कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
( १९२ )
बोधसागर
स्वासा परख घरीकी राखे । जो दम चले सो आगम भावै॥
सत्ताइससो स्वासा चले जबही । पहर टंकारा मारे तबही ॥
एतिक स्वासा पहर प्रवानी । घरी चारमों गजर बन्धानी ॥
आठ पहर छ घरी बजावै । ठोके गजर गहर नहिं लावै ॥
चार घरी चारो युग मूला । चार पहर चारो अस्थूला ॥
चारो युग एक पहरके माही । चारो युगकी वतें छाही ॥
प्रथम पहर सतयुग प्रवाना । ताकर प्रथम घरी बंधाना ॥
सतयुगमें युग चार अपारा । चारो युगके नाम निनारा ॥
प्रथमह सतयुग रोपो थाना । चारो युग तेहि माहि समाना ॥
सतयुग प्रथमहि घरी उत्पानी । किलक नामयुग ताहि बखानी ॥
किलक जगकी स्वासा सारा । छैसे पचहत्तर स्वास सुधारा ॥
एतिकस्वासाकिलक युगमाहीं । पूछै जीव अछैकी छाहीं ॥
वीतत घरी गजर घहराई । काल टंकोरा मारे धाई ॥
या युग अन्तकी आवे घरी । ग्रासे नागिन सनमुख खड़ी ॥
प्रथम किलकयुग होय संघारा । पीछे कमतयुग करे पसारा ॥
सतयुग घरी दूसरी आवै । तैतिक स्वासा कमत युग पावै ॥
जवे कमत युगकरे हंकारा । उत्पत थोरी बहुत संघारा ॥
कमत युगकी स्वासा जानो । छैसे पचहत्तर स्वासा बखानो ॥
एतिक स्वासा कमत युग माही । गुण औगुण सब निखें ताही ॥
बीते कमत कमोद युग आवै । तीसरी घरी बासना धावै ॥
आवागवन विचारे जोई । युग कमोद सुख पावे सोई ॥
तिसरी घरी कमोदकी आवै । तब कमोद युग सुख दिखरावै ॥
युग कमोद अमल जब आवै । दुखी सुखी नर सब सुख पावै ॥
युग कमोदकी प्रलै होई । दुखी सुखी जाने सब कोई ॥
तबही होय सूर संचारा । महाविरोध उपजे संसारा ॥
पञ्चसुत्रा
( १५३ )
चन्द सनेह होय जो हीना । महासूल तन होय मलीना ॥
धासा घरी सातसे भारी । युगकमोदकी कथा निनारी ॥
युगकंकवत होय पैसारा । चौथी घरी कोध अधिकारा ॥
ताकी घरी निकट जब आवै । सतयुग अंत कंकवत पावै ॥
सतयुग अंत होन नहिं पावै । युग कंकवत आन समावै ॥
युगकंकवत काल दुखदाई । काया कहर गिरासे आई ॥
युगकंकवत कालकी बाजी । कलह विकार सब जगमों साजी ॥
युगकंकवत महाबल योधा । अंतकाल सतयुगसों क्रोधा ॥
सतयुगअंत कंकवत माहीं । अंतकालकी व्यापे छाहीं ॥
युगकंकवत मोहकी छाहीं । काम कोध ममता लपटाहीं ॥
अंतकाल सतयुगके भयऊ । चारो युग परले तर गयऊ ॥
चारों युगका भेद बतावा । अगम निगम सब भाष सुनावा ॥
साखी—एके युगके बीतते, चारों गये विनास ।
एक नाद चारों युग खायो, सतयुग कीन्हो ग्रास ॥
किलक कमोद चंदके नेहा । कमत कंकवत सूर सनेहा ॥
भये युग अंत एक संगचारी । चार शब्द एक नाद सँघारी ॥
एक नाद एक पहर कहावै । चार घरी एक माहि समावै ॥
चार घरी चारों युग बीतै । शब्द नाद रवि शशिघर जीतै ॥
सतयुगको तब भयो विनाशा । त्रेतायुगको भयो प्रकाशा ॥
दूसर युग तब भौ विश्वासा । दूसर पहर तत्त्व प्रकाशा ॥
तेज लगन श्वासा अनुसारी । ताते त्रेतायुग संचारी ॥
त्रेता युगकी पखुरी चारी । चार घरी युग चार विचारी ॥
जस युगअंत सतयुगमों देखा । सोई युग त्रेतामों लेखा ॥
जब जब अंत होय युग केरा । तब तब नादकाल घन घोरा ॥
नं. ८ कबीरसागर - ७
( १९४ )
बोधसागर
त्रेता युगमें कलह अपारा । यज्ञ दान व्रत नेम अचारा ॥
तेहि पीछे द्वापर युग आवा । काल अंत तब आन समावा ॥
अहंकार तामें अति भाखा । अब कलयुगकी वणों साखा ॥
काम क्रोध और पाप अपारा । लोभ मोह यम कीन्ह पसारा ॥
एक पहर चारों युग जाना । ताको वर्ण कहों बिछलाना ॥
पांच तत्त्व तीनों गुण कहिये । ताते पिंडकी उत्पति लहिये ॥
अष्टधात कहिये अस्थूला । ताते रचो गर्भको मूला ॥
शिवकी श्वासा वायु सरूपा । सक्ती गहे जानके रूपा ॥
शिवको रूप शक्ति गहि लेई । तब सांचा मो जावन देई ॥
जावन जगे तब सांचा माहीं । थाका होय रुधिरके ताहीं ॥
तेहि थाकाकी रचना भारी । तीन लोककी विभो सवारी ॥
महल मध्य पुनि जीव समावा । जलके भीतर महल बनावा ॥
महलके माहिं बनाये छजा । तामो दश कीन्हों दरवजा ॥
सांचा अन्न जरे नहिं कबहीं । पिंड सवारो अन्तर जबहीं ॥
सांचा माहिं दियो रंग ढारी । नख सिख शोभा बहुत सवांगी ॥
तीनों लोक रचो पलमाहीं । गढ़पति अंश तब साजा ताहीं ॥
प्रथमहि सायेर सात सँवारा । पर्वत आठ कीन्ह अधिकारा ॥
अठारह गंडा नदी बहाई । तामह गुप्त बहे ठहराई ॥
अठारह सहस्र बनाये नारा । अष्टधातुले साज सुधारा ॥
रक्त हांडको सब अस्थूला । बाढ़े लिंग सवांरे मूला ॥
आगे रचो दोह भुज देडा । सातद्वीप पृथ्वी नौखंडा ॥
बहुर सँवारो दोय पग खंभा । मदन महाबल उपजो रंभा ॥
नासा चढाय मस्तक पर लाई । सातभैंवर नौनाट लगाई ॥
उत्तर मेर शिर जो अस्थूला । सरवर माहिं कमल बहु फूला ॥
नाभी माहिं दल चार बनाई । फूल फल बास घट छाई ॥
पञ्चमुद्रा
( १९५ )
आठो अंग रचो अस्थूला । शिव शक्ती दोनों समतूला ॥
सोई अंग शक्त सोह ईसा । एकै रूप एक समदीसा ॥
नख सिरख रचो गर्भस्थाना । सातद्वीप नौखंड बखाना ॥
प्रथमहि ब्रह्म द्वीप निरमावा । ताऊपर बहु रचना लावा ॥
एकद्वीप नौखंड बनाई । त्रिकुटी सात तहां निखाई ॥
एकद्वीपमहैं सातो नाला । सातोनाल सात हैं चाला ॥
सरवर सात कमल है साता । रंग पांच पांचौ उत्पाता ॥
त्रिकुटी मध्य एकहै कीला । तहां देखिये रंगरसीला ॥
ता कीलामह कानी लागी । पवन सनेह आत्मा जागी ॥
ता कीलामह लागी डोरी । खूटा लगा पवन झकझोरी ॥
झूले मन पवन झूलावै घेरी । एक घर झून्य एक घर फेरी ॥
खूटा होयके पवन झकोरी । इंगला पिंगला सुखमण जोरी ॥
रविशशि पवन गहे मन जोरी । खूटा लाग पवनकी डोरी ॥
मेरे डंडपर खूटा गाड़ा । नदी तीन ताऊपर बाड़ा ॥
खूटातरे नदीत्रिय बहई । तीननदी बिच खूटा रहई ॥
खूटाके दहिने दिश गंगा । अति शीतल बहे नीर तरंगा ॥
सूरसनेह नीर हिय पसैं । सुरतसनेह धनी तहैं दसैं ॥
खूटाके है बांये अंगा । यमुना नदी बहे अतिरंगा ॥
सुखमन सरस्वती नीर तरंगा । लहर लालच तेज विष अंगा ॥
तहां बसे सरयू तेहि साथ । रावल एक बयालिस हाथा ॥
काल अनन्त रूप रस नाथा । बसे अथर दीखे नहिं माथा ॥
बाढी नदी दोह विकरारा । शीतल तेज बहे दोउ अधारा ॥
तिसरी नदी गुप्त पर्वाहा । अविगत जल बहेअगमअथाहा ॥
खूटा तरे होय नदी सिधारा । चली सरस्वती फोरि पहारा ॥
मध्य लहर रस विषके खानी । गंगा यमुना बीच समानी ॥
( १९६ )
त्रिधसागर
त्रिकुटी संगम भयो मिलाना । भवर गुफा माधो करथाना ॥
त्रिवेणी तट बसे सुदंगा । ताको मम लखा परसंगा ॥
गणगंधर्व मुनि सब कर थाना । सुर नर मुनि कर बैठे ध्याना ॥
तैतिस कोट देव मुनि भारी । यक्ष यक्षणी देव कुमारी ॥
नागसुता अपसरा मोहिनी । चढ़ विमान सब फिरे जोहिनी ॥
असुरपिशाचऋषनागजोलाहल । त्रिवेणीतट करे कोलाहल ॥
तीनलोक जौ जीव निवासा । सो सब करो त्रिवेणी बासा ॥
त्रिवेणी तट माधौ देवा । सब मिल करे तासुकी सेवा ॥
ताहि प्राग होय चलो प्रवाहा । गंगासागर संगम जाहा ॥
देश देश गंगा फिर आई । घाट घाट बहु क्षेत्र बँधई ॥
जहां तहां तप ध्यान लगावै । योग यज्ञ तप बहुत करावै ॥
ऋतुबसंत प्रागको धावै । मकर नहाय बजार लगावै ॥
अर्ध उर्ध बिच लागी हाटा । भीतर बाहर औघट घाटा ॥
गर्भमाहि सब युक्ति बनाई । तीन कचहरी तहां लगाई ॥
जहां नदी संगम पर्वाना । तहवां रचो एक अस्थाना ॥
संगम बीच गुफा एकधारा । ताहि गुफामों सात है द्वारा ॥
एकद्वार होय नाद सूधारे । एकद्वार होय रूप निहारे ॥
एकद्वार होय वास बसावै । एकद्वार होय अग्नि समावै ॥
एकद्वार हो स्वाद लिवाने । एकद्वार होय न्याय चुकावै ॥
एकद्वार होय नाद उचारा । योग जीव यह मता विचारा ॥
सातनाल चौदह सुरभाऊ । सातोंके हैं एक सुभाऊ ॥
सातो सात शून्य में बासा । सातो बसे गुफाके पास ॥
अनहद भेद श्वासाकी धारा । ताको भाषतहों व्यवहारा ॥
साखी-रचना भाषेउ पिंडकी, श्वासा सहित विचार ।
बिरलाजन कोई परखि है, अलखरूप व्यवहार ॥
पञ्चसुदृढा
( १९७ )
सुक्ति वचन-चौपाई
सुक्ति कह सुन सत्यगुरु ज्ञानी । अगम कथा कहीं अन्तरयार्मी ॥
और कथा अब मोसों भाषों । जो पूछों सो गीय न राषों ॥
हंस अवधको भेद बतावो । तास मर्म सब मोहि सुनावो ॥
आगम वरष मासषट जानो । तो कछु अपने निजमत ठानो ॥
ताको भेद कहों समुझाई । सो मोहि सतगुरु भेद लखाई ॥
योगजीत वचन
सुक्ति सुनो सत् मम वानी । भिन्न भिन्न मैं कहों बखानी ॥
पाचघरी बांये सुर पाई । सोई दहिनो श्वासा चलाई ॥
दशश्वासा सुखमन जो कहिये । ताको भेद बराबर लहिये ॥
आठ पहर पिंगला सुर हालै । बरष तीसरे हंसा चालै ॥
आठ दिवस दहिनो सुर बहै । हंसा अवध वर्ष दोय रहै ॥
सोरह दिन पिंगला सुर बोले । वर्ष एक मो हंसा डोलै ॥
वीस रैयन दिन दहिनो पाई । तब षट मासमें हंस चलाई ॥
एकति सरोज दक्षस्वरको जानो । तब दोय दिनमें हंस पयानो ॥
पांचघरी सुखमन जो हालै । पांचघरी मो हंसा चालै ॥
चन्द सूर सुषमन छपजाई । सुखसे तीजो पवन चलाई ॥
ऐसी विधि पवन चलाई । पहर माहिं हंसा चल जाई ॥
साखी-धूम मंडल दीखे नहीं, जोत न नेत्र लखाय ।
छठे मास हंसा चले, बचै न कोट उपाय ॥
छाया शीस दीखे नहीं, भुजा शिखर ना दिखाय ।
दीप बास आवै नहीं, छठे मास चल जाय ॥
गगन शब्द गरजे नहीं, नेत्र गुञ्ज छपजाय ।
मास एकके अवधमें, हंसा तन तज जाय ॥
भैवरगुफा तिल ना लखे, पुतरी जब चढ़जाय ।
पहर एकमें जानिये, हंसा तन तज जाय ॥
( १९८ )
बोधसागर
सुक्रित वचन चौपाई
सुक्रित कहे सुनो गुरु ज्ञानी । आगम पचै सब हम जानी ॥
और एक पूछौं गुरु तोही । भिन्न भिन्नके भाखौ मोही ॥
जीव ब्रह्म कैसे प्रगटाई । सबके उत्पत्त देहु बताई ॥
ताकर भेद गोंय जिन राखो । सत्य सत्य सब मोसो भाखो ॥
कौतुक
कौन सो मन है कौन पवन है कौन शब्द है भाई ।
कौन प्रान है कौन हंस है कौन ब्रह्म ठहराई ॥
कौन काल है कौन जीव है कौन शून्य पहिचानी ।
कौन शिव है कौन निरंजन कहो सकल उत्पानी ॥
योगजीत वचन
चंचल मन है श्वास पवन है शब्द शून्य पहिचानी ।
प्राण निरंतर अखल ब्रह्म है सोहंग हंस बखानी ॥
कारण काल शून्य अविनाशी जीव कर्म पहिचानी ।
जीव शक्ति करतार निरंजन ऐसा भेद बखानी ॥
सुक्रित वचन
मन कहाँ रहे पवन कहाँ वासा शब्द वास कहैं कीन्ह ।
कहाँ प्रान कहैं ब्रह्म वास है हंस कहाँ है लीन्ह ॥
कारण काल केहि ठोर बसत है कहाँ शून्य ठहराई ।
जीव शीव निरंजन वासा सो मोहि देहु बताई ॥
योगजीत वचन
हृदे मन है नाभि पवन है अनहद शब्द को वासा ।
निरन्तर प्राण ब्रह्म ब्रह्मण्डे गगन हंस पर्काशा ॥
सकलमें काल शीव चंदामें शून्य निरूपम माही ।
सुखमन मध्य निरंजन वासा योगी देखे ताही ॥
पञ्चमुद्रा
( १९९ )
सुक्ति वचन
इन्द्री नाभी तब नाहीं स्वामी पवन कहा तब बासा ।
जादिन अनहद रूप नहीं तब शब्द कहाँ पकीशा ॥
ब्रह्मांड ना तो तब ब्रह्म कहाँ तो गगन नहीं कहाँ हंसा ।
निरूपम विना शून्य कहाँ कहिये भेद कहौं प्रकाशा ॥
आकार नहीं तब जीव कहाँ तो चन्द नहीं तब शीऊ ।
सुखमन नहीं तब कहाँ निरंजन ससुझाय कहो सब भेऊ ॥
योगजीत वचन
इंद्री विन मन हतो निरूपम निराकारमें प्रवना ।
अलख रूपमें शब्द बासतो अविगतिमें तब प्राना ॥
अविनाशीमें हंसबास तो शून्य कालमें बासा ।
ऊँकारमें काल बास तो ऐसा भेद प्रकाशा ॥
जीव शीवमें प्रथमो बासा शीव निरंजन माहीं ।
सबको बास प्रकट कर भाखों भेद कहैं तुम पाहीं ॥
सुक्ति वचन
कहाँते उत्पत भयो निरंजन कहाँ शीव उत्पानी ।
काल जीव कहाँते प्रकटो शून्य भयो केहि खानी ॥
कहाँते उत्पत भये अविनाशी कहाँते उत्पन हंसा ।
कहाँते उत्पन ब्रह्मभयो है प्राण भयो कह अंशा ॥
शब्द पवन मन कहाँते उत्पन कहाँते प्रकटो जीऊ ।
सबके उत्पन मोसों भाखों केहिबिधि प्रकटो शीऊ ॥
योगजीत वचन
आदि ब्रह्मते भयो निरंजन तहाँते प्रकटो शीऊ ।
तौन भेद तुमसों कहो सुक्ति शिवते उपजो जीऊ ॥
जीवते उत्पत काल भयो है कालते भयो ओँकारा ।
ओँकारते शून्य भयो है शून्यते जोत प्रकारा ॥
( २०० )
बोधसागर
जोत ब्रह्मते सब प्रकारा अगम भेदको कहो विचारा ।
अखंड रूपते भयो अविनाशी अविनाशी ते हंसा ॥
शब्दते उत्पत्त पवनकी है पवनते स्वांसा अंशा ॥
सुक्ति वचन--चौपाई
अन्तकाल जब आवे भाई । तन छूटे मन कहाँ समाई ॥
पवन शब्द हंसा कहाँ सिधाई । अन्तकाल कहवां ठहराई ॥
कालशून्य तब कहा समैहै । जीव शीव कहवां चल जैहै ॥
अन्त निरंजन कहो समाई । ताको भेद कहौ समुझाई ॥
योगजीत वचन
तन छूटे मन जोत समाई । पवन श्वांसमें तब खप जाई ॥
प्राण समय शब्दके माहीं । हंस ब्रह्ममें तब खपजाहीं ॥
अविनाशी शिवमाहे समाई । ब्रह्म अलखमें तब खप जाई ॥
अलख अनुपमों जाय समाना । अन्त प्रलैको भेद बखाना ॥
उत्पत्त सकल भाष हम दीना । ताको भेद लखो पवीना ॥
सत्य सत्य यह बानी जानो । आदि वचन यह तुम निर्वानो ॥
सुक्ति वचन--चौपाई
हे समर्थ मैं तुम बलिहारी । खोल भेद अब कहौं बिसारी ॥
केता प्रवान लोक अस्थाना । ताको भेद कहौं निर्वाना ॥
संख्या योजन ताकी भाखो । ताकर भेद गोय जनि राखो ॥
कहाँ कौन सो पुरी रहाई । कौन अंश तहाँ आसन लाई ॥
साखी-सब उत्पत्त तुम भाषिया, भेद कहेउ समुझाय ।
अब मन मो निश्चय भई, आगम भेद लखाय ॥
योगजीत वचन
साखी-योजनकी मरजाद बहु, आगे जो पवीन ।
अंशसहित अब भाखेल, तिनको नाम बखान ॥
पञ्चमुद्रा
( २०१ )
चौपाई
अब मैं कहौ लोककी बानी । निरगुण भेद कहौ बिलछानी ॥
प्रथमहि कुम्भ रूप औतारा । पीछे सकल सृष्टि विस्तारा ॥
योजनकोट एक सुख कहिये । कोट पचास पीठ तेहि लहिये ॥
एक कोटको मस्तक जाना । कोटकोटके अन्त बखाना ॥
एक कोटपर नेत्र बताई । सोरा माथ चौसठ हाथ पाई ॥
पृथी ते दून कुम्भ है भाई । पूरबदिशि सुख बरन भुनाई ॥
उंचास कोट पृथ्वी पर्वाणा । ताके तरे कुम्भ अस्थाना ॥
बहुर अष्ट दिगपाल बखाना । कुम्भ पीठपर है अस्थाना ॥
चौसठ पुंडरीक तहां कहिये । बावन लक्षको मस्तक लहिये ॥
छयकोट ऊचे प्रमाना । कुम्भ पीठपर कीन्हों थाना ॥
ऊपर कुम्भ शेषको जाना । पंद्रह कोट ताहि प्रवाना ॥
तहां वासुककी बैठक कहिये । और वराहु तासुपर लहिये ॥
ताकी डाढ़ पृथी ठहराई । राई प्रवानसो दीखे भाई ॥
पर्वत अष्टपृथी पर जाना । मध्यपृथी सुमेर बखाना ॥
सोरह सहस्र नीचे बधाना । एता योजन तरे समाना ॥
बीस सहस्र योजन चौरासी । चार दिशा तेहि फेर रहासी ॥
चौरासी सहस्र योजन प्रवाना । इतना ऊँच सुमेर बखाना ॥
तापर चारपुरी हैं भाई । अमरपुरी पुन तहां बनाई ॥
तहां इंद्र सुखराज कराई । तीन देव अस्थान बताई ॥
तैत्तिस कोट देवता जाना । अठासी सहस्र ऋषि प्रवाना ॥
तहां कुबेर भंडारी कहिये । अलकापुरी नामसो लहिये ॥
नौ पदुम नील अठतालिस । चौत्तिस पर्व अर्ब उनतालिस ॥
सतावन कोट कहौ प्रवाना । पैंसठ लाख कहो बंधाना ॥
पञ्चानवे सहस्र और तहां कहिये । पचास एकसो योजन लहिये ॥
( २०२ )
बोधसागर
एता योजन कहो प्रमाना । पृथ्वी अकाशको अन्तर जाना ॥
एता स्याम अंड पहिचानी । आगे और अबलोक बखानी ॥
पृथीते लक्ष योजन बंधाना । तहवां सूरज देवको अस्थाना ॥
सूरजते चन्दलोक है भाई । योजन लक्ष आगे चल जाई ॥
चन्दलोकते आगे जाना । योजन लक्ष नक्षत्र बखाना ॥
योजन लक्ष आगे चलजाई । ताके आगे भौम बताई ॥
भौमके आगे बुध अस्थाना । योजन लक्ष आगे प्रवाना ॥
बुधके आगे गुरु पहिचानो । योजन लक्षमें ताहि बखानो ॥
गुरुके आगे शुक्र बताई । योजन लक्ष कहों ठहराई ॥
शुक्रके आगे शनिको जाना । लक्ष योजन आगे पहिचाना ॥
शनिके आगे अदित बखाना । योजन लक्ष कहो प्रवाना ॥
तेहिके आगे सोम कहीजै । सोमके आगे राहु लहीजै ॥
राहु केतु लोक अस्थाना । योजन लक्ष आगे बंधाना ॥
तहाँते लक्ष योजन प्रवाना । तहवां सप्तऋषीश्वर जाना ॥
तेरह लक्ष ऋषिन सो भाई । आगे विधिको लोक बताई ॥
तहाँते लक्षयोजन बंधाना । महाविष्णु आगे पर्वाणा ॥
श्रीनारायण बैठे जहँवा । सूवा ऊपर पालंग तहँवा ॥
पग अगुष्ट मुख दीन्हों सोई । बालरूप तहाँ कीन्हों जोई ॥
तहाँते गौलोक कहावे भाई । राधा सती तहाँते आई ॥
सोई नाम अर्चित कहावे । सच्चिदानन्द ताहि गोहरावे ॥
इहालंग सगुणरूप बतलाई । यही चारों वेदन गुन गाई ॥
आगेको कछु भेद न पाई । इहालंग सबही मिल गोहराई ॥
तैंतिसकोट इहालंग गावै । आगेका कछु भेद न पावै ॥
चारमुक्तका कहे बखाना । यही रूपको करे पर्वाणा ॥
बहुते तेज उहालंग जाई । प्रले समै नाश होय भाई ॥
पञ्चसुत्रा
( २०३ )
नौ औतार देहधर आवा । सो अचितके अंश कहावा ॥
जहाँलग अंश सकल पुन देखा । तहाँलग मायारूप विशेषा ॥
आगे अक्ष लोक है भाई । तहाँ गये फिर बहुरि न आई ॥
साखी-इहाँलग सरगुण रूप है, सो हम दीन्ह लखाय ।
जग नहि जानत तासको, निरगुणके कोधौँ आह ॥
सुक्ति वचन--चौपाई
हो समर्थ तुम अगम अपारा । तुम हो निरगुणके औतारा ॥
अब आगेको भेद बताई । लोक पुर्ष सब वर्ण सुनाई ॥
जहवाँ हंस जाव ठहराई । बहुर नहीं प्रलैतर आई ॥
ताकर भेद कहो समुझाई । अगम निगम सब वर्ण सुनाई ॥
साखी-सतगुरु भाषो आदिते, लोकन को पर्वान ।
केता अन्तर ताहिको, पुर्ष भेद निरवान ॥
योगजीत वचन--चौपाई
हेसुक्ति मैं कहां बखानी । वणौ अगम निगमकी बानी ॥
अचितलोकमें दीन्ह बताई । लोकालोक सब वर्ण सुनाई ॥
अब भाषों निरगुणको लेखा । योजन संख्या लोक विशेषा ॥
अचितके आगे लोक बखानो । तीनअंशख योजन पहिचानो ॥
सोहंगलोक तहाँ है भाई । आठ अंश तिनते उपजाई ॥
सोहंग पुरुष है अगम अपारा । जगर मगर जहाँ हैउजियारा ॥
सोहंग पुर्षके आगे जाना । मूल नाम तहाँ पुर्ष बखाना ॥
पांच असंख योजन प्रमाना । तहवाँ मूलनाम बंधाना ॥
मूलनाम तहं आमन कीन्हा । आदि पुर्षके अंश जो चीन्हा ॥
मूलपुर्ष है अगम निसानी । तास भेद मैं कहां बखानी ॥
मूलपुर्ष ते आगे जाना । अंकुर नाम तहाँ पुर्ष बखाना ॥
तीन असंख आगे है भाई । अंकुरनाम तहाँ पुरुष रहाई ॥
( २०४ )
बोधसागर
ताको उग्रलोक है भाई । तहां अंकूर उदित रहाई ॥
अंकूरलोकते आगे जाना । इक्ष नाम तहां पुर्ष बखाना ॥
चार असंख योजन प्रमानी । इक्ष्या पुर्ष तहां रजधानी ॥
सोई पुर्ष कर्ता होयं आवा । आदपुर्षके अंश कहावा ॥
प्रथम पुर्षकी इक्ष्या आई । ताते इक्ष्या नाम कहाई ॥
ताहि पुर्षको कहां ठिकाना । है सुकित तुम सत्तही माना ॥
इक्ष्या आगे लोक बखानो । सोतो अंश पुर्षको जानो ॥
नौ नील एक संख बखाना । बानी नाम पुर्ष स्थाना ॥
पुर्ष प्रथम बानी उच्चार । ताते नाम सर्व आकारा ॥
ताहि पुर्षको भेद बताई । एतो आद पुर्ष हैं भाई ॥
बानी नामते आगे जाना । सहजनाम तहां पुर्ष बखाना ॥
दशलाख एकशंख बखाना । सहज पुर्षको तहां अस्थाना ॥
तहवां सहज पुर्ष है भाई । आदिपुर्षके अंश कहाई ॥
सातपुर्ष इहांलग जाना । निरंजन अक्षर नीचे थाना ॥
अचितसौ अक्षर उपजे भाई । निरंजन अंश अक्षरते आई ॥
साखी-निरंजन और सहजलों, नौ पुर्ष प्रमान ।
आदिपुर्ष आगे कहां, जितने सब उत्पान ॥
सहज अंशलग जैतिक भाषा । सो रचना परलयतर राषा ॥
इहांलग प्रलैको प्रमाना । आगे अक्षैलोक अस्थाना ॥
सहज पुर्षते आगे जाई । आदिपुर्षको लोक दिखाई ॥
सहजते एक असंख प्रवाना । तहवां आदिपुर्ष निरबाना ॥
तहँवा प्रलैकालकी छाया । नहीं तहां कछु मोह और माया ॥
तहां न तीनों गुनका भेषा । ब्रह्मा विष्णु तहां न महेशा ॥
नहीं तहां जोत निरंजन राई । अक्षर अचित तहां नहि जाई ॥
तहां नहीं शिवशक्ती औतारा । नहीं तहां अक्षर ओकारा ॥
पञ्चमुद्रा
( २०५ )
ब्रह्मजीव नहीं तत्त्वकी छाया । नहिं तहैं दशइंद्री निरमाया ॥
काम क्रोध मद लोभ न कोई । तहवां हर्ष सोग नहिं दोई ॥
नादबिंदको तहां न पानी । नहीं तहैं सृष्टि चौरासी जानी ॥
चंद सूर तारागण नाही । नहीं तहैं दिवस रैनकी छाहीं ॥
ज्ञान ध्यानको तहां न लेषा । पाप पुण्य तहवां नहीं देषा ॥
डार मूल तहां वृक्ष न छाया । जीव सीव तहांकालन काया ॥
पवन न पानी पुरुष न नारी । हृद अनहृद तहां नहीं विचारी ॥
यंत्र मंत्र तहां दरद न धोखा । नर्क स्वर्ग संशय नहिं शोका ॥
श्वेत पीत सबज नहीं लाला । मोर सोर नहीं वृद्ध ना बाला ॥
पिंड ब्रह्मांडको तहां न लेखा । लोक अलोक तहां नहीं देखा ॥
मन औ वृद्ध पवन नहीं जाना । रचना बाहिरसो अस्थाना ॥
आदि पुरुषको है तहां थाना । यह चरित्र एकौ नहीं जाना ॥
हे सुकृत मैं तुम्है लखावा । निरगुणरूप वर्ण दर्शावा ॥
सुकृत वचन
हो सतगुरु तुम आगम भाषा । वर्णैउ पेड़ पत्र अरु शाखा ॥
अब तुम कहो पुरुषको रूप । कैसी कला हे कौन स्वरूपा ॥
लोक प्रकाशको भेद बतावो । लोक प्रमान मोहि समुझावो ॥
यामैं कछु न राखो गोई । है समर्थ अब भाषो सोई ॥
सार्वी—आदि पुरुषके रूपको, कहो भेद समुझाय ।
लोक प्रमान मरजाद सब सो मोहि देहु बताय ॥
योगजीत वचन—चौपाई
प्रथम पुरुषको रूप बखानो । सो तुम रूप हृदयमें आनो ॥
पुर्षअंग छबि वर्ण सुनाई । गुप्त भेद मैं तोहि लखाई ॥
पुरुष शोभा अगम अपारा । ताको को अब बरणे पारा ॥
कोट अनन्त योजन लौ काया । कहाँ लग कहों तासुकी छाया ॥
( २०६ )
बोधसागर
कछु संक्षेप मैं देऊँ बताईं । कहाँ कहीं कछु वर्णि न जाईं ॥
कोटि कल्प युगजाय सिराईं । मुख अनन्तसो वर्णि न जाईं ॥
ये कछु सूक्ष्म रूप लखाऊँ । कछु कछु शोभा वर्णि सुनाऊँ ॥
अब मस्तकको बणों भेषा । मानों अनंत भानु शशिलेखा ॥
जगर मगर मस्तक उजियारा । वर्णत बने न रूप अपारा ॥
अब नेत्रनको कहीं प्रमाना । मानो अनन्त भान शशि जाना ॥
जिमि कोटिन दामिन लपटानी । जोत अनंतनकी जिमि खानी ॥
वर्णत बने न ताको रंगा । कहाँलग कहीं तास प्रसंगा ॥
नासारूप कहीं प्रचंडा । मानो अन्न अनन्त ब्रह्मंडा ॥
पोहप बास तहांति प्रकटाईं । ब्राण अनंत योजन लग जाईं ॥
श्रवणरूप मैं कहीं बखानी । अनंत सिंध मानो समानी ॥
ता मह कमल अनन्तन फूला । साखा पत्र डार नहीं मूला ॥
ताको शोभा वर्णि न जाईं । कमल रूप तहां अधिक सुहाईं ॥
अब मुख शोभा कहीं बखानी । पिंड ब्रह्मांड तेहिमाहिसमानी ॥
नौ शून्य जहां लग बासा । सो मुख भीतर कीन्ह निवासा ॥
लोक अनंत देखिये ताही । सर्वाकार रूप है जाही ॥
पुर्ररूपका बणों भाईं । वर्णत बने न होय दिठाईं ॥
पुरुष शोभा अगम अपारा । मुख अनंत नहीं पावे पारा ॥
चिकुर शोभा कहीं बुझाईं । कोटिन रवि शशि रोम लजाईं ॥
कोटिन चंद सूर प्रकाशा । एक एक रोम अनन्तन भासा ॥
पुरुष अंगका करौ बखाना । रचना कोट तासुमों जाना ॥
श्वेत अकार पुरुषको अंगा । फटकबर्ण देहीको रंगा ॥
शब्द स्वरूप पुरुष है भाईं । वणों कहा वर्ण नहीं जाईं ॥
जहां लग जीव बुन्द है भाईं । ताकर भेद कहीं समुझाईं ॥
जीव अनन्त बुन्द सम जानो । अमी सिन्धु पुरुष पहिचानो ॥
पञ्चसुत्रा
( २०७ )
यह प्रमान पुर्षको जाना । सो अब तनमों कहों बखाना ॥
सूक्षिम रूप गगनमों वासा । ताहि रूपको कहों प्रकासा ॥
तनभोरूप जो सूक्षिम जानो । सोई रूप बाहिर पहिचानो ॥
जो भीतर सो बाहिर कहिये । एकप्रमाण रूपसो लहिये ॥
साखी-बारूके दशअंश कर, ताकर बिस्वा बीश ।
ताहूते सूक्षिम कहो, इम प्रकटो जगदीश ॥
लोक समानो पुर्षमो, पुर्षहि लोक समान ।
पुर्ष निरंतर लोक है, लोक पुर्षमो जान ॥
सुक्ति वचन-चौपाई
हो समर्थ मैं तुव बलिहारी । सर्व भेद तुम कही विचारी ॥
अब प्रभु कहो ध्यानको लेखा । जेहिते रूपहि पुर्षको देखा ॥
ताको नाम मंत्र उपदेसा । सो सत्गुरु अब कहो सँदेसा ॥
सोई मंत्र गुरु देहु बताई । जाके बल हँसा घर जाई ॥
करनी योगकी रहनी आशा । हँसा करे लोकमों वासा ॥
सोई नाम गुरु देहु बताई । मेरो हंस लेहु मुक्ताई ॥
और रहनी हँसनकी भाखो । मोसों गोय कछू जनि राखो ॥
कौन नेहते हँस कहाई । कौन नेहते लोक समाई ॥
योगजीत वचन
सुक्ति सुनो सत्य मम बानी । जैसी रहन हंस पहिचानी ॥
तास रहन अब वर्ण सुनाऊँ । नेह प्रेमकी उक्त लखाऊँ ॥
जैसे सीप स्वात करे नेहा । लागी प्रीत भूल निज देहा ॥
जैसे त्रिया पुर्षको चाहै । या विधि संत ध्यान औगाहै ॥
जैसे चात्रिक बुंद पुकारा । सोई लगन संत अधिकारा ॥
जैसे बासको भँवर लोभाई । योजन एक तहां उड़ जाई ॥
जैसे चंद चकोर हुलासा । ऐसे संत पुर्षको आसा ॥
( २०८ )
त्रोधसागर
जैसे लोहा चुंबक लग जाई । तैसे संत ध्यान लपटाई ॥
जैसे कनिका कपूरको धावै । ऐसे प्रीत संत लवलवावै ॥
जैसे पतंग दीपकको धावै । ऐसे संत ध्यान लपटावै ॥
जैसे नेह बारि औ मीना । ऐसे संत नाम लवलौना ॥
जैसे बाल बहिन महतारी । ऐसे लगन तहां संत विचारी ॥
ऐसे प्रीत करे जो कोई । सत्यपुर्णको पावै सोई ॥
ऐसे प्रीत गगन मन लावै । गुरुप्रतापते दर्शन पावै ॥
और रहन मैं देऊँ बताई । जाते बेग पुर्ण दर्शाई ॥
आपामेट आप दर्शाई । प्रेमसिंधुमें जाइ समाई ॥
बिरहरूप करुणा अधिकारी । लागी ज्वाल निरन्तर भारी ॥
जगसों नेह झूठ करजाना । मनसो सब जग मिथ्या माना ॥
साखी-मनसों त्यागे जत्तको, जान विषयकी खान ।
सुकित अब मैं भाषेऊँ, राजस योग प्रमान ॥
कायासों कारज करे, सकल काजकी रीत ।
कर्म भय सब मेटके, सत्त नामसों प्रीत ॥
अब सुन ब्रह्म ज्ञानकी वानी । ताकर रीति लेहु पहिचानी ॥
एके ब्रह्म सकल घट देखा । ऊँच नीच काहु नहिं पेखा ॥
शत्रु मित्र एक कर जानै । पाप पुण्यको भेद न आनै ॥
करै कर्म पुरुष परिवारे । अपनो करतब मन नहिं धारे ॥
सब कछु करे पुर्ण रे भाई । अपनो शीस ना भार चढाई ॥
सुख औ दुःख एककर जाने । इनको भाव मिथ्यापहिचाने ॥
झूठ वचन नहिं जीव सतावै । दया भाव सबही सो लावै ॥
इंद्रीस्वाद स्वप्न कर जाने । रूप कुरूप नाम मनो आनै ॥
वाद विवाद न जाने प्राणी । हार जीत एक समय पहिचानी ॥
उत्तम मध्यम मर्म न जाने । कर्तारूप सकल पहिचानै ॥
पञ्चसुन्दरी
( २०५ )
जात वर्ण नाहीं कछु मानै । चार अंग एक दृष्टि समानै ॥
जहां लग दृष्टिपरे जो कोई । इच्छा पुर्ष जानिये सोई ॥
सोवत जागत लखे अकारा । तहांलग कर्तारूप निहाग ॥
वारखान धरती असमाना । सो सब कर्ता माहि समाना ॥
जलथल ससदीप नौखण्डा । लोक अलोक सकल ब्रह्मण्डा ॥
गुप्तप्रकट जहांलग आकारा । सो सब कर्ता बीच निहारा ॥
भिन्नभाव कछु दृष्टि न आवै । सोई ब्रह्म ज्ञान कहलावै ॥
साखी-कर्तारूप विचारिये, जहांलग सकल अकार ।
इच्छा द्वैत विनास होय, रहो एक करतार ॥
प्रथमहि अविगत ब्रह्म है, तिनते ब्रह्म अनेक ।
सकल बुंद सिंधुहि मिलै, बहुर एकको एक ॥
द्वैत रूपको ध्यानमो, कारज लहे न कोय ।
आदि पुर्ष चीन्हे बिना, मुक्त कौन विध होय ॥
सुकित सुनौ सुजान, अक्षे नाम चीन्हे बिना ।
यमघर करे पयान, युगनयुगन भर्मत फिरे ॥
तैतिस कोट बखाना, सकल देव अब भाषिया ।
तिनमों तीन प्रमान, जीव सकल विस्तार है ॥
युगप्रति तन धरधर मरे, मायाको व्यवहार ।
अंतकाल सबको भषे, इनते पुर्ष निनार ॥
आदि पुर्ष बैठे जहां, अविगतरूप अनाद ।
रचनाते बाहिर रहै, तिनको भेद अगाध ॥
महाविष्णु गोलोकके, और अर्चित बखान ।
राा ममा जोत मह, ताको करे प्रवान ॥
पिंडमहीं ब्रह्मंड औ, नहीं लोक आकार ।
अनंत लोकते भिन्न है, सुकित करो विचार ॥
( २१० )
बोधसागर
निरगुण मो मन लीन रहु, करे जीव गतनाश ।
बहुर काल बश ना परे; अजर अमाघर बास ॥
जिन संतनको यह मता, बरनत बने न मोहि ।
तिन पटतर का दीजिये, कहि समुझाऊं तोहि ॥
संतकोट वारो जहाँ, ज्ञानी लक्ष अनेक ।
जो निरगुनमें रत सदा, सो अनंतमें एक ॥
सुक्ति बचन--चौपाई
हो समर्थ मैं तुव बलिहारी । संतन महिमा कहो विचारी ॥
संतरूप कैसे पहिचानी । महिमा तासु कौन विधि जानी ॥
कैसे भेद तासको पावै । कैसे परम संत बस आवै ॥
और संत एक देहु बताई । तुमको आहु कहाँते आई ॥
योगजीत बचन
हो सुक्ति मैं कहों बखाना । तुमसों भेद कहों निर्बाना ॥
अपनी उत्पत्त देहु बताई । तुम्है भेद कछु नाहे दुराई ॥
आदि भेद अब कहों बुझाई । तुम सुक्ति सुनियो चितलाई ॥
प्रथमहि पुर्ष आप निबाना । तब नहि रचना अश बखाना ॥
जबै पुर्ष मन इच्छा आई । षोडश अंश तबै उपजाई ॥
चौदह सुत तहाँ रहे छिपाई । तिनको भेद कोई नहीं पाई ॥
सक्त निरंजन तब उपराजा । जिन सब कियो मृष्टिको साजा ॥
तिनसों त्रिगुनरूप प्रकटाया । जिनसों भई सबनकी काया ॥
तिन पुन चारों वेद बखाना । तामें जीव सबे लपटाना ॥
चारखान तब प्रकट कीन्हा । तेहिमें फाँस जक्त सब लीन्हा ॥
फिर पुत चउदह यम उपराजा । तब चौरासी कीन्ह समाजा ॥
तीरथ व्रत औ नेम अचारा । दान पुण्य जप मंत्र विचारा ॥
इतना करे जगतमें कोई । यमकी त्रास न छूटे सोई ॥
पञ्चमुद्रा
( २११ )
यामह सकल जीव उरझाई । अंतकाल पुन धरधर खाई ॥
स्वर्गलोकमह जो चले गयेऊ । तेतो आके देह फिर धरेऊ ॥
तेहुना यमकी छूटे त्रासा । भांत अनेक जीवनको फाँसा ॥
जबै पुर्ष अस देखेउ भावा । सत्तपुर्ष एक रुयाल बनावा ॥
सत्तपुर्ष इच्छा उपजाई । पुहुप नाम तब अंश बनाई ॥
तिन्है पुर्ष अस आहा कीन्हा । भौसागरको आयसु दीन्हा ॥
साखी-पोहोप नाम तबही चले, पुर्षहि शीस नवाय ।
भौसागरमों प्रकटभो, अबिगत रूपबनाय ॥
चौराई
अबिगतरूप छांड हम दीन्हा । संत स्वरूप भेष गहि लीन्हा ॥
शब्दस्वरूप बनाये सोई । तिनकी देहन छाया होई ॥
पाँच तत्त्व तीनोंगुन नाही । धरी देह तब बसत युगमाहीं ॥
सत्तनाम हम नाम धरावा । सब जीवनको संध लखावा ॥
या विध अजदेह धर लीन्हा । सबको आय सिखावन दीन्हा ॥
तब पुन जगमों संध लखाई । निरगुन मता सबै समुझाई ॥
जो जिव संध शब्दकी पाई । जीव असंखन लोक पठाई ॥
प्रथमहि सतयुगमैं हम आये । सत्त नाम तब नाम धराये ॥
तब हम जीव असंखन तारे । यमको मार तब जीव उबारे ॥
त्रेतामाहि बहुर हम आये । मुनिकह बोध मुनींद्र कहाये ॥
कोटिन जीवको संध लखाये । एतिक जीवको तब मुक्ताये ॥
तीजे फिर द्वापरयुग आई । मुनि करुनामे नाम धराई ॥
कोटिन जीव तबै हम तारे । महाकालते जीव उबारे ॥
फिर कलियुगको आयेउ भाई । योग जीत तब नाम धराई ॥
कालहिं जीत हंस मुक्ताये । सत्य शब्दकी संध लखाये ॥
जीव असंखन तारेउं आई । सत्तपुर्षकी दर्श कराई ॥