भारतकोश
संग्रह पर लौटें

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

ज्ञानसागर

( ८७ )

सोरठा-पञ्चयें कमल प्रकाश, तिहिं पोडश दल अहै ॥ आतम जीव निवास, कइ सहस्र अजपा कह्यो ॥

चौपाई

छठवां कमल अहै दल तीनी । सरस्वती तहैं वासा कीनी ॥ दोसौ एक अजपा जहैं होई । बूझे भेद सो बिरला कोई ॥ भौर गुफा दो जल परवाना । सातों कमलकोआहि ठिकाना ॥ एक सहस्र अजपा परकाशा । तहां बोलता ब्रह्म को वासा ॥ तहां जोग साधे बहु जोगी । इंगलापिंगला सुखमनि भोगी ॥ तहां देख असंख्य जो फूला । ब्रह्म थाप काया में भूला ॥ सात कमल जाने सब कोई । अष्टम कमल विनुमुक्ति न होई ॥ विनु सतगुरु को भेद बतावै । नाम प्रताप जोग हि आवै ॥ काया तें जो बाहिर होई । भाग जीव पावै पुनि सोई ॥ छन्द-बहु भांति मुनि ऋषिजोग ठान्यो भयोरहित नहिं लेस हो ॥ काया थापी सुरति सों सब काग भये नहिं हंस हो ॥ पक्षी होई तब होइ महाबल नाम विना तो काग हो ॥ पक्षी त्यागी जो नाम साधे हंस होय बड़ भाग हो ॥ सोरठा-जोग तो आहि अपार, पक्षी भया पर नयन नहीं ॥ जोग नाम उजियार, नाम तेहि जो पावही ॥

चौपाई

पक्षी भाग नयन जिन पावै । ताके जहां तहां उड़ जावै ॥ देखे लोक जो गुरु बतावै । पक्षी नयन को यहै स्वभावै ॥ अथवा नाम नेक जो पावै । साधे तत्त्व जो लोक सिधावै ॥ नाम नयन पक्षी जो होई । तेहि समान दूसर नहिं कोई ॥ बाहिर को मैं कहब ठिकाना । सुरतिकमलसतगुरु निरवाना ॥

( ८८ )

ज्ञानसागर

छः सौ एक एकसौ बीसा । अजपा ऊपर देखे ईसा ॥ सातदलकमल देवऋषि माना । अष्ट कमल उनहूँ नहिं जाना ॥

छन्द-यह भांति अजपा तत्त्वऽराधे बस करे पाँचों भूत हो । रुनक झुनक बाजेआदि अक्षर दिमँकर बाचे तार हो ॥ षट् चक्र बांधे देह में तब जोग मुद्रा सार हो । प्रेम को बाजे पखावज प्रति दिना ततकार हो ॥

सोरठा-आतम जीव जो जाय, मुक्ति मुक्ता संग में ॥ तिन सँग ब्रह्म समाय, जिमि जा सरिता सागरेँ ॥

चौपाई

सरिता परै सिन्धु महाँ जबहीं । दुबिधा भाव न उपजै कबहीं ॥ सरिता संग रहे यक नीरा । भिन्न भाव कथ कहैं कबीरा ॥ दक्षिण नयन जब नेह निहारी । ते समरै बहुतै अधिकारी ॥ चन्दन निकट वृक्ष जो होई । भेद सुवास प्रबल है सोई ॥ संगति का फल ऐसा होई । यह तो भेद जाने जन कोई ॥ चन्दन नाम सुमेर है जोगा । इतनी प्रगट करै जो भोगा ॥ आतम जीव भेद पुनि होई । चन्दन बेल कहै सब कोई ॥ चन्दन कष्ट सब कोई जाना । यहै भेद विरले पहिचाना ॥

छन्द-जोग सम कछु भोग नाहीं देखु हृदय विचारि कै । पांच को बस करो आपने बसै पांच सम्हारि कै ॥ तीन गुण औ नाम चौथा बहुरि इनहि सम्हारिये । तब जीतिये निष्कंटका हो प्रति योग यहि विधि साधिये ॥

सोरठा-मेटें जम को दंड, मुक्ति होय तेहि अटल पुन ॥ विष को करे निकन्द, जोग होय जो नाम फल ॥

ज्ञानसागर

( ८९ )

चोपाई

संशय मिटे जोग के धारे । मैं अपने मन कीन्ह विचारे ॥ संशय को खंडन है जोगा । ता सम आहि न दूसर भोगा ॥ जीव को काज जाहितें होई । सोई जतन करो सब कोई ॥ अथवा देह जोग कोई न साथे । तो अब सहज जोग अवराधे ॥ ता मैं मिल जो यह निस रहई । दुविधा भाव कबहुँ नहिं करई ॥

साखी-पांच तत्त्व गुण तीन हैं, और प्रकृति पञ्चीस ॥

चौतीस ऊपर डेरा करई, नाम तत्त्व इक्कीस ॥

चोपाई

चौतीस ऊपर डेरा करई । नाम तत्त्व पलक नहिं टरई ॥ ये सब एक नखा मैं राखै । गुरु प्रसाद अमीरस चाखै ॥ सत गुरु दया सम्पुट उघराई । शून्य शहर में बैठे जाई ॥ देखे बोलता ब्रह्म तेहि ठाई । करे हर्ष धर्ष सी जाई ॥ ब्रह्म देखि त्रिकुटी मैं मुक्ता । जीव सीव होय इक जुगता ॥ जीव सीव एकै लख जाना । देह जीव तब देख पयाना ॥ शब्द प्रतीत देख सत लोका । गुरु की दया मिटे सब धोखा ॥ अगम अलख सो गुरु समझावै । सुरती निरति से दर्शन पावै ॥ गुरु की दया गम्य जो होई । निश्चय दर्शन पावै सोई ॥ एक बार जो दर्शन पावै । देखै बहुरि विलम्ब न लावै ॥ एकै सुरति निरति जो धारे । सुरति सनेही दीप निहारे ॥ यह निस तत्त्व मता जो धारे । गुरु प्रताप सों लोक सिधारे ॥ जाते सहज योग नहिं होई । तातैं आरति साथे लोई ॥ जो मनसा मारे नहिं कोई । तो पुन दासी कर निज सोई ॥ जो कोई काछे सन्त का भेखा । तासों कहिये जोग का लेखा ॥

साखी-गेही लीन्हें आरती, संत सोई सो भोग ॥

इडा पिंगला साधिकै, सुषमनि राधे जोग ॥

गैबी रहनी

( ९० )

ज्ञानसागर

चौपाई

जैसे ग्रेही के मन नेहा । तैसे साथे जोग सनेहा ॥ आसन हठ पर नारि न जावै । ग्रेही रहै न भेष बनावै ॥ देखी देखा भेष बनावै । राध जोग तो शोभा पावै ॥ भेषै धरे सूरता चाही । कादर भेष की हांसी आही ॥ जाते मन सूरमा नहिं होई । तातैं ग्रेही थाप्यो सोई ॥ ग्रेही मैं छल मता अपारा । तातैं सत्य भक्ति चित धारा ॥ करे जो सेवा सन्त की सोई । आरत भक्त महा फल होई ॥ धन्य सन्त जो आरति साजा । काल जंजाल तेहि घरतैं भाजा ॥ आरति समान भक्ति नहीं दूजा । सब ते भली सन्त की पूजा ॥ चरणामृत तासु को लेई । सुरति निरति चरणन चित देई ॥

साखी-सन्त आरती जोग मन, करहि गगनमें बास ॥

ग्रेही जोग न जानहीं, कर आरति परकाश ॥

चौपाई

विना जोग मैं होय उबारा । कै नेवर कै दीपक बारा ॥ तातैं सहज जोग मैं भाखा । शिरनि पान महातम राखा ॥ आरति तो नानाविधि साजै । पान मिष्टान्न भक्त भय भाजै ॥ जो कछु आहि जोगकर भाऊ । सब भाखौ आरति पर भाऊ ॥ वह देही यह ग्रेही व्यवहारै । काया संजम दै अनुसारै ॥ निशिदिन सुरति निरति बिचारा । तातैं मंदिर सेत सद्धार ॥ पांचौ तत्त्व तीन गुण साथै । तातैं मन बिच आरति राधै ॥ इंगला पिंगला सुषमनि वासा । मन बिच कर्म आरत परकाशा ॥ बांधै मूल नाम को साथै । दुबिधा मिटै एक अवराधै ॥ एक घरै कर प्रकृति पचीसा । सोई पुरुष आरति मैं दीसा ॥

साखी-उलट पवन जब आवै, त्रिकुटी भेट जो होय ॥

गुरु की दायो प्रकट हो, संपुट उघरै सोय ॥

आरतीका योगरूपसे वर्णन

ज्ञानसागर

( ११ )

चौपाई

उघरै संपुट गुरु की दाय़ा । नरिअर को देखै परभाया ॥ तत्त मूल नरिअर मो जाना । ज्ञानवंत भजि हो निर्वाना ॥ अनहद बाजै त्रिकुटी ताला । तातैं भक्ति जो होय रिशाला ॥ बिन करताल पखावज बाजे । अनहद धुन निस दिन तहैं गाजै ॥ अष्ट दल कमल फूल जो फूला । तातैं सुमिरन किये समतूला ॥ सुन अति जोग छतीसौ रागा । तातैं भांति भांति पद जागा ॥ जोग करत मैं देह बिसारै । या संसार मैं काज सम्झारै ॥ जोग समाधि छूटत नहिं देखा । आरत से मिटै कर्म विशेषा ॥ प्रतिदिन जो समाधि मन लावै । तातैं सदा आरति गावै ॥ जोग हीन तत्त नहिं लहई । तातैं पान पढोता चहई ॥ देखो मन बहुरंग अपारा । तातैं पुहुप सेत विस्तारा ॥ देह समाधि गंध बहु होई । साथै अग्र प्रबल है सोई ॥ चौका सेत हंस भल छाजै । सेत सिंहासन छत्र विराजै ॥

साखी-परचै मैं मन बांधै, करे जोग मन बास ॥ संतन आरत जोग मन, दीपक करे प्रकाश ॥

चौपाई

मन औ पवन आहिं दो धारा । तातैं पवन अनिल घूत जारा ॥ जोग जुगत बिन संग न होई । पालै पवन पाहन है सोई ॥ गगन बाव गरजै जो जाई । दीप शिखर द्वारै ठहराई ॥ ह्यावै जोग अमीरस चाखा । तातैं महाप्रसाद जो भाखा ॥ धन्य अंकुर जीव है सोई । परिचय जोग करै तन जोई ॥ जोग न होय आरती करई । सोई जीव भवसागर तरई ॥ मूल नाम और सब शाखा । पुहुप जोग महातम राखा ॥ जोगी दृष्टि भाव बहु करई । घट घटमें सुमिरन अनुसरई ॥

पुनोकी बड़ाई

( ९२ )

ज्ञानसागर

मूल नाम मुक्ति फल जोगा । ताते नरिअर मिष्ठानका भोगा ॥ देह बिसार जोग फल चाखा । मन वच कर्म नरिअर सत भाखा ॥ उज्ज्वल मंदिर सेत सम्हारा । तेहि रूप साज्यो पनवारा ॥ मुक्ति पदारथ अबेधा हीरा । तेहि पाये कोई गहिर गंभीरा ॥ चंदन काष्ठ सिंहासन चाही । सुमिरण नाम इकोतर आही ॥

साखी-उत्तम पान बडो ना, टूटा भंग न होय ॥ नरिअर चहिये निर्मल, महा मुक्ति फल होय ॥

चौपाई

और कछू बात संपत्ति आही । काचा जीव सुन बिचलेताही ॥ ताते सहज बताओ भाऊ । परचै जीवको परम स्वभाऊ ॥ अथवा जो इतना नहिं होई । सहज आरती थापो सोई ॥ सवा सेर आनो मिष्ठाना । सत्त सवासो आनो पाना ॥ प्रति पूनौ जो आरति करई । सोई जीव भवसागर तरई ॥

धर्मदास वचन

हे प्रभु पूनौ कह अधिकारा । दया करौ दुख भंजन हारा ॥

साहिब कबीर वचन

तुम कह दोन्ह यही दिन पाना । तासौँ पूनौ आरति ठाना ॥ अथवा सबई अर्थ नहि जाना । दोई आरति थाप प्रमाना ॥ छठे मास साजौ निज बीरा । ताते दोई आरती मत धीरा ॥

साखी-जोग आरती फल बड़ा, सत्त वचन परकाश ॥

दुविधा मेटो निश्चय, सत्तलोक होय वास ॥

चौपाई

सत्तभाव देखहु मति धीरां । लगन साखि देख निज बीरा ॥ बिना लगन करो मत शिक्षा । जोती खेती जो भल दिशा ॥ ऊसरू बीज डारही कोई । निःफल खेती किसान की होई ॥

गुरुवाके लक्षण

ज्ञानसागर

( १३ )

ऊसर बीज का ऐसा भाऊ । बोवहि बीज अवृथा जाऊ ॥ काचे जीवकहैं सुमिरत देई । परिचय जीव तात गहि लेई ॥ ता कहैं कैसी करहि जमराजा । देह धरै तो गुरु कहैं लाजा ॥ बिना लगन मगन भयो जानी । ऐसो अहे शिष्य सहिदानी ॥ पूरा जब शिष्य जो होई । गुरु देव भेद बतावै सोई ॥ अथवा जो गुरु अन्तर राख्यौ । गुरुमें धोख सन्त में भाखौ ॥ लीक करी औ पंथ बतावै । शोभा अधिक गुरु सो पावै ॥ जस बाना तस होवै करनी । ता गुरु सम औरन बरनी ॥ सदा लीन नाम जो भाखै । पांच आत्मा अनुरुचि राखै ॥ पांचमें करे पच्चीसों नारी । ते बस किये जोग अधिकारी ॥ मरत तजो जस कांचरी सांपा । तातें सब को मेटव दापा ॥ करो शिष्य जो यहि विधिकोई । पुरइन पान रहैं जनु सोई ॥ साखी-जो ऐसी बनि आवै, और बान है सार ॥ तातें ग्रेही थापो, कडिहारी संसार ॥

गुरुवाके लक्षण चौपाई

आप स्वारथी भेष बनावै । मन की दशा ताहि चित लावै ॥ तृष्णा जुक्त करे गुरुवाई । जम सो बाचै कौन उपाई ॥ निश्चय मानो शब्द हमारा । पर द्रोही कैसा कडिहारा ॥ आप अबूझ औरन समझावै । साखी रमैनी झगरो लावै ॥ जातें साधु सेवा नहिं आवै । तृष्णा कारण भेष बनावै ॥ सिंह न चाहै स्वान सियारा । पैरच बिना कैसे कडिहारा ॥ पर नारी औ मन्मथ कर्मा । यह तो भेद काल को मर्मा ॥ मारहि मनसा होइ सो होई । नातर नारि करे पुनि लोई ॥ ग्रेही माहि भक्ति को भेवा । नाम जपै औ साधू सेवा ॥ जोपै सहज भाव कडिहारा । शिष्य कियेका क्या अधिकारा ॥

( १४ )

ज्ञानसागर

ग्रेही माहि मुक्त फल बासा । सो सब वचन कहौं परकाशा ॥ नाम गहै राखै सत करमा । सब जीव तजै एक पुनि भरमा ॥ साखी-मद रु मांस को त्यागै, और न करै जीव घात ॥ अथवा जो कछु चूकि है, साधु सेव चित राख ॥

चौपाई

करे आरती मन विच करमा । पर घर तजै जान निज भरमा ॥ गृह में जो रहे उदासा । निश्चय सत् लोक में वासा ॥ जो कोई यहै अवज्ञा करई । कछु दिन रूपहीन अनुसरई ॥ जो को चूके साधु की सेवा । ताकर फल भारवों कछु भेवा ॥ जाई सो लोक नाम परतापा । तजै देह जिमि कांचरी सांपा ॥ देखै जाइ हंसन की पांती । ता मध्ये अस बैठ अजाती ॥ जातें चूक परैं सेवकाई । तातें शोभा हीन लजाई ॥ जो कोई याकी करे उछेदा । तातें मैं समझाऊं भेदा ॥ गृही तरे सो कौन विशेषा । गुरु को अचरज यौ बड़ देखा ॥ गुरु नहीं कोई यहि भवसागर । सतगुरु आप अजर मनि आगर ॥ जाप आहि जो नाम हमारा । तातें नाम धरा कडिहारा ॥ कडिहार लेवै जीवका भारा । तेहि न सूझ किमि उतरे पारा ॥ साखी-जैसे महिमा प्रकट है, तैसे सिन्धु का नीर ॥ सरिता सब कडिहार भये, सतगुरु सिन्धु कबीर ॥

चौपाई

सरिता माहि बारि जो होई । जीव जन्तु सुख पावै सोई ॥ सरिता लहै पुण्य परमारथ । सत कडिहारी जोग स्वारथ ॥ अथवा नीर अथाह न होई । सहज जोग भारवों पुनि सोई ॥ भदी में सोह सदा जो बारी । ऐसी उत्पति आहि हमारी ॥ प्यासा जाय नदी के पास । बिन पानी सो जाय पियासा ॥

ज्ञानसागर

( १५ )

प्यासा पानी नदी न पावै । जहैं पानी तहैं तृपा बुझावै ॥ इक जीव ग्रेही आप उवारा । वार नदी नहि सत कडिहारा ॥ बांधे अस्त्र करे शुग्माई । तिन के त्रास सौ दुर्जन डराई ॥ काछे रहै शूर का साजा । आयो समय कादर हो भाजा ॥ यहि विश्वास रहै जो कोई । स्वारथ पिंड परै जन सोई ॥ परै पिंड तब होवै हांसी । दै विश्वास जीव जो फांसी ॥ चतुरा पहिले करै उपाई । द्रव्य न मिले अनते नहि जाई ॥ धन मिले का यही उपाई । ग्रेही भाव रचो जो भाई ॥ क्षुधावंत जाके गृह आवै । भले बुगैके असन न जावै ॥ क्षुधावंत जो करही त्रासा । सन्तुष्ट होय तुरते हो पास ॥ औ जहां देखे सत् का वाना । ता कहैं बहुत करे सन्माना ॥ करै साधु सेवा मनराता । ता कहैं मैं बणों विख्याता ॥ जस जासूस द्रव्य नहि पावै । ताके नग्र सैध दै आवै ॥ चतुरा करै तामु सन्माना । जो पुन ताको करै वखना ॥ ताके पुर का मता बतावै । विवेककी महिमा द्रसावै ॥ ताके गेह दरब न चले जबही । ताकी महिमा दूत करे तबही ॥ बहुविधि महिमा करे जमदूता । तासौ कोई न करे अजगूता ॥ भाजै कादर नगर बधाई । ताके निकट जान नहि पाई ॥ धन्य सोई जो गेही करई । भल मन्दा को उदर भरई ॥ ता कहैं होई पुन्य परमारथ । नाम गहैं जन्मैं होय स्वारथ ॥ कडिहार सोइ जो शूरा होई । भाखों ताहि आपसम सोई ॥ सारखी-कडिहारा औ गृही को, कोई न जाने अन्त ॥ बिन परचै विसमाद है, हरषत परचै सन्त ॥

चौपाई

भाषो संयम सत के राऊ । अस गेही जो करै उपाऊ ॥ प्रात नेम जो करै अस्त्राना । प्रथम प्रफुल्लित कमल बिगसाना ॥

गुरुलक्षण

( १६ )

ज्ञानसागर

मद रु मांस कहैं त्यागै दोऊ । मिथ्या जीव घात पुनि सोऊ॥ सत आमन पर निद्रा त्यागी । भली बुरी सैं रहत बिरागी ॥ जाइ जहाँ बर जहैं हितकारी । ऊचट न परई अन्तर भारी ॥ शुध्दावन्त हित कारी होई । अति प्रिय जानसमोवहि सोई॥ यहि सम दूसर व्रत नहि जाना । ते जन पूनौ आरत ठाना ॥ कहौ जान दासा तन जोई । भागी जीव पावहि निजसोई॥ शिष्य होय जो तन मन वारे । गुरु आज्ञा कबहुँ नहि टारे ॥ गुरु दे शब्द मुक्ति जे होई । तेहि समान दूसर नहि कोई ॥

साखी-तन मन गुरु को दीजिये, मुक्ति पदार्थ जान ॥

गुरु की सेवा मुक्ति फल, यह गेही सहिदान ॥

गुरु लक्षण-चोपाई

गुरु सोई जो सब ते न्यारा । सो सब मैं भाखौ उपचारा ॥ जल तैं पुरइन का है मूला । पानी पत्र न लागै फूला ॥ जातैं देह धरा कडिहारा । तातैं चाहिये सब उपचारा ॥ जैसे मूल पुरइन को पानी । ऐसेहि दुनियाँ की सहिदानी ॥ काया धरे सब न कडिहारा । पुरइन भेद तैं उतरे पारा ॥ केतो शिष्य करे सनमाना । ते पानी पुरइन सम जाना ॥ इतना सुनै रहै लपटाई । तो वह जग समान है भाई ॥ पुरइन मुक्ति लोक में बासा । गुरुबिनपरहि कालकी फांसा ॥ काल बस जीव नहि तरई । तेहि विश्वास जन्म सोइ धरई ॥ कहा सन्त सबहि में भेदा । आप स्वारथी करहि उच्छेदा ॥

साखी-नहीं सहज सत गुरु वचन, करम कुटिलता ठान ॥

चले लोक गति नरकहुँ, सरिता सिंधु समान ॥

लोक गर्व गति राखे भाऊ । ताको देख मास पुनि खाऊ ॥ बहुत यत्न मैं भाव बताया । जो नहि बूझ अन्त पछिताया ॥

परलोकका मार्ग । सत्यलोक और हंसका वर्णन

ज्ञानसागर

( १७ )

धर्मदास बचन

हे स्वामी तुम सुनो सत भाऊ । जो पूछौं सो मोहि बताऊ ॥ जब तन तजे बोलता ब्रह्मा । किहि विधि जाइ कहो सो मर्मा ॥ सो मोहि स्वामी भेद बताऊ । धर्मदास टेके गहि पाऊ ॥

साहिब कबीर-बचन

आवै अंत होय नर जबही । अंतक आनै पठवै तबही ॥ जो जीव नाम तत्त्व मन लावै । ताको अंतक दूत नहिं पावै ॥ नौ द्वारा लग छेके जाई । दशवों द्वार अब देख बताई ॥ दसों द्वारन केते न्यारा । भौर गुफा में सो है तारा ॥ गुरु प्रताप पंथ तेहि जायौं । आदि पवन तेहि होत सहायी ॥ अरध उरध में पवन का वासा । मूल पवन प्रथम जो भाषा ॥ तेहि पर हंस होय असवारा । पचासी पवन का जो सिरदारा ॥ तिहिं चढ हंसा घरको जाई । मान सरोवर जा ठहराई ॥ अंतक दूत करै पछताई । सो सब भेद कहौं समझाई ॥ भक्षै यहि कारण यम राया । तबहि जीव तोहि समझाया ॥

साखी-काल फांस जेहि बांधै, जो नहिं राधै नाम ॥

तत्त्व हीन जीव व्याकुल, अंतक राखै ग्राम ॥

चौपाई

जो कछु पहिले भेद बताया । सो नहिं करै हतै यमराया ॥ छठै मास बीरा निज होई । सो नहिं होइ करो क्या कोई ॥ किंचित् तत्त्व भाव विधि धारै । गुरु प्रताप ते लोक सिधारै ॥ लोक निकट अंतक जो जाई । होय बलहीन चक्षु ही नाई ॥ तहैंवां आहि पंथ का फेरा । एक हमारे इक यमकेरा ॥ गुरु जो प्रथमहिं भेद बतावै । निज घर बैठ हंस सो आवै ॥ आवै शीश ऊपर दै पाऊ । जाय तहां सो कहौं प्रभाऊ ॥ यहि विधि हारै यम कौ दूता । पाँजी रोक धर्म अवधूता ॥

( ९८ )

ज्ञानसागर

प्रथमहि मान सरोवर जाई । जहवाँ कामिनि राज बनाई ॥ शोभा हीन हिरंमर वारा । तातें अटकै हंस पियारा ॥ हंस द्रौप में पहुँचे जाई । शोभा हीन सो बहुत लजाई ॥

सारखी-ते पुनि करै अधोन्ता, हंस सुजन जन पास ॥

कहा अपराध गुसाई, रूप न होय प्रकाश ॥

चोपाई

जब लग मूल दरश नहि पावै । शोभा तब लग नाहीं आवै ॥ जब लग शोक भगे नहि भाई । शोभा तब लग नाहीं आई ॥ एक हंस नहि शोक भराई । जा नहि जीव इकोतर जाई ॥ पावै सार जान निज बीरा । पलकहि शोक मरे पुन धीरा ॥ प्रथमहि हेत द्रौप पर जाई । शोभा अधिक तहाँ पुन पाई ॥ शोभा तस षोडश जस भाना । रवितैक्षीन हो सलिल समाना ॥ यहवां सूरज कांति प्रकाशा । वहवां जोती स्थिर निवासा ॥ ग्रासे सूरज शशि निम्पाई । वहां न सतावै काल अन्याई ॥ जस कमोदिनि सम्पुट प्रभाऊ । तैसा वहां मैं युक्ति बनाऊ ॥

सारखी-जस रविके परभावते, कमोदिनि सम्पुट लाग ॥

ऐसे रवि है निर्मल, पावत तनही जाग ॥

रविके उदय जस मिले चकेवा । हंसा हंस मिलै जस भेवा ॥ रेन तज तब देही त्यागा । पहुँचे लोक हंस मिल जागा ॥ मिल जस चकई चकवा कम्ही । हंसा हंस भाव तस धरही ॥ रविके उदय कमल जस फूला । हंस कमल सूरज रवि तूला ॥ रविके उदय तिभिर जस भागा । हर्षहि धर्म हंस मन जागा ॥ सरल गरल तें अन्तर जानी । धर्मराय अपने मन आनी ॥ काया शोभा उडुगन बांती । अस बूझै चिकुरन की कांती ॥ सो पुनि चिकुर आहि उजियारा । अस शोभा है हंस पियारा ॥ रजनी मुदित विवस जो भएऊ । ज्योति अटल तस हंसा गएऊ ॥

ज्ञानसागर

( ११ )

साखी-नयन दोई भल छाजै, मानौ शशिकी ज्योति ॥ शशि स्वभाव सो देखिये, ऐसी शोभा होती ॥

चोपाई

वरण तासु चक्षु शोभाई । फूटी चंद दो दिशा समाई ॥ नयन दामिनी होत झलहाला । पाछे नहि अनिल उजियाला ॥ बादल घन विजुली चमकाई । शोभा मानों तेज लजाई ॥ श्रवण सोहैं मनौ रवि के चाका । शोभा अधिक सु जाऊ थाका ॥ शोभा कण्ठ जैसे गिरि देवा । नाक कीन्ह सिष्ट जनु देवा ॥ शोभित कहे मिरनाल सरोजा । मुखजो कमल मिरनार कुरोजा ॥ है मिरनाल जनु सेतहि भाऊ । वदन प्रकाश शोभा बहु पाऊ ॥ विगसत कमल उदित जिमि तरणी । हंस पदम दीपक जस वरणी ॥ काया तासू कदली नेहा । रोम रोम मुक्ता को रेहा ॥

धर्मदास बचन

हे स्वामी मैं पूछौं भाऊ । जो पूछौं सो मोहि बताऊ ॥ अन बेधा जस देखियत हीरा । रोमत होवे हंस शरीरा ॥

माहिव कवीर बचन

साखी-जँघ पिंडुरी पग अँगुष्ठा, शोभा अधिक अपार ॥ शब्द रूप कारीगर, रवि शशि अनि जन ढार ॥

चोपाई

नख शोभा किमि करौं बखाना । जातैं हंसन कौ उतपाना ॥ नख न होय जैसे नख हीरा । अंगुरी बाद बरन चँद चीरा ॥ हथली सोहैं मनु पूरण चंदा । अँगुरिन पांति शोभा अरबिदा ॥ जस क्रांती शोभा बहु भांती । छाजै तहाँ नखन की पांती ॥ एही सबै है रूप पर भाऊ । सब उजियार पुरुष से आऊ ॥ सो सब शोभा भाव बताऊ । अगम उपेक्षा सबहि बताऊ ॥ जातैं भयो मानो अधिकारा । तातैं कहाँ रूप व्यवहारा ॥ जस अकाश महाँ ऊगहि सूर। हो उजियारा सो तिनहु पूरा ॥

( १०० )

ज्ञानसागर

पाइर द्रीय होई बड़ चोखा । परमारथ सो करत बड़ तोपा ॥ रविगण पुरुष लगन जो लोका । उड़ गये हंस मिटा सब धोखा ॥ दीप सार औ करी सम्हारी । तेज वरना चन्दा अधिकारी ॥

साखी-तीनौं पुर उजियार भयो, ऊगे भातु अकाश ॥ तैसे पुर की ज्योति में, हंस जो करे प्रकाश ॥

चोपाई

एक सूर्य का किंचित भाऊ । जाग उपेक्षा भाव बताऊ ॥ हंस सुजन हंस के राजा । पल पल हंस दंडवत छाजा ॥ एतिक हेत द्रीय उजियारा । बैठे सब जहाँ हंस पियारा ॥ ते पुन हंस दंडवत करही । क्षणक्षण माथ चरन तर धरही ॥

धर्मदास वचन

हे प्रभु हेत द्रीय सुख पाया । अग्र द्रीय ताहि करी दायो ॥

साहिब कबीर वचन

हंस सुसज्जन दंडवत् काहीं । पुरुष सौं फिर विनती अनुसरहीं ॥ जोग सन्तायन हंस लै आवहु । हेत द्रीय तिन को बैठावहु ॥ देखा चाहे चरण जो द्रीय । मंजुल मंगल करी समीपा ॥ आज्ञा पाय चले हैं हंसा । चरणा द्रीय पहुँचे निःशंसा ॥ अभय पक्ष हंस तहाँ आवहि । जोग संतायन भाव बतावहि ॥ जिहितें आहि आदि परवाना । पावै हंस तब करहि पयाना ॥ हंस राज तब मौन होय जाई । आवै हंस बहुत तेहि ठाई ॥

साखी-सहस्र अठासी पालंग, और सहस्र से तीन ॥

इतने हंस तब आवैं, यह अस्थिर कई चीन्ह ॥

पहिले बन्दौं गुरु चरण, सुरति संतायन योग ॥

बन्दौं हंस सुजन जन, तिन प्रसाद यह भोग ॥

चोपाई

धन्य पुरुष जिन परिमल छाया । हंसन सुख बहुते मन भाया ॥ तब हंसा बहुते दर्पाना । प्रथम हंस सुजन जन ज्ञाना ॥

ज्ञानसागर

( १०१ )

सुरति सनेही गुरु की दाय्या । हंस सुख बहुते मन भाया ॥ पुढुप द्रौप ताको विस्तारा । चार करी केता उजियारा ॥ प्रथमहि महिमा जोत विस्तारा । बैठे जिन कहैं जोत अपारा ॥ नौसै संख औ तेरा करोरी । एतिक महिमा द्रौपहि केरी ॥ ता भीतर करी कस देखा । महिमा फल जस रवि को रेखा ॥ अस जनि जानो रवि को भाऊ । उत्तपक्षा सब भाव बताऊ ॥ अम्बू करी बहुते उजियारा । धन्य पुरुष जिन शब्द उचारा ॥

सारखी-इतना भाव सुख उपजै, अम्बुकरी महाँ जाय ॥ नाम तत्त्व जो राघे, सो अस्थिर बैठे आय ॥

चौपाई

शुभ करी किम करौ प्रवाना । जातै कूर्म काल उत्पाना ॥ पक्षि पालना द्रौप बत्तीसा । तापर रूप सूर्य पञ्चीसा ॥ इक दिन मनो सूर्य की पांती । दुविधा भाव न रूप की कांती ॥ बरणों सूरज ज्योति अपारा । सोहै अटल रूप उजियारा ॥ औ सब शुभ करी को भाऊ । सब उजियार पुरुष से आऊ ॥ सिन्धु मध्य मेघ जस भरई । पुरुष शब्द ज्योति अनुसरई ॥ जस जीव रहै विषय की आशा । शब्द पुरुष सत करे निवासा ॥ प्रथम करी का मर्म न जाना । सो पुनि कैसे जाइ ठिकाना ॥ दूसर द्रौप मम महा सुरंगा । परम हंस बैठे तिन संगा ॥ तीसर द्रौप जोगा जहाँ रहई । ताहि द्रौप का मरम ना लहई ॥ आदि द्रौप पुरुष अस्थाना । तहाँ हिरंमर सुख कर थाना ॥

सारखी-पक्षि पालना द्रौप बड़, जामें ज्योति सुरंग ॥ नाम तत्त्व जो राघे, तो मेटे दुख द्रन्द ॥

चौपाई

मूल द्रौप मूल नाम उचारा । तातें अग्र बीरा निज सारा ॥ मूल अग्र बीरा निज पावै । इकोतरसौ जीव लोक सिधौवै ॥ शोक भरे काया नहि छाजा । शोभा हीन हंस होय लाजा ॥

( १०२ )

ज्ञानसागर

ते पुन करे बहुत पछितावा । सुजन हंस सौं बिन्ती लावा ॥ हंस सुजन जन कहैं अस बानी । शब्द हमार सुनो हो ज्ञानी ॥ जाते जीव काल बस रहई । पुरुष शब्द जो नाहीं गहई ॥ एक निमिष हंसा कर होई । पुरुष सेज तेहि होवै सोई ॥ सोई हंसा तन मन धरई । परम पुरुष सों परिचय करई ॥ परम द्रौप शोभा बहु होई । सब विस्तार कहाँ अब सोई ॥ तहाँ बिराजै जस पुन कमला । उडुगन सूर सनेह जनु जवला ॥ साखी-रत्न पदारथ थाका, पदम अनूप सुरंग ॥ उदित अवास बहुरि जितै, बिगसत सूर औ चंद ॥

चौपाई

जग मग ज्योति हंस शिर सोहै । ललित मौन रतनन जनु मोहै ॥ हंस के सीस छत्र जो धारा । पुरुष बानी तैं होय उजियारा ॥ मिटै तिमिर उदय जनु भाना । हिरामर भांति सब रूप प्रवाना ॥ सबै रूप जस भये चकेवा । हंसा हंस मिलै तस भेवा ॥ प्रथम हंस बैठे तह रहई । सो पुनि भक्ति परम पद करई ॥ बहु दिन रहै नक की खानी । धन्य गुरू हंसा कियो पयानी ॥ बैठे हंस सबै इक पांती । मेटो दुख जब भये अजाती ॥ संशय सबै पिछली गएऊ । रंक महानिधि मानो लहेऊ ॥ पुहुप द्रौप महाँ बैठे जाई । अमृत फलै जहाँ मिल पाई ॥ मंगल करी देख जब जाई । देखत शोभा बहुत लुभाई ॥ मेघ महल सो है ब्रह्मंडा । तहैं तस सँग रहै अरविन्दा ॥ जहैं लग मेघ बुन्द ढरकाई । तैसे कमल तहाँ बिगसाई ॥ साखी-पुरुष आप जस स्वाती, भैरे मेघ शब्द झनकार ॥ जल सब भरो जो पोखरी, सांभा भूमि निनार ॥

चौपाई

बुन्द निरंकार बरषावै । शून्य शिखर तब शोभा पावै ॥ करो स्वाति तहैं अमृत आही । प्रथम हंस देखै पुनि ताही ॥

ज्ञानसागर

( १०३ )

तिन पुनि ध्यान पुरुषसौ धारा । बिगस्यो पुहुप बाणी उच्चार । ॥ फल अमृत तब टूटे चारी । तिहितें फल अनेक विस्तारी ॥ जेते हंस दर्शन को आये । एक एक सब हंसन पाये ॥ आज्ञा मांगि हंस सब पाया । तबते भई अमर की काया ॥ आस प्यास सब हंस अघाना । निर्वृति सुधा सो शुधा बुझाना ॥ निवृति करी किम करव बखाना । उदित भये जनु अगनित भाना ॥ पालंग कोटि तीन कौ फेरा । निवृति करी इतनौ बिस्तेरा ॥

सारखी हंस आवै बहु व्याकुल, बहुत करै पछिताव ॥

दयावंत प्रभु महिमा, मृतक दरस दिखराव ॥

चोपाई

प्रगत रूप देख्या पुन कैसा । जल विलग गगन तामुर वि जैसा ॥ हंस सबै तब दर्शन पावा । भया हरष मिटा पछितावा ॥ हंस सबै तब भये अधीना । उडुगन माही शशिकौ चीन्हा ॥ अस जिन जाने उशशिका भाऊ । उत पक्षा सबई भाव बताऊ ॥ चातक निस दिन बारि निहारै । पावै जल तब तृपा विसारै ॥ पुरुष दर्श स्वाती कौ पानी । देखि रूप सो तृषा बुझानी ॥ पदमै संपुट लागा जबहीं । हंसा परम रूप भयो तबहीं ॥ निज अस्थाने हंस न तब जाहीं । हंस द्रौप तहवां ठहराहीं ॥ एकहि जात रूप सब माहीं । दुविधा भाव सो देखत नाहीं ॥ ता भीतर पुहुपन की सेजा । पंकज बीज आहि जनु लेजा ॥ अभै दीप ज्ञानी कौ वासा । तहँवां हंस करहिं सुख रासा ॥ पालंग तीन सोहै पुन द्रौपा । तहाँ पुरुष रहै अधर समीपा ॥ पुहुप द्रौप बिगसो पुनि गुंजा । गुंज मनौ शशि भानु अलुंजा ॥ भये पग स्थिर हंस सुखारी । पुहुप द्रौप सिरजै छत्रधारी ॥ हंसा तब पग अस्थिर आये । अमर चौर शोभा बहु पाये ॥ मान सरोवर बहु नौनाई । शोभा रूप राशि बहु ताई ॥

( १०४ )

ज्ञानसागर

सुरति सागर डोर समोई । मुक्ति द्वार तहाँ सौं गोई ॥ सो द्वारा जो गुरु बतावै । मानसरोवर तैं चलि आवै ॥ तहाँ हंस शीलका थाना । माणिक मध्य दीप निर्वाना ॥ चौरासी लक्ष द्वीप को फेरा । आवै हंस तहाँ कोन्हो डेरा ॥ तहाँ है पुनि कामिनि राजा । जगमगज्योति तहाँ पुनिछाजा ॥ बरणो शीश रूप भल आही । चार भानु जानौ तिहि पाही ॥

छन्द-शीश झलक बहु बरणा पांती रूप शोभा राशि हो ।

नौ लाख उडुगन पोह राखै भानु शसिको भासि हो ॥

जग मगा चौकुर अतिहि सोहै राजै जैसे पुर सही ।

अटल जेहि रूप बरनौ शशि बरणा काया कही ॥

सोरठा-शशि औ भानु निचौर, शोभा राखी शीश पर ॥

सेत वरणा अंजोर, मान सरोवर कामिनी ॥

चौपाई

भले नेत्र दूरसन कस देखा । मानहु अर्काहि सुठार विशेष्खा ॥

शब्द कारीगर रूप चम कारा । शशि अनेक ताही जनु ढारा ॥

श्रवण गातु शोभा अधिकाई । जैसे छीर कै काठ मलाई ॥

छीर भरो जनु शशि औ भाना । माखन रूप कामिनी ठाना ॥

मौज अनेक ताके तन चीरा । लागे रवि शशि अगनित हीरा ॥

चमके रूप ज्योति बहु भाऊ । सब उजियार पुरुषसे आऊ ॥

सारखी-शोभा बहुते कामिनी, नख शिख सुन्दर रूप ॥

बैठे माना भाव धरि, चन्द्रभानु बहु यूप ॥

चौपाई

सर शब्द पावै जो ताई । ताके बल हंसा घर जाई ॥

इतना रूप कामिनी अंगा । नहि उपजै तँ भाव अंनंगा ॥

बैठे रहई हंस सुख पावई । दृष्टि भाव परम मन भावई ॥

ऐसी भक्ति नहि महि माहीं । पटतर बने देत नहि ताहीं ॥

जस पाहन मंजुमें डारा । देखौ शोभा अगम अपारा ॥

भविष्यत् कथा । चक्रवर्त्तीका वर्णन

ज्ञानसागर

( १०५ )

महल पंच भूत तहाँ नाहीं । हँसा बैठे सुख करे ताहीं ॥ अग्र रुचिर छत्र सिर छाजा । हँसा लइत बहुत सुख साजा ॥ जाय दिव्य तहाँ कर्गहि निवासा । विमल अंग शोभा बहु पासा ॥ मिटै अम तव परिचय पाई । जहाँ रहै तहवाँ ठकुराई ॥

सारखी-करहीं हंस सुख अस्थिर, अम्बू करी अस्थान ॥

देखौ द्रौप सो पावन, कमल करी निर्वाण ॥

चौपाई

धन्य जीव पुरुष शब्द उचारा । जातै शोभा अगम अपारा ॥

धर्मदास वचन

हे प्रभु सुन्यो हंस कर भेऊ । जो कछु प्रछौँ सो कहि देऊ ॥ जो कछु होय आगे व्यवहारा । आगे होय सो कहौ विचारा ॥

साहेब कबीर वचन

सुनु धर्मदास मैं कहौ बुझाई । आगे जस करि है अन्याई ॥ वंश व्यालीस अचल तुम्हारा । नाद बहुत है विंद विचारा ॥ तेही पाछे चरित अस होई । कहौँ प्रगट नहिं राखौँ गोई ॥ अग्नि कौन अचिन्तपुर गाऊँ । तहाँ कौ वरणन तुमहि सुनाऊँ ॥ अमृत नयन विकट है काया । नाम चक्ररथी काल स्वभाया ॥ मानै जीव सो कहो विचारा । जस रविकोट है मृत्यु है सारा ॥ ताहि नय की राज कुवारी । सोभा चहै सहित जनु नारी ॥ ताकौ भेद मैं कहौँ बुझाई । घर कुम्हार के जन्मे आई ॥ जनमत तात जननी कहैं खाई । दृष्टि परत हतन होइ जाई ॥ जस पावक महैं तुनै समाई । वहिनी खाय जो देखन आई ॥ अग्नि समान चक्ररथी भाई । तृण समान मलेछ अधिकाई ॥ बत्तिस अंगुल तासु शरीर। कहौ अगम अस दास कबीरा ॥ श्रवण एक नौ अंगुल ताही । डेढ नाक दो जिभ्या जाही ॥ यही स्वरूप विश्व कहैं ढावै । तेहि अन्तर रानी चलि आवै ॥ रानी दृष्टि परे तेहि पाहीं । भाजे गज केहरि की छाहीं ॥

( १०६ )

ज्ञानसागर

तैसई भाजै अंतक दूता । वंश तुम्हार थकै अजगूता ॥ मिटहि पंथ धर्मदास तुम्हारा । काल चरित्रै करै अपारा ॥

धर्मदास वचन

हे सतगुरु सो पुनि बतावहु । चक्ररथी को भाव बुझावहु ॥ जब दिखराय काल कौ भाऊ । धर्मदास मन त्रास जनाऊ ॥ साखी-बहुत त्रास जब कीन्है, भये व्याकुल मति भंग ॥ चक्ररथी को भाव बतायो, कह्यो वचन परसंग ॥

साहित कबीर वचन-चोपाई

अबही भाव दूर है ताही । जनि डरो त्रास वज्र जिव चाही ॥ हदूता जान करौ गुरुवाई । जातैं जीव लोक कहैं जाई ॥ जीवको बन्ध छुड़ावहु यम ते । हंस मुक्तावहु नाम जतन ते ॥ साखी-नाम जतन जो करै, ताकर होइ न हानि ॥

ज्ञान सागर सुख आगर, कहे कबीर बखानि ॥

सत्य विचार-चोपाई

ज्ञान सागर ग्रन्थ को भाऊ । समझि बूझि के पारख लाऊ ॥ अनन्त प्रकार के शब्द पसारा । विनु पारख नहीं होय उबारा ॥ शब्द परख की युगती आही । गुरु सुख कहा रमैनी माही ॥ रमैनी सताईस तेहिको जानू । बूझि विचारके हिरदय आनू ॥ पारख करनकी युक्ति जब जानो । सांच झूठ की परीक्षा आनो ॥ काल दयालको स्वरूप पिछनौ । काल सन्धि झाई मन जानो ॥ सार शब्द का पाओ लेखो । उभय आनंद तबहीं तुम देखो ॥ करु पारख तब बन्धन छूटै । विनु पारख जमै धरि कूटै ॥ इति श्रीज्ञानसागर समाप्त ॥