जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
१५४ [ २१५४ नाग ने गरुड को गरुड न समझ उसके कंधे पर हाथ रख दिया। गरुड ने मुड़कर देखा कि मेरे कंधे पर हाथ किसने रखा ? उसने देखा कि नाग है। नाग ने भी जब गरुड को देखा तो उसे जान का डर हुआ। वह नगर से निकल नदी के रास्ते भाग गया। गरुड ने भी उसे पकड़ने के लिए पीछा किया। उस समय बोधिसत्त्व तपस्वी थे। वे उसी नदी के किनारे पर्णशाला में रहते हुए दिन की थकावट मिटाने के लिए नहाने का वस्त्र पहन वल्कल-छाल को बाहर छोड़ नदी में उतर स्नान कर रहे थे। नाग ने सोचा इस प्रव्रजित की सहायता से जान बचा सकूँगा। उसने अपना असली रूप छोड़ मणि की शक्ल बना वल्कल के अन्दर प्रवेश किया। गरुड़ ने पीछा करते हुए उसे वहाँ घुसा देख वल्कल के प्रति गौरव होने से उसे न पकड़ बोधिसत्त्व को 'भन्ते ! मैं भूखा हूँ। आप अपने वल्कल को लें। मैं नाग को खाऊँगा' कहने के लिए यह गाथा कही— इधूरगान पवरो पविट्ठो सेलस्स वण्णेन पमोक्खमिच्छ बह्मञ्च वण्ण अपचायमानो बुभुक्खितो नो विसहामि भोत्तुं ॥ [यहाँ मणिवर्ण से नागराजा जान बचाने के लिए घुसा है। मैं ब्राह्मण वर्ण का आदर करने के कारण भूखा होता हुआ भी उसे खाने की हिम्मत नहीं करता।] इधूरगान पवरो पविट्ठो, उस वल्कल में नागों में श्रेष्ठ नागराज प्रविष्ट हुआ है। सेलस्स वण्णेन, मणि के वर्ण से, अर्थात मणि की शक्ल बना प्रविष्ट हुआ। पमोक्खमिच्छ, मुझसे बचने की इच्छा से। ब्रह्मञ्च वण्ण अपचायमानो, मैं तुम्हारे ब्रह्म वर्ण श्रेष्ठ वर्ण की पूजा करने के कारण, गौरव करने के कारण बुभुक्खितो नो विसहामि भोत्तु वल्कल में घुसे हुए इस नाग को भूख होते भी नहीं खा सकता हूँ।
गग्ग ] १५५ पानी मे खड़े ही खड़े बोधिसत्त्व ने गरुड राज की प्रशंसा करते हुए यह गाथा कही— सो ब्रह्मगुत्तो चिरमेव जीव दिव्या च ते पातुभवन्तु भक्खा सो ब्रह्मवण्णं अपचायमानो धुभुक्खितो नो वितरासि भोत्तु ॥ [ तू ब्रह्म द्वारा रक्षित होकर चिर काल तक जीवित रह । तुझे दिव्य भोजन प्राप्त हो । तू ब्राह्मण वर्ण के गौरव के कारण भूखा होता हुआ भी नहीं खा रहा है । ] सो ब्रह्मगुत्तो, यह तू ब्रह्म द्वारा गोपित, ब्रह्म द्वारा रक्षित होकर दिब्बा च ते पातुभवन्तु भक्खा, देवताओ के भोजन करने योग्य भोजन तुझे मिलें । प्राण हिंसा करके नाग-मास खानेवाला न बन । इस प्रकार बोधिसत्त्व ने पानी में खड़े ही खड़े अनुमोदन कर, पानी से निकल वल्कल पहन उन दोनो को अपने आश्रम पर ले जा मैत्री-भावना की प्रशंसा कर दोनो का मेल करा दिया । उसके बाद से वह प्रसन्नता पूर्वक सुख से रहने लगे । शास्ता ने यह धर्म-देशना ला जातक का मेल बैठाया । उस समय नाग और गरुड यह दो महामात्य थे । तपस्वी तो मैं ही था । १५५. गग्ग जातक “जीव यस्स सत गग्ग ” यह शास्ता ने जेतवन के समीप राजा प्रसेनजित के बनवाए राजकाराम म रहते हुए अपनी छींक के बारे में कही ।
क. वर्तमान कथा
१५६ [ २ १.१५५ ५ क. वर्तमान कथा एक दिन शास्ता को राजकाराम म चारो प्रकार की परिषद् म बैठे धर्मोपदेश करते समय छींक आई। भिक्षुओं ने जोर मे, ऊँचे स्वर से कहा- "भन्ते ! भगवान् ! जीएँ। सुगत ! जीए।" उनके चिल्लाने से धर्मोपदेश में विघ्न पडा। भगवान् ने भिक्षुओ से पूछा- "भिक्षुओ, यदि किसी के छींकने पर 'जीएँ' कहा जायगा, तो क्या उस कहने से उसके जीने मरने पर कुछ प्रभाव पडेगा ?" "भन्ते ! नही।" "भिक्षुओ ! छींकने पर 'जीएँ' नहीं कहना चाहिए। जो कहे उसे दुष्कृत का दोष लगेगा।"¹ उन दिनो भिक्षुओ को छींक आने पर लोग कहा करते- "भन्ते ! जीएँ।" भिक्षु बुरा मानते और कुछ न बोलते। लोग खीझ उठते- "कैसे हैं यह श्रमण शाक्य-पुत्रीय जो "भन्ते ! जीए' कहने पर कुछ नहीं बोलते। भगवान् से यह बात कही गई। भगवान् ने कहा-"भिक्षुओ ! गृहस्थ लोग मगल-अमगल को मानने वाले हैं। भिक्षुओ ! गृहस्थ लोगों के 'भन्ते जीएँ' कहने पर 'चिरकाल तक जीते रहो' कहने की अनुज्ञा देता हूँ।" भिक्षुओ ने भगवान से पूछा- भन्ते ! 'जीओ', तथा 'जीते रहो' यह कहने की प्रथा कब से आरम्भ हुई ? शास्ता ने कहा-भिक्षुओ, यह 'जीओ' तथा 'जीते रहो' कहने की प्रथा पुराने समय में आरम्भ हुई। इतना कह पूर्व-जन्म की कथा कही- ख. अतीत कथा पूर्व समय में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व काशी देश में एक ब्राह्मण कुल में पैदा हुए। उसका पिता व्यापार करके गुजारा करता था। उसके सोलह वर्ष के बोधिसत्त्व स मोरी आदि की चीजें उठा ग्राम निगम आदि में घूमते हुए वाराणसी पहुँचकर द्वारपाल के घर पर भात ¹ विनय पिटक में यह शिक्षापद नहीं मिला।
गग्ग ] १५७ बनवाकर खाया । निवासस्थान नही था । उसने पूछा-"असमय पर आए हुए अतिथि कहाँ रहते हैं ?" मनुष्यो ने उत्तर दिया-"नगर के बाहर एक शाला है । लेकिन उसमें भूत-प्रेत आदि रहते है । यदि चाहे तो वहाँ रहें ।" बोधिसत्त्व ने कहा-"तात ! चले ! डरने की जरूरत नही । मैं उस यक्ष का दमन कर उसे आपके चरणो पर गिराऊँगा ।" वह पिता को लकर वहाँ गए । पिता तख्ते पर लेटा । वे स्वय पिता के पैरो को दबाते हुए बैठे । वहाँ रहनेवाल यक्ष ने बारह वर्ष कुबेर की सेवा करके उससे यह अधिकार प्राप्त किया था कि उस शाला मे जो आदमी आएँ उनमें से किसी को छींक आने पर यदि कोई 'जीवँ' कहे और जिसको छींक आई हो वह भी 'जीओ' कहे तो उनको छोडकर वह शेष सभी को खा सकता है। वह चौखट पर रहता था । उसने बोधिसत्व के पिता को छींक लिवाने के लिए अपने प्रताप से सूक्ष्म चूर्ण बिखेरा । चूर्ण आकर उसके नयनो में पडा । उसे तख्ते पर पडे ही पडे छींक आई। बोधिसत्व ने उसे 'जीवँ' नही कहा । यक्ष उसे खाने के लिए चोखट से उतरने लगा । बोधिसत्व ने उसे उतरते देख, सोचा इसी ने मेरे पिता को छिंकाया होगा । छींकने पर 'जो जीवँ' न कहे उन्हें यह यक्ष खा लेता होगा । उन्होंने पिता को सम्बोधन करके यह पहली गाथा कही— जीव वस्स सत गग्ग ! अपरानि च वीसति, मा मं पिसाचा खादन्तु जीव त्वं सरदोसत ॥ [ गग्ग ! तू सौ वर्ष जीवित रह । और भी बीस वर्ष । मुझे पिशाच न खाएँ । तू सौ वर्ष जीवित रह । ] गग्ग, यह पिता को उसके नाम से सम्बोधन किया है । अपरानि च वीसति, और भी बीस वर्ष जीवित रह । मा मं पिसाचा खादन्तु, मुझे पिशाच न खाए । जीव त्व सरदो सत, तू एक सो बीस वर्ष जी । सरदसत का अर्थ तो सौ वर्ष ही होता है। लेकिन पहले के बीस जोड देने से यहाँ एक सौ बीस से मतलब है ।
१५८ [ २१.१५५ यक्ष ने बोधिसत्त्व का वचन सुन सोचा कि इस माणवक ने 'जीवै' कहा है, इसलिए इसे नहीं खा सकता । इसके पिता को खाऊँगा । इसलिए पिता के पास गया । उसने उसे आते देख सोचा, यह यक्ष उन लोगों को खा लेता होगा, जो 'जीवै' के उत्तर में 'जीओ' न कहते होंगे । इसलिए मैं प्रतिवचन करूँगा । उसने पुत्र के बारे में दूसरी गाथा कही— त्वम्पि वस्स सत जीव अपराणि च वीसति, विस पिसाचा खादन्तु जीव त्व सरदोसत ॥ [ तू भी सौ वर्ष जीवित रह । और भी बीस वर्ष । पिशाच विष खाएँ । तू सौ वर्ष जीवित रह । ] विस पिसाचा, पिशाच हलाहल विष खाएँ । यक्ष ने उसकी बात सुन सोचा, मैं दोनों में से किसी को नहीं खा सकता । वह रुक गया । बोधिसत्त्व ने पूछा—'भो यक्ष ! इस शाला में प्रवेश करनेवाले आदमियों को तू क्यों खाता है ?' “बारह वर्ष कुबेर की सेवा करके अधिकार प्राप्त किया है ।” “क्या सभी को खाने का अधिकार है ?” “'जीवै' और 'जीओ' कहने वाला को छोड़ शेष सभी को खाता हूँ ।” “यक्ष ! तूने पहले बुरे कर्म किए । इसलिए तू निर्दयी, कठोर तथा दूसरों की हिंसा करनेवाला पैदा हुआ । अब फिर उसी तरह के काम करके तू तमोतम- परायण¹ हो रहा है। इसलिए अब से तू प्राणि हिंसा आदि से विरत हो ।” इस प्रकार उस यक्ष का दमन कर, नरक के भय से उसे डरा, पञ्चशीलों में प्रतिष्ठित कर यक्ष को दूत की तरह विनीत कर दिया । आगे चलकर आने जाने वाले मनुष्यों ने यक्ष को देखा और जब उन्हें मालूम हुआ कि बोधिसत्त्व ने उसका दमन किया, तो उन्होंने राजा से कहा—“देव ! ¹ अन्धकार से अन्धकार में जाने वाला = हीनकुल में पैदा होकर नीच कर्म करने वाला ।
चली, कहा और जातक का मेल बैठाया।
अलीनचित्त ] १५६ एक तरुण ने उस यक्ष का दमन कर उसे दूत की तरह विनीत कर रखा है।” राजा ने बोधिसत्त्व को बुलाकर सेनापति के स्थान पर नियुक्त किया। और पिता का बहुत सत्कार किया। राजा यक्ष को बलि-ग्रहण का अधिकारी बना, बोधिसत्त्व के उपदेशानुसार चल दान आदि पुण्य-कर्म कर स्वर्ग सिधारा। शास्ता ने यह धर्म-देशना ला 'जीवं' और 'जीवो' कहने की प्रथा उस समय चली, कहा और जातक का मेल बैठाया। उस समय का राजा आनन्द था। पिता काश्यप था। और पुत्र तो मैं ही था। १५६. अलीनचित्त जातक “अलीनचित्त निस्साय ”, यह शास्ता ने जेतवन में विहार करते समय एक हिम्मत-हारे भिक्षु के बारे म कही। क. वर्तमान कथा इसकी कथा ग्यारहवें परिच्छेद (निपात) की सबर जातक¹ म आएगी। शास्ता ने उस भिक्षु से पूछा—'भिक्षु, क्या तूने सचमुच हिम्मत छोड़ दी?' “भगवान् ! सचमुच।” शास्ता ने कहा—'भिक्षु, क्या तूने पूर्व समय में हिम्मत करके मास के टुकड़े सदृश छोटे से कुमार को बारह योजन के वाराणसी के नगर का राज्य ¹ सबर जातक (४६२)
हिम्मत हारता है ?" इतना कह पूर्व जन्म की कथा कही—
१६० [ २१ १५६ नही लेकर दिया था ? अब इस प्रकार के शासन में प्रव्रजित होकर क्यो हिम्मत हारता है ?" इतना कह पूर्व जन्म की कथा कही— ख. अतीत कथा पूर्व समय में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय वाराणसी के समीप ही बढ़ई-ग्राम था । वहाँ पाँच सौ बढ़ई रहते थे । यह नौका से नदी के स्रोत के ऊपर की तरफ जाते । यहाँ जगल में घर बनाने की लकडी पाटकर वही एक तल्ले तथा दो तल्ले के मकान बना, खम्भे से आरम्भ करके सभी लकडियो पर चिह्न लगाते । फिर उन्हें नदी के किनारे ले जा, नौका पर चढा, स्रोत के अनुसार चल नगर में आते । वहाँ जो जैसे घर चाहता, उसे वैसे बना देकर कार्षापण ले फिर वैसे ही जा घर के सामान लाते । उनके इस प्रकार जीविका चलाते हुए एक बार पडाव डालकर लकडी काटते समय, उनके पास ही एक हाथी का पांव खैर की लकडी के खूंटे पर पडा । उस खूंटे से उसका पांव बिध कर उसमें बडी पीडा होने लगी । पैर सूज गया । उसमें से पीप बहने लगा । पीडा से पीडित हो उसने लकडी काटने का शब्द सुनकर सोचा कि इन बढ़इयो से मेरा कल्याण होगा । ऐसा समझ कर वह तीन पैरो से चलकर उनके पास पहुँचा और वही नजदीक ही पड रहा । बढइयो ने उसका सूजा हुआ पैर देखा तो पास गए । उन्हें उसमें खूंटा दिखाई दिया । उन्होने तेज कुल्हाडी से खूंटे के चारो ओर गहरा निशान कर, उसमें रस्सी बाँधकर उसे खींचकर निकाला। फिर पीप निचोडकर, निकालकर गर्म पानी से धोया। उसके अनुकूल दवाई करने से थोडे ही समय में घाव ठीक हो गया। हाथी ने निरोग होकर सोचा—इन बढइयो ने मेरी जान बचाई । मुझे इनकी कुछ सेवा करनी चाहिए । उस दिन से वह बढइयो के साथ वृक्ष लाने लगा । छीलने के समय वह उन्हे उलट उलट कर सामने करता । कुल्हाडी आदि औजार ले आता । सूण्ड से लपेटकर काले धागे के सिरे को पकड लता । बढई भी भोजन के समय इसे एक एक पिण्ड देते तो पाँच सौ पिण्ड हो जाते । उस हाथी का एक बच्चा था, जो एक दम श्वेत वर्ण का था और था मगल हाथी । हाथी ने सोचा कि मै बूढा हो गया । अब मुझे अपने लडके को इन बढइयो
अलीनचित्त ] १६१ को काम करने के लिए देकर स्वयं जाना चाहिए । वह बिना बढ़इयों को सूचित किए ही जंगल में गया । वहाँ से लड़के को ले आकर बढ़इयों से बोला—"यह मेरा लड़का है। तुमने मुझे जीवन दान दिया है। मैं डाक्टर की फीस के बदले में इसे देता हूँ। अब से यह तुम्हारी सेवा किया करेगा।" इतना कह, पुत्र को आदेश दे कि पुत्र ! जो कुछ मेरा काम है, वह सब अब से तू करना, उसे बढ़इयों को सौंप स्वयं जंगल में प्रवेश किया । उस समय से यह हाथी बच्चा बढ़इयों के कहने के अनुसार सब काम करने लगा । ये भी उसे पाँच सौ पिण्ड देकर पोसते। वह काम समाप्त कर नदी में उतर खेलकर आया करता। बढ़इयों के बच्चे भी उसे सूण्ड आदि से पकड़ जल और स्थल में सभी जगह उसके खेलते। श्रेष्ठ हाथी हो, घोड़े हों, अथवा मनुष्य हो, कोई भी पानी में मल-मूत्र नहीं त्यागते। वह भी पानी में मल-मूत्र न कर बाहर नदी के किनारे पर ही करता था। एक दिन नदी के ऊपर के हिस्से में वर्षा हुई। हाथी की आधी सूखी लेण्डी पानी से बहकर नदी के रास्ते जा वाराणसी नगर के पत्तन पर एक झाड़ी में जा अटकी । राजा के हाथी-सेवक पाँच सौ हाथियों को नहलाने के लिए ले गए। श्रेष्ठ हाथी की लेण्डी की गन्ध सूँघकर एक भी हाथी ने पानी में उतरने की हिम्मत न की। सभी पूँछ उठाकर भागने लगे। हाथी-सेवकों ने हथवानों को खबर की । उन्होंने सोचा पानी में कुछ खतरा होगा। पानी खोज करने पर जब उन्होंने झाड़ी में श्रेष्ठ हाथी की लेण्डी देखी तो समझ गए कि यही कारण रहा है। उन्होंने चाटी मँगवाई और उसे पानी से भर, उसमें उसे घोल हाथियों के शरीर पर छिड़- कवा दिया। शरीर सुगन्धित हो गए तब वह हाथी नदी में उतरकर नहाए । हथवानों ने राजा को यह समाचार सुना सलाह दी कि देव ! वह हाथी खोजवाकर मँगवाया जाना चाहिए । राजा नौकाओं के बेड़े से नदी में उतर ऊपर जानेवाले बेड़े से बढ़इयों के निवासस्थान पर पहुँचा। वह हाथी-बच्चा नदी में खेल रहा था। जब उसने भेरी शब्द सुना तो जाकर बढ़इयों के पास खड़ा हो गया। बढ़इयों ने राजा की अगवानी करते हुए कहा—देव ! यदि लकड़ी की आवश्यकता थी, तो कष्ट क्यों किया ? क्या भेजकर मँगाना उचित न होता ? ११
अलीनचित्त ] १६३ आज से सातवें दिन राज्य न देकर युद्ध करगे। इतने दिन प्रतीक्षा करें।" राजा ने 'अच्छा' कह स्वीकार किया। देवी ने सातवें दिन पुत्र को जन्म दिया। लोगो ने कहा यह हमारे उदा- चित्त की उदासी को दूर करता हुआ पैदा हुआ है, और उसका नाम अलीनचित्त कुमार रक्खा। उसके पैदा होने के ही दिन से नगर-निवासी कोसल-नरेश के साथ युद्ध करने लगे। युद्ध का नेता न होने से बडी सेना भी युद्ध करती हुई थोडी थोडी पीछे हटने लगी। आमात्यों ने रानी से यह समाचार कह पूछा— "आर्ये ! इस प्रकार सेना के पीछे हटने से हमें डर लगता है कि हम हार न जाएँ। राजा का मित्र मगल हाथी न राजा के मरने की बात को जानता है, न पुत्र उत्पन्न होने की बात जानता है और न कोसल-नरेश के आकर युद्ध करने की बात जानता है। हम इसे यह सब कह दें ?" उसने 'अच्छा' कह स्वीकार किया। फिर पुत्र को अलंकृत कर कोमल वस्त्र की गद्दी पर लिटा महल से उतर आमात्यों को साथ ले हस्ति शाला में गई। यहाँ बोधिसत्त्व को हाथी के पैरो पर रख कर बोली— 'स्वामी ! तुम्हारा मित्र तो मर गया। हमने तुम्हारे हृदय के फट जाने के डर से तुमसे नहीं कहा। यह तुम्हारे मित्र का पुत्र है। कोसल-राजा आकर नगर को घेरे हुए तेरे पुत्र से युद्ध कर रहा है। सेना पीछे हट रही है। या तो तू अपने पुत्र को स्वय ही मार डाल अथवा राज्य जीतकर इसे दे।" उसी समय हाथी ने बोधिसत्त्व को सूण्ड में ले उठा कर सिर पर रक्खा। रोया पीटा। फिर बोधिसत्व को उतार कर देवी के हाथ में लिटाया और कोसल-नरेश को पकडने के लिए हस्ति-शाला से निकल पडा। मन्त्री-गण कवच उतार, सज सजाकर दरवाजे खोल उसके पीछे पीछे हो लिए। हाथी ने नगर से निकल क्रौंच-नाद किया। लोगो को डरा कर भगा दिया। सेना की पाँत को तोड कोसल-राजा को पाँवो मे पकड लाकर बोधिसत्व के पैरो मे डाल दिया। वह मारने के लिए उठा, तो उसे रोका। अब से सावधान रह। यह मत समझ कि कुमार बालक है। इस प्रकार उपदेश दे उसे उत्साहित किया।
१६४ [ २-१-१५६ उस समय से सारे जम्बू द्वीप का राज्य एक प्रकार से बोधिसत्त्व के ही हाथ में आ गया। कोई भी शत्रु विरोध न कर सका। सात वर्ष की अवस्था होने पर बोधिसत्त्व का अभिषेक हुआ। वह अलीन चित्त राजा के नाम से धर्मानुकूल राज्य करते रह कर मरने पर स्वर्ग सिधारा। शास्ता ने यह पूर्व जन्म की कथा ला सम्यक् सम्बुद्ध होने की अवस्था में यह दो गाथाएँ कही-- अलीनचित्तं निस्साय पहट्ठा महतो चमू कोसलं सेना-सन्तुट्ठं जीवगाहं अग्राहयी एवं निस्सयसम्पन्नो भिक्खु आरद्धवीरियो भावयं कुसलं धम्मं योगक्खेमस्स पत्तिया पापुणे अनुपुब्बेन सब्ब संयोजनक्खयं ॥ [अलीन चित्त के कारण बड़ी सेना प्रसन्न हुई। अपने राज्य से असन्तुष्ट कोशल नरेश को जिन्दा पकड़वा लिया। इसी प्रकार यदि भिक्षु प्रयत्न-शील हो और उसका सहायक हो तो वह निर्वाण-प्राप्ति के लिए कुशल-धर्मों का अभ्यास कर क्रम से संम्योजनों का क्षय कर सकता है।] अलीनचित्तं निस्साय, अलीनचित्त राजकुमार के कारण पहट्ठा महती चमू, हम लोगो को राज्य-परम्परा देखनी मिली, इसलिए बड़ी सेना प्रसन्न हुई। कोसलं सेनासन्तुट्ठं, कोशल नरेश को, जो अपने राज्य से असन्तुष्ट हो पराया राज्य लेने को आया। जीवगाहं अग़ाहयी बिना मारे ही उस सेना ने उस हाथी से राजा को जीवित पकड़वाया। एवं निस्सय सम्पन्नो जैसे यह सेना उसी प्रकार कोई कुल-पुत्र बुद्ध अथवा बुद्ध-श्रावक सदृश किसी हितैषी को या उसके आश्रय से युक्त। भिक्खु, जो शुद्ध है, उसी का यह नाम है। आरद्धवीरियो, प्रयत्न-शील; चार प्रकार के दोषों से रहित प्रयत्न से युक्त। भावयं कुसलं धम्मं, कुशल, निर्दोष सैंतीस बोधि-पाक्षिक धर्मों की भावना करता हुआ। योगक्खेमस्स पत्तिया चारो प्रकार के योग से क्षेम अथवा निर्वाण की प्राप्ति के लिए उस धर्म का अभ्यास करते हुए। पापुणे अनुपुब्बेन सब्ब संयोजन क्खयं इस प्रकार विपश्यना से इस कुशल-धर्म का अभ्यास करते हुए वह किसी हितैषी का आश्रय-प्राप्त भिक्षु क्रम से विपश्यना ज्ञान और पहले मार्ग-ज्ञान
आगे चार आर्य-सत्यो को प्रकाशित कर जातक का मेल बैठाया। सत्यो
गुण ] १६५ प्राप्त करते हुए अन्त में दसो सञ्योजनो का नाश होने पर पैदा होने के कारण सर्वसञ्योजनक्षय स्वरूप कहे जाने वाले अर्हत्त्व को प्राप्त करता है। क्योकि निर्वाण प्राप्त होने पर सभी सञ्योजनो का क्षय हो जाता है, इस लिए उसे भी सञ्योजनक्षय ही कहा जा सकता है। इस लिए यह अर्थ हुआ कि निर्वाण कहे जाने वाले सभी सञ्योजनो के क्षय को प्राप्त करता है। इस प्रकार भगवान् ने अमृतमहानिर्वाण को धर्मोपदेश में मुख्य स्थान दे आगे चार आर्य-सत्यो को प्रकाशित कर जातक का मेल बैठाया। सत्यो का प्रकाशन समाप्त होने पर हिम्मत-हारा भिक्षु अर्हत्व पद लाभी हुआ। उस समय माता महामाया, पिता शुद्धोदन महाराजा था। राज्य लेकर देने वाला यह हिम्मतहारा भिक्षु था। हाथी का पिता सारिपुत्र। अलीनचित्त कुमार तो मैं ही था।
१५७. गुण जातक "येन काम पणामेति " यह (उपदेश) शास्ता ने जेतवन में विहार करते समय आनन्द स्थविर को एक हजार वस्त्र मिलने के बारे में कहा।
क. वर्तमान कथा आनन्द स्थविर की कोशल-नरेश के महल में धर्मोपदेश करने की कथा पहले महासार जातक¹ में आ ही गई है। जिस समय स्थविर राजा के महल में धर्मोपदेश दे रहे थे राजा के लिए
¹ महासार जातक (६२)
गुण ] १६७ "पुराने उत्तरासंग का क्या करेंगे ?" "अन्तरवासक¹ बना लेंगे।" "पुराने अन्तरवासक का क्या करेंगे ?" "बिछावन बना लेंगे।" "पुराने बिछौने का क्या करेंगे ?" "जमीन पर बिछा लेंगे।" "जमीन पर जो पहले बिछाते थे, उसका क्या करेंगे ?" "पाँव-झाड़ने का काम लेंगे।" "पाँव झाड़ने के पुराने कपड़े का क्या करेंगे ?" "महाराज ! जो श्रद्धापूर्वक दिया गया है, वह फेंका नहीं जा सकता । इस लिए पाँव झाड़ने के पुराने कपडे को कुल्हाडी से कूटकर मिट्टी में मिलाकर शयनासन की जगहो पर मिट्टी का लेप करेंगे।" "भन्ते ! आपको दिया हुआ वस्त्र पाँव झाडने का कपडा बनने पर भी फेका नहीं जा सकता ?" "महाराज ! हाँ, हमें दिया फेंका नही जा सकता । उपयोग में ही लाया जाता है।" राजा ने सन्तुष्ट हो प्रसन्नता के मारे घर पर रक्खे दूसरे पाँच सौ वस्त्र भी मँगवा कर स्थविर को दिए । स्थविर ने दान का अनुमोदन किया । उसे सुन स्थविर को प्रणाम कर राजा स्थविर की प्रदक्षिणा कर चला गया । स्थविर ने जो पाँच सौ चीवर पहले मिले थे वह उन भिक्षुओं को बाँट दिए जिनके चीवर पुराने हो गए थे । स्थविर के पाँच सौ शिष्य थे । उनमें एक छोटी आयु का भिक्षु स्थविर की बहुत सेवा करता था । परिवेण में झाडू लगाता । पीने और काम में लाने का पानी लाकर उपस्थित करता । दातुन लाकर देता । मुख धोने तथा स्नान करने के लिए जल देता । पाखाने अग्नि-शाला तथा सोने-बैठने के स्थान को ठीक-ठाक करके रखता । हाथ-पैर दबाना तथा पीठ मलना आदि
¹ नीचे पहनने का चीवर, जैसे धोती ।
१६८ [ २.१.१५७ करता। स्थविर ने यह सोच कि इसने मेरा बडा उपकार किया है पीछे मिले सब वस्त्र उसी को देना उचित समझ दे डाले। उसने भी वह सब वस्त्र बांट कर अपने गुरु-भाइयो को दिए। वे सभी भिक्षु जिन्हें वस्त्र मिला वस्त्र के टुकडे टुकडे कर उन्हें रज कर्णिकार पुष्प के सदृश काषाय वस्त्र पहन शास्ता के पास गए। वहां प्रणाम कर एक ओर बैठे भिक्षु कहने लगे- "भन्ते ! क्या श्रोतापन्न आर्य-श्रावक भी मुंह देखकर दान देते है ?" "भिक्षुओ, आर्य-श्रावक मुंह देखकर दान नही देते।" "भन्ते ! हमारे उपाध्याय धर्म-भण्डागारिक स्थविर ने हजार हजार की कीमत के पांच सौ वस्त्र एक ही छोटी आयु के भिक्षु को दे दिए। उसने जो उसे मिले बांट कर हमे दिए।" "भिक्षुओ, आनन्द मुख देखकर दान नही देता। उस भिक्षु ने इसकी बहुत सेवा की। उसने अपने उपकार का प्रत्युपकार करने के विचार से गुणवान होने के ख्याल से, उचित होने से सोचा कि उपकारी का प्रत्युपकार करना चाहिए, और इसी लिए अपनी कृतज्ञता प्रकट करने के लिए दिए। पुराने पण्डितों ने भी अपना उपकार करने वाले का बदले मे उपकार किया है।" उनके प्रार्थना करने पर पूर्व-जन्म की बात कही - ख. अतीत कथा पूर्व समय में बाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व सिंह की योनि मे पैदा हो पर्वत-गुफा मे रहते थे। उन्होने एक दिन गुफा से निकल पर्वत के नीचे की ओर देखा। उस पर्वत के चारो ओर बडा भारी तालाब था। उस के एक (तरफ) ऊंची जगह पर कडे दलदल के ऊपर कोमल हरी घास उगी थी। खरगोश, हरिण, और हलके मृग उसके ऊपर विचर कर उसे खाते। उस दिन भी एक मृग उन तिनकों को खाता हुआ घूम रहा था। सिंह उस मृग को पकडने के लिए पर्वत पर से उछल कर मृग की तरफ कूदा ! मृग मरने के भय से डरकर चिल्लाता हुआ भाग गया। सिंह वेग को न रोक सकने के कारण दलदल पर गिरकर नीचे चला गया। उलट न आ सकने के कारण चारो पैर खंभे की तरह हो गए। उसे एक
गुण ] १६६
सप्ताह तक वही निराहार खडा रहना पडा। एक सियार शिकार खोज रहा था। उसे देख भय से भागा। सिंह ने उसे बुलाकर कहा—"भो ! सियार ! भाग मत। मै दलदल में फँसा हूँ। मेरे जीवन की रक्षा कर।" सियार उस के पास जाकर बोला—"मै तो तुझे निकालूँ, लेकिन डर लगता है कि तू निकलकर मुझे खा न जाए। "डर मत। मै तुझे नही खाऊँगा। तेरा बडा उपकार करूँगा। मुझे किसी उपाय से निकाल।" सियार ने उससे प्रतिज्ञा करवा चारो पैरो के इर्द-गिर्द से दलदल हटा चारो पैरो से चार नालियाँ पानी की ओर बना दीं। पानी ने घुस कर गारे को नरम कर दिया। उसी समय सियार ने सिंह के पेट के नीचे घुस कर चिल्लाया— स्वामी ! जोर लगाएँ। स्वय सिंह के पेट में सिर से टक्कर लगाई। सिंह जोर लगाने से गारे के ऊपर आया और कूद कर स्थल पर जा खडा हुआ। थोडी देर विश्राम कर, तालाब में उतर गारे को धो, स्नान कर सिंह ने एक भैंसे का वध किया। उसे दाढो से चीर उसका मास उधेड सियार के आगे रख कहा—'सौम्य ! ले खा। सियार के खा चुकने पर अपने खाया। सियार ने एक मास-पेशी मुंह में ली। शेर ने पूछा—"सौम्य ! यह किसके लिए ?" सियार बोला—"तुम्हारी दासी है। यह उसके लिए।" सिंह बोला—'ले ले।' स्वय भी सिंहनी के लिए मास लेकर उसने सियार से कहा—"सौम्य ! आ अपने पर्वत के शिखर पर जाकर वहाँ से सखि के निवास स्थान पर जाएँगे।" वहाँ पहुँच, मास खिला चुकने पर उसने सियार और सियारनी को आश्वासन दिया—अब से मैं तुम्हारी देख-भाल करूँगा। वह उन्हें अपन निवास स्थान पर ले गया। वहाँ गुफा के द्वार पर ही दूसरी गुफा में बसाया। उसके बाद से सिंह सिंहनी और सियारनी को छोड सियार के साथ शिकार के लिए जाता। वहाँ नाना पशुओ को मार कर दोनो वही खाते। सिंहनी और सियारनी को भी ला कर देते। इस प्रकार समय व्यतीत होता रहा।
१७० [ २.१.१५७
सिंहनी ने तथा सियारनी ने भी दो दो पुत्रो को जन्म दिया। वे सब इकट्ठे रहने लगे। एक दिन सिंहनी के मन में आया—यह सिंह सियार को, सियारनी को, तथा उसके बच्चो को बहुत प्यार करता है। इसका सियारनी से सम्बन्ध अवश्य होगा। इसी लिए उससे स्नेह करता है। मैं इसे कष्ट देकर, डराकर भगाऊँ। जिस समय सिंह सियार को साथ ले शिकार के लिए जाता सिंहनी सियारनी को डराती, धमकाती—तू यहाँ क्यो रहती है? यहाँ से भागती क्यो नही? उसके बच्चे भी सियारनी के बच्चो को वैसे ही तग करते, धमकाते। सियारनी ने सियार से सब हाल कहा और बोली—"पता नही, सिंहनी सिंह के ही कहने से ऐसा व्यवहार करती है। हम यहाँ बहुत दिन रह चुके। वह हमारी जान भी ले सकता है। अपने निवास स्थान पर ही चले।" सियार ने उसकी बात सुन सिंह के पास आकर कहा— "स्वामी ! हम तुम्हारे पास बहुत समय रहे। अधिक देर तक समीप रहने वाले अप्रिय हो जाते हैं। हमारे शिकार के लिए चले जाने पर सिंहनी सियारनी को तग करती है। उसे डराती है कि यहाँ क्यो रहती है? यहाँ से भाग। सिंह-बच्चे भी सियार-बच्चो को डराते धमकाते है। यदि किसी को किसी का अपने पास रहना अच्छा न लगे तो 'जाओ' कह कर उसे निकाल देना चाहिए, तग करने की क्या जरूरत है।" इतना कह यह पहली गाथा कही— येन काम पणामेति धम्मो बलवत मिगो! उन्नदन्ति विजानाहि जात सरणतो भयं ॥ [ हे सिंह ! बलवान् का यही स्वभाव है कि जहाँ चाहता है भगा देता है। हे उन्नत दाँत वाले (सिंह) ! यह जान ले कि शरण-स्थल से ही भय पैदा हो गया।] येन कामं पणामेति धम्मो बलवतं बलवान अथवा ऐश्वर्यशाली अपने सेवक को जिस दिशा में चाहता है उस दिशा में भगा देता है, निकाल देता है, यह बलवानो का धर्म है। यह ऐश्वर्य-शालियो का स्वभाव है। यही परम्परा है।
गुण ] १७१ इस लिए यदि हमारा रहना अच्छा न लगता हो, तो हमें सीधा निकाल दे। कष्ट देने से क्या लाभ ? —यही अर्थ प्रकट करने के लिए यह कहा। मिगो, सिंह को सम्बोधन करता है। वह मृगराज होने से मृगो का मालिक है, इसी लिए मिगी। उन्नदन्ति—यह भी उसी का सम्बोधन है। ऊँचे दांतो वाला होने से उन्नदन्ति। उन्नतदन्ति, यह भी पाठ है। विजानाहि, यही ऐश्वर्य- शालियो का स्वभाव है, यह जान लें। जात सरणतो भय, हमें तुमसे प्रतिष्ठा मिली, इससे तुम्ही हमारे शरण। अब तुम्हारे ही पास से भय पैदा हो गया। इस लिए हम अपने निवास-स्थान को जायेंगे। दूसरा अर्थ—मिगी (सिंहनी) उन्नदन्ती मेरे बच्चो और स्त्री को ताडती है। येन काम पणमेति, जिस जिस तरह से चाहता है उस उस तरह से निकाल देता है, प्रर्वतित करता है तग करता है—इसे तू जान ले। इसमे हम क्या कर सकते हैं ? धम्मो बलवत, यह बलवानो का स्वभाव है। हम जाते हैं। किस लिए ? क्योकि जात सरणतो भय । उसकी बात सुनकर सिंह ने सिंहनी से पूछा—"भद्रे ! अमुक समय मे शिकार के लिए गया था और सातवें दिन इस सियार और सियारनी के साथ लोटा था, इसकी कुछ याद है ?" "हाँ, याद है।" 'मेरे एक सप्ताह तक न आ सकने का कारण जानती है।" "स्वामी ! नही जानती हूँ।" 'भद्रे ! मैं एक मृग को पकडने जाकर चूक कर दलदल में फँस गया। उसमें से न निकल सकने के कारण सप्ताह भर भूखा खडा रहा। अरे, इस सियार ने मेरे प्राण बचाए। यह मुझे जीवन-दान देने वाला मित्र है। जो मित्र का धर्म पूरा कर सके वह मित्र दुर्बल नही माना जाता। इस के बाद मेरे मित्र, मेरी सखी तथा उसके बच्चो का इस प्रकार अपमान न करना।" इतना कह सिंह ने दूसरी गाथा कही— अपिचेपि दुब्बलो मित्तो मित्तधम्मेसु तिट्ठति सो जातको च बन्धू च सो मित्तो सो च मे सखा, दाठिनि ! मातिमिन्र्ञत्थो सिगालो मम पाणदो ॥
अपि तिट्ठति, यदि स्थित रह सकता है । सो जातको च बन्धु च सो, मैत्री
१७२ [ २-१-१५८ [ यदि मित्र दुर्बल है, लेकिन वह मित्र के कर्तव्य को पूरा करता है तो वही रिश्तेदार है, बन्धु है, मित्र है, सखा है । सिंहनी ! अपमान मत कर । सियार मेरे प्राणो की रक्षा करने वाला है । ] अपि चेपि, एक 'अपि' जोर डालने के लिए है, दूसरा 'अपि' सम्भावना प्रकट करता है । अन्वय इस प्रकार है—दुब्बलो चेपि मित्तो मित्तधम्मेसु अपि तिट्ठति, यदि स्थित रह सकता है । सो जातको च बन्धु च सो, मैत्री चित्त होने से मित्तो । सो च मे सहायक होने से सखा । दाठिनि ! माति- मञ्ञित्थो, भद्रे ! दाढ वाली ! सिंहनी ! मेर मित्र अथवा मेरी सखी का अपमान न कर । यहु सिगालो मम पाजदो । उसने सिंह की बात सुन सियारनी से क्षमा माँगी । फिर उसके तथा उसके बच्चो के साथ मिल जुल कर रहने लगी । सिंह-बच्चे भी सियार के बच्चो के साथ खेलते हुए मौज करते हुए रहने लगे । माता पिता के मरने पर भी मैत्री बनाए रख मिलजुल कर रहे । सात पीढ़ी तक उनकी मैत्री बराबर बनी रही । शास्ता ने यह धर्म देशना ला आर्य-सत्यों को प्रकाशित कर जातक का मेल बैठाया । सत्यों का प्रकाशन समाप्त होने पर कोई श्रोतापन्न, कोई सकृदागामी कोई अनागामी तथा कोई अर्हत हुए । उस समय सियार आनन्द था । सिंह तो मै ही था । १५८. सुहनु जातक “नयिदं विसमसीलेन ”यह शास्ता ने जेतवन में विहार करते समय दो भिक्षुओ के बारे में जिनका स्वभाव बडा उद्दण्ड था, कही ।
क. वर्तमान कथा
सुहनु ] १७३ क. वर्तमान कथा उस समय जेतवन में भी एक उद्दण्ड, कठोर, दुस्साहसी भिक्षु था और एक दूसरा देहात (= जनपद) में भी था । एक दिन देहात का भिक्षु किसी काम से जेतवन गया । श्रामणेर और छोटी आयु के भिक्षु उसके चण्ड-स्वभाव की बात जानते थे । उन्होने दोनो उद्दण्ड भिक्षुओं का झगडा देखने की इच्छा से कुतूहलवश उस भिक्षु को जेतवन वासी भिक्षु के परिवेण में भेज दिया । दोनो उद्दण्ड भिक्षु एक दूसरे को देखते ही परस्पर एक हो गए, मित्र बन गए । वह एक दूसरे के हाथ, पैर, पीठ दबाना आदि करने लगे । भिक्षुओ ने धर्म सभा मे बात चलाई—"भिक्षुओ ! उद्दण्ड भिक्षु दूसरो के प्रति तो बड़े उद्दण्ड हैं, कठोर है तथा दुस्साहसी है लेकिन दोनो परस्पर एक हो गए, मेल कर लिया, प्रेमी बन गए ।" शास्ता ने आकर पूछा—'भिक्षुओ ! इस समय बैठे क्या बात चीत कर रहे हो ?' "अमुक बातचीत ।" "भिक्षुओ ! केवल अभी नही पहले भी यह औरो के प्रति तो उद्दण्ड, कठोर तथा दुस्साहसी थे लेकिन दोनो परस्पर एक हो गए थे, मेल से रहते थे तथा प्रेमी थे । इतना कह पूर्वजन्म की कथा कही— ख. अतीत कथा पूर्व समय मे बाराणसी मे ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व उस राजा के सर्वार्थसाधक आमात्य हुए। वे उसे अर्थ तथा धर्म की बातो में सलाह देते थे । वह राजा थोडा लोभी स्वभाव का था । उसके यहाँ महासोण नाम का एक दुष्ट घोडा था । गान्धार (= उत्तरापथ) देश के घोडो के व्यापारी पाँच सौ घोडे लाए । राजा को घोडो के आने की खबर दी गई । पहले बोधिसत्त्व घोडो की कीमत लगा उसे कम न कर दिलवाते थे ।
१७४ [ २-१.१५८ राजा को उससे संतोप न होता था। इस लिए उसने दूसरे धामात्य को बुलाकर कहा—"तात ! तू घोडो की कीमत लगा । लेकिन कीमत लगाने से पहले महासोण को ऐसा कर कि वह इन घोडो में जाकर उन्हें काट कर जख्मी कर दे । जब ये दुर्बल हो जायें और उनका मूल्य घट जाए, तब उनकी कीमत लगाना।" उसने 'अच्छा' कह स्वीकार कर वैसा ही किया । घोड़ो के व्यापारियो ने, असन्तुष्ट हो, उसने जो किया वह बोधिसत्त्व से कहा । बोधिसत्त्व ने पूछा—"क्या तुम्हारे नगर में दुष्ट घोड़ा नही है ?" "स्वामी ! सुहनु नाम का दुष्ट, चण्ड, कडे स्वभाव का घोड़ा है।" "अच्छा तो फिर आते समय उस घोड़े को लेते आना।" उन्होने 'अच्छा' कह स्वीकार किया । फिर आते समय उस घोड़े को साथ लिवाकर आए । राजा ने सुना कि घोडो के व्यापारी आए । उसने खिडकी खोलकर घोड़ो को देखा और महासोण को छुड़वा दिया । घोड़ो के व्यापारियो ने भी महासोण को आते देख सुहनु को छोड़ा । वे दोनो पास आने पर एक दूसरे का शरीर चाटने लगे । राजा ने बोधिसत्त्व से पूछा—"मित्र ! यह दो घोड़े दूसरों के प्रति चण्ड हैं, कडे स्वभाव के हैं, दुस्साहसी हैं । दूसरे घोड़ो को काट कर रोगी कर देते हैं। लेकिन एक दूसरे के शरीर को चाटते हुए आनन्द- पूर्वक खड़े हैं। यह क्या बात है ?" बोधिसत्त्व ने उत्तर दिया, "महाराज ! यह परस्पर विरोधी स्वभाव के नही हैं, समान स्वभाव के हैं, समान धातु के हैं" और यह दो गाथाएँ कहीँ— नयिदं विसमसीलेन सोणेन सुहनुस्सह, सुहनूंपि सादिसोयेव यो सोणस्स स गोचरो ॥ पक्खन्दिना पलब्भेन निच्चं सन्दान खादिना, समेति पापं पापेन समेति असत्ता अस ॥ [ सुहनु और सोण का स्वभाव विरोधी नही है । जैसा सुहनु है, वैसा ही सोण । उछल-कूद करने वाले, प्रगल्भ तथा हमेशा लगाम खा जाने वाले इस घोड़े का पापकर्म और असत्कर्म दूसरे के बराबर हैं] ।
सुहनु ] १७५ यदपिदं विसमसीलेन सोणेन सुहनुस्सह, यह जो सुहनु दुष्ट घोडा सोण के साथ प्रेम करता है, यह अपने विरुद्ध स्वभाव वाले के साथ नहीं। यह अपने समान शील वाल के ही साथ करता है। यह दोनो दुष्ट स्वभाव वाले होने से समान स्वभाव वाले या समान धातु वाले हैं। सुहनू'पि तादिसोयेव यो सोणस्स सगोचरो, जैसा सोण सुहनु भी वैसा ही। यो सोणस्स सगोचरो, जो सोण की चरने की जगह है, वही उसकी भी। जैसे सोण अश्व-गोचर है अश्वो को काटता हुआ ही चरता है, उसी तरह सुहनु भी। इस प्रकार उनकी समान गोचरता प्रदर्शित की गई है। उनके आचरण की एकता दिखाने के लिए पक्खन्दिना आदि कहा गया है। पक्खन्दिना, अश्वो के ऊपर कूद पडने के स्वभाव वाला। पगलब्भेन, काय- प्रगल्भता आदि दुश्शीलता से युक्त। निच्च संदानखादिना, हमेशा अपनी लगाम खा जाने की आदत वाले से। समेति पाप पापेन, इन दोनो में से एक का पाप, दुष्टता दूसरे के बराबर है। असन्ता अस इन दोनो मे से एक दुष्ट दुराचारी के साथ दूसरे का अस बुरा काम बराबरी करता है। जैसे गूंह आदि के साथ गूंह आदि मिल जाता है, कोई अन्तर नही रहता, वैसा ही। इतना कहकर बोधिसत्त्व ने राजा को उपदेश दिया—'महाराज ! राजा को अधिक लोभी नही होना चाहिए। दूसरो का धन नष्ट करना उचित नही।' फिर घोडो की कीमत लगवा उचित मूल्य दिलवाया। घोडो के व्यापारी यथोचित मूल्य पाकर सतुष्ट लौटे। राजा भी बोधि- सत्त्व के उपदेशानुसार रह कर्मानुसार परलोक सिधारा। शास्ता ने यह धर्म-देशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय दो घोड यह दो दुष्ट भिक्षु थे। राजा आनन्द था। पण्डित थामात्य तो में ही था।