कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पञ्चसुत्रा
( २०३ )
नौ औतार देहधर आवा । सो अचितके अंश कहावा ॥
जहाँलग अंश सकल पुन देखा । तहाँलग मायारूप विशेषा ॥
आगे अक्ष लोक है भाई । तहाँ गये फिर बहुरि न आई ॥
साखी-इहाँलग सरगुण रूप है, सो हम दीन्ह लखाय ।
जग नहि जानत तासको, निरगुणके कोधौँ आह ॥
सुक्ति वचन--चौपाई
हो समर्थ तुम अगम अपारा । तुम हो निरगुणके औतारा ॥
अब आगेको भेद बताई । लोक पुर्ष सब वर्ण सुनाई ॥
जहवाँ हंस जाव ठहराई । बहुर नहीं प्रलैतर आई ॥
ताकर भेद कहो समुझाई । अगम निगम सब वर्ण सुनाई ॥
साखी-सतगुरु भाषो आदिते, लोकन को पर्वान ।
केता अन्तर ताहिको, पुर्ष भेद निरवान ॥
योगजीत वचन--चौपाई
हेसुक्ति मैं कहां बखानी । वणौ अगम निगमकी बानी ॥
अचितलोकमें दीन्ह बताई । लोकालोक सब वर्ण सुनाई ॥
अब भाषों निरगुणको लेखा । योजन संख्या लोक विशेषा ॥
अचितके आगे लोक बखानो । तीनअंशख योजन पहिचानो ॥
सोहंगलोक तहाँ है भाई । आठ अंश तिनते उपजाई ॥
सोहंग पुरुष है अगम अपारा । जगर मगर जहाँ हैउजियारा ॥
सोहंग पुर्षके आगे जाना । मूल नाम तहाँ पुर्ष बखाना ॥
पांच असंख योजन प्रमाना । तहवाँ मूलनाम बंधाना ॥
मूलनाम तहं आमन कीन्हा । आदि पुर्षके अंश जो चीन्हा ॥
मूलपुर्ष है अगम निसानी । तास भेद मैं कहां बखानी ॥
मूलपुर्ष ते आगे जाना । अंकुर नाम तहाँ पुर्ष बखाना ॥
तीन असंख आगे है भाई । अंकुरनाम तहाँ पुरुष रहाई ॥
( २०४ )
बोधसागर
ताको उग्रलोक है भाई । तहां अंकूर उदित रहाई ॥
अंकूरलोकते आगे जाना । इक्ष नाम तहां पुर्ष बखाना ॥
चार असंख योजन प्रमानी । इक्ष्या पुर्ष तहां रजधानी ॥
सोई पुर्ष कर्ता होयं आवा । आदपुर्षके अंश कहावा ॥
प्रथम पुर्षकी इक्ष्या आई । ताते इक्ष्या नाम कहाई ॥
ताहि पुर्षको कहां ठिकाना । है सुकित तुम सत्तही माना ॥
इक्ष्या आगे लोक बखानो । सोतो अंश पुर्षको जानो ॥
नौ नील एक संख बखाना । बानी नाम पुर्ष स्थाना ॥
पुर्ष प्रथम बानी उच्चार । ताते नाम सर्व आकारा ॥
ताहि पुर्षको भेद बताई । एतो आद पुर्ष हैं भाई ॥
बानी नामते आगे जाना । सहजनाम तहां पुर्ष बखाना ॥
दशलाख एकशंख बखाना । सहज पुर्षको तहां अस्थाना ॥
तहवां सहज पुर्ष है भाई । आदिपुर्षके अंश कहाई ॥
सातपुर्ष इहांलग जाना । निरंजन अक्षर नीचे थाना ॥
अचितसौ अक्षर उपजे भाई । निरंजन अंश अक्षरते आई ॥
साखी-निरंजन और सहजलों, नौ पुर्ष प्रमान ।
आदिपुर्ष आगे कहां, जितने सब उत्पान ॥
सहज अंशलग जैतिक भाषा । सो रचना परलयतर राषा ॥
इहांलग प्रलैको प्रमाना । आगे अक्षैलोक अस्थाना ॥
सहज पुर्षते आगे जाई । आदिपुर्षको लोक दिखाई ॥
सहजते एक असंख प्रवाना । तहवां आदिपुर्ष निरबाना ॥
तहँवा प्रलैकालकी छाया । नहीं तहां कछु मोह और माया ॥
तहां न तीनों गुनका भेषा । ब्रह्मा विष्णु तहां न महेशा ॥
नहीं तहां जोत निरंजन राई । अक्षर अचित तहां नहि जाई ॥
तहां नहीं शिवशक्ती औतारा । नहीं तहां अक्षर ओकारा ॥
पञ्चमुद्रा
( २०५ )
ब्रह्मजीव नहीं तत्त्वकी छाया । नहिं तहैं दशइंद्री निरमाया ॥
काम क्रोध मद लोभ न कोई । तहवां हर्ष सोग नहिं दोई ॥
नादबिंदको तहां न पानी । नहीं तहैं सृष्टि चौरासी जानी ॥
चंद सूर तारागण नाही । नहीं तहैं दिवस रैनकी छाहीं ॥
ज्ञान ध्यानको तहां न लेषा । पाप पुण्य तहवां नहीं देषा ॥
डार मूल तहां वृक्ष न छाया । जीव सीव तहांकालन काया ॥
पवन न पानी पुरुष न नारी । हृद अनहृद तहां नहीं विचारी ॥
यंत्र मंत्र तहां दरद न धोखा । नर्क स्वर्ग संशय नहिं शोका ॥
श्वेत पीत सबज नहीं लाला । मोर सोर नहीं वृद्ध ना बाला ॥
पिंड ब्रह्मांडको तहां न लेखा । लोक अलोक तहां नहीं देखा ॥
मन औ वृद्ध पवन नहीं जाना । रचना बाहिरसो अस्थाना ॥
आदि पुरुषको है तहां थाना । यह चरित्र एकौ नहीं जाना ॥
हे सुकृत मैं तुम्है लखावा । निरगुणरूप वर्ण दर्शावा ॥
सुकृत वचन
हो सतगुरु तुम आगम भाषा । वर्णैउ पेड़ पत्र अरु शाखा ॥
अब तुम कहो पुरुषको रूप । कैसी कला हे कौन स्वरूपा ॥
लोक प्रकाशको भेद बतावो । लोक प्रमान मोहि समुझावो ॥
यामैं कछु न राखो गोई । है समर्थ अब भाषो सोई ॥
सार्वी—आदि पुरुषके रूपको, कहो भेद समुझाय ।
लोक प्रमान मरजाद सब सो मोहि देहु बताय ॥
योगजीत वचन—चौपाई
प्रथम पुरुषको रूप बखानो । सो तुम रूप हृदयमें आनो ॥
पुर्षअंग छबि वर्ण सुनाई । गुप्त भेद मैं तोहि लखाई ॥
पुरुष शोभा अगम अपारा । ताको को अब बरणे पारा ॥
कोट अनन्त योजन लौ काया । कहाँ लग कहों तासुकी छाया ॥
( २०६ )
बोधसागर
कछु संक्षेप मैं देऊँ बताईं । कहाँ कहीं कछु वर्णि न जाईं ॥
कोटि कल्प युगजाय सिराईं । मुख अनन्तसो वर्णि न जाईं ॥
ये कछु सूक्ष्म रूप लखाऊँ । कछु कछु शोभा वर्णि सुनाऊँ ॥
अब मस्तकको बणों भेषा । मानों अनंत भानु शशिलेखा ॥
जगर मगर मस्तक उजियारा । वर्णत बने न रूप अपारा ॥
अब नेत्रनको कहीं प्रमाना । मानो अनन्त भान शशि जाना ॥
जिमि कोटिन दामिन लपटानी । जोत अनंतनकी जिमि खानी ॥
वर्णत बने न ताको रंगा । कहाँलग कहीं तास प्रसंगा ॥
नासारूप कहीं प्रचंडा । मानो अन्न अनन्त ब्रह्मंडा ॥
पोहप बास तहांति प्रकटाईं । ब्राण अनंत योजन लग जाईं ॥
श्रवणरूप मैं कहीं बखानी । अनंत सिंध मानो समानी ॥
ता मह कमल अनन्तन फूला । साखा पत्र डार नहीं मूला ॥
ताको शोभा वर्णि न जाईं । कमल रूप तहां अधिक सुहाईं ॥
अब मुख शोभा कहीं बखानी । पिंड ब्रह्मांड तेहिमाहिसमानी ॥
नौ शून्य जहां लग बासा । सो मुख भीतर कीन्ह निवासा ॥
लोक अनंत देखिये ताही । सर्वाकार रूप है जाही ॥
पुर्ररूपका बणों भाईं । वर्णत बने न होय दिठाईं ॥
पुरुष शोभा अगम अपारा । मुख अनंत नहीं पावे पारा ॥
चिकुर शोभा कहीं बुझाईं । कोटिन रवि शशि रोम लजाईं ॥
कोटिन चंद सूर प्रकाशा । एक एक रोम अनन्तन भासा ॥
पुरुष अंगका करौ बखाना । रचना कोट तासुमों जाना ॥
श्वेत अकार पुरुषको अंगा । फटकबर्ण देहीको रंगा ॥
शब्द स्वरूप पुरुष है भाईं । वणों कहा वर्ण नहीं जाईं ॥
जहां लग जीव बुन्द है भाईं । ताकर भेद कहीं समुझाईं ॥
जीव अनन्त बुन्द सम जानो । अमी सिन्धु पुरुष पहिचानो ॥
पञ्चसुत्रा
( २०७ )
यह प्रमान पुर्षको जाना । सो अब तनमों कहों बखाना ॥
सूक्षिम रूप गगनमों वासा । ताहि रूपको कहों प्रकासा ॥
तनभोरूप जो सूक्षिम जानो । सोई रूप बाहिर पहिचानो ॥
जो भीतर सो बाहिर कहिये । एकप्रमाण रूपसो लहिये ॥
साखी-बारूके दशअंश कर, ताकर बिस्वा बीश ।
ताहूते सूक्षिम कहो, इम प्रकटो जगदीश ॥
लोक समानो पुर्षमो, पुर्षहि लोक समान ।
पुर्ष निरंतर लोक है, लोक पुर्षमो जान ॥
सुक्ति वचन-चौपाई
हो समर्थ मैं तुव बलिहारी । सर्व भेद तुम कही विचारी ॥
अब प्रभु कहो ध्यानको लेखा । जेहिते रूपहि पुर्षको देखा ॥
ताको नाम मंत्र उपदेसा । सो सत्गुरु अब कहो सँदेसा ॥
सोई मंत्र गुरु देहु बताई । जाके बल हँसा घर जाई ॥
करनी योगकी रहनी आशा । हँसा करे लोकमों वासा ॥
सोई नाम गुरु देहु बताई । मेरो हंस लेहु मुक्ताई ॥
और रहनी हँसनकी भाखो । मोसों गोय कछू जनि राखो ॥
कौन नेहते हँस कहाई । कौन नेहते लोक समाई ॥
योगजीत वचन
सुक्ति सुनो सत्य मम बानी । जैसी रहन हंस पहिचानी ॥
तास रहन अब वर्ण सुनाऊँ । नेह प्रेमकी उक्त लखाऊँ ॥
जैसे सीप स्वात करे नेहा । लागी प्रीत भूल निज देहा ॥
जैसे त्रिया पुर्षको चाहै । या विधि संत ध्यान औगाहै ॥
जैसे चात्रिक बुंद पुकारा । सोई लगन संत अधिकारा ॥
जैसे बासको भँवर लोभाई । योजन एक तहां उड़ जाई ॥
जैसे चंद चकोर हुलासा । ऐसे संत पुर्षको आसा ॥
( २०८ )
त्रोधसागर
जैसे लोहा चुंबक लग जाई । तैसे संत ध्यान लपटाई ॥
जैसे कनिका कपूरको धावै । ऐसे प्रीत संत लवलवावै ॥
जैसे पतंग दीपकको धावै । ऐसे संत ध्यान लपटावै ॥
जैसे नेह बारि औ मीना । ऐसे संत नाम लवलौना ॥
जैसे बाल बहिन महतारी । ऐसे लगन तहां संत विचारी ॥
ऐसे प्रीत करे जो कोई । सत्यपुर्णको पावै सोई ॥
ऐसे प्रीत गगन मन लावै । गुरुप्रतापते दर्शन पावै ॥
और रहन मैं देऊँ बताई । जाते बेग पुर्ण दर्शाई ॥
आपामेट आप दर्शाई । प्रेमसिंधुमें जाइ समाई ॥
बिरहरूप करुणा अधिकारी । लागी ज्वाल निरन्तर भारी ॥
जगसों नेह झूठ करजाना । मनसो सब जग मिथ्या माना ॥
साखी-मनसों त्यागे जत्तको, जान विषयकी खान ।
सुकित अब मैं भाषेऊँ, राजस योग प्रमान ॥
कायासों कारज करे, सकल काजकी रीत ।
कर्म भय सब मेटके, सत्त नामसों प्रीत ॥
अब सुन ब्रह्म ज्ञानकी वानी । ताकर रीति लेहु पहिचानी ॥
एके ब्रह्म सकल घट देखा । ऊँच नीच काहु नहिं पेखा ॥
शत्रु मित्र एक कर जानै । पाप पुण्यको भेद न आनै ॥
करै कर्म पुरुष परिवारे । अपनो करतब मन नहिं धारे ॥
सब कछु करे पुर्ण रे भाई । अपनो शीस ना भार चढाई ॥
सुख औ दुःख एककर जाने । इनको भाव मिथ्यापहिचाने ॥
झूठ वचन नहिं जीव सतावै । दया भाव सबही सो लावै ॥
इंद्रीस्वाद स्वप्न कर जाने । रूप कुरूप नाम मनो आनै ॥
वाद विवाद न जाने प्राणी । हार जीत एक समय पहिचानी ॥
उत्तम मध्यम मर्म न जाने । कर्तारूप सकल पहिचानै ॥
पञ्चसुन्दरी
( २०५ )
जात वर्ण नाहीं कछु मानै । चार अंग एक दृष्टि समानै ॥
जहां लग दृष्टिपरे जो कोई । इच्छा पुर्ष जानिये सोई ॥
सोवत जागत लखे अकारा । तहांलग कर्तारूप निहाग ॥
वारखान धरती असमाना । सो सब कर्ता माहि समाना ॥
जलथल ससदीप नौखण्डा । लोक अलोक सकल ब्रह्मण्डा ॥
गुप्तप्रकट जहांलग आकारा । सो सब कर्ता बीच निहारा ॥
भिन्नभाव कछु दृष्टि न आवै । सोई ब्रह्म ज्ञान कहलावै ॥
साखी-कर्तारूप विचारिये, जहांलग सकल अकार ।
इच्छा द्वैत विनास होय, रहो एक करतार ॥
प्रथमहि अविगत ब्रह्म है, तिनते ब्रह्म अनेक ।
सकल बुंद सिंधुहि मिलै, बहुर एकको एक ॥
द्वैत रूपको ध्यानमो, कारज लहे न कोय ।
आदि पुर्ष चीन्हे बिना, मुक्त कौन विध होय ॥
सुकित सुनौ सुजान, अक्षे नाम चीन्हे बिना ।
यमघर करे पयान, युगनयुगन भर्मत फिरे ॥
तैतिस कोट बखाना, सकल देव अब भाषिया ।
तिनमों तीन प्रमान, जीव सकल विस्तार है ॥
युगप्रति तन धरधर मरे, मायाको व्यवहार ।
अंतकाल सबको भषे, इनते पुर्ष निनार ॥
आदि पुर्ष बैठे जहां, अविगतरूप अनाद ।
रचनाते बाहिर रहै, तिनको भेद अगाध ॥
महाविष्णु गोलोकके, और अर्चित बखान ।
राा ममा जोत मह, ताको करे प्रवान ॥
पिंडमहीं ब्रह्मंड औ, नहीं लोक आकार ।
अनंत लोकते भिन्न है, सुकित करो विचार ॥
( २१० )
बोधसागर
निरगुण मो मन लीन रहु, करे जीव गतनाश ।
बहुर काल बश ना परे; अजर अमाघर बास ॥
जिन संतनको यह मता, बरनत बने न मोहि ।
तिन पटतर का दीजिये, कहि समुझाऊं तोहि ॥
संतकोट वारो जहाँ, ज्ञानी लक्ष अनेक ।
जो निरगुनमें रत सदा, सो अनंतमें एक ॥
सुक्ति बचन--चौपाई
हो समर्थ मैं तुव बलिहारी । संतन महिमा कहो विचारी ॥
संतरूप कैसे पहिचानी । महिमा तासु कौन विधि जानी ॥
कैसे भेद तासको पावै । कैसे परम संत बस आवै ॥
और संत एक देहु बताई । तुमको आहु कहाँते आई ॥
योगजीत बचन
हो सुक्ति मैं कहों बखाना । तुमसों भेद कहों निर्बाना ॥
अपनी उत्पत्त देहु बताई । तुम्है भेद कछु नाहे दुराई ॥
आदि भेद अब कहों बुझाई । तुम सुक्ति सुनियो चितलाई ॥
प्रथमहि पुर्ष आप निबाना । तब नहि रचना अश बखाना ॥
जबै पुर्ष मन इच्छा आई । षोडश अंश तबै उपजाई ॥
चौदह सुत तहाँ रहे छिपाई । तिनको भेद कोई नहीं पाई ॥
सक्त निरंजन तब उपराजा । जिन सब कियो मृष्टिको साजा ॥
तिनसों त्रिगुनरूप प्रकटाया । जिनसों भई सबनकी काया ॥
तिन पुन चारों वेद बखाना । तामें जीव सबे लपटाना ॥
चारखान तब प्रकट कीन्हा । तेहिमें फाँस जक्त सब लीन्हा ॥
फिर पुत चउदह यम उपराजा । तब चौरासी कीन्ह समाजा ॥
तीरथ व्रत औ नेम अचारा । दान पुण्य जप मंत्र विचारा ॥
इतना करे जगतमें कोई । यमकी त्रास न छूटे सोई ॥
पञ्चमुद्रा
( २११ )
यामह सकल जीव उरझाई । अंतकाल पुन धरधर खाई ॥
स्वर्गलोकमह जो चले गयेऊ । तेतो आके देह फिर धरेऊ ॥
तेहुना यमकी छूटे त्रासा । भांत अनेक जीवनको फाँसा ॥
जबै पुर्ष अस देखेउ भावा । सत्तपुर्ष एक रुयाल बनावा ॥
सत्तपुर्ष इच्छा उपजाई । पुहुप नाम तब अंश बनाई ॥
तिन्है पुर्ष अस आहा कीन्हा । भौसागरको आयसु दीन्हा ॥
साखी-पोहोप नाम तबही चले, पुर्षहि शीस नवाय ।
भौसागरमों प्रकटभो, अबिगत रूपबनाय ॥
चौराई
अबिगतरूप छांड हम दीन्हा । संत स्वरूप भेष गहि लीन्हा ॥
शब्दस्वरूप बनाये सोई । तिनकी देहन छाया होई ॥
पाँच तत्त्व तीनोंगुन नाही । धरी देह तब बसत युगमाहीं ॥
सत्तनाम हम नाम धरावा । सब जीवनको संध लखावा ॥
या विध अजदेह धर लीन्हा । सबको आय सिखावन दीन्हा ॥
तब पुन जगमों संध लखाई । निरगुन मता सबै समुझाई ॥
जो जिव संध शब्दकी पाई । जीव असंखन लोक पठाई ॥
प्रथमहि सतयुगमैं हम आये । सत्त नाम तब नाम धराये ॥
तब हम जीव असंखन तारे । यमको मार तब जीव उबारे ॥
त्रेतामाहि बहुर हम आये । मुनिकह बोध मुनींद्र कहाये ॥
कोटिन जीवको संध लखाये । एतिक जीवको तब मुक्ताये ॥
तीजे फिर द्वापरयुग आई । मुनि करुनामे नाम धराई ॥
कोटिन जीव तबै हम तारे । महाकालते जीव उबारे ॥
फिर कलियुगको आयेउ भाई । योग जीत तब नाम धराई ॥
कालहिं जीत हंस मुक्ताये । सत्य शब्दकी संध लखाये ॥
जीव असंखन तारेउं आई । सत्तपुर्षकी दर्श कराई ॥
( २१२ )
बोधसागर
सारखी-चारो युग हम आइया, कीन्हेउ हंस उबार ॥
कलयुग नाम बखानऊँ, योग जीत उच्चार ॥
चौपाई
सुकृत सुनो भेद निर्वाना । अपनी उतपत कहा बखाना ॥
अब संतनको कहाँ संदेशा । जेहि विध लखोतासको भेसा ॥
तिनकी रहन अब देउँ बताई । जाते तुमही संत लखाई ॥
निरगुण चाल चले पुनसोई । सोई संत शिरोमणि होई ॥
तीरथव्रत औ नेम अचारा । इतने रहैं संतसो न्यारा ॥
दानपुण्य जगवतैं धर्मा । एतो जक्त जानिये कर्मा ॥
पूजा जाप ना दुतिया राखै । सत्तनाम हदे अभिलाखै ॥
तैंतीसकोट देवगण भारी । ये सब माया रूप निहारी ॥
दुतिया ध्यान अनित्य विचारै । अक्षै नाम हदेमों धारै ॥
सोई निरगुण संत कहाई । ताकी परख मैं देऊँ बताई ॥
रहे विरक्त होय जगमों सोई । विरही संत सोइ पुन होई ॥
सारखी-यह तो विस्वा धर्म है, दुतिया जप तप ध्यान ।
पतिव्रता इनमों नहीं, मगके रोरा जान ॥
अक्षय नामको गहि रहे, तजे द्वैतके आस ।
सत्तपुर्षको पावई, पूरण पर्म विलास ॥
रहो एकता चित्तमों, दुतिया उसको जान ।
गगनमगन निशिदिन रहै, निरगुणसो पहिचान ॥
चौपाई
सुकृत सुनो ज्ञान अब सोई । निरगुण संत कैसे बसहोई ॥
प्रथम संतको पावे जाही । प्रेम प्रीत तब कीजे ताही ॥
करे बंदगी शीस नवाई । निज गृह तबे ताहि लैजाई ॥
चंदन घसे धामको छावै । तापर बस्तर श्वेत बिछावै ॥
पञ्चमुद्रा
( २१३ )
चरन परवार चरनारज लीजै । बहुत भांतसो भोजन दीजै ॥
महाप्रसाद तासुको लीजै । पीछे औपुन पूजा कीजै ॥
प्रथम बंदगी कायक जाना । मायक बायक फिर पहिचाना ॥
तीनों बंदगी करे बनाई । अनेक भांतिसो ताहे रिझाई ॥
द्रव्य देनको लोभ न कीजै । चरन तरे ताहि धरदीजै ॥
अष्टधातको काया जाना । सो उद्धार कैसे पहिचाना ॥
काया भार उतारके लीजै । चउदह रतन तब गुरुको दीजै ॥
आरती करे बहुभांत बनाई । काया भार तब ताको जाई ॥
यहविध भक्त करो चितलाई । यमको डंड छूट तब जाई ॥
साखी—आरती कीजै पुष्पको, बहुत दीनता लाय ।
कागाते हँसा भयो, सत्त भक्तको पाय ॥
इतनी प्रीत संत जब जाना । तबे संतसो निज मत ठाना ॥
क्रिया करै तबहीमुख बोलै । तबे संत दिल पर्दा खोलै ॥
तबे बस्तु निज देहि लखाई । तासो हंस समाध लगाई ॥
सोई करनी कछुदिन करई । आदिब्रह्म अंतर लख परई ॥
पुर्णलोकमें रहे समाई । तबही बुंद सिंध मिलजाई ॥
इतना खोज करे पुन जबही । अजर अमर घर पावे तबही ॥
निरगुण संतको भेद बतायो । निजमत खोलमें तुम्हैं लखायो ॥
अब एक आगम तुमसों भाषों । सुकृत गोय कछू नहिं राषों ॥
साखी—निरगुणको औतार है, सो प्रकटे जग आय ।
ऋषिमुनि ताको ना लखे, गुप्तसो रहो छिपाय ॥
ताको भेद अब देहुँ बताई । संत रूपसौ जगमें आई ॥
बालक होय पुन जगमें आवै । कमलपत्र पर आसन लावै ॥
निरूनाम जुलहा कहाई । भक्तेहत ताके गृह जाई ॥
खान पान कछु करि हैं नाहीं । दिनदिन अंग बढ़त पुन जाहीं ॥
( २१४ )
बोधसागर
शब्दस्वरूप देह तिन होई । पांचपचीस तीन नहिं कोई ॥
छलदिक्ष्या रामानंदसो लैहै । तिनको फेर उलट समुझैहै ॥
पांडव यज्ञ तिन पूरन कीन्हहा । स्वपच भेष तिनही धर लीन्हहा ॥
कोटिन हंस तबै मुक्ताई । सत्तनाम कबीर कहाई ॥
अजर अमरहो तिनकी काया । जासु देख काँपे यमराया ॥
सोई नाम कबीर कहाई । हमैं उन्हे कछु अंतर नाहीं ॥
ते पुन जगमों परकट होई । ताकर अवध बताऊँ तोही ॥
सम्भवत पंद्रहसे बीस प्रमाना । तबै आय जगमों प्रकटाना ॥
निरगुण संध तब जगमों आई । सोई नाम कबीर कहाई ॥
दोई दीन को बोधे आई । मगहर अमी नदी बहाई ॥
पंडाके पग जरत बुझाई । परसो तगको भरम छोड़ाई ॥
सत्य शब्द प्रतीत दिढ़ाई । भौसागरते जीव मुक्ताई ॥
जीव असंखन तारे जबही । आवैं अंशलोकते तबही ॥
कोटज्ञान धर्मदासहि देहैं । ब्यालिस पिढ़ीथाना बैठेहैं ॥
साखी-नौतम अंश पुर्षके, सो प्रकटे संसार ।
जीव असंखन संगले, जही पुर्ष दर्बार ॥
भौसागरमें रोपेव थाना । धर्मराय शिर मरदेउ माना ॥
तिनको मता सन्त जब पावै । सोतो अजर अमर घर आवै ॥
ताको काल न पावै सोई । गुरु कबीर निज पावै जोई ॥
हमरो उनको एक शरीरा । जाको सुनियो नाम कबीरा ॥
सत्त कबीर पुर्ष निर्वाना । तिनको तुमसों कहों बखाना ॥
साखी-अजर अमर सोइ जानिये, जाको नाम कबीर ।
तासु संध जाने बिना, हंस न लागे तीर ॥
सुकित वचन--चौपाई
है समर्थ तुम आगम भाषा । आगकी अब बणों साखा ॥
पञ्चमुद्रा
( २१५ )
निरगुन अंश लीन्ह हम जानी । ध्यान मंत्र प्रभु कहो बखानी ॥
आगे बिने करों बहु बारा । ताको भेद कहो निरधारा ॥
जीव मुक्तको भेद बताई । आपन करमो कह मुक्ताई ॥
विनती करो दोग्य कर जोरी । ध्यान मंत्रकी भाषों डोरी ॥
ताको मता धरोजिन गोई । मोसो वर्ण सुनावो सोई ॥
योगजीत वचन
सुक्ति सुनो भेद निर्वाना । जीवमुक्ताको कहों प्रमाना ॥
मंत्र ध्यानको बणों अंगा । ताको भाव कहों प्रसंगा ॥
आदि मंत्र मैं देहु बताई । जाके बल हंसा घर जाई ॥
सोई जाप अंतर लो लाई । अंतकाल ताको नहिं खाई ॥
ऐसा तुम्हे कहों उपदेशा । अंतर ध्यानको कहों संदेशा ॥
प्रथमहि जो सुख आसन लावै । राजस योग तब करे बतावै ॥
काया कष्ट न व्यापै कोई । राजस योग पुन कहिये सोई ॥
पांच पचीसकी सुतं बिसारै । अस्थिर बैठ ध्यान उचारै ॥
बैठ शून्य महलमों जाई । तबे निरंतर ध्यान लगाई ॥
प्रथम विरह वैराग समावै । रचना सकल तहाँ बिसरावै ॥
एक पुर्ष एक आपको जानै । द्वैत अकार शून्य पहिचानै ॥
तबही ध्यान समाध लगाई । जाकी सुतं अन्त नहिं जाई ॥
दहिनो अंग श्वास जब आवै । तबे ध्यान महाँ सुतं लगावै ॥
पिंगला अंग पुर्षको बासा । बाँये अंग शक्त प्रकाशा ॥
शक्त अंग कह देहु बचाई । दक्ष अंग वह सुतं लगाई ॥
प्रथम रूप सोहंग उचारा । तामों लखो पवनकी धारा ॥
तामहँ अर्ध पवन जो कहिये । सोहंगनाम पुन तामों लहिये ॥
प्रथम ध्यान धर देखे सोई । अंग अंग की पचै होई ॥
( २१६ )
बोधमागर
तास अंगमें देहु बताई । यह कौआय कहाँते आई ॥
सोतो पुर्पको अंश कहाई । भीतर वाहिर सिद्ध कराई ॥
पिंड ब्रह्माण्ड रहा भरपूरी । सोई निकट सोई है दूरी ॥
तब अजपाकी तारी लावै । विन जप हंसा तहाँ समावै ॥
श्वेतरूप श्वासा को रंगा । सुतं समानी ताको संगा ॥
सप्तपताल कोट ब्रह्मण्डा । सातद्वीप पृथ्वी नौखंडा ॥
सोई सबमें रहा समाई । सो जगको करतार कहाई ॥
एक संख छैलक्ष प्रमाना । इतना योजन लोक बखाना ॥
सोहंग नामको लोक प्रमाना । आगे पुर्प कहीं निर्बाना ॥
पदाराख गुप्तकर भाखो । अक्षरकाट गुप्तही राखो ॥
जेहिते जक्त लेखे नहीं कोई । गुप्त अंक कर भाषों सोई ॥
ताके आगे नाम बखानो । सोई नाम गुरुगमते जानो ॥
प्रकट नाम कर भाषो सोई । सुनके जीव तरे सब कोई ॥
अब मैं कहीं आगेकी बानी । गुप्त अंक गुरुगमते जानी ॥
प्रथमही सोहंग नाम बखानो । तामह बोहंग ब्रह्म समानो ॥
सोहंग मध्य कोहंग दर्शाई । सोतो अंश पुर्पको भाई ॥
दोय असंख दशनील बखाना । एता योजन लोक प्रमाना ॥
श्वेत अंग तिनहुको कहिये । सोहंग पार धामसो लहिये ॥
तिनके दर्श हंस जब पाई । कर प्रनाम तहैं शीस नवाई ॥
वोहंग नाम आसिका दीन्हा । बहुत भांति तिनदाया दीन्हा ॥
तबे हंसको लीन्ह बुलाई । लोक प्रमान सब दियो बताई ॥
तब उन डोरी दीन्ह लखाई । ता चदिहंसा लोक सिधाई ॥
सारखी-वोहंगको प्रनाम कर, तब डोरी गहि लीन ।
पुर्प नाम सुमिरत भयो, परे पयाना दीन्ह ॥
पञ्चमुद्रा
( २१७ )
तब आगेको कीन्ह पयाना । कोहंग नाम जहाँ अस्थाना ॥
कोहंग नामको देखा जबही । हंस प्रणाम कीन्ह पुन तबही ॥
दोयकर जोर सब अस्तुति कीन्हा । मस्तक हाथ पुर्ष तब दीन्हा ॥
तबही हंस बहुत हरषाना । पायो पूरन पद निर्वाना ॥
तीन असंख वटनील बखाना । एता योजन लोक प्रमाना ॥
श्वेत स्वरूप पुर्ष है सोई । श्वेतही वर्ण लोक वह होई ॥
तबै हंसको लीन्ह बुलाई । पाँजी लोकको दीन्ह बताई ॥
मक्रतार तब डोर लगाई । तब आगेकी संघ बताई ॥
हंस प्रनाम पुर्षको कीन्हा । तबही डोर हंस गहि लीन्हा ॥
साखी-बहुत भांति तिन पुर्षसों, हंसा कीन्ह प्रनाम ।
तब आगे गवनत भयो, जोहंग नामको भांम ॥
तब हंसा आगे चलजाई । जोहंग नाम तहाँ पुर्ष रहाई ॥
हंसा तहाँ पयाना दीन्हा । जोहंग नाम तहाँ बैठक कीन्हा ॥
तबही पुर्ष हंसतन हेरा । हंस प्रनाम कीन्ह तेहि बेरा ॥
तब पूरष दिलदाया कीन्हा । वचन आसिका हंसहि दीन्हा ॥
तब हंसा हिरदे हरषाई । हम पुरुषके दर्शन पाई ॥
चार असंख नौ पदुम प्रमाना । जोहंग नामके लोक बखाना ॥
श्वेत स्वरूप पुर्षकी काया । श्वेत वर्णसों लोक बनाया ॥
तबही पुर्ष हंस सँग लीन्हा । लोक दिखाय ताखुको दीन्हा ॥
ताके परे विहंगम डोरी । मुक्तके मारग जाय जिवसोरी ॥
सो हंसाको दीन्ह लखाई । ताचढ़ हंसा लोक सिधाई ॥
आगे आदि पुर्ष निर्वाना । तहाँको हंसा कीन्ह पयाना ॥
साखी-भांति अनेकन पुर्षसों, अस्तुत कीन्ह प्रनाम ।
आदिपुर्ष अवस्थानमों, हंसा कीन्ह पयान ॥
( २१८ )
बोधसागर
जबही हंसलोक नजिकाई । तबही देह हिरंमर पाई ॥
षोडश भान देह उजियारी । ऐसा रूप हंस तब धारी ॥
हंसा तबै तहाँ चल जाई । जक्षत पुर्ष तहाँ आप रहाई ॥
कमल अनंत परबूरी जानो । आदिपुर्ष जहाँ आसन ठानो ॥
पोहोप दीप तेहि नाम बखाना । सत्तपुर्ष कीन्हो अस्थाना ॥
सोई नाम निर्गम्य बखानी । अनंत नाम ताते प्रमानी ॥
ताको नाम हंस जो पाई । जीवन मुक्त हंस होय जाई ॥
सोई नाम जो सुमिरण करई । धिन तप भक्ति सो प्राणी तरई ॥
योजन अनंत लोक विस्तारा । आदिपुर्ष तहाँ करहि विहारा ॥
श्वेतहि वर्ण पुर्षकी काया । संपुट कमल देखिये छाया ॥
पुष्पहि धरनी तहाँ रहाई । जहाँ हंस सब राज कराई ॥
चारकरी सिंहासन जोरा । तहवां मध्य पुर्ष अंजोरा ॥
जगमग जोत अगिन उजियारा । बर्णत बने न अपरम्पारा ॥
हंस अनंतन बैठे तहवाँ । माथे मुकुट छत्रमणि जहवाँ ॥
षोडशभान हंस उजियारा । देह हिरंमर सो विस्तारा ॥
चंद न सूर दिवस नहिं राती । वर्ग अवर्णन जात नहिं पांती ॥
माया कालकी तहाँ न छाया । अजर अमर हंसनकी काया ॥
पुरुषनाम अस्थान बतायो । आदिनामकी संध लखायो ॥
सोई नाम हंस जो पावै । योनी संकट बहुर न आवै ॥
साखी—आदि अमर अक्षत हैं, अविगत अविचल धाम ।
आदिपुरुष सो जानिये, रूप निहगम्भी नाम ॥
आदनाम मैं परकट भाषा । वणों मूल फूल फल साखा ॥
और नाम एक पुर्ष बखाना । विहंग नाम तासुको जाना ॥
सोतो रहे पुरुष दरबारा । ताको भेद मैं कहाँ विचारा ॥
अजपा सिद्धि देउँ बतलाई । ताको भेद कहाँ समझाई ॥
पञ्चमुद्रा
( २१९ )
प्रथमे सोहंग पुर्ष बखाना । तामे अलख ब्रह्म पहिचाना ॥
निः अक्षर निःतत्त्व अधारा । तामह अर्ध पवन हंकारा ॥
सोहंग कार गगन अस्थाना । तामह पूरण ब्रह्म समाना ॥
तामह नाम निगम्य है सारा । सोहै सबको सिरजन हारा ॥
तासों हंस लीन होय जाई । निःअशरमों रहे समाई ॥
सिंधुबुन्द तहाँ एके होई । दुनियाँभाव नाश होय सोई ॥
सोनिज अजपा है निर्वाना । आतम हंसा तहाँ समाना ॥
वोहंग कोहंग जोहंग नामा । सोहंग सुर्त निरन्तर धामा ॥
सोई नाम जीव रखवारा । अमी अन्न बिहंग विचारा ॥
आगे आदिनाम हम भाखा । ताकर नाम सो गुप्तहि राखा ॥
अंतर अजाप नाम सनेही । अमी सोहंग पुर्षकी देही ॥
लागी निरंजन बेहंगमतारी । अष्ट गगनकी खुर्ली किवारी ॥
दहिनो अंग पुर्ष अस्थाना । तहवाँ हंसा कीन पयाना ॥
मकतार गहि हंस उड़ाई । आगे अकह कमल दरशाई ॥
कमल अनंत पंखुरी छाजै । आदिपुर्ष जहाँ आप विराजै ॥
श्वेत सिंहासन श्वेतहि काया । श्वेतहि पुर्ष श्वेतही छाया ॥
श्वेतछत्र शिर मुकुट बिराजै । भान अनंत शोभा तहाँ लाजै ॥
श्वेत चवर शीस फहराई । भान अनंत कला वहाँ छाई ॥
ऐसे निरगुण नाम अन्नपा । महापुर्षसो आदि स्वरूपा ॥
नाम तेज बल सुमिरन पाई । महाकालते जीव छोड़ाई ॥
बहुर न होय जीवकी हानी । निश्चय सत्तपर्षको जानी ॥
यह मत निरगुण पावे कोई । जाको सतगुरु पूरा होई ॥
यह मत पाय अमर होय जाई । बहुर न जीव प्रलै तर आई ॥
सत्यनाम सतगुरु परतीती । हंसा चले तब भौजल जीती ॥
है सुकृत तुम संत सुजाना । तुमसों कहीं मैं योग ठिकाना ॥
( २२० )
बोधसागर
या विधि करनी करे बनाई । सत् सिंधमो जाय सहाई ॥
ना फिर आवे ना फिर जाई । अजर अमर घर रहै समाई ॥
जीव बुद्ध नाश तब होई । ब्रह्म समाय ब्रह्म होय सोई ॥
ताकर संघ कहो निरवारी । हंस होय सो लेय विचारी ॥
यह तो भेद ना राखौ गोई । आदि योग मैं भाखों सोई ॥
अब मैं कहौं मंत्र उपदेशा । भाखो आदनामको भेषा ॥
गुप्त अंक लिख देउं बताई । पुस्तक देख लखो नहिं जाई ॥
साखी-गुप्त भेदको मंत्र यह, वणोंअंक छपाय ।
सो अंतरमों जाप कर, ताको काल न खाय ॥
अजपाको मन ध्यान धर, सो यह मंत्र बखान ।
सो तो पुन अस्थिर भयो, बहुर न जीवकी हान ॥
मंत्र
बो सों जो को अ अ निः म वे कां ञ्र मी हं हं हं हं हं हं छे
रू है सं हं म म नो ग नि पू प त अ हं ॥
हे सुकित तुम बडे विवेकी । तुमको बुद्ध सकल हस देखी ॥
ताते तुमको मंत्र सुनावा । जीव काजको शब्द लखावा ॥
सो तुम राखो गुप्त छिपाई । यह जनि कहो खोलके भाई ॥
यह निजमन्त्र प्रकट जो होइहै । विन करनी हंसा तर जैहै ॥
गुरमत पंथ चाल मिट जाई । ताते करनी कहि ससुझाई ॥
योग ध्यान कुछ करनी कीजै । पीछे मंत्र जाप तेहि दीजै ॥
मंत्रपाय मन आपा आई । गुरुकी आसन राखे पाई ॥
तबे हंसको होय अकाजा । ताते कहो योगको साजा ॥
मंत्र जोर ते लोके जाई । शोभा हीन हंस होय भाई ॥
षोडश भान हंस उजियारा । सो नरहै गतमंद विचारा ॥
मंत्र ध्यान अजपाको साधै । या बिधसन्त ध्यान अवराधै ॥
पञ्चसुद
( २२१ )
तबही सुफल कामना होई । पहुँचे हंस लोकको सोई ॥
अजर हिरंमर देही पावे । योनी संकट बहुर न आवे ॥
साखी-जीव मुक्तको मंत्र यह, बणीं अंक छपाय ।
ताको जप मनमें करे, ताको काल न खाय ॥
सुक्ति वचन-चौपाई
हो सतगुरु तुम मंत्र सुनायो । मेरो हृदैं सांच अब आयो ॥
अब गुरु कहो लगनकी वानी । श्वासा लगन कैसे पहिचानी ॥
अलख मता है ताको साई । ताको भेद कहो समुझाई ॥
कैसो रंग लगनको होई । कारण भेद कहो प्रभु सोई ॥
साखी-जैमुन जगपत केतुकी, औ व्यालिन पहिचानी ।
गुण प्रकाश लक्षण सहित, सतगुरु कहो बखानी ॥
योगजीत वचन
सुक्ति सुनो लगन बेवहारा । तुमसों भेद सब कहों बिचारा ॥
प्रथमे श्वासा ध्यान लगावै । ताको रंग हृष्टमें आवे ॥
पीतवर्ण तहां देखे जबहीं । अति दुलास मन आवे तबहीं ॥
उपजे सुख पीत रंग जानी । जगपति लगन पुन ताहि बखानी ॥
अरु पुन श्वेतवर्ण लख आई । अस्थिर समाध रहे ठहराई ॥
उपजे सुख प्रेम भक्त अधिकारी । दया लीन तब सुतं निहारी ॥
श्वेतभाव जब मनमें आवे । सोई जैमुन लगन कहावै ॥
बहुर ध्यान धर देखे जाई । श्वासा पवन श्वेत लख जाई ॥
जल आकार पुन भासों जबहीं । उठे सुगंध श्वासमें तबहीं ॥
ध्यान बीच आकार न जाने । कैतुकी लगन ताहि पहिचाने ॥
बहुर ध्यान धर देखे जाई । अरुणश्याम तहाँ भूमि लखाई ॥
अहंकार मन शठता आवे । सुख नाश होय दुःख उपजावे ॥
इतना भावही देखे जाई । व्याल लगन कहावै भाई ॥
( २२२ )
बोधसागर
साखी-श्वासा मद्धे तत्त्व है, लगन तत्त्वके माहिं ।
योगांजन पहिचानि हैं, ज्ञानीजानत नाहिं ॥
प्रथमहि पृथीतत्त्वको पाई । तामें जगपति लगन मिलाई ॥
अष्टोदिशा गवन तब कीजै । सकलबिचार छांड़ तब दीजै ॥
अष्ट सिद्ध नव निद्धि कहाई । सो तो तहां सहजमों पाई ॥
मनमों इच्छा जाकी होई । सुफल कामना पावै सोई ॥
कोटिन कार्य सिद्धता पावै । सर्व जीत होय घर को आवै ॥
मनमों हार न आवै कबही । ऐसी लगन बिचारे जबही ॥
सुरको सगुन एक गुन जानो । यह मत विश्वावीश बखानो ॥
ताको भेद मैं दीन्ह बताई । सबे सिद्धको मूल लखाई ॥
साखी-जैतिक कारज जगतमों, चर औ अचर विचार ।
ते सब जानो सुफल है, कोट सिद्धको सार ॥
जैमुन लगन कहौं समुझाई । ताकर फल मैं देउँ बताई ॥
जलके पृथीतत्त्व दोय पावै । तामें जैमुन लगन पिलावै ॥
तबही ज्ञान करे जो कोई । सबै सिद्धता पावै सोई ॥
कब हूं न होवे तनमों पीरा । जीते युद्ध महा रणधीरा ॥
मनवांछित फल पावे सोई । जितने कार्य जगतमों होई ॥
एक सिद्धकी कौन चलावे । कोटिन सिद्ध तामें फल पावे ॥
साखी-नौ ग्रह घातिक दरसके, और योगिनी काल ।
लगन तत्त्व लखके चले, कारज होय ततकाल ॥
सुर औ तत्त्व बिचारके, तामह जैमुन होय ।
जौन वचन मुखसों कहे, सिद्ध जानिये सोय ॥
तीसर लगनको भेद बताऊँ । ताको अर्थ तब वर्ण सुनाऊँ ॥
जलके पृथी तत्त्व एक पावै । तामह लगन केतुकी आवै ॥
ताके जोर कार्यको जाई । सोतो कार्य मिले उठ धाई ॥