कबीर कृष्ण गीता
Kabir Krishna Gita
युगल आनंद विहारी द्वारा
स्रोत: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (उद्गम)
लक्ष्मी आदि देवियोंके गुरुमुख होनेका वृत्तान्त
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कबीरकृष्णगीता ।
सबमो राम सो रमहिं कबीरा । जैसे घृत व्यापक है क्षीरा ॥ बैठा नवर बराबर पोखे । पाप नाचि तबै पुण्य कर चोखे ॥ ना कोइ पाप जिवघातसमाना । साधुसेवासम पुण्य न आना ॥ गुरुके भक्तसमान नहिं दूजा । पतिव्रता जिमि भियपद पूजा ॥ सद्गुरु पिव सो जीवके आहीं । पतिव्रताते गुरुभक्तभेदआहीं ॥ तिन स्वामीके भक्त सुरलोक । गुरु भियभक्त सो जीवनिसोका ॥ भ्रान मंजार देह धर सोई । गुरु साधुको निन्देउ सोई ॥ हरदम नाम कबीरको गावे । तासु हृदय कबीर सयावे ॥ तजे अभक्ष सुभक्ष सो पावे । भीन मास यदार रत नहिं भावे ॥
दोहा--मधुर मम पाय कसतुरी, माक्षी घोंघी चुन ।
मत्स्य मास मद त्यागे, पहुँचे पुरुष सनीप ॥
पान परवाना पावे, सुमरे सत्य कबीर ।
कहे कबीर घर पहुँचे, बहुर न धरे शरीर ॥
ब्रह्मा विष्णु महेश भवानी । लक्ष्मी गायनि सकुचानी ॥
हम सब गुरुविनकोहिपंथ जायव । ना जानो केहि खान समायव ॥
हमरे स्वामी तेहि सिर दीन्हा । हम तीनों मिल केहि पग लीन्हा ॥
लक्ष्मीवचन ।
लक्ष्मी कहे सुनो ब्रह्माणी । सुन सेवहु कबीर सुखवाणी ॥
चहिये कबीरके दीक्षा लीजे । सत्यकबीर चरण चित दीजे ॥
कह लक्ष्मी मम पति सिरदारा । थो मम पतिके सद्गुरु सारा ॥
यह कह लक्ष्मी विष्णुपहँआई । सीस नाय चरण चित लाई ॥
आज्ञा करिये स्वामी मोरा । तब गुरु करो कबीरबदिछोरा ॥
कबीरकृष्णगीता ।
१ ३१
विष्णुवद्भन ।
हंसके विष्णु तवआयसु दीन्हा । हम जो चहत सोईतुम कीन्हा ॥
दोहा-धन्य भाग तेहि नारको, विष्णव जाको स्वामी ।
बहुर भाग तेहि पुरुषको, जेहि घर विष्णव वामी ।
कहैं कृष्ण नरिअर कर लेहू । सीस निछावर नरियर देहू ॥
दोहा-पान मिष्ठान्न नरियर, पुंगी फल पुष्प श्वेत ।
श्वेत वस्त्र सिंहोसन, साजहु थार समेत ॥
कंचन थार जोत प्रकाश । हीरा माणिक अथ सुवासा ॥
कृष्ण लाय पीछे निज नारी । चले भक्त राधे झझकारी ॥
पुन सत शिवको सिधाई । कबीरके चरण परससवआई ॥
कहैं कृष्ण सुन सत्यकबीर । दीजे शरण नार त्रिय धीर ॥
लक्ष्मीबचन ।
लक्ष्मी कहे विविध कर जोरी । हमको तारहु यमसोबांदिछोरी ॥
कबीरबचन ।
दोहा-कहैं कबीर सुन लक्ष्मी, सोई नार सुलक्ष ।
तन स्वामी जिव पीव कहैं, सेवा करती दक्ष ॥
अपने पति तज आन न जोवे । सोई नार पतिव्रता होवे ॥
पतिव्रता निज प्रियपद पूजा । जग महीं पतितज सृष्टि न दूजा ॥
दोहा-पिय चरणोदक जूठन, पतिव्रताको आधार ।
पियहे अंबू अगिन घसे, सिरदे हने पहार ॥
सवपर सत्यनाम गुरुरूपा । अजर अमर गुरु सत् सख्पा ॥
जीव सबे गुरु समर्थ केरा । जासु प्राण वस जाके चेरा ॥
१३२
कबीरकृष्णगीता ।
तुम तो लक्ष्मी सत्यकी माया । साधु संतपर करिहो दाया ॥ सुनहु कृष्ण स्त्री गुरु स्वामी । तन गुरुपति पति गुरु निज नार्मी। कृष्णवचन ।
कहैं कृष्ण हम दासी दासा । एक मत घर तब संत विलासा ॥ तब कबीर प्रसाद चढावा । सत्यनाम कहैं भोग लगावा ॥ यम त्रिण तोड दीन्ह परवाना । लक्ष्मी पान पाय सुख माना ॥ चरणामृत सीत प्रसादा । लीन्ह लक्ष्मी सचको स्वादा ॥ सात दंडवत कीन्ह स्वसम कहैं । तीन दंडवत संत तनपति कहैं ॥ कहा कृष्ण अब हम गतिपावा । घर साकट वैष्णव करवावा ॥ केते पुरुष आय गुरु शिष्या । नारी साकट घर प्रेत परेखा ॥
दोहा-भक्ति करे जो स्त्री, तो वीसिये घर माहिं । साकट स्त्री भुंभनी; नहिं जैये तेहि पाहिं ॥
स्त्री बेटी बेटा भानजी । मात पितु बंधु परिजन काजी ॥ ये सब सरगुण भ्रम पसारा । मोर मोर कर मरे संसारा ॥ मोर मोर का करहु रे भाई । मोर आप पगु देख तवाई ॥ सब गुण शूद्र तासु धराई । भक्ति बिना कछु काम न आई ॥ अपने मन सब भक्त कराहीं । सार भक्त विन नरक भोगाहीं ॥ सार भक्त सतनाम कबीरा । भजै कबीर न घरै शरीरा ॥ चौथा पद सदुरु स्थाना । सदुरु सत्य कबीर निरवाना ॥ निरगुण भक्त पतिव्रत शरीरा । एक स्वसम सो सत्य कबीरा ॥ त्रिगुण भक्त सो आवा जाहीं । चौरासी मई भटका खाहीं ॥
कबीरकृष्णगीता ।
१३३
दोहा--सतगुण रजगुण तमगुण, तिनके तीन सुभाव ॥ कौन सिरजे कौन पोखे, कोइ संहार कराव ।
रजगुण तमकी उत्पत जाना । सतगुण सोवत जन्म सिराना ॥ तमगुण रुद्र काल संहारे । त्रिगुण निरंजन भसम कर धारे । बांचे विष्णु सतगुण सत ठाई । सत्यके मूलसत्य कबीर सतसोई जेहि जस रुचे तैसो गुरु कीजे । विन गुरुजीव काल वस दीजे ॥
दोहा--सावित्री ओ गौरा, मगन भये हरि बैन ।
कहैं हमहू गुरु करों, सत्य कबीर सुख चैन ॥ कहैं कृष्ण कबीरसे वाणी । शिष्य होन चाहैं त्रिय दाय प्राणी ॥ कबीरवचन ।
कहैं कबीर खीवस स्वामी । पति कहैं पूछ नाम भज नामी ॥ गायत्रीगौरावचन ।
कहैं गायत्री गौरा बहोरी । सबके स्वामी तुम बंदिछोरी ॥ दुतिया माहि कोइ हित नाहीं । दिन दश कच्चा सुख जगमाहीं ॥ अंतकाल जब काल गरासे । तब गुरु विन नहिं कोइ निकसे ॥ अधा अंछंगी तेहमें तानी । लक्ष्मी तुव शरण हम कालअधीनी सत्यकबीर तुम गुरु पितु माता । तुम्हरी दया बने सब वाता ॥ हम चीन्हा तुम साहेब आहूँ । सब बनजिया तुमही गुरु साहूँ ॥ तुम जेहि चितबहु सो तर जाईं । तुम विन जियरा नरक भोगाईं ॥ गौरा कहैं विहसिके वाणी । हमहू लखा कबीर सहिदानी ॥ जबहिं विष्णु हरिनाकुश मारा । शिव गुणसुत छिन असुरहिं मारा हमहू शिवगण आईं हां । बैठे हरिनाकुश सिरमाहा । जब कबीर विष्णुके माथे । तब देखा मैं शिवके साथे ॥
१३४
कवीरुक्षणगीता ।
कवीरवचन ।
कहैं कवीर सही तुम कहा । होहू शिष्य कपिलमुनि पहा ॥
दोहा-कपिला गऊ कपिल मुनि, हो सट्टरु हो तास ।
तास शिष्य मम पुत्री, तुम्हरे होय निवाह ॥
कृष्णवचन ।
कहा कृष्ण गौरा सावित्रिहिं । एके वृक्ष डारभै निवधिहिं ॥
भूल कवीर निरंजन डारा । साखा त्रिगुण पत्र संसारा ॥
पाँच पचीस जीव संग परऊ । हंस चाल तज बक मग गहू ॥
हंस सोई जिन सट्टरु चीन्हा । सट्टरु सत्यकवीर चित दीन्हा ॥
दोहा-सावत्री औ गौरा, भई कपिलमुनि शिष्य ।
विष्णुआदिक कवीर प्रमोधा, भयो सवन मन हर्ष ॥
तेहि छिन मात्र रुद्र अज आये । देश सुल्क सुख हरहि सुनाये ॥
पूछा विष्णु मृत्युलोक कहानी । चतुरावन शिव कहा बखानी ॥
ब्रह्माशिववचन ।
महा आनंद होत सब ठाऊं । भौ मृत्युलोक वैकुंठ सुभाऊं ॥
विष्णव मया सकल जग जाई । सत्यकवीर जपे दुनियाई ॥
राम कवीर करे पंथ जागा । जग सब भक्त भयउ मद त्यागा ॥
विष्णव होय सो गिने न काहू । कहैं के को तुम अज शिव आहू ॥
कृष्णवचन ।
कहैं कृष्ण यह भलि है बाता । तुम अंकुल काहे अकुलाता ॥
तुमहु भक्त करहु भल चाहहू । तजहु क्रोध सट्टरु पहिचानहू ॥
महादेववचन ।
कहैं महादेव तमकके बाता । सट्टरु तुमहि विष्णु जगदाता ॥
कबीरकृष्णगीता ।
१३५
कृष्णवचन ।
कहे कृष्ण हम सदुरु नाहीं । सदुरुके पदरजको छाहीं ॥ सदुरु एके सत्य कबीरा । काया वीर सतनाम कबीरा ॥ काया वीर बोलता पवना । आद पवनसो स्वास अजौना ॥ खंस हंस सरवर तनयाहीं । अमी अहार सदा सुखयाहीं ॥ सोहंग हंस अंस सतनामा । सोहंग करता पुरुष वखाना ॥ सोहंग एक कबीरते छोटा । सबसे बडे सोहंग रूप मोटा ॥ सोहंग स्वास एकहि नाऊ । अनंत नाम स्वासके भाऊ ॥ दोहा—अनंत नाम एक स्वासके, स्वासा सबके माहिं ।
निरंजन अद्या अज हरिहर, जतरूवास विना कोई नाहिं सो स्वासा स्वासा विस्तारहि । आद स्वासा सो भौ सोहंग छाही। वास सोहंग सो ओंकार भो तीनी । सबके रचना कबीरजी कीन्ही दोहा—राम कबीरके अंश हैं, कबीर रामके अंश ।
राम कबीरके वंश हैं, कबीर रामके वंश ॥ सत्य सो पिता पुत्र होय धाया । तबहिं पुत्र पिता कहलाया ॥ स्वासा सत्यकबीरको अंसा । देह निरंजन घट पर संसा ॥ ब्रह्माशिववचन ।
सुनि ब्रह्मा शिव अचरज भयऊ । तबहीं शिव अस बोले लियऊ ॥ सही कबीर बडे हैं भाई । मोह कहा भूतको राई ॥ जासे हम तुम सब मिल हारा । एक बेर नहिं कैयो बारा ॥ कबीर करता हम तबहीं चीन्हा । खरा जबाब जब हम कह दीन्हा ब्रह्मा कहे कबीर करतारा । कबीर कला सो अपरम्पारा ॥ निरंजन जाके ढर भौ माना । कबीरके त्राससो काल डेराना ॥
सत्यलोकके हंसोंके रूपका वर्णन
१३६
कबीरकृष्णगीता ।
कृष्णवचन ।
इतना सुन कृष्ण कबीरपहँ हेरा । तब कबीर भगटे तेहि बेरा ॥
सत्यनाम कहि शब्द उचारा । अडुत लीला कला विस्तारा ॥
सोभा लोक रोम एक प्रगटा । अडुत चंद सूर भौ घटा ॥
दोहा-सिंहासन पर बैठे, सट्टरु सत्यकबीर ।
अमित कला छबिको कहे, अडुत हंस मन हीर ॥
धन्य भाग्य वैकुंठके, जहँ प्रगटे सत्यनाम ।
सट्टरु देव अनंदही, रजगुण तमगुण धाम ॥
कला गुप्त किये सत्यकबीरा । जैसेको तैसे यतधीरा ॥
सबे देव थरहर पग लागे । परसत चरण सकल भगभागे ॥
अजहरवचन ।
अजहर सबे कहे हरसेती । सबे शरण गहो यही सुनेती ॥
दोहा-ब्रह्मा विष्णु महेश्वर, सबन कृष्ण समुझाय ।
फिर यह अवसर कहाँ मिले, गहो कबीरके पाँव ॥
हरषत अजहर लीन्हो पाना । नारि पुरुष एक मत निरवाना ॥
चरणाभूत सबहिन कहँ दीन्ह। सबन माँग प्रीतिसो लीन्ह। ॥
कबीरवचन ।
कहे कबीर सुनो त्रियदेवा । आपन अंस रचहु जग सेवा ॥
ठीका पुरे तुम लोक सिधावो । पितुके सेवा अंस बैठावो ॥
सट्टरु भाकि हृदय महँ राखहु । मात पिता सेवा सत भाषहु ॥
माता पिता सबे भल होई । सट्टरु सेय तरे कुल दोई ॥
काम क्रोध आपा घट काढव । सेवा साध सखा घर बाढव ॥
कबीरकृष्णगीता ।
१३७
कहैं कबीर सत्यकी चाली । तरे शिष्य ठागे सुर नाली ॥ सत्य कहे होय कारज जिवके । सत्य गहे मिलिहै निज पियके ॥
दोहा-सत्य ताहि कहैं कहिये, रती न मिथ्या जाहि ।
कहैं कबीर कृष्णगीता, विष्णु व्यास चित चाहि ॥
कहैं कबीर सुनो सब कोई । भाषों काया प्रचे सोई ॥ काया सो जो अमर ना रहई । जिवरा योनी नहि औतरई ॥ षोडश शशि सोहंसन भाला । चकित चंद है कलात्रियभाळा ॥ यनिमाली कंठ माल विराजे । कोटिन रवि शशि नखछविछाजे ॥ छत्र सिंहसन जगमग जोती । हंस खान शशि तिहुँ पुर पोती ॥ अमरलोक सो अमर हंसा । अमृतफल भोजन निहंससा ॥ अमर चीर तन विमल विराजे । देह सुवास प्राणमें छाजे ॥ श्वेत भंवर पंकज विन नाला । अभी सिंधुतट कुंज रिसाला ॥ कमोदनि विमलश्वेत उजियारी । मन पृथ्वी तन फल फुलवारी ॥ विमल सुगंध विटप फलपाता । पक्षी केलिकरें रंग राता ॥ त्रिधि विहंगम मय कर जूहा । चंद उदै फल फूल सबूहा ॥ विहसहि हंस महा रस खानी । दसनपांति मन जगमग वाणी ॥ काया अमर सुगंध अंजोरा । योजन शत सुवास धनघोरा ॥ हंस काया अस अमरलोक । परस पुरुष पद हंस निसोका ॥ यह शोभा संक्षेप वखाना । अद्भुत शोभा अकह अंमाना ॥ सत्यनामका लेय परवाना । निराकारका मर्दन माना ॥ सो पावे यह काया भाई । कहैं कबीर जिन मोहि लौलाई ॥ कोट सूर्य छवि हंसन काया । बहुत अंजोर संक्षेप सुनाया ॥
ब्रह्मा और कबीर सम्वाद - लोक द्वीपका वर्णन
१३८
कबीरकृष्णगीता ।
दोहा-सत्यनामके एक रोम छवि, तुले न कोटि अनंत । अदुत शोभा कह कहों, कोट अनंत सूर चंद ॥ शीतल रवि सतलोक मझारा । अगिनसूरज भयो तब निराकारा अगिनको रास निरंजन काया । अभितरास पुरुष पगु छाया ॥ हंसन काया कंचन सूंचा । कोटिन रवि विधि सरिस न पहुँचा विष्णुके काया कंचन आभा । जैसे अन्नके अगुवा भाभा ॥ स्याम भये हरि पितके खोजा । अरि विष झार स्यामतन बोजा ॥ ब्रह्मा ताम रुद्र तन लोहा । लरगा इंद्रका मत फंद मोहा ॥ प्रेत खान विष्टाके देहा । नरक देह नर नार उरेहा ॥ चौरासी लक्ष योनी खानी । नरककी नार सो अंकुर जानी ॥ कोइ एक हंस अंकुरी होई । अंकुर पावहिँ अभिष न जोई ॥ अंकुरी जो भजे सतनामा । तो सब सुधरे वाको काया ॥ सत्यनाम कबीर बखाना । कहैं जनार्दन वचन प्रवाना ॥
विष्णुवचन ।
कहैं विष्णु सुन नारद व्यासा । नाम कबीर भजो सुखरासा ॥
दोहा-सकल जीव गायत्री, बांध निरंजन राय ।
सत्यकबीर सो रक्षक, कहैं कृष्ण समुझाय ॥
ब्रह्मावचन ।
ब्रह्मा कहैं सीस सुई लाई । सत्यकबीर मोहिँ कहहु बुवाई ॥
केतिक दूर आहि सतलोक । जहां रहहिँ सब हंस निसोका ॥
सत्यकबीर सत्यपुरुष अमाना । न्यारा सबसे सकल अमाना ॥
अजर अमर सत्पुरुष अजावन । जिन भज सतकबीर गुरुपावन ॥
कबीरकृष्णगीता ।
१३९
कहैं ब्रह्मा हम सब बड भागी । उवरे चरण कबीरके लागी ॥ पायउं सुत्कको खान प्रवाना । जीवत सुत्क भये अज जाना ॥
कबीरवचन ।
कहैं कबीर सुनो चतुरानन । सत्यनाम भज मन वच करमन ॥ एक आस सत्यनामकी कीरये । और आस सकलो परिहरिये ॥ सत्यनामते अधिक न कोई । सत्यनाम भज अविचलहोई ॥ अब तुम सुनहु लोक जत दूरी । गुरु ज्ञानीको हाल हजुरी ॥ निर्जनके सुखसे बाहर । सत्यलोक अमरपुर ठाहर ॥ सात तबक नभ सात पताल । चौदह यम विच जीव विहाला ॥ चौदह तबक चौदह यम ईशा । यमकी सेना रोम तन दीसा ॥ सिद्धदास सतनाम कबीरा । गज रथ यम सैना घर चीरा ॥ पृथ्वी उर्ध योजन लक्ष मेघा । तासु पुन नभतर विषेधा ॥ रवि उर्ध लक्ष योजन है चंद । चंद उर्ध तन नखत अनंदा ॥ तेइस लक्ष योजन उर्ध अपक्षरा । तेहि तत उर्ध सुरासन ठहरा ॥ सूर आस तत उर्ध यम साला । तेहि तत उर्ध निर्जन काला ॥
दोहा—ताके आगे तत दूरी, महाक्षेत्र सो नारि ।
तेहि तत मानसरोवर जहैं, कामनी रचि धमारि ॥ ताके आगे सहज सो दीपा । योगजीतके दीप सनीपा ॥ सबे दीप अग्र महकाई । घ्राण सुगंध सकल रहु छाई ॥ पुरुषलोक जाय सो हंसा । ताको तरे इकोतर बंसा ॥
ब्रह्मावचन ।
ब्रह्मा मम होय पगु धारा । कर जोरे भाभी स्तुति सारा ॥ कहैं ब्रह्मा धन्य कृष्ण व्यासा । जिन कियो प्रगट कबीर प्रकाशा
महादेव और कबीर सम्वाद - योगका वर्णन
१४०
कबीररुणगीता ।
कहैं अज सत्यकबीर संवादी । हम सब शिशु क्रीतमलघुवादी ॥ अन चीन्है हम बाद बहु कीन्हा । बरुसहु सत्यकबीर प्रवीना ॥ अब तो शरण तुम्हारी आये । यम अवगुण क्षमा प्रभु लाये ॥
कबीरवचन ।
कहैं कबीर सुनो अज वाणी । मात पिता शिशु घट नहिं यानी ॥ जो हम क्रोध करो तुव सबपर । को तोहिराख सके अज हरिहर ॥ तुन तीनोंके पितु महकाला । निराकार सब करे विहाला ॥ हम तुम सबको प्रथम चेतावा । गहो शरण होय जिव सुत्कावा ॥ तब तुम गर्भवासमहैं भूले । ताते फिर २ योनी झूले ॥ जब सिर टेकेउ ऋषिदेव कारा । तब कबीरके शरण पवैरा ॥ कबीरके नाम शरण प्रतापा । उलटहिं जाय कालहिं चांपा ॥ कहैं कबीर सुनहु तुम चित दे । हृदय कबीर नाम जप हितकै ॥ जो जेहि नाम सुमरे चितलाई । हृदय कबीर नाम लौलाई ॥ दोहा-निशि दिन सुमरहु नाम मम, यमते रहहु निसंक ।
शब्द निरख पंथ गवनहु, गुरु पितु जेहि न कलंक ॥
चरण चूम अज सीस चढाये । तत्क्षण रुद्र जो गमन लाये ॥ कहैं महादेव विनय बहूता । कहहु कबीर योग सतमता ॥ केतिक स्वास चले दिन राती । किम घर बरे तेल विन वाती ॥ केते हांथ धरती आकाशा । कौन देवको कहां निवासा ॥ केतिक नदी केतिक गिरवरतन । कौन सिंधुको गाय कहावन ॥ कौन अमावस कौन परीवा । कौन पुत्रवा कौन ग्रह धरिवा ॥ केतिक रुधिर कायाभैं आही । वगन ओंकार फेर कित आही ॥ पांच तचहैं काहे नामा । और पचीस नाम पंच बाभा ॥
कबीरकृष्णगीता ।
१४१
काया माहिं कै अंस हैं ताता । सोकहु कै अंस आहिं तन माता ॥ कौन तत्त केहि जोनी साजा । योग भलाके भोगे राजा ॥ श्रुतुक मरे जरे तन क्षारा । परम पुरुष होय तनते न्यारा ॥ कौन देह धरि नरक भोगाई । को है सेवक लेय भिलाई ॥ चौदह सुवन कायामहैं काही । कहिये तन प्रचे मोहि पाही ॥ पांच सत्तका रंग कौन है । विन मंदिरका है सो कौन है ॥ कौन योगीको सिंगी बजावे । कौन आसन कौन विभूत रमावे ॥ काहेकी डिब्बी काहेका ढकना । कौन बेगाना को है अपना ॥ कौनसो चावल कौनसो दाली । कौनसी अगिन जात कहिवाली ॥ कौन कपिल को देवता आही । केतिक अनपा कहाँ जपाही ॥ विनती कर शिव पूछहिं भेऊ । कहैं कबीर सुनहु सब कोऊ ॥ योग यज्ञ तप तीर्थ कर्म काटा । यह मत चलि जिव बारह वाटा ॥ सार भक्त विन तरे न कोई । चहुं युग भक्ति श्रेष्ठ गुरु सोई ॥ कहैं कबीर सुन प्रेतके ईशा । गहहु देव पथ तारहु सीसा ॥ तुम सब लीन्ह पान परवाना । भक्ति चावल चित तज मम कामा ॥ एक २ अंश देहते काढहु । तेहि पितु सेव राख पितु बाढहु ॥ दोहा—अपनी अकित दुतिअन, सिरजा तीनो देव । बनिजा तीनो छट्टुर मिले, क्रीतम देव पितु सेव ॥ छै सौ बीस सहस्र इकईसा । येतिक स्वास दिवस निशि ईसा ॥ मनु पवनाको धायियो तारी । विना तेल औ दीपक वारी ॥ साठे तीन कर क्षीनीजहैंथा । आंगुर चार अकाशको माथा ॥ मल निकास बछ गनपत राजा । रिद्ध सिद्ध समसावत्री विराजा ॥ सकल सिद्ध मिल गुरुपद सेवा । गुरु विन गनपति भक्ति बहेवा ॥
१४२
कबीरकृष्णगीता ।
पृथ्वी तत्त्व तिष्ठत तेहि बारिज । पृथ्वी समान साध तेह कारिज ॥ सोह चतुरदल विधु सूरंगा । नाम बीच अजपा सोहंगा ॥ सोहंगका विन डोर कमला । जपे सो अमृत नाम दयाला ॥ षट्पत्रपद इंदी अस्थाना । बला सावित्री तहँवा जाना ॥ रजगुण पीत वरण सो पंकज । षट्सहस्र अजपातहँआपअज ॥ आप तच तहँ कीन्ह निवासा । विषै निरंजन काम यम फांसा ॥ केवल सो अष्टदल नील सुरंगा । विष्णु देवता लक्ष्मीसंगा ॥ सबगुण षट्सहस्र अजपा जप । सत्यनाम सम नहिँ कोइ तप ॥ वायु तत तहँ गांठ वंधानी । नाभचक पवना घर जानी ॥ कीतम घर तन पवन सोहंगा । आद अमर घर सदुरु संगा ॥ जाके बस सोहंग है भाई । सोई सत्यकबीर गोसाई ॥
दोहा--आद पवन सोहंग है, क्रीतम वायु तत पांच ।
जहांते सोहंग ऊपजा, कहैं कबीर सो सांच ॥
शिव शारदा दस हियकमला । स्फटिक वर्णअतिसोहेपदअमला तेज तत वडवानल चितंगी । हृदय दरश गुरु सदुरु संगी ॥ षट्सहस्र अजपा तहँ होई । शिव सक्ती गुरु शिष्यधरसोई ॥ द्वादसदल पंकज कंठ अथर । तत अकाश त्रिगुण मनस धर ॥ अय परम शिव दस द्वादसी । स्वांतकीलक्ष्मीमहाविष्णुसंगवसी एक सहस्र अजपा तहँ होई । सञ्ज रंग बरते पद सोई ॥ सञ्ज स्याम जेठ लघु भाई । सञ्ज रिस्वाम लखि जाई ॥ कंठ केवल दल षोडश पूरा । तहां वस्तु जिवसकलरंगसूरा ॥ अजपा छै सो नाम विहंगा । सुरत निरत सो सदुरु संगा ॥ भंवर गुफा दोय दल पद सोहा । परमहंस बसे नृप निरमोहा ॥
कबीरकृष्णगीता ।
१४३
एक निरमोह सुरत सतनामा । दुतिय निरमोह कबीरशिष्यराभा स्याम लालभी रंग सोहाई । अजपा सहस्र कबीर लखाई ॥ सहस्रकमलदलाझलमिलझलके । मन पवन झीर मानसरोवरसे ॥ सुरत कमलपर सट्टुर वासा । एक सहस्र अजपा प्रकाशा ॥ गुन गुहिंज निरगुण सरबादी । शब्दसरूप सुरत संग स्वादी ॥ वतिस पट्टम पत्र गुण गाना । सुखा कंबल गुरु दरश पयाना ॥ दलअसंख्यकोकरवलसो भूला । जेहि २विन शून्य २ अस्थूला ॥ असंख्यदलकंबलकेदेखहुआगे । सतसाहेब दसमे बढभागे ॥ सतसाहेब सतनाम कबीरा । कहै कबीर हम सकल शरीरा ॥ हंस हमार सकल भत ताते । जीवधातके निकट न जाते ॥ कहै कबीर सुनो वृषवासन । काया लखहु देवन जहँ आसन ॥ अट्ट कोट पर्वत तहँहाडा । नौ सौ नदी समानीजेहिभांडा ॥ ज्ञानहीन जिव रात अमावस । पूनम चाँद गहुजगतगुरुआवस ॥ गुरु सट्टुर कबीर मिल तरना । कलश सवांरहु रतन सुवरणा ॥ सवा हाथ नभको गगन घर । वरणहु एक २ सुन संकर ॥ पृथ्वी आप तेज वायु अकाशा । यही नाम पंच तत्व प्रकाशा ॥ और सुनहु पांचहुके भाजा । ताते जीवन पोत दो मरजा ॥ पृथ्वीतत्वकी सुनहु प्रकृती । गुरु प्रताप कहैं संतन जीती ॥ असत भेद नारि तुच रोमा । बंधु पंच यह पृथ्वी तत भोमा ॥ लाल भसेव सुकल सोभ सुनं । पंच बंधु वह आपकी सुनं ॥ वायु तत्तकी भारजा बोली । लिये पवन फिरे उठन खटोली ॥ गावन धावन बोलन अगोचर । अटवा नतसी प्राणन दूसर ॥ क्रीतम वायु पंचतत्त संग तेहि बंधु।तेहि मुख बैन बोले भज नंद ॥
१४४
कबीरकृष्णगीता ।
नासिका वाट आवे जाई । रमता राम स्थिर न रहाई ॥ स्थिर पुरुष सत्यनाम कबीरा । मरे न जरे न धरे शरीरा ॥ तेज तत्तकी बंधु कहाई । तृषा क्षुधा आलस जमुहाई ॥ निद्रा मिल पांचो तजे दासी । नाम भक्त विन यमकी फांसी ॥ लज्जा शंका हर्ष शोक मोहा । यह अकाश बंधु संदोहा ॥ कहे कबीर सांचा मोहि भावे । सांचा सो जो सद्गुरु गुण गावे ॥
कबीरवचन ।
कहे कबीर हम नाम लखाई । सद्गुरु विन कोइ सुक्ति न पाई ॥ मम भये शिव नाचन लागे । कर गहि हरको दुलारन लागे ॥ सुनहु शंभु पूछहु प्रचारई । इतना सुन नाचत हो भाई ॥ जो पूछेहु तेहि महाँ कछु बाकी । सो सुन लेहु मह पंथ ताकी ॥ दूत तुम्हार फिरहि संसारा । पुण्यहि पापी दोनो लै जारा ॥
महादेववचन ।
कहे महादेव सुन सतनामा । तुव सेवक जो हम तेहि कामा ॥ पाप पुण्य है त्रिगुण बाजी । बेद ठेल त्रिपतात्रिक साजी ॥ पाप पुण्य है यमके खेती । दया सत् प्रधारथ सुनेती ॥ हमहु चले कुपंथ ढर ताता । तापर प्रबल अष्टंगीमाता ॥ अपने पुत्रहि जो धर खाई । आनहिं कस छोडे भाई ॥ पितु आज्ञा हम बहु जिव चांपा । परे आन हमरे सिरपापा ॥ ताते शरण तुम्हारी आये । काल पितारे आप बचाये ॥
कबीरवचन ।
कहे कबीर भल होय सब केश । जरा मरण सतनाम निबेरा ॥ अब तुम जात भातु तन बूझहु । तन स्वासा स्वासा गम सुझहु ॥
कबीरकृष्णगीता ।
१४५
एकको लोहु एकको पानी । दौय मिल सिरजा विदेहनिस्सानी ॥ निहअक्षर निहतत्तसो निरगुण । अमी नीर विन कुंभक सरगुण ॥ सट्टुर शब्दसे खागी धरनी । उर्ध्व सुरत सोहंग परवनी ॥ पितुके बुंदसो हाड औ गूदा । मांस रक्त औ येद औजूदा ॥ पुन पितु अंस रुधिर तन तबलों । तबलहि तन श्रोनित जिव जबलों ॥ चार अंस तनमहँ पितुकेरा । पांच अंस माता वन घेरा ॥ एक अधिक माता गुण भयऊ। चित देखो पन सतगुण कियऊ ॥ पौन आगे परा चल पाछे । धरिया माहिँ तन कछनी कांछे ॥ पिता पौन ले सांचहि दारी । तब जिव परा परातम नारी ॥ आतम परमातप जिव संग। नांद बिंदु मिलना मत रंगा ॥ अब जो अंस सुनहु शिव आही। जे जननी सो जो इन होय खाही ॥ जेहि जननी तन पांच प्रकृती । रोम चाम नख दंत भगोती ॥ जत द्वार तन तत भग जानी । आद लिंग सोहंग बखानी ॥ आठो पहर करे रति सोई । आवागवन महा दुख होई ॥ जबलग अमरलोक नहि पहुँचे । आवागौन भग भोगि विगूचे ॥ भक्त करे तो बारहि नीकी । भक्त बिहून सकल जग फीकी ॥ कीतम निरंजन पितु मम आही। तनके मात पिता यह साही ॥ जीव सब सत्यनामके आही । सत्यकबीर सतनाम लखाही ॥
महादेववचन ।
कहैं शंखु संसे गढ़ मोरी । तुम दयाल मम बंदीछोरी ॥ अब साहेब कहु जीवत लेखा । कौन तत्त कोहि जोनि परेखा ॥
योगियोंके तत्त्वोंका वर्णन व मुक्तिका मार्ग
१४६
कबीरकृष्णगीता ।
कबीरवचन ।
कहैं कबीर सुन उमापति ईशा । नरतन त्रिगुण पांच पचीसा ॥ चार खान महैं नर तन ईशा । सकल भेद जानहु जगदीशा ॥ नरपिंडज चौरासी नारा । नाम भक्त बिन यमके चारा ॥ पिंडज गौ गज चौपग पहिषा । अरना बाध सिंह बनगोहिषा ॥ श्वान मंजार अजिया सुत बीगा । पृथ्वी आप वाय तेज अंगा ॥ त्रिगुण भेराय सकल जिव दीन्हा । सतगुण रज तम भासे चीन्हा ॥ रजगुण बहु छल झूद परबंदा । रोग वियोग भोग यमदंडा ॥ मिथ्या बोल सोग संतापा । छुतहिँ छूत जिव छूतहिँ थापा ॥ वैष्णवसे नहिं नवीहिं अभागे । वैष्णवन असंखहिं द्विज नागे ॥ तिनहु भागह बड वैष्णो बखाना । जीव दया कथि जग पतिथाना ॥ बहुर युद्ध महाभारथ करावा । तब करता हरि धका दियावा ॥ कृष्ण सीस जब वसे कबीरा । तबलग्ण राम कृष्ण मत धीरा ॥ निरंजन अधा परवेसा । तब से कृष्ण कालकर भेसा ॥
दोहा—जबलग्ण जाकर नाम लिख्य, तब लहि तेह यह सोय कहैं कबीर मोहिं सुमेर, एकमत सब सुख लोय ॥ पांच तीनकी काया कांची । अमरपुरी अमर तन सांची ॥ सतगुण सत्यकबीरके आसा । निरंजन अवा रज तम फांसा ॥ जैसे तुलसी भांमे राई । औ गुर राम तुलसी सार लाई ॥ रज तम गुंभा भांग बखाना । भांग महादेव अज गुमा जाना ॥ तुलसी विष्णु अंस विनाशी । औ अविनाशी कबीर सुखराशी ॥
दोहा—कहैं महादेव विष्णु अज, सुन सतनाम कबीर। निराकार डहनसे, राख लेहु गुरु पीर ॥
कबीरकृष्णगीता ।
१४७
कबीर वचन ।
कहैं कबीर सुनहु त्रिय देवा । सब मिल करहु साधुकी सेवा ॥ जगमहैं वैष्णव भेष मम दासा । प्रेमवस भये ताके पास ॥ सत रज तम जिव सबहैं मेरा । अभष पंथ राक्षस जिव चेरा ॥ वीज वंस तेहि रहे न कोई । मीन गऊ वध जत जिव खोई ॥ सतगुणको सो भाव बखानी । रज तम तज सतपंथ चल्लानी ॥ सत्य दया पर आतम पूजा । सदुरु साथ चरण मन बूझा ॥ सकल देव मिल निरगुण नामा । कबीर अंस तन रमता रामा ॥ सबसे प्रेम क्षमा धीरज तन । अपने जानत न दुखवैं काहु मन ॥ कौनहु जीव जंतु न दुखवैं । समष्टी निज सबपर भावे ॥ काहूके तन मांस न खाई । मीन मास मद निकट न जाई ॥ वृत्त मिष्टान्न पान फुलवारी । यह सब सात्वकी भक्ष विचारी ॥ अभ्यागत आवे कोइ बरणा । सबकर पोषन सब मिल करना ॥ सात्वकी चाल मुक्त नर नारी । रज तम भौ सब भ्रम संसारी ॥ भक्षित भाव गलतान लिय नामा । परनारी द्रव्य अपंथ कर कामा ॥ कच्छ मच्छ सकलो जिवजंता । सब जिव परा क्षमा शुभ संता ॥ तीर्थ व्रत तप त्रिगुण जोगा । बनोवास अधर्म तज भोगा ॥ भोग सात्वकी भजन सतनामा । इच्छा दशा समर्थ निहकामा ॥
कृष्णवचन ।
कहैं कृष्ण पुलकित होय वाणी । सत्य कबीर तुमहिं सुख खानी ॥ हम सब कहैं तुम दीन्ह बढाई । आप दास होय सेवा लाई ॥
कबीरवचन ।
कहैं कबीर बडेकी रीती । सब जिव पोषव सबसे प्रीती ॥
त्रिगुणका प्रभाववर्णन
१४८
कबीरकृष्णगीता ।
बमन दीनता लघुता माती । पतिव्रता सब लाब तेहि क्रांती ॥ सद्गुरु नाम कबीर अटोटा । कबीर कंथ भज कछु नहिं टोटा ॥ विष्णुवचन ।
कहे कृष्ण अज हर शुक्र व्यासा । अब सद्गुरु कहिय तथासा ॥
कबीरवचन ।
कहे कबीर तमगुणके लक्षण । दरिद्री भिखारी क्रोध यत तिक्ष्ण मारन मरन राते षट् उरमा । सत्य नाम भजे सो जिवघरमा ॥ सत्यनाम सो अम्बर काया । जगमग जीत सो अंस सुहाया ॥ अमरलोक सो अटल रहाहीं । जीव दया वद जग प्रगटाहीं ॥ असुरहिं साथ चतुर सुख साखा । रज तम भक्त असुर जग लाखा सुगुप्त मोह बस तक्षक भासा । राक्षसी भोजन पेत पिशाचा ॥ विष्णु भक्तके दोह कराहीं । शिव जोगी सिष साथे नाहीं ॥ और कहे शिव जोगी सिध्या । कलयुगद्विज मिल शिव शिष्यगिधा मीन मास मद भष गिद्ध भाना । मीन मास मद है अब खाना ॥ चोरी और करहिं बटपारी । झूठा लंपट चुगल जुवारी ॥ षट् उर मास रसके संगी । रज तम शिष कुपंथ अभंगी ॥ छीन सतगुण रज तम बहुताई । यहि जीवको ढर विचल न जाई । नहिं विचलहिं सतगुरुजेहिमाहीं । सच चीन्ह रज तम मिन डाहीं ॥ सचहिं दिन २ बाढ सवाई । गुरु साथ विमुख यम खाई ॥ दिना चार कलि श्रेष्ठ मलेच्छा । झष भखहिं गौ भखहिं अभक्षा ॥ जहँ लग अवगुण रज तम जानो । सतगुण रज तम चाल बखानो ॥ रज तम आधार ते वैष्णव नाहीं । वैष्णव सतकबीर सतगुणमाहीं हमरे दासहिं जो कोइ मनिहै । तेहि सुख होय यम नहिं दहिहै ॥
सत्य भक्ति तथा योग भोगका वर्णन
कबीरकृष्णगीता ।
१४९
एक २ रोम वैष्णव सतोगुण । रज तम देवी पंथहै दुर्जन ॥ यह सब तन वैष्णव तन दूजा । रज तम देवी पंथ अरुझा ॥ जो नहिं संतहि माने भाई । झूठहिं थाप नरकमें जाई ॥ जन्मे घरे सो क्रीतम झूठा । अजर स्वास जिव संतन दूठा ॥ सत्यकबीर अजर अविनाशी । सत्यकबीर जो करे हुलासी ॥ दुलह कबीर अमर सुखरासी । दुलहिन जीव अमरघरवासी ॥ देह धरे भौ जिव चकलागा । खसम विसार जार मन वागा ॥ धगरा मनमत त्रिगुण निरंजन । खसम कबीर काल सिरभंजन ॥ जै जै स्वामी सत्य कबीर । स्तुति करें त्रिय देव सो धीर ॥ तीनों कहे हम तरे तुव दाय। मुक्त परवाना कबीर सिरवाया ॥ अगले हंसन वाट चिन्हाई । सर्व शास्त्र दाय। फरमाई ॥
कृष्णवचन ।
कहैं कृष्ण यह निश्चय जानी । मुक्ति कबीर चरण लपटानी ॥ कबीरवचन ।
कहैं कबीर सुनो सब कोई । सांची भक्ति विना गत खोई ॥ सांच भक्ति गुरु साध विश्वास। भैरों भूत देवी यमफांसा ॥ कहैं कबीर सुन वृषभ सवारी । प्रच्छेहु प्रथम सो लेहु निरवारी ॥ सब योनिन तत गुण क्रीत विवरण । पांचतीन एक मिलनर जोहतन पिंडज चार तत्त नभ त्यागी । और सकल नभहि ते लागी ॥ अबूज तीनते पृथ्वी वाई । उषमज दोय तत्त तेज औवाई ॥ एक तत्त अंकुर दलको थेका । पांच तत्त नर शब्द विवेका ॥ चार खान रचि त्रिगुण अछंगी । एक जीव तनका चित्रभंगी ॥ जोग भोग दोउ रोग समाना । नाम भक्त चहुँ युग निरवाना ॥