कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पञ्चसुत्रा
( २०७ )
यह प्रमान पुर्षको जाना । सो अब तनमों कहों बखाना ॥ सूक्षिम रूप गगनमों वासा । ताहि रूपको कहों प्रकासा ॥ तनभोरूप जो सूक्षिम जानो । सोई रूप बाहिर पहिचानो ॥ जो भीतर सो बाहिर कहिये । एकप्रमाण रूपसो लहिये ॥
साखी-बारूके दशअंश कर, ताकर बिस्वा बीश ।
ताहूते सूक्षिम कहो, इम प्रकटो जगदीश ॥
लोक समानो पुर्षमो, पुर्षहि लोक समान ।
पुर्ष निरंतर लोक है, लोक पुर्षमो जान ॥
सुक्ति वचन-चौपाई
हो समर्थ मैं तुव बलिहारी । सर्व भेद तुम कही विचारी ॥
अब प्रभु कहो ध्यानको लेखा । जेहिते रूपहि पुर्षको देखा ॥
ताको नाम मंत्र उपदेसा । सो सत्गुरु अब कहो सँदेसा ॥
सोई मंत्र गुरु देहु बताई । जाके बल हँसा घर जाई ॥
करनी योगकी रहनी आशा । हँसा करे लोकमों वासा ॥
सोई नाम गुरु देहु बताई । मेरो हंस लेहु मुक्ताई ॥
और रहनी हँसनकी भाखो । मोसों गोय कछू जनि राखो ॥
कौन नेहते हँस कहाई । कौन नेहते लोक समाई ॥
योगजीत वचन
सुक्ति सुनो सत्य मम बानी । जैसी रहन हंस पहिचानी ॥
तास रहन अब वर्ण सुनाऊँ । नेह प्रेमकी उक्त लखाऊँ ॥
जैसे सीप स्वात करे नेहा । लागी प्रीत भूल निज देहा ॥
जैसे त्रिया पुर्षको चाहै । या विधि संत ध्यान औगाहै ॥
जैसे चात्रिक बुंद पुकारा । सोई लगन संत अधिकारा ॥
जैसे बासको भँवर लोभाई । योजन एक तहां उड़ जाई ॥
जैसे चंद चकोर हुलासा । ऐसे संत पुर्षको आसा ॥
( २०८ )
त्रोधसागर
जैसे लोहा चुंबक लग जाई । तैसे संत ध्यान लपटाई ॥ जैसे कनिका कपूरको धावै । ऐसे प्रीत संत लवलवावै ॥ जैसे पतंग दीपकको धावै । ऐसे संत ध्यान लपटावै ॥ जैसे नेह बारि औ मीना । ऐसे संत नाम लवलौना ॥ जैसे बाल बहिन महतारी । ऐसे लगन तहां संत विचारी ॥ ऐसे प्रीत करे जो कोई । सत्यपुर्णको पावै सोई ॥ ऐसे प्रीत गगन मन लावै । गुरुप्रतापते दर्शन पावै ॥ और रहन मैं देऊँ बताई । जाते बेग पुर्ण दर्शाई ॥ आपामेट आप दर्शाई । प्रेमसिंधुमें जाइ समाई ॥ बिरहरूप करुणा अधिकारी । लागी ज्वाल निरन्तर भारी ॥ जगसों नेह झूठ करजाना । मनसो सब जग मिथ्या माना ॥
साखी-मनसों त्यागे जत्तको, जान विषयकी खान । सुकित अब मैं भाषेऊँ, राजस योग प्रमान ॥ कायासों कारज करे, सकल काजकी रीत । कर्म भय सब मेटके, सत्त नामसों प्रीत ॥
अब सुन ब्रह्म ज्ञानकी वानी । ताकर रीति लेहु पहिचानी ॥ एके ब्रह्म सकल घट देखा । ऊँच नीच काहु नहिं पेखा ॥ शत्रु मित्र एक कर जानै । पाप पुण्यको भेद न आनै ॥ करै कर्म पुरुष परिवारे । अपनो करतब मन नहिं धारे ॥ सब कछु करे पुर्ण रे भाई । अपनो शीस ना भार चढाई ॥ सुख औ दुःख एककर जाने । इनको भाव मिथ्यापहिचाने ॥ झूठ वचन नहिं जीव सतावै । दया भाव सबही सो लावै ॥ इंद्रीस्वाद स्वप्न कर जाने । रूप कुरूप नाम मनो आनै ॥ वाद विवाद न जाने प्राणी । हार जीत एक समय पहिचानी ॥ उत्तम मध्यम मर्म न जाने । कर्तारूप सकल पहिचानै ॥
पञ्चसुन्दरी
( २०५ )
जात वर्ण नाहीं कछु मानै । चार अंग एक दृष्टि समानै ॥ जहां लग दृष्टिपरे जो कोई । इच्छा पुर्ष जानिये सोई ॥ सोवत जागत लखे अकारा । तहांलग कर्तारूप निहाग ॥ वारखान धरती असमाना । सो सब कर्ता माहि समाना ॥ जलथल ससदीप नौखण्डा । लोक अलोक सकल ब्रह्मण्डा ॥ गुप्तप्रकट जहांलग आकारा । सो सब कर्ता बीच निहारा ॥ भिन्नभाव कछु दृष्टि न आवै । सोई ब्रह्म ज्ञान कहलावै ॥
साखी-कर्तारूप विचारिये, जहांलग सकल अकार । इच्छा द्वैत विनास होय, रहो एक करतार ॥ प्रथमहि अविगत ब्रह्म है, तिनते ब्रह्म अनेक । सकल बुंद सिंधुहि मिलै, बहुर एकको एक ॥ द्वैत रूपको ध्यानमो, कारज लहे न कोय । आदि पुर्ष चीन्हे बिना, मुक्त कौन विध होय ॥ सुकित सुनौ सुजान, अक्षे नाम चीन्हे बिना । यमघर करे पयान, युगनयुगन भर्मत फिरे ॥ तैतिस कोट बखाना, सकल देव अब भाषिया । तिनमों तीन प्रमान, जीव सकल विस्तार है ॥ युगप्रति तन धरधर मरे, मायाको व्यवहार । अंतकाल सबको भषे, इनते पुर्ष निनार ॥ आदि पुर्ष बैठे जहां, अविगतरूप अनाद । रचनाते बाहिर रहै, तिनको भेद अगाध ॥ महाविष्णु गोलोकके, और अर्चित बखान । राा ममा जोत मह, ताको करे प्रवान ॥ पिंडमहीं ब्रह्मंड औ, नहीं लोक आकार । अनंत लोकते भिन्न है, सुकित करो विचार ॥
( २१० )
बोधसागर
निरगुण मो मन लीन रहु, करे जीव गतनाश । बहुर काल बश ना परे; अजर अमाघर बास ॥ जिन संतनको यह मता, बरनत बने न मोहि । तिन पटतर का दीजिये, कहि समुझाऊं तोहि ॥ संतकोट वारो जहाँ, ज्ञानी लक्ष अनेक । जो निरगुनमें रत सदा, सो अनंतमें एक ॥
सुक्ति बचन--चौपाई
हो समर्थ मैं तुव बलिहारी । संतन महिमा कहो विचारी ॥ संतरूप कैसे पहिचानी । महिमा तासु कौन विधि जानी ॥ कैसे भेद तासको पावै । कैसे परम संत बस आवै ॥ और संत एक देहु बताई । तुमको आहु कहाँते आई ॥
योगजीत बचन
हो सुक्ति मैं कहों बखाना । तुमसों भेद कहों निर्बाना ॥ अपनी उत्पत्त देहु बताई । तुम्है भेद कछु नाहे दुराई ॥ आदि भेद अब कहों बुझाई । तुम सुक्ति सुनियो चितलाई ॥ प्रथमहि पुर्ष आप निबाना । तब नहि रचना अश बखाना ॥ जबै पुर्ष मन इच्छा आई । षोडश अंश तबै उपजाई ॥ चौदह सुत तहाँ रहे छिपाई । तिनको भेद कोई नहीं पाई ॥ सक्त निरंजन तब उपराजा । जिन सब कियो मृष्टिको साजा ॥ तिनसों त्रिगुनरूप प्रकटाया । जिनसों भई सबनकी काया ॥ तिन पुन चारों वेद बखाना । तामें जीव सबे लपटाना ॥ चारखान तब प्रकट कीन्हा । तेहिमें फाँस जक्त सब लीन्हा ॥ फिर पुत चउदह यम उपराजा । तब चौरासी कीन्ह समाजा ॥ तीरथ व्रत औ नेम अचारा । दान पुण्य जप मंत्र विचारा ॥ इतना करे जगतमें कोई । यमकी त्रास न छूटे सोई ॥
पञ्चमुद्रा
( २११ )
यामह सकल जीव उरझाई । अंतकाल पुन धरधर खाई ॥ स्वर्गलोकमह जो चले गयेऊ । तेतो आके देह फिर धरेऊ ॥ तेहुना यमकी छूटे त्रासा । भांत अनेक जीवनको फाँसा ॥ जबै पुर्ष अस देखेउ भावा । सत्तपुर्ष एक रुयाल बनावा ॥ सत्तपुर्ष इच्छा उपजाई । पुहुप नाम तब अंश बनाई ॥ तिन्है पुर्ष अस आहा कीन्हा । भौसागरको आयसु दीन्हा ॥
साखी-पोहोप नाम तबही चले, पुर्षहि शीस नवाय ।
भौसागरमों प्रकटभो, अबिगत रूपबनाय ॥
चौराई
अबिगतरूप छांड हम दीन्हा । संत स्वरूप भेष गहि लीन्हा ॥ शब्दस्वरूप बनाये सोई । तिनकी देहन छाया होई ॥ पाँच तत्त्व तीनोंगुन नाही । धरी देह तब बसत युगमाहीं ॥ सत्तनाम हम नाम धरावा । सब जीवनको संध लखावा ॥ या विध अजदेह धर लीन्हा । सबको आय सिखावन दीन्हा ॥ तब पुन जगमों संध लखाई । निरगुन मता सबै समुझाई ॥ जो जिव संध शब्दकी पाई । जीव असंखन लोक पठाई ॥ प्रथमहि सतयुगमैं हम आये । सत्त नाम तब नाम धराये ॥ तब हम जीव असंखन तारे । यमको मार तब जीव उबारे ॥ त्रेतामाहि बहुर हम आये । मुनिकह बोध मुनींद्र कहाये ॥ कोटिन जीवको संध लखाये । एतिक जीवको तब मुक्ताये ॥ तीजे फिर द्वापरयुग आई । मुनि करुनामे नाम धराई ॥ कोटिन जीव तबै हम तारे । महाकालते जीव उबारे ॥ फिर कलियुगको आयेउ भाई । योग जीत तब नाम धराई ॥ कालहिं जीत हंस मुक्ताये । सत्य शब्दकी संध लखाये ॥ जीव असंखन तारेउं आई । सत्तपुर्षकी दर्श कराई ॥
( २१२ )
बोधसागर
सारखी-चारो युग हम आइया, कीन्हेउ हंस उबार ॥
कलयुग नाम बखानऊँ, योग जीत उच्चार ॥
चौपाई
सुकृत सुनो भेद निर्वाना । अपनी उतपत कहा बखाना ॥ अब संतनको कहाँ संदेशा । जेहि विध लखोतासको भेसा ॥ तिनकी रहन अब देउँ बताई । जाते तुमही संत लखाई ॥ निरगुण चाल चले पुनसोई । सोई संत शिरोमणि होई ॥ तीरथव्रत औ नेम अचारा । इतने रहैं संतसो न्यारा ॥ दानपुण्य जगवतैं धर्मा । एतो जक्त जानिये कर्मा ॥ पूजा जाप ना दुतिया राखै । सत्तनाम हदे अभिलाखै ॥ तैंतीसकोट देवगण भारी । ये सब माया रूप निहारी ॥ दुतिया ध्यान अनित्य विचारै । अक्षै नाम हदेमों धारै ॥ सोई निरगुण संत कहाई । ताकी परख मैं देऊँ बताई ॥ रहे विरक्त होय जगमों सोई । विरही संत सोइ पुन होई ॥
सारखी-यह तो विस्वा धर्म है, दुतिया जप तप ध्यान ।
पतिव्रता इनमों नहीं, मगके रोरा जान ॥
अक्षय नामको गहि रहे, तजे द्वैतके आस ।
सत्तपुर्षको पावई, पूरण पर्म विलास ॥
रहो एकता चित्तमों, दुतिया उसको जान ।
गगनमगन निशिदिन रहै, निरगुणसो पहिचान ॥
चौपाई
सुकृत सुनो ज्ञान अब सोई । निरगुण संत कैसे बसहोई ॥
प्रथम संतको पावे जाही । प्रेम प्रीत तब कीजे ताही ॥
करे बंदगी शीस नवाई । निज गृह तबे ताहि लैजाई ॥
चंदन घसे धामको छावै । तापर बस्तर श्वेत बिछावै ॥
पञ्चमुद्रा
( २१३ )
चरन परवार चरनारज लीजै । बहुत भांतसो भोजन दीजै ॥ महाप्रसाद तासुको लीजै । पीछे औपुन पूजा कीजै ॥ प्रथम बंदगी कायक जाना । मायक बायक फिर पहिचाना ॥ तीनों बंदगी करे बनाई । अनेक भांतिसो ताहे रिझाई ॥ द्रव्य देनको लोभ न कीजै । चरन तरे ताहि धरदीजै ॥ अष्टधातको काया जाना । सो उद्धार कैसे पहिचाना ॥ काया भार उतारके लीजै । चउदह रतन तब गुरुको दीजै ॥ आरती करे बहुभांत बनाई । काया भार तब ताको जाई ॥ यहविध भक्त करो चितलाई । यमको डंड छूट तब जाई ॥
साखी—आरती कीजै पुष्पको, बहुत दीनता लाय ।
कागाते हँसा भयो, सत्त भक्तको पाय ॥
इतनी प्रीत संत जब जाना । तबे संतसो निज मत ठाना ॥ क्रिया करै तबहीमुख बोलै । तबे संत दिल पर्दा खोलै ॥ तबे बस्तु निज देहि लखाई । तासो हंस समाध लगाई ॥ सोई करनी कछुदिन करई । आदिब्रह्म अंतर लख परई ॥ पुर्णलोकमें रहे समाई । तबही बुंद सिंध मिलजाई ॥ इतना खोज करे पुन जबही । अजर अमर घर पावे तबही ॥ निरगुण संतको भेद बतायो । निजमत खोलमें तुम्हैं लखायो ॥ अब एक आगम तुमसों भाषों । सुकृत गोय कछू नहिं राषों ॥
साखी—निरगुणको औतार है, सो प्रकटे जग आय ।
ऋषिमुनि ताको ना लखे, गुप्तसो रहो छिपाय ॥
ताको भेद अब देहुँ बताई । संत रूपसौ जगमें आई ॥ बालक होय पुन जगमें आवै । कमलपत्र पर आसन लावै ॥ निरूनाम जुलहा कहाई । भक्तेहत ताके गृह जाई ॥ खान पान कछु करि हैं नाहीं । दिनदिन अंग बढ़त पुन जाहीं ॥
( २१४ )
बोधसागर
शब्दस्वरूप देह तिन होई । पांचपचीस तीन नहिं कोई ॥ छलदिक्ष्या रामानंदसो लैहै । तिनको फेर उलट समुझैहै ॥ पांडव यज्ञ तिन पूरन कीन्हहा । स्वपच भेष तिनही धर लीन्हहा ॥ कोटिन हंस तबै मुक्ताई । सत्तनाम कबीर कहाई ॥ अजर अमरहो तिनकी काया । जासु देख काँपे यमराया ॥ सोई नाम कबीर कहाई । हमैं उन्हे कछु अंतर नाहीं ॥ ते पुन जगमों परकट होई । ताकर अवध बताऊँ तोही ॥ सम्भवत पंद्रहसे बीस प्रमाना । तबै आय जगमों प्रकटाना ॥ निरगुण संध तब जगमों आई । सोई नाम कबीर कहाई ॥ दोई दीन को बोधे आई । मगहर अमी नदी बहाई ॥ पंडाके पग जरत बुझाई । परसो तगको भरम छोड़ाई ॥ सत्य शब्द प्रतीत दिढ़ाई । भौसागरते जीव मुक्ताई ॥ जीव असंखन तारे जबही । आवैं अंशलोकते तबही ॥ कोटज्ञान धर्मदासहि देहैं । ब्यालिस पिढ़ीथाना बैठेहैं ॥
साखी-नौतम अंश पुर्षके, सो प्रकटे संसार ।
जीव असंखन संगले, जही पुर्ष दर्बार ॥
भौसागरमें रोपेव थाना । धर्मराय शिर मरदेउ माना ॥ तिनको मता सन्त जब पावै । सोतो अजर अमर घर आवै ॥ ताको काल न पावै सोई । गुरु कबीर निज पावै जोई ॥ हमरो उनको एक शरीरा । जाको सुनियो नाम कबीरा ॥ सत्त कबीर पुर्ष निर्वाना । तिनको तुमसों कहों बखाना ॥
साखी-अजर अमर सोइ जानिये, जाको नाम कबीर ।
तासु संध जाने बिना, हंस न लागे तीर ॥
सुकित वचन--चौपाई
है समर्थ तुम आगम भाषा । आगकी अब बणों साखा ॥
पञ्चमुद्रा
( २१५ )
निरगुन अंश लीन्ह हम जानी । ध्यान मंत्र प्रभु कहो बखानी ॥ आगे बिने करों बहु बारा । ताको भेद कहो निरधारा ॥ जीव मुक्तको भेद बताई । आपन करमो कह मुक्ताई ॥ विनती करो दोग्य कर जोरी । ध्यान मंत्रकी भाषों डोरी ॥ ताको मता धरोजिन गोई । मोसो वर्ण सुनावो सोई ॥
योगजीत वचन
सुक्ति सुनो भेद निर्वाना । जीवमुक्ताको कहों प्रमाना ॥ मंत्र ध्यानको बणों अंगा । ताको भाव कहों प्रसंगा ॥ आदि मंत्र मैं देहु बताई । जाके बल हंसा घर जाई ॥ सोई जाप अंतर लो लाई । अंतकाल ताको नहिं खाई ॥ ऐसा तुम्हे कहों उपदेशा । अंतर ध्यानको कहों संदेशा ॥ प्रथमहि जो सुख आसन लावै । राजस योग तब करे बतावै ॥ काया कष्ट न व्यापै कोई । राजस योग पुन कहिये सोई ॥ पांच पचीसकी सुतं बिसारै । अस्थिर बैठ ध्यान उचारै ॥ बैठ शून्य महलमों जाई । तबे निरंतर ध्यान लगाई ॥ प्रथम विरह वैराग समावै । रचना सकल तहाँ बिसरावै ॥ एक पुर्ष एक आपको जानै । द्वैत अकार शून्य पहिचानै ॥ तबही ध्यान समाध लगाई । जाकी सुतं अन्त नहिं जाई ॥ दहिनो अंग श्वास जब आवै । तबे ध्यान महाँ सुतं लगावै ॥ पिंगला अंग पुर्षको बासा । बाँये अंग शक्त प्रकाशा ॥ शक्त अंग कह देहु बचाई । दक्ष अंग वह सुतं लगाई ॥ प्रथम रूप सोहंग उचारा । तामों लखो पवनकी धारा ॥ तामहँ अर्ध पवन जो कहिये । सोहंगनाम पुन तामों लहिये ॥ प्रथम ध्यान धर देखे सोई । अंग अंग की पचै होई ॥
( २१६ )
बोधमागर
तास अंगमें देहु बताई । यह कौआय कहाँते आई ॥ सोतो पुर्पको अंश कहाई । भीतर वाहिर सिद्ध कराई ॥ पिंड ब्रह्माण्ड रहा भरपूरी । सोई निकट सोई है दूरी ॥ तब अजपाकी तारी लावै । विन जप हंसा तहाँ समावै ॥ श्वेतरूप श्वासा को रंगा । सुतं समानी ताको संगा ॥ सप्तपताल कोट ब्रह्मण्डा । सातद्वीप पृथ्वी नौखंडा ॥ सोई सबमें रहा समाई । सो जगको करतार कहाई ॥ एक संख छैलक्ष प्रमाना । इतना योजन लोक बखाना ॥ सोहंग नामको लोक प्रमाना । आगे पुर्प कहीं निर्बाना ॥ पदाराख गुप्तकर भाखो । अक्षरकाट गुप्तही राखो ॥ जेहिते जक्त लेखे नहीं कोई । गुप्त अंक कर भाषों सोई ॥ ताके आगे नाम बखानो । सोई नाम गुरुगमते जानो ॥ प्रकट नाम कर भाषो सोई । सुनके जीव तरे सब कोई ॥ अब मैं कहीं आगेकी बानी । गुप्त अंक गुरुगमते जानी ॥ प्रथमही सोहंग नाम बखानो । तामह बोहंग ब्रह्म समानो ॥ सोहंग मध्य कोहंग दर्शाई । सोतो अंश पुर्पको भाई ॥ दोय असंख दशनील बखाना । एता योजन लोक प्रमाना ॥ श्वेत अंग तिनहुको कहिये । सोहंग पार धामसो लहिये ॥ तिनके दर्श हंस जब पाई । कर प्रनाम तहैं शीस नवाई ॥ वोहंग नाम आसिका दीन्हा । बहुत भांति तिनदाया दीन्हा ॥ तबे हंसको लीन्ह बुलाई । लोक प्रमान सब दियो बताई ॥ तब उन डोरी दीन्ह लखाई । ता चदिहंसा लोक सिधाई ॥
सारखी-वोहंगको प्रनाम कर, तब डोरी गहि लीन । पुर्प नाम सुमिरत भयो, परे पयाना दीन्ह ॥
पञ्चमुद्रा
( २१७ )
तब आगेको कीन्ह पयाना । कोहंग नाम जहाँ अस्थाना ॥ कोहंग नामको देखा जबही । हंस प्रणाम कीन्ह पुन तबही ॥ दोयकर जोर सब अस्तुति कीन्हा । मस्तक हाथ पुर्ष तब दीन्हा ॥ तबही हंस बहुत हरषाना । पायो पूरन पद निर्वाना ॥ तीन असंख वटनील बखाना । एता योजन लोक प्रमाना ॥ श्वेत स्वरूप पुर्ष है सोई । श्वेतही वर्ण लोक वह होई ॥ तबै हंसको लीन्ह बुलाई । पाँजी लोकको दीन्ह बताई ॥ मक्रतार तब डोर लगाई । तब आगेकी संघ बताई ॥ हंस प्रनाम पुर्षको कीन्हा । तबही डोर हंस गहि लीन्हा ॥
साखी-बहुत भांति तिन पुर्षसों, हंसा कीन्ह प्रनाम ।
तब आगे गवनत भयो, जोहंग नामको भांम ॥
तब हंसा आगे चलजाई । जोहंग नाम तहाँ पुर्ष रहाई ॥ हंसा तहाँ पयाना दीन्हा । जोहंग नाम तहाँ बैठक कीन्हा ॥ तबही पुर्ष हंसतन हेरा । हंस प्रनाम कीन्ह तेहि बेरा ॥ तब पूरष दिलदाया कीन्हा । वचन आसिका हंसहि दीन्हा ॥ तब हंसा हिरदे हरषाई । हम पुरुषके दर्शन पाई ॥ चार असंख नौ पदुम प्रमाना । जोहंग नामके लोक बखाना ॥ श्वेत स्वरूप पुर्षकी काया । श्वेत वर्णसों लोक बनाया ॥ तबही पुर्ष हंस सँग लीन्हा । लोक दिखाय ताखुको दीन्हा ॥ ताके परे विहंगम डोरी । मुक्तके मारग जाय जिवसोरी ॥ सो हंसाको दीन्ह लखाई । ताचढ़ हंसा लोक सिधाई ॥ आगे आदि पुर्ष निर्वाना । तहाँको हंसा कीन्ह पयाना ॥
साखी-भांति अनेकन पुर्षसों, अस्तुत कीन्ह प्रनाम ।
आदिपुर्ष अवस्थानमों, हंसा कीन्ह पयान ॥
( २१८ )
बोधसागर
जबही हंसलोक नजिकाई । तबही देह हिरंमर पाई ॥ षोडश भान देह उजियारी । ऐसा रूप हंस तब धारी ॥ हंसा तबै तहाँ चल जाई । जक्षत पुर्ष तहाँ आप रहाई ॥ कमल अनंत परबूरी जानो । आदिपुर्ष जहाँ आसन ठानो ॥ पोहोप दीप तेहि नाम बखाना । सत्तपुर्ष कीन्हो अस्थाना ॥ सोई नाम निर्गम्य बखानी । अनंत नाम ताते प्रमानी ॥ ताको नाम हंस जो पाई । जीवन मुक्त हंस होय जाई ॥ सोई नाम जो सुमिरण करई । धिन तप भक्ति सो प्राणी तरई ॥ योजन अनंत लोक विस्तारा । आदिपुर्ष तहाँ करहि विहारा ॥ श्वेतहि वर्ण पुर्षकी काया । संपुट कमल देखिये छाया ॥ पुष्पहि धरनी तहाँ रहाई । जहाँ हंस सब राज कराई ॥ चारकरी सिंहासन जोरा । तहवां मध्य पुर्ष अंजोरा ॥ जगमग जोत अगिन उजियारा । बर्णत बने न अपरम्पारा ॥ हंस अनंतन बैठे तहवाँ । माथे मुकुट छत्रमणि जहवाँ ॥ षोडशभान हंस उजियारा । देह हिरंमर सो विस्तारा ॥ चंद न सूर दिवस नहिं राती । वर्ग अवर्णन जात नहिं पांती ॥ माया कालकी तहाँ न छाया । अजर अमर हंसनकी काया ॥ पुरुषनाम अस्थान बतायो । आदिनामकी संध लखायो ॥ सोई नाम हंस जो पावै । योनी संकट बहुर न आवै ॥
साखी—आदि अमर अक्षत हैं, अविगत अविचल धाम ।
आदिपुरुष सो जानिये, रूप निहगम्भी नाम ॥
आदनाम मैं परकट भाषा । वणों मूल फूल फल साखा ॥ और नाम एक पुर्ष बखाना । विहंग नाम तासुको जाना ॥ सोतो रहे पुरुष दरबारा । ताको भेद मैं कहाँ विचारा ॥ अजपा सिद्धि देउँ बतलाई । ताको भेद कहाँ समझाई ॥
पञ्चमुद्रा
( २१९ )
प्रथमे सोहंग पुर्ष बखाना । तामे अलख ब्रह्म पहिचाना ॥ निः अक्षर निःतत्त्व अधारा । तामह अर्ध पवन हंकारा ॥ सोहंग कार गगन अस्थाना । तामह पूरण ब्रह्म समाना ॥ तामह नाम निगम्य है सारा । सोहै सबको सिरजन हारा ॥ तासों हंस लीन होय जाई । निःअशरमों रहे समाई ॥ सिंधुबुन्द तहाँ एके होई । दुनियाँभाव नाश होय सोई ॥ सोनिज अजपा है निर्वाना । आतम हंसा तहाँ समाना ॥ वोहंग कोहंग जोहंग नामा । सोहंग सुर्त निरन्तर धामा ॥ सोई नाम जीव रखवारा । अमी अन्न बिहंग विचारा ॥ आगे आदिनाम हम भाखा । ताकर नाम सो गुप्तहि राखा ॥ अंतर अजाप नाम सनेही । अमी सोहंग पुर्षकी देही ॥ लागी निरंजन बेहंगमतारी । अष्ट गगनकी खुर्ली किवारी ॥ दहिनो अंग पुर्ष अस्थाना । तहवाँ हंसा कीन पयाना ॥ मकतार गहि हंस उड़ाई । आगे अकह कमल दरशाई ॥ कमल अनंत पंखुरी छाजै । आदिपुर्ष जहाँ आप विराजै ॥ श्वेत सिंहासन श्वेतहि काया । श्वेतहि पुर्ष श्वेतही छाया ॥ श्वेतछत्र शिर मुकुट बिराजै । भान अनंत शोभा तहाँ लाजै ॥ श्वेत चवर शीस फहराई । भान अनंत कला वहाँ छाई ॥ ऐसे निरगुण नाम अन्नपा । महापुर्षसो आदि स्वरूपा ॥ नाम तेज बल सुमिरन पाई । महाकालते जीव छोड़ाई ॥ बहुर न होय जीवकी हानी । निश्चय सत्तपर्षको जानी ॥ यह मत निरगुण पावे कोई । जाको सतगुरु पूरा होई ॥ यह मत पाय अमर होय जाई । बहुर न जीव प्रलै तर आई ॥ सत्यनाम सतगुरु परतीती । हंसा चले तब भौजल जीती ॥ है सुकृत तुम संत सुजाना । तुमसों कहीं मैं योग ठिकाना ॥
( २२० )
बोधसागर
या विधि करनी करे बनाई । सत् सिंधमो जाय सहाई ॥ ना फिर आवे ना फिर जाई । अजर अमर घर रहै समाई ॥ जीव बुद्ध नाश तब होई । ब्रह्म समाय ब्रह्म होय सोई ॥ ताकर संघ कहो निरवारी । हंस होय सो लेय विचारी ॥ यह तो भेद ना राखौ गोई । आदि योग मैं भाखों सोई ॥ अब मैं कहौं मंत्र उपदेशा । भाखो आदनामको भेषा ॥ गुप्त अंक लिख देउं बताई । पुस्तक देख लखो नहिं जाई ॥
साखी-गुप्त भेदको मंत्र यह, वणोंअंक छपाय ।
सो अंतरमों जाप कर, ताको काल न खाय ॥
अजपाको मन ध्यान धर, सो यह मंत्र बखान ।
सो तो पुन अस्थिर भयो, बहुर न जीवकी हान ॥
मंत्र
बो सों जो को अ अ निः म वे कां ञ्र मी हं हं हं हं हं हं छे रू है सं हं म म नो ग नि पू प त अ हं ॥
हे सुकित तुम बडे विवेकी । तुमको बुद्ध सकल हस देखी ॥
ताते तुमको मंत्र सुनावा । जीव काजको शब्द लखावा ॥
सो तुम राखो गुप्त छिपाई । यह जनि कहो खोलके भाई ॥
यह निजमन्त्र प्रकट जो होइहै । विन करनी हंसा तर जैहै ॥
गुरमत पंथ चाल मिट जाई । ताते करनी कहि ससुझाई ॥
योग ध्यान कुछ करनी कीजै । पीछे मंत्र जाप तेहि दीजै ॥
मंत्रपाय मन आपा आई । गुरुकी आसन राखे पाई ॥
तबे हंसको होय अकाजा । ताते कहो योगको साजा ॥
मंत्र जोर ते लोके जाई । शोभा हीन हंस होय भाई ॥
षोडश भान हंस उजियारा । सो नरहै गतमंद विचारा ॥
मंत्र ध्यान अजपाको साधै । या बिधसन्त ध्यान अवराधै ॥
पञ्चसुद
( २२१ )
तबही सुफल कामना होई । पहुँचे हंस लोकको सोई ॥ अजर हिरंमर देही पावे । योनी संकट बहुर न आवे ॥
साखी-जीव मुक्तको मंत्र यह, बणीं अंक छपाय । ताको जप मनमें करे, ताको काल न खाय ॥
सुक्ति वचन-चौपाई
हो सतगुरु तुम मंत्र सुनायो । मेरो हृदैं सांच अब आयो ॥ अब गुरु कहो लगनकी वानी । श्वासा लगन कैसे पहिचानी ॥ अलख मता है ताको साई । ताको भेद कहो समुझाई ॥ कैसो रंग लगनको होई । कारण भेद कहो प्रभु सोई ॥
साखी-जैमुन जगपत केतुकी, औ व्यालिन पहिचानी । गुण प्रकाश लक्षण सहित, सतगुरु कहो बखानी ॥
योगजीत वचन
सुक्ति सुनो लगन बेवहारा । तुमसों भेद सब कहों बिचारा ॥ प्रथमे श्वासा ध्यान लगावै । ताको रंग हृष्टमें आवे ॥ पीतवर्ण तहां देखे जबहीं । अति दुलास मन आवे तबहीं ॥ उपजे सुख पीत रंग जानी । जगपति लगन पुन ताहि बखानी ॥ अरु पुन श्वेतवर्ण लख आई । अस्थिर समाध रहे ठहराई ॥ उपजे सुख प्रेम भक्त अधिकारी । दया लीन तब सुतं निहारी ॥ श्वेतभाव जब मनमें आवे । सोई जैमुन लगन कहावै ॥ बहुर ध्यान धर देखे जाई । श्वासा पवन श्वेत लख जाई ॥ जल आकार पुन भासों जबहीं । उठे सुगंध श्वासमें तबहीं ॥ ध्यान बीच आकार न जाने । कैतुकी लगन ताहि पहिचाने ॥ बहुर ध्यान धर देखे जाई । अरुणश्याम तहाँ भूमि लखाई ॥ अहंकार मन शठता आवे । सुख नाश होय दुःख उपजावे ॥ इतना भावही देखे जाई । व्याल लगन कहावै भाई ॥
( २२२ )
बोधसागर
साखी-श्वासा मद्धे तत्त्व है, लगन तत्त्वके माहिं । योगांजन पहिचानि हैं, ज्ञानीजानत नाहिं ॥
प्रथमहि पृथीतत्त्वको पाई । तामें जगपति लगन मिलाई ॥ अष्टोदिशा गवन तब कीजै । सकलबिचार छांड़ तब दीजै ॥ अष्ट सिद्ध नव निद्धि कहाई । सो तो तहां सहजमों पाई ॥ मनमों इच्छा जाकी होई । सुफल कामना पावै सोई ॥ कोटिन कार्य सिद्धता पावै । सर्व जीत होय घर को आवै ॥ मनमों हार न आवै कबही । ऐसी लगन बिचारे जबही ॥ सुरको सगुन एक गुन जानो । यह मत विश्वावीश बखानो ॥ ताको भेद मैं दीन्ह बताई । सबे सिद्धको मूल लखाई ॥
साखी-जैतिक कारज जगतमों, चर औ अचर विचार । ते सब जानो सुफल है, कोट सिद्धको सार ॥
जैमुन लगन कहौं समुझाई । ताकर फल मैं देउँ बताई ॥ जलके पृथीतत्त्व दोय पावै । तामें जैमुन लगन पिलावै ॥ तबही ज्ञान करे जो कोई । सबै सिद्धता पावै सोई ॥ कब हूं न होवे तनमों पीरा । जीते युद्ध महा रणधीरा ॥ मनवांछित फल पावे सोई । जितने कार्य जगतमों होई ॥ एक सिद्धकी कौन चलावे । कोटिन सिद्ध तामें फल पावे ॥
साखी-नौ ग्रह घातिक दरसके, और योगिनी काल । लगन तत्त्व लखके चले, कारज होय ततकाल ॥ सुर औ तत्त्व बिचारके, तामह जैमुन होय । जौन वचन मुखसों कहे, सिद्ध जानिये सोय ॥
तीसर लगनको भेद बताऊँ । ताको अर्थ तब वर्ण सुनाऊँ ॥ जलके पृथी तत्त्व एक पावै । तामह लगन केतुकी आवै ॥ ताके जोर कार्यको जाई । सोतो कार्य मिले उठ धाई ॥
पञ्चमुद्रा
( २२३ )
राजाराव मिलनको जाई । देखत ताहि सभा भहराई ॥ हाथ जोर आगे चलआई । बहुत भांति तेहि सेवा लाई ॥ कार्य सिद्ध तब जगमों जानो । चर अरु अचर जेते पहिचानो ॥ योग सिद्धके साधन कीजै । यह मत सुरत देख जब लीजै ॥
साखी—सर्व अर्थ मन कामना, आनन्द सकल हुलास ।
जेते सुख है जगतमों, सो सब ताके पास ॥
चौपाई
व्याल लगन अब कहौ विचारी । सोतो युद्धकार्यको भारी ॥ दहिनों सुर पुन आवै जबही । व्याल लगन कहावै तबही ॥ सो सो जाय लाखको मारै । सो संश्राम न कबहुँ हारै ॥ यम स्वरूप जब कटक दिखाई । देय शत्रु तब तुरत पराई ॥ याको दृष्टि भरि हेरे जबही । मानों काल गिरासे तबही ॥ मानों काल लीन्ह औतारा । या विधि ताको रूप निहारा ॥
साखी—व्याल लगनको भेद यह, तुमसों कहां विचार ।
सिद्धिकार्य यामें नहीं, युद्ध जीत अहंकार ॥
जैसुन जगपत केतुकी, औ व्यालिन पहिचान ।
अर्थ सहित गुण लगनको, तुमसों कहां बखान ॥
कोटि योगको योग है; कोटि ज्ञानको ज्ञान ।
कोटिसिद्धको सिद्ध है, कोटि ध्यानको ध्यान ॥
नौ षट चार अष्टदश, तैंतिस कोटि बखान ।
ताते मत आगे कहौं, महारूप विज्ञान ॥
योग ध्यान आक्षेप मत, आदि नाम ले जोय ।
उलट समानों आपमों, जीवन मुक्ता होय ॥
चार मुक्तके बीचमें, रहे अवध परमान ।
याते रहित बखानिये फिर नहीं आवाजान ॥
( २२४ )
बोधसागर
चली पूतरी नोनकी, थाह सिन्धुको लेन । आपन गल पानी भई, उलट कहेको बैन ॥
चौपाई
हे सुकित तुम हो बड़ ज्ञानी । तुम सो भेद अब कहाँ बखानी ॥ यह निरगुण मत राखो गोई । जगमों प्रगट न कीजै सोई ॥ यहतो अगम निगमकी बानी । ताको भेद जक्त नहि जानी ॥ अपनो काज गुप्त कर लीजै । ताको मर्म न काहू दीजै ॥ जाकह जानहु आप समाना । ताको यह मत कहो बखाना ॥ तुम आये जीवनके काजा । बासन जान बस्तधरो साजा ॥ कलियुगआदि द्वापरको अन्ता । निजमत तुमसों भाषो सन्ता ॥ यह तो तुम्हे सिखावन दीन्हा । तुमतो रहो नाम लौ लीन्हा ॥ ध्यान समाध करो चितलाई । आप अपनमों रहो समाई ॥ पुर्ष संध हृदयमों राखो । और ज्ञान प्रगटकर भाखो ॥ अब भौसागर करो पसारा । हम अब चले पुर्ष दरबारा ॥ आपन सुतें नामसों लावो । भौसागरते जीव मुक्तावो ॥ जीवतपुर्ष सो पचै कीजै । ऐसो चित समाधमों दीजै ॥ बहुर मरे की रहे न आसा । जीवत करे लोकमों बासा ॥
साखी—जीवत समानो लोकमों, नहीं मरणकी आस ।
जीवन मुक्ता होय रहो, सत्तनाम पर्काश ॥
सिंधु समानो बुंदमों, बुन्दहि सिंधु समान ।
सिंधु बुन्द एकै भयो, बहुर न आवा जान ॥
अगम ज्ञान अक्षेत मत, आदि रूप विज्ञान ।
हेसुकृत निरगुण कथा, तुमसों कहाँ बखान ॥
इति श्रीग्रन्थ पंचमुद्रा सुकृतो योगजीत संवादः सम्पूर्णः
प्रारंभिक पृष्ठ (आत्मबोध एवं अन्य बोध)
भारतपथिक कबीरपंथी स्वामी श्रीयुगलानन्द (विहारी) द्वारा संशोधित
खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन बम्बई
नं.९ कबीरसागर - १
संस्करण : फरवरी २०१९, संवत् २०७५
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