हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Harshacharitam of Mahakavi Banabhatta with Sanket and Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट द्वारा
कादम्बरी में जो कौतुकाधिक राग उत्पन्न करती है, हर्षचरित में विवाह की योग्यता होने पर भी अविवाहिता होने के कारण अज्ञातयौवना-सी लगती है । सम्भव है इसी कारण वह कादम्बरी की तरह सहृदय-जनों में कौतुकाधिक राग उत्पन्न न कर सकी हो । स्थान-स्थान पर बाण की अद्भुत वर्णनशक्ति का पूर्वाभास हर्षचरित में मिल जाता है । पात्रालोचन [ अब यहाँ संक्षेप में हर्षचरित के पात्रों के सम्बन्ध में जानना आवश्यक है । मुख्य पात्र के रूप में सरस्वती, सावित्री, बाण, पुष्पभूति, भैरवाचार्य, प्रभाकरवर्धन, यशोवती, राज्यवर्धन, हर्षवर्धन तथा राज्यश्री के चरित्र हर्षचरित में निर्दिष्ट हैं । अतः उन्हीं के सम्बन्ध में अग्रिम वक्तव्य है । ] सरस्वती और सावित्री-सरस्वती वाणी की अधिष्ठात्री देवी और ब्रह्माजी की कुमारी कन्या थी । विद्या की देवी होने के कारण और बालभाव की चपलता से अंशतः उसमें कुछ अभिमान की मात्रा भी थी । दुर्वासा के स्वरहीन सामगान पर वह हँस पड़ी जिससे उस क्रोधान्ध ऋषि के शाप से ग्रस्त हुई । दुर्वासा ने उसकी विद्याजनित उन्नति को चूर करने के लिए नीचे मर्त्यलोक में चले जाने का शाप दे डाला । परन्तु सरस्वती ने ऋषि के शाप को शिर झुका कर मान लिया । उसकी प्रिय सखी सावित्री ऋषि के इस अन्याय को न सह सकी और स्वयं प्रतिशाप देने के लिए उद्यत हो गई । तब सरस्वती ने उसे रोका और कहा—'सखी, तू अपना क्रोध शान्त कर, संस्कारशून्य बुद्धि होने पर भी ब्राह्मण सर्वथा आदरणीय है।' सरस्वती की इस वाणी में उसकी अपार सहिष्णुता निहित है । वह निरपराध होने पर भी कुछ नहीं बोलती और सावित्री को साथ लेकर मर्त्यलोक के लिए ब्रह्मलोक से प्रस्थान कर देती है । ब्रह्मा जी ने उसके शाप को पुत्र का मुख देखने की अवधि दी । सावित्री ने उसे बहुत ढाढ़स दिया और वे दोनों शोण के तट पर निवास करने लगीं । वहीं पहुँचे हुए दधीच से सरस्वती का प्रणय हो गया । सरस्वती की अपेक्षा सावित्री अधिक प्रगल्भ थी । सरस्वती मुग्धा और सावित्री प्रगल्भा थी । दधीच के प्रथम दर्शन से आकृष्ट होने पर भी सरस्वती ने अपना प्रणय-भाव बिलकुल छिपाये रखा । उसके चले जाने पर शून्य-शून्य-सी रहने लगी । जब दधीच का कुशल-समाचार लेकर मालती आई तब एकान्त में सरस्वती ने दधीच के प्रति अपना अनुराग व्यक्त किया । दधीच को लाने के लिए मालती के चले जाने पर उसने सावित्री से यह रहस्य प्रकट कर दिया । इस प्रकार सरस्वती एक सहिष्णु, लज्जाशील नारी के रूप में चित्रित है और सावित्री का चित्रण एक संवेदनशील नारी के रूप में हुआ है । बाण—हर्षचरित के रचयिता बाण भी एक मुख्य पात्र है । मानना तो यह चाहिए कि हर्षचरित दो विभागों में विभक्त आख्यायिका है । प्रथम भाग के मुख्य पात्र स्वयं
( १७ ) महाकवि बाण हैं और द्वितीय भाग के सम्राट् हर्षवर्धन । बाण ने अपने चरित्र का जितनी धार्मिकता और स्पष्टता से चित्रण किया है उतना शायद ही हर्ष के चित्रण में हो। यद्यपि यह बात नहीं फिर भी कवि ने अपना दोष और गुण सब एक तटस्थ पर्यवेक्षक के नाते कह डाले हैं। बाण की तटस्थता इसी से व्यक्त होती है कि उन्होंने अपनी आत्मकथा में 'उत्तम पुरुष' के स्थान पर अन्य पुरुष का ही प्रयोग किया है। 'मैं उत्पन्न हुआ' के स्थान पर 'बाण उत्पन्न हुआ, बढ़ा और यौवन के आरम्भ में आवारा ( इत्वर ) बन गया' आदि साधारण पात्र के रूप में ही बाण ने अपने को रखा है। सम्भव था अगर उत्तम पुरुष 'मैं' का प्रयोग करते, तो अपने दोष पक्ष के उल्लेख में इतनी स्पष्टता न होती। छोटी अवस्था में ही बाण की माता मर गईं। पिता ने ही किसी प्रकार पाल-पोस कर बढ़ाया। दुर्भाग्य से जब बाण चौदह वर्ष का हुआ तभी उसके पिता भी दिवंगत हो गए। अब मातृ-पितृहीन बाण को सुधारने वाला कोई नहीं मिला। मिले वहीं नाचने-गाने के शौकीन संगी-साथी । उनके साथ रहने से बाण की स्वतन्त्रता बढ़ती गई और फलतः यौवन के आरम्भ में ही वह आवारा ( इत्वर ) हो गया। इन्हीं साथियों के साथ यहाँ-वहाँ मारा-मारा फिरने लगा । कभी किसी नगर में जाकर नाटक खेलता, तो कभी किसी नगर में। इस इत्वरवृत्ति ने यद्यपि बाण को पितृ-पितामह द्वारा अर्जित विभव एवं अविच्छिन्न विद्या-प्रसंग से वंचित कर दिया, तथापि बाण ने अपने उसी भ्रमणशील जीवन में, जब उसकी लोग खिल्ली उड़ा रहे थे, अनुभव के चार स्रोत पकड़ लिए थे। उसके अनुभव के प्रथम स्रोत राजकुल थे, उनमें घूम-घूम कर वह उनके प्रत्येक कर्मचारी से मिलता और वहाँ के उदार व्यवहारों से परिचित होता। दूसरा स्रोत उस समय के गुरुकुल थे, वहाँ जा-जाकर अध्ययन-अध्यापन की विधियों को उसने खूब समझ लिया। तीसरा स्रोत गुणी जनों की गोष्ठियाँ मिलीं, जिनमें उसने अनमोल बातें सुनीं। चौथा स्रोत सूझ-बूझ वाले विदग्ध जनों की मंडलियाँ थीं, उसने उनमें भीतर घुस कर थाह ली। इस प्रकार वह अपने जीवन के अल्हड़पन और घुमक्कड़ी प्रवृत्ति से अपनी आँखों देखे हुए लोकजीवन का चौचक अनुभव पाकर अपने घर वापस आया। तब उसके अन्दर जो पुश्तैनी प्रतिभा थी वह चमक उठी। बाण स्वभावतः अपने भाई-बन्धुओं में हिल-मिल जाता था। उसे अपने गाँव में अपने लोगों के बीच मोक्ष का आनन्द मिलता था। वह सम्राट् के पास से भी उस आनन्द के लिए चला आता था। अपनी इस प्रकृति से बाण बहुत अधिक जनप्रिय हो गया था। उसमें नम्रता भी खूब थी। अपने बड़ों के सामने झुक जाता था। उसने अपने आरम्भिक जीवन की समस्त बुराइयों को जड़ से खोद कर निकाल दिया और अनुभवी होने के बाद स्वयं अपना निर्माण किया। यद्यपि बाण ने कादम्बरी में भर्तु या भत्सुं नामक अपने गुरु का उल्लेख किया है, तथापि यह नहीं विदित होता कि बाण के जीवन के निर्माण में भर्तुशर्मा का कितना हाथ था। बाण के व्यक्तित्व में दो बातें बड़े महत्त्व की थीं, एक तो वह जन्म से ही स्वभावगम्भीर अर्थात् विस्तृत मेधाशक्ति वाला था, दूसरे वह
( १८ ) प्रत्येक वस्तु की जानकारी प्राप्त करने के लिए सदा उत्सुक रहता था। इन दोनों बातों से बाण को मार्गस्थ होने में बड़ी सहायता मिली। बाण के व्यक्तित्व की एक और विशेषता है, वह है उसका स्वाभिमान। वह जितना नम्र था उतना ही स्वाभिमानी भी। वह किसी की परवाह नहीं करता था। उसे क्या पड़ी थी कि वह राजकुल में प्रवेश पाकर सेवा में हाजिरी बजाता और सेवकों जैसी चापलूसी करता ! जब हर्ष के भाई कृष्ण ने अपने दूत द्वारा संदेश भेजा कि बिना समय गँवाए राजकुल में पधारें तो बाण बहुत सोच में पड़ गया। कृष्ण के दूत ने संदेश में यह भी कहा कि सेवा में झंझट सोच कर उदासीन न होना चाहिए। इससे प्रतीत होता है कि बाण के स्वाभिमानी व्यक्तित्व से कृष्ण खूब परिचित थे। उन्हें डर था कि बाण कहीं सम्राट् के पास आना अस्वीकार न कर दें। बाण से डाह करने वालों ने उसकी आरम्भिक चाल-चलन की बात लेकर सम्राट् के कान भर दिये थे, जिसका परिमार्जन बड़े प्रयत्न से कृष्ण ने कर दिया। बाण अपने अकारणबन्धु कृष्ण का संदेश सुन कर बहुत सोच में पड़ गए। राजसेवा उन्हें कष्टप्रद लगती थी। राजदरबार में बड़े खतरे नजर आते थे। न उनके पुरखों में किसी की इस तरफ रुचि रही, न उनके ही मन में ऐसी बात थी कि वे राजकुल में जाकर बुद्धि-सम्बन्धी विषयों का आदान-प्रदान करें। न विद्वानों की गोष्ठियों में बैठने की विलक्षण चतुराई ही उनके पास थी। चापलूसी से भी उन्हें बड़ी चिढ़ थी। ऐसी स्थिति में भी उन्होंने जाने का निश्चय कर लिया। स्वाभिमान उन्हें रोकता था, परन्तु जब यह ध्यान में आता कि सम्राट् मुझको कुछ ऐसा-वैसा समझ गए हैं तो उनका स्वाभिमान उनको चलने के लिए ही प्रेरित करने लगा। स्वाभिमानी बाण को यह कैसे सह्य होता कि दूसरा उसे हीन दृष्टि से देखे, जब कि वह हीन नहीं। अपनी अहीनता का सम्यग्ज्ञान होने पर भी बाण में अहङ्कार का लेश भी न था। उन्हीं के निर्देश से पता चलता है कि वे रूप-सम्पन्न थे, पर उनके मन में सुन्दर रूप से मिलने वाले आदर की इच्छा न थी। उनमें प्रगाढ़ शास्त्रीय ज्ञान था लेकिन बुद्धि-सम्बन्धी विषयों पर लड़झगड़ के लिए दिखावा करने जाना वह सर्वथा व्यर्थ समझते थे। जब सम्राट् हर्ष ने प्रथम बार बाण को देख कर हँसते हुए 'महानयं भुजङ्गः' कह डाला तो बाण अपनी स्वतंत्र प्रकृति और स्वाभिमान से संवलित ब्रह्मतेज का संवरण न कर सके। थोड़ी देर तक चुप रह कर उन्होंने पूछ ही डाला—'का मे भुजङ्गता ?' बाण का व्यक्तित्व इस प्रकरण में जितना स्पष्ट खुल सका है उतना अन्यत्र नहीं। उस समय बाण को यह सुध-बुध न थी कि वे महाराजाधिराज हर्षवर्धन के सामने खड़े हैं। उनका स्वाभिमान तत्काल प्रज्वलित हो उठा। जब कि बाण में अब कोई भुजङ्गरूपता न रह गया था तब भी दूसरों के कान भर देने से केवल ऐसी निराधार कल्पना कर देना कहाँ तक उचित था। उसने हर्ष से स्पष्ट कह दिया कि 'आप नेय की तरह बोलते हैं अर्थात् आपकी बुद्धि
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दूसरों पर निर्भर करती है। आप मुझे साधारण व्यक्ति मत समझिये। मैंने वात्स्यायन ब्राह्मणों के कुल में जन्म लिया है। सांगवेद का स्वाध्याय और अनेक शास्त्र भी सुने हैं। विवाह हो जाने के बाद नियमित गृहस्थ हूँ। (इससे यह पता चलता है कि बाण उस समय तक विवाहित हो गए थे और तभी से उनके जीवन में स्थिरता आई) यौवन के आरम्भ में अवश्य ही मुझ में कुछ चपलताएँ थीं, इससे मैं इनकार न करूँगा, किन्तु वे ऐसी थीं जिनका इस लोक या उस लोक में विरोध न हो।' बाण की इस वाणी में सचमुच उनका ब्रह्मतेज निखर उठा है। फिर बाण अपनी नम्रता का अवलम्बन ले लेते हैं। बाण ने अपने आप को खूब पहचाना था। वे अपनी कमजोरियों को अच्छी तरह समझ गए थे और उन्हें हटाने का प्रयत्न भी करते थे। जैसा कि उन्होंने स्कन्धावार में दरबार से लौटने पर सोचा था कि मुझे धिक्कार है यदि मैं अपने दोषों के प्रति अन्धा होकर केवल अनादार की पीड़ा अनुभव करके इस गुणी सम्राट् के प्रति कुछ और सोचने लगूँ। अवश्य ही मैं वह करूँगा जिससे यह कुछ समय बाद मुझे ठीक जान लें। पुष्पभूति और भैरवाचार्य—पुष्पभूति ही हर्ष के वर्धनवंश के आदि संस्थापक थे। वे शिव के अनन्य उपासक थे। उनके प्रभाव से घर-घर में शिव की पूजा होती थी। राजा पुष्पभूति बेताल-साधना भी करते थे। इस कार्य में उनका सहायक भैरवाचार्य नामक दाक्षिणात्य महाशैव था। भैरवाचार्य से मिलने का वृत्तान्त यह है कि एक दिन उस राजा के पास एक परिव्राट् आया। वह भैरवाचार्य का मुख्य शिष्य था। राजा के पूछने पर कि 'भैरवाचार्य कहाँ हैं?' उस शिष्य ने 'सरस्वती के किनारे शून्यायतन में ठहरे हैं' यह कह कर पाँच-चाँदी के कमल भैरवाचार्य की ओर से अर्पित किए। दूसरे दिन पुष्पभूति ने पुराने देवी के मन्दिर के उत्तर विल्ववाटिका में आसन लगाए भैरवाचार्य को साक्षात् शिव की तरह देखा। भैरवाचार्य से राजा की मित्रता हो गई। भैरवाचार्य के शिष्य ने ब्रह्मराक्षस के हाथ से छीन कर लाई अट्टहास नामक तलवार राजा को अर्पित की। राजा ने भैरवाचार्य की बेताल साधन में बड़ी सहायता की। फलतः श्रीकंठ नाग को हरा कर उसने लक्ष्मी को प्रसन्न किया। प्रसन्न लक्ष्मी द्वारा वर माँगने के लिए प्रेरित किए जाने पर पुष्पभूति ने अपने प्रिय सुहृद् भैरवाचार्य की सिद्धि के लिए ही वर माँगा। इससे पुष्पभूति की निःस्वार्थपरता व्यक्त होती है। लक्ष्मी ने उसे वर देकर राजा की शिव- भट्टारक के प्रति अनन्य भक्ति देखकर वरदान में यह भी कहा—'तुम महान् राजवंश के संस्थापक होंगे जिसमें हरिश्चन्द्र के समान सर्वद्वीपों का भोक्ता हर्ष नाम का चक्रवर्ती जन्म लेगा।' भैरवाचार्य विद्याधर के शरीर को प्राप्त हुआ। उसने राजा का बहुत बड़ा उपकार माना। इस प्रकार पुष्पभूति के रूप में एक ऐसे व्यक्ति का चित्रण किया गया है जो परोप- कार में ही जीवन को लगा देता है और स्वप्न में भी स्वार्थ का चिन्तन नहीं करता। प्रभाकरवर्धन और यशोवती—पुष्पभूति के वंश में प्रभाकरवर्धन बड़ा प्रतापी राजा हुआ। उसने सिन्ध, गान्धार, गुर्जर, लाट, मालव देशों पर विजय प्राप्त की थी।
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हूणरूपी हिरन के लिए वह केसरी था। इस प्रकार वह स्थाण्वीश्वर के छोटे से राज्य को बढ़ा कर महाराजाधिराज की पदवी से विभूषित हुआ। इसी कारण उसका दूसरा नाम प्रतापशील था। प्रभाकरवर्धन अत्यन्त पराक्रमी होते हुए भी दयावान् था। उसने मालवा के राजा के मारे जाने पर उसके अनाथ कुमारों के साथ मृदु व्यवहार किया। वह सूर्य का भक्त था। उसकी रानी यशोवती थी। हर्षचरित में यशोवती के चरित्र का चित्रण एक भारतीय पतिव्रता के रूप में हुआ है। रानी यशोवती के गर्भ से ही राज्यवर्धन, हर्षवर्द्धन और राज्यश्री ने जन्म लिया। प्रभाकरवर्धन ने राज्यश्री का विवाह बड़ी धूम-धाम से मौखरिवंशज अवन्तिवर्मा के ज्येष्ठ पुत्र ग्रहवर्मा के साथ किया। राजा प्रभाकरवर्धन ने अपने योग्य पुत्र राज्यवर्धन को हूणों से युद्ध करने के लिए भेजा। उसके पीछे-पीछे १४-१५ वर्ष की आयु वाला हर्ष भी कुछ पड़ावों तक गया, पर वह शिकार खेलने की रुचि से हिमालय की तराइयों में रुक गया। अचानक पिता की बीमारी का समाचार पाकर हर्ष वहाँ से लौट आया। हर्ष के आने पर पति के मरने के पूर्व ही यशोवती ने अग्नि में प्रवेश कर भारतीय नारी आदर्श का उज्ज्वल चित्र प्रस्तुत किया। बाद में प्रभाकरवर्धन की मृत्यु हुई। राज्यवर्धन—एक आज्ञाकारी पुत्र, स्नेहशील भाई और शूर योद्धा के रूप में राज्यवर्धन का चित्रण किया गया है। वह पिता की आज्ञा पाते ही हूणों के साथ युद्ध करने के लिये चला जाता है। बालक हर्ष भी कुछ पड़ावों तक उसके साथ चलता है, पर हिमालय की तराइयों में आखेट के लिये रुक जाता है। जब तक राज्यवर्धन परदेश से नहीं लौटा था, इसी बीच प्रभाकरवर्धन की मृत्यु हो गई और माता यशोवती भी न रही। हर्ष ने राज्यवर्धन के पास खबर भिजवा दी। इधर हर्ष के मन में बड़ी भारी चिन्ता यह होने लगी कि पिताजी का समाचार सुनकर बड़े भैया (आर्य) भी कहीं बुद्ध की तरह आचरण न कर बैठें। कहीं राज्यवर्धन आश्रम में प्रविष्ट न हो जायँ। कहीं वह पुरुष-सिंह किसी गुफा में न चला जाय। अनाथ पृथिवी को देखकर कहीं निरन्तर अश्रुधारा प्रवाहित न करने लगें। प्रथम बार इस आपत्ति से विह्वल होकर आत्मचिन्तन में न लग जायँ। संसार को अनित्य समझकर पास आती हुई राज्यलक्ष्मी से विरक्त न हो जायँ। कहीं दुःखज्वाला का शमन करने के लिये जल में न डूब जायँ। यहाँ लौटने पर राजाओं के कहने पर पराङ्मुख न हो जायँ। इस प्रकार हर्ष अपने मन में कल्पना करते हुए राज्यवर्धन को बाट देखते रहे। भ्रातृप्रेम से अभिभूत हर्ष के मन के ये भाव राज्यवर्धन के शम-प्रधान व्यक्तित्व की ओर संकेत करते हैं। लगता है राज्यवर्धन आरम्भ से ही भगवान् बुद्ध के धर्म से आस्थावान् था। जैसा कि एक ताम्रपत्र के अनुसार उसे परम- सौगत भी कहा गया है। हर्ष को भी उपर्युक्त चिन्ता में भी राज्यवर्धन से विरक्त होने के पश्चात् बुद्ध के जीवन की झलक मिलती है। हर्ष को यह सन्देह था कि बुद्ध के समान वे भी कहीं न चले जायँ।
( २१ ) पितृ-शोक में अभिभूत होकर राज्यवर्धन जब लौटा तब यही घटना घटी। हर्ष से उसने कहा—'तुम राज्यभार ग्रहण करो, मैंने आज शस्त्र छोड़ा।' और तलवार हाथ से फेंक दी। राज्यवर्धन के इस कथन में उसकी निःस्पृहता पितृप्रेम, भ्रातृप्रेम आदि समस्त सद्वृत्तियों एक साथ उमड़ पड़ी है। इसी अवसर पर एक विचित्र घटना घट जाती है। एक परिचारक ने आकर खबर दी कि सम्राट् के मरने की खबर सुनकर दुरात्मा मालव- राज ने ग्रहवर्मा को जान से मार डाला और राज्यश्री को कान्यकुब्ज के कारावास में डाल दिया। इस समाचार से तत्काल राज्यवर्धन का शोक जाता रहा, उसके स्थान पर क्रोध प्रतिष्ठित हो गया। उसने हर्ष से कहा—'तुम राज्य सँभालो, मैं मालवराज के कुल का नाश करने चला।' हर्ष ने जब यह कहा कि 'आर्य के प्रसाद से पहले भी मैं कभी वञ्चित न रहा। कृपा कर मुझे भी साथ ले चलें।' तो राज्यवर्धन ने कहा—'तुम ठहरो, मुझे अकेले ही शत्रु का नाश करने दो।' यह कहकर उसने उसी दिन शत्रु पर धावा बोल दिया। राज्यवर्धन मालवराज की सेना को खेल ही खेल में जीत लेने पर भी गौड़ाधिप के कुचक्र से मारा जाता है। हर्ष के हृदय में राज्यवर्धन के प्रति अपार स्नेह था। उसने उसके मारे जाने का समाचार सुनकर उसकी चरण-रज का स्पर्श करके प्रतिज्ञा की—'कुछ ही दिनों में यदि गौड़ाधिप को न मार डालूँ, तो स्वयं जल कर भस्म हो जाऊँगा।' हर्ष चरित में राज्यवर्धन का व्यक्तित्व सर्वथा अकलुषित और स्नेह तथा पराक्रममय देखने में आता है। हर्षवर्धन—कहा जा चुका है कि वर्धनवंश के आदि संस्थापक राजा पुष्पभूति को लक्ष्मी ने प्रसन्न होकर वरदान दिया था—'तुम्हारे वंश में हरिश्चन्द्र के समान समस्त द्वीपों का भोक्ता हर्ष नाम का चक्रवर्ती जन्म लेगा।' इसलिए यह स्वाभाविक था कि हर्ष के समस्त गुण जन्मजात थे। जैसा कि बाण ने हर्ष के यशोवती के गर्भ में आते ही रानी का वर्णन करते हुए लिखा है—उसके मन में यह दोहद इच्छा हुई कि चार समुद्रों का जल एक में मिलाकर स्नान करूँ और समुद्र के बेला-कुञ्जों में भ्रमण करूँ। नंगी तलवार के पानी में मुँह देखने की, वीणा अलग हटा कर धनुष की टंकार सुनने की और पंजर- बद्ध केसरियों के देखने की इच्छा हुई। इस प्रकार हर्ष जन्म से ही एक महापुरुष था। किसी ब्राह्मण ने ज्योतिष के अनुसार हर्ष के जन्म के समय भविष्यवाणी भी कर दी थी। हर्ष में शैशव काल से ही अपूर्व रणोत्साह और साहस का आभास मिलने लगा था। जब पिता ने अपने सुयोग्य पुत्र राज्यवर्धन को हूणों से भिड़न्त के लिए भेजा, तो १४-१५ वर्ष की अवस्था वाले हर्ष भी बड़े भाई के साथ चलने के उत्साह का संवरण न कर सके। कुछ पड़ावों के बाद ही हर्ष का मन आखेट में लग गया तो वे आगे न जाकर हिमालय की तराइयों में शिकार करने लगे। यहीं से हर्ष के जीवन का आकस्मिक परिवर्तन आरम्भ हो जाता है। उन्हें पिता की बीमारी की खबर मिलती है। वे शीघ्र ही दौड़ पड़े; मार्ग में कुछ भी नहीं खाया-पिया। इससे उनका अनन्य पितृ प्रेम व्यक्त होता है।
राजद्वार पर पहुँचते ही उन्होंने उद्विग्न होकर सुषेण नामक वैद्यकुमार से पिता की हालत पूछी। सुषेण ने कोई आशाजनक बात न कहीं तो घबराए हुए पिता के पास पहुँचे। उन्होंने उन्हें रुग्णावस्था में देखा। प्रभाकरवर्धन ने हर्ष को देखकर उठने की चेष्टा की। उन्होंने बड़ी कठिनता से यह कहा—'हे वत्स, दुबले जान पड़ते हो।' तब भंडि ने कहा कि हर्ष को भोजन किए हुए तीन दिन हो चुके हैं। यह सुन कर पिता ने गद्गद कंठ से कहा—'तुम्हारे आहार के बाद ही मैं पथ्य लूँगा।' पिता का पुत्र के प्रति स्नेह स्वाभाविक है, पर यहाँ स्वाभाविकता की सीमा पर यह स्नेह पहुँच गया है। गुणवान् पुत्र के प्रति पिता का इससे बढ़कर क्या भाव हो सकता है। हर्ष की गुणग्राहिता भी असामान्य थी। जब उन्होंने सुना कि रसायन नामक वैद्यकुमार ने सम्राट् के प्रति भक्ति और स्नेह से अभिभूत होकर आग में कूद कर जान दे दी, तो उनकी प्रतिक्रिया यह हुई कि उसने कुलपुत्रता धर्म को चमका दिया। स्वयं बाण ने हर्ष की गुणग्राहिता की प्रशंसा अपनी प्रथम भेंट के अवसर पर की थी। जब बाण ने अपना विशिष्ट परिचय दिया तब हर्ष ने कहा था कि मैंने भी ऐसा ही सुना है। तब बाण ने एकान्त में हर्ष की उदारता एवं गुणग्राहिता की प्रशंसा की है। अस्तु, इसी बीच जब प्रभाकरवर्धन मृत्युशय्या पर अन्तिम- साँस तोड़ने ही वाले थे तब हर्ष के जीवन की दूसरी मार्मिक घटना माता यशोवती के सती हो जाने की तैयारी सुनकर हुई। किसी प्रकार वे माँ को उनके निर्णय से विचलित न कर सके। तत्पश्चात् पिता भी दिवंगत हो जाते हैं। इन उद्वेजक घटनाओं से हर्ष अत्यन्त शोकमग्न अवस्था में पड़ गए। अनेक कुलपुत्र, गुरु, वृद्ध ब्राह्मण, मूर्धाभिषिक्त अमात्य, मस्करी, मुनि, वेदान्ती तथा पौराणिक लोगों ने हर्ष के शोक को उदाहरणों और दृष्टान्तों द्वारा कम किया। तब हर्ष के मन में राज्यवर्धन के विषय में अनेक विचार आने लगे। कहीं बड़े भाई पिता के मरण का घातक समाचार सुन कर बुद्ध की तरह आश्रम में न प्रविष्ट हो जायें ! हर्ष की यह भावना राज्यवर्धन के प्रति अपार भ्रातृ-प्रेम और हृदय की पवित्रता को व्यंजित करने वाली है। सचमुच इस प्रकार की आन्तरिक वृत्ति के कारण महानता की दृष्टि से हर्ष एक उच्च आदर्श का रूप धारण कर लेते हैं। जैसा हर्ष ने राज्यवर्धन के विषय में मन में सोचा था, शोक से भरे हुए राज्य- वर्धन ने आकर वही सोचा और अपनी तलवार फेंक दी। राज्यवर्धन के इस विचार से हर्ष का हृदय विदीर्ण हो गया। उन्होंने अपने आप में ही कोई ऐसा दोष अनुभव किया जिसके कारण राज्यवर्धन ने यह निश्चय कर डाला। हर्ष के उस विदीर्ण हृदय में कितनी पवित्रता और विशालता थी। इसी बीच एक घटना और घटती है। मालवराज द्वारा ग्रहवर्मा की मृत्यु और राज्यश्री के कारागार में बन्द होने की खबर तत्काल मिली। सुनते ही राज्यवर्धन का विषाद जाता रहा, वे आगबबूला हो गए। हर्ष को राज्यभार सम्भालने के लिए कहा और स्वयं फिर हाथ में कृपाण उठा लिया। यहाँ भी हर्ष ने साथ जाने के लिए आग्रह किया। राज्यवर्धन हर्ष के पराक्रम से परिचित थे, उन्होंने कहा—
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'सारी पृथिवी को जीतने के लिए मान्धाता की तरह तुम धनुष उठाओगे, तो तुम ठहरो। मुझे अकेले ही शत्रु का नाश करने दो।' यह कहकर उन्होंने प्रस्थान किया। जब हर्ष को चौथी घटना यह सुन पड़ी कि एक मालवराज को खेल-खेल में पराजित कर लेने पर भी राज्यवर्धन को धोखे से गौड़ाधिप ने मार डाला, तो उनकी क्रोधाग्नि फूट पड़ी। तब हर्ष ने यह प्रतिज्ञा की—'यदि कुछ ही दिनों में इस पृथिवी को गौडरहित न बना दूँ और समस्त राजाओं के पैरों में बेड़ियाँ न पहना दूँ तो घी से धधकती हुई आग में पतंगों की तरह अपने शरीर को जला दूँगा।' हर्ष की इस प्रतिज्ञा में उसका समस्त ओज प्रदीप्त हो उठा है। युद्ध की तैयारियाँ होने लगीं। कुछ दिन बाद प्राग्ज्योतिषेश्वर कुमार ने हंसवेग के साथ एक छत्र और अनेक उपहार भेजे। हर्ष के हृदय में प्रत्युपकार की भावना का यह कितना सुन्दर प्रसङ्ग है। जब एकान्त में बैठे-बैठे उन्होंने यह सोचा—'आमरण मैत्री के अतिरिक्त इस प्रकार के सुन्दर उपहार का बदला और क्या हो सकता है?' भण्डि ने आ- कर राज्यश्री के विन्ध्याटवी में भाग जाने की खबर दी, तो हर्ष स्वयं सब काम छोड़ कर उसे खोजने निकल पड़े। बीच में शबर युवक निर्घात के माध्यम से दिवाकरमित्र नामक एक बौद्ध भिक्षु से भेंट होती है। दिवाकरमित्र के एक शिष्य ने हर्ष को राज्यश्री का पता बताया। अन्त में राज्यश्री मिल जाती है। इस प्रकार हर्ष का व्यक्तित्व आदि से अन्त तक निर्भीक और साहसी, कर्त्तव्यपरायण और स्नेहमय मिलता है। बाण ने सम्राट् के उदात्त जीवन का बहुत नजदीक से अध्ययन किया था। बाण की लेखनी के स्पर्श से हर्ष के व्यक्तित्व की जो परिस्फूर्ति हर्षचरित में दिखाई देती है वह अपूर्व है। यह कहना कठिन है कि बाण की लेखनी ने हर्ष का स्पर्श कर इतनी शक्ति प्राप्त की अथवा हर्ष का व्यक्तित्व ही बाण की लेखनी के स्पर्श से समृद्ध हो गया। इसमें सन्देह नहीं कि हर्ष जैसा सम्राट् भारतवर्ष में कोई दूसरा नहीं हुआ। हर्ष की महती सफलता तो इसमें भी अभिलक्षित होती है कि उसने परस्परविरोधी, साम्प्र- दायिक तथा धार्मिक वातावरण को भी एक सन्तुलित रूप दिया था। हर्ष किसी एक धर्म और एक सम्प्रदाय का पक्षपाती न था। उसके मन में सबके प्रति समान आदरभाव था। बाण ने एक तटस्थ दर्शक के रूप में ही उसके व्यक्तित्व का चित्रण किया है। व्यर्थ प्रशंसा का पुल बाँधना बाण जैसे स्वाभिमानी के लिए कहाँ तक सम्भव था। हर्ष के व्यक्तित्व की यह प्रसंगतः सामान्य चर्चा है। ग्रन्थ के आद्योपान्त अवलोकन से ही पाठक उसकी विशेषताओं से परिचित हो सकेंगे। बाण की चित्रग्राहिणी प्रतिभा में हर्ष के व्यक्तित्व का चित्र ऐसी स्वाभाविकता से आलिखित है कि देखते ही बनता है। राज्यश्री—यह हर्ष की छोटी बहन थी। यह नृत्य, गीत आदि कलाओं से प्रवीण थी। प्रभाकरवर्धन ने धूम-धाम से ग्रहवर्मा के साथ उसका विवाह किया। पिता के मरते ही राज्यश्री पर भी दुर्भाग्य के बादल उमड़ आए। मालवराज ने ग्रहवर्मा को जान से मार दिया और उसे कान्यकुब्ज के कारागार में बन्द कर रखा। वह किसी तरह बन्धन से छूट
कर परिवार के साथ विन्ध्याचल के जंगल में चली गई। जब वहाँ वह अग्निप्रवेश करने के लिए तैयार थी तब हर्ष उसे ढूँढते हुए पहुँच गए। इस अवस्था में सहसा भाई को पाकर वह विलाप करने लगी। हर्ष ने रोते हुए कहा—'अब धीरज धरो, अपने को सम्हालो।' राज्यश्री पर इस समय दुःख का पहाड़ टूट पड़ा था, हर्ष ने मृत्यु के मुख से खींच कर उसे बचा लिया। वह अपने सतीत्व की रक्षा के लिए शत्रु के कारावास से भी भाग निकली। भारतीय नारी का यह उच्च आदर्श राज्यश्री में एकान्ततः प्रस्फुरित होता है। बौद्धभिक्षु आचार्य दिवाकरमित्र के सामने राज्यश्री ने हर्ष से विनयपूर्वक कषाय वस्त्र धारण की अनुज्ञा माँगी। एक विधवा के तपस्वी जीवन के लिए आत्मसंयम के अतिरिक्त और दूसरा क्या कर्तव्य रह जाता है। हर्ष ने भाई के वध का बदला लेने की जो प्रतिज्ञा की थी उसे सुनाकर तत्काल राज्यश्री को ऐसा न करने के लिए कहा। उन्होंने भिक्षु दिवाकरमित्र से कह दिया कि प्रतिज्ञा पूरी होने पर मैं और यह एक साथ कषाय ग्रहण करेंगे। तब राज्यश्री ने भाई की बात पर आग्रह नहीं किया। इस प्रकार इन प्रमुख पात्रों की चर्चा के साथ ही हर्षचरित का कथानक भी बहुत अंश में सामने आ जाता है।
कादम्बरी
महाकवि बाणभट्ट की दूसरी 'अतिद्वयी' रचना कादम्बरी है। यह एक कथा है। आधुनिक परिभाषा में कथा को ही उपन्यास कहते हैं। यद्यपि कथा और उपन्यास में बहुत अन्तर है, तथापि काल्पनिकता का सम्बन्ध दोनों में एक-सा अभिलक्षित होता है। आधुनिक उपन्यास कथा का विकसित रूप है और कथा उपन्यास का पूर्वरूप। कादम्बरी संस्कृत साहित्य की सर्वोत्कृष्ट गद्य-रचना है और बाण की अमर कृति है। 'हर्षचरित इस पृथिवी लोक की तथ्यात्मक आख्यायिका है पर कादम्बरी दिव्य-लोक को भूतल पर लाने वाली काव्य-कल्पना है।' यह दृढ़ता के साथ कहा जा सकता है कि बाण हर्षचरित की अपेक्षा कादम्बरी में अधिक सफल हुए हैं। कादम्बरी की कथा के सम्बन्ध में यह मान्यता है कि यह गुणाढ्यकृत बृहत्कथा से ली गई है। गुणाढ्य ने बृहत्कथा को पैशाची भाषा में लिखा था, जो अब तक उपलब्ध नहीं है। उसके संस्कृत अनुवाद के रूप में क्षेमेन्द्रकृत बृहत्कथामंजरी और सोमदेवकृत कथासरित्सागर में कादम्बरी-कथा का मूल रूप सुरक्षित है। भारतीय प्राचीन साहित्य में उपजीव्य तीन ग्रन्थ विशेष रूप से रहे हैं—रामायण, महाभारत और बृहत्कथा। अतः सम्भव है कि बाण ने अपनी कथा की मूल घटनाएँ बृहत्कथा से ली हों, किन्तु यह निर्विवाद है कि उन्होंने अपनी प्रतिभा से उसे एक सर्वथा नवीन और मौलिक रूप दे दिया है। कादम्बरी की कथा संक्षेप में इस प्रकार है—'विदिशा के राजा शूद्रक के समीप एक चाण्डालकन्या पंजरबद्ध आश्चर्यकारी शुक को उनकी सेवा में अर्पित करती है। यह
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शुक अपने जन्म से लेकर महर्षि जाबालि के आश्रम में पहुँचने तक का वृत्तान्त सुनाता है। महर्षि जाबालि शुक के पूर्वजन्म की कथा सुनाते हैं—उज्जयिनी के राजा तारापीड थे। उनकी रानी विलासवती थी। उनके गुणवान् महामन्त्री शुकनास थे। बड़ी प्रतीक्षा के बाद राजा को एक पुत्र होता है। उसी समय शुकनास की पत्नी मनोरमा के गर्भ से भी पुत्र होता है। राजा के पुत्र का नाम चन्द्रापीड़ था और शुकनास के पुत्र का नाम वैशम्पायन। दोनों ने एक साथ गुरुकुल में अध्ययन किया। दोनों दिग्विजय के लिए सेना लेकर निकल पड़े। राजकुमार चन्द्रापीड़ एक बार किन्नर-मिथुन का पीछा करते हुए बहुत दूर अच्छोद नामक सरोवर के समीप पहुँच गए। वहाँ महाश्वेता नामक एक तपस्विनी गन्धर्वकन्या मिलती है। पूछने पर अवगत हुआ कि उसका अभीप्सित प्रिय पुण्डरीक मिलने के पूर्व ही मृत्यु को प्राप्त हुआ। प्रिय के भावी मिलन की आशा में वह अच्छोद सरोवर के किनारे रहने लगी थी। उसकी सखी कादम्बरी ने भी कौमार्यव्रत धारण किया था। वह चन्द्रापीड़ को कादम्बरी के पास ले जाती है वहाँ प्रथम साक्षात्कार में ही चन्द्रापीड़ और कादम्बरी दोनों अनुरक्त हो जाते हैं। चन्द्रापीड़ फिर लौट कर अपने स्थान पर आते हैं। वहाँ से पिता का पत्र पाकर अकेले घर आ जाते हैं। घर से फिर स्कन्धावार पहुँच कर वैशम्पायन को वहाँ न देख दौड़े-दौड़े महाश्वेता के पास जाते हैं। महाश्वेता ने जब यह कहा कि मुझसे उसने प्रणययाचना की तो मैंने उसको शुक बना दिया, तो इस प्रकार अपने सुहृद् की आपत्ति से चन्द्रापीड़ के प्राण निकल जाते हैं। वहाँ कादम्बरी भी पहुँचकर चन्द्रापीड़ के पुनः मिलन की आशा से उनके शवशरीर की सेवा करती है। यहाँ जाबालि की कथा समाप्त हो जाती है। तब शुक ने शूद्रक से कहा कि मैं जाबालि के आश्रम से महाश्वेता के लिए उड़ चला तो बीच ही में चाण्डालकन्या ने पकड़ कर मुझे आप के समीप ला दिया। तब चाण्डाल- कन्या ने कहा कि मैं लक्ष्मी हूँ, यह शुक पुण्डरीक है और आप चन्द्रापीड़ हैं। शूद्रक को कादम्बरी का प्रेम स्मृत हो उठा। उनके प्राण निकल गए और उधर चन्द्रापीड़ जीवित हो गए। शुक की आत्मा भी पुण्डरीक के मृत शरीर में आकर पुनः मिल गई, जो चन्द्रलोक में सुरक्षित था। तत्पश्चात् महाश्वेता और पुण्डरीक, कादम्बरी और चन्द्रापीड़ सब एकत्र हो गए और विवाहित होकर सुख-पूर्वक रहने लगे। इस प्रकार कादम्बरी अनेक अप्राकृतिक घटनाओं से भरी होने पर भी कुतूहल उत्पन्न करने में अपूर्व है। उत्सुकता तो कथा के आरम्भ में चाण्डालकन्या द्वारा शूद्रक की सभा में वैशम्पायन शुक के लाए जाने से ही लेकर आरम्भ हो जाती है और पाठक को बरबस आगे बढ़ने के लिए बाध्य होना पड़ता है। कथा की प्रधान नायिका कादम्बरी बड़ी लम्बी चढ़ान के बाद मिलती है। अनेक उपकथाएँ भी साथ-साथ चल पड़ती हैं जो कथा के सूत्र में पुष्टि लाने का काम करती हैं। महाश्वेता की प्रणयकथा कादम्बरी की प्रणयकथा के अन्तर्भुक्त होने पर भी अपना अस्तित्व अलग रखती है। कादम्बरी एक मुग्धा नायिका
( २६ ) है जो सिर्फ प्रणय करना जानती है, महाश्वेता तपी हुई वनिता है जो प्रणय के सच्चे मार्ग पर कादम्बरी को प्रतिष्ठित करने में सहायक होती है। कादम्बरी से महाश्वेता का व्यक्तित्व किसी अंश में दुर्बल नहीं। इसका यह अर्थ नहीं कि कादम्बरी बिलकुल एक कठपुतली रह गई है। वह सबके प्रभाव से अलग होकर अपने प्रणय का अस्तित्व बनाने में अत्यन्त निपुण है। आरम्भ में उसका वासना-जनित प्रेम भी आगे चल कर विरह-तप्त होकर महाश्वेता के प्रणय के समान ही पवित्र बन गया। आरम्भ से अन्त तक कादम्बरी कथा अनेक प्रकार की विविधतापूर्ण घटनाओं से भरी होने के कारण कवि के वस्तुविन्यास- कौशल का परिचय देती है। बाण के चरित्र की अपनी विशेषता है। जैसा कि हम हर्षचरित में देख चुके हैं, उसी प्रकार कादम्बरी के भी सभी पात्र सजीव बन पड़े हैं। नवयुवक चन्द्रापीड जो अपनी सौम्यता में, महाराज तारापीड जो अपनी उदारता में, आदर्श महामन्त्री शुकनास जो अपनी अगाध प्रवीणता में, रानी विलासवती जो अपनी सुकुमारता में, छाया की भाँति चन्द्रापीड का अनुसरण करने वाली पत्रलेखा अपनी तत्परता में, कठोर कपिंजल अपनी स्नेहमयता में कादम्बरी के जीते-जागते पात्र हैं जो पाठक के मन पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं। कादम्बरी के चित्रण में बाण ने भावों के सम्बन्ध में अपने मार्मिक निरीक्षण का अपूर्व परिचय दिया है। कादम्बरी के समस्त भाव सहृदय और समीक्षक पाठक के लिए अलग से अध्ययन के विषय हैं। बाण के मौलिक कवित्व का साक्षात्कार इन्हीं विषयों में होता है।
वर्णन-वैचित्र्य कल्पनाओं का अतिरंजित हो जाना बाण जैसे कल्पनाशील मन वाले भावुकहृदय कवि के लिए कोई आश्चर्यजनक नहीं। सबसे बड़ी बात तो यह दृष्टि में आती है कि बाण ने अपने बहुमुखी जीवन के अनुभवों को समेट कर पद-पद में अनुस्यूत कर डाला है। हर्षचरित में बाण की दृष्टि के सामने उनके जो समस्त अनुभव थे, कादम्बरी में वे ही बिलकुल उनके तरल मानस से अन्तर्लीन होकर कुछ विलक्षण रूप में प्रस्फुरित होते हैं। जैसे कोई चित्रकार किसी प्रपात के मनोहर दृश्य के सामने बैठ कर उसका रेखाचित्र बना लेता है और घर पर जाकर आँखों के मार्ग से मन में उतारे हुए उस हृदय के समस्त छविमय आकार को विविध प्रकार के रंगों से अभिव्यंजित करता है, ठीक उसी प्रकार बाण ने अभ्यास के लिए अनुभव के विविध रूपों का एक खाका तैयार कर लिया, जो हर्षचरित के रूप में सहृदय जनों के सामने है। फिर वे ही अनुभव नये-नये रंगरूप में अलौकिकता के साथ कादम्बरी के पद-पद में बीन गए हैं। यही कारण है कि कवि की सफलता हर्ष- चरित की अपेक्षा कादम्बरी में अधिक समझी जाती है। हर्षचरित में जो सेनापति सिंहनाद का उपदेश है उसकी कोटि में कादम्बरी का शुकनासोपदेश कितना विस्तृत और
( २७ ) पूर्ण बन गया है। ऐसा लगता है जैसे महर्षि व्यास ने महाभारत के अतिरिक्त प्रकरण में गीता को उपनिबद्ध कर दिया है वैसे ही महाकवि बाण ने शुकनासोपदेश के नाम से एक अतिरिक्त रचना ही कादम्बरी में उपनिबद्ध कर दी हो। कादम्बरी शताधिक वर्णनों का अद्भुत संग्रह है। डा० वासुदेवशरणजी अग्रवाल के शब्दों में कादम्बरी में बाण की वर्णन-क्षमता का मृद्वीकापाक हुआ है। बाण की चित्र- ग्राहिणी प्रतिभा वर्णनों में वर्णनातीत सफल हुई है। कादम्बरी में बाण ने नदी, वन, वृक्ष सरोवर, नगर, सायं-प्रातः, चन्द्रोदय, धूलिपटल, राजकुल, इन्द्रायुध, अश्व आदि के वर्णनों में बड़ी दूरदर्शिता से काम लिया है। व्यक्ति चित्रण में उसके सौन्दर्य की सूक्ष्मतम कल्पना में बाण के अतिरिक्त कौन सफल हो सकता है? यद्यपि संस्कृत-साहित्य में वर्णनकर्ता कवियों की कमी नहीं है, कालिदास का तो कहना क्या ? लेकिन बाण विस्तार-प्रधान वर्णन के पक्षपाती हैं। कालिदास जिस चित्र को थोड़े में ही अंकित कर सके हैं उसे बाण ने भव्य रूप देकर बड़ा बना दिया है। यही कारण है कि कालिदास के पश्चात् सर्वाधिक मौलिकता बाण की अपेक्षा अन्य को नहीं मिली। बाण की दृष्टि में किसी विशेष वर्णन में पक्षपात नहीं दिखाई देता। बाण जिस सूक्ष्मता से धवलदेहकान्तिप्रतिमण्डिता महाश्वेता का वर्णन करते हैं उसी सूक्ष्मता से नीलम की पुतली के समान काली-कलूटी चाण्डालकन्या का भी वर्णन करते हैं। अपेक्षाकृत बाण के वर्णन प्रातःकाल से अधिक सायंकाल के ही मिलते हैं। सम्भव है प्रातःकाल की अपेक्षा सायंकाल का दृश्य ही उनको अधिक पसंद रहा हो। नगरी उज्जयिनी के वर्णन से जाबालि के शान्त और पवित्र आश्रम का वर्णन भी कम अद्भुत नहीं। कादम्बरी के सौन्दर्य-वर्णनों में भी कम आकर्षण नहीं। मानवीय सौन्दर्य का वर्णन और तद्वाची शब्दों की विकसित सामग्री भी कालिदास से कहीं अधिक बाण की इस रचना में मिल जाती है। इसके अतिरिक्त इन्द्रायुध अश्व के सजीव वर्णन से बाण को 'तुरङ्गबाण' की पदवी भी मिली है। बाण के साहित्य के प्राण वर्णन ही हैं। उन्हें अलग कर देने पर कथा कुछ भी न रह जायगी। बाण अत्यन्त परिहास-प्रिय व्यक्ति थे। कादम्बरी के चण्डिका-मन्दिर के बुड्ढे पुजारी के वर्णन में उनकी परिहासप्रियता का पता चलता है। उस पुजारी के वर्णन में बाण ने खुलकर मजाक किया है। 'देवी के चरणों पर बार-बार माथा रगड़ने से उसके माथे पर घट्टा पड़ गया था। किसी ठगवैद्य द्वारा दिए हुए सिद्धांजन से उसकी एक आँख फूट गई थी इसलिये वह दूसरी आँख में प्रतिदिन तीन बार अंजन लगाता था जिससे लकड़ी की सलाई भी घिस कर चिकनी हो गई थी। रेशम के कोये का छल्ला पैर के अंगूठे में मढ़ लेने के कारण उसकी काट से अंगूठा घायल हो गया था। पिशाच चढ़े हुए लोगों का भूत उतारने के लिए वह मंत्र पढ़कर पीली सरसों से बार-बार उन्हें मारता तो वे भी उसकी ओर लपक कर लप्पड़ मारते जिससे उसका कान दब कर चपटा हो गया था। वह दिन भर मच्छर की तरह भनभनाता हुआ सिर हिला कर कुछ गुनगुनाता रहता था। वह
लाचार ब्रह्मचारी था, अत एव जब दूर जगहों से आकर ठहरी हुई बुड्डी तापसियों को देखता तो ताव खा-खा कर स्त्रीवशीकरण चूर्ण का उन पर प्रयोग करता था। कभी आए हुए बटोद्दियों को वहाँ न ठहरने देने के लिए उनसे जूझ जाता और तब वे भी बिगड़ कर उसके साथ गुत्थम-गुत्था करने लगते और उसे पटककर उसकी पीठ चटका देते। रतौंधी के कारण वह दिन में ही आ-जा लेता। उसका पेट निकला हुआ था और खाने की कोई थाह न थी। फाल्गुन में जब लोगों को मस्ती चढ़ती तो वे मचियासहित किसी बूढ़ी दासी को उठा ले आते और उसके साथ ब्याह रचा कर उसकी ठठोली करते।' इस प्रकार बाण के इस बुद्धे पुजारी को देख कर मन में रस भर आते हैं। हास्य, वीभत्स और भयानक का जीता-जागता चित्र बाण ने यहाँ देकर अपनी अद्भुत कला का प्रदर्शन किया है। कादम्बरी का एक प्रसंग बहुत ही आश्चर्यकारी है जहाँ बाण की कथानिर्माणक्षमता का अनुमान सहज ही होने लगता है। जब महाश्वेता के साथ चन्द्रापीड़ कादम्बरी के यहाँ भवन में जाकर ताम्बूल द्वारा उससे सम्मानित होते हैं। तत्पश्चात् उस समय कथा- क्रम शिथिल होता प्रतीत होता है। सबके सब चुपचाप यथास्थान बैठते हैं। कादम्बरी, चन्द्रापीड़, महाश्वेता एवं और सब उपस्थित सखी और परिजनों के लिए इस समय ऐसे हल्के झोंके की आवश्यकता थी कि जिससे फिर वे अपनी स्वाभाविक स्थिति प्राप्त कर सकें। बाण ने वहाँ सहसा एक सारिका और परिहास नामक शुक के झगड़े का प्रसंग लाकर कथा के प्रवाह को विलक्षण युक्ति से सम्हाल लिया है। चन्द्रापीड़ ने इस प्रसंग में नर्म भाषित करके सबको प्रभावित कर लिया। वहाँ का वातावरण उन पर हावी न हो सका। वहाँ के लोगों और चन्द्रापीड़ में अपरिचयकृत दूरी हट गई और वे उन सबके ऊपर प्रभावशाली हो गए तथा परस्पर सबके निकट आ गए। इस प्रकार बाण की लेखनी कथा के वस्तु-विन्यास-वर्णनों के संवर्धन एवं मानस भावों के अंकन में सर्वत्र जागरूक रहती है। वर्णनों की भरमार से कथा-प्रवाह के शिथिल प्रतीत होते हुए भी उनकी सरसता एवं चित्रमयता से पाठक को किसी प्रकार का उद्वेजन नहीं हो पाता। वह कथा के अग्रिम मोड़ से परिचित होने के लिए उत्सुक होकर भी तत्काल वर्णनों के भीतर इतना डूब जाता है कि कथा की ओर से उसका ध्यान हट जाता है। इसे बाण की अपनी विशेषता समझना चाहिए। यह पहले कहा जा चुका है कि कादम्बरी का उत्तर भाग बाणभट्ट के सुयोग्य पुत्र की रचना है। सौभाग्य की बात है कि उत्तरभाग भी बाणरचित पूर्वभाग की तरह ही बन गया है। सम्भव था बाण कुछ और विस्तृत करके लिखते। उत्तर भाग को देख कर ऐसा लगता है कि अगर भूषणभट्ट या पुलिन्द (न्ध्र) भट्ट ने अपना नाम बिना लिखे ही कादम्बरी की पूर्ति कर दी होती तो निश्चय ही यह किसी के लिए निर्णय करना कठिन हो जाता कि पूरी रचना एक ही कवि की है या नहीं। हाँ, इतना तो लोग अवश्य कहते कि बाण अन्त
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में चल कर हड़बड़ा गए और कथा को शीघ्र समाप्त कर डाला। कहीं उत्तर भाग में भी पूर्व भाग के टक्कर की रचना हो गई है। फिर भी बाण-पुत्र यह कहते हुए तनिक भी रुकते नहीं कि मैंने पिता की वाणी के समुद्रगामी प्रवाह में अपनी वाणी की धारा मिला दी जिससे कथा समाप्ति को प्राप्त सके। उनका यह कथन सर्वथा सत्य है। बाण की धारा में मिल पाने से ही उनकी वाणी यह काम कर सकी, अन्यथा बाण-जैसे वर्णनशिल्पी के सामने किसी दूसरे का डट पाना कभी सम्भव न था। बाण-पुत्र में कुछ-कुछ कवित्व का जो गुण था वह उनके पिता के आशीर्वाद का ही फल था। उन्होंने कादम्बरी के सम्बन्ध में कहा है— कादम्बरीरसभरेण समस्त एव मत्तो न किञ्चिदपि चेतयते जनोऽयम् । भीतोऽस्मि यन्न रसवर्णविवर्जितेन तच्छेषमात्मवचसाऽप्यनुसन्दधानः ॥ अर्थात् कादम्बरी (एक प्रकार की मदिरा तथा कादम्बरीकथा) के उत्तम रस को पीकर सहृदय जनों का वर्ग बिल्कुल छक कर अपनी सुध-बुध खो बैठा है। ऐसी स्थिति में रस और वर्ण से विहीन अपनी बाणी द्वारा कादम्बरी की पूर्ति करते हुए मुझे कुछ भय नहीं, क्योंकि बेहोशी में किसी को पता न चलेगा। बाण की दृष्टि में काव्य का स्वरूप बाण की शैली जानने से पूर्व हमें बाण के विचार में काव्य के स्वरूप को जान लेना चाहिए। बाण काव्य के स्वरूप के सम्बन्ध में अपनी अलग दृष्टि रखते हैं, जैसा कि हर्ष- चरित के आरम्भ में उन्होंने समझाया है। बाण को उन कवियों की कविता पसंद न थी जो राग द्वेष में भर कर मनमाने ढंग से बकवास करते हैं। बाण के अनुसार ऐसे 'वाचाल' और 'कामकारी' लोग ही कुकवि हो जाते हैं। नई वस्तु उत्पन्न करने वाला ही सच्चे अर्थ में कवि कहलाने योग्य है और वही 'उत्पादक' है। बाण केवल स्वभावोक्ति (जाति) के पक्षपाती न थे। प्रायः उन दिनों साहित्य में कविता के नाम पर प्रचुर मात्रा में स्वभा- वोक्तिशैली का प्रचलन था। बाण की प्रतिक्रिया यह थी कि स्वभावोक्ति किसी प्रकार भी कविता नहीं हो सकती; क्योंकि उसमें नवीनता का सर्वथा अभाव रहता है। आगे चलकर अलंकारशास्त्र के आचार्यों ने वक्रोक्तिवाद को खड़ा करके बाण के निर्दिष्ट मार्ग का अनुसरण किया। स्वभावोक्ति एक अलंकारमात्र तक सीमित रह गई। वस्तु के यथार्थ रूप में कोई आकर्षण नहीं रहता, अन्यथा कविता लिखने की कोई आवश्यकता ही नहीं। कवि वस्तु के यथार्थ रूप को बदल डालता है और अपनी प्रतिभा से नई वस्तु का निर्माण करता है, यही बाण का अभिप्रेत पक्ष था। वक्रोक्ति ने श्लेषप्रधान शैली को उत्पन्न किया। श्लेषपूर्ण शैली का काव्य निर्माण भी चल पड़ा। उसकी झलक बाण के पूर्ववर्त्ती सुबन्धु की प्रत्यक्षरश्लेषमय रचना वासवदत्ता में मिलती है। यह शैली बाण की भी पसंद थी। कादम्बरी में उन्होंने लगातार श्लेषों से भरी हुई (निरन्तरश्लेषघना) शैली की प्रशंसा
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की है । वस्तु की भावात्मक रचना में जब तक शब्दों की मरोड़ से उत्पन्न नवत्व का साक्षात्कार नहीं मिलता तब तक कवि प्रशंसा के पात्र नहीं, सम्भवतः बाण की यही दृष्टि थी । यह भी बात नहीं कि जाति या स्वभावोक्ति-शैली बाण को सर्वथा अनभिमत थी, उन्होंने अग्राम्या जाति की प्रशंसा की है, अर्थात् वह स्वभावोक्ति जो केवल वस्तु के यथार्थ रूप का चित्रण न होकर सुन्दरतापूर्ण चित्रण हो, बाण को सर्वथा मान्य थी । बाण कविता में समन्वय दृष्टि के पक्षपाती थे । वे एकांगी दृष्टि को कविता के लिए उपयुक्त नहीं मानते थे । उन दिनों प्रायः पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण के कवि लोग एकांगी दृष्टि से काव्य लिखते थे, जैसा कि बाण ने स्वयं निर्देश किया है— श्लेषप्रायमुदीच्येषु प्रतीच्येष्वर्थमात्रकम् । उत्प्रेक्षा दाक्षिणात्येषु गौडेष्वक्षरडम्बरम् ॥ ( हर्ष० ) अर्थात् उत्तर के लोगों में श्लेष-प्रधान शैली में रचना करने की प्रवृत्ति है, पश्चिम के लोग अर्थमात्र पर ध्यान देते हैं, भाषा कैसी भी हो अर्थ बढ़िया होना चाहिए । दाक्षिणात्य लोग उत्प्रेक्षा करने में खूब पड़ हैं, उत्प्रेक्षाशैली उड़न्त भरना या हद तक कल्पना करना है, गौड़ देश के निवासी कवियों में अक्षराडम्बर ही खूब चलता है । अक्षराडम्बर अर्थात् विकट शब्दों की योजना की आनुप्रासिक प्रवृत्ति से तात्पर्य है । इस प्रकार चारों ओर साहित्यिक समाज में एकांगी दृष्टि से काव्य-निर्माण की प्रवृत्ति चल पड़ी थी जो बाण को अभिप्रेत न थी । बाण कविता में सब शैलियों का समन्वय मानते थे । बाण की दृष्टि में बढ़िया काव्य वह है जिसमें पांच बातों का मेल हो— नवोऽर्थो जातिरग्राम्या श्लेषोऽक्लिष्टः स्फुटो रसः । विकटाक्षरबन्धश्च कृत्स्नमेकत्र दुर्लभम् ॥ ( हर्ष० श्लोक १।८ ) अर्थात् विषय की नवीनता, सुन्दर लगने वाली स्वभावोक्ति, श्लेष ऐसा जो क्लिष्ट न हो, स्फुट रस, जिसके निर्णय के लिए सहृदय को विशेष माथा-पच्ची न करनी पड़े, विकट या भारी भरकम शब्दों की योजना । बाण का कहना है कि सब मिल कर ये पाँचों बातें किसी एक काव्य में दुर्लभ हैं, परन्तु सच्चे अर्थ में वही काव्य कहने योग्य है जिसमें इन सब का समन्वय हो । बाण ने अपने काव्यों में इनके समन्वय का हमेशा ध्यान रखा है । बाण की यह समन्वयप्रधान शैली किसी प्रकार के एकांगी दृष्टिकोण के अधीन नहीं रही, यही उसकी विशेषता है । सचमुच श्लाघनीय रचना समन्वयप्रधान दृष्टिकोण का कवि ही कर सकता है, बाण की सफलता का रहस्य भी यही है । बाण रचना में विषय की सर्व- धिक नूतनता, सरल श्लेष-प्रधान शैली की अद्भुत योजना, वस्तुओं का अग्राम्य यथार्थ वर्णन, समासबहुल पदविन्यास तथा कथावस्तु का ग्रंथन, इन सब का विलक्षण सामंजस्य मिल जाता है ।
( ३१ ) कहा गया है कि बाण मनमाने ढंग की कविता करने वाले वाचाल एवं अनुत्पादक कवियों से खूब चिढ़े हुए थे। दूसरे कवि के वर्णों को बदल कर उनके स्थान में अपने शब्द रख कर काव्य निर्माण की प्रवृत्ति रखने वाले कवि बाण के शब्दों में चोर होते हैं। वे सहज ही पकड़े जाते हैं। ऐसे कवियों की रचना किसी अंश में आदर के योग्य नहीं। बाण की दृष्टि में कविता की भूमिका अपने स्वरूप में सर्वथा मौलिक और महत्वपूर्ण है। कविता की सिद्धि के लिए कवि को महती साधना करनी पड़ती है। साधना-विहीन कवि किसी प्रकार भी कविता की उच्च भूमिका में नहीं पहुँच सकता। बाण ने किसी विशेष कवि का नाम लेकर इस प्रकार की कुछ भी निन्दा की बात नहीं कही है। व्यक्तिगत आक्षेप बाण को अभिमत नहीं। प्रशंसा के अवसर पर वे विशेष कवियों की चर्चा हृदय खोल कर करते हैं। इसी प्रसंग में बाण ने अनेक कवियों का आदर-पूर्वक स्मरण किया है। सर्वविद् महर्षि व्यास और आख्यायिका निर्माण करने वाले कवीश्वरों की वन्दना के पश्चात् बाण अपने पूर्ववर्ती गद्यकाव्य वासवदत्ता की प्रशंसा करते हैं। वासवदत्ता सुबन्धु- कृत होनी चाहिए। किन्तु कुछ विद्वानों की कथा के रूप में सुबन्धु की उपलब्ध श्लेष-बहुल- रचना वासवदत्ता आख्यायिका के प्रसंग में कवियों के दर्प को विचलित करने वाली बाण की निर्दिष्ट (आख्यायिका) वासवदत्ता से अतिरिक्त लगती है। अस्तु, वे वासवदत्ता के गुण से प्रभावित अवश्य थे, पर अन्य कवियों की तरह विगलित-दर्प न थे, क्योंकि कादम्बरी के आरम्भिक पद्यों में बाण ने अपनी कथा को 'निरन्तरश्लेषघना' और 'अतिद्वयी' अर्थात् वासवदत्ता और गुणाढ्यकृत बृहत्कथा का अतिक्रमण करने वाली कहा है। फिर बाण ने भट्टार हरिचन्द्र नामक कवि के गद्यबन्ध चर्चा की है, जिसमें पद- बन्ध उज्ज्वल, मनोहर तथा अनुप्रास के रूप में क्रम से वर्णों की स्थिति है। उसकी शैली बाण के लिए आदर्श थी। भट्टार हरिचन्द्र के गद्यबन्ध के उपलब्ध न होने से यह ठीक पता नहीं चलता कि वे कौन थे। सम्भावना है कि राजशेखर ने जिन हरिचन्द्र का उल्लेख किया है वे ही बाण के भट्टार हरिचन्द्र हों। इस प्रकार बाण ने सातवाहन के सुभाषित- कोश गाथासप्तशती, प्रवरसेन की प्रसिद्ध रचना सेतुबन्ध और भास के यशस्वी नाटकों का सादर संस्मरण किया है। महाकवि कालिदास बाणभट्ट के अत्यन्त प्रिय कवि थे। बाण ने उसकी मधुरसान्द्र सूक्तियों में खूब आनन्द लिया था। सचमुच कालिदास के बाद बाण का ही नाम लिया जा सकता है। बाण ने कालिदास को खूब समझा है और उनकी शैली को आदर्श मान कर और भी पल्लवित रूप में निर्माण करने की अद्भुत क्षमता अर्जित की है। गुणाढ्य की बृहत्कथा और आढ्यराज नामक कवि के काव्योत्साह भी बाण के लिए आश्चर्यकारी थे। आढ्यराज की प्रशंसा में बाण कहते हैं कि जिह्वा ही भीतर की ओर खिंच जाती है और कविता करने के लिए प्रवृत्त नहीं होती।
( ३२ ) इस प्रकार बाणभट्ट जितने अंश में दोषज्ञ थे उतने ही अंश में गुणज्ञ भी। फिर भी किसी विशेष के प्रति उनकी बुरी धारण न थी। बाण के साहित्य में ऐसे व्यक्ति का कोई भी निर्देश नहीं मिलता जिससे बाणभट्ट क्षुब्ध हों। कादम्बरी में उन्होंने थोड़े में ही अपनी काव्यनिर्माणशैली की ओर संकेत किया है। जैसा कि कहा जा चुका है श्लेष- प्रधान शब्दों की अद्भुत योजना बाण की शैली की विशेषता है। कादम्बरी में इस शैली की प्रांजलता का साक्षात्कार होता है। बाण के शब्दों में बाण की शैली को 'निरन्तर- श्लेषघना' कहना चाहिए। आख्यायिका और कथा महाकवि बाण आख्यायिका और कथा दोनों के लेखक हैं। हर्षचरित आख्यायिका है और कादम्बरी कथा। अमरकोश में 'आख्यायिकोपलब्धार्था' कहा है, अर्थात् आख्या- यिका वह कथा है जिसका सत्यार्थ ज्ञात हो। कथा का विषय कल्पित होता है। आगे चल कर आख्यायिका के इस लक्षण का विकास हुआ और भिन्न-भिन्न आचार्यों ने अपनी-अपनी परिभाषा की। हर्षचरित और कादम्बरी को देख कर आख्यायिका का विषय ऐतिहासिक होना और कथा का कल्पनाप्रसूत होना, ऐसा ज्ञात होता है। अग्निपुराण के अनुसार आख्यायिका वह है जिसमें लेखक के वंश की प्रशंसा कुछ विस्तार से हो, कन्याहरण, संग्राम, विप्रलम्भ आदि विपत्तियों का वर्णन हो, रीति और वृत्ति अति प्रदीप्त शैली में हों, परिच्छेदों का नाम उच्छ्वास हो, चूर्णक शैली का बाहुल्य हो तथा वक्त्र और अपवक्त्र नामक श्लोक हों (अग्नि० ३३६।१३-१४)। कथा में इसके विपरीत कुछ श्लोकों में कवि-वंश का संक्षिप्त वर्णन हो, मुख्यार्थ के अवतरण के रूप में दूसरी कथा कही जाय, जिसमें परिच्छेद न हों अथवा कहीं पर लम्बक हों (अग्नि० ३३६।१५-१७)। दण्डी ने भी काव्यादर्श में दोनों के भेद-बताने का प्रयत्न किया है। आख्यायिका का वक्ता स्वयं नायक होता है, कथा का नायक या अन्य कोई; किन्तु यह नियम सर्वत्र लागू नहीं। दण्डी दोनों में किसी विशेष अन्तर के पक्षपाती न थे। नाममात्र का ही भेद है, यही उनका तात्पर्य था। पर बाण ने दोनों को अलग-अलग माना है। हर्षचरित में वक्त्रादि छन्दों का भी प्रयोग किया है और उच्छ्वास के रूप में विभाग किया है। कथा में बाण ने इससे बिल्कुल भिन्न दृष्टि अपनाई है। आगे चल कर आचार्यों ने हर्षचरित और कादम्बरी को देख कर ही आख्यायिका और कथा के लक्षण बनाये हैं। दण्डी के अनुसार नाम-भेद वाला पक्ष किसी को सम्मत नहीं। बाण ने अनेक आख्यायिकाकार कवियों की आख्यायिकाएँ देखी थीं। सम्भवतः महाभाष्य में उल्लिखित वासवदत्ता नाम की आख्यायिका से ही बाण परिचित हों। सुबन्धु की वासवदत्ता, जो कथारूप में अभी उपलब्ध है, बाण के बाद की रचना हो। पतंजलि ने वासवदत्ता के अतिरिक्त सुमनोत्तरा और भैमरथी आख्यायिकाओं का भी
( ३३ ) उल्लेख किया है। तात्पर्य यह कि बाण का हर्षचरित संस्कृत-साहित्य की पहली आख्यायिका नहीं, पर यह अवश्य है कि उपलब्ध पहली आख्यायिका यही दृष्टिपथ में आती है। बाण की शैली अब हमें संक्षेप में बाण की शैली के आधार पर वर्णनों का अध्ययन कर लेना चाहिए। बाण के समय से ही चार प्रकट की गद्यशैलियाँ चल पड़ी थीं, जिनमें बाण के साहित्य में तीन मिलती है, जैसे—एक दीर्घ समास वाली, दूसरी अल्प समास वाली और तीसरी समास-रहित । लम्बे-लम्बे समासों वाली शैली को उत्कलिका, छोटे- छोटे समासों वाली शैली को चूर्णक और समासरहित शैली को आविद्ध कहते हैं। बाण को इन तीनों शैलियों में बड़ी सफलता प्राप्त थी। उन्हें किसी विशेष शैली पर आग्रह नहीं था, फिर भी उत्कलिका अर्थात् दीर्घ समास वाली शैली बाण के चित्रात्मक प्रसंग के अनुकूल पड़ती थी। इसलिए बाण वर्णनों में प्रायः इसका आश्रयण करते हैं। हर्षचरित के दधीचिवर्णन, ग्रीष्मवर्णन आदि प्रसंगों में विशेष रूप से यह शैली प्रयुक्त है। वर्णनों में चलचित्र के समान शब्दों के माध्यम से छोटे-छोटे चित्र प्रस्तुत करने पड़ते हैं। संस्कृत भाषा की महती विशेषता है कि उन लघु चित्रों को प्रस्तुत करने में कवि कई शब्दों को गूँथकर एक लड़ी बना डालता है। बाण के जिस वर्णन को लीजिए, उसमें दीर्घ समासोंवाली शैली मिलेगी। वर्णन के अन्त में प्रायः बाण उत्कलिका को छोड़कर समासरहित आविद्ध शैली का आश्रयण करते हैं। आविद्ध शैली में किसी चित्र को प्रस्तुत नहीं किया जा सकता। वस्तु से सम्बन्धित कुछ बातों की सामान्य चर्चा के लिए यह उपयोगी है। बाण ने अपने वर्णनों में प्रायः ऐसा ही किया है। चूर्णकशैली को जिसमें छोटे-छोटे समास होते हैं, बाण खूब लिखते हैं। इसके लिए कोई खास नियम नहीं है। वर्णन करते-करते कभी-कभी शास्त्रीय उपदेश भी करने की प्रवृत्ति बाण के साहित्य में जगह-जगह मिलती है। उसमें प्रायः अल्पसमास चूर्णकशैली बाण को पसंद है। बाण की शैली का निखरा हुआ रूप हर्षचरित के चतुर्थ उच्छ्वास में जहाँ राज्यश्री के विवाह का प्रसंग है, मिलता है। हर्षचरित की अपेक्षा कादम्बरी के वर्णन चित्रमयता और प्राञ्जलता तथा सरसता की दृष्टि से अपूर्व बन पड़े हैं। महाश्वेता, कादम्बरी आदि के वर्णनों में बाण की अलौकिक वर्णन-क्षमता का परिचय मिलता है। बाण स्वयं कादम्बरी में गद्य की उत्कृष्ट शैली की ओर संकेत करते हुए लिखते हैं— उत्कृष्टकविगद्यमिव विविधवर्णश्रेणिप्रतिपाद्यमानाभिनवार्थसञ्चयम् ।' अर्थात् नाना प्रकार के वर्णों द्वारा नये अर्थ-समूह का प्रतिपादन करने वाला गद्य उत्कृष्ट होता है अथवा वह उत्कृष्ट कवि द्वारा लिखा जाता है। रीति की दृष्टि से बाण में पाञ्चाली रीति का प्राचुर्य है : स्वयं भोजराज भी इसे स्वीकार करते हैं— ३ ह० भू०
( ३४ ) शब्दार्थयोः समो गुम्फः पाञ्चाली रीतिरिष्यते । शीलाभट्टारिकावाचि बाणोक्तिषु च सा यदि ॥ (सरस्वतीकण्ठाभरण) अर्थात् शब्द और अर्थ का समान रूप से गुम्फन पाञ्चाली रीति में होता है, वह शीलाभट्टारिका और बाण दोनों की उक्तियों में पाई जाती है। विषय के अनुरूप शब्दावली का प्रयोग ही पाञ्चाली रीति का तात्पर्य है। बाण इसके सिद्धहस्त कवि हैं। इस भूमिका में बाण के जीवन और साहित्य के सम्बन्ध में कुछ उपयोगी बातों की चर्चा की गई है। आशा है बाण के विद्यार्थी इससे लाभान्वित होंगे। श्रद्धेय डा० वासुदेव शरण जी अग्रवाल ने हर्षचरित और कादम्बरी पर अलग-अलग अपना सांस्कृतिक अध्ययन प्रस्तुत किया। भूमिका में मैंने उनकी दृष्टि का बहुत अंश में अनुसरण करने का प्रयत्न किया है। बाण के साहित्य को जानने के लिए जो कुछ अन्य स्रोत भी मिले हैं मैंने उनका उपयोग किया है। अनुवाद के सम्बन्ध में हर्षचरित का अनुवाद मैंने किया यह कहने की हिम्मत मुझमें नहीं। अनुवाद आरम्भ करने के पूर्व मैंने अपने गुरुदेव डा० अग्रवाल जी से इस सम्बन्ध में पूछा था। उन्होंने सहर्ष अनुमति दी और उत्साहित किया। तत्काल स्वयं चौखम्बा विद्याभवन के अध्यक्ष महोदय से उन्होंने बातें भी कर लीं और मुझे अनुवाद तैयार करने के लिए सूचित किया। उन्होंने उत्साहित करते हुए यह कहा कि कहीं शंका हो तो पूछ लेना। मैंने अपना कार्य आरम्भ कर दिया। इसी बीच अध्यापनार्थ मुझे वैद्यनाथधाम गुरुकुल आना पड़ा। मैं ज्यों-ज्यों आगे बढ़ता गया मेरी कठिनाइयाँ भी बढ़ने लगीं। किसी- किसी प्रसंग में मैंने अपने आपको सर्वथा असमर्थ पाया। अनुवाद की परिसमाप्ति की लोलुपता और गुरुदेव का असांनिध्य दोनों ने मुझे अहोरात्र उद्वेलित किया, तब मैंने ऐसे प्रसंगों में 'हर्षचरित एक सांस्कृतिक अध्ययन' की शरण ली और बड़ी सरलता से पूरे ग्रन्थ का अनुवाद तैयार कर लिया। इस अनुवाद की आधारभित्ति गुरुदेव की कृति ही है। अतः गुरुदेव के लिए मैं अपनी कृतज्ञता कैसे प्रकट करूँ ? आशा है वे मेरी विवशताजन्य धृष्टता को क्षमा कर देंगे। चौखम्बा विद्याभवन के अध्यक्ष महोदय धन्यवाद के पात्र हैं, जिन्होंने मेरे अनुवाद को अपने यहाँ से प्रकाशित किया और आगे के कार्य के लिए भी प्रेरित किया है। जगन्नाथ पाठक
विषय-सूची प्रथम उच्छ्वास ( वात्स्यायनवंशवर्णन ) विषय पृष्ठ मङ्गलाचरण १ कुकवि-निन्दा ४ काव्य का देशिक रूप-भेद ५ काव्य स्वरूप, आख्यायिकाकार कवि ६ वासवदत्ता, हरिचन्द्र, सातवाहन, प्रवरसेन, भास, कालिदास, बृहत्कथा, आढ्यराज आदि का उल्लेख ७ हर्षचरित-आख्यायिका १० ब्रह्माजी की गोष्ठी में विवाद १२ सरस्वती-वर्णन १४ दुर्वासा का क्रोध १६ सावित्री-वर्णन १७ दुर्वासा का सरस्वती को शाप देना २० ब्रह्माजी द्वारा दुर्वासा की भर्त्सना २१ फिर सरस्वती को सान्त्वना देना २३ सन्ध्या-रात्रि-चन्द्रोदयवर्णन २५ सावित्री का सरस्वती को सान्त्वना देना २८ ब्रह्मलोक से सरस्वती और सावित्री का प्रस्थान तथा मन्दाकिनी-वर्णन ३२ शोण के तट पर सरस्वती का निवास ३४ दूर से घोड़ों को देखना ३६ दधीच-वर्णन ३७ विकुक्षिवर्णन ४१ दधीच और सरस्वती का परिचय ४३ दधीच का च्यवनाश्रम जाना ४९ सरस्वती का औत्सुक्य ५० विकुक्षि का पुनः आगमन ५४ मालती-वर्णन ५५