हिन्द स्वराज (आत्म-निर्भरता एवं स्वराज्य दर्शन)
Hind Swaraj by Mahatma Gandhi
मोहनदास करमचन्द गाँधी (महात्मा गाँधी) द्वारा
सच्ची सभ्यता कौन सी ? पाठक : आपने रेल को रद्द कर दिया, वकीलों की निन्दा की, डॉक्टरों को दबा दिया। तमाम कलकाम (यंत्रों) को भी आप नुकसानदेह मानेंगे, ऐसा मैं देख सकता हूं। तब सभ्यता कहें तो किसे कहें ? संपादक : इस सवाल का जवाब मुश्किल नहीं है। मैं मानता हूं कि जो सभ्यता हिन्दुस्तान ने दिखाई है, उस तक दुनिया में कोई नहीं पहुंच सकता। जो बीज हमारे पुरखों ने बोए हैं, उनकी बराबरी कर सके ऐसी कोई चीज देखने में जो बीज हमारे पुरखों ने नहीं आई। रोम मिट्टी में मिल गया, ग्रीस का बोये हैं, उनकी बराबरी सिर्फ नाम ही रह गया, मिस्र की बादशाही चली कर सके ऐसी कोई चीज गई, जापान पश्चिम के शिकंजे में फंस गया और देखने में नहीं आई। रोम चीन का कुछ भी कहा नहीं जा सकता। लेकिन मिट्टी में मिल गया, ग्रीस गिरा-टूटा जैसा भी हो, हिन्दुस्तान आज भी का सिर्फ नाम ही रह गया, अपनी बुनियाद में मजबूत है। मिस्र की बादशाही चली जो रोम और ग्रीस गिर चुके हैं, उनकी गई, जापान पश्चिम के किताबों से यूरोप के लोग सीखते हैं। उनकी शिकंजे में फंस गया और गलतियां वे नहीं करेंगे ऐसा गुमान रखते हैं। चीन का कुछ भी कहा ऐसी उनकी कंगाल हालत है, जबकि हिन्दुस्तान नहीं जा सकता। लेकिन अचल है, अडिग है। यह उसका भूषण है। गिरा-टूटा जैसा भी हो, हिन्दुस्तान पर आरोप लगाया जाता है कि वह हिन्दुस्तान आज भी अपनी ऐसा जंगली, ऐसा अज्ञानी है कि उससे जीवन बुनियाद में मजबूत है। में कुछ फेरबदल कराये ही नहीं जा सकते। यह आरोप हमारा गुण है दोष नहीं। अनुभव से जो हमें ठीक लगा है उसे हम क्यों बदलेंगे ? बहुत से अक्ल देने वाले आते-जाते रहते हैं, पर हिन्दुस्तान अडिग रहता है। यह उसकी खूबी है, यह उनका लंगर है। सभ्यता वह आचरण है जिससे आदमी अपना फर्ज अदा करता है। फर्ज अदा करने के मानी है नीति का पालन करना। नीति के पालन का मतलब है अपने मन और इन्द्रियों को बस में रखना। ऐसा करते हुए हम अपनी 85
हिन्द स्वराज असलियत को पहचानते हैं। यही सभ्यता है। इससे जो उल्टा है वह बिगाड़ करने वाला है। बहुत से अंग्रेज लेखक लिख गये हैं कि ऊपर की व्याख्या के मुताबिक हिन्दुस्तान को कुछ भी सीखना बाकी नहीं रहता। यह बात ठीक है। हमने देखा कि मनुष्य वृत्तियां चंचल हैं। उसका मन बेकार की दौड़ धूप किया करता है। उसका शरीर जैसे-जैसे ज्यादा दिया जाए वैसे-वैसे ज्यादा मांगता है। ज्यादा लेकर भी वह सुखी नहीं होता। भोग भोगने से भोग की इच्छा बढ़ती जाती है।
[हाशिया / पार्श्व-पाठ]: हिन्दुस्तान पर आरोप लगाया जाता है कि वह ऐसा जंगली, ऐसा अज्ञान है कि उससे जीवन में कुछ फेरबदल कराए ही नही जा सकते। यह आरोप हमारा गुण है दोष नहीं। अनुभव से जो हमें ठीक लगा है उसे हम क्यों बदलेंगे ? बहुत से अक्ल देने वाले आते-जाते रहते हैं, पर हिन्दुस्तान अडिग रहता है। यह उसकी खूबी है।
[मुख्य पाठ]: इसलिए हमारे पुरखों ने भोग की हद बांध दी। बहुत सोचकर उन्होंने देखा कि सुख-दुःख तो मन के कारण हैं। अमीर अपनी अमीरी की वजह से सुखी नहीं है। गरीब अपनी गरीबी के कारण दुखी नहीं है। अमीर दुखी देखने में आता है और गरीब सुखी देखने में आता है। करोड़ों लोग तो गरीब ही रहेंगे। ऐसा देखकर उन्होंने भोग की वासना छुड़वाई। हजारों साल पहले जो हल काम में लिया जाता था, उससे हमने काम चलाया। हज़ारों साल पहले जैसे झोंपड़े थे, उन्हें हमने कायम रखा। हज़ारों साल पहले जैसी हमारी शिक्षा थी वही चलती आई। हमने नाशकारक होड़ को समाज में जगह नहीं दी। सब अपना-अपना धंधा करते रहे। उसमें उन्होंने दस्तूर के मुताबिक दाम लिए। ऐसा नहीं था कि हमें यंत्र वगैरह की खोज करना ही नहीं आता था। लेकिन हमारे पूर्वजों ने देखा कि लोग अगर यंत्र वगैरह की झंझट में पड़ेंगे तो गुलाम ही बनेंगे और अपनी नीति को छोड़ देंगे। उन्होंने सोच समझकर कहा कि हमें अपने हाथ-पैरों से जो काम हो सके वही करना चाहिए। हाथ- पैरों का इस्तेमाल करने में ही सच्चा सुख है, उसी में तन्दुरुस्ती है। उन्होंने सोचा कि बड़े शहर खड़े करना बेकार की झंझट है। उनमें लोग सुखी नहीं होंगे। उनमें धूर्तों की टोलियां और वेश्याओं की गलियां पैदा होंगी, गरीब अमीरों से लूटे जायेंगे। इसलिए उन्होंने छोटे देहातों से संतोष
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हिन्द स्वराज माना। उन्होंने देखा कि राजाओं और उनकी तलवार के बनिस्बत नीति का बल ज्यादा बलवान है। इसलिए उन्होंने राजाओं को नीतिवान पुरुषों, ऋषियों और फ़कीरों से कम दर्जे का माना। ऐसा जिस राष्ट्र का गठन है वह राष्ट्र दूसरों को सिखाने लायक है, वह दूसरों से सीखने लायक नहीं है। इस राष्ट्र में अदालतें थीं, वकील थे, डॉक्टर-वैद्य थे। लेकिन वे सब ठीक ढंग से नियम के मुताबिक चलते थे। सब जानते थे कि ये धन्धे बड़े नहीं हैं और वकील, डॉक्टर वगैरह लोगों में लूट नहीं चलाते थे, वे तो लोगों पर आश्रित थे। वे लोगों के मालिक बनकर नहीं रहते थे। इन्साफ काफी अच्छा होता था। अदालतों में न जाना, यह लोगों का ध्येय था। उन्हें भरमाने वाले स्वार्थी लोग नहीं थे। इतनी सड़न भी सिर्फ राजा और राजधानी के आस-पास ही थी। यों आम प्रजा तो उससे स्वतंत्र रहकर अपने खेत का मालिकी हक भोगती थी। उसके पास सच्चा स्वराज्य था। और जहां यह चांडाल सभ्यता नहीं पहुंची है, वहां हिन्दुस्तान आज भी वैसा ही है। उसके सामने आप अपने नये ढोंगों की बात करेंगे, तो वह आपकी हंसी उड़ायेगा। उस पर न तो अंग्रेज राज करते हैं, न आप कर सकेंगे। उन्होंने सोचा कि बड़े शहर खड़े करना बेकार की झंझट है। उनमें लोग सुखी नहीं होंगे। उनमें धूर्तों की टोलियां और वेश्याओं की गलियां पैदा होंगी, गरीब अमीरों से लूटे जायेंगे। इसलिए उन्होंने राजाओं को नीतिवान पुरुषों, ऋषियों और फ़कीरों से कम दर्जे का माना। ऐसा जिस राष्ट्र का गठन हो वह राष्ट्र दूसरों को सिखाने लायक है, वह दूसरों से सीखने लायक नहीं है। जिन लोगों के नाम पर हम बात करते हैं, उन्हें हम पहचानते नहीं हैं, न वे हमें पहचानते हैं। आपको और दूसरों को, जिनमें देशप्रेम है, मेरी सलाह है कि आप देश में, जहां रेल की बाढ़ नहीं फैली है उस भाग में छह माह के लिए घूम आयें और बाद में देश की लगन लगायें, बाद में स्वराज्य की बात करें। अब आपने देखा कि सच्ची सभ्यता मैं किस चीज को कहता हूं। ऊपर मैंने जो तस्वीर खींची है वैसा हिन्दुस्तान जहां हो वहां जो आदमी फेरफार करेगा उसे आप दुश्मन समझिए। वह मनुष्य पापी है। पाठक : आपने जैसा बताया वैसा ही हिन्दुस्तान होता तब तो ठीक था। लेकिन जिस देश में हजारों बाल-विधवायें हैं, जिस देश में दो बरस की 87
हिन्द स्वराज बच्ची की शादी हो जाती है, जिस देश में बारह साल की उम्र के लड़के- लड़कियां घर संसार चलाते हैं, जिस देश में स्त्री एक से ज्यादा पति करती है, जिस देश में नियोग की प्रथा है, जिस देश में धर्म के नाम पर कुमारिकाएं बेसवाएं बनती हैं, जिस देश में धर्म के नाम पर पाड़ों और बकरों की हत्या होती है, वह देश भी हिन्दुस्तान ही है। ऐसा होने पर भी आपने जो बताया वह क्या सभ्यता का लक्षण है ? किसी भी सभ्यता के संपादक : आप भूलते हैं। आपने जो दोष बताये मातहत सभी लोग संपूर्णता वे तो सचमुच दोष ही हैं। उन्हें कोई सभ्यता तक नहीं पहुंच पाए हैं। नहीं कहता। वे दोष सभ्यता के बावजूद कायम हिन्दुस्तान की सभ्यता का रहे हैं। उन्हें दूर करने के प्रयत्न हमेशा हुए झुकाव नीति को मजबूत है, और होते ही रहेंगे। हमसे जो नया जोश पैदा करने की ओर है, पश्चिम हुआ है, उसका उपयोग हम इन दोषों को दूर की सभ्यता का झुकाव करने में कर सकते हैं। मैंने आपको आज की अनीति को मजबूत करने सभ्यता की जो निशानी बताई, उसे इस सभ्यता की ओर है, इसलिए मैंने के हिमायती खुद बताते हैं। मैंने हिन्दुस्तान की उसे हानिकारक कहा है। सभ्यता का जो वर्णन किया, वह वर्णन नई पश्चिम की सभ्यता सभ्यता के हिमायतियों ने किया है। निरीश्वरवादी है, किसी भी देश में किसी भी सभ्यता के हिन्दुस्तान की सभ्यता मातहत सभी लोग संपूर्णता तक नहीं पहुंच पाये ईश्वर को मानने वाली है। हैं। हिन्दुस्तान की सभ्यता का झुकाव नीति को मजबूत करने की ओर है, पश्चिम की सभ्यता का झुकाव अनीति को मजबूत करने की ओर है, इसलिए मैंने उसे हानिकारक कहा है। पश्चिम की सभ्यता निरीश्वरवादी है, हिन्दुस्तान की सभ्यता ईश्वर को मानने वाली है। यों समझकर, ऐसी श्रद्धा रखकर, हिन्दुस्तान के हितचिंतकों को चाहिए कि वे हिन्दुस्तान की सभ्यता से, बच्चा जैसे मां से चिपटा रहता है, वैसे चिपटे रहें। 88
बनिस्बत इसके कि गांव की खेती अलग-अलग सौ टुकड़ों में बंट जाए, क्या बेहतर नहीं है कि सौ परिवार गांव की खेती सहयोग से करें। 89
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हिन्दुस्तान कैसे आज़ाद हो ? पाठक : सभ्यता के बारे में आपके विचार मैं समझ गया। आपने जो कहा उस पर मुझे ध्यान देना होगा, तुरन्त सब कुछ मंजूर कर लिया जाए, ऐसा आप नहीं मानते होंगे, ऐसी आशा भी नहीं रखते होंगे। आपके ऐसे विचारों के अनुसार आप हिन्दुस्तान के आज़ाद होने का क्या उपाय बताएँगे ? संपादक : मेरे विचार सब लोग तुरन्त मान लें, ऐसी आशा मैं नहीं रखता। मेरा फ़र्ज़ इतना ही है कि आपके जैसे जो लोग मेरे विचार जानना चाहते हैं, उनके सामने अपने विचार रख दूँ। वे विचार उन्हें पसंद आएँगे या नहीं आएँगे, यह तो समय बीतने पर ही मालूम होगा। हिन्दुस्तान की आज़ादी के उपायों का हम विचार कर चुके। फिर भी हमने दूसरे रूप में उन पर विचार किया। अब हम उन पर उनके स्वरूप में विचार करें। जिस कारण से रोगी बीमार हुआ हो वह कारण अगर दूर कर दिया जाए तो रोगी अच्छा हो जाएगा यह जग मशहूर बात है। इसी तरह जिस कारण से हिन्दुस्तान गुलाम बना वे कारण अगर दूर कर दिये जाएं तो वह बंधन से मुक्त हो जाएगा। स्वराज्य को आप सपने जैसा न मानें। मन से मानकर बैठे रहने का भी यह स्वराज्य नहीं है, यह तो ऐसा स्वराज्य है कि आपने अगर इसका स्वाद चख लिया हो, तो दूसरों को इसका स्वाद चखाने के लिए आप ज़िन्दगी भर कोशिश करेंगे, लेकिन मुख्य बात तो हर शख्स के स्वराज्य भोगने की है। डूबता आदमी दूसरे को नहीं तारेगा, लेकिन तैरता आदमी दूसरे को तारेगा। हम खुद गुलाम होंगे और दूसरों को आज़ाद करने की बात करेंगे, तो वह संभव नहीं है। पाठक : आपकी मान्यता के मुताबिक हिन्दुस्तान की सभ्यता अगर सबसे अच्छी है, तो फिर वह गुलाम क्यों बना ? संपादक : सभ्यता तो मैंने कही वैसी ही है, लेकिन देखने में आया है कि हर सभ्यता पर आफतें आती हैं। जो सभ्यता अचल है, वह आखिरकार 91
हिन्द स्वराज्य आफ़तों को दूर कर देती है। हिन्दुस्तान के बालकों में कोई न कोई कमी थी, इसीलिए वह सभ्यता आफ़तों से घिर गई, लेकिन इस घेरे में से छूटने की ताकत उसमें है, यह उसके गौरव को दिखाता है। और फिर सारा हिन्दुस्तान गुलामी में घिरा हुआ नहीं है। जिन्होंने पश्चिम की शिक्षा पाई है और जो उसके पाश में फँस गये हैं, वे ही जो सभ्यता अचल है, गुलामी में घिरे हुए हैं। हम जगत को अपनी वह आखिरकार आफ़तों दमड़ी के नाप से नापते हैं। अगर हम गुलाम को दूर कर देती है। हैं तो जगत को भी गुलाम मान लेते हैं। हम हिन्दुस्तान के बालकों में कंगाल दशा में हैं, इसलिए मान लेते हैं कि कोई न कोई कमी थी, सारा हिन्दुस्तान ऐसी दशा में है। दरअसल ऐसा इसीलिए वह सभ्यता कुछ नहीं है। फिर भी हमारी गुलामी सारे आफ़तों से घिर गई, देश की गुलामी है। ऐसा मानना ठीक है, लेकिन लेकिन इस घेरे में से ऊपर की बात हम ध्यान में रखें तो समझ छूटने की ताकत उसमें है, सकेंगे कि हमारी अपनी गुलामी मिट जाए, तो यह उसके गौरव को हिन्दुस्तान की गुलामी मिट गई ऐसा मान लेना दिखाता है और फिर सारा चाहिए। इसमें अब आपको स्वराज्य की हिन्दुस्तान गुलामी में घिरा व्याख्या भी मिल जाती है। हम अपने ऊपर राज हुआ नहीं है। जिन्होंने करें वही स्वराज्य है और वह स्वराज्य हमारी पश्चिम की शिक्षा पाई हथेली में है। है और जो उसके पाश में इस स्वराज्य को आप सपने जैसा न मानें। फँस गये हैं, वे ही मन से मानकर बैठे रहने का भी यह स्वराज्य नहीं गुलामी में घिरे हुए हैं। है, यह तो ऐसा स्वराज्य है कि आपने अगर इसका स्वाद चख लिया हो, तो दूसरों को इसका स्वाद चखाने के लिए आप ज़िन्दगी भर कोशिश करेंगे, लेकिन मुख्य बात तो हर शख्स के स्वराज्य भोगने की है। डूबता आदमी दूसरे को नहीं तारेगा, लेकिन तैरता आदमी दूसरे को तारेगा। हम खुद गुलाम होंगे और दूसरों को आज़ाद करने की बात करेंगे, तो वह संभव नहीं है। लेकिन इतना काफी नहीं है। हमें और भी आगे सोचना होगा। अब इतना तो आपकी समझ में आया होगा कि अंग्रेजों को देश से निकालने का मक़सद सामने रखने की ज़रूरत नहीं है। अगर अंग्रेज हिन्दुस्तानी बनकर 92
हिन्द स्वराज्य रहें तो हम उनका समावेश यहाँ कर सकते हैं। अंग्रेज अगर अपनी सभ्यता के साथ रहना चाहें, तो उनके लिए हिन्दुस्तान में जगह नहीं है। ऐसी हालत पैदा करना हमारे हाथ में है। पाठक : अंग्रेज हिन्दुस्तानी बनें, यह नामुमकिन है। संपादक : हमारा ऐसा कहना यह कहने के बराबर है कि अंग्रेज मनुष्य नहीं हैं। वे हमारे जैसे बनें या न बनें, इसकी हमें परवाह नहीं है। हम अपना घर साफ करें। फिर रहने लायक लोग ही उसमें रहेंगे, दूसरे अपने-आप चले जाएँगे। ऐसा अनुभव तो हर हम जगत को अपनी आदमी को हुआ होगा। दमड़ी के नाप से नापते पाठक : ऐसा होने की बात इतिहास में तो हमने हैं। अगर हम गुलाम हैं तो नहीं पढ़ी। जगत को भी गुलाम मान संपादक : जो चीज़ा इतिहास में नहीं देखी लेते हैं। हम कंगाल दशा वह कभी नहीं होगी, ऐसा मानना मनुष्य की में हैं, इसलिए मान लेते प्रतिष्ठा में अविश्वास करना है। जो बात अक्ल हैं कि सारा हिन्दुस्तान में आ सके, उसे आखिर हमें आजमाना तो ऐसी दशा में है। दरअसल चाहिए ही। ऐसा कुछ नहीं है। फिर हर देश की हालत एक सी नहीं होती। भी हमारी गुलामी सारे हिन्दुस्तान की हालत विचित्र है। हिन्दुस्तान का देश की गुलामी है। हम बल असाधारण है। इसलिए दूसरे इतिहासों से अपने ऊपर राज करें वही हमारा कम संबंध है। मैंने आपको बताया कि दूसरी स्वराज्य है और वह सभ्यताएँ मिट्टी में मिल गयीं, जबकि हिन्दुस्तानी स्वराज्य हमारी सभ्यता को आँच नहीं आई है। हथेली में है। पाठक : मुझे ये सब बातें ठीक नहीं लगतीं। हमें लड़कर अंग्रेजों को निकालना ही होगा, इसमें कोई शक नहीं। जब तक वे हमारे मुल्क में हैं, तब तक हमें चैन नहीं पड़ सकता। ‘पराधीन सपनेहु सुख नाहीं’ ऐसा देखने में आता है। अंग्रेज यहाँ हैं इसलिए हम कमज़ोर होते जा रहे हैं। हमारा तेज चला गया है और हमारे लोग घबराए, से दिखते हैं। अंग्रेज हमारे देश के लिए यम जैसे हैं। उस यम को हमें किसी भी प्रयत्न से भगाना होगा। 93
हिन्द स्वराज संपादक : आप अपने आवेश में मेरा सारा कहना भूल गये हैं। अंग्रेजों को यहाँ लाने वाले हम हैं और वे हमारी बदौलत ही यहाँ रहते हैं। आप यह कैसे भूल जाते हैं कि हमने उनकी सभ्यता अपनाई है, इसलिए वे यहाँ रह सकते हैं? आप उनसे जो नफ़रत करते हैं वह नफ़रत आपको उनकी सभ्यता से करनी चाहिए। फिर भी मान लें कि हम लड़कर उन्हें निकालना चाहते हैं। यह कैसे हो सकेगा ? पाठक : इटली ने किया वैसे। मैज़िनी और गैरीबाल्डी ने जो किया, वह तो हम भी कर सकते हैं। वे महावीर थे, इस बात से क्या आप इनकार कर सकेंगे ? 94
ईश्वर को नहीं मानने से सबसे बड़ी हानि वही है, जो हानि अपने को न मानने से हो सकती है। अर्थात ईश्वर को न मानना आत्महत्या के समान है। 95
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इटली और हिन्दुस्तान संपादक : आपने इटली का उदाहरण ठीक दिया। मैज़िनी महात्मा था। गैरीबाल्डी बड़ा योद्धा था। दोनों पूजनीय थे। उनसे हम बहुत सीख सकते हैं। फिर भी इटली की दशा और हिन्दुस्तान की दशा में फर्क है। पहले तो मैज़िनी और गैरीबाल्डी के बीच का भेद जानने लायक है। मैज़िनी के अरमान अलग थे। मैज़िनी जैसा सोचता था वैसा इटली में नहीं हुआ। मैज़िनी ने मनुष्य जाति के कर्तव्य के बारे में लिखते हुए यह बताया है कि हर एक को स्वराज्य भोगना सीख लेना चाहिए। यह बात उसके लिए सपने जैसी रही। स्वदेशाभिमान का अर्थ मैं गैरीबाल्डी और मैज़िनी के बीच मतभेद हो गया देश का हित समझता हूँ। था यह हमें याद रखना चाहिए। अगर देश का हित अंग्रेजों इसके सिवा, गैरीबाल्डी ने हर इटालियन के के हाथों होता हो, तो मैं हाथ में हथियार दिए और हर इटालियन ने हथियार आज अंग्रेजों को झुककर लिये। इटली और आस्ट्रिया के बीच सभ्यता का नमस्कार करूँगा। अगर भेद नहीं था। वे तो ‘चचेरे भाई’ माने जाएँगे। कोई अंग्रेज कहे कि देश ‘जैसे को तैसा’ वाली बात इटली की थी। इटली को आज़ाद करना चाहिए, को परदेशी (आस्ट्रिया के) जुए से छुड़ाने का जुल्म के ख़िलाफ़ होना मोह गैरीबाल्डी को था। इसके लिए उसने कावूर चाहिए और लोगों की की मारफ़त जो साजिशें कीं, वे उसकी शूरता को सेवा करनी चाहिए, तो बट्टा लगाने वाली हैं। उस अंग्रेज को मैं अन्त में नतीजा क्या निकला? इटली में हिन्दुस्तानी मानकर उसका इटालियन राज करते हैं इसलिए इटली की प्रजा स्वागत करूँगा। सुखी है, ऐसा आप मानते हों तो मैं आप से कहूँगा कि आप अंधेरे में भटकते हैं। मैज़िनी ने साफ़-साफ़ बताया है कि इटली आज़ाद नहीं हुआ है। विक्टर इमेन्युअल ने इटली का एक अर्थ किया, मैज़िनी ने दूसरा। इमेन्युअल, कावूर और गैरीबाल्डी के विचार से इटली का अर्थ था इमेन्युअल या इटली का राजा और उसके हुजूरी। मैज़िनी के विचार से इटली 97
हिन्द स्वराज्य का अर्थ था इटली के लोग उसके किसान। इमेन्युअल वगैरह तो प्रजा के नौकर थे। मैजिनी का इटली अब भी गुलाम है। दो राजाओं के बीच शतरंज की बाज़ी लगी थी, इटली की प्रजा तो सिर्फ़ प्यादा थी और है। इटली के मजदूर अब भी दुःखी हैं। इटली के मजदूरों की दाद-फ़रियाद नहीं सुनी जाती, इसलिए वे लोग खून करते हैं, विरोध करते हैं, सिर फोड़ते हैं और वहाँ बलवा होने का डर आज भी बना हुआ है। आस्ट्रिया के जाने से इटली को क्या लाभ हुआ ? नाम का ही लाभ हुआ। जिन सुधारों के लिए जंग मचा, वे सुधार हुए नहीं, प्रजा की हालत सुधरी नहीं। हिन्दुस्तान की ऐसी दशा करने का तो आपका मेरा स्वदेशाभिमान इरादा नहीं ही होगा। मैं मानता हूँ कि आपका विचार मुझे यह नहीं सिखाता हिन्दुस्तान के करोड़ों लोगों को सुखी करने का होगा, कि देशी राजाओं के यह नहीं कि आप या मैं राजसत्ता ले लूँ। अगर ऐसा मातहत जिस तरह प्रजा है तो हमें एक ही विचार करना चाहिए। वह यह कि कुचली जाती है उसी प्रजा स्वतन्त्र कैसे हो ? तरह उसे कुचलने आप कुबूल करेंगे कि कुछ देशी रियासतों में प्रजा दिया जाए। मुझमें बल कुचली जाती है। वहाँ के शासक नीचता से लोगों को होगा तो मैं देशी कुचलते हैं। उनका जुल्म अंग्रेजों के जुल्म से भी राजाओं के जुल्म के ज्यादा है। ऐसा जुल्म अगर आप हिन्दुस्तान में चाहते ख़िलाफ़ और अंग्रेजी हों, तो हमारी पटरी कभी नहीं बैठेगी। जुल्म के ख़िलाफ़ मेरा स्वदेशाभिमान मुझे यह नहीं सिखाता कि देशी जूझूँगा। राजाओं के मातहत जिस तरह प्रजा कुचली जाती है उसी तरह उसे कुचलने दिया जाए। मुझमें बल होगा तो मैं देशी राजाओं के जुल्म के ख़िलाफ़ और अंग्रेजी जुल्म के ख़िलाफ़ जूझूँगा। स्वदेशाभिमान का अर्थ मैं देश का हित समझता हूँ। अगर देश का हित अंग्रेजों के हाथों होता हो, तो मैं आज अंग्रेजों को झुककर नमस्कार करूँगा। अगर कोई अंग्रेज कहे कि देश को आजाद करना चाहिए, जुल्म के ख़िलाफ़ होना चाहिए और लोगों की सेवा करनी चाहिए, तो उस अंग्रेज को मैं हिन्दुस्तानी मानकर उसका स्वागत करूँगा। फिर, इटली की तरह जब हिन्दुस्तान को हथियार मिलें तभी वह लड़ सकता है, पर इस भगीरथ (बहुत बड़े) काम का तो मालूम होता है, आपने 98
हिन्द स्वराज्य विचार ही नहीं किया है। अंग्रेज गोला-बारूद से पूरी तरह लैस हैं, इससे मुझे डर नहीं लगता, लेकिन ऐसा तो दीखता है कि उनके हथियारों से उन्हीं के ख़िलाफ़ लड़ना हो, तो हिन्दुस्तान को हथियारबंद करना होगा। अगर ऐसा हो सकता हो तो इनमें कितने साल लगेंगे ? और तमाम हिन्दुस्तानियों को हथियारबंद करना तो हिन्दुस्तान को यूरोप सा बनाने जैसा होगा। अगर ऐसा हुआ तो आज यूरोप के जो बेहाल हैं वैसे ही हिन्दुस्तान के भी होंगे। थोड़े में हिन्दुस्तान को यूरोप की सभ्यता अपनानी होगी। ऐसा ही होने वाला हो तो अच्छी बात यह होगी कि जो अंग्रेज उस सभ्यता में कुशल हैं, उन्हीं को हम यहाँ रहने दें। उनसे थोड़ा- बहुत झगड़ कर कुछ हक हम पाएँगे, कुछ नहीं खून तो हमें अपना करना पाएँगे और अपने दिन गुजारेंगे। चाहिए, क्योंकि हम नामर्द लेकिन बात तो यह है कि हिन्दुस्तान की बन गये हैं, इसीलिए हम प्रजा कभी हथियार नहीं उठायेगी। न उठाये यह खून का विचार करते हैं। ठीक ही है। ऐसा करके आप किसे पाठक : आप तो बहुत आगे बढ़ गये। सबके आज़ाद करेंगे ? हिन्दुस्तान हथियारबंद होने की ज़रूरत नहीं। हम पहले तो की प्रजा ऐसा कभी नहीं कुछ अंग्रेजों का खून करके आतंक फैलाएँगे। चाहती। हम जैसे लोग ही फिर तो थोड़े लोग हथियारबंद होंगे, वे जिन्होंने अधम सभ्यता रूपी खुल्लमखुल्ला लड़ेंगे। उसमें पहले तो बीस- भाँग पी है, नशे में ऐसा पचीस लाख हिन्दुस्तानी ज़रूर मरेंगे, लेकिन विचार करते हैं। खून करके आखिर हम देश को अंग्रेजों से जीत लेंगे। हम जो लोग राज करेंगे, वे प्रजा गुरील्ला (डाकुओं जैसी) लड़ाई लड़कर को सुखी नहीं बना सकेंगे। अंग्रेजों को हरा देंगे। संपादक : आपका ख़्याल हिन्दुस्तान की पवित्र भूमि को राक्षसी बनाने का लगता है। अंग्रेजों का खून करके हिन्दुस्तान को छुड़ाएंगे ऐसा विचार करते हुए आपको त्रास क्यों नहीं होता ? खून तो हमें अपना करना चाहिए, क्योंकि हम नामर्द बन गये हैं, इसीलिए हम खून का विचार करते हैं। ऐसा करके आप किसे आज़ाद करेंगे ? हिन्दुस्तान की प्रजा ऐसा कभी नहीं चाहती। हम जैसे लोग ही, जिन्होंने अधम सभ्यता रूपी भाँग पी है, नशे 99
हिन्द स्वराज में ऐसा विचार करते हैं। खून करके जो लोग राज करेंगे, वे प्रजा को सुखी नहीं बना सकेंगे। धींगड़ा ने जो खून किया है उससे या जो खून तमाम हिन्दुस्तानियों को हिन्दुस्तान में हुए हैं उनसे देश को फायदा हुआ हथियारबंद करना तो है, ऐसा अगर कोई मानता हो तो वह बड़ी हिन्दुस्तान को यूरोप सा भूल करता है। धींगड़ा को मैं देशाभिमानी मानता बनाने जैसा होगा। अगर हूँ, लेकिन उसका देश प्रेम पागलपन से भरा ऐसा हुआ तो आज यूरोप था। उसने अपने शरीर का बलिदान गलत तरीके के जो बेहाल हैं वैसे ही से दिया। उससे अंत में तो देश को नुकसान ही हिन्दुस्तान के भी होंगे। होने वाला है। थोड़े में हिन्दुस्तान को पाठक : लेकिन आपको इतना तो कुबूल करना यूरोप की सभ्यता अपनानी ही होगा कि अंग्रेज इस खून से डर गये हैं और होगी। ऐसा ही होने वाला लॉर्ड मॉर्ले ने जो कुछ हमें दिया है वह ऐसे डर से हो तो अच्छी बात यह होगी ही दिया है। कि जो अंग्रेज उस सभ्यता संपादक : अंग्रेज जैसे डरपोक प्रजा हैं वैसे में कुशल हैं। बहादुर भी हैं। गोला-बारूद का असर उन पर तुरन्त होता है, ऐसा मैं मानता हूँ। संभव है, लॉर्ड मॉर्ले ने हमें जो कुछ दिया वह डर से दिया हो, लेकिन डर से मिली हुई चीज जब तक डर बना रहता है तभी तक टिक सकती है। 100
आश्चर्य है, वैद्य मरते हैं, डॉक्टर मरते हैं, उनके पीछे हम भटकते हैं। लेकिन राम जो मरता नहीं है, हमेशा जिन्दा रहता है और अचूक वैद्य है, उसे हम भूल जाते हैं। 101
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गोला-बारूद पाठक : डर से दिया हुआ जब तक डर रहे तभी तक टिक सकता है, यह तो आपने विचित्र बात कही। जो दिया सो दिया। उसमें फिर क्या हेरफेर हो सकता है ? संपादक : ऐसा नहीं है। १८५७ की घोषणा बलवे अंग्रेजों ने जो कुछ पाया के अंत में लोगों में शान्ति कायम रखने के लिए की वह मार-काट करके गई थी, जब शान्ति हो गई और लोग भोले दिल के पाया, इसलिए हम भी बन गये तब उसका अर्थ बदल गया। अगर मैं सज़ा वैसा ही करके मनचाही के डर से चोरी न करूँ, तो सज़ा का डर मिट जाने चीज पाएँ। अंग्रेजों ने पर चोरी करने की मेरी फिर से इच्छा होगी और मैं मार-काट की और हम चोरी करूँगा। भी कर सकते हैं, यह यह तो बहुत ही साधारण अनुभव है, इससे बात तो ठीक है, लेकिन इनकार नहीं किया जा सकता। हमने मान लिया है मार-काट से जैसी चीज कि डाँट-डपटकर लोगों से काम लिया जा सकता उन्हें मिली वैसी ही हम है और इसलिए हम ऐसा करते आए हैं। भी ले सकते हैं। आप पाठक : आपकी यह बात आपके ख़िलाफ़ जाती कुबूल करेंगे कि वैसी है, ऐसा आपको नहीं लगता ? आपको स्वीकार चीज हमें नहीं चाहिए। करना होगा कि अंग्रेजों ने खुद जो कुछ हासिल किया है, वह मार-काट करके ही हासिल किया है। आप कह चुके हैं कि मार-काट से उन्होंने जो कुछ हासिल किया है वह बेकार है, यह मुझे याद है इससे मेरी दलील को धक्का नहीं पहुँचता। उन्होंने बेकार चीज पाने का सोचा और उसे पाया। मतलब यह कि उन्होंने अपनी मुराद पूरी की। साधन क्या था, इसकी चिन्ता हम क्यों करें ? अगर हमारी मुराद अच्छी हो तो क्या उसे हम चाहे जिस साधन से, मार-काट करके भी पूरा नहीं करेंगे ? चोर मेरे घर में घुसे तब क्या मैं साधन का विचार करूँगा ? मेरा धर्म तो उसे किसी भी तरह बाहर निकालने का ही होगा। 103
हिन्द स्वराज्य ऐसा लगता है कि आप यह तो कुबूल करते हैं कि हमें सरकार के पास अर्जियां भेजने से कुछ नहीं मिला है और न आगे कभी मिलने वाला है। तो फिर उन्हें मारकर हम क्यों न लें ? ज़रूरत हो उतनी मार का डर हम हमेशा बनाये रखेंगे। बच्चा अगर आग में पैर रखे और उसे आग से बचाने के लिए हम उस पर रोक लगाएँ, तो आप भी इसे दोष नहीं मानेंगे। किसी भी तरह हमें अपना काम पूरा कर लेना है। साधन और साध्य, ज़रिया संपादक : आपने दलील तो अच्छी की। वह और मुराद के बीच कोई ऐसी है कि बहुतों ने उससे धोखा खाया है। मैं संबंध नहीं है। यह बहुत भी ऐसी ही दलील करता था, लेकिन अब मेरी बड़ी भूल है। इस भूल के आँखें खुल गई हैं और मैं अपनी गलती समझ कारण जो लोग धार्मिक सकता हूँ। आपको वह गलती बताने की कहलाते हैं, उन्होंने घोर कर्म कोशिश करूँगा। किये हैं। यह तो धतूरे का पहले तो इस दलील पर विचार करें कि पौधा लगाकर मोगरे के अंग्रेजों ने जो कुछ पाया वह मार-काट करके फूल की इच्छा करने जैसा पाया, इसलिए हम भी वैसा ही करके मनचाही हुआ। मेरे लिए समुद्र पार चीज पाएँ। अंग्रेजों ने मार-काट की और हम भी करने का साधन जहाज़ ही कर सकते हैं, यह बात तो ठीक है, लेकिन मार- हो सकता है। अगर मैं पानी काट से जैसी चीज उन्हें मिली वैसी ही हम भी में बैलगाड़ी डाल दूँ तो वह ले सकते हैं। आप कुबूल करेंगे कि वैसी चीज गाड़ी और मैं दोनों समुद्र के हमें नहीं चाहिए। तले पहुँच जाएँगे। जैसे देव आप मानते हैं कि साधन और साध्य, ज़रिया वैसी पूजा। और मुराद के बीच कोई संबंध नहीं है। यह बहुत बड़ी भूल है। इस भूल के कारण जो लोग धार्मिक कहलाते हैं, उन्होंने घोर कर्म किये हैं। यह तो धतूरे का पौधा लगाकर मोगरे के फूल की इच्छा करने जैसा हुआ। मेरे लिए समुद्र पार करने का साधन जहाज़ ही हो सकता है। अगर मैं पानी में बैलगाड़ी डाल दूँ तो गाड़ी और मैं दोनों समुद्र के तले पहुँच जाएँगे। जैसे देव वैसी पूजा यह वाक्य बहुत सोचने लायक है। उसका गलत अर्थ करके लोग भुलावे में पड़ गए हैं। साधन बीज है और साध्य (हासिल करने की चीज) पेड़ है। 104