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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

आत्मबोध ग्रन्थ

अथ आत्मबोध प्रारंभः

भारतपथिक कवीरपंथी-

स्वामी श्रीयुगलानन्दद्वारा संशोधित

खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई

अनिल प्रकाशक

पुस्तक प्रकाशक

पुस्तक प्रकाशक प्रकाशक

पुस्तक प्रकाशक प्रकाशक

सत्यनाम

श्री कबीर साहिब

1812

1812

सत्यसुकृत, आदिअदली, अजर, अचिन्त, पुरुष, मुनीन्द्र, करुणामय, कबीर, सुरति योग, संतायन, धनी धर्मदास, च्छ्रामणिनाम, सुदर्शन नाम, कुलपति नाम, प्रबोध गुरुवालापीर, केवल नाम, अमोल नाम, सुरतिसनेही नाम, हक्क नाम, पाकनाम, प्रकट नाम, धीरज नाम, उग्र नाम, दया नामकी दया वंश- व्यालीसकी दया

अथ श्रीबोधसागरे

सप्तविंशतिस्तरंगः

आत्मबोध प्रारम्भः

रेखता

भक्ति भगवानकी बहुत बारीक है, शीस सौंपे बिना भक्ति नाहीं। होय अवधूत सब आश तनकी तजै, जीवता मरै सो भक्ति पाहीं ॥ नाचना कूदना तालको पीटना, राँड़िया खेलकी भक्ति नाहीं । रैनदिन तार निर्धार सो लागीरहै, कहैं कबीर तब भक्ति पाहीं ॥

( ६ )

बोधसागर

भजनके वासते सन्तजन कहत है, राम रमतीति एक नामतेरा । नामएकठामकुलगाम नहिं देखिये, अगम औनिगम दोउथकत चेरा ॥ इन्द्रियादि मन वाक्य पहुँचे नहीं, सकल प्रकाश करि रहे न्यारा । रूप अरु रेख वपुषेष नहिं पाइये, कहैं कबीर सो पीव प्यारा ॥ आप दरि आवहैं त्रंग पुनी आवही, आपही बुद बुदा फेन होई । आपही घट है मठ पुनि आपही, आपही अम्बर अकाश सोई ॥ आप प्रकट है आप माही रमे, आपही करत किलोल भाई । कहैं कबीर आपही रमिरहा, आप विनु दूसरा कहाँ समाई ॥ आपही मृत्तिका आपही कुलाल है, आप ही फेरता चक्र काला । आपही सूत है आप मणिया बना, आपही फेरता चक्र माला ॥ आपही सतगुरु शिष्य पुनि आपही, आपही करत उषदेश भाई । कहैं कबीर तहाँ आपही बनि रहा, आपही आपको दे लखाई ॥ ऊँच अरु नीच कछु भेद आने नहीं, राव अरु रंक सब एक देखै । एकही तत अरु एकही ठाठ है, एक बिन दूसरा नाहिं पेशै ॥ काममें क्रोध अरु रागमें द्वेष है, राम भजि राम भजि दूर घेरै । कहैं कबीर मन पवनको फेरिके, पिसन पांच प्रबलको पडि जेरै ॥ एकबिन दूसरा दृष्टि आवे नहीं, एकबिन कहो तुम कौन दूजा । एकबिन दूसरी सेव कहो कौनकी, एक बिन दूसरी कौन पूजा ॥ पांच पचीसका एक मंडान है, एक प्रकाश ब्रह्मांड कीया । कहैं कबीर अब द्वैत दीखे नहीं, एक अद्वैत गुरुदेव दीया ॥ अडिगग अडोल अबीरुसप्रथ धनी, नाम निर्वाण तिस थाह नाहीं । शेष शिव विरंचि तिस थाह पावैं नहीं, उदय अरु अस्त नहीं धूपछाँही ॥ रूप अरु रेष नहीं वर्ण आश्रम कहूँ, आप अलेख सब ठौर पूरा । कहैं कबीर कहूँ लिस होवे नहीं, सैन लखे कोई सन्त सूरा ॥ जल जहाँ थल करै थलतहाँ वहन करै, वहन करि फिरि थल करत साई ।

आत्मबोध

( ७ )

राव सो रंक करि रंक राजा करै,अविगतिकी गति कहो कौनपाई॥ पलएकमें भाजिकरि फिर रचनकरै,समरत्थकीबाजिया कौनजाने। कहैं कबीर यह खेल समरत्थका,होय साक्षी तिहिको सुख माने ॥ रजाय तुम्हारी साईयां करोसो होगया,आपकीरजाकहो कौनमेटै । पल एकके बीचमें दरिआवदहपेलता,फिरि पलएकमहँलेस मेटै ॥ उलटका पुलट अरु पुलटका उलट है,आपका खेल कहो कौनपावै । पल एकमें भाजि करिफिरि रचनाकरै, कहैं कबीर नहीं हारिआवै॥ दृष्टि औ सुष्टि नहिं ज्ञान गुष्टि तहाँ,सकलप्रकाश करिरहै न्यारा । सकलके माँहिअरुसकलकी जानहै,आदिअरुअन्तनहिं मध्यपारा॥ परम प्रकाश आकाशवत जानिये, बाहिरा भीतरा एक साई । कहैं कबीर यह खेल भरपूर है, आवना जावना फेरि नाई ॥ खेल अवधूतका महा अद्वैत है, द्वैत प्रपंचका लेश नाही । गुणमयीकृत सब कालकी डाटमें,शेषशिवविरंचि अरु विष्णु ताही॥ रहै निर्धारि आकार थिर ना रहै, विश्व संसार सब अघर माही । कहैं कबीर यह खेल निश्चे किया,जन्म अरु मरण तिस भर्म नाही॥ देख अवधूतके ज्ञानका घेसला, कालके जालको दूरि तोडै । गुणमई कृतको काटि पयमाल करि,पांच पचीसको पलटि मोडै॥ राग अरु द्वेषकी भीतिको ढाय करि, भर्मके कोटको फोर फोडै । कहैं कबीर यों प्रेम प्रकाश करि,सुरति अरु निरतिका तार जोडै॥ सैलियां बाकियां देख अवधूतकी, जीवता मरै सो भक्ति पाही । तीर खुरसानका बहत तीखा बहै,लगे उर माँहि गद टिकैनाही॥ राजसा माहि गद बहु ऊपजे, तामसा माँहि अहंकार भाई । कहैं कबीर तहाँ शांति कहैं पाइये, जीवकी वृत्तिको ठीक ठाई ॥ दृष्टि अवधूतका दुष्ट नहिं सहि सके,दुष्टको द्वैतकी दृष्टि भासै । परम प्रकाशका भेद पावे नहीं, इन्द्रियां द्वारके रहे आसै ॥

( ८ )

बोधसागर

कहै सब साधु अगाध मैं क्या कहूँ, बिना निर्वेद नहिँ दृष्टि आवे। कहैं कबीर यह खेल बारीक है, बिना गुरु देव कहो कौन पावै ॥ देव निर्वाण तहाँ बाण लागे नहीं, सकल कला सिरें काल देवा । शेष शिव बिरंचि तिस पार पावे नहीं, चन्द अरु सूर फिर करै सेवा ॥ तेज क्षिति पवन जल रहत आज्ञा सही, निगमहू कहत नहिँ पार आवै। कहत अगाध २ सब संत जन, दास कबीर तहँ शीस नावै ॥ सांचा साइयां एकतू और दूजा नहीं, दृष्टि दीखे तेती सकल माया। गुणमयी कृत प्रपंच सब बिनसिहें, थिर नहीं दीखता रहन पाया ॥ घट अरु मठ महदादि थिर ना रहै, रहैगा आदि सोइ अंत नाई । कहैं कबीर मैं तासुकी बन्दगी, एक भरपूर सर्वज्ञ साई ॥ देवरे देवरे देव निर्वाण है, कालका बाण तहाँ नाहिँ लागै । चन्द औ सूर प्रकाश करि सकै, करत परपंच कै रहै आगै ॥ विश्व आधार अरु आप निर्धार है, लहै कोइ संत गुरु ज्ञान जागै। कहैं कबीर विष धार सो ना बहै, जन्म अरु मरणका भर्म भागै ॥ खिरे सो थिर नहीं थिर नहीं खिरत है, आनंद अमरानंद अलख योगी। सकल के माहिँ अरु रहत अतीत होय, तीन गुन पांचरस सकल भोगी ॥ खेल अगाध कछु कहत आवे नहीं, खेल को देखि करि मगन हुआ । कहैं कबीर यह सैन गुंगातणी, जानिहै संत सो नाहिँ जूआ ॥ जागता २ जागकर देखिया सोवता सोवता सुख सोया । खोवता खोवता खोय सारा दिया, रहासो कहन मैं नाहिँ आया ॥ अर्थ अगाध कोई साध भल पाइहै, जासुके खेल प्रकट होई । कहैं कबीर यह खेल प्रतीतका, बिना प्रतीत क्या कहै कोई ॥ रैन दिन संत यूँ सोवता देखिये, संसारकी तरफसूँ पीठ दीया । मन अरु पवन फिर फूट चालै नहीं, चन्द अरु सूर कूँ समकीया ॥ टकटकी चन्द चकोरकी रहत है, सुरति अरु निरतिका तार बाजे ।

आत्मबोध

( ९ )

नौबत तहाँ रैन दिन शून्यमें घुरत है, कहैं कबीर यों गगन गाजै॥ पाव अरु पलकी आरती कौनसी, रैन दिन आरती संग गावै । घुरत निशान तहाँ गौबकी झालरा, गैबके घंटका नाद आवै ॥ जहाँ नेव बिन देहरा देव निर्वाण है, गगनके तरुतपर बुक्ति सारी । कहैं कबीर तहाँ रैन दिन आरती, बातियां पांच पूजा उतारी ॥ साइ आपकी सेवतो आपही जानिहो, आपका भेद कहु कौन पावे । आपनी आपनी बुद्धिउनमानसो, वचनविलास करि लहरिलावे॥ तू कहै तैसा नहीं है सो नहीं देखिये, निगम हू कहत नहीं पार आवे । कहैं कबीर या सैन गुंग तणी, गुंग होय सो सैन पावे ॥ कथत है ज्ञान अरु ध्यान पुनि धरत है, चलत विचारके पंथमाही । श्वास उश्वास फिरि गूदडी सीवता, सुरतिकी सूइनहि अंतजाही॥ रहै निर्द्वन्द कोइ द्रन्दमें ना पड़ै, मन अरु पवनका करै खेला । कहैं कबीर फिर फूट चालै नहीं, सहज दरिआवमें रमे मेला ॥ पुरुषकी सेवते पुरुषही होत है, नारिके सेवते नारि होई । पुरुषकी सेवते परम पद पाइये, नारिके सेव नहिं सुक्ति कोई ॥ पुरुष प्रमात्मा देव निर्वाण है, नारिये करत प्रपंच सारा । गुण मई कृतको त्यागरे बावरे, कहैं कबीर ज्यों होय पारा ॥ दरोगे बापडे दाम लेखै किया, छतरिया माहि तबकरी बोरी । बोवरी माहि तहाँ बैसि करि बावरे, ज्ञान कपट सँ जडी मोरी ॥ रामही राम तहाँ सदा विश्राम है, रैन दिन जाम जहाँ बजे बाजा । कहैं कबीर तहाँ पीव संग खेलना, सकल देवा सिरै देवराजा ॥ पाँच अरु तीनकी छत्रडी साज करि, डरोगे ऊपरै प्राण हूआ । गगनकी गुफाको पवनसँ, साफ करि, दमहिदम तहाँ लिया अजूवा॥ शाह सुलतान सुब्हान सँ सुखरू, दरोगै जाय करि ज्वाब दीया । कहैं कबीर दीवान तब मिहर करि, आपने कदम मों राखि लीया॥

( १० )

बोधसागर

कर्म अरु भर्म सब संसार करत है, पीवकी परख कोइ संत जाने। सुरति अरु निरतिमन पवन कूँपलटिकरि, गंग अरु यमुन के घाट आने॥ पाँचको नाथ करि साथ सोहँ लिया, अघर दगि आवका सुख माने। कहैं कबीर सोइ संत निर्भय रहै, जन्म अरु मरणका भर्म माने ॥ नाभि कस्तूरिका मृग बारे फिरै, उलटि करि आपमें नाहिं जोवे। भर्मता भर्मता योनि पूरी करै, अंधयो आपुनी वस्तु खोवै ॥ नाभि निज नामसो ठाम पावै नहीं, जगत सब तीर्थ गर्भ भूला। कहैं कबीर हरिपंथको नाल है, अंध भवसिन्धुमें फिरत झूला॥ उलटि बज्रदमें भर्मना दूरि करि, बाछिकै भटकनै सिद्धि नाही। फिरत बाहरे तहाँ वस्तुको नास है, वस्तु विचारि तू देख माहीं॥ आपमें आप है आप अजपा जपो, जाप जपेते आप पावै। कहैं कबीर ये सत्यकी सैन है, सत्का शब्द सब संत गावै ॥ गंगा उलटि धरो यमुन बासा करो, पलटि पञ्चतीर्थी पाप जावे। फूरि वर्षा तहाँ रैन दिन झरत है, न्हायसो फारि भौ नाहिं आवे॥ फिरत वारे तहाँ बुद्धिको नाश है, बाँझके भटकने सिद्धि नाही। कहैं कबीर इस युक्तिको गहेगा, जनम अरु मरण तव अंत पाहीं ॥ बपु बालोतरा माहि वावो रहै, ज्ञान प्रकाश बिन रहै नाही। बोलता चालता खावता पीवता, करै उपदेश अरु रहै माहीं ॥ दृष्टि दीसै तिनको रहन पावे नहीं, बपु बालोतरो बिनसि जावै। कहैं कबीर एक बोलता सही करें, सो जन्म अरु मरण मैं नाहिं आवै॥ देख बज्रदमें अजब विश्राम है, होय मौजूद तो सही पावै। फेरि मन पवनको घेरि उलटा चले, पाँच पचीसको पलटि लावै ॥ शब्दकी डोरि सुख सिन्धुका झूलना, घोरकी शोर तहँ नाद गावै। नीर विनुकमल तहँ देख अति फूलिया, कहै कबीर मन भँवरछावे॥ रामकी दयाते खेल प्रकट हुआ, तासुका खेल कहो कौन जानै।

आत्मबोध

( ११ )

होय अंलीक सो खेल पावैसही, मगन होय आपमें मौज मानै॥ सदा निर्द्वन्द कोइ द्वन्दव्यापे नहीं, गुरुदेवकी मेहर ते मौज पाई॥ कहैं कबीर योंखेल सुख सिन्धुमें, भूलि भर्ममें नहि अंत जाई ॥ चक्रके बीचमें कमल अति फूलिया, तासुका सुख कोई सन्त जाने॥ कुफल नौद्वार अरु पवनको रोकना, भृकुटिमध्य मन भवर ठानै॥ शब्दकी घोर चहुँ ओर तहाँ हात है, अंधर दीर आवका सुख मानै । कहैं कबीर यो खेलि सुख सिन्धुमें, जन्म अरु मरनका भर्म मानै॥ गंग अरु यमनके घाट को खोजिले, भंवर गुँजार तहाँ होय भाई॥ सरस्वती नीर तहाँ देख निर्मल वहै, तासुके जल पिये प्यास जाई॥ पाँचकी प्यास तहँ देखि पूरी भई, तिनकी ताप तो लगे नाही । कहैं कबीर यह अगमका खेल है, गैबका चाँदना देखि माही ॥ बोलरे बोल अब चुप क्यों होइ रहा, बोल मन सुवटा ब्रह्म बानी॥ पाँचको पलटिकरि तीनिको जीतिले, महल चौथातनी खबर जानी ॥ गगन गजें तहाँ नीर निर्झर झरै, परखि पाँवै कोइ संत सूरा । कहैं कबीर मस्तान माता रहे, बिना भूदंग बजै तूरा ॥ माँडि मंथान मन रईको फेरना, होय घमसान तहाँ गगन गजै । उठै झँकार तहाँ नाद अनहद घुरै, तुकुटी महलके बैठ छाजै ॥ नामकी नेति करि चित्तको फेरना, ततको ताय करि घृत लिय । कहैं कबीर योंसंत निर्भय हुआ, परम सुखधाम तहाँ लागि जीया ॥ गड़ा निशान तहाँ शून्यके बीचमें, उलटिकरि सुरति फिरिना हि आवै॥ दूधको मथिकरि घृत न्यारा किया, बहुरि फिरित करमें नाहि समावै॥ माँडि मंथान तहाँ पाँच उलटा किया, नामकी नेति सो सुरति फेरी । कहैं कबीर यों संत निर्भय हुआ, जनम औ मरणकी मिटी फेरी ॥ श्रवण अरु नयन मुखनासिकार टट है, रोमही रोमधुनि एक होई । बाहिग भीतरा एकही तान है, एक बिन दूसरी नाहि कोई ॥

( १२ )

बोधसागर

अधर दरिआव धसेको मीलिया, बाहिरा भीतरा एक पानी । कहैं कबीर यह खेलदरिआवका, योग अवधूतकी यहै बाणी ॥ शशि प्रकाशते सूर उगासही, तूर बाजै तहाँ संत झूले । तत झनकार तहाँ नूर वर्षत रहै, सरस पीवै तहाँ पांच भूले ॥ दरिआव और बुन्दज्यो देखअन्त नहीं, जीव अरुशीवयो एकआही । कहैं कबीर यह सैन गुंगा तणी, वेद कितेबकी गम नाही ॥ अगम स्थान गुरुज्ञान बिन नाल है, लहै गुरुज्ञान कोइ संत पूरा । द्वादशां पलटि करि षोडशां प्रकटै, गगन गजै तहाँ बजै तूरा ॥ ईड़ा पिंगला सुषुमना समकरै, अर्ध अरु उर्ध विचध्यानलावै । कहैं कबीर सोइ संत निर्भय रहै, कालकी चोट फिरनाहि खावै ॥ अधर आसन किया अगमप्यालापिया, योगको मूलगहि युक्तिपाई । पंथ बिन चलिगये शहर बेगम्य पुरा, दया गुरुदेवकी समझि आई ॥ ध्यान धरि देखियानैन बिनुपेखिया, अगम अगाध सब कहत जाई । कहैं कबीर कोइ भेद विरला लहै, सो कहैया भेद भाई ॥ शहर बेगम्य पुरागम्य कोई ना लहै, होय बेगम्य सोई गम्य पावै । गुननकी गम्य ना अजब बिश्राम है, सैनको लहै सोइ सैनगावै ॥ मूक बाणी तिको स्वाद कैसे लहे, स्वाद दावै सोई सुख मानै । कहैं कबीर या सैन गुंगा तणी, गुंगा होय सो सैन जानै ॥ अधरही ख्याल अरु अधरही कल है, अधरके बीच तहाँ मठकीया । खेल उलटा चला जाय चौथे मिला, सिन्धुके मुख फिर शीस दीया । शब्द घंघोर टंकोर तहाँ अधर है, नूरको परास करि पीव पाया । कहैं कबीर यह खेल अवधूतका, खेलि अवधूत घर सहज आया ॥ छका अवधूत मस्ताना माता फिरै, ज्ञान वैराग्य सों छका पूरा । श्वास उश्वासका प्रेम प्याला पिया, गगन गजै तहाँ बजै तूरा ॥ पीठ संसार सो राम राता रहैं, यतन जरना लिया सदा खेले ।

आत्मबोध

( १३ )

कहैं कबीर गुरु पीरसूं सुखसुख, परम सुख धाम तहाँ प्राण मेलै॥ छकासो थका फिर देह धारे नहीं, करम कपाट सब दूर कीया । जिनश्वासउश्वासका प्रेमप्यालापिया, नामदरि आवतहाँ पैसिजीया ॥ चढीमतबालिया औरहु आमनसावता, फटिकज्यों फेरिनहिं फूटजावै। कहैं कबीर जिनवासनिर्भय किया, बहुरि संसारमें नाहिं आवै ॥ तरक संसार सो फरक फुक्र सदा, गरक गुरुज्ञानमें युक्ति योगी । अरध अरु उरधके बीच आसन किया, बंक प्यालेपीवे रस भोगी ॥ आधा दरिआव जहाँ जाय डोरिलगी, महल वारीकका भेदपाया। कहैं कबीर यों संत निर्भय हुआ, परमसुख धाम तहाँ प्राणलाया ॥ चमड़ी मतबालि तहाँ ब्रह्म भाठी झरै, पिपै कोह सूरमां शीसमेलै। पांचको मेलि सैतानको पकड़ि करि, प्रेमकाप्यालाअधर झेलै ॥ पलटिमनपवनको उलटिसूधाकंवल, अरधअरुउरधबिचध्यानलावै। कहैं कबीर मस्तानमाता रहै, बिनाकर तातियां नाद गावै ॥ आठही पहर मतबाली लागी रहै, आठही पहरकी छाक पीवै । आठही पहर मस्ता माता रहै, ब्रह्मकी छोलिमें संत जीवै ॥ साचही कहतअरुसांचही रहत है, काचको त्यागिकरि सांच लाग। कहैं कबीर यों सन्तनिर्भय हुआ, जन्मअरुमरनका भर्म भागा ॥ करत किलोक दरिआवके बीचमें, ब्रह्मकी छोलिमें हंस झूलै । अरध अरु उरधका एकवारा तहाँ, पलटिमनपवनको कमलफूलै ॥ गगन गजें तहाँ सदा पावस झरै, होत झड़रैन दिन बजै तूरा । बेनकितेवको गमनाहीं तहाँ, कहैं कबीर कोई रमै सूर। ॥ बजत करताल तहाँ नीरनिर्झरझरै, होत टकसाल तहाँ, शब्दपूरा । गैबकी मौन अरु ज्ञानका चांदना, शब्दअनहद तहाँ बजै तूरा ॥ होत ततकार तहाँ निरतनिशदिन करै, सुरतिमनपवनके बैठिछाजै । कहैं कबीर गुरुपीरकी मिहरिसूं, बिना बयबादले गगनि गाजै ॥

( १४ )

बोधसागर

गगनकीगुफातहाँ गैवाकाचांदना, उदयअरुअस्तका नाम नाही । दिवसअरुनैतहाँ नेकनहिं पाइये, परमप्रकाशका सन्तमाहीं ॥ सदा आनन्द दुख द्वन्द व्यापे नहीं, पूर्णानन्द भरपूर देखा । भ्रम अरु भ्रान्ति तहाँ नेकनहिं पाइये, कहैं कबीर रस एकपेखा ॥ खेल ब्रह्मांडका पिण्डमें देखिया, जगतकी भरमनादूर भागी । बाहिरा भीतराएक आकाशवत, सुषुप्ता डोरी तहाँ उलटिलागी ॥ पाँचको पलटिकरि शून्य मोघरकिया, धरामें अघर भरपूरदेखा । कहैं कबीर गुरु पीरकी हमरि सँ, त्रिकुटि मध्य दीदार पेखा ॥ देख दीदार मस्तान मन होरहा, सकल भरपूर है नूर तेरा । सुभग दरिआवजहाँहंसमोतीचुगे, कालका जालतहाँ नाहिनेरा ॥ ज्ञानकीपालिअरुसहजमतवालिहै, अघरआसनकिया अगमडेरा । कहैं कबीर तहाँ द्वैत भासे नहीं, जन्म अरु मरनका मिटाफेरा ॥ ब्रह्मदरियावतहाँ करतकिलोलमन, सुरतिकीसीपतहाँ शब्दमोती । गुरुपीरकीनिहरते भेदयह पाय है, मोतिया माँहितहाँ नाम जोती ॥ तिनयापरख कोइ जानिहैं जौहरी, कौडियावणिजनहिंपरखिआवे । कहैंकबीरकोइ होय मरजीबता, तोखेल दरिआवका हाथ आवै ॥ चितकीरचमककीप्रीतिकरि पथरिया, सुरतिकासोखताखूबलाया । अग्निको झारि अवधूतप्रचण्ड करि, कर्मसब काठले माँहि द्याया ॥ हुआ निर्धूमसब सकलसंसार मिटा, खुला कपाट तब घाटपाया । कहैं कबीरअब द्वैत दीखै नहीं, अखंड करूणा भई रामराया ॥ करियोगयमडाठउगालि करिदेहगुण, चतुर्दशभवनका लोग खाया । महाप्रलयकियाबीजकोईनारहा, रहाएकनिर्द्वन्दनहिंकालखाया ॥ खेल अगाधकोइ साधुभल पाइ हैं, महाप्रलय जिनकिया सोई । कहैं कबीर फिर उपजिविनशै नहीं, अहंमताजिनकुबुधि खोई ॥ कालकेजालके भेद नहिं राममें, कालकहाँ कौनको खाइ हैं रे ।

आत्मबोध

( १५ )

वस्तुमें वस्तुअरु तत्त्वमें तत्त्व मिलै, जीवका नामयो जायहैं रे॥ जन्म अरु मरनकी शंक नाही कछु, जन्म अरुमरनको पाइहैरे॥ कहैं कबीर यों संत निर्भय हुआ, बहुरि संसार नहिं आइहैं रे ॥ धेनु व्यावैतिको दूध भरवे नहीं, बाँझडी धेनुको दूध होई । बाँझडी धेनुको दूध पीवैतिको, होय सुख रूप ना मरै कोई ॥ बाँझडी धेनुको पुत्र पैदा हुआ, मरि मन मृगको माँस खावै । कहैं कबीर सो पुत्र हैं पाँगुला, चढ़ै आकाश फिर नाहिं आवै॥ ससुन्द उलटा तबै सीपमाहीं मिला, हुआ मोती तहां सीपमाहीं । जल बिनाहंसतहांसदामोती चुगै, ताहंसको कालकी चोट नाही॥ नदी उलटी तबै ससुन्द माहीं मिली, प्राण हंसा तहां सदा झूलै । कहैं कबीर कोइ भेद बिरला लहै, बिना जल केतकी कमल फूलै॥ नहरी काटि करि उलटि पाछे दर्द, ज्याथुं दरियावका सोटलागि। सदा सुख सिंधुमें माछल्लों झूलता, जन्मअरुमरनका भर्मभागा॥ रोमही रोम रसनीरको पीवता, नीरकी प्यासमें सदा जीवै । कहैं कबीर सुख सिंधु छाड़ै नहीं, खार दरिआवजलनाहिं पीवै॥ सुख सिंधुकेसीरका स्वाद तबपाइ हैं, चाहका चौतरा उठिजावै । बीजके माहिं ज्यों वृक्ष विस्तार है, यों चाहके माँहिसबरोग आवै॥ प्रौढ़ वैरागमें होय आरूढ़ मन, चाहके चौतरे आग दीजै । कहैं कबीर यों होय निर्वासनी, ततसो रत्न होय काज कीजै ॥ सूर प्रकाश तहां रैन कहाँ पाइये, रैनप्रकाश नहिं सूर भासै । ज्ञान प्रकाश अज्ञान कहैं पाइये, होय अज्ञान तहां ज्ञान नासै ॥ काम बलवान तहारांम कहैं पाइये, रमिरहा राम तहां कामनाहीं। कहैं कबीर यह तत्त्वविचार है, समझि बिचारि करि देख माहीं॥ कामकी कोथली मूलमें जलि गई, रामकी कोथली रहै प्यारे । राम विश्राम तहां काम कहाँ पाइये, कामविश्रामतहारांममन्यारे॥

नं. ९ कबीरसागर - २

( १६ )

बोधसागर

दिवस अरु रैन फिर एकठां ना रहे, ज्ञान अज्ञान नहिं एक होई । कहैं कबीर यह भेद जान्या बिना, जीव विश्राम क्यों लहै कोई॥ घुरत निशान तहां शून्यके बीचमें, रमत चौगान कोइ सन्त सूर। झूझ बिन झूझ अरु बूझ बिनु बूझना, पावविनपंथतहां बजै तूरा॥ नैन बिनु सैन अरु बैनबिनुबोलना, पाप प्रचंड तहां जाय चूरा । कहैं कबीर ये विकट सा खेल है, लहै कोइ सन्त गुरु ज्ञान पूरा॥ एक शामसेर एकसार बजती रहे, खेल कोई सूरमा सन्त झेलै । कामदलजीतिकरिकोधपयमालकरि, परमसुखधामतहां प्राणमेलै॥ शील सनाहकरि ज्ञानको खड़ले, आय चौगानमें खेल खेलै । कहैं कबीर सन्त जन सूरमा, शीसको सौंपि करि करम ठेलै ॥ पकड़ि शमशेर संग्राममें पैठिया, देह प्रयंत करि युद्ध भाई । काटि शिर बैरिया दाबि जहाँका तहां, आयदरबारमें शीस नाई ॥ करतमतवाली जहाँ सन्तजनसूरमा, घुरतनिशानतहां गगनि घाई । कहैं कबीर अब श्यामसो सुखरू, मौजदरियावकी भक्ति पाई ॥ तन बन्दूक अरु पवन दारू किया, ज्ञानगोली तहां खूब दाटी । सुरतिकी जामगीमूठ चौथेलगी, भर्मकी भीति तहां दूरिफाटी ॥ कहैं कबीर कोइ खेलिहैं सूरमा, कायरा खेल यह हाथ नाही । आसकी फाँसको काटि निर्भय भया, रामरमिरामरमि गर्क माहीं॥ ज्ञान शमशेरको बाँधि योगी चढ़ै, मारिमन मीररणधीर हूआ । खेतकोजीतिकरिपिसनसबपेलिया, मिलाहरिमांहि अबनाहिंजूवा ॥ जगतमें यश अरु दाद दगीहमें, खेलयो खेलिहैं सूर कोई । कहैं कबीर यह सूरका खेल है, कायरां खेल ये नाहिं होई ॥ सूर संग्रामको देखि भाजे नहीं, देखि भाजैतिको सूर नाही । काम अरुकोधमदलोभसोजूझना, मंडाघमसान तहां खेतमाहीं ॥ शील अरु साँच संतोषसहाई भये, ज्ञान शमशेर तहां खूब बाजै ।

आत्मबोध

( १७ )

कहैं कबीर कोइ जूझि हैं सूरमा, कायरा भीरु तहां धरडिभाजै ॥ शूर संग्रामको देखि सन्मुख मँडा, शीश दे नाथको साथ हुआ । कमदकीलो कियो फौजमांही पड़ा, पिसन पाँचुदलजीति जुवा ॥ ज्ञान शमशेर ले भूमि सवसर करी, जाय निर्बानपद किया बासा । कहैं कबीर रणधीर निर्भय हुआ, शीस जगदीश जगजीति खासा ॥ साधुका खेल तो विकटबैडा मता, सती औ सूरकी चाल आगै । सूर घमसान है पलकएक दोयका, सती घमसान पलकएक लागै ॥ साधु घमसान है रैन दिन जूझना, देह प्रयंत का काम भाई । कहैं कबीर टुकबाग ढीली करै, तो उलटि मनमगनसौ जमी आई ॥ साधु पद कहत तो बात अगाध है, साधु का खेल तो कठिन भाई । होयमरजीवता गत सब गुण करै, साधु पद भला तो हाथ आई ॥ अवनिकै गुण धरै रहत गिरि मेरुज्यों, किलाको देखि नहि छोभ पावै । कहैं कबीर कोइ रेख नहि ऊपजै, साधु पद भला तो हाथ आवै ॥ नाच आवै तबै काछको काछिये, नाचविनकाछ किस काम आवै । पहिरि सन्नाह धरि नाम रणजीतको, बेरघमसानके कूदि जावै ॥ उत्तरे नूर अरु श्याम नहि आदरे, दाद दर्गाह में नाहि पावै । सिंहकी खाल अरु चाल है भेडकी, कहैं कबीर तब सियालखावै ॥ ब्रह्म चौगान तहाँ ज्ञानकी गेंद है, रमत अवधूत कोई सन्त सूर । सुरतिके दंडसोफेरि मन पवनको, शब्द अनहद तहाँ बजे तूरा ॥ सदारसएकतहाँ मूठिनही विभचरे, कालसेतीलडै रैन दिन होय घमसानमाही । कहैं कबीर यह विकट बैड़ा मता, कायरा खेल का काम नाहीं ॥ सकल संसारमें एक चीपि फिरि, शील अरु सांच संतोष नाहीं । जगत अरु भेष सबएक नाकै चला, जत अरु सत्त कहाँ ठौर पाहीं ॥ दम्भपाषंड संसार सब मिलत है, सांचके शब्दको नाहि मानै । कहैं कबीर यह खेल बारीकहैं, साधुके राहको कौन जानै ॥

मो० सा०

( १८ )

बोधसागर

सकल संसार विषधारमें बहुत है, रहत कोइ सन्तजन नामराता । झूठ अरुकपटयेदूरिदिलते करे, तबजन्मअरु मरनका मर्म भागा ॥ सुखसार हृदयधरे छारसब पर हरे, इन्द्रिया द्वारते फिरै पूठा । कहैं कबीर सोइ सन्त निर्भय हुआ, जगतसंसार सो रहै रूठा ॥ राग अरु द्वेषते रहित हैं तेजना, यजना रामके रंग राते । महल बारीकमें सदा भीना रहै, प्रेम प्याला पिवे रस माते ॥ ज्ञान गलतान अरु अंग शीतलसब, धरामें अधरमिलिएकहुआ । कहैं कबीर महदादि अरु मठज्यों, घटा फूटै जबै माहि जूवा ॥ भेष दरिआवमें हंस भी होत है, भेषदरिआव तहाँ बग होई । भेषदरियाव तहाँ रतन भी होत है, भेषदरिआव तहाँ सङ्ग सोई ॥ जीवता मुये बिन भेद पावै नहीं, जीवता मरै सो भेद पावै । कहैं कबीर गुरुपीर पूरा मिलै, तब कछु नमूना दृष्टि आवै ॥ झूठ अरु सांचका तान कैसे मिलै, रैन अरु दिवसका फरकभारी । लौनअरु शकरएकहोतहैं, कहाँ खाँडकीजात कहाँ लवनखारी ॥ हंस अरु बगदोउ एकसे देखिये, चालके माहिती फरक भारी । कहैं कबीर वह हंस मोती चुगे, वगतो माछली दूँडिभारी ॥ साधुके संगते साधुही होत है, जगतके संगते जगत होवे । साधुके संगते परम सुख ऊपजे, जगतके संगते जन्म खोवे ॥ साधुके संगते परमपद पाइये, जगतके संग दुख होय भारी । कहैं कबीर यह संतका शब्द है, सुनोरे जीव सब पुर्ण नारी ॥ दरिद्री देख अवधूत है भरथरी, दूसरा दरिद्री नाहिं कोई । पांच अरु पचीसकूपलटि नाकैकिया, मनअरूपवनयेजातिदोई ॥ सदानिर्द्वन्दकोइद्वन्द व्यापेनहीं, अजरअमरानन्द अगम राता । कहैं कबीर यह दरिद्री देखिये, दूसरा दरिद्री नरक जाता ॥ सुखी अवधूत दुखी सब जगत है, रैनदिनपचतनहिं भूख भागे ।

आत्मबोध

( १९ )

ये सदानिर्द्वन्द्व कोइ द्वन्द्वव्यापेनहीं, गुरुदेवकेशब्दतेस्मृति लागी॥ तत्त्वस्मृति अरुगत सबगुण किया, प्रकटी अग्नि सब भर्म भागा । कहैं कबीर संसार सब गलत है, नहीं ज्ञानका ओढना सदा नागा । नरकका जीव सब नरकमें मिलरहा, नरकविन और नहिं बात आवै । नरकमें उपज्या नरकमें खपेगा, रैन दिन नर्कके माहिं ध्यावै ॥ शील अरु साँच संतोष सूझै नहीं, इन्द्रिया द्वार रस जहर पीवै । कहैं कबीर नर सही सो मरेगा, बिना हरि आसरे कहाँ जीवै ॥ नाम गुरुदेव अरु शिष्य है नारिका, कपिज्यों नाचता फिरत भाई । देत है ठान तब करत उनमाद नर, बन्दगी करत है चित्त लाई ॥ करत सँघार अरु खानको देत है, गुड अरु सूठ बूरा विसाई । कहैं कबीर यह अकिल अज्ञानकी, कहत गुरुदेव नहीं लाज आई ॥ बारहि बार मन पवनको सोधि नर, पाँच प्रमोधि करि नाम लीजे । भांग अरु तमाकू खाय अफीमको, कालके जालमें न्याय छीजे ॥ भांगकी तोरमें रैन दिन फूलिया, भजन प्रतापका सुख नाहीं । कहैं कबीर सुनु शब्द साँचा कहूं, समझविचार करि देख माहीं ॥ कहनको साथ अरु व्याध छूटैनहीं, कोटिमें पाव या देख भाई । खेत अरु कुवा फिर व्याज बाढो करै, बलधिया हाँक करि देत खाई ॥ नामको फेरि करि जगत धूता सबै, नागिनी नारि घर बार पूरा । कहैं कबीर मन माहि फूला फिरै, काल शिर बाजि है देख वूरा ॥ प्रतिग्रह झेलता डरता नाहिं है, कौन गति होइ है जीव थारी । होयगा ऊंट अरु बाड़िको चरैगा, सो डरता फिरैगा बन सारी ॥ पायकी पोटको डारिरे पापिया, पछै भी भार तलब है भारी । कहैं कबीर नर अंध चेतै नहीं, बात सांची कहूं लगे खारी ॥ साधु जो होय तो व्याधको नाश कर, व्याधके नाशते साधु होवै । वासना व्याधि सब जीवको दहत है, बिना गुरुदेव कह कौन खोवै ॥

( २० )

बोधसागर

कतरनी कपटदिलबीचते दूरिकरि, सांचकी नापनी हाथ लीजै । कहैं कबीर यों होय निर्बासना, निर्मला तत रस नाम लीजै ॥ मगनहोयविश्वासधरिध्यानअलेखको, लिखाहैलेखसोमिटैनाहीं । किया है कृत कहु मेटिको करिसकै, दुखअरुसुख या देहमांही ॥ टहलुवा संग दोय टहल करबो करै, आपनी आपनी बेरि आवै । कहैं कबीर यों जानि निर्भय रही, किया है कृत सो कहा जावै ॥ कियासो हुआ अरु करै सो होयगा, जीव क्यों कल्पताफिरैभाई । लिखाहै अंकसो मेटिको करिसके, बिनाहै रिजक सो दियाजाई ॥ गहो विश्वास एक समरत्थ धनीका, आनको छाड़ि अलेखधावो । कहै कबीर सब कल्पना दूरिकरि, पैसिदिलमाहि दिलदारपावो ॥ जीवको जक नहीं रैनदिन पचतहै, करमकी रेख सोई पाइहै रे । तनकी भूख सहल है बावरे, मनकी मेर नहीं धायहै रे ॥ आपना कृत तो दृष्टि नहिं देखता, पारके भागको रोयहै रे । कहैं कबीर यों रतनको खोय करि, जीव अज्ञानमें सोयहै रे ॥ आपनी अग्निमें आपही जलतहै, दोष कहो कौनको दीजिये रे । संत तो चन्द्रज्यों अंगशीतल सबै, जीवआपही आपमें छीजियेरे ॥ नीरके पीयेते प्यास मिटि जात हैं, डूबि मरै तो दोष कैसा । कहैं कबीर ये दोष कहु कौनको, जीव पाताल लै न्यायबैसा ॥ कामकी अग्निमें जीव सब जरत हैं, ज्ञानविचार कछुनाहिंबूझे । खोय प्रतीत अरु बोय बाजीदई, शब्द मानै नहीं काल सूझे ॥ झूठको थापि करि सांचको उत्थपै, झूठकी पक्षको गहेगांठी । कहैं कबीर नर अंधचेतै नहीं, कालकी चोट यों खाय डाठी ॥ कामबलवानजगमाहिं योद्धासबल, बीजविस्तार तिहुँलोककिया । स्वर्गऔमृत्युपाताल सबघेरिया, जीवजलथल सब मारिलिया ॥ खंडब्रह्माण्ड सो जीव सारागया, रहा कोइ एक जो कोटि माहीं ।