इच्छानुसार संतान
Ichhanusar Santan
बीरेन्द्र गुप्त (Virendra Gupta) द्वारा
स्रोत: Mumukshu Bhawan Varanasi Collection - इच्छानुसार सन्तान · अश्विनी कुमार, प्रकाशन मन्दिर / वीरेन्द्र नाथ (उद्गम)
गर्भाधान
ऋतु समय से १६ दिन तक गर्भाशय का मुख खुला रहता है और उसी समय में गर्भधारण करने की शक्ति उत्पन्न रहती है। इसके पश्चात् गर्भाशय का मुख बन्द हो जाता है जिसके पश्चात् गर्भधारण नहीं हो सकता।
स्थान- कमरा एकांत हो, सुन्दर चित्रों से या जिस विचार का पुत्र या पुत्री के लिए गर्भाधान करना हो, उसी प्रकार के चित्रों से सुसज्जित हो, साफ- सुथरा और सुगन्धित हो, सेज मुलायम गद्देदार हो, कमरे में हल्का प्रकाश हो।
समय- एक प्रहर रात्रि बीते समय से एक प्रहर रात्रि रहे समय तक, अर्थात् रात्रि को १० से १२, १ बजे तक का समय गर्भाधान के लिए उपयुक्त और उत्तम है।
आसन- स्त्री को चारपाई पर सीधे ही लेटकर टांगे घुटने के स्थान से मोड़ कर सीने के पास लगाना चाहिए और पैरों की एड़ियाँ नितम्ब से लगी रहें। इस प्रकार वीर्य ग्रहण करना चाहिए और अपनी कमर के नीचे तकिया भी लगा लेना चाहिये। किसी भी करवट, बैठकर या स्त्री पुरुष के ऊपर लेट कर वीर्य ग्रहण करेगी तो बालक कुछड़ा अंग बिहंग होगा। रजः और वीर्य के पात होते समय स्त्री ऊपर को संकोचन द्वारा वीर्य को खींचे और उस समय स्त्री पुरुष दोनों के मुख के सामने मुख, नासिका के सामने नासिका, नेत्रों के सामने नेत्र, हृदय के साने हृदय, नाभि के सामने नाभि अर्थात् दोनों शरीरों के अंग आम्ने-सामने हों ताकि वीर्य गर्भाशय में सुमन्ता से सीधा ही प्रविष्ट हो जावे। जब दोनों के शरीर तथा भीतरी नाड़ी की चेष्टा शिथिल हो जावे तब दोनों पृथक-पृथक हो जावें। अर्थात् वीर्य स्वलन के कुछ देर पश्चात् पृथक होवें। यदि वीर्य गर्भाशय में प्रविष्ट होते समय जिरह से टेढ़ा इच्छानुसार सन्तान
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वीरेन्द्र गुप्तः
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आदि हो जायगा वही अंग बच्चे का विकृत हो जायगा। पुरुष का समागम के पश्चात् लघुशक्ति (मूत्र त्याग) के लिए अवश्य जाना चाहिए और इन्द्र की त्वचा को भी सीधा कर लें।
भोजन-जिस विचार की तथा जितनी विद्वान सन्तान को जन्म देना हो, उसी प्रकार का भोजन पूर्व लिखे अनुसार १॥ मास तक स्त्री पुरुष दोनों ब्रह्मचर्य के साथ सेवन करें। भोजन पाने के कम से कम २ घण्टे पश्चात् समागम करना चाहिए। रति के पश्चात् शतावर ६ माशा, छुहारा २ नग, १॥ पाव दूध १॥ पाव जल इन वस्तुओं को मिलाकर पकायें जब दूध मात्र रह जाये तो उसको ठण्डा करके समागम से पूर्व तैयार करके रख लें और रति से निवृत्त होकर इस दूध का पान करें या मिष्ठान खायें या २॥ तोला बहिया गुड़ भी खा सकते हैं। ऐसा करने से समागम से जा शक्ति क्षय होती है वह पुनः वापिस आ जाती है और कुछ न खाने से आँतों में रूक्षता आ जाती है जिस कारण पेट में विवन्ध हो जाता है।
भावना- समागम के समय स्त्री और पुरुष के जैसे भाव होते हैं, वही भाव सन्तान में अवश्य ही आ जाते हैं। देखा गया है कि माता-पिता तो धर्मात्मा हैं परन्तु उनका लड़का चोर डाकू। ऐसा क्यों? समागम समय में किसी डाकू की घटना याद आ गई और उसे सुनाना आरम्भ कर दिया। इसमें स्त्री के विचारों की अधिक प्रधानता है। इसलिये समागम समय निर्भयता, धार्मिक चित्र, योद्धाओं का ध्यान, शांति, प्रसन्नता, सात्विक विचार होते हैं तो सन्तान उत्तम, विद्वान, निर्भय, बलवान और धर्मात्मा होंगे। इसके विपरीत भावों से दुष्ट, दुराचारी, कुरूप, दरिद्री, पापी और हीन सन्तान होंगे।
एतत्कामफलं लोके यद्व्यापक चिन्तना।
अन्य चित्त कृते कामं शववौरिक संगमः॥
शृंगार शतक २९
इच्छानुसार सन्तान
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वीरेन्द्र गुप्तः
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गर्भ स्थित न होने के कारण और उसका उपचार
अर्थ- मंथुन के समय स्त्री पुरुष का चित्त एकाग्रित हो जाना ही काम की सफलता है, यदि उस समय दोनों का चित्त दो स्थानों पर रहा तो समागम में आनन्द नहीं आता।
महाभारत आदिपर्व की गाथा- जिस समय राजा शान्तनु के दोनों पुत्र चित्रवीर्य युवाकाल में और विचित्रवीर्य युद्ध में मारे गये। उस समय रानी सत्यवती को चिन्ता हुई कि वंश वृद्ध कैसे हो, तब उसने नियोग के लिए व्यास जी को बुला कर सन्तान लाभ के लिये प्रार्थना की जिस व्यास जी ने स्वीकार कर लिया। सत्यवती ने सुसज्जित कमरे में घृत का दीपक जलाकर उस कमरे को अम्बिका के लिये नियुक्त किया। जब उस कमरे में व्यास जी ने प्रवेश किया तो अम्बिका ने डर कर ओँखें बन्द कर लीं, व्यास जी ने माता का प्रिय साधने के लिये उसके साथ समागम किया परन्तु काशीराज की कन्या ने भय से उनकी ओर न देखा, अन्तः व्यास जी के घर से निकलने पर उनकी माता ने उनसे पूछा कि बेटा क्या इस वधु से गुणवान पुत्र उत्पन्न होगा? इन्द्रियों के अतीत ज्ञानी सत्यवती के पुत्र व्यास जी ने माता की यह बात सुनकर कहा कि विधि पूर्वक जन्म लिया हुआ गर्भ में यह बालक सहस्र हाथियों के समान बलवान, विद्वान, राजर्षियों में श्रेष्ठ महाभाग, महावीर्यवान अति बुद्धिमान होगा, और वह महात्मा पुत्र उत्पन्न करेगा परन्तु माता दोष के कारण अन्धा होगा। पुत्र की यह बात सुनकर माता ने कहा कि हे तपोवन! अन्धा पुरुष कुल के योग्य भूषण नहीं हो सकता, इसलिए जाति कुल का रक्षक पितरों का वंश रखने वाला और कुरुवंश का राजा होने योग्य एक पुत्र और उत्पन्न करो। महायशस्वी व्यास जी इसे स्वीकार करके चले गये। समय आने पर अम्बिका ने ऋषि के वचनानुसार एक अन्धा पुत्र उत्पन्न हुआ देवी सत्यवती ने पहले की तरह पुत्र वधु की आज्ञा लेकर फिर ऋषि को बुलाया। महर्षि विधि के अनुसार अम्बालिका के पास आये। अम्बालिका उस ऋषि को देख कर पीली पड़ गई।
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सत्यवती को पुत्र व्यास ने उसको डरी हुई दुःखित और पीली देखकर कहा कि तुम मुझ को कुरूप देखकर पीली हो गयीं इसलिए तुम्हारा पुत्र भी पीला होगा वह पीला अर्थात् पांडु नाम से प्रसिद्ध होगा। ऋषि यह बात कहकर घर से निकलने पर सत्यवती ने उनसे सन्तान की बात पूछी और व्यास जी ने माता से कहा कि पुत्र पीला होगा। सत्यवती ने यह सुन कर फिर उनसे एक पुत्र की और प्रार्थना की, महर्षि ने वह भी स्वीकार करली। समय आने पर देवी अम्बालिक ने सुन्दर पांडु वर्ण एक कुमार उत्पन्न किया। फिर बड़ी वधु का ऋतुकाल आने पर सत्यवती ने उसको राजर्षि के लिए नियुक्त किया। परन्तु उसने ऋषि शरीर की दुर्गन्ध स्मरण कर उसका कहना नहीं माना और देव कन्या रूपी उस काशीराज पुत्री ने अप्सरा समान एक दासी को अपने आभूषणों से अलंकृत कर व्यास जी के पास भेज दिया। ऋषि के आने पर दासी ने उठकर उनको नमस्ते की और ऋषि की आज्ञानुसार काम किया। व्रतशील महर्षि उसके पास रहकर अति प्रसन्न हुए और ज्ञाते हुए कहा कि तुम्हारा दासीपन जाता रहेगा। तुम्हारे गर्भ में स्थित सन्तान धर्मात्मा और बुद्धिमानों में श्रेष्ठ होगी, व्यास जी के वीर्य से और उसके गर्भ से धृतराष्ट्र और पांडु के भाई विदुर ने जन्म लिया।
समागम समय आँखें मीचने पर धृतराष्ट्र अन्धे का जन्म हुआ। भय के कारण शरीर पीला पड़ जाने से पांडु (पीलिया रोगी) पुत्र जन्मा और निर्भय, प्रीतियुक्त, प्रसन्न चित्त और शान्ति पूर्वक विचारों से धर्मात्मा, नीतिज्ञ दूरदर्शी विद्वान विदुर ने जन्म लिया।
इसलिए समागम समय उत्तम सन्तान की इच्छा के लिए दम्पति को प्रसन्न चित्त, आनन्दमय, प्रीतियुक्त वातावरण में ही समागम करना उपयुक्त है, विपरीत दशा में नहीं। ऋतु काल में धर्म से गमन करने से सन्तान सौ और इससे भी अधिक वर्ष की आयुँ मोगती है।
इच्छानुसार सन्तान
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गर्भ स्थित न होने पर
गर्भ स्थित न होने के कारण और उसका उपचार
गर्भ स्थित न होने के अनेक कारण हैं। जिनमें से मुख्य यह हैं—
- १- गर्भाशय में मेध (चर्बी) का बढ़ जाना।
- २- गर्भाशय में शोथ (सूजन) का होना।
- ३- गर्भाशय में केशाद नाम के कीटों का प्रविष्ट हो जाना।
- ४- रजः और वीर्य का दूषित हो जाना।
- ५- वन्ध्यापन।
- ६- जनित इन्द्रियों का लघु या दीर्घ होना।
- ७- वीर्य में सन्तानोत्पादक कौट के अभाव का होना।
उपरोक्त व्याधियों का निराकरण इस प्रकार, करें—
१- गर्भाशय में मेध के बढ़ जाने से गर्भ द्वारा का मुख छोटा हो जाता है जिस कारण गर्भाशय में वीर्य नहीं पहुँच पाता ऐसी दशा में नारी रत्न चूर्ण का दो-तीन मास तक सेवन कराने से लाभ होगा (कुछ अनुभव में देखें प्रयोग नं. २५)।
२- गर्भाशय में शोथ का होना गर्भस्थित होने में बाधक है। ऐसी दशा में भपके से खींचा हुआ मकोय का जल १ तोला और अशोकारिष्ट एक तोला या पुनर्नवासव भोजन के पश्चात् दोनों समय तथा प्रातः गौ दूध के साथ चन्द्रप्रभा वटी की २ गोली। लगभग २-३ मास तक देने से रोग दूर होकर गर्भ स्थित हो जायगा।
३- केशाद नाम के कीटाणु सर के बालों को खा जाते हैं। ऐसी दशा में सर पर गंज नामक रोग हो जाता है। किसी भी
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असावधानी के कारण यह केशाद कीटाणु स्त्री के गर्भाशय में प्रविष्ट हो जायें तो यह गर्भ में गर्भित रजः वीर्य और भ्रूण को खा जाते हैं। इसी कारण गर्भ स्थित नहीं हो पाता। ऐसी दशा में रात्रि को सोते समय एक ताजा हरी मूली को भली प्रकार चाकू तथा जल से स्वच्छ करके स्त्री अपनी योनि में रखे। प्रातः निकालने पर आप देखेंगे कि मूली पर अनेक काले रंग के बारीक-बारीक कीटाणु लगे हुए हैं। यही केशाद नाम के कीटाणु हैं जो गर्भ में भ्रूण को खा जाते हैं। उस मूली को सावधानी के साथ दूर कहीं फेंक दें। इसी प्रकार मूली का निरन्तर प्रयोग करें। जब तक कीटाणु निकलने बन्द न हो जायें। जब इन कीटाणुओं से गर्भाशय स्वच्छ हो जायेगा तो निश्चय ही गर्भ स्थित हो जायेगा।
४- रजः वीर्य के दूषित हो जाने पर स्त्रियों के लिए सुपारीपाक और पुरुषों के लिए बानरी गुटका प्रयोग करना और ३ मास तक ब्रह्मचर्य से रहना उत्तम रहेगा। यह योग 'कुष्ठ अनुभव' में देखें।
५- बन्ध्यापन तो एक प्रकार से असाधारण अवस्था है जो सातवीं रात्रि में गर्भाधान करने का फल होता है। फिर भी प्रभु से याचना करते हुए स्त्री को नारी रत्न चूर्ण का (कुष्ठ अनुभव का प्रयोग नं. २५) ४-४ माशा प्रातः सायं जीवित बछड़े वाली गाय के दूध से ६ मास तक निरन्तर प्रयोग कराने से लाभ हो सकता है। यदि प्रभु की कृपा हुई तो अवश्य ही गर्भ स्थित होगा।
६- जनित इन्द्रियों की लघुता-दीर्घता का तो विवाह से पूर्व ही जान लेना उचित है। क्योंकि यदि स्त्री की योनि गहरी और पुरुष की इन्द्रिय छोटी होगी तो ना तो स्त्री ही सन्तुष्ट होगी और न ही वीर्य गर्भाशय तक पहुँचेगा और यदि स्त्री की योनि कम गहरी और पुरुष की इन्द्रिय लम्बी होगी तो स्त्री को अधिक कष्ट होने के कारण वीर्य अपने स्थान पर नहीं पहुँच सकेगा। इसलिए इसकी जानकारी विवाह से पूर्व करा लेना उचित रहता है। इसको भली प्रकार समझने और परीक्षा करने के लिए वात्सायन काम सूत्र
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आदि में स्त्री और पुरुषों की आकृतियों के चिन्ह दिये हैं। उनसे ही जनित इन्द्रियों के सम्बन्ध में ज्ञान प्राप्त करें।
७- जिस वीर्य में सन्तानोत्पादक कौटुम्ब का अभाव हो तो उस वीर्य से कदापि गर्भ स्थापित नहीं हो सकेगा। इसके लिए पुरुष को उचित है कि निम्न लिखित योग ३ मास तक निरन्तर सेवन करें। साथ में स्त्री सेवन का ३ मास तक परित्याग रखें। ऐसा करने से वीर्य में सन्तानोत्पादक कौटुम्ब बलवान होकर गर्भ स्थापित हो जायेगा।
भुने हुए बिनौलों का आटा ५० ग्राम, सलाव मिश्री पंजे की १० ग्राम, सफेद मूसली १० ग्राम, बीज बन्द १० ग्राम, तालमखाना १० ग्राम, लजवन्ती १० ग्राम, उटंगन १० ग्राम, कौंच बीज छिलका उतार कर १० ग्राम, शतावर १० ग्राम, गोखुर पहाड़ी १० ग्राम, पीपल की दाढ़ी २० ग्राम, सैमल की मूसली १० ग्राम, तोदरी सफेद १० ग्राम, तोदरी लाल १० ग्राम, साँठ १० ग्राम भूसी इसबगोल १०० ग्राम, २५० ग्राम मिश्री। भूसी को छोड़कर सबको बारीक कूट लें। ४ से ६ माशा तक दो समय दूध से लें।
गर्भ स्थित न होने पर
किन्हीं सज्जनों का विचार है कि यह आवश्यक नहीं कि जिस दिन गर्भाधान संस्कार के लिए निश्चय किया है उस दिन गर्भ स्थिति हो ही जाय। तो फिर उत्तम तिथि का निश्चय करके कैसे गर्भ स्थित हो सकता है।
प्रिय बन्धुओं! ऐसा नहीं है, जो निश्चित तिथि के दिन गर्भाधान किया जाय और गर्भ स्थित न हो। मैंने पूर्व की पंक्तियों में महाभारत काल के एक नियोग का दृश्य प्रस्तुत किया है। आप उसे पढ़कर देखें। उस घटना से तीन महत्वपूर्ण विषयों पर आश्चर्यजनक प्रकाश पड़ता है।
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प्रथम-पुत्र की कामना के लिए नियोग कराया था। सो तीनों बार पुत्रों का ही जन्म हुआ। दूसरे- गर्भाधान समय अम्बिका अम्बालिका और दासी की जैसी जैसी भावना बनी वैसी- वैसी सन्तान ने जन्म लिया। तीसरे- व्यास जी ने अम्बिका अम्बालिका और दासी के साथ केवल एक ही एक बार गर्भाधान कृत्य किया और उसी समय गर्भ स्थित हो गया।
प्रथम महत्त्वपूर्ण विषय यह सिद्ध हुआ कि पुत्र या पुत्री को अपनी इच्छानुसार जन्म दिया जा सकता है। दूसरे गर्भाधान समय पुरुष की अपेक्षा स्त्री के विचारों का बच्चे पर तत्काल प्रभाव पड़ता है और बच्चा वैसा ही बन जाता है। तीसरे निश्चित तिथि में ही केवल एक ही बार में गर्भाधान क्रिया द्वारा गर्भ स्थित हो सकता है। हाँ यह सम्भव हो सकता है कि अम्बिका अम्बालिका और दासी को पूर्व से ही किसी औषधि का प्रयोग कराया गया हो जिससे गर्भाशय वीर्य को तत्काल ग्रहण कर सके। रोग रहित स्त्री पुरुषों के लिए इसी आशय के प्रयोगों का उल्लेख करते हैं जो परीक्षित भी हैं।
स्वर्ण भस्म २ चावल, नागकेशर का चूर्ण १ माशा (यदि नागकेशर बंगाल की मिल जाय तो अति उत्तम है) दोनों को मिलाकर एक मात्रा बनी। जब स्त्री को मासिक धर्म होकर रक्त विकार गिर जावे और स्नान कर शुद्ध हो, जिस दिन गर्भाधान का विचार हो उस दिन तक जीवित बछड़े वाली गाय के दूध से प्रातःकाल स्त्री को सेवन करायें यह योग तत्काल गर्भ स्थापन होने में उत्तम साधक है।
अथवा
मकरध्वज स्वर्ण सिन्दूर १ माशा, सितोपलादि चूर्ण ३ माशा दोनों को खरल में डालकर भली प्रकार घोटें, एक रस हो जाने पर उसकी १० मात्रा बनालें। जब स्त्री को मासिक धर्म होकर रक्त विकार गिर जावे और स्नान कर शुद्ध हो उसी दिन से १० दिन इच्छानुसार सन्तान
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गर्भ धारण के तात्कालिक लक्षण
तक बिसौटा (अडुसा) सूखा २ तोला को एक पाव जल में रात्रि को भिगो दें और प्रातःकाल को अग्नि पर पकावें जब जल पकते-पकते एक छटीक रह जाय तो उतारकर छान लें ठण्डा हो जाने पर उसमें इच्छानुसार शहद मिलाकर उपरोक्त औषधि की एक मात्रा को लेकर शहद में अलग मिलाकर स्त्री को चटावें बाद में उपरोक्त काढ़े को पिला दें। यह योग गर्भ स्थापन में शीघ्र ही वीर्य को ग्रहण करने में सहायक होता है।
अन्य विधिवत् प्रयोग
जिन स्त्रियों को मासिक धर्म न्यून मात्रा में निरन्तर कई वर्षों से होता रहा है। ऐसी स्थिति में गर्भ स्थित नहीं हो सकता ऐसी स्त्रियों के लिए निम्नलिखित प्रयोग अति उत्तम है।
शरद ऋतु में मासिक धर्म के पश्चात् प्रातःकाल और रात्रि में गाय का दूध १ पाव में ६ माशा फलघृत मिलाकर देना चाहिए और दोनों समय भोजन के पश्चात् १ तोला दशमूलारिष्ट १ तोला मकोय के अर्क के साथ देना चाहिए तथा ग्रीष्म ऋतु में प्रातःकाल और रात्रि में दो-दो गोली चन्द्रप्रभा वटी गाय के दूध से और दोनों समय भोजन के पश्चात् १ तोला पत्रांगासव १ तोला मकोय के अर्क के साथ देना चाहिए। इसके पश्चात् दोनों ऋतुओं में उपरोक्त ऋतु के अनुसार औषधि सेवन कराकर जब अगला मासिक धर्म आये तो उससे ७ दिन पूर्व से १ गोली रजः प्रवर्तनी वटी की रात्रि को गर्भ जल से देनी चाहिए तथा जिस दिन मासिक धर्म आरम्भ हो उस दिन रात्रि को रजः प्रवर्तनी वटी की २ गोली देकर पश्चात् सब औषधियाँ देनी बन्द कर दें। जिन दिनों रात्रि को रजः प्रवर्तनी वटी का प्रयोग करायें उन दिनों रात्रि की और औषधि बन्द कर देनी चाहिए। जब रजः विकार गिर जावे और स्त्री स्नानादि से पवित्र हो जाय तो पूर्व लिखित विधि से स्वर्ण भस्म नागकेशर के योग का प्रयोग करायें या मकरध्वज स्वर्ण सिन्दूर इच्छानुसार सन्तान
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सितोपलादि चूर्ण वाला योग सेवन करायें तथा इस बीच में प्रातःकाल की अन्य औषधि बन्द रखें तथा भोजन के पश्चात् और रात्रि की औषधि चलती रहेगी। तत्पश्चात् निश्चित तिथि के दिन गर्भाधान प्रकरण में लिखित विधि से गर्भाधान करें। ध्यान रहे इस मास के अन्त में रजः प्रवर्तनी वटी का सेवन नहीं कराना चाहिए। अगले मास मासिक धर्म आने के समय तक प्रतीक्षा करें। यदि गर्भ स्थित न हुआ हो तो पुनः पुनः इसी रीति का प्रयोग करें। अवश्य ही गर्भ स्थित होगा। उपरोक्त क्रम के अनुसार स्त्री में रजः की उत्पत्ति में अधिकता हो सकती है, जिस कारण युग्म रात्रि में भी गर्भाधान करने पर कन्या के जन्म लेने की सम्भावना हो सकती है। इस कारण पुरुषों के लिए उचित है कि वे गर्भाधान की तिथि से कम से कम २ मास पूर्व इस वीर्य वर्धक योग का निम्न प्रकार अवश्य ही सेवन करें। प्रातः काल प्रयोग नं० ३३ के साथ स्वर्ण बंग। तीसरे प्रहर बानरीगुटका प्रयोग नं० ३१। रात्रि में चन्द्रप्रभावटी और शीत वीर्य गुटका, दोनों की दो-दो गोली दूध के साथ सेवन करें। इस प्रकार निरन्तर २ या ३ मास तक सेवन करने से वीर्य की मात्रा रजः से अधिक हो जायगी। (देखें कुछ अनुभव में ३१ और ३३)
बंगला अशोक की छाल को दरदरा कट लें, उसमें से ५० ग्राम छाल, २५० ग्राम पानी और २५० ग्राम दूध। सबको मिलाकर मन्द मन्द आग पर पकायें। जब पानी जल जाय तो उतार कर छान लें और रुचि के अनुसार मीठा मिलाकर स्त्री को सेवन करायें। यदि दो समय सेवन करा दें तो अति उत्तम है। इसका प्रयोग ३ मास तक कराने से गर्भाशय सम्बन्धी समस्त दोषों का निवारण हो जाता है, इसके पश्चात् चौथे मास में मासिक धर्म के चौथे दिन प्रातःकाल शिवलिंगों के ७ बीज सांबुत ही बिना दौत लगाये ताजे जल से निगल लें। पाँचवें दिन ९ बीज, छठे दिन ११ बीज, सातवें दिन १३ बीज, आठवें दिन १४ बीज, नवें
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दिन १५ बीज, दसवें दिन १६ बीज, ग्यारहवें दिन १७ बीज सेवन करायें और रात्रि को इन्हीं ८ दिन नित्य स्वर्ण भस्म नागकेशर के योग का प्रयोग गाय के दूध से करायें तथा ८, १०, १२ रात्रि में गर्भाधान करे निश्चित रूप से सफलता मिलेगी। ध्यान रहे अब अशोक की छाल के दूध का प्रयोग नहीं कराना है। यदि गर्भ धारण न हुआ हो तो शिलिंगी और स्वर्ण भस्म नागकेशर के योग का फिर सेवन करायें। इसी प्रकार २ या ३ मास के प्रयत्न से निश्चित सफलता मिलेगी।
गर्भ धारण के तात्कालिक
लक्षण
योनि में वीर्य का सम्यक रीति से ग्रहण, तृप्ति, कोख में भारीपन, फड़कन, समागम के पश्चात् योनि से वीर्य का बाहर न निकलना, हृदय में प्रसन्नता, नेत्रों में आलस्य, तृष्ण, ग्लानि और रोमांच होना। ये लक्षण गर्भ धारण होने के साथ स्पष्ट अनुभव होते हैं।
गर्भ रक्षा
किसी भी सभ्य देश के स्वास्थ्य स्तर का सर्वोत्तम अनुमान उस देश के निवासियों के जन्म-आयु और मृत्यु सम्बन्धी आँकड़ों से जाना जा सकता है। शिशु-मृत्यु संख्या और मातृ मृत्यु संख्या देश के सामाजिक जीवन के सच्चे दर्पण हैं।
हमारे देश में शिशुओं की मृत्यु संख्या और देशों की अपेक्षा अत्याधिक है। देश का भविष्य इन शिशुओं पर ही अवलम्बित है।
इच्छानुसार सन्तान
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हमारे स्वास्थ्य की नींव सच्ची पृथिवी से बहुत पहले पड़ती है। जब बालक गर्भ में होता है तब उसकी माँ को कैसा भोजन मिला है, प्रसव व्यवस्था कैसी हुई है, ये सभी बातें भावी सन्तान के स्वास्थ्य को प्रभावित करती हैं।
प्रकृति के अनुसार गर्भावस्था में माँ और शिशु दोनों के लाभ का विधान है। माँ से शिशु का पोषण होता है और प्रसव के उपरान्त माँ पहले से अधिक स्वस्थ और सुन्दर हो जाती है परन्तु ऐसा तभी सम्भव है जबकि गर्भवती स्त्री के स्वास्थ्य, भोजन, रहन-सहन और प्रसव आदि पर उचित ध्यान रखा जाये तथा सभी आवश्यक सुविधायें उपलब्ध हों।
गर्भवती स्त्री के रहन-सहन, भोजन, वंशवाद और प्रसव व्यवस्था का ध्यान और उचित सावधानी भावी शिशु और माता के स्वास्थ्य के लिये अत्यन्त आवश्यक हैं।
गर्भिणी स्त्री के लिए वर्जित कर्म-उत्तर दिशा को सिर करके सोने से गर्भाश्रया नाड़ी गर्भध्रुव में लिपट कर गर्भ का संहार कर देती है। रात्रि में भ्रमण करने से उन्मादी। कलह करने से मृगी रोग वाली। समागम करने से दुर्बल, निर्लज्ज और नपुंसक सन्तान। शोक से उपरोक्त स्वल्प शरीर, अल्पायु चिन्तित, दूसरों को कष्ट देने वाली, ईर्ष्यालु सन्तान। क्रोध से क्रोधी कपटी। अधिक सोने से अधिक सोने वाली, मूर्ख, मन्दगिन वाली। मीठा अधिक खाने से प्रमेही, गूँगी, अति स्थूल रक्त पित्त नेत्र रोग, चर्मरोगी। इसी प्रकार लवण, कवैली आदि वस्तुओं का भी अधिक प्रयोग न करें।
देखा गया है गर्भिणी स्त्रियों को मिट्टी आदि खाने में अधिक रुचि हो जाती है। इससे शिशु को पांडु रोग होकर यकृत और प्लीहा निर्बल हो जाते हैं। यदि इसके स्थान पर ऐसी दशा में स्त्रियों को बंसलोचन दे दिया जाय तो वह उत्तम रहेगा। एक तो वह मिट्टी जैसा स्वाद देगा और दूसरे गर्भ में शिशु को कैलशियम पूरी मात्रा में मिल सकेगा।
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वीरेन्द्र गुप्तः
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भोजन- गर्भावस्था में भोजन पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है। यदि आप चाहते हैं गर्भावस्था का समय नितान्त निरापद रहे तथा माँ और भावी शिशु दोनों ही स्वस्थ रहें तो माँ को उचित भोजन मिलना आवश्यक है। इस समय स्त्री को केवल अपने शरीर के लिए ही उपयुक्त आहार की आवश्यकता नहीं होती, परन्तु उसे गर्भस्थ बालक के शरीर निर्माण के लिए भी भोजन के सभी मूल तत्वों की प्रचुर मात्रा मिलनी आवश्यक है।
इसके अतिरिक्त भोजन में प्रोटीन, खनिज तथा विटामिनों की उपयुक्त मात्रा पर भी विशेष ध्यान देना चाहिए।
प्रोटीन- गर्भस्थ बालक के शरीर के तन्तुकोषों के निर्माण के लिए प्रोटीन अधिक आवश्यक है।
कैलशियम- बच्चे की हड्डियों के निर्माण के लिए आवश्यक है। इसकी न्यूनता से माता तथा शिशु दोनों की हड्डियाँ तथा दंत निर्बल हो जाते हैं।
लोहा- बच्चे के रक्त कण निर्माण करता है। इसके अभाव से माता तथा बालक दोनों में रक्त अल्पता का रोग हो जाता है। जिससे बच्चों को सूखा रोग भी लग जाता है।
उपरोक्त तीनों पदार्थ दूध में अधिक पाये जाते हैं। इसलिए गर्भिणी को कम से कम १ लीटर दूध नित्य लेना चाहिए। यह आवश्यक नहीं कि दूध, दूध ही रूप में पिया जाय, उसके स्थान पर दही, छाछ, दूध की खीर, दूध का दलिया आदि प्रकारों से भी प्रयोग में लिया जा सकता है। और इस प्रकार से दूध की तरफ से अरुचि भी नहीं होगी।
विटामिन- गर्भ स्थित बालक तथा माता के शरीरों के सभी अंगों को परिपुष्ट करने के लिए सभी विटामिनों की आवश्यकता है। यह विटामिन प्रचुर मात्रा में पते वाले शाक, अन्य शाक, छिलके सहित दालें और चोकर सहित आटे में मिलते हैं। इसलिए इनका प्रयोग होना आवश्यक है।
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वीरेंद्र गुप्त
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उषाः पान- शय्या से उठते ही ईश्वर का स्मरण करने के पश्चात् अच्छी प्रकार से मुख स्वच्छ करके एक गिलास ताजा जल में १ कागजी नींबू, संतरों का रस तथा टिमाटर का रस जिसकी रुचि हो और रुचि अनुसार मीठा तथा नमक भी मिलाया जा सकता है, मिलाकर पीना चाहिए। इससे वमन बेचैनी आदि में शान्ति मिलती है और पेट साफ होकर शौच खुलकर आती है।
प्रातराश- प्रातःकाल पानी में भोगे हुए या सूखे ही मुनक्का ७ नग, अंजीर २ नग, बादाम ५ नग और ऋतु अनुसार दही या दही की लससी तथा उष्ण दूध। रुचि अनुसार।
मध्याह्न भोजन- चोकर सहित आटे की रोटी, छिलकेदार दाल पत्ते वाले शाक, दही छाछ तथा मक्खन या घी।
तीसरे पहर- ऋतु अनुसार फल।
सायंकाल- उपरोक्त भोजन कुछ कम मात्रा में।
रात्रि को सोने से एक घण्टा पूर्व दूध या ऋतु अनुसार फलों का रस।
अन्य सावधानी- केवल इतना खाओ जितना रुचि पूर्वक खाया जा सके। धीरे-धीरे भली प्रकार चबा-चबा कर भोजन करो। अधिक गर्म, खट्टा, चरपरा, कबला मत खाओ। एक ही समय बहुत-सा मत खाओ जिससे पेट तन जाये। रखा हुआ और बासी खाना मत खाओ। गर्भावस्था में जल का प्रयोग अधिक करना चाहिए। दिन में कम से कम पाँच छः बार जल पीना चाहिए। परन्तु भोजन करते समय जल कम मात्रा में भोजन के मध्य में ही पीना उचित है।
प्रथम मास में गर्भिणी औंटा हुआ गाय का दूध ठण्डा करके जो किञ्चित उष्ण हो पान करे और दिन में थोड़ा-थोड़ा कई बार पान करे, प्रातः सायं सात्विक, हल्का भोजन करे। दही में सौंठ और ब्राह्मी का समान भाग चूर्ण ३ माशा का विशेष सेवन किया करें जिससे सन्तान अति बुद्धिमान रोग रहित शुभ गुण वाली होती है।
इच्छानुसार सन्तान
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वीरेन्द्र गुप्तः
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दूसरे मास में पलास का पंता, गिलोय, ब्रह्मी और सौठ का समान भाग चूर्ण ४ माशा दूध से सेवन करें, या इन चारों औषधियों को दूध में डाल कर पका छान कर सेवन करें।
तीसरे चौथे तथा पाँचवें मास में दूध में मधु मिलाकर पियें। छठे तथा सातवें मास में दूध में घी मिलाकर उपरोक्त चूर्ण का सेवन करें।
आठवें मास से दूध में १ माशा बादाम का शुद्ध तेल मिलाकर दें और तेल नित्य ॥ माशा बढ़ाते जायें, यहाँ तक कि तेल १० माशा तक पहुँच जाय, फिर १ माशा नित्य कम करके ४ माशे तेल नित्य देते रहें।
नवें मास में शुद्ध तिल के तेल का फोया योनि में रखें इससे बच्चा सुगमता से बिना किसी कष्ट के उत्पन्न होता है।
जब बच्चा गर्भ में बढ़ता है। उस समय स्त्री की इच्छा भिन्न-भिन्न प्रकार के भोजनों को खाने की होने लगती है। इस इच्छा को रोकने से गर्भस्थ बच्चे पर बुरा प्रभाव पड़ता है और साथ में अखाद्य और अप्राकृतिक भोजन का भी। जैसे मिट्टी आदि। हम पीछे लिख आये हैं कि वंसलोचन मिट्टी जैसा स्वाद देता है, इससे मिट्टी खाने वाली स्त्रियों की तृप्ति हो जाती है और बालक भी गौर वर्ण का और पुष्ट होता है।
वस्त्र- गर्भावस्था में स्त्री को अपने वस्त्रों पर भी विशेष ध्यान देना चाहिए। इन दिनों बहुत कसे वस्त्र नहीं पहनने चाहिए। चोली और पेटीकोट ढीले बाँधने चाहिए। रात्रि को चोली और पेटीकोट को खोल देना अच्छा है। वस्त्र ऋतु अनुसार होने चाहिए। शरद ऋतु में ठण्ड से बचना, ग्रीष्म ऋतु में लू आदि से बचना तथा वर्षा ऋतु में सील तथा सीले वस्त्रों से बचना आवश्यक है। इन दिनों ऊँची एड़ी की चप्पल तथा फिसलने वाली चप्पल नहीं पहनने चाहिए इससे गिर जाने का भय रहता है।
इच्छानुसार सन्तान
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गर्भावस्था में मैथुन
विश्राम- गर्भावस्था में उचित विश्राम की उतनी हो आवश्यकता है जितनी नियमित भोजन की। प्रतिदिन तीसरे पहर कम से कम १ घण्टा पूर्ण विश्राम करना चाहिए। लेटते समय पैर नीचे न हों। पैरों के नीचे तकिया लगा लेना उचित है। इसके अतिरिक्त यदि किसी समय थकान अनुभव हो और विश्राम की इच्छा हो तो उस समय विश्राम अवश्य करना चाहिए।
रात्रि होने पर अधिक समय तक नहीं जागना चाहिए। और ८ घण्टे का पूर्ण निद्रा लेनी उचित है। मासिक धर्म को तिथियों में तो पूर्ण विश्राम करना चाहिए।
जो स्त्रियाँ गर्भधारण के पश्चात् आराम ही करती हैं उनके बच्चे निर्बल होते हैं और जो बराबर परिश्रम करती रहती हैं उनके भी बच्चे निर्बल होते हैं। इसलिए आरम्भ में हल्का परिश्रम अर्थात् घर का काम-काज करना परन्तु भारी वजनदार वस्तु को उठाना ऊँचे पर रखी हुई वस्तु को उचक कर उतारना, लम्बी यात्रा करना, जीने पर अधिक चढ़ना-उतरना उखरू बैठना आदि कार्य नहीं करना चाहिए और अन्त के तीन महीनों में जितना अधिक से अधिक हो सके उतना विश्राम करना चाहिए। इस प्रकार से सन्तान पुष्ट होगी। सायं समय वायु सेवन के लिए जाना चाहिए।
स्नान- नित्य ताजे जल से स्नान करना चाहिए तथा रुचि न होने पर स्नान नहीं करना चाहिए। यह आवश्यक नहीं कि ठण्डे ही जल से स्नान किया जाय यदि रुचि हो तो किंचित गर्म जल से भी स्नान किया जा सकता है। ध्यान रहे गर्म जल में ठण्डा जल मिलाकर स्नान नहीं करना चाहिए।
स्तन- गर्भ स्थित होने के पश्चात् स्तनों में वृद्धि होने लगती है इस कारण चोली ढीली रखनी चाहिए और स्नान समय स्तनों को भी भली प्रकार जल से स्वच्छ करके अच्छी प्रकार पोछ लेना आवश्यक है।
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गर्भिणी स्त्री को प्रति दिन पलास (ढाक) का एक पत्ता गाँदुघं के साथ पिलाओ तो उसके अति पराक्रमी पुत्र होगा और गर्भपात होने से रोक्ता है।
जिन स्त्रियों का गर्भपात हो जाता हो या बच्चा जन्मते ही या २,३ वर्ष का होकर जाता रहता हो तो ऐसी अवस्था में गर्भ स्थित होने के दूसरे मास से अन्त तक स्त्री को पुत्र जीवक के २ फलों की माँग प्रातः निहार मुँह ताजे जल से दें।
अथवा
कस्तुरी १ माशा, वंशलोचन ३ माशा, केशर ४ माशा, गुलाब पुष्प का जीरा ४ माशा, जीरा सफेद ४ माशा, तुलसी पत्र दो तोला, जाँबुत्री २ तोला, धतुरे का बीज १ नग, सहदेई पत्र ४ तोला। समस्त औषधियों को बारीक पीसकर १,१ रत्ती की गोलियों बनाकर छाया में सुखा लें।
प्रयोग विधि- जब निश्चय हो जाय कि गर्भ स्थित हो गया है तब से स्त्री को ४० दिन पर्यन्त २-२ गोली प्रातःकाल जल से दें और बालक उत्पन्न होने तक १-१ गोली खिलाते रहें। तत्पश्चात् बालक को आधी गोली प्रति दिन जल में घिसकर उस समय तक देते रहें जब तक बालक माता का दूध पीना न छोड़े।
लाभ- गर्भपात नहीं होता, बाल्यकाल में बच्चा मृत्यु के भय से बचा रहता है, बालक स्वस्थ और प्रसन्न रहता है।
★★★
इच्छानुसार सन्तान
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गर्भावस्था की भावना
गर्भावस्था में मैथुन
शास्त्रों ने गर्भावस्था में समागम करने के लिए निषेध किया है। इससे गर्भ में बच्चे के अंगों को हानि पहुँचती है। जब बच्चे के अंग बन जाते हैं तो उसके अंग समागम करने से विकृत हो जाते हैं और बच्चा बुद्धिहीन होकर कामी पुरुष के रूप में सामने आता है ऐसे गर्भ के बच्चे ब्रह्मघर्ष का पालन नहीं कर सकते। यही कारण है कि भारत में ब्रह्मघर्ष के लिए स्थान नहीं। 'हमने देखा है कि हमारे देश में ऐसे-ऐसे दम्पति हैं जो बच्चे के जन्म होने से केवल २४ घण्टे पूर्व तक स्त्री समागम करते रहे हैं।' और जब बच्चा जन्म से ही रोगी होकर शरीर निर्बल, निकम्मा, जीर्ण होने के कारण उसे जीवात्मा छोड़ कर अन्तरिक्ष को चली जाती है। तो उस समय ईश्वर को दोष देते हैं या अपने भाग्य को कोसते हैं। परन्तु यह नहीं विचारते कि यह सब हमारे ही कर्म से ऐसा हुआ है। मैंने अपने कई मित्रों और अन्य कई व्यक्तियों से इस विषय पर चर्चा की, उन्होंने उत्तर दिया कि क्या करें हम अपने को वश में नहीं रख सकते जब स्त्री को देखा और हमारा रंग पलटा। स्मरण रहे जिस मास में जो जो अंग प्रत्यंग बच्चे के बनते हैं यदि उस मास में रति किया होती है तो उस-उस अंग-प्रत्यंग को क्षति पहुँचे बिना रह नहीं सकेगी।
हाय! भारतवर्ष देश तेरी यह दशा कि आजकल के दम्पति एक वर्ष के लिए भी स्त्री से अलग नहीं रह सकते। जबकि पशु भी गर्भित पशु से समागम नहीं करते। जब बुद्धिहीन योनिर्पी पशुओं में इतनी समझ है तो हम बुद्धिमान होकर भी ऐसा नहीं कर सकते। धिक्कार है ऐसे जीवन पर जो कृकर्मों द्वारा अपना शरीर, भविष्य और जीवन को नष्ट करें, और साथ में आने वाली सन्तति को भी नष्ट भ्रष्ट करें। क्या इतिहास को पढ़कर भी
इच्छानुसार सन्तान
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वीरेन्द्र गुप्तः
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शिक्षा ग्रहण नहीं कर सकते? इस घटना को पढ़ो और विचारो, कि हमारे पूर्वज कितने दृढ़ संकल्पी थे।
आपने संस्कृति साहित्य में आचार्य कव्यट का नाम सुना होगा। जब इनका विवाह होकर पत्नी घर पर आई। आते ही आचार्य कव्यट ने अपनी पत्नी के सम्मुख यह प्रश्न रखा। 'देवी मैं महाभाव्य लिख रहा हूँ मेरी इच्छा है कि जब तक भाव्य लिखकर पूर्ण न हो जाय उस समय तक हम दोनों ब्रह्मचर्य का जीवन व्यतीत करें।' पत्नी ने उत्तर दिया प्रभु! जैसी आपकी इच्छा, मैं आपकी आज्ञा के विरुद्ध नहीं जा सकती। आचार्य कव्यट उत्तर पाकर हर्षित हुए और अपने लेखन कार्य में निर्विघ्न लग गये।
आचार्य कव्यट को भाव्य लिखते लिखते इतना अधिक समय व्यतीत हो गया कि उन दोनों के केश पक कर खेत हो गये। आचार्य कव्यट का भाव्य पूर्ण हो चुका। दोनों दम्पति भूमि की कोमल हरियाली पर लेटे हुए हैं। चन्द्रमा की चाँदनी चहूँ और छिटक रही है। इस शीतल सुन्दर चन्द्र प्रपात में दोनों के खेत केश रजत सम चमक रहे हैं। कैसा सुहावना सुन्दर और आकर्षक समय है। दोनों दम्पति के चेहरों पर प्रसन्नता शान्ति और निर्भयता छटक रही है। ऐसे सुहावने समय में आचार्य कव्यट ने प्रेम पुरित मुखड़े को पत्नी की ओर कर अपना हाथ बढ़ाते हुए कहा, 'प्रिय! भाव्य पूर्ण हो गया। मैं आज तुम्हें अपना प्रेम प्रदान कर सकता हूँ।' देवी पति के यह वचन सुनकर प्रसन्न चित्त हो बोलीं- 'प्रभु! वैसे तो मेरा सर्वस्व आपका ही है, प्रभु! मेरी और आपकी थोड़ी सी ही आयु शेष रही है। मेरी इच्छा है कि इस थोड़ी सी आयु में यह शरीर यदि अक्षुता ही रहे तो उत्तम है।' आचार्य कव्यट ने इसे सहर्ष स्वीकार किया, इस प्रकार दम्पति का सारा जीवन अक्षुता ही व्यतीत हो गया।
यह था हमारे भारतवर्ष का गौरवपूर्ण जीवन, जो विवाह के पश्चात् भी दो शरीर आजीवन अक्षुत रहे। आज यह कहा
इच्छानुसार सन्तान
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वीरेन्द्र गुप्तः
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जाता है कि जब हमारी पत्नी हमारे कमरे में लेटी हो तो हम अपने को अंकुश में नहीं रख सकते। कितना परिवर्तन है। इसी लिए यह विश्व शिरोमणी भारतवर्ष अधोगति को पहुँच कर पराधीनता को बेड़ियों में जकड़ा गया। समय के परिवर्तन से आज हम स्वतन्त्र हो गये। अब हमें संयम के साथ अपना जीवन व्यतीत करना चाहिए और कम से कम गर्भ स्थिति हो जाने के पश्चात् जब तक बच्चा माता का दूध पीता रहे अर्थात् कम से कम ४.६ मास का बच्चा न हो जाय तब तक ब्रह्मचर्य का जीवन व्यतीत करें। जिससे सन्तान निरोगी और दीर्घजीवी हो।
गर्भावस्था की भावना
गर्भवती स्त्री के प्रति पति का उत्तरदायित्व अधिक बढ़ जाता है। उसे अपनी पत्नी को हर प्रकार से सांत्वना और धैर्य देते रहने की आवश्यकता है। इन दिनों पहले की अपेक्षा सर्वाधिक प्रेम, स्नेह और सहानुभूति की आवश्यकता है। पत्नी की किसी भी प्रकार से पहले की अपेक्षा इस समय में उपेक्षा नहीं होनी चाहिए। वरन् घर के अन्य सदस्यों को भी उसके साथ अधिक वात्सल्य पूर्ण व्यवहार करना चाहिए और उसे इस बात का महत्व अवगत करा देना चाहिए कि वह संसार का सर्वाधिक गौरवपूर्ण पद प्राप्त करेगी।
गर्भवती स्त्री जैसे वातावरण में जैसे चित्रों का अवलोकन करेगी, जैसी उसकी दिनचर्या होगी वैसे ही विचारों के बालक को जन्म देगी।
वीर अभिमन्यु को कौन नहीं जानता। जिसने कभी युद्ध में अस्त्र-शस्त्र नहीं उठाया। वह अभिमन्यु अकेला ही द्रोणाचार्य के रचित चक्रव्यूह को खण्डित करने के लिए निर्भय अग्रसर हुआ।
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