिसम्भवम् ।
नार्हसे देव हन्तुं वै बाणमप्रतिमं रणे ॥११६॥

श्रीकृष्णके ऐसा कहनेपर देवीने फिर इस प्रकार कहा—'प्रभो ! मैं आपको जानती हूँ, आप समस्त प्राणियोंके स्रष्टा, पुरुषोत्तम, महान् सौभाग्यशाली, महादेव, अनन्त, श्यामवर्णवाले तथा अविनाशी पुरुष हैं, आपकी नाभिसे कमल प्रकट हुआ है, आप समस्त इन्द्रियोंके नियन्ता हैं तथा सम्पूर्ण जगत्के आदि कारण हैं। देव ! यह बाणासुर रणभूमिमें अप्रतिम वीरता दिखानेवाला है, अतः आपको इसका वध नहीं करना चाहिये ॥ ११५-११६ ॥