हिन्द स्वराज (आत्म-निर्भरता एवं स्वराज्य दर्शन)
Hind Swaraj by Mahatma Gandhi
मोहनदास करमचन्द गाँधी (महात्मा गाँधी) द्वारा
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हिन्दुस्तान कैसे आज़ाद हो ? पाठक : सभ्यता के बारे में आपके विचार मैं समझ गया। आपने जो कहा उस पर मुझे ध्यान देना होगा, तुरन्त सब कुछ मंजूर कर लिया जाए, ऐसा आप नहीं मानते होंगे, ऐसी आशा भी नहीं रखते होंगे। आपके ऐसे विचारों के अनुसार आप हिन्दुस्तान के आज़ाद होने का क्या उपाय बताएँगे ? संपादक : मेरे विचार सब लोग तुरन्त मान लें, ऐसी आशा मैं नहीं रखता। मेरा फ़र्ज़ इतना ही है कि आपके जैसे जो लोग मेरे विचार जानना चाहते हैं, उनके सामने अपने विचार रख दूँ। वे विचार उन्हें पसंद आएँगे या नहीं आएँगे, यह तो समय बीतने पर ही मालूम होगा। हिन्दुस्तान की आज़ादी के उपायों का हम विचार कर चुके। फिर भी हमने दूसरे रूप में उन पर विचार किया। अब हम उन पर उनके स्वरूप में विचार करें। जिस कारण से रोगी बीमार हुआ हो वह कारण अगर दूर कर दिया जाए तो रोगी अच्छा हो जाएगा यह जग मशहूर बात है। इसी तरह जिस कारण से हिन्दुस्तान गुलाम बना वे कारण अगर दूर कर दिये जाएं तो वह बंधन से मुक्त हो जाएगा। स्वराज्य को आप सपने जैसा न मानें। मन से मानकर बैठे रहने का भी यह स्वराज्य नहीं है, यह तो ऐसा स्वराज्य है कि आपने अगर इसका स्वाद चख लिया हो, तो दूसरों को इसका स्वाद चखाने के लिए आप ज़िन्दगी भर कोशिश करेंगे, लेकिन मुख्य बात तो हर शख्स के स्वराज्य भोगने की है। डूबता आदमी दूसरे को नहीं तारेगा, लेकिन तैरता आदमी दूसरे को तारेगा। हम खुद गुलाम होंगे और दूसरों को आज़ाद करने की बात करेंगे, तो वह संभव नहीं है। पाठक : आपकी मान्यता के मुताबिक हिन्दुस्तान की सभ्यता अगर सबसे अच्छी है, तो फिर वह गुलाम क्यों बना ? संपादक : सभ्यता तो मैंने कही वैसी ही है, लेकिन देखने में आया है कि हर सभ्यता पर आफतें आती हैं। जो सभ्यता अचल है, वह आखिरकार 91
हिन्द स्वराज्य आफ़तों को दूर कर देती है। हिन्दुस्तान के बालकों में कोई न कोई कमी थी, इसीलिए वह सभ्यता आफ़तों से घिर गई, लेकिन इस घेरे में से छूटने की ताकत उसमें है, यह उसके गौरव को दिखाता है। और फिर सारा हिन्दुस्तान गुलामी में घिरा हुआ नहीं है। जिन्होंने पश्चिम की शिक्षा पाई है और जो उसके पाश में फँस गये हैं, वे ही जो सभ्यता अचल है, गुलामी में घिरे हुए हैं। हम जगत को अपनी वह आखिरकार आफ़तों दमड़ी के नाप से नापते हैं। अगर हम गुलाम को दूर कर देती है। हैं तो जगत को भी गुलाम मान लेते हैं। हम हिन्दुस्तान के बालकों में कंगाल दशा में हैं, इसलिए मान लेते हैं कि कोई न कोई कमी थी, सारा हिन्दुस्तान ऐसी दशा में है। दरअसल ऐसा इसीलिए वह सभ्यता कुछ नहीं है। फिर भी हमारी गुलामी सारे आफ़तों से घिर गई, देश की गुलामी है। ऐसा मानना ठीक है, लेकिन लेकिन इस घेरे में से ऊपर की बात हम ध्यान में रखें तो समझ छूटने की ताकत उसमें है, सकेंगे कि हमारी अपनी गुलामी मिट जाए, तो यह उसके गौरव को हिन्दुस्तान की गुलामी मिट गई ऐसा मान लेना दिखाता है और फिर सारा चाहिए। इसमें अब आपको स्वराज्य की हिन्दुस्तान गुलामी में घिरा व्याख्या भी मिल जाती है। हम अपने ऊपर राज हुआ नहीं है। जिन्होंने करें वही स्वराज्य है और वह स्वराज्य हमारी पश्चिम की शिक्षा पाई हथेली में है। है और जो उसके पाश में इस स्वराज्य को आप सपने जैसा न मानें। फँस गये हैं, वे ही मन से मानकर बैठे रहने का भी यह स्वराज्य नहीं गुलामी में घिरे हुए हैं। है, यह तो ऐसा स्वराज्य है कि आपने अगर इसका स्वाद चख लिया हो, तो दूसरों को इसका स्वाद चखाने के लिए आप ज़िन्दगी भर कोशिश करेंगे, लेकिन मुख्य बात तो हर शख्स के स्वराज्य भोगने की है। डूबता आदमी दूसरे को नहीं तारेगा, लेकिन तैरता आदमी दूसरे को तारेगा। हम खुद गुलाम होंगे और दूसरों को आज़ाद करने की बात करेंगे, तो वह संभव नहीं है। लेकिन इतना काफी नहीं है। हमें और भी आगे सोचना होगा। अब इतना तो आपकी समझ में आया होगा कि अंग्रेजों को देश से निकालने का मक़सद सामने रखने की ज़रूरत नहीं है। अगर अंग्रेज हिन्दुस्तानी बनकर 92
हिन्द स्वराज्य रहें तो हम उनका समावेश यहाँ कर सकते हैं। अंग्रेज अगर अपनी सभ्यता के साथ रहना चाहें, तो उनके लिए हिन्दुस्तान में जगह नहीं है। ऐसी हालत पैदा करना हमारे हाथ में है। पाठक : अंग्रेज हिन्दुस्तानी बनें, यह नामुमकिन है। संपादक : हमारा ऐसा कहना यह कहने के बराबर है कि अंग्रेज मनुष्य नहीं हैं। वे हमारे जैसे बनें या न बनें, इसकी हमें परवाह नहीं है। हम अपना घर साफ करें। फिर रहने लायक लोग ही उसमें रहेंगे, दूसरे अपने-आप चले जाएँगे। ऐसा अनुभव तो हर हम जगत को अपनी आदमी को हुआ होगा। दमड़ी के नाप से नापते पाठक : ऐसा होने की बात इतिहास में तो हमने हैं। अगर हम गुलाम हैं तो नहीं पढ़ी। जगत को भी गुलाम मान संपादक : जो चीज़ा इतिहास में नहीं देखी लेते हैं। हम कंगाल दशा वह कभी नहीं होगी, ऐसा मानना मनुष्य की में हैं, इसलिए मान लेते प्रतिष्ठा में अविश्वास करना है। जो बात अक्ल हैं कि सारा हिन्दुस्तान में आ सके, उसे आखिर हमें आजमाना तो ऐसी दशा में है। दरअसल चाहिए ही। ऐसा कुछ नहीं है। फिर हर देश की हालत एक सी नहीं होती। भी हमारी गुलामी सारे हिन्दुस्तान की हालत विचित्र है। हिन्दुस्तान का देश की गुलामी है। हम बल असाधारण है। इसलिए दूसरे इतिहासों से अपने ऊपर राज करें वही हमारा कम संबंध है। मैंने आपको बताया कि दूसरी स्वराज्य है और वह सभ्यताएँ मिट्टी में मिल गयीं, जबकि हिन्दुस्तानी स्वराज्य हमारी सभ्यता को आँच नहीं आई है। हथेली में है। पाठक : मुझे ये सब बातें ठीक नहीं लगतीं। हमें लड़कर अंग्रेजों को निकालना ही होगा, इसमें कोई शक नहीं। जब तक वे हमारे मुल्क में हैं, तब तक हमें चैन नहीं पड़ सकता। ‘पराधीन सपनेहु सुख नाहीं’ ऐसा देखने में आता है। अंग्रेज यहाँ हैं इसलिए हम कमज़ोर होते जा रहे हैं। हमारा तेज चला गया है और हमारे लोग घबराए, से दिखते हैं। अंग्रेज हमारे देश के लिए यम जैसे हैं। उस यम को हमें किसी भी प्रयत्न से भगाना होगा। 93
हिन्द स्वराज संपादक : आप अपने आवेश में मेरा सारा कहना भूल गये हैं। अंग्रेजों को यहाँ लाने वाले हम हैं और वे हमारी बदौलत ही यहाँ रहते हैं। आप यह कैसे भूल जाते हैं कि हमने उनकी सभ्यता अपनाई है, इसलिए वे यहाँ रह सकते हैं? आप उनसे जो नफ़रत करते हैं वह नफ़रत आपको उनकी सभ्यता से करनी चाहिए। फिर भी मान लें कि हम लड़कर उन्हें निकालना चाहते हैं। यह कैसे हो सकेगा ? पाठक : इटली ने किया वैसे। मैज़िनी और गैरीबाल्डी ने जो किया, वह तो हम भी कर सकते हैं। वे महावीर थे, इस बात से क्या आप इनकार कर सकेंगे ? 94
ईश्वर को नहीं मानने से सबसे बड़ी हानि वही है, जो हानि अपने को न मानने से हो सकती है। अर्थात ईश्वर को न मानना आत्महत्या के समान है। 95
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इटली और हिन्दुस्तान संपादक : आपने इटली का उदाहरण ठीक दिया। मैज़िनी महात्मा था। गैरीबाल्डी बड़ा योद्धा था। दोनों पूजनीय थे। उनसे हम बहुत सीख सकते हैं। फिर भी इटली की दशा और हिन्दुस्तान की दशा में फर्क है। पहले तो मैज़िनी और गैरीबाल्डी के बीच का भेद जानने लायक है। मैज़िनी के अरमान अलग थे। मैज़िनी जैसा सोचता था वैसा इटली में नहीं हुआ। मैज़िनी ने मनुष्य जाति के कर्तव्य के बारे में लिखते हुए यह बताया है कि हर एक को स्वराज्य भोगना सीख लेना चाहिए। यह बात उसके लिए सपने जैसी रही। स्वदेशाभिमान का अर्थ मैं गैरीबाल्डी और मैज़िनी के बीच मतभेद हो गया देश का हित समझता हूँ। था यह हमें याद रखना चाहिए। अगर देश का हित अंग्रेजों इसके सिवा, गैरीबाल्डी ने हर इटालियन के के हाथों होता हो, तो मैं हाथ में हथियार दिए और हर इटालियन ने हथियार आज अंग्रेजों को झुककर लिये। इटली और आस्ट्रिया के बीच सभ्यता का नमस्कार करूँगा। अगर भेद नहीं था। वे तो ‘चचेरे भाई’ माने जाएँगे। कोई अंग्रेज कहे कि देश ‘जैसे को तैसा’ वाली बात इटली की थी। इटली को आज़ाद करना चाहिए, को परदेशी (आस्ट्रिया के) जुए से छुड़ाने का जुल्म के ख़िलाफ़ होना मोह गैरीबाल्डी को था। इसके लिए उसने कावूर चाहिए और लोगों की की मारफ़त जो साजिशें कीं, वे उसकी शूरता को सेवा करनी चाहिए, तो बट्टा लगाने वाली हैं। उस अंग्रेज को मैं अन्त में नतीजा क्या निकला? इटली में हिन्दुस्तानी मानकर उसका इटालियन राज करते हैं इसलिए इटली की प्रजा स्वागत करूँगा। सुखी है, ऐसा आप मानते हों तो मैं आप से कहूँगा कि आप अंधेरे में भटकते हैं। मैज़िनी ने साफ़-साफ़ बताया है कि इटली आज़ाद नहीं हुआ है। विक्टर इमेन्युअल ने इटली का एक अर्थ किया, मैज़िनी ने दूसरा। इमेन्युअल, कावूर और गैरीबाल्डी के विचार से इटली का अर्थ था इमेन्युअल या इटली का राजा और उसके हुजूरी। मैज़िनी के विचार से इटली 97
हिन्द स्वराज्य का अर्थ था इटली के लोग उसके किसान। इमेन्युअल वगैरह तो प्रजा के नौकर थे। मैजिनी का इटली अब भी गुलाम है। दो राजाओं के बीच शतरंज की बाज़ी लगी थी, इटली की प्रजा तो सिर्फ़ प्यादा थी और है। इटली के मजदूर अब भी दुःखी हैं। इटली के मजदूरों की दाद-फ़रियाद नहीं सुनी जाती, इसलिए वे लोग खून करते हैं, विरोध करते हैं, सिर फोड़ते हैं और वहाँ बलवा होने का डर आज भी बना हुआ है। आस्ट्रिया के जाने से इटली को क्या लाभ हुआ ? नाम का ही लाभ हुआ। जिन सुधारों के लिए जंग मचा, वे सुधार हुए नहीं, प्रजा की हालत सुधरी नहीं। हिन्दुस्तान की ऐसी दशा करने का तो आपका मेरा स्वदेशाभिमान इरादा नहीं ही होगा। मैं मानता हूँ कि आपका विचार मुझे यह नहीं सिखाता हिन्दुस्तान के करोड़ों लोगों को सुखी करने का होगा, कि देशी राजाओं के यह नहीं कि आप या मैं राजसत्ता ले लूँ। अगर ऐसा मातहत जिस तरह प्रजा है तो हमें एक ही विचार करना चाहिए। वह यह कि कुचली जाती है उसी प्रजा स्वतन्त्र कैसे हो ? तरह उसे कुचलने आप कुबूल करेंगे कि कुछ देशी रियासतों में प्रजा दिया जाए। मुझमें बल कुचली जाती है। वहाँ के शासक नीचता से लोगों को होगा तो मैं देशी कुचलते हैं। उनका जुल्म अंग्रेजों के जुल्म से भी राजाओं के जुल्म के ज्यादा है। ऐसा जुल्म अगर आप हिन्दुस्तान में चाहते ख़िलाफ़ और अंग्रेजी हों, तो हमारी पटरी कभी नहीं बैठेगी। जुल्म के ख़िलाफ़ मेरा स्वदेशाभिमान मुझे यह नहीं सिखाता कि देशी जूझूँगा। राजाओं के मातहत जिस तरह प्रजा कुचली जाती है उसी तरह उसे कुचलने दिया जाए। मुझमें बल होगा तो मैं देशी राजाओं के जुल्म के ख़िलाफ़ और अंग्रेजी जुल्म के ख़िलाफ़ जूझूँगा। स्वदेशाभिमान का अर्थ मैं देश का हित समझता हूँ। अगर देश का हित अंग्रेजों के हाथों होता हो, तो मैं आज अंग्रेजों को झुककर नमस्कार करूँगा। अगर कोई अंग्रेज कहे कि देश को आजाद करना चाहिए, जुल्म के ख़िलाफ़ होना चाहिए और लोगों की सेवा करनी चाहिए, तो उस अंग्रेज को मैं हिन्दुस्तानी मानकर उसका स्वागत करूँगा। फिर, इटली की तरह जब हिन्दुस्तान को हथियार मिलें तभी वह लड़ सकता है, पर इस भगीरथ (बहुत बड़े) काम का तो मालूम होता है, आपने 98
हिन्द स्वराज्य विचार ही नहीं किया है। अंग्रेज गोला-बारूद से पूरी तरह लैस हैं, इससे मुझे डर नहीं लगता, लेकिन ऐसा तो दीखता है कि उनके हथियारों से उन्हीं के ख़िलाफ़ लड़ना हो, तो हिन्दुस्तान को हथियारबंद करना होगा। अगर ऐसा हो सकता हो तो इनमें कितने साल लगेंगे ? और तमाम हिन्दुस्तानियों को हथियारबंद करना तो हिन्दुस्तान को यूरोप सा बनाने जैसा होगा। अगर ऐसा हुआ तो आज यूरोप के जो बेहाल हैं वैसे ही हिन्दुस्तान के भी होंगे। थोड़े में हिन्दुस्तान को यूरोप की सभ्यता अपनानी होगी। ऐसा ही होने वाला हो तो अच्छी बात यह होगी कि जो अंग्रेज उस सभ्यता में कुशल हैं, उन्हीं को हम यहाँ रहने दें। उनसे थोड़ा- बहुत झगड़ कर कुछ हक हम पाएँगे, कुछ नहीं खून तो हमें अपना करना पाएँगे और अपने दिन गुजारेंगे। चाहिए, क्योंकि हम नामर्द लेकिन बात तो यह है कि हिन्दुस्तान की बन गये हैं, इसीलिए हम प्रजा कभी हथियार नहीं उठायेगी। न उठाये यह खून का विचार करते हैं। ठीक ही है। ऐसा करके आप किसे पाठक : आप तो बहुत आगे बढ़ गये। सबके आज़ाद करेंगे ? हिन्दुस्तान हथियारबंद होने की ज़रूरत नहीं। हम पहले तो की प्रजा ऐसा कभी नहीं कुछ अंग्रेजों का खून करके आतंक फैलाएँगे। चाहती। हम जैसे लोग ही फिर तो थोड़े लोग हथियारबंद होंगे, वे जिन्होंने अधम सभ्यता रूपी खुल्लमखुल्ला लड़ेंगे। उसमें पहले तो बीस- भाँग पी है, नशे में ऐसा पचीस लाख हिन्दुस्तानी ज़रूर मरेंगे, लेकिन विचार करते हैं। खून करके आखिर हम देश को अंग्रेजों से जीत लेंगे। हम जो लोग राज करेंगे, वे प्रजा गुरील्ला (डाकुओं जैसी) लड़ाई लड़कर को सुखी नहीं बना सकेंगे। अंग्रेजों को हरा देंगे। संपादक : आपका ख़्याल हिन्दुस्तान की पवित्र भूमि को राक्षसी बनाने का लगता है। अंग्रेजों का खून करके हिन्दुस्तान को छुड़ाएंगे ऐसा विचार करते हुए आपको त्रास क्यों नहीं होता ? खून तो हमें अपना करना चाहिए, क्योंकि हम नामर्द बन गये हैं, इसीलिए हम खून का विचार करते हैं। ऐसा करके आप किसे आज़ाद करेंगे ? हिन्दुस्तान की प्रजा ऐसा कभी नहीं चाहती। हम जैसे लोग ही, जिन्होंने अधम सभ्यता रूपी भाँग पी है, नशे 99
हिन्द स्वराज में ऐसा विचार करते हैं। खून करके जो लोग राज करेंगे, वे प्रजा को सुखी नहीं बना सकेंगे। धींगड़ा ने जो खून किया है उससे या जो खून तमाम हिन्दुस्तानियों को हिन्दुस्तान में हुए हैं उनसे देश को फायदा हुआ हथियारबंद करना तो है, ऐसा अगर कोई मानता हो तो वह बड़ी हिन्दुस्तान को यूरोप सा भूल करता है। धींगड़ा को मैं देशाभिमानी मानता बनाने जैसा होगा। अगर हूँ, लेकिन उसका देश प्रेम पागलपन से भरा ऐसा हुआ तो आज यूरोप था। उसने अपने शरीर का बलिदान गलत तरीके के जो बेहाल हैं वैसे ही से दिया। उससे अंत में तो देश को नुकसान ही हिन्दुस्तान के भी होंगे। होने वाला है। थोड़े में हिन्दुस्तान को पाठक : लेकिन आपको इतना तो कुबूल करना यूरोप की सभ्यता अपनानी ही होगा कि अंग्रेज इस खून से डर गये हैं और होगी। ऐसा ही होने वाला लॉर्ड मॉर्ले ने जो कुछ हमें दिया है वह ऐसे डर से हो तो अच्छी बात यह होगी ही दिया है। कि जो अंग्रेज उस सभ्यता संपादक : अंग्रेज जैसे डरपोक प्रजा हैं वैसे में कुशल हैं। बहादुर भी हैं। गोला-बारूद का असर उन पर तुरन्त होता है, ऐसा मैं मानता हूँ। संभव है, लॉर्ड मॉर्ले ने हमें जो कुछ दिया वह डर से दिया हो, लेकिन डर से मिली हुई चीज जब तक डर बना रहता है तभी तक टिक सकती है। 100
आश्चर्य है, वैद्य मरते हैं, डॉक्टर मरते हैं, उनके पीछे हम भटकते हैं। लेकिन राम जो मरता नहीं है, हमेशा जिन्दा रहता है और अचूक वैद्य है, उसे हम भूल जाते हैं। 101
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गोला-बारूद पाठक : डर से दिया हुआ जब तक डर रहे तभी तक टिक सकता है, यह तो आपने विचित्र बात कही। जो दिया सो दिया। उसमें फिर क्या हेरफेर हो सकता है ? संपादक : ऐसा नहीं है। १८५७ की घोषणा बलवे अंग्रेजों ने जो कुछ पाया के अंत में लोगों में शान्ति कायम रखने के लिए की वह मार-काट करके गई थी, जब शान्ति हो गई और लोग भोले दिल के पाया, इसलिए हम भी बन गये तब उसका अर्थ बदल गया। अगर मैं सज़ा वैसा ही करके मनचाही के डर से चोरी न करूँ, तो सज़ा का डर मिट जाने चीज पाएँ। अंग्रेजों ने पर चोरी करने की मेरी फिर से इच्छा होगी और मैं मार-काट की और हम चोरी करूँगा। भी कर सकते हैं, यह यह तो बहुत ही साधारण अनुभव है, इससे बात तो ठीक है, लेकिन इनकार नहीं किया जा सकता। हमने मान लिया है मार-काट से जैसी चीज कि डाँट-डपटकर लोगों से काम लिया जा सकता उन्हें मिली वैसी ही हम है और इसलिए हम ऐसा करते आए हैं। भी ले सकते हैं। आप पाठक : आपकी यह बात आपके ख़िलाफ़ जाती कुबूल करेंगे कि वैसी है, ऐसा आपको नहीं लगता ? आपको स्वीकार चीज हमें नहीं चाहिए। करना होगा कि अंग्रेजों ने खुद जो कुछ हासिल किया है, वह मार-काट करके ही हासिल किया है। आप कह चुके हैं कि मार-काट से उन्होंने जो कुछ हासिल किया है वह बेकार है, यह मुझे याद है इससे मेरी दलील को धक्का नहीं पहुँचता। उन्होंने बेकार चीज पाने का सोचा और उसे पाया। मतलब यह कि उन्होंने अपनी मुराद पूरी की। साधन क्या था, इसकी चिन्ता हम क्यों करें ? अगर हमारी मुराद अच्छी हो तो क्या उसे हम चाहे जिस साधन से, मार-काट करके भी पूरा नहीं करेंगे ? चोर मेरे घर में घुसे तब क्या मैं साधन का विचार करूँगा ? मेरा धर्म तो उसे किसी भी तरह बाहर निकालने का ही होगा। 103
हिन्द स्वराज्य ऐसा लगता है कि आप यह तो कुबूल करते हैं कि हमें सरकार के पास अर्जियां भेजने से कुछ नहीं मिला है और न आगे कभी मिलने वाला है। तो फिर उन्हें मारकर हम क्यों न लें ? ज़रूरत हो उतनी मार का डर हम हमेशा बनाये रखेंगे। बच्चा अगर आग में पैर रखे और उसे आग से बचाने के लिए हम उस पर रोक लगाएँ, तो आप भी इसे दोष नहीं मानेंगे। किसी भी तरह हमें अपना काम पूरा कर लेना है। साधन और साध्य, ज़रिया संपादक : आपने दलील तो अच्छी की। वह और मुराद के बीच कोई ऐसी है कि बहुतों ने उससे धोखा खाया है। मैं संबंध नहीं है। यह बहुत भी ऐसी ही दलील करता था, लेकिन अब मेरी बड़ी भूल है। इस भूल के आँखें खुल गई हैं और मैं अपनी गलती समझ कारण जो लोग धार्मिक सकता हूँ। आपको वह गलती बताने की कहलाते हैं, उन्होंने घोर कर्म कोशिश करूँगा। किये हैं। यह तो धतूरे का पहले तो इस दलील पर विचार करें कि पौधा लगाकर मोगरे के अंग्रेजों ने जो कुछ पाया वह मार-काट करके फूल की इच्छा करने जैसा पाया, इसलिए हम भी वैसा ही करके मनचाही हुआ। मेरे लिए समुद्र पार चीज पाएँ। अंग्रेजों ने मार-काट की और हम भी करने का साधन जहाज़ ही कर सकते हैं, यह बात तो ठीक है, लेकिन मार- हो सकता है। अगर मैं पानी काट से जैसी चीज उन्हें मिली वैसी ही हम भी में बैलगाड़ी डाल दूँ तो वह ले सकते हैं। आप कुबूल करेंगे कि वैसी चीज गाड़ी और मैं दोनों समुद्र के हमें नहीं चाहिए। तले पहुँच जाएँगे। जैसे देव आप मानते हैं कि साधन और साध्य, ज़रिया वैसी पूजा। और मुराद के बीच कोई संबंध नहीं है। यह बहुत बड़ी भूल है। इस भूल के कारण जो लोग धार्मिक कहलाते हैं, उन्होंने घोर कर्म किये हैं। यह तो धतूरे का पौधा लगाकर मोगरे के फूल की इच्छा करने जैसा हुआ। मेरे लिए समुद्र पार करने का साधन जहाज़ ही हो सकता है। अगर मैं पानी में बैलगाड़ी डाल दूँ तो गाड़ी और मैं दोनों समुद्र के तले पहुँच जाएँगे। जैसे देव वैसी पूजा यह वाक्य बहुत सोचने लायक है। उसका गलत अर्थ करके लोग भुलावे में पड़ गए हैं। साधन बीज है और साध्य (हासिल करने की चीज) पेड़ है। 104
हिन्द स्वराज इसलिए जितना सम्बन्ध बीज और पेड़ के बीच है, उतना ही साधना और साध्य के बीच है। शैतान को भजकर मैं ईश्वर भजन का फल पाऊं, यह कभी हो ही नहीं सकता। इसलिए यह कहना कि हमें तो ईश्वर को ही भजना है, साधन भले शैतान हो, बिल्कुल अज्ञान की बात है। जैसी करनी वैसी भरनी। अंग्रेजों ने मार-काट करके १८३३ में वोट के विशेष अधिकार पाए। क्या मार-काट करके वे अपना फ़र्ज समझ सके ? उनकी मुराद अधिकार पाने की थी, इसलिए उन्होंने मार-काट मचाकर अधिकार पा लिए। सच्चे अधिकार तो फ़र्ज के फल हैं, वे अधिकार उन्होंने नहीं पाए। नतीजा यह हुआ कि सबने अधिकार पाने का प्रयत्न किया, लेकिन फ़र्ज सो गया। जहाँ सभी अधिकार की बात करें, वहाँ कौन किसको दे ? वे कोई भी फ़र्ज अदा नहीं करते, ऐसा कहने का मतलब यहाँ नहीं है, लेकिन जो अधिकार वे माँगते थे उन्हें हासिल करके उन्होंने वे फ़र्ज पूरे नहीं किये जो उन्हें करने चाहिए थे। उन्होंने योग्यता प्राप्त नहीं की, इसलिए उनके अधिकार उनकी गर्दन पर जुए की तरह सवार हो बैठे हैं। इसलिए जो कुछ उन्होंने पाया है, वह उनके साधन का ही परिणाम है। जैसी चीज उन्हें चाहिए थी वैसे साधन उन्होंने काम में लिये। मुझे अगर आपसे आपकी घड़ी छीन लेनी हो, तो बेशक आपके साथ मुझे मार-पीट करनी होगी, लेकिन अगर मुझे आपकी घड़ी खरीदनी हो, तो आपको दाम देने होंगे। अगर मुझे बख्शीश के तौर पर आपकी घड़ी लेनी होगी, तो मुझे आपसे विनती करनी होगी। घड़ी पाने के लिए मैं जो साधन काम में लूँगा, उसके अनुसार वह चोरी का माल, मेरा माल या बख्शीश की चीज होगी। तीन साधनों के तीन अलग परिणाम आएँगे। तब आप कैसे कह सकते हैं कि साधन की कोई चिन्ता नहीं ? --- [दाएँ हाशिए का पाठ / Sidebar Text] --- साधन बीज है और साध्य हासिल करने की चीज पेड़ है। इसलिए जितना सम्बन्ध बीज और पेड़ के बीच है, उतना ही साधना और साध्य के बीच है। शैतान को भजकर मैं ईश्वर भजन का फल पाऊं, यह कभी हो ही नहीं सकता। इसलिए यह कहना कि हमें तो ईश्वर को ही भजना है, साधन भले शैतान हो, बिल्कुल अज्ञान की बात है। जैसी करनी वैसी भरनी। 105
हिन्द स्वराज अब चोर को घर से निकालने की मिसाल लें। मैं आपसे इसमें सहमत नहीं हूँ कि चोर को निकालने के लिए चाहे जो साधन काम में लिया जा सकता है। अगर मेरे घर में मेरा पिता चोरी करने आएगा, तो मैं एक साधन काम में लूँगा। अगर कोई मेरी पहचान को चोरी करने आएगा, तो मैं यही अंग्रेजों ने मार-काट साधन काम में नहीं लूँगा और कोई अनजान आदमी करके १८३३ में वोट आएगा, तो मैं तीसरा साधन काम में लूँगा। अगर के विशेष अधिकार वह गोरा हो तो एक साधन और हिन्दुस्तानी हो तो पाए। क्या मार-काट दूसरा साधन काम में लाना चाहिए, ऐसा भी शायद करके वे अपना फ़र्ज़ आप कहेंगे। अगर कोई मुर्दार लड़का चोरी करने समझ सके ? उनकी आया होगा, तो मैं बिल्कुल दूसरा ही साधन काम मुराद अधिकार पाने में लूँगा। की थी, इसलिए अगर वह मेरी बराबरी का होगा, तो और ही कोई उन्होंने मार-काट साधन मैं काम में लूँगा और अगर वह हथियारबंद मचाकर अधिकार पा तगड़ा आदमी होगा, तो मैं चुपचाप सो रहूँगा। इसमें लिये। सच्चे पिता से लेकर ताकतवर आदमी तक अलग-अलग अधिकार तो फ़र्ज़ के साधन इस्तेमाल किये जाएँगे। पिता होगा तो भी मुझे फल हैं, वे अधिकार लगता है कि मैं सो रहूँगा और हथियार से लैस कोई उन्होंने नहीं पाये। होगा तो भी मैं सो रहूँगा। पिता में भी बल है, नतीजा यह हुआ कि हथियारबंद आदमी में भी बल है। दोनों बलों के बस सबने अधिकार पाने होकर मैं अपनी चीज को जाने दूँगा। का प्रयत्न किया, पिता का बल मुझे दया से रुलाएगा। हथियारबंद लेकिन फ़र्ज़ सो आदमी का बल मेरे मन में गुस्सा पैदा करेगा, हम गया। कट्टर दुश्मन हो जाएँगे। ऐसी मुश्किल हालत है। इन मिसालों से हम दोनों साधनों के निर्णय पर तो नहीं पहुँच सकेंगे। मुझे तो सब चोरों के बारे में क्या करना चाहिए यह सूझता है, लेकिन उस इलाज से आप घबरा जाएँगे, इसलिए मैं आपके सामने उसे नहीं रखता। आप इसे समझ लें और अगर नहीं समझेंगे तो हर वक्त आपको अलग साधन काम में लेने होंगे, लेकिन आपने इतना तो देखा कि चोर को निकालने के लिए चाहे जो साधन काम नहीं देगा और जैसा साधन आपका होगा उसके मुताबिक नतीजा आयेगा। 106
हिन्द स्वराज आपका धर्म किसी भी साधन से चोर को घर से निकालने का हरगिज नहीं है। जरा आगे बढ़ें। वह हथियारबंद आदमी आपकी चीज ले गया है। आपने उसे याद रखा है। आपके मन में उस पर गुस्सा भरा है। आप उस लुच्चे को अपने लिए नहीं, लेकिन लोगों के कल्याण के लिए सज़ा देना चाहते हैं। आपने कुछ आदमी जमा किए। अच्छे नतीजे लाने के उसके घर पर आपने धावा बोलने का निश्चय किया। लिए अच्छे ही साधन उसे मालूम हुआ। चाहिए और अगर सब वह भागा। उसने दूसरे लुटेरे जमा किये। वह भी नहीं तो ज्यादातर खीजा हुआ है। अब तो उसने आपका घर दिन-दहाड़े मामलों में हथियार लूटने का संदेशा आपको भेजा है। आप उसके बल से दयाबल मुकाबले के लिए तैयार बैठे हैं। इस बीच लुटेरा ज्यादा ताकतवर आपके आसपास के लोगों को हैरान करता है। वे साबित होता है। आपसे शिकायत करते हैं। आप कहते हैं: "यह सब हथियार में हानि है, मैं आप ही के लिए तो करता हूँ मेरा माल गया उसकी दया में कभी नहीं। तो कोई बिसात ही नहीं" लोग कहते हैं: "पहले तो वह हमें लूटता नहीं था। आपने जब से उसके साथ लड़ाई शुरू की है तभी से उसने यह काम शुरू किया है।" आप दुविधा में फँस जाते हैं। गरीबों के ऊपर आपको रहम है। उनकी बात सही है। अब क्या किया जाए? क्या लुटेरे को छोड़ दिया जाए? इससे तो आपकी इज़्ज़त चली जायेगी। इज़्ज़त सबको प्यारी होती है। आप गरीबों से कहते हैं: "कोई फिक्र नहीं। आइये, मेरा धन आपका ही है। मैं आपको हथियार देता हूँ। मैं आपको उनका उपयोग सिखाऊंगा। आप उस बदमाश को मारिए, छोड़िए नहीं", यों लड़ाई बढ़ी। लुटेरे बढ़े। लोगों ने खुद होकर मुसीबत मोल ली। चोर से बदला लेने का परिणाम यह आया कि नींद बेचकर जागरण मोल लिया। जहाँ शांति थी वहाँ अशांति पैदा हुई। पहले तो जब मौत आती तभी मरते थे। अब तो सदा ही मरने के दिन आए। लोग हिम्मत हारकर पस्तहिम्मत बने। इसमें मैंने बढ़ा- चढ़ाकर कुछ नहीं कहा है, यह आप धीरज से सोचेंगे तो देख सकेंगे। यह एक साधन हुआ। 107
हिन्द स्वराज अब दूसरे साधन की जाँच करें। चोर को आप अज्ञानी मान लेते हैं। कभी मौका मिलने पर उसे समझाने का आपने सोचा है। आप यह भी सोचते हैं कि वह भी हमारे जैसा आदमी है। उसने किस इरादे से चोरी की, यह आपको क्या मालूम ? आपके लिए अच्छा रास्ता तो यही है कि जब मौका मिले तब आप उस आदमी के भीतर से चोरी का बीज ही निकाल दें। ऐसा आप सोच रहे हैं, इतने में वे भाई साहब फिर से चोरी करने आते हैं। आप नाराज नहीं होते। आपको उस पर दया आती है।
[बायाँ स्तंभ/हाशिया:] जहाँ जो भी आदमी नीच काम करता होगा वहाँ-वहाँ पहुँचना होगा और सामने वाले के बच्चों के प्राण लेने के बजाय अपने प्राणों की आहुति देनी पड़े, इतना पुरुषार्थ आप करना चाहें तो कर सकते हैं, आप स्वतंत्र हैं। पर यह बात बिल्कुल असंभव है।
[मुख्य पाठ:] आप सोचते हैं कि यह आदमी रोगी है। आप खिड़की- दरवाजे खुले कर देते हैं। आप अपनी सोने की जगह बदल लेते हैं। आप अपनी चीजें झट ले जाई जा सकें इस तरह रख देते हैं। चोर आता है। वह घबराता है। यह सब उसे नया ही मालूम होता है। माल तो वह ले जाता है, लेकिन उसका मन चक्कर में पड़ जाता है। वह गाँव में जाँच-पड़ताल करता है। आपकी दया के बारे में उसको मालूम होता है। वह पछताता है और आपसे माफी माँगता है। आपकी चीजें वापस ले आता है। वह चोरी का धंधा छोड़ देता है। आपका सेवक बन जाता है। आप उसे काम-धंधे से लगा देते हैं। यह दूसरा साधन है। आप देखते हैं कि अलग-अलग साधनों के अलग- अलग नतीजे आते हैं। सब चोर ऐसा ही बरताव करेंगे या सब में आपका-सा दया भाव होगा, ऐसा मैं इससे साबित नहीं करना चाहता, लेकिन यही दिखाना चाहता हूँ कि अच्छे नतीजे लाने के लिए अच्छे ही साधन चाहिए और अगर सब नहीं तो ज्यादातर मामलों में हथियार बल से दयाबल ज्यादा ताकतवर साबित होता है। हथियार में हानि है, दया में कभी नहीं। अब अर्जी की बात लें, जिसके पीछे बल नहीं है वह अर्जी निकम्मी है, इसमें कोई शक नहीं। फिर भी स्व. न्यायमूर्ति रानडे कहते थे कि अर्जी लोगों को तालीम देने का एक साधन है। उससे लोगों को अपनी स्थिति का भान कराया जा सकता है और राजकर्ता को चेतावनी दी जा सकती है। यों सोचें
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हिन्द स्वराज्य तो अर्जी निकम्मी चीज है। बराबरी का आदमी अर्जी करेगा तो वह उसकी नम्रता की निशानी मानी जाएगी। गुलाम अर्जी करेगा तो वह उसकी गुलामी की निशानी होगी। जिस अर्जी के पीछे बल है वह बराबरी के आदमी की अर्जी है और वह अपनी माँग अर्जी के रूप में रखता है, यह उसकी खानदानियत को बताता है। अर्जी के पीछे दो तरह के बल होते हैं, "अगर आप नहीं देंगे तो हम आपको मारेंगे।" यह गोला-बारूद का बल है। इसका बुरा नतीजा हम देख चुके। दूसरा बल यह है: "अगर आप नहीं देंगे तो हम आपके अर्जदार नहीं रहेंगे। हम अर्जदार होंगे तो आप बादशाह बने रहेंगे। हम आपके साथ कोई व्यवहार नहीं रखेंगे।" इस बल को चाहे दयाबल कहें, चाहे आत्मबल कहें या सत्याग्रह कहें। यह बल अविनाशी है और इस बल का उपयोग करने वाला अपनी हालत को बराबर समझता है। इसका समावेश हमारे बुजुर्गों ने 'एक नहीं सब रोगों की दवा' में किया है। यह बल जिसमें है उसका हथियार बल कुछ नहीं बिगाड़ सकता। बच्चा अगर आग में पैर रखे, तो उसको दबाने की मिसाल की छानबीन करने में तो आप हार जाएँगे। बच्चों के साथ आप क्या करेंगे ? मान लीजिए कि बच्चा ऐसा जोर करे कि आपको मारकर वह आग में जा पड़े, तब तो आग में पड़े बिना वह रहेगा ही नहीं। इसका उपाय आपके पास यह है: या तो आग में पड़ने से रोकने के लिए आप उसके प्राण ले लें या उसका आग में पड़ना आपसे देखा नहीं जाता इसलिए आप स्वयं आग में पड़कर अपनी जान दे दें।
[हाशिए का पाठ / Sidebar Text]: बच्चों को रोकने में आप सिर्फ़ बच्चों का स्वार्थ देखते हैं। जिसके ऊपर आप अंकुश रखना चाहते हैं, उस पर उसके स्वार्थ के लिए ही अंकुश रखेंगे। यह मिसाल अंग्रेजों पर जरा भी लागू नहीं होती। आप अंग्रेजों पर जो हथियार बल का उपयोग करना चाहते हैं, उसमें आप अपना ही यानी प्रजा का स्वार्थ देखते हैं। उसमें दया जरा भी नहीं है।
[मुख्य पाठ (जारी)]: आप बच्चों के प्राण तो नहीं ही लेंगे। आपमें अगर संपूर्ण दया भाव न हो, तो मुमकिन है कि आप अपने प्राण नहीं देंगे, तो फिर लाचारी से आप बच्चों को आग में कूदने देंगे। इस तरह आप बच्चों पर हथियार-बल का उपयोग नहीं करते हैं। बच्चों को आप और किसी तरह रोक सकें तो रोकेंगे 109