कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
राजारानीका सत्यलोक जाना
(१०)
अमरसिंह बोध
कालजालते हंस छुडाये । राजा रानी भक्ति मन लाये ॥ सारखी-राजा रानी प्रेमसे, और सकल जिव साथ ॥ नाम पान सबहिन दिये, मस्तक धरिके हाथ ॥
चौपाई
कीन्हा दंडवत् सब बहु भांती । राजा रानि पुत्र औ नाती ॥ पुरेथभाणसा लीनो पाना । रंभा नाम पुरेथनी जाना ॥ तबही दिवान खेमसिंह आये । नर नारी परे गुरुके पाये ॥ आये बखशी लीन्हा पाना । भाव भक्ति मनमाहि समाना ॥ नाम रतनचंद्र कहे कर जोरी । दया करो मम बंधन छोरी ॥ आये चौधरी प्रेमचंद नामा । तन मन अरपी कीन्ह प्रनामा ॥ तबहीं शेष शामजा आये । प्रेमभावसे शीश नवाये ॥ और जीव बहु लीन्हा पाना । सबको चित्त गुरुचरण समाना ॥
छन्द-राजा खडा करे विनती प्रभु दीनबंधु दयाल हो ॥ हंस नायक प्रभू लायक शब्द दीन्हा रसाल हो ॥ जेहि खोज ऋषि मुनि नारद ब्रह्मा हरि हर थक रहे ॥ नहि पार पावत शारदा सोह नाम सतगुरु मोहिं दिये ॥
सोरठा-मोहि अनुग्रह कीन्ह, दास जानि दाया करी ॥ भक्तिदान मोहिं दीन्ह, लेह चलो समरापुरी ॥
ज्ञानी बचन-चौपाई
ज्ञानी कहे सुनो हो राऊ । तुमरी अवध सो सबै रहाऊ ॥ एते दिवस रहो भवसागर । पीछे चलो लोक कहैं नागर ॥
राजा रानी बचन
राजा रानि कहे कर जोरी । सतगुरु सुनिये विनती मोरी ॥ कठिन दुःख भवसागर मांही । क्षण भर इमपै रहौ न जाही ॥ इकइस लाख जीव तुव शरना । बहुत बरसमें होइ निज मरना ॥
बोधसागर
(११)
जो तुम सतगुरु हंस सहायक । होहु दयाल हंस सुखदायक ॥ अधम उधारन नाम तुम्हारा । अवगुन मोर न करहु विचारा ॥
ज्ञानी वचन
ज्ञानी वचन कहे गोहराई । राजा सकल हंसा बुलवाई ॥ सकल हंस सतगुरु संग लागा । इकइस लाख हंस तन त्यागा ॥ पावत पान गये एक ठारा । पहुँचे जाय पुरुष दरबारा ॥ भाव भक्ति भल कीन्ह बनाई । सर्वस अरपि चग्नामृत पाई ॥ काल जालको चिह्न जो पावे । सार शब्दमें सुरति लगावे ॥ मन निरंजन तेज ओंकारा । ये सब चीन्हे काल पसारा ॥ नाभि कमलते सुरति लगावे । मकरतार चढ़ि शब्द समावे ॥ पुरुष दरश पावे जब हंसा । जनम मरणको मेटै संसा ॥ षोडश भानु हंस तेहि रूपा । समझ न परे रंक औ भूपा ॥ एक बरन राजा औ रानी । ताकी भेद सब जाने जानी ॥ पुरुष सज्या हंस तहाँ आये । अमृत भोजन करत अघाये ॥ काया अमर अमरवर पाई । दुःख और द्वंद सबै मिट जाई ॥ एही विधि सकल जीव तहाँ आवा । सबही हंस एक नाम समावा ॥
सोरठा-कहा जीव करनी करे, कहा चलेगा चाल ॥
सतगुरु नाम प्रतापते, कबहुँ न खावे काल ॥
कहन सुननकी है नहीं, देखा देखी नाय ॥
सार सबद जो चिन्ही, सोइ मिलेगा आय ॥
चौपाई
पुरुष हुकुमसे जीव बुलाये । राजा रानी हंस तहाँ आये ॥
हंसन कह तब वचन सुनाये । भाग बडे तुव दर्शन पाये ॥
पुरुष वचन
अहो जीव कस कीन्ह कमाई । हंस सज्जन मोहि कहो सुनाई ॥
(९२)
अमरसिंह बोध
राजा रानी वचन
माथ नवाय कह राजा रानी । बार बार विनती बहु ठानी ॥ करनी चाल हम नहि जाना । परे ते कूपमें अति अज्ञाना ॥ आय जगाये अंध अचेता । सतगुरु शब्दते बांधे हेता ॥ पुरुष हुकुमते ज्ञानी चलि आये । कहो जीव कस करहि कमाये ॥ ज्ञानी वचन कहैं परमाना । इन सम हंस और नहि आना ॥ इनकी डोरी जीव सब आवा । पुरुष सुनी यह आनंद पावा ॥ अंक मिलाई हंस तब लीना । अरध सिंहासन बैठक दीना ॥ सेत छत्र शिर दीन्ह तनाई । सूरज कोटि छबि राजा पाइ ॥ यहिविधि राजा लोक सिधाये । सुनत बोध धर्मनि मन भाये ॥ एक वचनको संशय आई । सो मोहि नाथ कहौं समुझाई ॥ षोडश रवि सब हंस सराई । कैसे रायको दइ अधिकार्ई ॥
कबीर वचन
धर्मदास तोहैं कहि समुझाऊँ । तुमरे मनको धोख मिटाऊँ ॥ राज गुमान उन दिये विसारा । और जीवकी मुक्ति सुधारी ॥ पुरुष रायको पूछ न कीना । निज करनी कर नाम न लीना ॥ अपने मन तजि मान बढाई । ताते पुरुष दया उर आई ॥ धर्मदास सुनो चित लाई । यहिते राजा बढती पाई ॥
धर्मदास वचन
धर्मदास कहे युग कर जोरी । दया करी तुम बंदीछोरी ॥ दीनदयाल दयाके सागर । अच्छी कथा सुनाये आगर ॥ साखी-धर्मदास आधीन होइ, विनती करै कर जोर ॥ कथा कही अमरसिंहकी, संशय मिटायो मोर ॥
इति श्रीबोधसागरे कबीरधर्मदाससंवादे राजा अमरसिंहबोध कथा वर्णनो नाम द्वितीयस्तरंगः ॥ श्री अमरसिंहबोधः समाप्तः
श्री-बीरसिंहबोध
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भारतपथिक कवीरपंथी-
स्वामी श्रीयुगलानन्द ( विहारी ) द्वारा संशोधित
हेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई
1947-1948
1947-1948
1947-1948
1947-1948
1947-1948
1947-1948
सत्यनाम
श्री कबीर साहिब
शिवलिंग
A faint, stylized illustration of a seated figure, likely Lord Shiva, wearing a crown and holding a trident (trishula). The figure is surrounded by a decorative border.
शिवलिंग
अथ बोधसागर
तृतीयस्तरंगः
बीरसिंहबोध
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धर्मदास वचन-चोपाई
धर्मदास पूछे चित लायी । साहब मोहि कहो समझायी ॥ बीरसिंहराय किमि कीनी सेवा । करिके दया कहो गुरुदेवा ॥ बीरसिंहदेव बडा अभिमानी । कैसे साहिब सेवा ठानी ॥ सो वृत्तान्त कहो मोहि स्वामी । दया करि कहिये बहु नामी ॥
कबीर वचन
धर्मदास भल पूछहु बाता । तुमसे बरनि कहूँ विरुयाता ॥ तन मन धन अरु मोहन लावे । जो जिव हमरे संग सिधावे ॥ आदि अन्त सुरति हम कीना । तबही पग धरतीपर दीना ॥ और दिशा देख्यो हम जायी । पूरब पश्चिम दृष्टि फैलायी ॥ बीरसिंह देव काशीकर राऊ । हम पहुँचि तहाँ कीन गोहराऊ ॥ प्रथमहिं चले भक्तपर गयऊ । सकल संत जहाँ भक्ति करयऊ ॥ नामदेव भक्ति करन मन लावा । सेना धनाजाट तहाँ आवा ॥ राँका बाँक सदन कसाई । पद्मावती दीपक ले आई ॥ चौहटे तान चँदेवा दीना । ठाडे भक्त सब गायन लीना ॥ नामदेव लोटन करे भाई । हाथ ताल रेदास बजाई ॥
नं. ४ कबीरसागर - ४
कबीर साहबका काशीमें जाना और भक्तोंके साथ वार्तालाप करना
(९८)
बीरसिंह बोध
धना मृदंग पट्ट उजियारा । जुरे भक्त सब संत अपारा ॥ धर्मदास तहँवा हम गयऊ । राम राम सबही मिलि कियऊ ॥ तब हम वचन एक कहि लीना । सकल भक्तके हिये मन दीना ॥ नामदेव केहि पुरुषहि ध्याओ । भक्त करतका कर्म तुम लाओ ॥
नामदेव वचन
नामदेव कहे सन्त भुलाओ । दोसर पुरुष कौन ठहराओ ॥ हरि हर ब्रह्म हैं बड देवा । तिनकी करै सकल जग सेवा ॥ वे जगकर्ता सब कछु अहहीं । वेद शास्त्र सब तिनकहँ कहहीं ॥ है प्रभु आदि मध्य अरु अंता । शीश सुडाय जपो केहि संता ॥
कबीर वचन
हरि ब्रह्मा शिव शक्ति उपायी । इनकी उत्पन्न कहहुँ बुझायी ॥ विना भेद सब फूले ज्ञानी । ताते काल बांधि जिव तानी ॥ अजर अमर है देश सुहेला । सो वे कहहिं पंथ हुहेला ॥ ताका मरम भक्त नहि जाना । किरतम कर्तासे मन माना ॥ हम तो अगम देशसे आये । सत्यनाम सौदा हम लाये ॥
साखी-किरतम रस रंग भेदिया, वह तो पुरुष न्यार ॥ तीन लोकके बाहिरें, पुरुष सो रहत निनार ॥
चौपाई
बीरसिंहदेव बचेला राजा । बैठे आय महलके छाजा ॥ राजा नजर सबन पर कीना । सबकी भाव भक्ति चित दीना ॥ गावै भक्त आनन्द व्यवहारा । एक भक्त बेटा सो न्यारा ॥ टोपी एक अनूपम दीने । माथा तिलक कूबरी लीने ॥ स्वेत स्वरूप भगतकी काया । महा आनन्द पुरुष छबि छाया ॥
राजाबीरसिंह वचन
छरीदार राजा हँकरायी । नामदेवको आजु बुलायी ॥
कबीर साहबका वेष स्वरूप देखकर वीरसिंहका कबीर साहबके पास आना
बोधसागर
(११)
छड़ीदार वचन
बेगहिं छड़ीदार चलि आये । नामदेव राजा बुलवाये ॥
नामदेव वचन
नामदेव पूछे चित लायी । राव संग को और रहायी ॥ छड़ीदार तब वचन सुनावा । कोउ नहिं साथ रायके भावा ॥ नामदेव छड़ी हाथमें लयऊ । चले चले राजापहैं गयऊ ॥ राजा देखि ठाढ उठि भयऊ । कर गहिके आसन बैठयऊ ॥
राजा वचन
राजा कहै सुनौ हो देवा । कहौ कौनकी करत हो सेवा ॥
नामदेव वचन
सांखी-भक्ति करौं गोविंदकी, एक चित ध्यान लगाय ॥
राजावीरसिंह वचन
श्वेत रूप जो भक्त है, सो कस न्यार रहाय ॥
नामदेव वचन
राजा सुनो वचन यक मोरा । हम तुम हरि हर ब्रह्मा दोरा ॥ ताकर भक्ति करे वह हांसी । कहै पुरुष यक और अविनासी ॥ माला मेखली श्याम शरीरा । मिली जुलाहा सत्य कबीरा ॥ किरतन कहे सकल सब देवा । कहे साँछु देख नहिं सेवा ॥ मूर्ति कूटि पाथर का लाई । कारीगर छाती दे पाई ॥ काँसा ताँबा मूर्ति बनावा । तामें कैसे ब्रह्म समावा ॥ ऐसे कहे कबीर जुलाहा । झूठे देवन हमैं मनाहा ॥ वह तो कहे हम पुरुष अभेवा । नहिं कोइ जाने हमरो भेवा ॥ आप अपनपौ बहु विधि थापै । आपै देव सेवक पुनि आपै ॥ भक्ति ज्ञान योग को भेवा । तीरथ व्रत तप अरु सब देवा ॥ सबको काल जाल बतलावे । एकोको नहिं मनमें लावे ॥ हम सन बहु विधि वाद विवादा । नहि माने वह अनहद नादा ॥
राजा वीरसिंह और कबीर साहबकी वार्तालाप
(१००)
बोरसिंह बोध
साखी-जोलहा निंदत सबनको, बन्दत काहू नाहिं ॥ झूठ कहत हरि ब्रह्महीं, कहे निर्गुण एकै आहिं ॥
राजाबीरसिंह वचन
राजा नामदेव कह बानी । अगम ज्ञान वह करत बखानी ॥
नामदेव वचन
कह नामदेव सुनो हो राजा । बहु विधि कहै शब्द को साजा ॥ जो को निर्गुण नामहिं धावै । योनी संकट बहुरि न आवै ॥ राजा छरीदार पठवाई । जाय कबीरहिं आनु बुलाई ॥
राजाबीरसिंह वचन
परम खुशी हमरे मन आवै । जो कोइ निर्गुण नाम सुनावै ॥ अस्तुति वेद करत है जाको । पार न पावत हरि हर ताको ॥ अहिंपति अस्तुति करै जो ताही । कोउ विधि पार न पावत जाही ॥ तेहिकर भजन करै जो कोई । तब विधिसे पूरा है सोई ॥ नाम देव सुनु संत सुजाना । वह निन्दक नहि संत प्रमाना ॥ छडीदार भेजि तुरत बुलवाऊँ । निर्गुण भेद अबहि खुलवाऊँ ॥ रूप संत हृदय मम भावै । शांत रूप वह भजन प्रभावै ॥ देखो अबहीं आवत सोई । सब कहिहै तेहि भावत जोई ॥ छडीदार तुरते चलि आयऊँ । जहंवा हम वहाँ बैठे रहेऊँ ॥
छडीदार वचन
छडीदार तब विन्ती लावा । अहो कबीर तोहि राय बुलावा ॥ विन्ती राय कीन कर जोरी । लावा कबीर वेगि तैं दोरी ॥
कबीर वचन
कहे कबीर वचन अरथाई । केहि कारण मोहि राय बुलाई ॥ ना हम पण्डित ना परधाना । ना ठाकुर चाकर तेहि जाना ॥ ना हम विराना देश बसावैं । ना हम नाटक चेटक लावैं ॥
बोधसागर
(१०१)
पैसा दमरी नाहिं हमारे । केहि कारणे मोहि राय हंकारे ॥ गरज होय तो यहाँ चलि आवै । हम तो बैठे भजन करावै ॥
साखी—छडीदार तुम जायके, कहो रायके पास ॥ महा प्रचण्ड बघेल है, हम नहिं मानत त्रास ॥
चौपाई
छडीदार अति कोधित भयऊ । तुरतहिं चलि रायपहँ गयऊ ॥
छडीदार वचन
छडीदार कहै कर जोरी । महाराज एक विनती मोरी ॥ भक्त न आवै मोर हँकारे । कुछ भयभीरन राखु तुम्हारे ॥ कहैं हमारे कौन है काजा । तृणहि समान गिनत हौं राजा ॥ एता वचन राय सुनि लीन्हा । अगम बात कछु घटमो चीन्हा ॥ वह तो परमपुरुष है सोई । और होय तो आवै कोई ॥ सत्य भाव जाके उर आवे । मान बढाई लोभ सब जावे ॥ निर्गुण भक्ति जोई लवलीना । ताहि न उपजे भाव मलीना ॥ आशा तृष्णा जेहि घट व्यापै । धनवन्ता सो चाह मिलापै ॥ यहतो संत अविकल अविकारी । केहि कारण आवै केहु दुआरी ॥ शोचत राजा मनमें गूने । नामदेव मन रहे अलूने ॥ मान बढाई जो नर पागे । करत खुशामद नृपती आगे ॥ साखी—नामदेव राजा कहे, जुलहा यहाँ न आव ॥ है अभिमानी बहुत सो, बहु अहँकार जनाव ॥
चौपाई
कीन विवेक राय दिल माहीं । नहिं आये कवीर हम जाहीं ॥ वह तो सत्य भक्ति चित दीन्हा । कारण कौन त्रास मम कीन्हा ॥ यहि विधि कीन विवेक विचारा । तबहीं राजा आप सिधारा ॥
१ नामदेवजीने राजाके विचारका भाव नहीं समझा ॥
(१०२)
बीरसिंह बोध
हुकम पाय आय असवारा । गज औ तुरंग सु साज सँवारा ॥ आवत देखा जब हम भाई । तब हम लीला एक बनाई ॥ आसन अधर कीन तेहि वारा । सवा हाथ धरतीसे न्यारा ॥ माला तिलक औ टोप विराजै । हाथ स्वेत कुवरी सो छाजै ॥ नृपति देखि अचरज मन कीन्हा । यह तो पुरुष अगम कछु चीन्हा ॥ कीन अवलोकन जग हम सबहीं । ऐसे पुरुष न देखे कबहीं ॥ धन्य धन्य अस्तुति सब गावैं । धन्य कवीर चरण सब ध्यावैं ॥ राजा चरण पकड़ि दोउ भाई । धन्य धन्य नृप करई बडाई ॥ कहे राय धन भाग हमारा । दर्शन दीन्ह आय करतारा ॥
राजा बीरसिंह वचन
छन्द-अस्तुति करत नृपति भाषेउ तुम ब्रह्म निर्गुण आप हो ॥ अनाथ नाथ सनाथ करि दिये माथ हाथ अनाथ हो ॥ अपनो दास करि जानि साहब दरश दीनेउ आयकै ॥ कीजै कृपा यहि दासपै चलि भवन दरस दिखायकै ॥ सोरठा-कृपा कीन जस मोहिं, तस मन्दिर पग दीजिये ॥ विनय करौं प्रभु तोहिं, वेगि विलम्ब न कीजिये ॥
कवीर वचन-चोपाई
कहैं कवीर तहाँ नहिं काजा । तुम परचण्ड बघेला राजा ॥ काम क्रोध मद लोभ बडाई । रोम रोम अभिमान समाई ॥ तुरी सवा लक्ष सँग तोरे । लक्ष सवा दो प्यादा दोरे ॥ हस्ती चलत सहस तव संगा । निश्चिदिन भूले कामिनि रंगा ॥ कंचन कलसा महल अटारी । कैसे शब्द गहै नर नारी ॥ हम भिक्षुक जाने संसारा । कौन काज है तहाँ हमारा ॥
राजा बीरसिंह वचन
तुम सतगुरु हो दीन दयाला । करमवश्य हम अहैं विहाला ॥ माया तिमिर नैन पट लागी । दर्शन पाय भये अनुरागी ॥
राजाका रानीसे कबीर साहबको गुरु बनानेकी बात चलाना और रानीका राजाको नीति समझाना
बोधसागर
(१०३)
करो दया अपनो करि लीजै । दास जानि आयसु प्रभु दीजै ॥ दीन जानि मन्दिर पगु धारो । भक्तराज तुम वेगि पधारो ॥ हम हैं पापी अधम अजाना । तव विनु कृपा काल धरि ताना ॥ देह उपदेश प्रभु मोहि बचावो । पाप जालते वेगि छुडाओ ॥ तुमरी कृपा सुनहु हो साहब । अंस विश्वास भवहितरि जायब ॥ अब जनि लावहु बार गुसाई । चलहु कृपा करि हंसन राई ॥
साखी-भक्तराज दाता अहो, कीजै मोह सनाथ ॥
मैं आधीन शरण तुव, चलो हमारे साथ ॥
चोपाई
बहुत अधीन तेहि जब देखा । चलन विचार कीन तब लेखा ॥ ततक्षण राजा हस्ति मँगावा । लै हमहीं तब हस्ती बैठावा ॥ गजते आसन अधरहिं धारा । चले राय तब बजे नगारा ॥ जबै राय मन्दिर लै गयऊ । तबै रानि कहैं तुरत बोलेऊ ॥ मानिक देहरानी चलि आयी । तासे राजा बात सुनाई ॥
राजा बीरसिंह वचन
हम रानी गुरु कीन कबीरा । आदि ब्रह्म हैं मतिके धीरा ॥ चरण धोय चरणाभूत लीजै । सतगुरु दया करम सब छीजै ॥ तब सो रानी कहैं सुनु बाता । ओढे चीर सुभग निज गाता ॥
रानी मानिकदेवी वचन
राजा विन्ती सुनो हमारा । समुझि बूझि गुरु करो भुवारा ॥ तुम राजा हौ बहुतै ज्ञानी । विनय हमार लेहु सुनि मानी ॥
राजा बीरसिंह वचन
इतना सुनत राय मुसुकाये । रानी ज्ञान कौन बहुराये ॥ तुम हौ नारि भक्ति कहैं मानौ । साहबकी गति नहिं तुम जानौ ॥ कर्ता आप देह धरि लीना । भक्तरूप होय दर्शन दीना ॥
नामदेव आदि भक्तोंका कबीर साहबसे ईर्षा करना और उनका समाधान
(१०४)
बीरसिंह बोध
हम अरु राय बैठे जेवनारा । आनि सो वार घरे दोय थारा ॥ कंचन थारी झारी पानी । कंचनवटुकी व्यंजन आनी ॥ अधरसु थार भुईं ते न्यारा । महाप्रसाद राय चित धारा ॥ पाय प्रसाद राय जब लीन्हा । हम अरु राय बाहर पगु दीन्हा ॥ एकहि आसन बैठे दोई । नामदेव तब ठाढे होई ॥ नामदेव कह आसन दीन्हा । बहु सन्मान ताहिकर कीना ॥ नामदेव बैठे जब जायी । प्रश्न करन तिन चित तब लाई ॥
नामदेव वचन
कहहु कवीर मोहि समुझाई । कहैं तव गुरु शब्द कित पायी ॥ साहिब कौन सबनके पारा । मोसे कहहु वचन विचारा ॥ साहिब कौन जाहि तुम ध्याओ । कहैवा सुक्ति सुरति कित लाओ ॥ कौन भाँति यमसे जिव बाँचे । भिन्न भिन्न कहहु मोहि साँचे ॥ आप न समझो बोधो राजा । राम विना होय जीव अकाजा ॥ केतो पढे गुने अरु गावै । विनु हरि भक्ति पार नहीं पावै ॥
कवीर वचन
नामदेव भूले तुम जैसे । हमको मति जानहु तुम तैसे ॥ निर्गुण पुरुष आहि यक आना । अस्तुति ताकर वेद बखाना ॥ शिव ब्रह्मा नहि पावत पारा । और जीव है कौन विचारा ॥ छन्द-नित्य निगम अस्तुति अराघै हारि थके विरंच महेश हो ॥ सबै ऋषिदेव अस्तुति अराधई तेहि गावत सुरपति शेष हो ॥ जेहि गावत नारद शारदादि पार कोई ना लहे ॥ सो भेद सतगुरु गावही कोइ संत ज्ञानी चित गहे ॥ सोरठा-पूजहि हरि हर देव, जड मूर्ति पूजत बहै ॥ निशिदिन लावत सेव, जो रक्षक भक्षक अहै ॥ नामदेव तब सुनत लजाने । नहीं पाये भेद मनहिं पछताने ॥ सुनि लजायके उठि सो गयऊ । राजा तबहिं कहत अस भयऊ ॥
राजाका शिकार खेलने जाना - पानी न मिलनेसे व्याकुल होना और कबीर साहबका बाग प्रगट करके राजाका सेनासहित प्राण बचाना
बोधसागर
(१०५)
राजा वीरसिंह वचन
तब राजा अस वचन उच्चार । हम सँग साहिब चलो शिकारा ॥ आगे सेना सबही ठाडे । हस्ती घोडा बाहर काटे ॥ आगे चले निशान नगारा । सवा लक्ष सँग चले असवारा ॥ सवा लक्ष द्रव्य प्यादा दौरा । ठाडे भौंट करत बड शोरा ॥ हरनी स्वान लीन सँग चीता । कोइ सचान वाज कर लीता ॥ बहु दल हस्ती लीनी साथा । यहि विधि चले शिकार नरनाथा भौंतिन भौंति खिलौना लीना । आयसु सकल लोक कहँ दीना ॥ आगे सेन चली सब साजा । हस्ती बैठि चले गुरु राजा ॥
कवीर वचन
जबही राजा चले रिगायी । तब हम तासों बात सुनायी ॥ राजा संग मोहि ले जाओ । जीव एक मारन नहि पाओ ॥ कोटिक यतन करो तुम राजा । जीवन मिलै होय तोहि लाजा ॥
राजा वीरसिंह वचन
तत्क्षण राजा वचन सुनावें । मारन कहौ तोहि जाइ चुकावें ॥ तब हम कहा हमका कहहीं । यह नहि धर्म मनुषकर अहहीं ॥ यह सुनि राजा घोड कुदावा । शेर शिकारी रूप बतावा ॥ एको जीव फन्द ना परई । क्रोध अग्नि घट भूपति जरई ॥ खेलेत रमत दूर होय गयऊ । कितहुँ न भेंट जीवसे भयऊ ॥ फिरत अहेरे परे भुलाई । कतहुँ न ठौर नीर कहँ पाई ॥ विना नीर सो तडपे राजा । व्यापी तृषा बने नहि काजा ॥
साखी-बहुत दूर राजा गये, पीछे फिरे भुआर ॥
कटक सकल सबही फिरे, व्याकुल सबै अपार ॥
ग्रंथकर्ता अथवा परचात् के लेखक महाशयकी बलिहारी है, शिकारके लिये इतनी तैयारी बतलायी है ।
(१०६)
बीरसिंह बोध
पानी पानी सबहीं गोहरावैं । विनु पानी सबहीं मरि जावैं ॥ राजा कहै देखो सब जायी । बडो धूप जिव गयो ढरायी ॥ बहुत लोग जल दूँढन लागे । बहुतक लोग भाग चले आगे ॥ ठावैं ठावैं सब गये झुलाई । हस्ती घोरा सबहिं नशायी ॥ राजा तब कहन अस लागा । संशय बहुत तेहि मन पागा ॥
राजा बीरसिंह वचन
आज अहेर एको नहिं आवा । एको जीव जन्तु नहिं पावा ॥ पाना कतहुँ न पावा भाई । कैसी कर्ता कीन गुसाई ॥ जो जनितों अस होइहैं बाता । करन अहेर न आइत ताता ॥ सेना हमार प्राण सम प्यारी । सोऊ मरत प्यासकी मारी ॥ अब कहाँ जाइ केहि विधि करिहैं । विना नीर सब इतही मरिहैं ॥ व्याकुलता बहुतै मन बाढी । बहुत करौं सकौं नहिं काढी ॥ तेहि अवसर चर बहुतक आये । खोजिथके नहिं जलकतहुँ पाये ॥
साखी-सेना सकल मरत है, पानि पानि गोहराय ॥ छाँह छाँह सब दूँढहीं, राजा रहे शिर नाय ॥
चौपाई
तेहि अवसर हम कीन विचारा । राय प्रतीति देखों यहि वारा ॥ बीरसिंहदेव बघेला राजा । देइ प्रतीति करों यहि काजा ॥ विना प्रतीति भक्ति नहिं होई । विना भक्ति जिव जाय विगोई ॥ विनु भक्ती गुरु नाहीं भेटे । विनु गुरु संशय नाहीं भेटे ॥ विनु भेटे हिय संशय भाई । काल दयाल कहु को विलगाई ॥ मन परतीति होय जेहि प्रानी । होय तुरत चौरासी हानी ॥ करे प्रतीति नर सो पावैं । पाइ श्रद्धा गुरु शरणहिं जावैं ॥ गुरुके वचन जाहि विश्वासा । फिर नहिं होय नरकमें बासा ॥
बोधसागर
(१०७)
गुरु विनु मुक्ति न पावत कोई । चौरासी भय मिटत न लोई ॥ याते हम सब कीन्ह उपाई । राजा मन प्रतीति जेहि आई ॥ सरवर रच्यो अनूपम ठामा । बाग बगीचा औ लखेरामा ॥ नाना भांति फूली फुलवागी । बहु मेवा लागे तेहि बारी ॥ नाना भांति फूल तहैं फूले । बास सुवास पाइ मन भूले ॥ नाना पक्षी करत कलोल। जहैं तहैं उड़ैं सो टोलम टोला ॥
छन्द-फूल नाना भांति फूले, केतकी जूही आदि है ॥
चम्पा चमेली मोगरा तहैं फूल दाख गुलाब है ॥
खम्भा कदली खडे तहाँ सेबती दवना बहु अहे ॥
कदम्ब जाही मालती चमेली बहुत सुखदा लहैं ॥
सोरठा-नारियल अम्ब बदाम, कटहर बडहर पीसता ॥
बहुविधि कहे सुनाम, फल लागे चहु ओर सो ॥
चौपाई
ऐसो बाग बनी फुलवारी । बनी सो तुरत लगी नहिं वारी ॥ इहवाँ सैन रही कुम्हलायी । पानी पानी सबै गोहरायी ॥ तब हम कहे राय सुनु बाता । सत्य वचन भाखूं विख्याता ॥ उत्तर दिशा राय पगु धारो । थोडहि दूर जल बहे अपारो ॥ कहे मरत ससैन कुम्हलाई । सेना सकल चलो तहैं भाई ॥ यह सुनि राय ठाढ़ तब भयऊ । दौय कर जोरि सुविन्ती कियऊ ॥
राजा बीरसिंह वचन
सतगुरु वचन कहो जनि ऐसो । पाहन ऊपर जल बह कैसो ॥ बार अनेक अहेरे आये । पर्वत पर जल नाहिं रहाये ॥ साहिब कछु जनि ऐसी बानी । हँसे लोग गुरु झूठ बखानी ॥
१ महल
(१०८)
बीरसिंह बोध
दीवान वचन
राय दिवान कहे अस बाता । गुरुके वचन झूठ नहिं जाता ॥ कहत दिवान जोरि दोउ हाथा । गुरुके वचन सत्य धरु माथा ॥ का जानो को आहि गुसाई । बेगि राय उठि टेके पाई ॥
राजा बीरसिंह वचन
करो क्षमा सुनु हे गुरुराई । दास गुनाहहि देहु बहाई ॥ जस कहिहौ सोई हम करिहैं । बचन तुम्हार सदा अनुसरिहैं ॥
कबीर वचन
तब हम कहयो सुनो तुम राई । उत्तर दिशा तुम देहु रिगाई ॥ सैन सिपाइ ठाढे सब भयऊ । ततक्षण उत्तरदिशि चलि गयऊ ॥ राजा कुंजर दीन रिगाई । बाज निशान भेरि शहनाई ॥ चलत राय देखे चहुँ फेरा । राजा नजर दूर लगि फेरा ॥ दूरिते देखि परा सो ठावा । सुंदर बाग जहाँ रहै शोभावा ॥ राजा देखि हरष मन भरेऊ । गुरुके चरण शीश तब धरेऊ ॥ सरवर निकट राय चलि जाई । देखत बाग रहै हरषाई ॥ अम्ब निम्ब औ कदलि घनेरा । दौना मरुआ लगे बहुतेरा ॥ भांति भांति तहँ मेवा लागा । भई प्रतीति राय मन जागा ॥ ऐसी शोभा बनी बनायी । देखत बने बरनि नहिं जायी ॥
राजा बीरसिंह वचन
छन्द-राय कुंजर उतरि ठाढे चरण सतगुरुकै गहै ॥ हम कुटिल अधम अघकर्म राशी बचन पावन तुव अहै ॥ बालभाव सुभाव पितु हित बचन कबहिक टार जो ॥ पितु कण्ठ लावत आपने हिय तात और न आव सो ॥ सोरठा-जो पितु तामन लाव, तो बालक कासों कहै ॥ अधम उधारन नाव, दीन जानि जन तारिये ॥
बोधसागर
(१०९)
साखी-सैन सरोवर देखिया, उत्तम वरन सो नीर ॥ गिरिवर पर सरवर रचे, धन धन सत्यकवीर ॥
चौपाई
करी प्रणाम राय गहि पाई । महाप्रसाद देहु गुरुराई ॥ कीन प्रसाद राजा कहैं दीना । राजा बहुत लोक मिलि लीना ॥ मेवा सकल लोक मिली पाये । बहुत भांति सब लीन धराये ॥ राजा प्रजा सब करै बडाई । काहि कहौं कछु कहत न जाई ॥ जैसा मेवा सत्यगुरु दीना । नहि मिल सो सुरलोकहि चीना ॥ खात खात सो जनम सिराई । नहि देख्यो अस मेवा भाई ॥ लेइ प्रसाद जल अचवन कीन्हा । दुख संताप मुलाय सो दीन्हा ॥ फिरन लगे सो बगीचा माहीं । नहि गर्मी नहि शीत तहांहीं ॥ परिमल वास उठे चहुँ ओरा । बहुविधि पक्षी करै कलौरा ॥ ज्यों २ देखै झैल बगीचे । त्यों २ मन आनन्द रस सीचे ॥
साखी-तृषा सबनकी बुझि गयी, ऐसा निर्मल नीर ॥ मेवा पाये सब मिली, तृषित भये शरीर ॥
कबीर वचन-चौपाई
तब मैं कहचो सुनो हो राजा । सेना सकल भयो सब काजा ॥ होय असवार जाहु घर राई । जहँको जल तहँ देखै पठाई ॥ अब हम अपने लोक सिधायब । सत्य पुरुषका दर्शन पायब ॥ वहँकी शोभा अनन्त अपारा । शिव ब्रह्मा नहि पावत पारा ॥ सुनत बचन राजा भय माना । जानि विछोहै मनहि सँकाना ॥ हाथ जोरि विन्ती सो कीना । बहुत अधीन भयो परवीना ॥
राजा बीरसिंह
राजा चरण परे अकुलायी । अब सतगुरु जनि करहु दुरायी ॥ अब स्वामी मन्दिर पगु दीजै । सकल जीव अपना कर लीजै ॥