कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
ज्ञानस्थितिबोध
( १२५ )
अन्तर ध्यान बहुरि प्रभु भयञ्जः। धर्मदास विलखत मन भयञ्जः॥
रुदन करत फिरै विलखाता । कहैं ना देखे साहब गाता ॥
मोहि अपराधी कस प्रभु छांङ्गा । विरह ज्वाल जरही मन भांङ्गा॥
हौ अपराधि करम कर हीना । साहेब तरस परै नहिं चीन्हा ॥
बिन देखे नहिं जियत न आऊँ । गुरुचरणामृत बिन पछताऊँ ॥
अपना दास दास प्रभु कीन्हा । अग्रिम पदार्थ हम कह दीन्हा॥
अब साहेब मोहि दर्शन देहू । तुम बिन कासो करब सनेहू ॥
दिवस आठ अन्नहि बिन बीता । बिना कबीर जीव नहिं जीता ॥
या विधि बारह दिन हो गयहू । तब साहब फिर दर्शन दियहू ॥
साखी-सजिव भये निजीवते, अति अनन्द उर बाढ़ि ।
धर्मदास मन हर्ष भा, सुख अनन्द हिय गाढ़ि ॥
चौपाई
धर्मदास बिनती तब लाई । इतने दिवस दरस बिन जाई ॥
हम तो भ्रमर कमलके वासी । जल बिन मीन सुरतिज्यों प्यासी ॥
सद्गुरु वचन
तब साहब अस भाखब बैना । अब तुम देखो अपने नैना ॥
देखहु धर्म निरूप हमारा । हमही छांङ्ग और चित धारा ॥
हिरिणिरूप धरो प्रभु तबहीं । कोटिन भानु छिपाने जबहीं ॥
येहि रूप है आदि हमारा । हठ नियह जिन करब बिचारा ॥
जब तुम इतना कीन्हा उपासा । तब कह दरस पाइ हम पासा ॥
धर्मदास वचन
भये कृतार्थ दर्शन लीन्हा । धर्मदास न्यौछावर कीन्हा ॥
बहुरि दास उठि पायन परही । चरण टेक बिनती अनुसरही ॥
जबसे पावब नाम तुम्हारा । तबसे सुनब लोक व्यवहारा ॥
अब मनसौं अभिलाखा येही । सोक दिखावहु पुरुष विदेही ॥
( १२६ )
बोधसागर
मो कह लेहि चलौ प्रभु तहवां । सत्य लोक पूरुषही जहवां ॥
बिन परिचय नहिं मन पतियाई। विन दर्शन नहिं सुरति हद्दाई॥
तुम प्रसाद पाइब मैं भेदा । अब परसौ चित अमृत केदा ॥
सत्यलोक परसौ उजियारी । मैं अब बलि २ जाऊँ तिहारी॥
साखी—यम बंधन सब काटिकै, हंस लगावहु तीर ।
धन्य भाग्य वा हंसके, कहि नाम कबीर ॥
सदगुरु वचन चौपाई
तब साहब चित पाया आई । चलहुँ वेग मैं दर्श दिखाई ॥
प्रथमहि करौ नासिका बारी । फिर रक्षा मन है रखवारी ॥
पैठै नाहीं काल शरीरा । बहुरि कठिन होवे तब पीरा ॥
जब तुम करहु अग्र सनेहा । शब्द संधिसौं राखो नेहा ॥
उन मुन कर पवनहि अवराथौं। उलटे ते सुलटा करि साथौं ॥
सोहं सोहं होइ सवारा । छोड़हु देह चलो दरबारा ॥
चले जो हंस पवनके तेजा । पहुँचे निमिष मांह जहां सेजा ॥
पलैंग साठ राह हम कीन्हों । साहिब खैंचि पलकमों लीन्हों ॥
राह माह एक नाचहि दूता । शब्द बान मारेय अजगूता ॥
छिनमें साहब लैगये तहँवा । पुहुप दीप पूरुष रह जहँवा ॥
सुरजन पीप जाइ भे ठोढ़े । देखत दरस हरष अति बाढ़े ॥
धर्मदास सत बिनती कीन्हों । साहब सुरति घटहिमों चीन्हों ॥
लेकर सुररति चले पुनि तहां । हंस सुजन बैठे जहां ॥
करी प्रणाम दण्डवत कीन्हों । हंसन कुशल पूछि सब लीन्हों ॥
केहि बिधि तुम रक्षा मन आयहु । कौन शब्दसों अमृत पायहु ॥
यमको जोर पहुँचत है प्रचण्डा । कैसे कदि आये नव खण्डा ॥
कौन प्रसाद पाय तुम भाई । कौन वस्तु बल इहवां आई ॥
पिछली सुरति कछु तुम आनौं । रक्षा हंस आप कह जानौं ॥
ज्ञानस्थितिबोध
( १२७ )
धर्मदास तब वचन प्रकाशा । आये इह कबीरकी आशा ॥
नाम संधि उन मोहि हटाई । तिहि प्रसाद सेवा तुम पाई ॥
आरतीकर परवाना पावा । काल फाँस सबहीय नशावा ॥
सुरति निरति भूल गये जब ही । भवसागरमों ठाढे तब ही ॥
साखी-लोक वेद सब भूलिहू, भूला आपनु भाव ।
बलिहारी सतगुरुनकी, जो ल्याये इहि ठाव ॥
चौपाई
तबहि सुजन जन पूछी बाता । कहिब कहा है हमरे आता ॥
तुमरे दीप माँहि वे ठाढे । हम पूरन उनहीके बाढे ॥
तब सुरजन जन आये तहँवा । आइ कबीर बैठे हैं जहँवा ॥
चरण लगाइ अंकमहँ लीन्हों । भले गुसाईं दर्शन दीन्हों ॥
सिंहासन साहब बैठारी । सुरजन हंस विराजे भारी ॥
आज्ञा साहब दीन्ही जबही । धर्मदास ठाढे भये तब ही ॥
पुरुषहि तबहि वचन उचारा । सुकृत अंश लावो सठिहारा ॥
आरति साजि हंस सब आये । चलिए सुकृत पुरुष बुलाये ॥
तब सुकृत चित आये तहँवा । पुहुपदीप पुरुष रहि जहँवा ॥
पुहुपदीप नहिं बरनो जाई । जगमगज्योति सदा अधिकई ॥
दामिनि दमक होय अति भारी । कोटिन भानु जाय तहाँ वारी ॥
हंस जाय तहाँ करै अनन्दा । कालजाल व्यापै नहिं फन्दा ॥
पंख बेहु नभचर तहाँ फिरही । अगिन बेहुते दीपक जरही ॥
बिन करताल मुदंग जो बाजे । चित्र विचित्र बीन कर छाजे ॥
बीना सुर तहाँ शब्द पुकारा । बीना श्रवण सुनत झनकारा ॥
बिना नालके कमल अन्तूपा । तामध्ये है पुरुष स्वरूपा ॥
करतहि दरश हरष उर आनी । सतगुरुवचन सत्य कर मानी ॥
साखी-अति अनंद उर ऊपजो, बाजत अनहद तूर ।
हीरा लाल मणि जग मगै, अमृत शोभा भरपूर ॥
( १२८ )
बोधसागर
चौपाई
धर्मदास मन भये अनन्दा । जिमिरविदरश फूलि अरविदा॥
शोभा दरश हरष अति भाऊ । उभयसुरखगतिबरणि न जाऊ॥
तब सुरजन जन जाइ जनावा । साहेब धर्मदास यह आवा ॥
इच्छा अधिक करै दर्शनको । पुरुष चरण हियमो परसनको॥
ये दोइ रूप तुमहि उत्पानी । सद्वरु सुकृतै नाम बखानी ॥
तब ही पुरुष बचन फरमाया । सुरजन हंस जबै बुलवाया ॥
लेहु बेगि सुकृत तुम अंशा । पुरुष दरश करीब निःशंसा ॥
दंडवत अष्टांगहि कीन्हौ । धर्मदास आगे पग दीन्हौ ॥
पायर दीप ठाढ़ भै जब ही । अमृतकला देखत भै तब तब ही॥
पर धर्मदास हि सुरझाई । देखि रूप अब मति अधिकाई॥
कोटिन कला सूर्य औ चन्दा । हीरा रतन गिने को गन्दा ॥
जगमगज्योति अधिकतहाँराजे । चितवनदृष्टि डगत गुनराजे ॥
हग संपुट अंबुज सम आही । दरशहरशच्छबिहियहि अघाही॥
आनन्दरूप मूरछा आई । तब सुरजन तन कीन्ह उठाई ॥
सुचित चित्त होऊ धर्मदासा । आभारूप करि शब्द निवासा॥
उठिकर बाह निछावर करही । शीश नवाय चरण रज धरही ॥
दंड प्रणाम कीन्ह बहुभांती । सीप अघाइ पाइ जिमि स्वाती॥
तबहि पुरुष असआसन दीन्हौ । शब्द सहाय हमही तुम चीन्हौ॥
तब सुरजन जन बचन उचारा । सुकृत अंश कीन्ह दीदारा ॥
पुरुष दीन सिंहासन टारी । हंसहरम्मर बैठो झारी ॥
पुरुष तबहि यह वचन उचारा । केहिके अंग आहि दरबारा ॥
धर्मदास कैसे तुम आये । को वहियां जिनधरि पहुँचाये ॥
काहेके बल कालहि जीता । कौन शब्दसे राखब प्रीता ॥
तब सुकृत बिनती अनुसारी । साहब बचन प्रीति उर धारी ॥
ज्ञानस्थितिबोध
( १२५ )
ज्ञानी अंश शब्द मोहि दीन्ह। उनकी बाँह गौन हम कीन्ह। ॥
करता देत छेकि जब बाटा। शब्द बाँह श्रोता कह काटा ॥
कालहि जीति अंशलै आवा। उनकी बाँह दरस हम पावा ॥
सुरजन अंश वचन उच्चार। सुकृतघटमें कवि सम्हारा ॥
देखहुँ लोकहि दृष्टि पसारी। ज्ञानी अंश कहां अनुसारी ॥
कौन दीप कहवाँ अस्थाना। कौन रूप ज्ञानी कर जाना ॥
धर्मदास घट कीन्ह विचारा। पुरुष वचन दृष्टि उजियारा ॥
लोक दीप देखो सब ठावा। ज्ञानी अंश नजर नहिं आवा ॥
साखी—लोक दीप सब देखिया, अंश नजर नहिं आय।
पुरुष कबीर घट एकहै, दूजा नहीं लखाय ॥
चौपाई
धर्मदास दुबिधा बिलगाना। पुरुष कबीर एक पहिचाना ॥
रूप रेख सब एकहि देखा। दूजा भाव अन्य नहिं लेखा ॥
धर्मदास तब चकृत भयऊ। पुरुष कबीर एकही भयऊ ॥
कीन्ह बन्दगी शीस नवाई। क्षमा अपराध कीजिये साई ॥
तुम प्रभु आप अवसर नहिं कोई। बकसडु चूकि मोर कछु होई ॥
ब्रह्म अखंडित अन्तर्यामी। कृपासिंधु प्रभु पूरण स्वामी ॥
लज्जावान अविगति अविनाशी। लोक दीप सब कीन्ह प्रकाशी ॥
पुरुष वचन
धर्मदास तोहि दाय। कीन्हौ। अवगति रूपदरश हम दीन्हौ। ॥
ये दोह कला भिन्न नहिं जानो। पुरुष कबीर एक पहिचानो ॥
एक रूप हम हंस उबारा। एक रूप त्रैलोक मझारा ॥
तुम्हरे शिर जीवनको भार। भवसागरके तुम कटियारा ॥
यासे परखो दीन्ह बताई। यह रमती घट देवरि गाई ॥
जो तुमरे घटते नाहिं जाती। तो सब जीवन माँह समाती ॥
नं. ८ कबीरसागर - ५
( १३० )
नोधसागर
यह हुरमत मनमहँ जो धरही । फिर २ भवसागरमें परही ॥
पुरुष कबीर एक जिन जाना । हंस हमारा सोइ पहिचाना ॥
के काल निकट नहि आई । नाम कबीर कहो चितलाई ॥
साखी—अब तुम जाइब जगतमें, हंसन करो उबार ।
हंसराज तुम अंश मम, भुगवो सुखहि अपार ॥
प्रलयकालके अंतमें, जीव जन्तु सब तार ।
दरस परस सब मिलि करे, अस्थिर रूप अपार ॥
चौपाई
पुरुष रूपसे ज्योति निकारा । नाम कबीर देह तब धारा ॥
धर्मदास ढिग बैठे आई । जौन रूप धरि गये लेवाई ॥
चीन्हो सुकृत रूप हमारा । अब तुम घटमें भव उजियारा ॥
चलहु बेगि जिन लावहु बारा । जीवनाथ देव टकसारा ॥
चले सुकृत तबही शिरनाई । ज्ञानी लीन्ह संग लगाई ॥
निमिष एक नहि लागी बारा । पहुँचे सहज शून्य मझधारा ॥
धर्मदासकी काया जहँवाँ । पहुँचे ज्ञानी आये तहँवाँ ॥
चारी दूत देह ढिग आवा । पैठन केर उपाय लगावा ॥
घटमें पड़ि देह ले जाऊ । धर्मदास फिर कहँवाँ आऊ ॥
साहब शब्द बानसे मारा । दूतहि मारि हंस पैठारा ॥
धर्मदास कहा महँ जागा । रोम २ आनंद बहु पागा ॥
गुरु कबीर कह निज कर चीन्हों । तन मन धन न्योछावर कीन्हों ॥
बहुत अनन्द कीन्ह गृह माँहीं । चरण शरण मन लीन्ह सदाँहीं ॥
साखी—यह गुण ज्ञान स्थितहिके, कहै कबीर विचार ।
धर्मदास दीदार करि, आए जगत मँझार ॥
चौपाई
धर्मदास हियमें अति हवैं । गढ़द गिरा नैन जल ववैं ॥
ज्ञानस्थिति बोध
( १३१ )
मम हियतिमिर आहि अधियारा । महर पतंग कीन्ही उजियारा ॥
मन अहि तपत कबहुँ नहि धीर । वचन अंग शीतलमलयागीर ॥
तेहिपर सत त्रिय ताप बुझानी । अमी असन त्रियत्रिपतअघानी ॥
पायउ दरश कृतारथ आजू । दरसन देखेव हंस समाजू ॥
अब गुरु मोकहैं देव लखाई । पुहुप दीप कैसे निरमाई ॥
अंबुदीप कौन विधि भयऊ । धर्मराज कैसे निर्मयऊ ॥
सद्गुरु वचन
धर्मदास पूछी भलवानी । सो सब कथा कही बिलछानी ॥
पुरुष विदेही देह निमासा । श्वासा सारते पुहुप प्रकाशा ॥
सत्रह शंख पंखुरी कीन्हौ । ताहि मध्य वासा प्रभु लीन्हौ ॥
अंबुदीप तबही जो कीन्हौ । सहज पुत्र कह बैठक दीन्हौ ॥
सवा शंख पंखुरी राजै । जग मग शोभा तहां विराजै ॥
आठ पुत्र तहँसे उत्पानी । तिनसों आठों सिद्धि बखानी ॥
जोति सरूपी पाया आई । ज्योति रूपके काल बनाई ॥
उत्पत करै प्रलय संहारा । तउना उपजै काल अहारा ॥
सहज धर्मसों गुण परकासा । ज्योति सरूपी ज्योति निवासा ॥
धर्मरायको बल परकाशा । माया जाल जीव सब फाँसा ॥
आपुन रहियब सुनी मझारा । वहाँ बैठि सब कीन्ह पसारा ॥
पुहुप दीप आवन नहि पावा । जानै साहब नाहि रहावा ॥
धर्मराय माया उपजाई । ज्योति स्वरूप जीव अरुझाई ॥
साखी-पुरुष पार नाहीं लहेउ, अटके ज्योतिहि मूर्ति ।
ज्योति भई है प्रकृतितें, प्रकृति बनी है मूर्ति ॥
चौपाई
इह कारण वह दीप सम्हारा । धर्मनि पाव वही बैठारा ॥
पुहुप दीप जब सिरजन लीन्हौ । समसर पवन वास तहैं कीन्हौ ॥
( १३२ )
बोधसागर
ज्योति ओट यह बोलत बानी । सबको जानै पुरुष निसानी ॥
काल दुष्ट जीवन छलि राखा । ज्योतिहिओट वचनमुख भाखा॥
उत्पति प्रलय याहिसों भयऊ । भूल भुलाय सबनको दयऊ ॥
पुहुप दीपको सुमिरन करई । ज्योति स्वरूप नहिं सो परई॥
साखी--इह गुन ज्ञानस्थितिके, पुहुपदीप अनुसार ।
एहि दीप बासा करै, आवा गवन निवार ॥
चौपाई
पुहुप दीपमें समसर कीन्हौ । समसर पवन खास तहाँ लीन्हौ॥
अमर वासना येही आहे । इहँहि बैठि सब करी कथा है ॥
थाह न जानत मूढ़ गवँरा । लुब्ध रहेव जयमाल पसारा ॥
पुहुपदीपको सब दीप निवासा । जहाँ वह पारब्रह्मकर बासा ॥
येहि शब्द तुम लेव बिचारी । पुहुप दीप कीन्हौ बहु बारी ॥
पुहुपदीप दीपनमें सारा । जो बूझे सो उत्तरहि पारा ॥
साखी--येहि सुरति ले राखहु, पुहुप दीपके पास ।
सत्य पुरुष जहाँ आप है, अमृत सिंधु निवास ॥
चौपाई
तहँको हंस करहि पैठारा । जब मिलि है सद्वरु कइहारा॥
हंस जाय पुरुषहिं दरबारा । अविचलनामकोमरहि सद्धार॥
सत्य कमलपर बैठक दीन्हा । बैठे हंस अतिहिं सुख लीन्हा ॥
सुधा अहार अमर भै काया । आदि नाम अविचल मन भाया॥
कोटिन कोटि दंडवत लीन्हा । धनि सत्य सुकृतनामजो दीन्हा॥
पुरुष शब्दजिनि आपु बतावा । आवा गौन रहित घर पावा ॥
साखी--येहि गुण ज्ञान स्थितिके, पुहुप दीप निजु बास ।
कहे कबीर वह शब्द गुन, हंसा करहि विलास ॥
धर्मदास वचन चौपाई
धर्मदास तब सेवा ठानी । सुरति भेद पूछनको आनी ॥
ज्ञानसिग्धनिबोध
( १३३ )
सो सद्गुरु मोहि कहो बखानी । जासो आदि अन्त पहिचानी ॥
जौन सुरति साहब तुम साथी । सो मोहि कहिये मिटत उपाधी ॥
जेहि सुरति प्रथम जो आहे । वही सुरति मिलि सबको थाहे ॥
बिना सुरति नहिं गुरुको पाही । बिना सुरति नहिं लोके जाई ॥
सुरति होइ तब ज्ञान उचारे । सुरति होय तब ध्यान सम्हारै ॥
सुरतिहि पैठि पवन को गहे । बिना सुरति वह प्राणी डहे ॥
सुरति होइ तब अगम जानी । भला बुरा सबही पहिचानी ॥
बहिनभानजी सुरतिहिजानी । माता पुत्री सुरति बखानी ॥
मोह न नारि सुरति कहैं देखौ । धर्म पाप सब सुरति बिसेखौ ॥
साखी--जो कुछ है सो सुगति है, साहब दे बतलाय ।
सुरति भाव जब चीन्ह है, तब हंसा घर जाय ॥
सद्गुरु वचन
तब सद्गुरु अस वचन उचारा । धर्मदास पूछव मत साग ॥
बिना सुरति पुनि कुछ अनपाई। सुरति विहूँ नहिं आवहि जाई ॥
सो अब तुमसों कहां बुझाई । सात सुरति सब देव लखाई ॥
पुरुष सुरति आपहि उपराजा । विहँगसुरतिप्रथमहि किय साजा ॥
बीस आठ प्रकृति जो कीन्हौ । जो जनमें तस भुगने लीन्हा ॥
जैसे योग मनहिं रहाई । तैसे बुद्धि शरीरहि सोई ॥
प्रथम कहौ अब सुरति विचारी । पुरुष एक उत्पन किय नारी ॥
जेठी सुरति तबहि उच्चारी । चारहु लोक कीन्ह बिस्तारी ॥
विहँग सुरति ताही सो कहिए । ब्रह्म सुरति मूल वह लहिए ॥
निरति सुरति ये स्थूलहिछाजा । हरषत सुरति विदेही साजा ॥
बाढी सुरति नाद गुन गहे । धीर सुरति नाद गुण गहे ॥
साखी--सुरति पुरुष अंगहि बसी, फूट अंडके भाव ।
बीजमूल गुण प्रकट है, देखै ते सच पाव ॥
( १३४ )
बोधसागर
चौपाई
सुरति शब्द अब कहौं बखानी । धर्मदास लीजो पहिचानी ॥
सुरति शब्द भाखिब हम तुमसे। सुरति प्रसन्न होय तब हमसे ॥
सुरतिहि माहि रच्यो संसारा । सुरति करै तब उत्तरे पारा ॥
जेठौं अंश सुरति जो आही । पुरुष संग वह सदा रहाही ॥
बिहंग सुरति पुरुष जब कीन्हौं। रचना सपत सोप तब दीन्हौं ॥
अबही कहौं सुरती कर मूला । उपज्यो अग्र शब्दसो स्थूला ॥
जबही पुरुष कीन्ह है इच्छा । तब इह प्रकट भई सब शिक्षा ॥
सुरति शब्द पुरुषहि उपजाई । सुरति प्रसन्न लोभ रच आई ॥
सुरति निरति सुख देह अनन्दा। मेटत सुरति सकल दुख द्रंदा ॥
सुरति निरति जब एके होई । तब साहेब कह देखे सोई ॥
साखी—कहै कबीर वह सुरतिते, सब कछु भयो प्रकाश ।
शब्दहि सुरति बिहंग है, लीन्ह अग्रमो बास ॥
चौपाई
धर्मदास सुनियो चितलाई । घट भीतर लीजो निरताई ॥
सुरति रूप देखो निरधारा । मन बुद्धि चित्त पवनसे न्यारा ॥
पाँच तत्त्वकी रचना येही । इनते सुरति जो आहि विदेही ॥
ब्रह्म अंगसे प्रकटी आई । तोनि अंग गुण कला धराई ॥
सत्यरूपसे सुरति बखानौ । चेतन अंग निरति कहैं जानौ ॥
आनंद सदन शब्द पहिचाना । सत्य सुकृत दोइ नाम बखाना ॥
सुरति रूप चैतन्य समाई । चेतन रहित शब्द लौ लाई ॥
सुरति समुद्रहि मठी हुवारा । हंसा पैठि देखि निर्धारा ॥
साखी—कहै कबीरहि सुरति बल, अपने पुरुषहि देख ।
मन बुद्धि चित्त समेटि के, चेतनरूप विशेष ॥
अक्षय वृक्षकी सुरतिमें, हंसा लेहि बसेर ।
कहै कबीर लै निबहि है, जात न लागे बेर ॥
ज्ञानस्थितिबोध
( १३५ )
अबु दीपकी सुरतिपर, हंस होय असवार ।
कहै कबीर लै निबहिहौं, कोटि बसैं बटपार ॥
गृहदान रोके नहीं, सुरति हंस लै जाय ।
कहै कबीर यम हारियो, काल पैठि पछिताय ॥
इह गुण ज्ञान स्थितिहिके, गहे शब्द चितलाय ।
कहै कबीर यम हारिया, काल बैठि पछिताय ॥
धर्मदासवचन-चौपाई
धर्मदास बिनती अनुसारी । तुम साहब हम दास तुम्हारी ॥
गुरु शिष्यकी रहनी कैसी । सो समुझाय कहौ गुरु तैसी ॥
योग अयोग मोहि समुझावो । हे दयाल मम त्रिखा बुझावो ॥
सद्गुरु वचन
सद्गुरुवचनहि विहँसि उचारी । अगुण सगुण विच गुरु अचारी ॥
शिष्य पूछि गुरु भए उदासा । सो गुरु उठि आए धर्मदासा ॥
जिमि बालक रोवै बिछाई । मात पिता बहु बोध कराई ॥
येयाविधि गुरु शिष्य हैं मोई । जगमें अमृत पीवैं वोई ॥
शिष्य सीप गुरु स्वाती जानो । गुरुपारस शिष्य लोह समानो ॥
गुरु मलयागिरि शिष्य भुजंगा । गुरु पारस शीतल होय अंगा ॥
गुरु समुद्र है शिष्य तरंगा । गुरु दीपक है शिष्य पतंगा ॥
शिष्य चकोर गुरु शशि जानौ । गुरुरविकमल शिष्यविकशानौ ॥
इह सनेह शिष्य निहचै लहई । गुरुपद परस दर्श हिय गहई ॥
जब शिष्ययाविधिध्यानविशेषा । सो वह सीख गुरु समलेखा ॥
गुरुन गुरुनमों भेद विचारा । गुरु गुरु कहै सकल संसारा ॥
गुरु सोई जिन शब्द लखाया । आवा गौन रहित दिखलाया ॥
गुरुहि सजीवन शब्द लखाया । जाके बल हंसा घर आया ॥
वा गुरुसो कछु अन्तर नाही । गुरु औ शिष्यमताएक आही ॥
( १३६ )
बोधसागर
साखी—गुरु शिष्य एके भए, भिन्न न कबहुँ होय ।
दुर्मति दिलसो मारिकै, सुरति शब्द चित पोय ॥
धर्मदासबचन--चौपाई
धर्मदास तब बिनती कीन्हौ । चरण पकरिके विन्ती लीन्हौ ॥
ब्रह्मा विष्णु महेश्वर देवा । केहिविधि उपजे सो कहि भेवा ॥
चारि मुक्तिको भेद बतावौ । सुस्थिर ज्ञान मोहि समझावौ ॥
सत्गुरु बचन
सदगुरु बचन विहसि कर बोले । मुक्ति भेद कहुँ परदा खोले ॥
आदिहि पुरुष निरञ्जन कीन्हौ । माया आदि ताहि कह दीन्हौ ॥
तिहि संयोग भये त्रिय बारी । ब्रह्मा विष्णु महेश विचारी ॥
चार मुक्तिके वे हैं राजा । पँचइ मुक्ति भिन्न उपराजा ॥
प्रथम मुक्ति सालोक बताई । मारग वाम ताहि कर आई ॥
दूजी मुक्ति समीप कहावा । निर्वाण मार्ग हो ताकहँ पावा ॥
तीसरि मुक्ति स्वरूप बखानी । अघोर मार्गही ताकर जानी ॥
चौथी मुक्ति कहिये सायोजा । सर्मग मार्ग कलमा पढ़ रोजा ॥
चारों मुक्ति निरञ्जन लीन्हौ । तिनके बसहि जीव सबकीन्हौ ॥
अब सुन पांचइ मुक्ति विचारा । धर्मदास परखो मतसारा ॥
जीवनमुक्ति दरस तब लहये । मृतकदसा होय नामहि गहिये ॥
सत्य वचन मुखसो उच्चरई । नाम सार हृदये महाँ धरई ॥
नियम धर्म षट्कर्म अचारा । त्रिगुण फंदसों रहै निन्यारा ॥
सुरति निरति नामसों राखै । सद्गुरु बचन सत्यकर भाखै ॥
लोभ मोहसों रह निह न्यारा । करम क्रोधते आप उवारा ॥
दुख सुखकी कछु संशय नाही । पाप पुण्य नाही चित माहीं ॥
अरथ द्रव्य मिथ्याकर मानै । जीवन जन्म नाम पहिचानै ॥
दया क्षमा कुल टूट कहावा । विषमें हरषन चितमें लावा ॥
ज्ञानस्थितिबोध
( १३७ )
सो जिव उतरहि भवजल पारा । जो यह चाल चले निर्धारा ॥
अर्ध ऊर्धका करहि विचारा । सत्यनाम हृदये मर्हधारा ॥
उलटि कमल सुलटा जब करई। मनहि समेटि सुरति चित धरई॥
समसर पवन योगि कह तारै । पवन डोरि स्वासा निरुवारै ॥
सोहं तार घडहिमें देखे । स्वेत भँवर गहि शब्द विशेषे॥
भँवर गुफामहँ जगमग जोती । वा घर बरवै माणिक मोती ॥
निहकामी निरवानी जानी । निहरूपी निश्चितहि बखानी ॥
सारखी—आदि सुहंग बखानऊ, स्वर्ग पताल भरि ठौर ।
कहे कबीर धर्मदाससों, वही हंस शिरमौर ॥
चौपाई
सुरहि कमल याजीकर छोरा । सुरति करै तब देखि निहोरा ॥
ऐसी सुरति निरति मन राखै । सांचै दरश पुरुषके भाखै ॥
जबही दरश परश पुनि होवै । जन्म जन्मके कश्मल धोवै ॥
जीवन मुक्ति होइ पुनि तबही । संधिक नाम आव घट तबही ॥
कागरूप सब चाल मिटाई । गुरुप्रसाद हंस गति पाई ॥
निर्मल जीव हंसगति भयऊ । नाम संधि हृदयेमहँ लहेऊ ॥
वंश प्रताप साँचकर चीन्हा । नाम सार अमृतसर लीन्हौ ॥
जीवनमुक्ति देहमहँ पाई । हिम्मर रूप धरे सो आई ॥
जाती बरन पलटे सब अंगी । सद्वरु साँचे मिलि बहुरंगी ॥
सारखी—मलयागिरकी वास ज्यो, दीपक ज्योति पतंग ।
पारस छुइ कंचन भया, स्वाति सीपके संग ॥
चौपाई
स्वाती सीप नाम मिटि दोई । मुक्ता हल तेहि कह सब कोई॥
धर्मदास वचन
धर्मदास गुरु चरण न परई । शीश नवाय दण्डवत करई ॥
धन्यभाग्य दर्शन प्रभु दीन्हौ । अधम जीव पावन कर लीन्हौ॥
( १३८ )
बोधसागर
साहब दया दास पर कीजै । विदेह मुक्ति कर भेद जो दीजै॥
विदेह मुक्ति किम देह समाई । कौन भांति हंसा लखि पाई ॥
छुच्छी नदी रैन अति भारी । सलिलप्यासकिम मिटे दुखारी॥
पाँचो तत्त्व पाँच गति संग। त्रिगुणफंद जीव यह रंगा ॥
नऊ नाटीक कहे घटमाहीं । स्वासारूप जीव सँग ताहीं ॥
मनकी कला अनेक पसारा । काम क्रोध तृष्णा अधिकारा ॥
लोभ मोह चिन्ता अतिभारी । जड़ता गर्भ कुटिल विस्तारी ॥
इनके संग काग गति पाई । हंसवरण किमि होय गोसाँई ॥
यही अंग मन चितवन कीन्हौ । केहिविधि साहब तुम कह चीन्हौ॥
साखी-धर्मदास बिनती करै, साहब बंधन छोर ।
सब अंगमें भरि रहै, विदेह अंगको चोर ॥
सद्गुरु वचन
सद्गुरु वचन सुनो धर्मदासा । अगम भेद तोहि कहों प्रकाशा॥
विदेहमुक्ति तुम पूछिब आई । सो सब कथा कहो ससुझाई ॥
पुरुष विदेह कमलमों रहेऊ । सुरति विदेह शब्द जौ ठयऊ॥
लोक दीप सब सुरतिहिं कीन्हौ । तेहि पाछे मन उत्पन कीन्हौ ॥
विदेह मुक्तिकी डोरी चीन्हौ । शब्द सुरतिके हाथहिं दीन्हौ ॥
मनहिं समेटि सुरति पहिचानी । सुरति जाय तब शब्द समानी॥
शब्द सुरतिकर बांधो भेला । भवसागरसे दीन्हों हेला ॥
शब्द विदेह गुरूकर बासा । सुरतिस्वरूपी शिष्य निवासा॥
सुरति शब्दमें लीन्हो बासा । सुरतिस्वरूपी शिष्य निवासा॥
मायाजाल कृत्रिम सब लेखो । अग्रझलक नैननमें देखो ॥
कूप झांकि हो वचन विदेही । अग्नी जार उठावै सेही ॥
अग्र शब्द तबही लखि पावै । मृतक दिशा हो सुरति समावै॥
शीतल तपत स्वाद नहिं जानै । जन्म मरण शंका नहिं आने ॥
ज्ञानस्थितिबोध
( १३९ )
चलते फिरत वचन अस भाखा । चेत अचेत बोध नहीं राखा ॥
पुत्री पिता बंधु नहीं जानै । माता बहिन नाहिं पहिचानै ॥
श्रीहि अभूषण धरै न अंगा । तृषा क्षुधा नहीं स्वाद उमंगा ॥
ऊंच नीचकी नाहिं बिचारी । धर्म अधर्म दोऊसे न्यारी ॥
दुख सुख सब एकहि करिजानी । विदेह अंग ऐसे पहिचानी ॥
साखी-काया सीप सम जानिये, स्वातिशब्द पट आन ।
परख नेह संपुट बँधौं, मुक्ताहल उतपान ॥
चौपाई
धर्मदास इह भेद विदेहा । इह धन धन्य और सब खेहा ॥
जस चकोर चंदा कह ताकै । याविधि लिप्त नामके नाकै ॥
कमलचक्र है मनको रूपा । स्वप्नरूप भर्मित वह भूपा ॥
पाँच पचीस कठिन बिकारा । देह बीच इन राज पसारा ॥
सेमर फूल जस किरुवां आवा । देखि फूल बहु हरष बढ़ावा ॥
जुंगल गारत सुआ उड़ानो । रोम रोम मिथ्या कर जानो ॥
जाना नहीं विवेक बिचारा । ठोक कपार चलो झँखमारा ॥
मायारूप आहि इमि भाई ! जिमि फूल सेमर सुन्दरताई ॥
साखी-नारीरूप नर देखिके, कूकर सम लिपटाय ।
बिषय वासनाँ बँधि रहि, विदेहमुक्ति किमि पाव ॥
चौपाई
घरी घरी मन काम जगावै । ज्ञान भुलाय नाम विशरावै ॥
स्वप्न माँहि सोई छल करई । गुप्तवासना हृदये धरई ॥
कूद कूपके अगिन मँझारा । राखै कौन जीव निजु सारा ॥
सम्मुख आय बाघके कोई । भक्षण यतन करै वह सोई ॥
रक्षक शब्द जाहि तन गाजै । उलटो काल तहाँसों भाजै ॥
यही शब्द घट राखि समाई । माया ताहि खान नहीं पाई ॥
( १४० )
बोधसागर
सारवस्तु घटमों पहिचानौ । रोम रोम अस्थिर ठहरानौ ॥
काया सकल कालकी बारी । निसदिन ध्यान शब्द चितधारी ॥
देही सकल कालकी जानै । विदेह अंग आपहि पहिचानै ॥
देह विदेह नेह गुण जानै । आपा मेटि आदि गुण ठानै ॥
याविधि मनमों रहनी करई । आपा मेटि आदि गुण धरई ॥
सारखी—कहै कबीर वह आपहै, नहिं सुमरन नहिं जाप ।
धर्मदास लिखि लीजियो, अकह अगोचर छाप ॥
चौपाई
अकह अंश जब कहत रहावा । पांचतत्त्व गुणतीन समावा ॥
चलत हँसत बोलत बहुबानी । आपुन राजा रंक समानी ॥
माता पिता धरणि घर कीन्हे । आपुहि योग भोग सब चीन्हे ॥
गृह निकरे पुत्रहिं उपजावे । अपहि षट्कर्मन कह सावे ॥
भूख प्यास तृष्णा बहु सहिया । दुख सुखको संगीसोहिरहिया ॥
अर्थ द्रव्य सुमिरण सों राखै । मिथ्या सत्य आप सुख भाखै ॥
सुमिरण भजन आपही करई । अकला बै अकला संचरई ॥
भली बुरीको करत बिचारा । आपहि पाप पुण्य बिस्तारा ॥
कबहुक संत असंत कहावे । मनके भाव अनेक दिखावे ॥
आपही सेवा करै करावे । खीझे हँसे मनहि पछितावे ॥
सारखी—आप आपही रमि रहो, आत्मरूप परवान ।
यासों रहित अपार है, परमात्म सुस्थान ॥
चौपाई
तब साहब अस वचन उचारा । रहित मुक्ति सब इनसो न्यारा ॥
रहित भाव जो घटमें देखो । आवा गौन रहितई लेखो ॥
रहित पुरुष कह तबही पावे । अस्थिर ज्ञान चित्तमहैं लावे ॥
ज्ञानस्थितिबोध
( १४१ )
लिखे पढ़ै नहिं पावै भाई । बिन सतगुरुको देह लखाई ॥
प्रेमसुधारस तबही पावै । गुरु बहियां मिलि भेद लखावै ॥
चित आनंद अस्थिर तब जानै। सुमिरन भजन नाम पहिचानै ॥
मातु पिता सुत नारि पियारी । पुरजनजलसम रहनि विचारी ॥
नाम गोत्र तन शीतल कीन्हां । मिथ्या नारिपुत्र कुल चीन्हां ॥
भूखहि प्यास गई तन ताको । दुख औ सुखकी आसन जाको ॥
अर्थ द्रव्य मिथ्या करि जानी । बुधकी बुधी रहित कर मानी ॥
भली बुरीकी नहीं विवेका । जहाँ देखो तहाँ आनंद पेखा ॥
पाप पुण्यकी संशय नाहीं । संत कुसंत रहित जो आहीं ॥
मन बुधि चितते रहे भुलाई । पांच पचीस राखि अरुझाई ॥
बैठे उठे दूजा नहिं आनै । उत्तम मन अमृतरस सानै ॥
मन अरु वचन रहित करि जानै। खासा बीज नाम धुनि तानै ॥
नयन नासिका रहित अनन्दा । उदित भए जनु पूरण चन्दा ॥
हाथ पांव इन्द्री बस कीन्हे । सुर्य चन्द्र रहित घर चीन्हे ॥
जो देखे सो रहितै देखे । रहित अनन्द अवर नहिं पेखे ॥
सब गुण सहित रहन है ज्ञानी । रहित बिना है भेद दिवानी ॥
जब ही रहित आप वह कीन्हां । पुरुषहि समसर जो जिय चीन्हां ॥
रहित शब्दमों है मतवाला । ताकहँ देखि मूर्छि रहि काला ॥
सुरति सम्हार नाम दृढ़ लीजे । नाम सुधारस भरि भरि पीजे ॥
साखी-इहगुण ज्ञानस्थितिहिको, रहित मुक्तिकर भेद ।
कहे कबीर धर्मदाससों, नाम अमोलिक लेव ।
रूप मगन मन हो रहौ, अंग अंग सुखधाम ।
जिमि मिसि कागद पत्रही, होत सुअक्षर नाम ।
चौपाई
प्रेम पियाला कठिन रहाई । सत्यरूप धरि पीवे अघाई ॥
( १४२ )
बोधसागर
जिमि सती सरकों चढि जावै । पिब कारण वह जीव गँवावै ॥
संसार कहे वह बोलत भाई । जरबर गई प्रेम निर्वाही ॥
जीवतही जिय पीयके संग। माया भरम तजौ परसंगा ॥
जो कोइ होय हंस अंकुरी । नाम सनेह रहै परसंगा ॥
ज्यो पतंग दीपके कारन । जीवन आये अंग सब जारन ॥
अंग विदेह येह अनुसरहीं । असनबसनीकी सुधि नहिं करहीं ॥
कहत सुनत जिय तनमहँ डोलै । जीवन प्राण पवनसंग खेलै ॥
साखी-रहितहि सुक्ति कठिन है, कोइ न जानत भेद ।
शब्दहि सुरति समयके, हंसराज इह खेद ॥
जो जन पियके मद छकै, करै पियापिय पीव ।
पीव मिले हिलमिलि रहै, श्वास समानेउ जीव ॥
चौपाई
इशकभाव है कठिन अपारा । बिरले जीवहि करै सम्हारा ॥
धर्मदास कहि सुनो गुसाई । कीन्ह कृतारथ मोकहँ आई ॥
सुस्थिर ज्ञान मोहि समझावा । मनचञ्चल सुस्थिर ठहरावा ॥
कीन्ह कृतारथ मोकहँ आजू । बरनेव पुरुषहि हंस समाजू ॥
इह बरदान देहु मोहि स्वामी । कृपासिंधु गुरु अंतर्यामी ॥
चरणकमल उरसों नहिं टरही । पदपराग मनवासा धरही ॥
मन चञ्चल है कठिन कठोरा । कैसे प्रीति लगे गुरु वोरा ॥
सो समझाय देव मोहि भेदा । आदि अंत सब कीन्ह निषेदा ॥
साखी-तुम प्रभु दीनदयाल हौ, हम निज दास तुम्हार ।
भवसागरतै काठिके; दीजै पार उतार ॥
चौपाई
धर्मदास निश्चय मोहि चीन्हां । तुमरे घट हम बासा लीन्हां ॥
जहँ लगि जीव जगतमें आही । ते सब उबरहि तुमरे बांही ॥
ज्ञानस्थितिबोध
( १४३ )
वंश बयालिस जंग औतारा । तेजहु है जीवन काङ्गनहारा ॥
नाम विदेह अकह हम कीन्हौ । सोई वंश हाथ करदीन्हौ ॥
वचन हमार शब्द टकसारा । चूरामन तासे औतारा ॥
पुरुषहि अंश आहि निज सोई । शब्द अतीत नाम कहि सोई ॥
आदि नाम निरअक्षर जानौ । मुक्तामणि तिनको पहिचानौ ॥
उनसोंइ सकल गावे साँचा । सोई जीव कालसों बाँचा ॥
नहिं अक्षर नहिं आदिकि वानी । सोहंग तार पुरुषहि उतपानी ॥
इतनो भेद जानि है सोई । जो हंसा हि अंकुरी होई ॥
विच्छू मंत्र जानि नहिं पावा । सर्पकी बाँबी हाथ समावा ॥
मुक्त न होय परे यमखानी । नरक वास औँधे मुख आनी ॥
प्रेम प्रीति जाने नहिं कोई । तासों गए बिगोइ बिगोई ॥
अक्षर इशक आहि निज साँचा । जो चीन्हे सो परलै बाँचा ॥
साखी-ज्ञानस्थितिके येह गुन, इशक पुरुष निज वास ।
कहे कबीर धर्मदाससों, गाउ अक्षर विसवास ॥
चौपाई
सुर नर मुनि गण गंधर्व देवा । रहित पुरुष कर लखौ न भेवा ॥
धर्मदास मुनि प्रेम स्वभाऊ । शीस देइ तब प्रेम कहाऊ ॥
अब मैं कहौ मुक्तकर भाऊ । अक्षर मिलि है मुक्त प्रभाऊ ॥
जो देखे सो समझकर देखे । अक्षर बिना पुरुष नहिं पेखे ॥
भला बुरा सब समकर देखे । नर अरु नारि एककर लेखे ॥
पाप पुण्य शंका नहिं करई । दुख मुख दोऊ समकर धरई ॥
नर और नारि एकही घटमों । ज्यों कपास है सूतहि पटमों ॥
जल थल पवन अकास बखनौ । धर्म अधर्म एक करि जानौ ॥
पाँच पचीसौ बधन करहीं । त्रयदश पाँच ताहिंसों तरहीं ॥
रसना रसपति माया डारी । इच्छासंगम मन फटकारी ॥
( १४४ )
बोधसागर
नयन नासिका श्रवण तरंगा । जिह्वा इंद्रि करी एक संगा ॥
हाथ पाँव जीव सबमें वासा । पल २ छिन २ करहिं प्रकाशा ॥
काया माँहि शब्द पहिचानौ । मिथ्या जग स्वप्नहि सब जानौ ॥
लोभ मोह नाहिं चितधारा । निज अक्षरको करै सम्हारा ॥
अक्षर बहे शीसके माहीं । सो लखि आवै सतगुरु पाहीं ॥
उन मुनि करिकै अक्षर देखै । अक्षरमें निरअक्षर पेंखै ॥
निरअक्षर है वस्तु अपारा । जो जानै सो उतरे पारा ॥
अक्षर निर अक्षर दूजा नाहीं । दूजा करै विगुरुचन ताहीं ॥
नाम संधि हृदये महाँ राखै । अग्र विदेही अमृत चारै ॥
साखी—ज्ञानस्थितिके यह गुण, सबविधि करै सहाव ।
मनुवा अस्थिर होइ रहे, पुरुषहि दरस कराव ॥
कहे कबीर धर्मदाससों, अक्षर सुमिरहु सार ।
निरअक्षरसो प्राति करि, उतरहु भवजलपार ॥
चौपाई
धर्मदास तोहि भेद बताई । एहज्ञान काहू नहि पाई ॥
बहुतक ग्रंथ तुम्हैं समुझावा । ज्ञानस्थितसो गुप्त रहावा ॥
जब तुम कीन्हो खोज बहूता । तब एह भेद कहेब अजगूता ॥
जो यह ग्रंथ सुनै चित गहई । आवागौन तासु निर्बहई ॥
जो कोइ हंसहिहो अंकुरी । तासो भेद कहिब भरपूरी ॥
कपटरूप जाके तन होई । तासो वस्तु जो राखहु गोई ॥
येहि सिखावन पंथ चलावौ । भवसागर के जीव मुक्तावौ ॥
धर्मदास वचन
धर्मदास बिनती अनुसारी । तारण तरण जाब बलिहारी ॥
अब एक इच्छा घटमें आई । सद्वर भक्ति करौ चितलाई ॥
पान प्रमान हमहिं कह दीजे । दीन दयाल दया प्रभु कीजे ॥