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इच्छानुसार संतान

Ichhanusar Santan

बीरेन्द्र गुप्त (Virendra Gupta) द्वारा

स्रोत: Mumukshu Bhawan Varanasi Collection - इच्छानुसार सन्तान · अश्विनी कुमार, प्रकाशन मन्दिर / वीरेन्द्र नाथ (उद्गम)

Devanagarihipublished250 पृष्ठ

जीवन भवन का सुदृढ़ एवं सुपुष्ट होना सम्भव है तथापि गृहस्थ आश्रम को सब आश्रमों में गुरु माना है। मनु महाराज का कहना है—

यथा नदी नदाः सर्वे सागरे यान्ति संस्थितिम्। तथैवाश्रमिणः सर्वे गृहस्थे यान्ति संस्थितिम्॥

‘जिस प्रकार सब नदी और नद समुद्र में स्थिति को प्राप्त होते हैं उसी प्रकार सभी आश्रम वाले गृहस्थ से भरण-पोषण पाने के कारण उसी पर स्थित हैं।’

जिस गृहस्थ पर अपने भरण-पोषण के साथ-साथ अन्य आश्रमियों के भरण-पोषण का भी दायित्व है उसे कितना शक्ति सम्पन्न होना चाहिये यह किसी भी मतिमान से अगोचर नहीं। वस्तुतः दुर्बल इन्द्रिय वालों को इस आश्रम में प्रवेश का अधिकार ही नहीं। जब एक गृहस्थ पर इस प्रकार भार है तो उसे अपनी शक्ति को संचित करने एवं सुरक्षित रखने का सदा ध्यान होना चाहिये। शारीरिक शक्ति मानसिक विकास तथा आत्मिक उन्नति को लिये नियत दिनचर्या एवं समुचित आहार-विहार ही एकमात्र कारण है। इस पर हमारे प्राचीन आर्य ग्रन्थों ने बड़ा बल दिया है। महर्षि दयानन्द सरस्वती ने चिरप्रस्तुत आश्रम व्यवस्था को पुनः जागृत करने के लिये प्राचीन गुरुकुल प्रणाली का शुभ-सन्देश देश को दिया। प्रथम आश्रम में ब्रह्मचर्य व्रत पालन पूर्वक नियत दिनचर्या का सतत अभ्यासी बालक जब गृहस्थ आश्रम में प्रवेश करेगा तो वह सद्गृहस्थ सिद्ध होगा। अन्यथा गृहस्थ के पुनीत कर्तव्य से विमुख या वंचित ही बना रहेगा। इन्हीं सब बातों को दृष्टिगत रखते हुए श्री वीरेन्द्र गुप्त ने प्रस्तुत पुस्तक का प्रणयन किया है।

सुयोग्य लेखक ने अनेक ग्रन्थों का स्वाध्याय कर तथा अनुभव विद्वज्जनों का सम्पर्क ग्रहण कर जिस कठिन परिश्रम के साथ इस पुस्तक को लिखा है वह सतशः स्तुत्य है। सादी भाषा में जिन जीवनोपयोगी अनुभवों को अंकित किया है वे वस्तुतः

इच्छानुसार सन्तान

वीरेन्द्र गुप्तः

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गाहस्थ जीवन को सुखमय एवं सम्पन्न बनाने वाले हैं। प्रत्येक विषय को पूर्ण रूप से स्पष्ट करने में लेखक ने अपने अनुपम कौशल का परिचय दिया है।

यद्यपि प्रस्तुत पुस्तक में अधिकतर प्राचीन विचारधारा एवं आचार पद्धति का ही विशेष रूप से उल्लेख किया है परन्तु नवीनतम विचारधारा पर भी यथास्थान उचित प्रकाश डाला है। सन्तति निरोध का प्रश्न आज की उत्तरोत्तर बढ़ती हुई जनसंख्या को रोकने के लिये महत्वपूर्ण बन गया है। इसके अनेकानेका आधुनिकतम उपाय प्रचलित हैं जिनसे संयम की भावना तो उपेक्षित हो जाती है। प्रत्युत विलासिता की भावना और बढ़ जाती है जिसके कारण हमारे बुद्धि, बल और स्वास्थ्य को अत्यन्त हानि पहुँचाती है। परन्तु इस पुस्तक के कुशल लेखक ने सन्तति निरोध के विषय पर जो शिष्ट सम्मत अपना विचार प्रस्तुत किया है वह भूरि-भूरि प्रशंसनीय है।

परमपिता परमात्मा से प्रार्थना है कि लेखक ने जिस हित भावना से इस पुस्तक को प्रकाशित किया है वह इसके अधिकाधिक प्रचार से सफल सिद्ध हो तथा नवयुवकों से निवेदन है कि वे इस पुस्तक के अध्ययन एवं मनन से अपने जीवन को तदनुरूप बनाने की सफल चेष्टा करें।

विदुषां वशवंद—

भगवत् सहाय शर्मा

(आचार्य)

पुरादाबाद

१५-५-५८

इच्छानुसार सन्तान

वीरेन्द्र गुप्तः

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द्वितीय संस्करण के प्रकाशन पर

आचार्य जी का चिर आशीर्वाद

प्रत्येक देश की अपनी एक मौलिक संस्कृति होती है जिसके आधार पर ही उस देश की उन्नति एवं अवन्ति निर्भर रहती है। धर्मप्राण भारतवर्ष ने जहाँ सुसंस्कृत एवं सुव्यवस्थित वर्णश्रम पद्धति द्वारा अपना ऐहलीकिक एवं पारलौकिक जीवन समुन्नत तथा उत्कृष्ट बनाया, वही उसने प्राणी मात्र में सर्वथा श्रेष्ठ मानव के हितार्थ पुरुषार्थ चतुष्टय का विधान कर उसके अनुष्ठान पर पूरा-पूरा बल दिया। धर्मार्थ, काम, मोक्ष, रूप पुरुषार्थ चतुष्टय में धर्म को सर्व प्रथम स्थान दे उससे अनुशासित अर्थ-काम की यथावत् उपलब्धि एवं उपभुक्ति के अनन्तर मोक्ष तक पहुँचने का सरल पथ प्रशस्त बना दिया। पर इसके साथ-साथ भारत के प्राचीन मनीषियों ने यह स्पष्ट घोषणा कर दी-

ऋणानि त्रीण्यपाकृत्य मनो मोक्षे निवेशयेत्॥

अर्थात् ऋषि ऋण, देव ऋण तथा पितृ ऋण, इन तीनों ऋणों को चुकाकर ही मोक्ष की ओर प्रवृत्त होना चाहिए। इन तीनों ऋणों में पितृ-ऋण से मुक्ति सुसन्तति के द्वारा ही मिलती है। कवि कुलगुरु कालिदास ने अपने प्रसिद्ध महाकाव्य रघुवंश में लिखा है- न संयतस्तस्य बभूव ऋषितुर्विसर्जयेदयं सुत-जन्म-हर्षितः। ऋणभिधानात् स्वयमेव केवलम् तदा पितृणां मुमुक्षु सन्धननात्॥

अर्थात्- प्रजा रक्षक राजा दिल्लीप के रघु-जन्म के समय कोई बन्दी न था, जिसे पुत्रोत्पत्ति के हर्ष में बन्धन मुक्त कर देता, आँपतू वह स्वयं ही पितृ-ऋण नाम के बन्धन से मुक्त हो गया, शुद्ध वंशज-सन्तति दोनों कुलों का उद्धार कर देती है, और वंश की शुद्ध उत्तम सन्तति पर आश्रित है। अतः वैयक्तिक एवं

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वीरेन्द्र गुप्तः

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सामाजिक उन्नति के लिए सन्तति का सुसंस्कृत होना परम आवश्यक है।

गृहस्थ आश्रम, जो सब आश्रमों का भरण-पोषण आदि के द्वारा गुरु माना गया है, उसकी सफलता सन्तानोपलब्धि होने पर ही मानी जाती है अतः सभी सदगृहस्थ सन्तान प्राप्ति के लिए परम उत्सुक रहते हैं और उसकी प्राप्ति होने पर अपने आपको धन्य एवं कृतार्थ समझते हैं। यद्यपि यह भावना गृहस्थ मात्र में पायी जाती है, पर तदर्थ उत्तम आचार-विचार की क्षमता सबमें नहीं होती और बिना उत्तम आचार-विचार के सन्तति का उत्तम बनना नितान्त असम्भव है। मानव समाज में कुछ ऐसे व्यक्ति पाये जाते हैं जो अपने सत्संस्कार-प्रेरित स्वाध्याय जन्म अनुभवों से सभी को लाभान्वित बनाने की तन-मन से सदा चेष्टा करते हैं।

हमारे परम प्रिय श्री वीरेन्द्र गुप्तः जी इसी प्रवृत्ति के व्यक्ति हैं। आपको आर्य परिवार में जन्म के कारण स्वाध्याय प्रवृत्ति दाय रूप में समुपगत हुई है और आपने अपने स्वाध्याय-जन्म अनुभवों को पुस्तक रूप देकर सभी का हित सम्पादित किया है। अतः आप इस प्रयास के लिए सर्वथा स्तुय्य हैं। आज पाठकों के समक्ष 'इच्छानुसार-सन्तानोत्पत्ति' का द्वितीय संस्करण 'इच्छानुसार सन्तान' के रूप में प्रस्तुत है। प्रथम संस्करण को सहृदय विज्ञ-वर्ग ने सादर ग्रहण करते हुए, उसकी उपादेयता प्रमाणित कर, अपने सदाशय एवं उदाराशय का जो परिचय दिया वह भूरि-भूरि सराहना के योग्य है, क्योंकि उन्हीं के उदाराशय के कारण हमारे गुप्तःजी उस पुस्तक का द्वितीय संस्करण प्रकाशित करने के लिये त्वतः बाध्य हुए, जिसके फलस्वरूप यह संस्करण पूर्व संस्करण की अपेक्षा अनेक परिष्करण एवं संवर्धन के साथ पाठकों की सेवा में उपस्थित है।

इस संस्करण में कतिपय नवीन उपयोगी परिवर्धन दृष्टिगत गते हैं। नक्षत्रों, ऋतुओं एवं अयनों का गर्भस्थिति पर जो प्रभाव पड़ता है उसका अत्यन्त मार्मिकता के साथ शास्त्र सम्मत विवेचन इच्छानुसार सन्तान

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वीरेन्द्र गुप्तः

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किया गया है। सम रत्नि और विषम रत्नि के गर्भाधान से पुत्र एवं पुत्री का जन्म, सर्व सम्मत होते हुए भी कभी-कभी रजोवीर्य के न्यूनोधिक्य के कारण पूर्वोक्त सिद्धान्त को अपवाद रूप में दृष्ट होता रहता है, इस पर भी कुशल लेखक ने पर्याप्त प्रकाश डाला है। पर अपवाद पर ही केवल दृष्टि न रखकर शास्त्रीय सिद्धान्त का ही पालन करना सर्वथा श्रेयकर है।

प्रस्तुत पुस्तक के अतिरिक्त हमारे प्रिय गुप्तः जी ने और भी अनेक पुस्तकें लिखकर प्रकाशित की हैं जो आर्य सिद्धान्तों से सर्वात्मना ओत-प्रोत तथा एक दूसरे की पूरक हैं। जीवन के आरम्भिक काल में इस प्रकार की पुस्तक-रचना वास्तव में लेखक की पुनीत संस्कृति की ही परिणति है, क्योंकि—

‘प्रथमे वयसि यः शान्तः स शान्त इति मेमतिः

शुद्धात् जीवन के आरम्भ में जो शान्ति की चर्चा चलावे वही वस्तुतः सच्चा शान्ति मार्गी है।

परम पिता परमात्मा से प्रार्थना है कि हमारे उदीयमान युवक लेखक को ऐसी शक्ति, धृति और सत्प्रतिभा प्राप्त हो जिससे आप अपनी इस दिशा में सर्व हित सम्पादनार्थ उत्तरोत्तर अग्र बनते रहें तथा अपने कार्य में सदा कृत कार्य होते रहें।

इत्योभशम्

विदुषां त्रिधेमः—

भगवत् सहाय शर्मा

(आचार्य)

पुरादाबाद

इच्छानुसार सन्तान

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वीरेन्द्र गुप्तः

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दो शब्द

दो शब्द

कहते हैं— श्रीकृष्ण जैसी सन्तान को जन्म देने के लिए माता-पिता को वसुदेव-देवकी बनने की आवश्यकता है और यह तब हो सकता है जब उनको बनाने वाले माता-पिता भी वैसे ही गुणों वाले हों।

यह बातें अपने को अकर्मण्य और कर्महीन बना देने की हैं। वसुदेव-देवकी को क्या परमात्मा ने कोई विशेष शक्ति प्रदान की थी जिससे उन्होंने कृष्ण को जन्म दिया? और अब हमारे में वह शक्ति नहीं जिससे हम श्री कृष्ण जैसे को जन्म दे सकें? हमें वास्तविकता को विचारना होगा।

वास्तव में वसुदेव-देवकी इच्छानुसार सन्तान को जन्म देने विज्ञान के पूर्ण ज्ञाता थे, यही उनकी विशेष शक्ति थी। इस विज्ञान को आप भी समझ सकते हैं। यदि सन्तान के जन्म में इसी प्रकार की सावधानी बरत कर आचरण किया जाय तो आपकी सन्तानभी महापुरुषों की कोटि में गिनी जा सकती है।

मुझ से कई महानुभावों ने कहा— “आपने अपनी पुस्तक में उत्तम सन्तति निर्माण के जो साधन दिये हैं वास्तव में वह ठीक ही होंगे, परन्तु यह सब बातें सत्यगुण की हैं। कलियुग में इन बातों को मानकर कैसे चल सकते हैं।”

प्रिय पाठक गण वास्तविकता भी यही है और व्यवहारिक रूप में यह दाख रहा है. परन्तु उत्तम सन्तान तप द्वारा ही प्राप्त होती है, उसे भी समझना चाहिए। पूर्ण ब्रह्मचर्य, उत्तम विवाह, शुद्ध भोजन, मासिक धर्म, ऋतु स्नान एवं गर्भ स्थापन के समय की भावना, सोलह कला, तिथी, वार, नक्षत्र, गर्भ स्थिति में भोजन, दिनचर्या आदि सभी की जानकारी आवश्यक है।

इच्छानुसार सन्तान

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वीरेन्द्र गुप्ता:

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यदि यह मान भी लिया जाय कि आप सभी साधन नहीं अपना सकते तो भी जितने अंश में आप अपनायेंगे उतने ही अंश में अपनी सन्तान में उत्तमता की वृद्धि आपको प्राप्त होगी। जरा सोच कर देखिये कि इसका फल अगली पीढ़ी में और अधिक अच्छा प्राप्त होगा, तब आप स्वयं सोचेंगे कि महामानव या महापुरुष को जन्म देना सम्भव है।

जिस प्रकार नसीरी के डन्डे पर एक के बाद दूसरे पर चढ़ते हुए ऊपर चढ़ जाते हैं उसी प्रकार देश की सन्तति भी प्रत्येक पीढ़ी में उत्तरोत्तर उत्कृष्टता को प्राप्त होती जायगी। परन्तु जब आप ही अपनी सन्तान को उत्तम बनाने में किसी भी अंश में अग्रसर नहीं होंगे तो फिर देश की सन्तति कैसे उत्कृष्टता को प्राप्त करेगी। इसलिए, 'हे देश भक्तों! मातृ भूमि के सच्चे सपुतों! अकर्मण्यता को त्याग कर कर्मवान् बनते हुए सर्वांश में नहीं तो किसी भी अंश में सन्तति सुधार की ओर अग्रसर हो। सर्वांश की दुहाई देते हुए कुछ भी न करने वालों की अपेक्षा सफलता के पथ पर किसी भी अंश में बढ़ने वाले श्रेष्ठ होते हैं।

जिस प्रकरण में किसी औषधि के उपयोग की आवश्यकता समझी गई है उसे उस प्रकरण में अधिकत कर दिया है, साथ में औषधि निर्माण एवं प्रयोग विधि को भी अधिकत कर दिया है। किसी किसी स्थान पर निर्मित औषधि के प्रयोग की बात आई है। वह निर्मित औषधियाँ आपको 'गुरुकुल कांगड़ी फार्मसी हरिद्वार' से तथा उनकी नगर शाखाओं से प्राप्त हो सकती हैं।

प्रस्तुत पुस्तक में उत्तमोत्तम सन्तति निर्माण के सभी साधनों को पूर्ण विवेचनात्मक दृष्टि और विस्तार से समझाया गया है। यदि फिर भी कोई बात समझ में न आये या कोई शंका हो तो, उसे समझने के लिए पत्र लिखें, साथ में उत्तर के लिए टिकट भेजें। पत्र हिन्दी भाषा में तथा पूर्ण पते सहित लिखें।

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वीरेन्द्र गुप्तः

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हमारे पास कई पाठकों के पत्र पुस्तक के नाम पर पुनः विचार करके पुस्तक के नाम में संशोधन करने के लिए आये हैं। हमने पहले से ही पुस्तक का नाम बहुत सोच विचार कर रखा है। पुस्तक का नाम 'यथा नाम तथा गुण' की संगति के अनुरूप ही है। परन्तु हमने पाठकों की भावना का आदर करते हुए पुस्तक के नाम में कुछ संशोधन कर दिया है जो कि मूल नाम 'इच्छानुसार सन्तानोत्पत्ति' है उसके स्थान पर 'इच्छानुसार सन्तान' कर दिया है।

इसके लिखने में जिन ग्रन्थों का सहयोग लिया है उन सभी ग्रन्थों के उल्लेख यथा स्थान अंकित किये गये हैं। जिन ग्रन्थों के स्वाध्याय से प्रेरित होकर तथा इस विषय की पुस्तक का अभाव अनुभव करके लिपि-बद्ध किया है उन सभी ग्रन्थकारों का आभारी हूँ।

आर्य जगत के सुविख्यात विद्वान् आचार्य श्री भगवत् सहाय जी ने भूमिका लिखकर इसकी शोभा को द्विगुणित कर दिया है। आर्य पुरोहित वेद पाठी श्री पं. गोपीनाथ जी तथा मास्टर सुमेर सिंह जी ने विशेष सहयोग तथा अनुकूल सामग्री के संग्रह में योगदान कर मेरा हाथ बटाया है।

मैं उक्त सभी महानुभावों का हृदय से आभारी हूँ। यदि भारतीय जनता सन्तति सुधार में कुछ भी पग उठायेगी, तभी मैं अपने प्रयास को सफल समझूँगा।

वीरेन्द्र गुप्तः

इच्छानुसार सन्तान

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वीरेन्द्र गुप्तः

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लेखक परिचय

लेखक परिचय

नाम - वीरेन्द्र गुप्त:

जन्म - श्रावण शुक्ल ६, संवत् १९८४, बुद्धवार,

३ अगस्त, १९२७ ई॰, मुरादाबाद

गृहस्वामिनी - श्रीमती राजेश्वरी देवी

सम्प्रति - व्यवसाय

सम्मान :-

१- १४ सितम्बर, १९८२ राष्ट्रभाषा हिन्दी प्रचार समिति, मुरादाबाद।

२- ३ अक्टूबर, १९८२ आर्य समाज मण्डी बांस, मुरादाबाद।

३- १४ सितम्बर, १९८८ श्री यशपाल सिंह स्मृति साहित्य शोध पीठ, मुरादाबाद।

४- ३० सितम्बर, १९८८ अहिवरण सम्मान, पुरालेखन केन्द्र, मुरादाबाद।

५- २ जनवरी, १९९२ साहू शिवशक्ति शरण कोठीवाल स्मारक समिति, मुरादाबाद द्वारा साहित्य सम्मान।

६- ७ जनवरी, १९९६ अभिनन्दन समिति द्वारा नागरिक अभिनन्दन एवं अभिनन्दन ग्रंथ भेंट तथा सामूहिक अभिनन्दन पत्र।

७- ६ मार्च १९९९ अखिल भारतीय माथुर वैश्य महासभा द्वारा राष्ट्रीय आधिदेशन ग्वालियर में (साहित्य) समाज शिरोमणी सम्मान।

८- ९ मई १९९९ विराट आर्य सम्मेलन पश्चिमी उत्तर प्रदेश मेरठ (आर्य शिरोमणी) सम्मान।

९- २६ जनवरी २००० माथुर वैश्य मण्डल, मुरादाबाद द्वारा (साहित्यिक शताब्दी पुरुष) सम्मान।

१०- २५ फरवरी २००० (अमृत महोत्सव) के अवसर पर संस्कार भारती, मुरादाबाद द्वारा अभिनन्दन।

११- १५ सितम्बर २००० (राष्ट्रीय हिन्दी सेवा सहस्राब्दी सम्मान) सहस्राब्दी

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वीरेन्द्र गुप्त:

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विश्व हिन्दी सम्मेलन नई देहली के द्वारा। संयुक्त राष्ट्र सघ (यूनेस्को) आदि से सम्बद्ध।

१२- १७ सितम्बर २००० 'ज्ञान मन्दिर पुस्तकालय, रामपुर' हिन्दी दिवस पर सम्मान।

१३- १४ सितम्बर २००३ हिन्दी साहित्य सदन द्वारा हिन्दी साहित्य सम्मान।

१४- २६ जनवरी २००७ माथुर वैश्य मण्डल मुरादाबाद द्वारा युग पुरुष सम्मान।

१५- २८ अक्टूबर २००७ प्रेरणा मन्च मुरादाबाद द्वारा साहित्य उत्कृष्ट सेवा सम्मान।

१६- ३० दिसम्बर २००७ अखिल भारतीय साहित्य कला मन्च एवं कबीर शान्ति मिशन द्वारा कबीर ज्योति सम्मान।

उल्लेख :-

१- हिन्दी साहित्य का इतिहास ले० डॉ० आलोक रस्तोगी एवं श्री शरण, देहली १९८८।

२- 'आर्य समाज के प्रखर व्यक्तित्व' दिव्य पब्लिकेशन केसरगंज अजमेर १९८९।

३- आर्य लेखक कोष दयानन्द अध्ययन संस्थान जयपुर १९९१।

४- एशिया-पैसिफिक 'हू इज हू' (खण्ड ३) देहली २०००।

५- गंगा ज्ञान सागर भाग- ४ पृष्ठ २३ सन् २००२।

प्रकाशित कृतियाँ :-

१- ईच्छानुसार सन्तान, २- लोकटि (उपन्यास), ३- पुत्र प्राप्ति का साधन,

४- पाणि ग्रहण संस्कार विधि, ५- How to be get a son, (अनुवादित)

६- सीमित परिवार, ७- बोध सन्धि, ८- धार्मिक चर्चा, ९- कर्म चर्चा, १०-

सस्ती पूजा, ११- वेद में क्या है? १२- गर्भावस्था की उपासना, १३- वेद

की चार शक्तियाँ, १४- कामनाओं की पूर्ति कैसे, १५- नींव के पत्थर,

१६- यज्ञों का महत्व, १७- ज्ञान दीप, १८- The light of learning

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वीरेन्द्र गुप्तः

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(अनुवादित) १९- दैनिक पंच महायज्ञ, २०- दिव्य दर्शन, २१- दस नियम, २२- पतन क्यों होता है, २३- विवेक कब जागता है, २४- ज्ञान कर्म उपासना, २५- वेद दर्शन, २६- वेदांग परिचय, २७- संस्कार, २८- निराकार साकार के स्वरूप का विदर्शन, २९- मुनूर्ध्व, ३०- अदीनास्थ्याम, ३१- गायत्री साधन, ३२- नव सम्बत्, ३३- अनुषक् (कहानियाँ), ३४- विवेकशील बच्चे, ३५- जन्म विवस्, ३६- करवा चौध, ३७- योग परिणति, ३८- पर्वमाला, ३९- वात्सल्यविवस, ४०- छलकपट और वास्तविकता, ४१- श्रद्धा सुमन, ४२- माधुर वैर्यों का उद्गम, ४३- ईश महिमा, ४४- मन की अपार शक्ति, ४५- नयन भास्कर, ४६- युधिष्ठिर यक्ष गीता, ४७- वेद उद्गीत, ४८- दर्पण, ४९- राष्ट्रीय गौरव, ५०- वातायन।

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वीरेन्द्र गुप्त

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वंदना

॥ओ३म्॥

अथ सन्तानानुशासनम्

कन्दना

अन ओजिष्ठमा भर च्यु म्मस्मम्यमङ्गिगो। प्र नो राये पनीयसे रत्निस वाजाय पन्थाम्॥

सामवेद १/९/१

सत्य धन की. और ले जाने वाले हे अग्ने! हमें तेजस्वी ज्ञानधन पहुँचा, प्रशंसनीय ऐश्वर्य और उन्नति की ओर गति के लिए मार्ग तैयार (प्रदर्शित) करना ही तुम्हारा कार्य है।

त्वं नश्चित्र ऊर्या वसो राधासि चोदय।

अस्य रायस्त्वमग्ने रथीरसि विद्या गार्ध तुवे तु नः॥

सामवेद १/४/७

हे विलक्षण! रक्षण शक्ति से बसाने वाले। आनन्द साधनों को हमारी ओर भेज। हे शक्ति सम्पन्न! इस समृद्धि का तू अधिष्ठाता एवं वाहक है, हमारी सन्तान के लिए भी कुछ आधार प्राप्त कराओ।

अद्या नो देव सवितः प्रजावत्सावीः सौभागम्।

परा दुष्चण्यं सुव॥

सामवेद २/३/७

हे प्रकृशमान प्रेरक! आप हमारे नाना सन्तान वितान युक्त सौभाग्य को उत्पन्न कर और दुष्ट संकल्प की कारणीभूता तन्त्रा को दूर कर।

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वीरेन्द्र गुप्तः

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मनुष्य

मनुष्य

संसार के समस्त जीवधारियों में मनुष्य ही एक ऐसा जीव है जो कर्म करने में स्वतंत्र और फल भोगने में परतंत्र है। बाकी जितने जीव हैं वह कर्म करने में स्वतंत्र नहीं, फल भोगने में स्वतंत्र हैं। अर्थात् मनुष्य योनि मुख्य रूप से कर्म करने के लिए है और योनिर्था मुख्य रूप से फल भोगने के लिए।

ते ह्यादपरितापफलाः पुण्यापुण्यहेतुत्वात्।।

योगदर्शन २/१४

अर्थ- वे (जन्म, आयु और भोग) हर्ष और शोकरूप फल को देने वाले होते हैं, क्योंकि उनके पुण्यकर्म और पाप कर्म दोनों ही (पूर्वजन्म का) कारण हैं।

इसीलिए मनुष्य अपने कर्मों द्वारा ऊँचा उठ सकता है और कर्मों द्वारा नीचे भी गिर सकता है। संसार में कौन मनुष्य ऐसा है जो यश, कीर्ति और ऐश्वर्य नहीं चाहता हो। हर कोई चाहता है, कि मुझे यश प्राप्त हो, कीर्ति बढ़े और ऐश्वर्यशाली भी हूँ। पर वह यत्न करने पर भी नहीं हो पाता। क्योंकि उसे नहीं मालूम कि मुझे कौन-सा ऐसा कार्य करना चाहिये जिससे यश और कीर्ति प्राप्त हो।

संसार में ईश्वर, जीव और प्रकृति अनदि हैं। जब मनुष्य प्रकृति की ओर अग्रसर होता है तो वह भोगवाद में अर्थात् सांसारिक माया जाल में फँस जाता है। तब उसे काम, क्रोध और मोह रूपी शत्रु घेर लेते हैं। जैसे ओइम् शब्द 'अ' 'उ' और 'म' से मिलकर बना है। 'अ' ईश्वर का द्योतक है। 'उ' जीव का और 'म' प्रकृति का द्योतक है। जब 'उ' रूपी जीव 'म' रूपी प्रकृति की ओर अग्रसर हो तो जीव अवनति को प्राप्त होता है, जैसे

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वीरेन्द्र गुप्तः

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'उ' की मात्रा 'म' के नीचे लगती है। यदि 'उ' रूपी जीव 'अ' रूपी ईश्वर की ओर अग्रसर हो तो जीव उन्नति को प्राप्त होता है जैसे 'उ' की मात्रा 'अ' के ऊपर लगती है अर्थात् 'अ' और 'उ' मिलकर ओ हो जाता है। इसी प्रकार जब जीव प्रकृति की ओर चलता है तो बजाय ऊँचा उठने के नीचे ही गिरता जाता है और जब वह ईश्वर की ओर को अग्रसर होता है तो वह जीव उत्कृष्टता को प्राप्त होता जाता है और शनैः शनैः बढ़ता हुआ परम सौरभ्य को प्राप्त होता है। इसलिए मनुष्य जीवन को सफल बनाने के लिए सुख और शान्ति से जीवन व्यतीत करने के लिए मनुष्यों को चाहिए कि वह भोगों में न फँसकर अपना जीवन सादा, वासनाओं से रहित एवं सत्यनिष्ठ बनावे।

यत्तदग्रे विषमिव परिणामेऽमृतोपमम्। तत्सुखं सात्त्विकं प्रोक्तमात्यबुद्धिप्रसादजम्।।

गीता १८/३७

अर्थ- वह (सुख) प्रथम साधन के आरम्भ काल में (यद्यपि) विष के सदृश भासता है (परन्तु) परिणाम में अमृत के तुल्य है, इसलिए जो ईश्वर विषयक बुद्धि के प्रसाद से उत्पन्न हुआ सुख है वह सात्त्विक कहा गया है।

विषयेन्द्रियसंयोगाद्यत्तदग्रेऽमृतोपमम्।

परिणामे विषमिव तत्सुखं राजसं स्मृतम्।।

गीता १८/३८

अर्थ- जो सुख विषय और इन्द्रियों के संयोग से होता है वह (यद्यपि) भोगकाल में अमृत के सदृश भासता है (परन्तु) परिणाम में विष के सदृश है (बल, वीर्य, धन, उत्साह आदि का नाशक है) इसलिए वह सुख राजस कहा गया है।

पश्चिमी सभ्यता में वह व्यक्ति महान है जिसकी अधिक से अधिक आवश्यकताएँ हों। परन्तु भारतीय सभ्यता में महान वह है जिसकी आवश्यकताएँ कम से कम हों। क्या सादा पहिनावा

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वीरेन्द्र गुप्तः

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पहिरने वाले, सादा भोजन पाने वाले पूज्य बापू महात्मा गांधी महान व्यक्ति नहीं थे? क्या विश्व में उन्हें महानता की दृष्टि से नहीं देखा जाता था? महानता पहिनावे की टीपटाप से नहीं मिलती है। महानता तो विद्या धर्म और सत्यनिष्ठ जीवन से ही मिलती है।

संसार में एक समुदाय ऐसा भी है जो कहता है कि संसार में मनुष्यों के लिए अन्न, वस्त्र की ही आवश्यकता है और ईन्द्रिय भोगों के लिए स्त्री की। इससे इतर धर्म कर्म आदि कुछ नहीं। इस समुदाय ने प्रमुखता अन्न, वस्त्रादि, भौतिक वस्तुओं को ही दी है। ज्ञात होता है कि इस प्रकार के समुदाय को जन्म देने वाला भोगवादी और ज्ञान शून्य व्यक्ति था कहावत है (प्रत्यक्षकिम् प्रमाणम्) प्रत्यक्ष को प्रमाण क्या। जब बच्चा माता के गर्भ में आता है तब उसके जन्म से ठीक ३ मास पूर्व ही परमेश्वर माता के स्तनों में दूध भेज देता है। यह नहीं कि ईश्वर केवल भारत की या मनुष्यों की ही माताओं को दूध भेजता है वरन् संसार भर की माताओं को और समस्त जीव जन्तुओं की माताओं को भी बच्चों के जन्म से पूर्व ही दूध भेज देता है।

नाहारं चिन्तयेत्मात्रो धर्मयेकं हि चिन्तयेत्।

आहारो हि मनुष्याणां जन्मना सह जायते॥

चाणक्य नीति १२/१८

अर्थ- बुद्धिमान पुरुष भोजन की चिन्ता न करे, किन्तु एक धर्म की ही चिन्ता करे। भोजन तो मनुष्य-जन्म के साथ ही उत्पन्न होता है।

प्राकृतिक प्रमाण, माता के स्तन में दूध का आना और चाणक्य जैसे विद्वान के कथन से प्रतीत होता है कि मनुष्य को अन्न वस्त्र की चिन्ता कदाचित् करनी ही नहीं चाहिए, उसे तो धर्म की ही चिन्ता करनी चाहिए। इसका अर्थ यह नहीं कि मनुष्य धन का संघव न करे। मनुष्य धन को धर्म से उल्लब्ध करे और धर्म से ही व्यय करे। देखा गया है कि जब मनुष्य पर धन

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वीरेन्द्र गुप्तः

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अधिक बढ़ जाता है तो वह प्रमादी होकर मद्यपान, पर-स्त्री गमन आदि दोषों में प्रसित हो जाता है और उसी में उसका सर्वनाश भी हो जाता है। सच्चे देश भक्त श्री स्वामी दयानन्द जी सरस्वती सत्यार्थ प्रकाश के ११वें समुल्लास में लिखते हैं- 'और यह संसार की स्वाभाविक प्रवृत्ति है कि जब बहुत सा धन असंख्य प्रयोजन से अधिक होता है तब आलस्य, पुरुषार्थ रहितता, ईर्ष्या, द्वेष विषयासक्ति और प्रमाद बढ़ता है। इससे देश में विघ्ना सुशिक्षा नष्ट होकर दुर्गुण और दुष्ट व्यसन बढ़ जाते हैं।' क्योंकि जीवनेत्यान के लिए शास्त्रों ने चार शब्द कहे हैं। १. धर्म २. अर्थ ३. काम और ४. मोक्ष। जब मनुष्य इन चारों पदार्थों को साथ लेकर चलोगा तभी प्रमाद रहित होकर उत्तमता को प्राप्त हो सकेगा न कि बीच की दो बातों को लेकर (अर्थ और काम को)। अधिकांश मनुष्यों की धारणा है कि मनुष्य धन से ही बड़ा होता है। यह बात सत्य नहीं। ही धर्म के साथ धन ऐसा होता है जैसे सोने में सुगन्ध। जो मनुष्य यह विचारते हैं कि धन से ही मनुष्य बड़ा बनता है वह भ्रम में हैं देखो उन महापुरुषों को। क्या वह धन से बड़े बने अथवा कर्म से।

आपने बाल्मीकि ऋषि का नाम सुना है। जिन्होंने रामायण नाम का ग्रन्थ लिखा है। क्या वह धनी थे, यदि आप उनकी जीवनी उठाकर पढ़ें तो पता चलेगा कि वह पहले एक लुटेरे डाकू थे। जब उनका प्रारब्ध उदय हुआ तो उन्हें एक सन्यासी की संगत मिली और वह ऋषि पद पर पहुँच गये। अब आप कहेंगे कि उनके प्रारब्ध में ही ऐसा लिखा था इसलिए वह ऋषि बन गये। मेरे भाई! प्रारब्ध भी तो आप ही की कमाई है। मनुष्य जो कर्म आज करेगा वह कर्म कल संचित होकर प्रारब्ध रूप में सामने आयेगा। उसी को भाग्य और पिछले कर्म कहते हैं।

यथा धेनुसहस्रेषु वत्सो गच्छति मातरम्। तथा यच्च कृतं कर्म कर्तारमनु गच्छति॥ १३/२४

इच्छानुसार सन्तान

२३

वीरेन्द्र गुप्तः

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अर्थ- जैसे हजारों गायों की विद्यामानता में बछड़ा माता ही के निकट जाता है, वैसे ही जो कुछ कर्म किया जाता है वह कर्ता को ही मिलता है। अर्थात् जो कर्म करेगा वही फल भोगेगा दूसरा नहीं।

तभी तो कहा है कि मनुष्य को कर्तव्य कर्म करते हुए सौ वर्ष तक जीना चाहिए।

कूर्वन्ने वेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः।

एवंतर्विं नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे।।

यजुर्वेद ४०/२

अर्थ- इस लोक में अपने कर्तव्य कर्म करते हुए ही सौ वर्ष जीने की इच्छा करना चाहिए। यही तेरे लिए एक मार्ग है इससे दूसरा कोई मार्ग नहीं, कर्तव्य कर्म करने से मनुष्य में दोष नहीं होते। इस जगत में परम पुरुषार्थ करते हुए ही मनुष्य को दीर्घ जीवन प्राप्त करने की इच्छा करनी चाहिए। पुरुषार्थमय जीवन व्यतीत करना ही मनुष्य का परम धर्म है। कर्तव्य कर्म करने से ही सब दोष दूर हो जाते हैं और मनुष्य निर्दोष होकर उत्तमता को प्राप्त होता है।

जबकि आज का कर्म प्रारब्ध, भाग्य के रूप में हमारे ही सामने आता है तो फिर क्यों न अच्छे कर्म करें जिससे प्रारब्ध भी अच्छा बने। अच्छे कर्म जिसे कर्तव्य कर्म भी कहते हैं करने के लिए धर्म तथा ईश्वर का सहारा लेना ही पड़ेगा। ईश्वर के चिन्तन से बुद्धि पवित्र होकर ही कर्म अकर्म का विचार कर सकोगी।

धनानि भूमौ पशवश्च गोष्ठे,

नारी गृह द्वारि सखा रमशाने।

देहरिचतायां परलोक मार्गं,

धम्मानुगो गच्छति जीव एकाः।

इच्छानुसार सन्तान

२४

वीरेन्द्र गुप्तः

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धन धरा के बीच सारा ही गड़ा रह जायगा। पशु भी बँधे रह जायंगे जब कूँच का दिन आयेगा।। नार घर के द्वार तक ही साथ देगी लोक में। मित्र दल मरघट से आगे साथ नहीं दिखलायेगा।। देह भी तेरी चिता के बीच जल-भुन जायेगी।। यह दृश्य आगे का तुझे क्या चेत में नहीं लायेगा।। एक वस ध्रुव धर्म ही सच्चा सखा है अन्त का। जोड़ इस में प्रेम अपना नित नये सुख पायेगा।।

बिना धर्म कर्म के मनुष्य पशवत् है।

येषां न विद्या न तपो न दानं, न चापि शीलं न गुणो न धर्मः। ते मृत्युलोकं भुवि भारभूता, मनुष्य रूपेण मृगाश्चरन्ति॥

चाणक्य नीति १०/७

अर्थ- जिन लोगों को न विद्या है, न तप है, न दान है, न शील है, न गुण है, और न धर्म है, वे संसार में पृथ्वी का भार रूप होकर मनुष्य रूप में मृग (पशु) फिर रहे हैं। क्योंकि-

आहार निद्रा भय मैथुनानि, समानि चैतानि नृणां पशूनाम्। ज्ञानन्तराणामधिको विशेषो, ज्ञानेन हीनाः पशुभिः समानाः॥

चाणक्य नीति १७/१७

अर्थ- भोजन, निद्रा, भय और मैथुन मनुष्य और पशुओं में समान ही हैं। मनुष्य में केवल विशेष ज्ञान ही अधिक है। ज्ञान से रहित मनुष्य पशु के समान है।

अपि चेदसि पापेभ्यः सर्वेभ्यः पापकृतमः। सर्वं ज्ञान प्लवेनैव वृजिनं संतीरिष्यसि॥

गीता ४/१६

इच्छानुसार सन्तान

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वीरेन्द्र गुप्तः

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अर्थ- यदि (तू) सब पापियों से भी अधिक पाप करने वाला है (तो भी) ज्ञान रूप नौका द्वारा निःसन्देह सम्पूर्ण पापों को अच्छी प्रकार तज सकेगा।

न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते।

तत्त्वयं योगससिद्धः कालेनास्मिन् विन्दति॥

गीता ४/३८

अर्थ- इस संसार में ज्ञान के समान पवित्र करने वाला निःसन्देह (कृष्ठ) भी नहीं है उस ज्ञान को कितने काल से अपने आप समतत्त्वबुद्धि रूप योग के द्वारा अच्छी प्रकार शुद्धात्मः कारण हुआ पुरुष (अपने आपको शुद्ध) आत्मा (के रूप में) अनुभव करता है।

ईश्वर आराधना से धर्म, धर्म से ज्ञान, ज्ञान से सुकर्म, और सुकर्मों से प्रारब्ध (भाग्य) बनता है। फिर तो पूरा विश्वास हो जाता है कि मनुष्य अपने भाग्य का स्वयं निर्माता है। इसलिए अच्छे कर्म करना ही मनुष्य का धर्म है।

पावमानीर्यो अध्येत्युषिभिः सम्भूतं रसम्।

तस्मै सरस्वती दुहे क्षीरं सर्पिर्मधुदकम्॥

ऋग्वेद ९/६७/३२

अर्थ- जो ऋषियों द्वारा सम्पादित, ज्ञानमय अन्तःकरण को पवित्र करने वाली ज्ञानमयी ऋचाओं का अध्ययन करता है, वेदवाणी और ज्ञानमय प्रभु उसको दूध घी, मधु, जल के तुल्य ऐश्वर्य, बल आनन्द और अभ्युदय प्रदान करता है।

य स्वाध्यायमधीतेशब्दं विधिना नियतः शुचिः।

तस्य नित्यं क्षारत्वेष पयो दधि घृतं मधु॥

मनु २/१०७

अर्थ- जो पुरुष एक वर्ष पर्यन्त विधियुक्त नियम से पवित्र हांकर स्वाध्याय करता है (पढ़ता है) उसके लिए वह (स्वाध्याय) दूध, दही, घी और मधु को वर्षाता है।

इच्छानुसार सन्तान

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वीरेन्द्र गुप्तः

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कर्म प्रधान विश्व रचिराखा

विश्वपति ने कर्म को ही प्रधान माना है, जो जैसे कर्म करता है वैसे ही फल पाता है।

विद्या के सूर्य प्रज्ञा चक्षु श्री दण्डी गुरु विरजानन्द जी के माता-पिता बचपन में ही स्वर्ग सिधार गये थे। इनके ५ वर्ष की आयु में चेचक निकली जिस कारण इनके नेत्र जाते रहे। स्वभाव तेज होने के कारण भाई-भावज से रुष्ट होकर १४वर्ष की आयु में घर से निकल गये। ४ वर्ष तक देशाटन करते रहे। इस भ्रमण से अनुभव हुआ कि बिना ज्ञान के मनुष्य पशु समान है, इसलिए विद्या पढ़कर ज्ञान प्राप्त करना चाहिए। विद्या प्राप्ति के लिए गुरु की खोज में लगे। यत्न करने पर भी जब कोई अच्छा गुरु नहीं मिला तब चिढ़कर अपने स्वभाव के कारण विद्याध्ययन का दृढ़ संकल्प करके बस्ती से दूर गंगा किनारे बैठ गये।

तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु। यजुर्वेद ३४/१

वह मेरा मन शुभ संकल्पों से युक्त हो।

संकल्पमूलः कर्मावै यज्ञः संकल्पभवाः।

ब्रतानि यमधर्माश्च सर्वे संकल्पजाः स्मृताः॥

मनु २/३

अर्थ- (अमुक कर्म से यह इष्ट फल प्राप्त होगा, इसको संकल्प कहते हैं। फिर जब पूरा विश्वास होता है तब) संकल्प से उसके करने की इच्छा होती है, यथादि सब संकल्प ही से होते हैं। और व्रत, नियम, धर्म ये सब संकल्प ही से होते हैं।

अर्थात् संकल्प बिना कुछ नहीं होता।

सायंकाल के समय एक सन्यासी उधर से निकला उसने इस बालक को एक वृक्ष के नीचे बैठे देखा, चेहरे पर तेज चमक रहा था। सन्यासी ने मन में कहा, मालूम होता है कि यह बालक होनहार विद्वान् होगा। सन्यासी ने बालक से इस तरह एकान्त में इच्छानुसार सन्तान

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वीरेन्द्र गुप्तः

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