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हिन्द स्वराज (आत्म-निर्भरता एवं स्वराज्य दर्शन)

Hind Swaraj by Mahatma Gandhi

मोहनदास करमचन्द गाँधी (महात्मा गाँधी) द्वारा

DevanagariHindipublished150 पृष्ठ

हिन्दुस्तान की दशा-तीन संपादक : आपका आख़िरी सवाल बड़ा गम्भीर मालूम होता है, लेकिन सोचने पर वह सरल मालूम होगा। यह सवाल उठा है, उसका कारण भी रेल, वकील और डॉक्टर हैं। वकीलों और डॉक्टरों का विचार तो अभी करना बाकी है। रेलों का विचार हम कर चुके। इतना मैं जोड़ता हूँ कि मनुष्य इस तरह पैदा किया गया है कि अपने हाथ-पैर से बने उतनी ही आने-जाने वगैरह की हलचल उसे करनी चाहिए। अगर हम रेल वगैरह साधनों से दौड़धूप करें ही नहीं, तो बहुत पेचीदे सवाल हमारे सामने आयेंगे ही नहीं। हम खुद होकर दुः ख को न्योतते हैं। भगवान ने मनुष्य की हद उसके शरीर की बनावट से ही बाँध दी, लेकिन मनुष्य ने उस भगवान ने मनुष्य की बनावट की हद को लाँघने के उपाय ढूँढ निकाले। हद उसके शरीर की मनुष्य को अक्ल इसलिए दी गई है कि उसकी मदद बनावट से ही बाँध से वह भगवान को पहचाने, पर मनुष्य ने अक्ल का दी, लेकिन मनुष्य ने उपयोग भगवान को भूलने में किया। मैं अपनी कुदरती उस बनावट की हद हद के मुताबिक अपने आसपास रहने वालों की ही को लाँघने के उपाय सेवा कर सकता हूँ, पर मैंने तुरन्त अपनी मगरूरी में ढूँढ निकाले। ढूँढ निकाला कि मुझे तो सारी दुनिया की सेवा अपने तन से करनी चाहिए। ऐसा करने में अनेक धर्मों के और कई तरह के लोगों का साथ होगा। यह बोझ मनुष्य उठा ही नहीं सकता और इसलिए अकुलाता है। इस विचार से आप समझ लेंगे कि रेलगाड़ी सचमुच एक तूफानी साधन है। मनुष्य रेलगाड़ी का उपयोग करके भगवान को भूल गया है। पाठक : पर मैं तो अब जो सवाल मैंने उठाया है उसका जवाब सुनने को अधीर हो रहा हूँ। मुसलमानों के आने से हमारा एक राष्ट्र रहा या मिटा ? संपादक : हिन्दुस्तान में चाहे जिस धर्म के आदमी रह सकते हैं, उससे वह एक राष्ट्र मिटने वाला नहीं है। जो नये लोग उसमें दाखिल होते हैं, वे उसकी प्रजा को तोड़ नहीं सकते, वे उसकी प्रजा में घुलमिल जाते हैं। ऐसा हो तभी कोई मुल्क एक राष्ट्र माना जाएगा। ऐसे मुल्क में दूसरे लोगों का समावेश करने का गुण होना चाहिए। हिन्दुस्तान ऐसा था और आज भी है। यों तो 65

हिन्द स्वराज्य जितने आदमी उतने धर्म ऐसा मान सकते हैं। एक राष्ट्र होकर रहने वाले लोग एक-दूसरे के धर्म में दखल नहीं देते, अगर देते हैं तो समझना चाहिए कि वे एक राष्ट्र होने लायक नहीं हैं। अगर हिन्दू मानें कि सारा हिन्दुस्तान सिर्फ़ हिन्दुओं से भरा होना चाहिए, तो यह एक निरा सपना है। मुसलमान अगर ऐसा मानें कि उसमें सिर्फ़ मुसलमान ही रहें, तो उसे भी सपना ही समझिए। फिर भी हिन्दू, मुसलमान, पारसी, ईसाई, जो इस देश को अपना वतन मानकर बस चुके हैं। एक देशी, एक मुल्की हैं, वे देशी भाई हैं और उन्हें एक-दूसरे के स्वार्थ के लिए भी एक होकर रहना पड़ेगा। दुनिया के किसी भी हिस्से में एक राष्ट्र का अर्थ एक धर्म नहीं किया गया है, हिन्दुस्तान में तो ऐसा था ही नहीं। पाठक : लेकिन दोनों कौमों के कट्टर बैर का क्या ? उन्हें इतिहास लिखने की आदत है, हर एक जाति के रीति-रिवाज जानने का वे दंभ करते हैं। ईश्वर ने हमारा मन तो छोटा बनाया है, फिर भी वे ईश्वरी दावा करते आये हैं और तरह-तरह के प्रयोग करते हैं। संपादक : ‘कट्टर बैर’ शब्द दोनों के दुश्मन ने खोज निकाला है। जब हिन्दू-मुसलमान झगड़ते थे तब वे ऐसी बातें भी करते थे। झगड़ा तो हमारा सबका बंद हो गया है। फिर कट्टर बैर काहे का ? और इतना याद रखिये कि अंग्रेजों के आने के बाद ही हमारा झगड़ा बन्द हुआ ऐसा नहीं है। हिन्दू लोग मुसलमान बादशाहों के मातहत और मुसलमान हिन्दू राजाओं के मातहत रहते आये हैं। दोनों को बाद में समझ में आ गया कि झगड़ने से कोई फायदा नहीं, लड़ाई से कोई अपना धर्म नहीं छोड़ेंगे और कोई अपनी ज़िद भी नहीं छोड़ेंगे। इसलिए दोनों ने मिलकर रहने का फ़ैसला किया। झगड़े तो फिर से अंग्रेजों ने शुरू करवाये। ‘मियाँ और महादेव की नहीं बनती’ इस कहावत को भी ऐसा ही समझिए। कुछ कहावतें हमेशा के लिए रह जाती हैं और नुकसान करती ही रहती हैं। हम कहावत की धुन में इतना भी याद नहीं रखते कि बहुतेरे हिन्दुओं और मुसलमानों के बाप-दादे एक ही थे, हमारे अंदर एक ही खून है। क्या धर्म बदला इसलिए हम आपस में दुश्मन बन गये ? धर्म तो एक ही जगह पहुँचने के अलग-अलग रास्ते हैं। हम दोनों अलग-अलग रास्ते लें, इसमें क्या हो गया ? उसमें लड़ाई काहे की ? 66

हिन्द स्वराज्य और ऐसी कहावतें तो शैवों और वैष्णवों में भी चलती हैं, पर इससे कोई यह नहीं कहेगा कि वे एक-राष्ट्र नहीं हैं। वेदधर्मियों और जैनों के बीच बहुत फर्क माना जाता है, फिर भी इससे वे अलग राष्ट्र नहीं बन जाते। हम गुलाम हो गये हैं, इसीलिए अपने झगड़े हम तीसरे के पास ले जाते हैं। जैसे मुसलमान मूर्ति का खंडन करने वाले हैं, वैसे हिन्दुओं में भी मूर्ति का खंडन करने वाला एक वर्ग देखने में आता है। ज्यों-ज्यों सही ज्ञान बढ़ेगा त्यों-त्यों हम समझते जाएँगे कि हमें पसंद न आने वाला धर्म दूसरा आदमी पालता हो, तो भी उससे बैरभाव रखना हमारे लिए ठीक नहीं, हम उस पर जबरदस्ती न करें। पाठक : अब गोरक्षा के बारे में अपने विचार बताइये। संपादक : मैं खुद गाय को पूजता हूँ यानी मान देता हूँ। गाय हिन्दुस्तान की रक्षा करने वाली है, मैं अपनी कुदरती हद के क्योंकि उसकी संतान पर हिन्दुस्तान का, जो खेती मुताबिक अपने आसपास प्रधान देश है, आधार है। गाय कई तरह से रहने वालों की ही सेवा कर उपयोगी है। यह तो मुसलमान भाई भी कुबूल सकता हूँ, पर मैंने तुरन्त करेंगे। अपनी मगरूरी में ढूँढ लेकिन जैसे मैं गाय को पूजता हूँ वैसे मैं निकाला कि मुझे तो सारी मनुष्य को भी पूजता हूँ। जैसे गाय उपयोगी है दुनिया की सेवा अपने वैसे मनुष्य भी, फिर चाहे वह मुसलमान हो या तन से करनी चाहिए। हिन्दु उपयोगी है। तब क्या गाय को बचाने के लिए मैं मुसलमान से लड़ूँगा? क्या उसे मैं मारूँगा? ऐसा करने से मैं मुसलमान का और गाय का भी दुश्मन बनूँगा। इसलिए मैं कहूँगा कि गाय की रक्षा करने का एक यही उपाय है कि मुझे अपने मुसलमान भाई के सामने हाथ जोड़ने चाहिए और उसे देश की खातिर गाय को बचाने के लिए समझाना चाहिए। अगर वह न समझे तो मुझे गाय को मरने देना चाहिए, क्योंकि वह मेरे बस की बात नहीं। अगर मुझे गाय पर अत्यंत दया आती हो तो अपनी जान दे देनी चाहिए, लेकिन मुसलमान की जान नहीं लेनी चाहिए। वही धार्मिक कानून है, ऐसा मैं तो मानता हूँ। 'हाँ' और 'नहीं' के बीच हमेशा बैर रहता है। अगर मैं वाद-विवाद करूँगा, तो मुसलमान भी वाद-विवाद करेगा। अगर मैं टेढ़ा बनूँगा, तो वह भी टेढ़ा बनेगा। अगर मैं बालिशत भर नमूँगा, तो वह हाथ भर नमेगा और अगर वह नहीं भी नमे तो मेरा नमना ग़लत नहीं कहलायेगा। जब हमने ज़िद 67

हिन्द स्वराज्य की तब गोकशी बढ़ी। मेरी राय है कि गोरक्षा प्रचारिणी सभा गोवध प्रचारिणी सभा मानी जानी चाहिए। ऐसी सभा का होना हमारे लिए बदनामी की बात है। जब गाय की रक्षा करना हम भूल गये तब ऐसी सभा की ज़रूरत पड़ी होगी। मेरा भाई गाय को मारने दौड़े, तो मैं उसके साथ कैसा बरताव करूँगा? उसे मारूँगा या उसके पैरों में पड़ूँगा? अगर आप कहें कि मुझे उसके पाँव पड़ना चाहिए, तो मुझे मुसलमान भाई के भी पाँव पड़ना चाहिए। गाय को दुःख देकर हिन्दू गाय का वध हिन्दू-मुसलमान दोनों जोश में करता है, इससे गाय को कौन छुड़ाता है? जो आते हैं तब अक्सर गलत हिन्दू गाय की औलाद को पैना (आर) भोंकता काम कर बैठते हैं। उन्हें हमें है, उस हिन्दू को कौन समझाता है? इससे सहन करना होगा, लेकिन हमारे एक राष्ट्र होने में कोई रुकावट नहीं ऐसी तकरार को भी बड़ी आई है। वकालत बघारकर हम अंग्रेजों अंत में, हिन्दू अहिंसक और मुसलमान की अदालत में न ले जाएँ। हिंसक है, यह बात अगर सही हो तो अहिंसक दो आदमी लड़ें लड़ाई में का धर्म क्या है? अहिंसक को आदमी की दोनों के सिर या एक का सिर हिंसा करनी चाहिए, ऐसा कहीं लिखा नहीं है। फूटे तो उसमें तीसरा क्या अहिंसक के लिए तो राह सीधी है। उसे एक न्याय करेगा? को बचाने के लिए दूसरे की हिंसा करनी ही नहीं चाहिए। उसे तो मात्र चरण-वंदना करनी चाहिए, सिर्फ़ समझाने का काम करना चाहिए। इसी में उसका पुरुषार्थ है। लेकिन क्या तमाम हिन्दू अहिंसक हैं? सवाल की जड़ में जाकर विचार करने पर मालूम होता है कि कोई भी अहिंसक नहीं है, क्योंकि जीव को तो हम मारते ही हैं, लेकिन इस हिंसा से हम छूटना चाहते हैं, इसलिए अहिंसक कहलाते हैं। साधारण विचार करने से मालूम होता है कि बहुत से हिन्दू माँस खाने वाले हैं, इसलिए वे अहिंसक नहीं माने जा सकते। खींचतान कर दूसरा अर्थ करना हो तो मुझे कुछ कहना नहीं है। जब ऐसी हालत है तब मुसलमान हिंसक और हिन्दू अहिंसक हैं, इसलिए दोनों की नहीं बनेगी, वह सोचना बिल्कुल गलत है। ऐसे विचार स्वार्थी धर्म शिक्षकों, शास्त्रियों और मुल्लाओं ने हमें दिये हैं और इसमें जो कमी रह गई थी, उसे अंग्रेजों ने पूरा किया है। उन्हें इतिहास 68

हिन्द स्वराज लिखने की आदत है, हर एक जाति के रीति-रिवाज जानने का वे दंभ करते हैं। ईश्वर ने हमारा मन तो छोटा बनाया है, फिर भी वे ईश्वरी दावा करते आये हैं और तरह-तरह के प्रयोग करते हैं। वे अपने बाजे खुद बजाते हैं और हमारे मन में अपनी बात सही होने का विश्वास जमाते हैं। हम भोलेपन में उस सब पर भरोसा कर लेते हैं। जो टेढ़ा नहीं देखना चाहते वे देख सकेंगे कि कुरान शरीफ़ में ऐसे सैकड़ों वचन हैं, जो हिन्दुओं को मान्य हों, भगवद् गीता में ऐसी बातें लिखी हैं कि जिनके ख़िलाफ गाय को दुःख देकर मुसलमान को कोई भी ऐतराज नहीं हो सकता। हिन्दू गाय का वध करता कुरान शरीफ़ का कुछ भाग मैं न समझ पाऊँ या है, इससे गाय को कौन कुछ भाग मुझे पसंद न आए, इस वजह से क्या मैं छुड़ाता है? जो हिन्दू गाय उसे मानने वाले से नफ़रत करूँ? झगड़ा दो से ही की औलाद को पैना हो सकता है। मुझे झगड़ा नहीं करना हो तो (आर) भोंकता है, उस मुसलमान क्या करेगा? और मुसलमान को झगड़ा हिन्दू को कौन समझाता न करना हो तो मैं क्या कर सकता हूँ? हवा में हाथ है? इससे हमारे एक राष्ट्र उठाने वाले का हाथ उखड़ जाता है। सब अपने- होने में कोई रुकावट अपने धर्म का स्वरूप समझकर उससे चिपके रहें नहीं आई है। और शास्त्रियों तथा मुल्लाओं को बीच में न आने दें तो झगड़े का मुँह हमेशा के लिए काला ही रहेगा। पाठक : अंग्रेज दोनों क़ौमों का मेल होने देंगे? संपादक : यह सवाल डरपोक आदमी का है। यह सवाल हमारी हीनता को दिखाता है। अगर दो भाई चाहते हों कि उनका आपस में मेल बना रहे, तो कौन उनके बीच में आ सकता है? अगर तीसरा आदमी दोनों के बीच झगड़ा पैदा कर सके, तो उन भाइयों को हम कच्चे दिल के कहेंगे। उसी तरह अगर हम हिन्दू और मुसलमान कच्चे दिल के होंगे, तो फिर अंग्रेजों का कुसूर निकालना बेकार होगा। कच्चा घड़ा एक कंकड़ से नहीं तो दूसरे कंकड़ से फूटेगा ही। घड़े को बचाने का रास्ता यह नहीं है कि उसे कंकड़ से दूर रखा जाए, बल्कि यह है कि उसे पक्का बनाया जाए, जिससे कंकड़ का भय ही न रहे। उसी तरह हमें पक्के दिल के बनना है। हम दोनों में से कोई एक भी 69

हिन्द स्वराज

पक्के दिल के होंगे, तो तीसरे की कुछ नहीं चलेगी। यह काम हिन्दू आसानी से कर सकते हैं। उनकी संख्या बड़ी है, वे अपने को ज्यादा पढ़े-लिखे मानते हैं, इसलिए वे पक्का दिल रख सकते हैं। दोनों क़ौमों के बीच अविश्वास है, अगर दो भाई चाहते हों कि इसलिए मुसलमान लॉर्ड मॉर्ले से कुछ हक उनका आपस में मेल बना रहे, माँगते हैं। इसमें हिन्दू क्यों विरोध करें? तो कौन उनके बीच में आ अगर हिन्दू विरोध न करें तो अंग्रेज चौंकेंगे, सकता है ? अगर तीसरा आदमी मुसलमान धीरे-धीरे हिन्दुओं का भरोसा दोनों के बीच झगड़ा पैदा कर करने लगेंगे और दोनों का भाईचारा बढ़ेगा। सके, तो उन भाइयों को हम अपने झगड़े अंग्रेजों के पास ले जाने में हमें कच्चे दिल के कहेंगे। उसी तरह शरमाना चाहिए। ऐसा करने से हिन्दू कुछ अगर हम हिन्दू और मुसलमान खोने वाले नहीं हैं, इसका हिसाब आप खुद कच्चे दिल के होंगे, तो फिर लगा सकेंगे। जिस आदमी ने दूसरे पर अंग्रेजों का कुसूर निकालना विश्वास किया, उसने आज तक कुछ खोया बेकार होगा। कच्चा घड़ा एक नहीं है। कंकड़ से नहीं तो दूसरे कंकड़ मैं यह नहीं कहना चाहता कि हिन्दू- से फूटेगा ही। घड़े को बचाने मुसलमान कभी झगड़ेंगे ही नहीं। दो भाई का रास्ता यह नहीं है कि उसे साथ रहें तो उनके बीच तकरार होती है। कंकड़ से दूर रखा जाए। कभी हमारे सिर भी फूटेंगे। ऐसा होना ज़रूरी नहीं है, लेकिन सब लोग एक सी अक्ल के नहीं होते। दोनों जोश में आते हैं तब अक्सर गलत काम कर बैठते हैं। उन्हें हमें सहन करना होगा, लेकिन ऐसी तकरार को भी बड़ी वकालत बघारकर हम अंग्रेजों की अदालत में न ले जाएँ। दो आदमी लड़ें, लड़ाई में दोनों के सिर या एक का सिर फूटे तो उसमें तीसरा क्या न्याय करेगा ? जो लड़ेंगे वे जख्मी भी होंगे। बदन से बदन टकरायेगा तब कुछ निशानी तो रहेगी ही। उसमें न्याय क्या हो सकता है?

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न्याय की अदालतों से भी एक बड़ी अदालत होती है। वह अदालत अंतर की आवाज़ की है और वह अन्य सब अदालतों से ऊपर की अदालत है।

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हिन्दुस्तान की दशा-चार पाठक : आप कहते हैं कि दो आदमी झगड़ें तब उसका न्याय भी नहीं कराना चाहिए। यह तो आपने अजीब बात कही। संपादक : इसे अजीब कहिये या दूसरा कोई विशेषण लगाइये, पर बात सही है। आपकी शंका हमें वकील-डॉक्टरों की पहचान कराती है। मेरी राय है कि वकीलों ने हिन्दुस्तान को गुलाम बनाया है, हिन्दू-मुसलमानों के झगड़े बढ़ाये हैं और अंग्रेजी हुकूमत को यहाँ मजबूत किया है। पाठक : ऐसे इल्जाम लगाना आसान है, लेकिन उन्हें साबित करना मुश्किल होगा। वकीलों के सिवा दूसरा कौन हमें आजादी का मार्ग बताता ? उनके सिवा गरीबों का बचाव कौन करता ? उनके सिवा कौन हमें न्याय दिलाता ? देखिये, स्व. मनमोहन घोष ने कितनों को बचाया ? खुद एक कौड़ी भी उन्होंने नहीं ली। कांग्रेस, जिसके आपने ही बखान किये हैं, वकीलों से निभती है और उनकी मेहनत से ही उसमें काम होते हैं। इस वर्ग की आप निंदा करें, यह इन्साफ़ के साथ गैर इन्साफ़ करने जैसा है। वह तो आपके हाथ में अखबार आया इसलिए चाहे जो बोलने की छूट लेने जैसा लगता है। [बाजू का बॉक्स:] हिन्दू-मुसलमान आपस में लड़े हैं। तटस्थ आदमी उनसे कहेगा कि आप गयी-बीती को भूल जाएँ, इसमें दोनों का क़ुसूर रहा होगा। अब दोनों मिलकर रहिए, लेकिन वे वकील के पास जाते हैं। वकील का फ़र्ज़ हो जाता है कि वह मुवक्किल की ओर ज़ोर लगाए। अगर वह ऐसा नहीं करता तो माना जाएगा कि वह अपने पेशे को बट्टा लगाता है। इसलिए वकील तो आमतौर पर झगड़ा आगे बढ़ाने की ही संपादक : जैसा आप मानते हैं वैसा ही मैं भी एक समय मानता था। वकीलों ने कभी कोई अच्छा काम नहीं किया, ऐसा मैं आपसे नहीं कहना चाहता। मि. मनमोहन घोष की मैं इज़्ज़त करता हूँ। उन्होंने गरीबों की मदद की थी यह बात सही है। कांग्रेस में वकीलों ने कुछ काम किया है, यह भी हम मान सकते हैं। वकील भी आखिर मनुष्य हैं और मनुष्य जाति में कुछ तो अच्छाई है ही। वकीलों की भलमनसी के जो बहुत से किस्से देखने में 73

हिन्द स्वराज्य आते हैं, वे तभी हुए जब वे अपने को वकील समझना भूल गये। मुझे तो आपको सिर्फ़ यही दिखाना है कि उनका धंधा उन्हें अनीति सिखाने वाला है। वे बुरे लालच में फँसते हैं, जिसमें से उबरने वाले बिरले ही होते हैं। हिन्दू-मुसलमान आपस में लड़े हैं। तटस्थ आदमी उनसे कहेगा कि आप गयी-बीती को भूल जाएँ, इसमें दोनों का क़सूर रहा होगा। अब दोनों मिलकर रहिये, लेकिन वे वकील के पास जाते हैं। वकील का फ़र्ज़ हो जाता है कि वह मुवक्किल की ओर जोर लगाए। मुवक्किल के ख़्याल में भी न हों ऐसी दलीलें मुवक्किल की ओर से ढूँढना वकील का काम है। अगर ये अदालतें लोगों के भले के लिए नहीं हैं। जिन्हें अपनी सत्ता कायम रखनी है, वे अदालतों के ज़रिये लोगों को बस में रखते हैं। लोग अगर खुद अपने झगड़े निबटा लें, तो तीसरा आदमी उन पर अपनी सत्ता नहीं जमा सकता। सचमुच जब लोग खुद मार-पीट करके या रिश्तेदारों को पंच बनाकर अपना झगड़ा निबटा लेते थे तब वे बहादुर थे। अदालतें आयीं और वे कायर बन गए। वह ऐसा नहीं करता तो माना जाएगा कि वह अपने पेशे को बट्टा लगाता है। इसलिए वकील तो आमतौर पर झगड़ा आगे बढ़ाने की ही सलाह देगा। लोग दूसरों का दुःख दूर करने के लिए नहीं, बल्कि पैसा पैदा करने के लिए वकील बनते हैं। वह एक कमाई का रास्ता है। इसलिए वकील का स्वार्थ झगड़ा बढ़ाने में है। यह तो मेरी जानी हुई बात है कि जब झगड़े होते हैं तब वकील खुश होते हैं। मुख्तार लोग भी वकील की जात के हैं। जहाँ झगड़े नहीं होते वहाँ भी वे झगड़े खड़े करते हैं। उनके दलाल जोंक की तरह गरीब लोगों से चिपकते हैं और उनका खून चूस लेते हैं। वह पेशा ऐसा है कि उसमें आदमियों को झगड़े के लिए बढ़ावा मिलता ही है। वकील लोग निठगे होते हैं। आलसी लोग ऐश-आराम करने के लिए वकील बनते हैं। यह सही बात है। वकालत का पेशा बड़ा आबरूदार पेशा है, ऐसा खोज निकालने वाले भी वकील ही हैं। कानून वे बनाते हैं, उसकी तारीफ़ भी वे ही करते हैं। लोगों से क्या दाम लिये जाएँ, यह भी वे ही तय करते हैं और लोगों पर रौब जमाने के लिए आडंबर ऐसा करते हैं, मानो वे आसमान से उतरकर आये हुए देवदूत हों! 74

हिन्द स्वराज वे मजदूर से ज्यादा रोजी क्यों माँगते हैं ? उनकी जरूरतें मजदूर से ज्यादा क्यों हैं ? उन्होंने मजदूर से ज्यादा देश का क्या भला किया है ? क्या भला करने वाले को ज्यादा पैसा लेने का हक है ? और अगर पैसे के खातिर उन्होंने भला किया हो, तो उसे भला कैसे कहा जाए ? यह तो उस पेशे का जो गुण है वह मैंने बताया। वकीलों के कारण हिन्दू-मुसलमानों के बीच कुछ दंगे हुए हैं, यह तो जिन्हें अनुभव है वे जानते होंगे। उनसे कुछ खानदान बरबाद हो गए हैं। उनकी बदौलत भाइयों में ज़हर दाखिल हो गया है। कुछ रियासतें वकीलों के जाल में फँसकर क़र्ज़दार हो वे मजदूर से ज्यादा रोजी गयी हैं। बहुत से गरासिये इन वकीलों की क्यों माँगते हैं ? उनकी कारस्तानी से लुट गए हैं। ऐसी बहुत सी मिसालें जरूरतें मजदूर से ज्यादा दी जा सकती हैं। क्यों हैं ? उन्होंने मजदूर से लेकिन वकीलों से बड़े से बड़ा नुकसान तो ज्यादा देश का क्या भला यह हुआ है कि अंग्रेजों का जुआ हमारी गर्दन पर किया है ? क्या भला मजबूत जम गया है। आप सोचिये ! क्या आप करने वाले को ज्यादा मानते हैं कि अंग्रेजी अदालतें यहाँ न होतीं तो वे पैसा लेने का हक है ? हमारे देश में राज कर सकते थे ? ये अदालतें और अगर पैसे के खातिर लोगों के भले के लिए नहीं हैं। जिन्हें अपनी सत्ता उन्होंने भला किया हो, तो कायम रखनी है, वे अदालतों के जरिये लोगों को उसे भला कैसे कहा बस में रखते हैं। लोग अगर खुद अपने झगड़े जाए ? यह तो उस पेशे निबटा लें, तो तीसरा आदमी उन पर अपनी सत्ता का जो गुण है वह मैंने नहीं जमा सकता। बताया। सचमुच जब लोग खुद मार-पीट करके या रिश्तेदारों को पंच बनाकर अपना झगड़ा निबटा लेते थे तब वे बहादुर थे। अदालतें आयीं और वे कायर बन गये। लोग आपस में लड़कर झगड़े मिटायें, यह जंगली माना जाता था। अब तीसरा आदमी झगड़ा मिटाता है, यह क्या कम जंगलीपन है ? क्या कोई ऐसा कह सकेगा कि तीसरा आदमी जो फैसला देता है वह सही फैसला ही होता है ? कौन सच्चा है, यह दोनों पक्ष के लोग जानते हैं। हम भोलेपन में मान लेते हैं कि तीसरा आदमी हमसे पैसे लेकर हमारा इन्साफ़ करता है। इस बात को अलग रखें। हकीकत तो यही दिखानी है कि अंग्रेजों ने 75

हिन्द स्वराज्य अदालतों के ज़रिये हम पर अंकुश जमाया है और अगर हम वकील न बनें तो ये अदालतें चल ही नहीं सकतीं। अगर अंग्रेज ही जज होते, अंग्रेज ही वकील होते और अंग्रेज ही सिपाही होते, तो वे जहाँ झगड़े नहीं होते सिर्फ़ अंग्रेजों पर ही राज करते। हिन्दुस्तानी जज वहाँ भी वे झगड़े खड़े और हिन्दुस्तानी वकील के बगैर उनका काम चल करते हैं। उनके दलाल नहीं सका। वकील कैसे पैदा हुए, उन्होंने कैसी जोंक की तरह गरीब धाँधल मचाई, यह सब अगर आप समझ सकें, लोगों से चिपकते हैं तो मेरे जितनी ही नफ़रत आपको भी इस पेशे के और उनका खून चूस लिए होगी। अंग्रेजी सत्ता की एक मुख्य कुंजी लेते हैं। वह पेशा ऐसा है उनकी अदालतें हैं और अदालतों की कुंजी वकील कि उसमें आदमियों को हैं। अगर वकील वकालत करना छोड़ दें और झगड़े के लिए बढ़ावा वह पेशा वेश्या के पेशे जैसा नीच माना जाए, तो मिलता ही है। वकील अंग्रेजी राज एक दिन में टूट जाए। वकीलों ने लोग निठगे होते हैं। हिन्दुस्तानी प्रजा पर यह तोहमत लगवाई है कि हमें झगड़े प्यारे हैं और हम कोर्ट-कचहरी रूपी पानी की मछलियाँ हैं। जो शब्द मैं वकीलों के लिए इस्तेमाल करता हूँ, वे ही शब्द जजों पर भी लागू होते हैं। ये दोनों मौसेरे भाई हैं और एक-दूसरे को बल देने वाले हैं। 76

किसानों को शहर के कृत्रिम जीवन और लकदक के चक्कर में नहीं पड़ना चाहिए। उनकी सादगी और सरलता ही उनका भूषण है। किसान का शहर की ओर भागना उसकी असफलता का ढिंढोरा है। ऐसा करके वह घर का रहेगा न घाट का। 77

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हिन्द स्वराज्य हिन्दुस्तान की दशा-पांच पाठक : वकीलों की बात तो हम समझ सकते हैं। उन्होंने जो अच्छा काम किया है वह जान-बूझकर नहीं किया, ऐसा यकीन होता है। बाकी उनके धंधे को देखा जाये तो वह कनिष्ठ ही है, लेकिन आप तो डॉक्टरों को भी उनके साथ घसीटते हैं। यह कैसे ? संपादक : मैं जो विचार आपके सामने रखता हूँ, वे इस समय तो मेरे अपने ही हैं, लेकिन ऐसे विचार मैंने ही किये हैं सो बात नहीं। पश्चिम के सुधारक खुद मुझसे ज्यादा सख्त शब्दों में इन धंधों के बारे में लिख गये हैं। उन्होंने वकीलों और डॉक्टरों की बहुत निंदा की है। उनमें से एक लेखक ने एक जहरी पेड़ का चित्र खींचा है, वकील-डॉक्टर वगैरह निकम्मे धंधे वालों को उसकी शाखाओं के रूप में बताया है और उस पेड़ के तने पर नीति-धर्म की कुल्हाड़ी उठाई है। अनीति को इन सब धंधों की जड़ बताया है। इससे आप यह समझ लेंगे कि मैं आपके सामने अपने दिमाग से निकाले हुए नये विचार नहीं रखता, लेकिन दूसरों का और अपना अनुभव आपके सामने रखता हूँ। डॉक्टरों के बारे में जैसे आपको अभी मोह है वैसे कभी मुझे भी था। एक समय ऐसा था जब मैंने खुद डॉक्टर होने का इरादा किया था और सोचा था कि डॉक्टर बनकर क़ौम की सेवा करूँगा। मेरा यह मोह अब मिट गया है। हमारे समाज में वैद्य का धंधा कभी अच्छा माना ही नहीं गया, इसका भान अब मुझे हुआ है और उस विचार की क़ीमत मैं समझ सकता हूँ। अंग्रेजों ने डॉक्टरी विद्या से भी हम पर काबू जमाया है। डॉक्टरों में दंभ की भी कमी नहीं है। मुगल बादशाह को भरमाने वाला एक अंग्रेज डॉक्टर 79


[साइडबार / उद्धरण बॉक्स]: पश्चिम के सुधारक खुद मुझसे ज्यादा सख्त शब्दों में इन धंधों के बारे में लिख गये हैं। उन्होंने वकीलों और डॉक्टरों की बहुत निंदा की है। उनमें से एक लेखक ने एक जहरी पेड़ का चित्र खींचा है, वकील-डॉक्टर वगैरह निकम्मे धंधे वालों को उसकी शाखाओं के रूप में बताया है और उस पेड़ के तने पर नीति-धर्म की कुल्हाड़ी उठाई है। अनीति को इन सब धंधों की जड़ बताया है।

अध्याय ११-१५: वकीलों, डॉक्टरों व रेलगाड़ियों का प्रभाव

हिन्द स्वराज्य ही था। उसने बादशाह के घर में कुछ बीमारी मिटाई, इसलिए उसे सिरोपाव (सिरोपा) मिला। अमीरों के पास पहुँचने वाले भी डॉक्टर ही हैं। डॉक्टरों ने हमें जड़ से हिला दिया है। डॉक्टरों से नीम-हकीम ज्यादा अच्छे, ऐसा कहने का मेरा मन होता है। इस पर हम कुछ विचार करें। [हाशिया:] यूरोप के डॉक्टर तो हद करते हैं। वे सिर्फ़ शरीर के ही गलत जतन के लिए लाखों जीवों को हर साल मारते हैं, जिंदा जीवों पर प्रयोग करते हैं। ऐसा करना किसी भी धर्म को मंजूर नहीं। हिन्दू, मुसलमान, ईसाई, जरथोस्ती सब धर्म कहते हैं कि आदमी के शरीर के लिए इतने जीवों को मारने की ज़रूरत नहीं। डॉक्टरों का काम सिर्फ़ शरीर को संभालने का है, या शरीर को संभालने का भी नहीं है। उनका काम शरीर में जो रोग पैदा होते हैं उन्हें दूर करने का है। रोग क्यों होते हैं? हमारी ही ग़फ़लत से। मैं बहुत खाऊँ और मुझे बदहज्मी, अजीर्ण हो जाए, फिर मैं डॉक्टर के पास जाऊँ और वह मुझे गोली दे, गोली खाकर मैं चंगा हो जाऊँ और दुबारा खूब खाऊँ और फिर से गोली लूँ। अगर मैं गोली न लेता तो अजीर्ण की सज़ा भुगतता और फिर से बेहद नहीं खाता। डॉक्टर बीच में आया और उसने हद से ज्यादा खाने में मेरी मदद की। उससे मेरे शरीर को तो आराम हुआ, लेकिन मेरा मन कमज़ोर बना। इस तरह आख़िर मेरी यह हालत होगी कि मैं अपने मन पर जरा भी काबू न रख सकूँगा। मैंने विलास किया, मैं बीमार पड़ा, डॉक्टर ने मुझे दवा दी और मैं चंगा हुआ। क्या मैं फिर से विलास नहीं करूँगा? ज़रूर करूँगा। अगर डॉक्टर बीच में न आता तो कुदरत अपना काम करती, मेरा मन मजबूत बनता और अन्त में निर्विषयी (व्यसन मुक्त) होकर मैं सुखी होता। अस्पतालें पाप की जड़ हैं। उनकी बदौलत लोग शरीर का जतन कम करते हैं और अनीति को बढ़ाते हैं। यूरोप के डॉक्टर तो हद करते हैं। वे सिर्फ़ शरीर के ही गलत जतन के लिए लाखों जीवों को हर साल मारते हैं, जिंदा जीवों पर प्रयोग करते हैं। ऐसा करना किसी भी धर्म को मंजूर नहीं। हिन्दू, मुसलमान, ईसाई, जरथोस्ती – सब धर्म कहते हैं कि आदमी के शरीर के लिए इतने जीवों को मारने की ज़रूरत नहीं। 80

हिन्द स्वराज्य डॉक्टर हमें धर्मभ्रष्ट करते हैं। उनकी बहुत सी दवाओं में चर्बी या दारू होती है। इन दोनों में से एक भी चीज हिन्दू-मुसलमान को चल सके ऐसी नहीं है। हम सभ्य होने का ढोंग करके, दूसरों को वहमी मानकर और बे- लगाम होकर चाहे सो करते रहें, यह दूसरी बात है, लेकिन डॉक्टर हमें धर्म से भ्रष्ट करते हैं, यह साफ और सीधी बात है। इसका परिणाम यह आता है कि हम निः सत्त्व और नामर्द बनते हैं। ऐसी दशा में हम लोक सेवा करने लायक नहीं रहते और शरीर से क्षीण और बुद्धिहीन होते जा रहे हैं। अंग्रेजी या यूरोपियन डॉक्टरी सीखना गुलामी की गाँठ को मजबूत बनाने जैसा है। डॉक्टर हमें धर्म भ्रष्ट करते हैं। उनकी बहुत सी दवाओं में चर्बी या दारू होती है। इन दोनों में से एक भी चीज हिन्दू-मुसलमान को चल सके ऐसी नहीं है। हम सभ्य होने का ढोंग करके, दूसरों को वहमी मानकर और बे-लगाम होकर चाहे सो करते रहें, यह दूसरी बात है, लेकिन डॉक्टर हमें धर्म से भ्रष्ट करते हैं, यह साफ और सीधी बात है। हम डॉक्टर क्यों बनते हैं, यह भी सोचने की बात है। उसका सच्चा कारण तो आबरूदार और पैसा कमाने का धंधा करने की इच्छा है। उसमें परोपकार की बात नहीं है। उस धन्धे में परोपकार नहीं है, यह तो मैं बता चुका। उससे लोगों को नुकसान होता है। डॉक्टर सिर्फ़ आडम्बर दिखाकर ही लोगों से बड़ी फीस वसूल करते हैं और अपनी एक पैसे की दवा के कई रुपये लेते हैं। यों विश्वास में और चंगे हो जाने की आशा में लोग डॉक्टरों से ठगे जाते हैं। जब ऐसा ही है तब भलाई का दिखावा करने वाले डॉक्टरों से खुले ठग, वैद्य, नीम-हकीम ज्यादा अच्छे। 81

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जिसका आत्मबल पर विश्वास है, उसकी हार नहीं होती क्योंकि आत्मबल की पराकाष्ठा का अर्थ है मरने की तैयारी।

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