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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

मुक्तिबोध (पंचदश तरंग)

सत्यपुरुषाय नमः

अथ श्रीबोधसागरे

पञ्चदशस्तरंगः

श्रीग्रन्थ मुक्तिबोध

★

सद्गुरु वचन-चौपाई

ये गुरु गम संशय करलेखो । प्रगटे ज्ञान तब वस्तु परेखो ॥
अनुभव आदिकुछ कहों बखानी । सुनिये सन्त गुरु गमबानी ॥
अनंत कोट जुग आगे चलगयेऊ । अचल अमानताहि पुनिरहेऊ ॥
साठ कोट जुग औरो बीता । सृष्टि रचनाकी इच्छा कीता ॥
वह तो अचल पुरुष है अन्ता । बिन गुरुदया न भेट भगवंता ॥
कोट कथे कथनी नहि पावा । जबलग गुरुगम नहीं बतावा ॥
सारखी पद हैं कोटन वाणी । पुरुष एककहैं सुमरो प्रानी ॥
ज्ञान सुरत औ शब्द उच्चार । यह सब दीन्ह कीन्ह संसारा ॥
अचल पुरुष को सुमिरे कोई । जीवत मुक्ति सन्तकी होई ॥
सारखी पद बोले बहु बानी । आदि नामको बिरला जानी ॥
आदि नामका भेद निनारा । त्रिना सतगुरु बूड़े संसारा ॥
सोइ जाने जाको बड़ ज्ञाना । गुप्त मता तिनहीं पहिचाना ॥

सारखी-आदि नाम निज सार है, बूझि लेहु हो हंस ।

जिन जानो निज नाम को, अमर भये ते वंश ॥

आदिनाम निजमन्त्र है, और मन्त्र सब छार ।

कहे कबीर निज नाम बिन, बूड़ मरा संसार ॥

( ६४ )

मुक्तिबोध

आदिनाम कहैं खोजहु प्राणी । जाते होय मुक्ति सहिदानी ॥
मूलमन्त्र मन्त्रन महि साचा । जोगहि जलेसोनगरहि पहुँचा ॥
आदि नाम जेहि खाजत भेटा । जरा मरन को संशय भेटा ॥
आदि नाम निःअक्षर साँचा । जाते जीव काल सों बाचा ॥
निःअक्षर धुन जहवाँ होई । ताहि जपे नर बिरला कोई ॥
जाके बल आवे संसारा । ताहि जपे नर हो भव पारा ॥
गुप्त नाम गुरु बिन नहि पावे । पूरा गुरु हो सोइ लखावे ॥
सार मन्त्र लखे जो कोई । विषधर मंडवा निर्मल होई ॥
आदि नाम मुक्तामणि साँचा । जो सुमरे जिव सबसाँ बाचा ॥
आदि नाम निज सार है भाई । जमराजा तेहि निकट न आई ॥
जब लग गुप्त जाप नहि जाने । तबलग काल हटा नहि माने ॥
गुप्त जाप ध्वनि जहँवाँ होई । जो जन जाने बिरला कोई ॥
गुप्त मता लै पुरुषहि चीन्हा । जबते गुरु मोहिं दिशा दीन्हा ॥
तात वरण प्रभु वरण विहीना । सकल मनुष्यनगर नहि चीना ॥
मूल मन्त्र जेहि पुरुषके पास । सोई जनको खोज ले दासा ॥
मूल मन्त्र है ओ सब साखा । कहैं कबीर मैं निजके भाखा ॥
लिखो न जाय कहै को पारा । हैं अक्षर में जो पावै निरबारा ॥
लिखो न जाय लिखामें नाहीं । गुरु बिन भेट न होवे ताहीं ॥

साखी-प्रीति विना नहि पाइये, जो नहि सुतं समान ।
पुरुष दीप तब पावइ, जबहीं तजै अभिमान ॥

चौपाई

परम पुरुषसों भेट न भयऊ । विन गुरु दयाप्रगटना कहेऊ ॥
धर्मदास मैं कहां समुझाई । निर्गुण भेद कोइ बिरले पाई ॥
तुम तो जीव पर बोधो जाई । जमराजा परपंच लगाई ॥

बोधसागर

( ६५ )

जीवहिं राखे फन्द फँदाईं । शब्दबान मईं मारो जाईं ॥
शब्द बान मैं तुम कहैं दीन्हा । जीवको देहु सुक्तिको चीन्हा ॥
नाम पान सों ईस बचाही । शब्द सुतं लै जुग बन्धाही ॥
जुग बांधे मारे नहीं कोई । लाख जतन चतुरा जो होई ॥
सबको मूल ताहि गहि लीजे । सुरत सम्हार ताहि चित दीजे॥
डार पत्रको जो कोई धरई । बिना मूल सो जीवन तरई ॥
गुप्त मता जो पकरे भारा । आप तरे औरन को तारा ॥
करे विवेक ताहि ठहराई । सोइ पुरुष को पावे भाई ॥
ताहि सन्त थापों परणाली । सदा भरों राखो नहीं खाली ॥
जो प्राणी लीजे ठहराई । हंसराज ते करी है भाई ॥
साखी पद बोलै सब कोई । बिन परिचये सुक्ति नहीं होई ॥
अगम अगोचर गत व्यौहारा । गहौं ताहि उत्तरी भव पारा ॥
यहि धन राख जीवनको जाई । कर बनी जी कहु टूट न आई ॥
यह पूजा है अगम अपारा । खर्चहु खाहु बहु बड़े विस्तारा॥
यह धन मिले भाग बहु केरा । जब धन सोच गाहक बहुतेरा ॥

साखी

पूजी मेरे नाम है, जाते सदा निहाल ।
कहै कबीर मैं पुरुष बल, चोरी करे न काल ॥

चौपाई

जो जिव है निज नाम समाना । भये सुक्त जो लोक सिधाना ॥
सोई हंस का तुम सत लेखो । अक्षर माहिं निरक्षर विवेको ॥

धर्मदास वचन

कहैं धर्मदास सन्त के दासा । गुरु मेटो मेरो जमको त्रासा ॥
नाम निःअक्षर कहो उतपानी । आपै तैं कैसे के जानी ॥

( ६६ )

मुक्तिबोध

सद्गुरुवचन

कहैं कबीर धर्मदास सुजानी । अकह हतो ताही कहो बखानी॥
जब नहिं लोक दीप विस्तारा । तब नहिं सुकृति करी संसारा॥
तब नहिं धरती अमर सुमेरु । तब नहिं हतो अमल औकुबेरु॥
तब नहिं सृष्टि सकल पसारा । आप अकह तब हता निनारा ॥
सकल सृष्टि उत्पन कछु नाहीं । तब सब उत्पन कहा सब नाहीं॥
हते आप तब शब्दहिं स्वाला । इच्छा भये कीन्हे उजियाला ॥
इच्छा ते अनहद ध्वनि बानी । सुरत संभार सृष्टि उत्पानी ॥
सुरत भीर तेहि माहिं समानी । इच्छा तैं अनुभव उत्पानी ॥
तब ते अक्षर भेद निनारा । साखी पद कीन्हा निरवारा ॥
अकह अचल पुरुषहिं तहां आपू । नहिं दुख सुख नहीं सन्तापू ॥
सबका मूल ताहिं सों लागी । उलट समय सोई बड़ भागी ॥
साखी-कहैं कबीर जो शब्द लखि, रहैं सुतैं लौलीन ।
कबीरा सुतैंके समय, निश्चय लोकको चीन ॥
जाके चित अनुराग है, ज्ञान मिले नर सोय ।
बिन अनुराग न पावई, कोट करे जो कोय ॥

चौपाई

सत्य शब्द जो आवे हाथा । सकलो काल नवावे माथा ॥
साखी-काल खड़ा सिर ऊपरे, काल नजर नहिं आय ।
कहैं कबीर बल आपने, जम से जीव छुड़ाय ॥

चौपाई

नाम अमर मल्यागिर भाई । पीवत विष अमृत हो जाई ॥
निशि दिन रहे मल्यागिर संगा । विश न लगे सो तिनके अंगा ॥
साखी-काल फिरे शिर ऊपरे, हाथों धरे कमान ।
कहे कबीर गहु नामको, छोड़ सकल अमान ॥

बोधसागर

( ६७ )

चौपाई

नर नारी जो गर्भहि धरहीं । नाम विना पुन नकँहि परहीं ॥
सुनो संत हौ शब्द रसाला । गहो ताहि जो हो उजियाला ॥
जाके जिव निज नाम समाना । ता कहँ काल अमर कर जाना ॥
विनती कर पूछे धर्मदासू । दोह कर जोर रहें गुरु पासू ॥
सतगुरु कहैं सुनो धर्मदासा । शब्द बान लेव हमरे पास ॥
मैं गुरु भयो शब्द मोर हाथा । सब घटवाह नवावें माथा ॥
साखी-भाग बड़े तेहि जीवके, आय मिले मो संग ।
पुरुष मिले वहि बाँह धर, सुख विलासे एक ॥

चौपाई

जब हम रहे पुरुष के माहीं । काहि कहों कोड दूसरे नाहीं ॥
कहे कबीर सुनो धर्मदासा । होय निःशंक मेटा जमत्रासा ॥
मेटो भर्म होय निःशंका । काय गढ़ जीत बजावे डंका ॥
भयो प्रकाश गुरु भेद बतावा । जीव बोध सतलोक पठावा ॥

साखी-जमराजा बड़ दारुण, महा विकट ब्रह्मंड ।

ताके डंका सुनत ही, भय माने नव खंड ॥

नाम खज्र दृढ़ राखहु, गहो, सुर्त सम्हार ।

काल सो जीव उबारिके, पठवहु भव जलपार ॥

चौपाई

जबते अजर पुरुषको चीन्हा । तबसों काल भये बल हीना ॥

साखी-यहाँ वहाँ कहि जीव छुड़ाये, काल रहे सिर साँध ।

सुर्तसमावे चेतन चौँकी, रहे न जमके बांध ॥

आदि नाम तेहि पुरुषके, सुनत तजहि अभिमान ।

कहे कबीर सुनो हो संतो, तजो नरककी खान ॥

( ६८ )

मुक्तिबोध

चौपाई

कासों कहों कहा नहीं जाई । मेरी गत मत बूझ न पाई ॥
हमहिं दास दासन के दासा । अगम अगोचर हमरे पास ॥
यहां वहां यदि दोनों ठाऊँ । सत्य कबीर कलिमें मोर नाऊँ ॥
जो न हते हमहीं पुन सोई । नाम विना भूले नर लोई ॥
साखी-कोटि जाय संसारमें, ताको मुक्त न होय ।
आदि नाम है मुक्तका, जाने बिरला कोय ॥

चौपाई

गुप्त जाप है अगम अपारा । ताहि जपै नर उत्तरे पारा ॥
मुक्ति न होवे नाचे गाये । मुक्ति न होई मृदंग बजाये ॥
मुक्ति न हो साखी पद बोले । मुक्ति न हो तीरथके डोले ॥
गुप्त जाप जाने जब कोई । कहे कबीर मुक्ति भल होई ॥
संत सुभाग गुरु दायी कीन्ह। आदि नाम हंसनको दीन्ह ॥
साखी-सोई नाम संसार में, उदित अमोल अपार ।
ताहि नाम विन मुक्ति नहीं, बूझि मुआ संसार ॥

चौपाई

कथा कीर्ति कई गदगद बानी । मुक्ति न होय विना सहिदानी ॥
केता कहो कहा नहीं जाई । नाम गहेसो पुरुष मिल जाई ॥
सार शब्द परवाना देहै । जीव जुडाय काल सो लेहै ॥
साखी-फनपति बीरन देखके, राखे बनहिं सकोर ।
बीरा देखे नामके, काल रहे सुख मोर ॥

चौपाई

सोहं शब्द निरक्षर वासा । ताहि भिन्न कर जपिये दासा ॥
साखी-जो जन हैहै जौहरी, सो धन लेहै गाय ।
सोहं जाप सब जगतए, मिथ्या जन्म गमाय ॥

बोधसागर

( ६९ )

साखी पद संसार में, कहन सुननको कीन ।
चीठी आई पुरुष की, सो धन लैहो चीन ॥
जो जन हूहै जौहरी, तो कहनेका जोग ।
बिन सतगुरु ना पावई, भटक सुये सब लोग ॥

चौपाई

जब बानी मुख बाहर आवा । भाग बड़े तिनही पुनि पावा ॥
कोट जतनकै जीव ससुझावा । बिना भागते नाम न पावा ॥
गुरु गम लहैं सन्तके पास । सो नहिं परें कालके फांसा ॥
जो कहैं पुरुष अपन कर जाना । सोई भक्त अन्तर्गत ठाना ॥

धर्मदास वचन

धरमदास कहैं कर जोरी । बंदी छोड़ बिनती सुन मोरी ॥
तब साहब अस बोले बाती । लेउँ छुड़ाय राखों निजसाती ॥
तुमको दीन्हौं भक्ति अपारा । नाम जपो तुम अजर हमारा ॥
जो ना बूझे कहा न करई । मुक्ति न होय नरकमें परई ॥
श्रवण माह कहैं दीन्हैं भाई । तौ न विवेकै आ बैठाई ॥
नाम सुने मोर मो कहैं पावैं । जाम जालिम तेहि देख डरावैं ॥

साखी-सब कहैं नाम सुनावहू, जो आवे तुव पास ।

शब्द हमारा सत कहत हों, दृढ़ मानो विश्वास ॥

चौपाई

जो जन गृह तजि ले वैरागी । जहां जाय तहां संगे लागी ॥

साखी-मूल के कान जो लागे, रहे रहन ठहराय ।

वह साधू भर्मै नहीं, सो नहिं नरकै जाय ॥

कहै कबीर तज भर्म पिटारी, नान्ह होयके पीव ।

तज अभिमान गहो गुरुचरण, जमसों वाचे जीव ॥

( ७० )

मुक्तिबोध

चौपाई

आदि नाम निःअक्षर नीरा । तौन नाम लै जीवहि तीरा ॥
आदि नाम लै पंच चलाई । सोइ सन्त प्रमान कहाई ॥
थापो ताहिं दऊं ठकुराई । जबलग रहही मोर दोहाई ॥
गहिमोर नाम मोहिमाहिं समावे । और नामते मोहि न पावे ॥
सोई नाम सन्तन सहिदानी । आप मिलै लेवै पाहिंचानी ॥
उदितनाम निरभय उजियारा । ताहि नाम सो जीव उबारा ॥
कहैं धर्मदास सतगुरु सुनलीजे । अगम पंथ को कैसे दीजे ॥

सद्गुरु वचन

कहैं कबीर पूछेउ भल आई । अगम पन्थगम कहौं बुझाई ॥
अगम पन्थ है विकट विकारा । तासों कबहुँ न होवे पारा ॥
शीतल शब्द लेहिं सहिदानी । उत्तर जाहि कछु शंक न मानी ॥
जाय मिले पुरुषाहिं के पाहीं । जेतिक जीव तुम्हारे बाहीं ॥

धर्मदास वचन

अनहद शब्द बहुत विस्तारा । कैसे पैहैं भेद तुम्हारा ॥

सद्गुरु वचन

आदि नाम पुन तहवाँ होई । नो धत बूझे बिरला कोई ॥
सुरत परम होवे गलताना । ताको मिले निजपद निर्वाना ॥
सुरत बांध जब गुरुहिं समावे । वस्तु अगोचर तबहिं पावे ॥
तज अभिमान मिले जब आई । ताको दीजे ऐन दिढाई ॥
सब तज रहै रहन ठहराई । औ छांड़े सब लोक बड़ाई ॥
ताको दीजे वस्तु अपारा । कहैं कबीर सुन शब्द हमारा ॥
गलत गरीब रहनसे भारै । तन मन धन सन्तनपर वारै ॥
लोक लाज कुल तजे बड़ाई । तब पग परस भर्म मिटजाई ॥
विन विश्वास भक्ति परकाशा । प्रीति बिना नाहिं दुविधा नाशा ॥

बोधसागर

( ७१ )

गुरु से शिष्य करे चतुराई । सेवा हीन नरकमें जाई ॥
संतन वारे तन मन धामा । सोई संत मरे मम नामा ॥
साखी-होय विवेक शब्दके, जाल मिले परवार ।
नाम गहे सो पहुँच है, मानो कहा हमार ॥

चौपाई

नाम उदित सो संत पियारा । मारों काल होय जर छारा ॥
जिन जिन नाम सुने हैं काना । नर्क न परे होय सुक्ति निदाना ॥
आदिनाम जेहि श्रवणन नाहीं । निश्चयसो जिव जम घर खाहीं ॥
सुमरौ पुरुष काल डर कंपा । भौमाने नाहीं सिर चंपा ॥
नाम निरक्षर सुधि जब पावा । काल अपर्बल निकट न आवा ॥

साखी-आदि नाम हैं पारस, मन हैं मैला लोह ।
पारस परस उजियार भये, छूटे बंधन मोह ॥

चौपाई

कहैं लग कहौं कहन नहीं पारा । नाम गहे सो संत हमारा ॥
आदि नाम जस सार के गौसी । लागे बान ठाव रहै वैसी ॥

साखी-सतगुरु मारे बान भर, डोले नहीं शरीर ।
का चाबुक वह कर सके, सुख लागे वह तीर ॥
गौसी लागे सुख भये, मरे न जीवे कोय ।
कहें कबीर अमर सो प्राणी, जो नहीं मृतक होय ॥

चौपाई

लागे जहाँ वस्तु सो पावा । विन लागे को भेद बतावा ॥
नाम अमर रस चाखें कोई । ताको जरा मरन नहीं होई ॥
अक्षर गुप्त सोई मैं भाषा । और शब्द स्वाल अभिलाषा ॥
साठ सुन्नके सुने जो भेऊ । यह गति जाने बिरला केऊ ॥
पाताल सुन्न है बारह खंडा । बारह सुन्न कहौं ब्रह्मंडा ॥

( ७२ )

मुक्तिबोध

बारह सुन्न आकाश बताईं । बारह सुन्न पुरुष के ठाईं ॥
बारह सुन्न कहो अनुमाना । कहैं कबीर गुरुसे हम जाना ॥
सारखी-अकह मूल सब सुन्नके, सुन्न सकल ब्रह्मंड ।
तहवां से बस्ती भई, सात द्वीप नव खंड ॥

चौपाई

चार पदारथ एक पथ माहीं । बिन गुरु नर कहैं बूझे नाहीं ॥
अदेख देखे कथा जो कथई । आप परस दोऊ ता मथई ॥
कथनी कथे प्रतीत हदाईं । मथनी शब्द अभय पद पाईं ॥
जब देखे औरै नहिं माने । तज पाखंड सत्यको जाने ॥
तहां संत को लैं जमरावे । जाके जीवसहिदानी पावे ॥
सो जाने पुन हमार ठिकाना । ता कहैं दीजे निज सहिदाना ॥
नाम अमर रस मनुवा पागे । होय लौलीन तहां सो लागे ॥
गहि पकरे नर सुर्तकी डोरी । तासों काल करे नहिं चोरी ॥
हठ के मनवां आदि जो थीरा । कहैं कबीर सो सांच फकीरा ॥
सत्य समोय झूठ परहरई । दाग न लागे सत्य सो तरईं ॥
जाकहैं गुरु आपन कर लीन्हा । नाम नेति हंसनको दीन्हा ॥
जे तन गुरुके नाम समाना । भक्ति हेत सोई सब जाना ॥
जबलग भक्ति अंग नहिंआवा । सार शब्द कैसे के पावा ॥
सत्य नाम श्रवणन में वोषे । ज्यों माता बालक कहैं पोषे ॥
जहां गुरु भक्त तहां लौ लावे । सुने जु वाह मुक्तिगत पावे ॥

सारखी-सुर्तसमानी नाम है, जगमें रहे उदास ।

कहैं कबीर निज नामही, हठ राखे विश्वास ॥

चौपाई

जाके उर विश्वास न आवे । भक्ति अंग सो कैसे पावे ॥
सुरत हठाय निसदिन तहैं जागे । मुक्त होय कछु बार न लागे ॥

बोधसागर

( ७३ )

चढ़ी निशंक मन मगन रहा था । सो नहिं करै कालके हाथा ॥
जो जिव माया सों लौ लावा । गहे काल मुख बात न आवा ॥
सोई सन्त समाधी मारी । जाके जीव सहिदानी डारी ॥
साखी-गुरुके शब्द साधुकी पूँजी, बणिज जाने जो कोय ।
कहें कबीर तो बड़े सवाई, हानि न कबहुँ होय ॥

चौपाई

जबलग सार नाम नहिं आवे । तबलग प्राणिमुक्ति ना पावे ॥
सार नाम बिन सौपके मोती । उपजे बहुत बिना हर खेती ॥
साखी-येहि विधि करे किसानी, पोता तल बल होय ।
भक्त मिले कोइ वीरला, दाम देय सब कोय ॥
मूलहा मोर नाम हैं, दरगाहे गुरु मान ।
सब सन्तोसों लिये फकीरी, डार सकल अभिमान ॥

चौपाई

आदि नाम जे संतनमाहीं । जमका करे निशंक डरनाहीं ॥
आदि नाम है अक्षर माहीं । गुरु विन नर्क पुन छूटे नाहीं ॥
सोहं मैं निः अक्षर रहाही । विन गुरुके कौन देह लखाई ॥
चीन्हे परे आवे विश्वासा । लोक वेदकी छूटे आसा ॥
चीन्हे आदि निः अक्षर वानी । छूटे भर्म होय ब्रह्म ज्ञानी ॥
कहें कबीर सन्त सोइ भागी । जाके सुर्त निरंतर लागी ॥
नाम चिन्ह पै कहों पुकारी । नातर बूड़े गैल मझधारी ॥
कहों शब्द मानो नर लोई । आदि नाम बिनमुक्ति नहोई ॥
गुरुके कहे मैं कहों संदेश । नाम लेवे सो पहुँचे देशा ॥
गुरुके शब्द जो माने नाहीं । मुक्ति न हो बूड़े भवमाहीं ॥
साखी-जम आसे बल बांधे, कहों पुकार पुकार ।
गुरुकी त्रास न होती तो, खाते उनको फार ॥

( ७४ )

मुक्तिबोध

चौपाई

जाको होय गुरुको विश्वासा । निश्चय जाय पुरुषके पास ॥
नर प्राणी कीजे इतबारा । गुरुके कहे मैं करें पुकारा ॥
कहे कबीर मिलन बिन आशा । मिलन भये भेटे विश्वासा ॥
निशिदिनरहे निजनामसमाना । तब जाने भजनी परवाना ॥
यह सब कहों परमारथ काजा । यही पाखंड नर अरुझेबाजा ॥
अक्षर आदि निजनाम सुनाऊँ । जरा मरनके भर्म मिटाऊँ ॥
सोहं के संग आये संसारा । सो गुरु दीजे मोहिं उपचारा ॥
ताको भर्म जान जो पावा । सो साधू जगमें नहिं आवा ॥
साखी-यह अवसर नहिं पावहीं, पलमें लेहु उबार ।
भवसागर तर जायंगे, क्षणमें लेहि उबार ॥

चौपाई

गुप्त मता पावे जो कोई । गेही तज वैरागी होई ॥
अकह वस्तु तब निज के पाई । तब पाखण्ड कछू नहिं आई ॥
अजर पुरुषको खोजहु प्राणी । कहे कबीर कोई सन्तसमानी ॥
आदि नाम सो सुरत समावे । निरभय मुक्ति अमरपद पावे ॥
गुरुके शब्द जीव हृद करई । सोई सन्त भवसागर तरई ॥
मनके सुख बूझे भर्म फांसा । बुझ जाय न हो सुख बासा ॥
सुरत सम्हार कहत हम तोहीं । पीछे दोष न आवे मोहीं ॥
आदि नाम जो अमीरस चाखे । पांच पचीस बांधके राखे ॥
साखी-प्रेम पन्थ जे पगु धरे, देत न शीश डराय ।
सपने मोह न व्यापे, ताको जन्म नसाय ॥

चौपाई

तन मन धन सन्तन परवारा । सोई सन्त निज हितू हमारा ॥
का कहैं अमर भरी मैं देऊँ । तेहि सन्तनको निकट बोलाऊँ ॥

बोधसागर

( ७६ )

सोइ संत सतगुरु सुखदासा । अजरपुरुषजहांअजरप्रकाशा॥
अनन्तकोटजाकोपार न पावे । को अस दूसरे गुरु कहावे ॥
हम तुम नारि पुर्ण सब मांहीं । जहां है सोहं तहां हम नाहीं ॥
ताहि खसम चीन्हे नर लोई । तन धर प्रगटे पुरुष न होई ॥
अकह अमान पुरुष जब रहेऊ । नाम निःअक्षर तासों भयेऊ ॥
ताहि नाम को सुमरे कोई । सुर नर मुनि इन्द्री वस होई ॥
अधर पियाला पियरस सांचा । ऐसी रहन रहे सो सांचा ॥
पियत अमीरस अधिक सुहाये । अधिक पिये पुनित्रास नसाये ॥

साखी-पांच पचीसों तीन गुण, एक मिहलमें राख ।

आदिनाम अनभय उच्चरो, तन मन धन सो चाख ॥

धन परखे धनवन्त जो, ज्ञान दृष्टि जो होय ।

आंघे गुरु विन ना सुझे, कोटकरे जो कोय ॥

चौपाई

कहे कबीर भर्म जब छूटे । मुक्ति भली सांची कर लूटे ॥

कहेऊं उपचार कछु परदा नाहीं । विन गुरु नरको सूझे नाहीं ॥

कथनी कथे कथे का होई । गुरु विन मुक्ति न कबहुं सोई ॥

शब्द रूप हमहीं होय आये । हमहीं होय कडिहार कहाये ॥

हमहीं नाम प्राण यह माहीं । हमहीं सन्त मर्द तेहि पाहीं ॥

साखी-ज्ञानदीपक सुरतकी वाती, दीनो संतन हाथ ।

दीपकलेके खोलिये, निस दिन सतगुरु साथ ॥

ज्ञान दीपक प्रकाशके, भीतर भवन उजाल ।

तहां बैठ पुरुषको सुमरो, सहजै होय निहाल ।

चौपाई

सो भजनी सबसी से ऊँचा । जोई अमर औ मतका ऊँचा ॥

यहि विधि भजन करे जो कोई । तीन लोकमें वास न होई ॥

( ७६ )

मुक्तिबोध

लोक वेद कर्म भरम नसावे । होय सुदृष्टि प्यासको पावे ॥
यह संसार अस कर जाने । सत्य पुरुषको जो पहचाने ॥
कहैं कबीर या तनको सोधो । पांच पर्चास तीनको बोधो ॥
एक नाम विन जग जस शवाना । कोट करे नहिं मुक्ति निदाना ॥
साखी-कहैं कबीर ये सब सुए, लहिं विषधरकी धार ।
जो जीव सतगुरु पावैं, ते जीव जगसे उबार ॥

चौपाई

बिरला जन कोई भक्तिहिलहई । जो थिर होय तो भक्तिही कहई ॥
आपही पुरुष और सब नारी । सेवक भये सकल देहधारी ॥
अचल अमान जो अकह कहावा । ताकी गत बिरला जन पावा ॥
आदि पुरुष को बिरला पावा । ब्रह्मा विष्णु शिव पार न पावा ॥
साखी-अमृत वरण ये मूरत, ताहि कहों गुण पेश ।
गुरुकी दाय़ा सो लखे, सुरत निरतकर देख ॥

चौपाई

निः अक्षर निर्गुण सो जाने । और सकल जग गुण नहिं आने ॥
तीनों गुण लै सर्गुण बोले । निर्गुण तनके माहीं डोले ॥
आदि नामसों सब जग वांधा । आदि नाम जाने सो साधा ॥
आदि नाम तहाँ अक्षर धारा । ताहि नाम लै सब विस्तारा ॥
आदि नाम देव शंकर भयऊ । और नाम है नरके सुभाऊ ॥
पद साखी निश्चै कर जाने । आदि नाम कहैं मूल बखाने ॥
मूल मंत्र जाने सो कोई । ताको आवागमन न होई ॥
भूलै लोग कहैं हम पावा । मूल वस्तु विन जन्म गमावा ॥
प्रेम अभागी मूल नहिं जाने । डार पत्रमें पुरुष बखाने ॥

साखी-अचर पुरुष एकै रहे, अजर दीप है स्थान ।
कहै कबीर सर्वांग विराजे, ताहि पुरुषको जान ॥

बांधसागर

( ७७ )

चौपाई

निःअक्षर पावे नहीं सोई । कैसे कै स्थिर प्राणी होई ॥
जब लग गुरुओं करे न नेहा । तबलग प्राणी प्रेतकी देहा ॥
आदि नाम अमृत तन पावा । जाति पांति कुलधर्म नसावा ॥
आदि नाम है गुप्त संसारा । जो पावे सो होय हमारा ॥
संत कुल तोर भर्म कुल तोरे । संत साधु सों नाता जोरे ॥
तज पाखण्ड वैरागी होई । अपने पिया को पावे कोई ॥
सार्वी-कहो काल का कर सके, पुरुष नाम जेहि पास ॥
निर्गुण निंदक पच सुए, गुरुका नहीं विश्वास ॥

चौपाई

पुरुष नाम जेहि परिचय होई । सब भेषन में गुरु है सोई ॥
ताकी महिमा अगम अपारा । लोक वेद तज भये नियारा ॥
अचल पुरुष जो अचल है देशा । आदि नाम लेकर परवेशा ॥
जाहि वस्तु में मिटे दुख द्वंद्व । सुख सागर तहां प्रेम अनंद ॥
अगुण सगुण होइ झगरा बाजे । दोष दलतजिके पुरुष विराजे ॥
कहें कबीर या भक्ति के मूला । अकह अमान अचल अस्थूला ॥
अब्रण वरण सो भेद निनारा । घट घट वसे लिप्त तनधारा ॥
ताहि पुरुष को चीन्हें प्राणी । घटमें रहे निकस ना जानी ॥
तबही कहिये खसम खुदाई । कौन कपट से आवे जाई ॥
कौन पुरुष में रहे समाई । सो प्रभु है संतन सुखदाई ॥
यह सब धन अनुभवकी वानी । खोजी होकै सो पावे प्रानी ॥
देख परख आवे विश्वासा । अगुन सगुन के सबै तमाशा ॥
सत्य शब्द कहि दीन्ह सँदेशा । जरा मरण का मिटे अँदेशा ॥
संत संदेशा गुरु मोही दीन्हा । जे जन होय ताहिको चीन्हा ॥
कहै कबीर है वस्तु अपारा । ताहि वस्तु गहि उतरे पारा ॥

( ७८ )

मुक्तिबोध

मूल मंत्र सब मथिके बूझे । अगम अगोचर तब कछु सूझे॥
जो जो वस्तु दृष्टि में आवे । सोइ वस्तु काल धरि खावे ॥
यह धन मिले देखे प्रणधारी । ताको दीजे भेद विचारी ॥

साखी-बिन देखे बोले जस, अंधरा हाथि परेख ।

बलिहारी वहि सन्तकी, निरख परखके देत ॥

चौपाई

तन अभिमान सब सर्वही धरहीं । मूल मन्त्र कैसे लख परहीं ॥
होय नहीं दास धरे अभिमाना । ताहि न दीजे अनुभव ज्ञाना ॥
मुक्ति भये संतन हित कीन्हा । मुक्ति भली प्रकट कहि दीन्हा ॥
कहैं कबीर तेहि की बलिहारी । पुन अनुभव मैं कहों पुकारी ॥

साखी-समझाये समझे नहीं, धरे बहुत अभिमान ।

गुरुके शब्द उच्छेदके, कहत सकल हम जान ॥

चौपाई

बोले बचन बहुत विस्तारा । आदि नामविनघटे अँधियारा ॥
पुरुष न चीन्हें फिरे भुलाना । निश्चय परे सोइ नर्क निदाना ॥
एक नाम बिन पार न पावे । मिथ्या प्राणी जन्म गमावे ॥
देख परे सोई सब भाषा । और कहनकी है अभिलाखा ॥
जाकर सज घट करे समाई । ताते साधू देहि लखाई ॥
अधिक भरे ऊँचे से सीजे । सो माया जो रुच रुच पीजे ॥
और सीचे अनुभव धन देखे । और सकल मिथ्याधनलेखे ॥
हरष शोक दोऊ परिहारे । होय मगन गुरु चरणै धारे ॥
अजर अमर सो अकह कहावे । जो धन मिले सो संत कहावे ॥

साखी-यह धन पूजी गुरुकी, भाग बड़े जिन पाय ।
कहैं कबीर आय नहीं टोटा, नित खरचे अरु खाय ॥

बोधसागर

( ७९ )

चौपाई

यह ना आवे अमर प्रकाशा । जो धन खोजहु धनके पास ॥
यह धन मिले होय बड़ भागी । सोई सन्त पग वैरागी ॥
करै विवेक वस्तु है न्यारी । यह सब है सपनेकी न्यारी ॥
ताहि गहे नर सुरत सम्हारी । सोई सन्त पूरा हितकारी ॥
बारा राशी मन्त्र चौबीसा । यह सब है सपनेको ईसा ॥
विन परचै नर आह जो करई । निश्चय जाय नरक सो परई ॥
जो नहिं मोक्षके शब्द विचारा । तिनहिं काल ले करै अहारा ॥
सारा नाम विन मुक्ति न पावै । बूड़ मरे पुन थाह न आवे ॥
निंदक नरक पौरे नहिं तरई । चार खूंट में भर्मत फिरई ॥
देह धरे नहिं सुतैं दृढ़ाई । उपजत बिनास चौरासी जाई ॥

साखी-भर्म जाल संसार है, सब अरुझे भव भीत ।
कोई कहैं जन एक है, मनमें राखो भीत ॥
चरणाभूत जो पायके, दृढ़ राखे विश्वास ।
निर्भय मुक्ति पाईये, पहुँप दीपकी वास ॥

चौपाई

सुतैं दीपकी अकथ कहानी । अगम अगोचर अनुभव वानी ॥
अकह सुतैं जहैं अगम अपारा । ताहि गहे उतरे भव पारा ॥
लखे अंक जो अकह कहानी । अगम अगोचर अनुभव वानी ॥
तजै पाखण्ड सोई निर्वानी । सोई सन्त कहावे ज्ञानी ॥

साखी-पुरुष सार सों न्यार है, दीखे सबहिन भीत ।
ज्ञानदृष्टि में जगसों छुटे, जो जन प्रेम पुनीत ॥
कहैं कबीर दरसाये, जाके उर निश दिन रहै ।
सोई करे गुरुवाय, झक मारे संसार है ॥

( ८० )

मुक्तिबोध

चीठी उतरे दूरसौं, ताके सिर वैराग ।
नाम गहे पुरुष पावहीं, तब गुरु प्रगटे भाग ॥

चौपाई

पावे वस्तु मगन होय रहई । चढ़े ना उतरे लाख जौं कहई ॥
होय निशंक नहिं चित्त डुलावे । जो जेहि सुर्त धरे सो पावे ॥
अकह अमान पुरुष है सोई । तन धरि प्रगटे पुरुष न होई ॥
मूल वस्तु पावे बड़ भागी । देखिये साखी पदमें नागी ॥
कहि न जाय अकह को देखा । गुरुकी दया सुर्त सो पेखा ॥
साखीपद के तहां न काजा । आप मिले सोइ सेश विराजा ॥
अनुभव शब्द जहाँ ठहराना । को कह सके न जाय बखाना ॥
देख परख आवे परतीती । तब जैहै चौरासी जीती ॥
तहां नहीं तुम दुतिया भाऊ । आप मेड़ तबही सब गाऊ ॥
वहां बैठ अमृत फल पाऊ । जब निःशंक बहुर नहिं आऊ ॥
गुरु के शब्द हृदय मो आना । तानरकी भइ मुक्ति निज जाना ॥
कोटि असुर की राई आवे । हृद विश्वास सन्त जेहि पावे ॥
कहैं कबीर है शब्द सुहेला । गुरु पूरा सूरा होय चेला ॥
साखी-गुरु पूरा शिष्य सूरा, बाग मोरि रन पैठ ।
सन्तमुक्त कहैं चीन्हके, तब तखत पर बैठ ॥

इति मुक्तिबोध समाप्त

शब्दबोध एवं अलिफनामा (षोडश व सप्तदश तरंग)

सत्यमुक्त, आदि अदली, अजर, अचिन्त, पुरुष,
मुनीन्द्र, करुणामय, कबीर, सुरति योग, संतायन,
धनी धर्मदास, चूरामणिनाम, मुदर्शन नाम,
कुलपति नाम प्रबोध गुरुबालापीर, केवलनाम,
अमोल नाम, सुरतिसनेही नाम, हकनाम,
पाकनाम, प्रकट नाम, धीरज नाम,
उग्र नाम, दया नामकी वंश-
व्यालीसकी दया

अथ श्रीबोधसागरे

★

षोडशस्तरंगः

श्रीग्रन्थ चौकास्वरोदय

★

प्रथम प्राण योग जो भाखा । कारज सिद्ध जो बाहर राखा ॥
प्राणायाम भेद सबहीको सारा । कारज सिद्ध वेद व्यवहारा ॥
वोई सुरूप हम आनि निर्माये । आधेको नर आधकी नारि बनाये ॥

नं. ७ कबीर सागर - ४।

( ८२ )

चौकास्वरोदय

सो स्वरूप हैं आदि निशानी । सत्यस्वरूप सो जीव समानी॥
प्रथमशब्दसुरतिसमृति निर्माया । जितने वेद और लोक बनाया॥
दुतिये इच्छा अंकुरकू कीन्हौ । उत्पतिप्रलयसौपि सब दीन्हौ॥
तृतिये माया मन विस्तारा । तिनके बीज जीव संचारा ॥
चौथे सुर चन्द्रहि परकाशा । शुक्ल भेद तिहिमाँहिनिवासा॥
पाँचयदिवशरातऔरतिथीपसारा । तापर सूर्य चन्द्रकी धारा ॥
एक नारि एक पुरुष कहावा । चन्द्र सूर्यनाम तिन पावा ॥

राखी-तिनको भेद शरीरमें बरतै, पाँच तत्व निजसार ।
कहैं कबीर सोई लख, पूर मिलै कडिहार ॥

चौपाई

काया भर्म भेद अधिकारा । नीर पवन दोह अस बैठारा ॥
नीर नामते उत्पति होई । नीरहि साथै मरै न कोई ॥
दुसरा पवन अंगकी धारा । तापर सोहैं सुरति बैठारा ॥
पवन भेद है अगम अपारा । आदि अन्त सब कीन्ह पसारा ॥
पवन डारि स्वासा अवगाहा । विन सदगुरु पावै नहि लाहा ॥
तापुर सूर्य चन्द्रकी धारा । सुखग चन्द्र औ सूर्यविचारा ॥
तिनकर भेद जो न्यारे करऊ । सूर्य चंद्र भेद दोई घरऊ ॥
दिनतिथिपक्षसंकांति विचारा । तापर पाँच तत्व विस्तारा ॥
सूर्य उदय संपूरण कहेऊ । भेद अभेद मर्म सब लयेऊ ॥
मंत्र उदौछे हि मासको भाजै । सूर्य सनेह सो तहां विराजै ॥
पृथ्वी तत्त्वपर सूर्य जो आवै । छै मासको शुभ दिखलावै ॥
घरको छाँड़ि तत्त्व जो बोले । प्रलय कालके छत्र जो डोले ॥
जलहि तत्त्वपर अस्थिर होई । ताको कष्ट होय नहि कोई ॥
वायु तत्त्व कीयो विस्तारा । किंचित कारज होय संसारा ॥