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जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

DevanagariHindipublished479 पृष्ठ

२४६ [ २.४.१८१ राजा ने बोधिसत्व को बुलाकर पूछा—"तात ! इसे गिरा सकते हो !" "महाराज ! हाँ ! थोड़ी जगह मिलने पर गिरा सकूँगा।" "जगह कहाँ चाहिए ?" "जहाँ आपकी शय्या है।" राजा ने शय्या हटवा कर जगह करा दी। बोधिसत्त्व हाथ में धनुष नहीं रखते थे। वह कपड़ों के नीचे छिपाए रहते थे। इसलिए कहा कि क़नात चाहिए। राजा ने कहा 'अच्छा' और क़नात मँगवा कर तनवा दी। बोधिसत्त्व क़नात के अन्दर चले गए। वहाँ पहुँच उन्होंने ऊपर पहना श्वेत वस्त्र उतार एक लाल कपड़ा पहना। फिर पच्छ पहन, थैली से जुड़ने-वाली तलवार निकाल, बाईं ओर बाँधी। तब सुनहरी वस्त्र पहन, कमर पर तरकश बाँध, जुड़ने वाला, मेढ़े की सींग का बना बड़ा धनुष ले, मूँगे के रंग की डोरी बाँध, सिर पर पगड़ी धारण की। तेज तीर को नाखून पर घुमाते हुए वह क़नात के दो हिस्से कर ऐसे निकला मानो पृथ्वी फाड़ कर अलङ्कृत नाग-कुमार बाहर आया हो। फिर बोधिसत्त्व तीर चलाने की जगह पर जा, तीर को तैयार कर राजा से बोले— "महाराज ! इस आम को ऊपर जाने वाले तीर से गिराऊँ, अथवा नीचे जाने वाले तीर से ?" "तात ! मैंने ऊपर जाने वाले तीर से बहुत गिराते देखा है, लेकिन नीचे जाने वाले तीर से गिराते नहीं देखा है। नीचे जाने वाले तीर से गिराएँ।" "महाराज ! यह तीर दूर तक जाएगा। चातुर्महाराजिक भवन तक जाकर स्वयं नीचे उतरेगा। जब तक यह नीचे उतरे, तब तक आपको प्रतीक्षा करनी होगी।" राजा ने 'अच्छा' कह स्वीकार किया। बोधिसत्त्व ने फिर कहा—"महाराज ! यह तीर ऊपर जाता हुआ आम की डंठल को ठीक बीच में से छेदता हुआ ऊपर जाएगा; और नीचे उतरता हुआ केशप्रमाण भी इधर उधर न हो, निश्चित जगह पर लग, आम को लेकर नीचे उतरेगा। महाराज ! देखें।" तब बोधिसत्त्व ने जोर लगाकर तीर छोड़ा। आम की डंठल को बीच में से छेदता हुआ तीर ऊपर बढ़ा। बोधिसत्त्व ने यह समझ कि अब यह तीर

असदिस ] २४७ चातुर्महाराजिक भवन पहुँचा होगा, पहले तीर से भी अधिक जोर से एक दूसरा तीर चलाया। यह तीर जाकर पहले छोड़े हुए तीर के पख में लगा और उसे लोटा स्वयं तावतिंस भवन को चला गया। उसे वहाँ देवताओ ने पकड लिया। जो तीर लोट रहा था उसके हवा छेदते हुए आने की आवाज बिजली की आवाज के समान थी। लोगो ने पूछा—"यह कैसी आवाज है?" बोधिसत्व ने उत्तर दिया—"यह तीर के लौटने की आवाज है।" लोगो को डर लगने लगा कि उनमे से किसी के बदन पर न गिरे। बोधि- सत्त्व ने उन्हें आश्वासन दिया कि मैं तीर को जमीन पर गिरने न दूंगा। उतरते हुए तीर ने बाल की नोक भर भी इधर उधर न जा निश्चित स्थान पर गिर आम को तोडा। बोधिसत्व ने तीर तथा आम को जमीन पर गिरने न दे, आकाश में ही रोक कर एक हाथ में तीर और दूसरे में आम लिया। जनता उस आश्चर्य को देख "ऐसा तो हमने कभी पहले नहीं देखा" कहते हुए महापुरुष की प्रशंसा करने लगी, चिल्लाने लगी, तालियां पीटने लगी; अंगुलियां चटकाने लगी, और सहस्रो वस्त्रो को ऊपर उछालने लगी। सन्तुष्ट चित्त राज्य-परिषद ने बोधिसत्त्व को एक करोड धन दिया। राजा ने भी धन की वर्षा करते हुए इसे बहुत सा धन तथा यश दिया। इस प्रकार आदृत तथा सत्कृत होकर बोधिसत्त्व के वहाँ रहते समय सात राजाओ ने यह जान कि अब असदिसकुमार वाराणसी में नही है, वाराणसी को घेर लिया और सन्देस भेजा कि चाहे राज्य दें, चाहे युद्ध करें। राजा ने मरने से भयभीत हो पूछा—"इस समय मेरा भाई कहाँ है?" "एक सामन्त राजा की सेवा में है।" उसने दूत भेजे—यदि भाई नहीं आएगा, तो मेरी जान नही बचेगी। जाओ मेरी ओर से उनके चरणो में प्रणाम कर क्षमा माँग उन्हें लिवा कर आओ। उन्होने जाकर बोधिसत्त्व को वह समाचार कहा। बोधिसत्व ने उस राजा को पूछ वाराणसी लौट कर अपने भाई को आश्वासन दिया कि मत डरें। फिर उसने एक तीर पर यह लिखा कि मैं असदिसकुमार आ गया हूँ। दूसरा तीर चला कर सब की जान ले लूंगा। इसलिए जिन्हे जान प्यारी हो, वह भाग जाएँ। उस तीर को उसने अट्टालिका पर चढ़ ऐसे चलाया कि वह

२४८ [ २४.१८१ जहाँ सातो राजा भोजन कर रहे थे वहाँ सोने की थाली के ठीक बीच में जाकर गिरा। उन अक्षरों को देख मरने के भय से वह सभी भाग गए। इस प्रकार बोधिसत्त्व ने, छोटी मक्खी जितना खून पीती है उतना खून भी बिना बहाए सातो राजाओ को भगा दिया। फिर छोटे भाई से भेट कर, काम-भोग के जीवन को त्याग ऋषियो के प्रव्रज्या-क्रम से प्रव्रज्या ग्रहण की। अभिज्ञा तथा समापत्तियां प्राप्त कर जीवन समाप्त होने पर ब्रह्मलोकगामी हुए। शास्ता ने बुद्ध हुए रहने पर "भिक्षुओ ! असदिसकुमार ने सात राजाओ को भगा, संग्राम विजयी हो ऋषियों के क्रम से प्रव्रज्या ग्रहण की" कह, यह गाथाएँ कही— ६ धनुग्गहो असदिसो राजपुत्तो महब्बलो दूरेपाती अक्खणवेधी महाकायप्पदालनो ॥ सब्बामित्ते रणं कत्वान च किञ्चि विहेठयि भातरं सोत्थि कत्वान सञ्जमं अज्झुपागमि ॥ [ महाबलशाली, बडी बडी चीजो को बींधने वाले, अचूक निशाना लगाने वाले, धनुर्धारी असदिस राजपुत्र ने जो तीर को दूर गिराता था, बिना किसी को कष्ट दिए सभी शत्रुओं से युद्ध कर भाई का उपकार किया। वह स्वयं सन्यासी हो गया । ] असदिसो केवल नाम से ही नही, बल, वीर्य तथा प्रज्ञा में भी असदृश । महब्बलो शरीर-बल तथा ज्ञान-बल, दोनो बलो से बलशाली। दूरेपाती चातुर्महाराजिक भवन तथा तावतिंस भवन तक तीर पहुँचाने की सामर्थ्य रखने से, दूर गिराने वाला। अक्खणवेधि अचूक निशाने वाला, अथवा अक्खणा कहते है बिजली को, जितनी देर एक बार बिजली चमकती है, एक बार बिजली चमकने के, उतनी ही देर के प्रकाश में सात आठ बार तीर खेंकर बींधने वाला। महाकायप्पदालनो बडी चीजो को बींधने वाला। चर्म-काय, लकडी-काय, लोह-काय,¹ अयस्-काय, बालू-काय, उदक-काय तथा स्फटिक-काय, यह सात ¹ लोह = तांबा ।

सङ्गामावचर ] २४६ महाकाय हैं। कोई दूसरा चर्म-काय को बीधने वाला केवल भैंस के चर्म को बीधता है। वह सात भैंस-चर्मों को बीधता। दूसरा कोई आठ अगुल मोटे अजीर के तख्ते को, वा चार अगुल मोटे असन वृक्ष के तख्ते को बीधता है। वह एक साथ सौ तख्ते बँधे हो, तो उनको भी बीधता। उसी तरह दो अगुल मोटे ताम्बे के तख्ते, वा अगुल मोटे अयस्-तख्ते को अथवा बालू की गाडी, वा तख्तो की गाडी, वा पराल की गाडी में पीछे से तीर मार कर आग निकाल देता। पानी में सामान्यतया चार ऋषभ की दूरी पर तीर पहुँचा देता, स्थल में आठ ऋषभ की दूरी पर। इस प्रकार इन सात कायो को बीधने वाला होने से महाकाय बीधने वाला। सव्वमित्ते, सभी शत्रु। रण कत्वा युद्ध करके भगा दिए। न च किञ्चि विहेठयि किसी एक को भी कष्ट नही दिया। बिना कष्ट दिए उनके साथ केवल तीर भेज कर ही युद्ध करके। सञ्जम अब्भु- पागमि शील-सयम रूपी प्रव्रज्या को प्राप्त किया। इस प्रकार शास्ता ने यह धर्म-देशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय छोटा भाई आनन्द था। असदिसकुमार तो मैं ही था। १८२. सङ्गामावचर जातक “सङ्गामावचरो सूरो ”यह शास्ता ने जेतवन में रहते समय नन्द स्थविर के बारे में कही। क. वर्तमान कथा जिस समय शास्ता पहली वार कपिलपुर¹ गए, उन्होने छोटे भाई नन्द- ¹ कपिलवस्तु।

२५० [ २.४.१८२ कुमार को प्रव्रजित किया। कपिलपुर से निकल क्रमशः श्रावस्ती जाते समय आयुष्मान् नन्द भगवान् का पात्र ले शास्ता के साथ साथ चले। जनपद- कल्याणि¹ ने सुना तो आधे बिखरे केशो से झरोखे में से देख कर कहा कि आय्यँ- पुत्र शीघ्र लौटना। नन्द जनपदकल्याणि के इस कथन को याद करता हुआ उत्कण्ठा के कारण शासन में मन न लगा सका। वह पाण्डुवर्ण का हो गया; और उसके शरीर में नसें ही नसें दिखाई देने लगीं। शास्ता ने उसका हाल जान सोचा कि मैं नन्द को अर्हत्-पद पर प्रतिष्ठित करूँ। इसलिए उन्होने उसके रहने के परिवेण में जा वहाँ बिछे आसन पर बैठ पूछा—"नन्द ! इस शासन में तेरा मन लगता है वा नही ? "भन्ते ! जनपदकल्याणि में आसक्ति होने के कारण मन नही लगता।" "नन्द ! तू पहले हिमालय में चारिका करने गया है ?" "भन्ते ! नही गया हूँ।" "तो ! आओ चले।" "भन्ते ! मुझे ऋद्धि (-बल) नही हैं। मैं कैसे जाऊँगा ?" "नन्द ! मैं तुझे अपने ऋद्धि (-बल) से ले जाऊँगा।" शास्ता ने स्थविर को हाथ से पकड आकाश मार्ग से जाते हुए रास्ते में जला हुआ खेत दिखाया। वहाँ जले हुए एक ठूंठ पर एक बन्दरी बैठी दिखाई; जिसके कान, नाक और पूंछ कटी थी; जिसके बाल जल गए थे; जिसकी खाल फट गई थी; जिसकी चमड़ी मात्र बाकी रह गई थी तथा जिसमें से रक्त बह रहा था। "नन्द ! इस बन्दरी को देखते हो ?" "भन्ते ! हाँ।" "अच्छी तरह से प्रत्यक्ष करो।" फिर उसे ले साठ योजन का मनोशिला-तल, अनवतप्त आदि सात महा- सर, पांच महानदियाँ, स्वर्ण-पर्वत, रजत-पर्वत तथा मणि-पर्वत से युक्त सैकडो रमणीय-स्थान और हिमालय-पर्वत दिखा पूछा—

¹नन्द की भार्या।

सङ्गामावचर ] २५१ “नन्द ! तूने तावतिंस-भवन¹ देखा है ?” “भन्ते ! नही देखा ?” “नन्द ! आ तुझे तावतिंस भवन दिखाएँ ।” शास्ता उसे वहाँ ले जा पाण्डु-कम्बल शिला आसन पर बैठें। दोनो देव- लोकों के देवताओ सहित देवेन्द्र शक्र-राजा ने आकर प्रणाम किया और एक ओर बैठ गया। उसकी ढाई करोड सेविकाएँ और कबूतरी की तरह लाल पाँव वाली पांच सौ अप्सराएँ भी आकर, प्रणाम कर एक ओर बैठीं। शास्ता ने नन्द को ऐसा किया कि वह उन पाँच सौ अप्सराओ पर आसक्त हो उन्हें बार बार देखने लगा। “नन्द ! कबूतरी जैसे पाँव वाली इन अप्सराओ को देखता है ?” “भन्ते ! हाँ ।” “क्या यह अच्छी लगती है, अथवा जनपदकल्याणि ?” “भन्ते ! जनपदकल्याणि की तुलना में जैसे यह लुजी बन्दरी थी, उसी तरह इनकी तुलना में जनपदकल्याणि है।” “नन्द ! अब क्या करेगा ?” “भन्ते ! क्या करने से यह अप्सराएँ मिल सकेगी ?” “श्रमण धर्म पूरा करने से ।” “यदि भन्ते ! आप मुझे इन्हें दिलाने के जिम्मेवार हो तो मै श्रमण- धर्म पूरा करूँगा ।” “नन्द ! कर। मै जिम्मेवार होता हूँ।” इस प्रकार देवसमूह के बीच में स्थविर ने तथागत को जिम्मेवार ठहरा कर कहा—“भन्ते ! देर न करें। आएँ चलें। मै श्रमण धर्म करूँगा ।” शास्ता उसे ले जेतवन चले आए। स्थविर ने श्रमण-धर्म करना आरम्भ किया। शास्ता ने धर्मसेनापति सारिपुत्र को सम्बोधन कर कहा—“सारिपुत्र ! मेरे छोटे भाई नन्द ने त्रयस्त्रिंशत् देवलोक में देवसमूह के बीच अप्सराऐं


¹ त्रयस्त्रिंशत् देवताओ का भवन।

२५२ [ २.४.१८२ दिलाने के लिए मुझे जिम्मेदार ठहराया है। इस उपाय से महामौद्गल्यायन स्थविर, महाकाश्यप स्थविर, अनुरुद्ध स्थविर, धर्मभण्डारी आनन्द स्थविर, अस्सी महाश्रावकों तथा प्रायः करके शेष सभी भिक्षुओं को कहा। धर्मसेनापति सारिपुत्र स्थविर ने नन्द स्थविर के पास जाकर कहा—आयुष्मन् ! क्या तूने सचमुच त्रयस्त्रिंशत् लोक में देवसमूह के बीच अप्सराएँ मिलें तो श्रमण- धर्म करूँगा, इसके लिए दसबलधारी (बुद्ध) को जामिन ठहराया है ? यदि ऐसा है तो तेरा ब्रह्मचर्य-जीवन स्त्रियों के लिए है, आसक्ति के लिए है। यदि तू स्त्रियों के लिए श्रमण-धर्म कर रहा है तो तुझ में और उस मजदूर में क्या अन्तर है जो मजदूरी के लिए काम करता है ?" इस प्रकार नन्द स्थविर को लज्जित किया, निस्तेज किया। इसी तरह सभी अस्सी महाश्रावकों ने तथा शेष भिक्षुओं ने उस आयुष्मन् को लज्जित किया। उसे लज्जा आई और निन्दा-भय के कारण उसने दृढ़ पराक्रम कर विप- श्यना-भावना बढ़ा अर्हत्व प्राप्त किया। फिर शास्ता के पास जाकर कहा— "भन्ते ! मैं आपको आपकी जिम्मेदारी से मुक्त करता हूँ।" शास्ता ने कहा—"नन्द ! जिस समय तूने अर्हत्व प्राप्त किया, उसी क्षण में अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो गया।" यह समाचार सुन भिक्षुओं ने धर्मसभा में बात चीत चलाई—"यह आयुष्मन् नन्द स्थविर उपदेश के कितने अधिकारी हैं। एक बार उपदेश देने से ही लज्जा तथा निन्दा-भय का ख्याल कर श्रमण-धर्म करके अर्हत्व प्राप्त कर लिया।" शास्ता ने आकर पूछा—"भिक्षुओ, बैठे क्या बातचीत कर रहे हो ?" "अमुक बातचीत।" "भिक्षुओ, न केवल अभी, पूर्व में भी नन्द उपदेश का अधिकारी ही रहा है।" फिर शास्ता ने पूर्व-जन्म की बात कही— ख. अतीत कथा पूर्व समय में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्व हाथी-शिक्षक के कुल में पैदा हुए। बडे होने पर हाथी-शिक्षा के कार्य में

सङ्गामावचर ] २५३ निष्णात हो वाराणसी राजा के एक शत्रु-राजा की सेवा म रहने लगा। उसने उसके मङ्गल हाथी को अच्छी तरह सिखाया। राजा ने वाराणसी राज्य को जीतने की इच्छा से बोधिसत्त्व को साथ ले मङ्गल हाथी पर चढ बडी भारी सेना के साथ चढाई की। उसने वाराणसी-नरेश के पास सन्देश भेजा— युद्ध करें या राज्य दे। ब्रह्मदत्त ने युद्ध करने का निर्णय किया। उसने चारदीवारी के दरवाजो पर, अट्टालिकाओ पर, नगर-द्वारो पर सेना को बिठा युद्ध करना शुरु किया। शत्रु-राजा ने मङ्गल हाथी को कवच बाँध, स्वय भी कवच पहन, हाथी के कन्धे पर बैठ तेज अङ्कुस ले हाथी को नगर की ओर बढाया, ताकि नगर (की चारदीवारी) को तोड शत्रु को मार राज्य को हस्तगत कर सके। हाथी ने जब देखा कि उधर से गर्म-गारा आदि फेंका जा रहा है तथा गुलेल और नाना प्रकार के दूसरे प्रहार किए जा रहे हैं तो वह मरने से भयभीत हो पास न जा सकने के कारण लौट पडा। हाथी-शिक्षक ने उसके पास जाकर कहा—"तात ! तू शूर है। सग्राम- जित है। इस तरह के मौके पर पीछे लौटना तेरे लिए अयोग्य है।" इतना कह हाथी को उपदेश देते हुए यह दो गाथाएँ कही— सङ्गामावचरो सूरो बलवा इति विस्सुतो किन्नु तोरणमासज्ज पटिक्कमसि कुञ्जर ! ओमह् खिप्पं पळिघ एसिकानि च अब्बह तोरणानि पमद्दित्वा खिप्पं पविस कुञ्जर ! [ कुञ्जर ! यह प्रसिद्ध है कि तू सङ्ग्राम-जित है, शूर है, बलवान् है। तोरण के पास पहुँच कर तू क्यो पीछे लौटता है ? बाधा को जल्दी तोड डाल। स्तम्भो को उखाड फेंक। कुञ्जर ! दरवाजो का मर्दन करके तू जल्दी नगर में प्रविष्ट हो।] इति विस्सुतो तात ! तू ऐसे सङ्ग्राम को जिसमें प्रहार मिलते हो मर्दन करके विचरने वाला होने से सङ्गामावचरो, दृढ-हृदय वाला होने से सूरो। बल-सम्पन्न होने से बलवा, यह प्रसिद्ध है, ज्ञात है, प्रकट है। तोरणमासज्ज,

२५४ [ २.४ ।८३ नगर-द्वार पर पहुँचे । पटिक्कमसि किस कारण से पीछे हटता है ? किस कारण से रुकता है ? श्रोमद्द मर्दन कर, नीचे गिरा दे । एसिकानि च अब्बूह, नगर-द्वार पर सोलह हाथ या आठ हाथ भूमि के अन्दर प्रवेश करके स्थिर रूप से गाडे हुए स्तम्भ एसिका-स्तम्भ कहलाते हैं। उन्हें जल्दी उखाड फेकने की आज्ञा देता है। तोरणानि पमद्दित्वा नगर-द्वार के पीछे के चौखट मर्दित कर। खिप्प पविस, जल्दी से नगर में प्रवेश कर। कुञ्जर, नाग को सम्बोधित करता है। - उसे सुन बोधिसत्त्व ने एक ही उपदेश से रुक, स्तम्भो को सूण्ड से लपेट, 'सांप की छतरियों' की तरह उखाड, तोरण का मर्दन कर बाधा को उखाड़ फेंका। फिर नगर-द्वार को तोड, नगर में प्रवेश कर राजा को राज्य ले दिया। शास्ता ने यह धर्म-देशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय हाथी नन्द था। राजा आनन्द था। हाथी शिक्षक तो मैं ही था। १८३. वाळोदक जातक "वाळोदक अप्परसं विहीनं, ॰" यह शास्ता ने जेतवन में रहते समय पांच सौ जूठन खाने वालो के बारे में कही। क. वर्तमान कथा श्रावस्ती में पाँच सौ श्रावक घर-गृहस्थी का भार अपने स्त्री-बच्चो को सौंप, शास्ता का धर्मोपदेश सुनते हुए एक साथ रहते थे। उनमे कोई स्रोतापन्न थे, कोई सकृदागामी तथा कोई अनागामी, पृथकजन कोई भी नही था। शास्ता को निमन्त्रित करते तो भी वह मिलकर ही निमन्त्रित करते। उनको दातुन, मुख धोने का जल, सुगन्धि तथा माला आदि देने वाले उनके पांच सौ छोटे सेवक जूठन खाकर रहते। वह प्रात काल का भोजन खा,

वाळोदक ] २५५ सो जाते और उठ कर अचिरवती नदी के किनारे जा कुश्ती लड़ते। लेकिन वह पाँच सौ उपासक हल्ला न मचाते हुए ध्यान-रत रहते थे। शास्ता ने उन जूठन खाने वालो का शोर सुनकर पूछा— "आनन्द ! यह शोर कैसा है ?" "भन्ते ! यह जूठन खाने वालो का शब्द है।" 'आनन्द ! यह जूठन खाने वाले केवल अभी जूठन खाकर शोर नही मचाते, पहले भी शोर मचाते रहे हैं, और यह उपासक भी न केवल अभी शान्त हैं पहले भी शान्त रहे हैं।" स्थविर के प्रार्थना करने पर शास्ता ने पूर्व-जन्म की बात कही। ख. अतीत कथा पूर्व समय में बाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करते समय बोधिसत्व अमात्य कुल में पैदा हुए। बड़े होने पर राजा के अर्थधर्मानुशासक का पद मिला। एक बार वह राजा यह सुन कि उसके इलाके में उपद्रव हो गया है, पांच सौ सैन्धव घोडे तैयार करा, चतुरंगिनी सेना के साथ जा, इलाके को शान्त कर बाराणसी लौट आया। उसने आज्ञा दी कि घोडे थके है, इसलिए उन्हें कोई नरम चीज अगूर का पेय ही पिलाया जाए। सैन्धव घोडे सुगन्धित पेय पीकर अश्व-शाला में आ अपनी अपनी जगह खड़े हो गए। उनको जो रस दिया गया था, उसमें से बचा हुआ बहुत कसैला हो गया। आदमियो ने राजा से पूछा—"इसका क्या करें ?" राजा ने आज्ञा दी—"इसमें पानी मिला, मोटे कपडे से छान, जो गधे घोडो का चारा ढो कर ले गए थे, उन्हे पिला दो।" पिला दिया गया। गधे उस कसैले पानी को भी मस्त होकर रेंकते हुए राजाङ्गण में घूमने लगे। राजा ने बडी खिड़की खोल राजाङ्गण को देखते हुए पास खडे बोधिसत्व को सम्बोधित करके कहा—"मित्र ! यह गधे कसैला पानी पीकर मस्त हो रेंकते हुए उछलते फिरते हैं। सिन्धु-कुल में पैदा हुए सैन्धव घोडे सुगन्धित पेय पीकर निःशब्द बैठे हुए उछलते कूदते नही हैं। इसका क्या कारण है ?" यह पूछते हुए राजा ने पहली गाथा कही—

२४६ [ २.४.१८३ थाळोदकं अप्परसं निहीनं पीत्वा मदो जायति गद्दभानं इमं च पीत्वान रसं पणीतं मदो न सञ्जायति सिन्धवानं [ गधों को थोड़े से रस वाला, तुच्छ, बोरे से छना हुआ पानी पीकर भी मद हो जाता है। सैन्धव घोड़ों को यह श्रेष्ठ रस पीकर भी मद नहीं होता।] वालोदकं बोरे से छाना हुआ पानी, घालूदकं भी पाठ है। निहीनं हीन रस से युक्त, न सञ्जायति, सैन्धव घोड़ो को मद नहीं होता है, क्या कारण है ? इसका कारण कहते हुए बोधिसत्त्व ने दूसरी गाथा कही— अप्पं पिवित्वान निहीनजच्चो सो मज्जति तेन ऽजनिन्द फुट्ठो धोरय्हसीलो च कुलम्हि जातो न मज्जति अग्गरसं पिवित्वा [ राजन् ! हीन कुल में पैदा हुआ, थोड़ी भी पी लेने से उसके स्पर्श से (ही) मस्त हो जाता है। स्थिर शील वाला तथा श्रेष्ठ कुल में पैदा हुआ, श्रेष्ठ रस पीकर भी मस्त नहीं होता।] • तेन जनिन्द, फुट्ठो, जनेन्द्र ! श्रेष्ठ राजन् ! वह हीन कुल में पैदा हुआ, अपने कुल की हीनता के कारण मज्जति, प्रमाद को प्राप्त होता है, धोरय्हसीलो स्थिर रूप से वहन करने की योग्यता वाला सैन्धव जाति का घोड़ा, अग्गरसं सबसे पहले लिया हुआ अंगूर-रस, पिवित्वा न मज्जति। राजा ने बोधिसत्त्व की बात सुन गधों को राजाङ्गण से निकलवाया। फिर उसी के उपदेशानुसार चल दानादि पुण्यकर्म करते हुए कर्मानुसार परलोक सिधारे।

शास्ता ने यह धर्म-देशना ला जातक का मेल बैठाया।

गिरिदत्त ] २५७ शास्ता ने यह धर्म-देशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय पाँच सौ गधे यह जूठन खाने वाले थे। पाँच सौ सैन्धव घोडे यह उपासक। राजा आनन्द। अमात्य-पण्डित तो में ही था। १८४. गिरिदत्त जातक “दूसितो गिरिदत्तेन ...” यह शास्ता ने वेळुवन में रहते समय विरोधी पक्ष का साथ देने वाले एक भिक्षु के बारे में कही। क. वर्तमान कथा पहले महिलामुख जातक¹ में जो कथा आई है, इसकी कथा भी उसी प्रकार है। शास्ता ने कहा, भिक्षुओ, यह केवल अभी विरोधी पक्ष का साथ देने वाला नहीं है, पहले भी यह विपक्ष-सेवी ही रहा है। इतना कह पूर्व-जन्म की कथा कही। ख. अतीत कथा पूर्व समय में वाराणसी में सामराजा नाम के राजा का राज्य था। उस समय बोधिसत्त्व अमात्यकुल में पैदा हो बड़े होने पर उसके अर्थ-धर्मानुशासक² हुए। राजा का पण्डव नाम का मङ्गल घोड़ा था। उसके शिक्षक का नाम था गिरिदत्त। वह लँगड़ा था। रस्सी पकड़ कर आगे आगे (लँगड़ाते ¹ महिलामुख जातक (१. ३. ६) ² लौकिक तथा नैतिक दोनों विषयों में सलाहकार। १७

२४८ [ २.४.१८४ हुए) जाने से घोडे ने सोचा कि यह मुझे सिखाना चाहता है। उसके अनुसार चलने से वह लँगडा हो गया। उसके लँगडेपन की बात राजा तक पहुँचाई गई। राजा ने वैद्यों को भेजा। उन्होंने जब देखा कि घोडे को कोई बीमारी नहीं हैं, तो उन्होंने राजा से कहा कि घोडे के शरीर में कोई रोग तो नहीं दिखाई देता। राजा ने बोधिसत्व को भेजा “मित्र ! जा, क्या कारण है, पता लगा।” उसने जाकर शिक्षक के लँगडे होने के कारण ही यह लँगडा हुआ है जान, राजा को सूचना दी, और यह दिखाने के लिए कि खराब सगत से ऐसा हो जाता है, यह गाथा कही— दूसितो गिरिदत्तेन हयो सामस्स पण्डवो पोराणं पर्कति हित्वा तस्सेव अनुविधीयति ॥ [ राजा साम के पण्डव घोडे को गिरिदत्त ने खराब कर दिया। वह अपने पहले स्वभाव को छोड कर उसीका अनुकरण करता है। ] हयो सामस्स सामराजा का मङ्गल घोडा, पोराण पर्कति हित्वा अपनी पुरानी प्रकृति, शृङ्गार छोड कर, अनुविधीयति अनुसार सीखता है। तब राजा ने पूछा—"मित्र ! अब क्या करना चाहिए ?" बोधिसत्त्व ने उत्तर दिया—अच्छा शिक्षक मिलने से फिर पहले की तरह हो जाएगा। और यह दूसरी गाथा कही— सचेव तनुजो पोसो सिखराकारकप्पितो, आनने त गहेत्वान मण्डले परिवत्तये, खिप्पमेव पहत्वान तस्सेव अनुविधीयति ॥ [ यदि सुन्दर आकार-प्रकार वाला, उस घोडे के अनुरूप शिक्षक उसे मुंह से पकड कर घुमाएगा, तो वह जल्दी ही यह (लँगडापन) छोड कर उसका अनुकरण करेगा। ]

अनभिरति ] २५६ तनुजो, उसका अनुज, अनुकूल उत्पन्न हुआ होने से अनुज। मतलब यह है—महाराज ! यदि उस शृङ्गार-युक्त आचारवान् घोडे के अनुरूप आकार प्रकार वाला पोसो। सिखराकारकल्पितो शिखर अर्थात् सुन्दर तरह से जिसकी बाल दाढी कढी है। स घोडे को आनने गहेत्वा घोडे के घुमाने की जगह पर घुमाए। सो यह शीघ्र ही लँगडेपन को छोड, यह शृङ्गारयुक्त आचारवान् अश्व शिक्षक मुझे सिखा रहा है, समझ उसका अनुकरण करेगा, उसके अनुसार सीखेगा, स्वाभाविक अवस्था को प्राप्त होगा। राजा ने वैसा करवाया। घोडा स्वाभाविक अवस्था में प्रतिष्ठित हुआ। यह सोच कि बोधिसत्त्व पशुओ तक के आशय को समझते हैं, उन्हें बहुत धन दिया । शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय गिरिदत्त देवदत्त था। घोडा विरोधी पक्ष का साथ देने वाला भिक्षु। राजा आनन्द। अमात्य पण्डित तो में ही था। १८५. अनभिरति जातक “यथोदके आविले अप्पसन्ने ” यह शास्ता ने जेतवन में विहार करते समय एक ब्राह्मण कुमार के बारे में कही। क. वर्तमान कथा श्रावस्ती में तीनो वेदो का जानकार एक ब्राह्मण-कुमार बहुत से क्षत्रिय तथा ब्राह्मणकुमारो को वेद पढाता था। आगे चलकर उसने घर बसाया। वस्त्र, अलङ्कार, दास, दासी, खेत, घरतु गो, भेंस, पुत्र तथा स्त्री आदि की

चिन्ता करने से राग, द्वेष और मोह के वशीभूत हो वह अस्थिर चित्त हो गया। मन्त्रों को क्रम से न पढ़ा सकता था। जहाँ तहाँ मन्त्र समझ में न आते थे। एक दिन वह बहुत सी सुगन्धियों तथा माला आदि लेकर जेतवन गया। वहाँ शास्ता की पूजा कर एक ओर बैठा। शास्ता ने कुशलक्षेम पूछने के बाद कहा—माणवक ¹ क्या मन्त्र पढ़ाते हो? मन्त्रों का अभ्यास बना है?" "भन्ते ! पहले मुझे मन्त्र अभ्यस्त थे। लेकिन जब से घर बसाया, तब से मेरा चित्त अस्थिर हो गया। इससे मन्त्रों का अभ्यास नहीं रहा।" शास्ता ने उसे कहा—"माणवक ! न केवल अभी, पहले भी जब तेरा चित्त स्थिर था, तभी तुझे मन्त्रों का अभ्यास था। रागादि से अस्थिर होने के समय तुझे मन्त्र समझ में नहीं आए।" उसके प्रार्थना करने पर शास्ता ने पूर्व-जन्म की बात कही।

ख. अतीत कथा

पूर्व समय में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करते हुए बोधिसत्व ब्राह्मणों के एक प्रधान कुल में पैदा हुए। बड़े होने पर तक्षशिला में मन्त्र सीख प्रसिद्ध आचार्य्य हो वाराणसी में बहुत से क्षत्रिय, ब्राह्मण कुमारों को वेद पढ़ाने लगा। उसके पास एक ब्राह्मण माणवक ने तीनों वेदों का अभ्यास किया। प्रत्येक पद तब में असंदिग्ध हो, उपाचार्य्य बन मन्त्र सिखाने लगा। वह आगे चलकर गृहस्थ हो गृहस्थी की चिन्ता से अस्थिर चित्त होने के कारण मन्त्रों का पाठ नहीं कर सकता था। आचार्य्य के पास जाने पर आचार्य्य ने पूछा—"माणवक ! क्यो तुझे मन्त्र अभ्यस्त हैं?" "गृहस्थ होने के समय से मेरा चित्त अस्थिर हो गया। में मन्त्रों का पाठ नहीं कर सकता।" ऐसा कहने पर आचार्य्य ने 'तात! अस्थिर चित्त होने से अन्यन्त मन्त्रों का भी प्रतिभान नहीं होता, स्थिर चित्त रहने पर विस्मृति होती ही नहीं' कह यह गाथाएँ कहा—

यसोदके अस्सिमे अण्णवम्हि न पस्सति सिप्पिसम्बुकञ्च

अनभिरति ] २६१ सक्खर वालुक मच्छगुम्ब एव आाविले हि चित्ते न पस्सति अत्तदत्थ परत्थ ॥ यथोदके अच्छे विप्पसन्ने सो पस्सति सिप्पिकसम्बुकस्सञ्च सक्खर वातुक मच्छगुम्ब एवं अनाविलाह चित्ते । सो पस्सति अत्तदत्य परत्य ॥ [ जिस प्रकार गंदले, मैले पानी में सीपी, शख, कफर, बालू तथा मछ- लियो का समूह नही दिखाई देता, उसी प्रकार अस्थिर चित होने पर आत्मार्थ तथा परार्थ नही सूझता । जिस प्रकार निर्मल, साफ पानी में सीपी, शख, कफर, बालू तथा मछ- लियो का समूह दिखाई देता है, उसी प्रकार स्थिर चित्त होने पर आत्मार्थ तथा परार्थ सूझता है । ] आाविले कीचड से गंदले हुए, अप्पसन्ने उसी गंदलपन के कारण मैले । सिप्पिकसम्बुक, सीपी और शंख । मच्छगुम्ब मछलियो का समूह । एवं आाविले, इसी प्रकार रागादि से अस्थिर चित्त अत्तदत्य परत्य, न आत्मार्थ न परार्थ देखता है—यही अर्थ है। सो पस्सति, इसी प्रकार स्थिर चित्त होने पर वह आदमी आत्मार्थ तथा परार्थ देखता है । शास्ता ने यह धर्मदेशना ला, आार्य(-सत्यो) को प्रकाशित कर जातक का मेल बैठाया । आार्य(सत्यो) का प्रकाशन समाप्त होने पर ब्राह्मण कुमार सोतापत्ति फल में प्रतिष्ठित हुआ । उस समय माणवक वही माणवक था । आचार्य्य तो मे ही था।

✓ १८६. दधिवाहन जातक

२६२ [ २.४.१८६

✓ १८६. दधिवाहन जातक

“वण्णगन्धरसूपेतो...” यह शास्ता ने वेळुवन में विहार करते समय विरोधी पक्ष का साथ देने वाले के बारे में कही।

क. वर्तमान कथा

जो कथा पहले आ चुकी है, १ वैसी ही कथा है। शास्ता ने कहा- “भिक्षुओ ! बुरे की संगत बुरी होती है, अनर्थकारी होती है। मनुष्यों के लिए कुसंगति के दुष्परिणाम का क्या कहना ? पूर्व समय में अस्वादिष्ट, अमधुरै नीम के वृक्ष की संगति के कारण मधुर-रस वाला, दिव्य-रस वाला, जड, आम का वृक्ष भी अमधुर, कडुआ हो गया ।” इतना कह पूर्व-जन्म की कथा कही।

ख. अतीत कथा

पूर्व समय में वाराणसी मे ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय काशी राष्ट्र में चार ब्राह्मण भाई ऋषियो के प्रव्रज्या क्रम से प्रव्रजित हो, हिमवन्त प्रदेश में क्रम से पर्णशालाएँ बना रहने लगे। उनमें से जो ज्येष्ठ था वह मर कर शक्र देवता हुआ। इस बात को जान वह बीच बीच में सातवें आठवे दिन अपने उन भाइयो की सेवा में आता। एक दिन उसने ज्येष्ठ तपस्वी को प्रणाम कर एक ओर बैठ पूछा- “भन्ते ! आपको किस चीज की जरूरत है ?” पाण्डु-रोग से पीडित तपस्वी ने कहा- “मुझे आग की जरूरत है।” उसने उसे छुरी-कुल्हाडी दी। यह छुरी-कुल्हाडी दस्ते के हिसाब से जैसे दस्ता

• 'देखो गिरिदत्त जातक (१८४)

दधिवाहन ] २६३ डाला जाता छुरी भी बन जाती, कुल्हाडी भी बन जाती। तपस्वी ने पूछा— "इसे लेकर कौन मेरे लिए लकडियां लाएगा ?" शक्र ने कहा—"भन्ते ! जब आपको लकडी की जरूरत हो, इस कुल्हाडी को हाथ से रगड़ कर कहें, जाओ मेरे लिए लकडियां ला कर आग बना दो। यह लकडियां लाकर आग बना देगी।" उसे छुरी-कुल्हाडी दे दूसरे से भी जाकर पूछा—"भन्ते ! तुम्हें क्या चाहिए ?" उसकी पर्णशाला के पास से हाथियो के आने जाने का रास्ता था। उसे हाथियो का उपद्रव था। इसलिए उसने कहा—"मुझे हाथियो के कारण दुख होता है। उन्हे भगा दें।" शक्र ने उसे एक ढोल लाकर दिया और कहा कि इस ओर बजाने से तुम्हारे शत्रु भाग जाएंगे, और इस ओर बजाने से मैत्री भाव युक्त हो चारो प्रकार की सेना सहित तुम्हारे पास आ जाएंगे। इतना कह और वह ढोल दे छोटे भाई के पास जा पूछा—"भन्ते ! तुम्हे क्या चाहिए ?" उसकी भी पाण्डुरोग की प्रवृत्ति थी। इसलिए उसने कहा कि मुझे दही चाहिए। शक्र ने उसे एक दही का घड़ा दिया और कहा—"यदि तुम्हारी इच्छा हो तो इसे उलटना। उलटने पर यह महानदी बहाकर, बाढ़ लाकर तुम्हें राज्य भी लेकर दे सकेगा" इतना कह कर इन्द्र चला गया। उस समय से छुरी-कुल्हाडी ज्येष्ठ भाई के लिए आग बना देती। दूसरा जब ढोल बजाता तो हाथी भाग जाते। छोटा दही खाता। उस समय किसी उजडे हुए गाँव की जगह पर घूमते हुए एक सूअर ने एक दिव्य मणि-खण्ड देखा। उसने उस मणि-खण्ड को मुंह से उठा लिया। उसके प्रताप से वह आकाश में ऊँचे उड़ा। वहाँ से उसने समुद्र के बीच में एक द्वीप पर पहुँच सोचा—मुझे यहाँ रहना चाहिए। इसलिए वहाँ उतर एक गूलर के वृक्ष के नीचे सुख पूर्वक रहने लगा। एक दिन वह उस वृक्ष के नीचे उस मणि-खण्ड को अपने सामने रख सो गया। काशी राष्ट्र का एक आदमी, जिसे उसके माता पिता ने निकम्मा समझ घर से निकाल दिया था, एक पत्तन गाँव पर पहुँचा। वहाँ उसने नाविको के पास नौकरी की। नौका पर चढ कर जा रहा था कि समुद्र के बीच में नौका टूट गई। वह एक लकडी के तख्ते पर बैठा उस द्वीप में पहुँचा। वहाँ फलमूल

२६४ [ २.४.१८६ खोजते हुए उसने उस सूअर को सोते हुए देख आहिस्ता से समीप जा मणि- खण्ड उठा लिया। उसके प्रताप से आकाश में उड गूलर के वृक्ष पर बैठ सोचने लगा-यह सूअर इसी के प्रताप से आकाश में घूमता हुआ यहाँ रहता है। मुझे पहले ही इसे मार कर मास खाकर पीछे जाना चाहिए। उसने एक डण्डा तोड कर उसके सिर पर गिराया। सूअर ने जागकर जब मणि को न देखा तो वह कांपता हुआ इधर उधर दौडने लगा। वृक्ष पर बैठा हुआ आदमी हँसा। सूअर ने उसे देखा तो वृक्ष से सिर दे मारा, और वहीं मर गया। उस आदमी ने उतर कर आग बनाई और उसका मास पका कर खाया। फिर आकाश में उडकर हिमालय के ऊपर से जाते हुए उस आश्रम को देख ज्येष्ठ तपस्वी के आश्रम पर उतरा। दो तीन दिन रह कर तपस्वी की सेवा की। वहाँ उसने छुरी-कुल्हाडी की महिमा देखी। 'इसे मुझे लेना चाहिए' सोच उसने तपस्वी को मणि-खण्ड की महिमा बता कर कहा- भन्ते ! यह मणि-खण्ड लेकर मुझे यह छुरी-कुल्हाडी दें। आकाश मे घूमने की इच्छा से उस तपस्वी ने मणि-खण्ड लेकर यह छुरी-कुल्हाडी दे दी। उसने थोडी दूर जा छुरी-कुल्हाडी को हाथ से रगड कर कहा-"छुरी- कुल्हाडी ! तपस्वी के सिर को काटकर मेरा मणि-खण्ड ले आ।" वह जाकर तपस्वी का सिर काट मणि-खण्ड ले आई। उस आदमी ने छुरी-कुल्हाडी को एक जगह छिपा कर मँझले तपस्वी के पास जा, कुछ दिन रह, ढोल की महिमा देख मणि-खण्ड दे, भेरी ली। फिर पूर्वोक्त प्रकार से उसका भी सिर कटवा छोटे तपस्वी के पास जा, दही के घट की महिमा देख पूर्वोक्त प्रकार से ही उसका भी सिर कटवा, मणि-खण्ड, छुरी- कुल्हाडी, ढोल तथा दही का घडा ले, आकाश में उड कर वाराणसी के पास पहुँचा। वहाँ से उसने वाराणसी के राजा के पास एक आदमी के हाथ पत्र भेजा-युद्ध करें अथवा राज्य दें। राजा सन्देश सुनते ही विद्रोही को पकडने के लिए निकल पडा। उसने ढोल के एक तल को बजाया। चारो प्रकार की सेना पहुँच गई। जब उसने देखा कि राजा ने अपनी सेना पंक्ति-बद्ध कर ली, उसने दही के घडे को छोडा। बडी भारी नदी बह निकली। जनसमूह दही में डूब गया और निकल न सका।

दधिवाहन ] २६५ छुरी-कुल्हाड़ी पर हाथ फेर उसे आज्ञा दी कि जाकर राजा का सिर ले आए। छुरी-कुल्हाड़ी ने जाकर राजा का सिर ला पैरो पर रख दिया। एक भी आदमी हथियार न उठा सका। उसने बड़ी सेना के साथ नगर में प्रवेश कर, अभिषेक करवा, दधिवाहन नाम से धर्मपूर्वक राज्य किया। एक दिन यह महानदी में जाल की टोकरी फेंक कर खेल रहा था। कण्ण- मुण्ड सरोवर से देवताओ के उपभोग में आने वाला एक पका आम आकर जाल में लगा। जाल उठाने वालो ने उसे देख कर राजा को दिया। वह बड़ा था, घड़े के प्रमाण का था, गोलाकार था, सुनहरी रंग का था। राजा ने बनचरो से पूछा—"यह किसका फल है ?" उन्होने बताया—आम्रफल। राजा ने उसे खाकर उसकी गुठली अपने उद्यान में लगवा, उसे दूध-पानी से सिंचवाया। पेड़ लगकर उसने तीसरे वर्ष फल दिया। आम के पेड़ का बहुत सत्कार होने लगा। दूध-पानी से उसे सींचते, सुगन्धित द्रव्यो के पञ्चाङ्गुलि-चिन्ह लगाते, और मालाओ के जाल पवते। सुगन्धित तेल के दीपक जलाते। यह कीमती कपडे की कनातो से घिरा रहता। इसके फल मधुर तथा सुनहरी रंग के होते। जब दधिवाहन राजा दूसरे राजाओ के पास आम के फल भेजता तो इस डर से कि कही गुठली से पेड न लग जाए वह अंकुर निकलने की जगह को कांटे से बींध देता। वे आम खाकर गुठली को रोपते। पेड़ न लगता। उन्होने पूछा तो पता लगा कि क्या कारण है ? एक राजा ने अपने माली को बुलाकर पूछा कि क्या वह दधिवाहन राजा के आमो के रस को नष्ट कर उन्हें कडुवा बना सकेगा ? उसने कहा—देव ! हाँ। "तो जा" कह, उसे हजार देकर विदा किया। उसने वाराणसी पहुँच राजा के पास खबर भिजवाई कि एक माली आया है। राजा न उसे बुलवाया। उसने जा राजा को प्रणाम कर "तू माली है ?" पूछने पर कहा—"देव ! हाँ" और अपनी योग्यता का बखान किया। राजा ने आज्ञा दी—जा हमारे माली के साथ रह। उस समय से वह दोनो जने बाग की सार संभाल रखते। नए माली ने अकाल-फूल फुला कर और अकाल-फल लगाकर उद्यान को रमणीय बना दिया।