कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
प्रवृत्तिकी ईर्षा और युद्धका मूल विवेक का संविन्यासे मन्त्र विचार
(१००)
विवेकसागर
करना चाहते हैं इस कारण तुम्हें अब उचित है कि, परस्परसुमति करके ऐसा उपाय विचारो जिसमें उसने अपनी रक्षा कर सको।
दृढता दण्ड विमलचित धीरज दीजिये ॥
दया पताका साजि समर सुत कीजिये ॥
टीका-निवृत्ति कहती है हे पुत्रो ! दृढता और राग द्वेष रहितता और धीरज द्वारा परस्पर एकमेक होकर दयारूपी पताका को फहराते हुए तुम भी युद्धके लिये परस्थान करो ।
छन्द--पार्ई शिक्षा भयी इच्छा भूमिरणसर सजि चले ॥
आनन्द तबल बजाय तब रिपु सेन चाहत दलमलै ॥
मद मोह आदि विराजता सब ध्वजा ईर्षासजावहीं ॥
निजमूर्खताको दण्ड गहि ममता निशान बजावहीं ॥
टीका-इस प्रकार जब निवृत्ति अपने पुत्रोंको आह्वा दे चुकी तब विवेक राजा अत्यन्त दृढ इच्छाके साथ आनन्दका धौसा बजाकर इस उत्साहके साथ सेना लेकर रणभूमिको चले मानो तत्कालही शत्रुके दलका नाश कर देंगे ।
विवेककी सेनाको ऐसे ठाटबाटसे आती देखकर मोह राजा अपने सब भाइयोंके साथ ईर्षाकी पताका स्वरूपकी अज्ञानताका दण्ड और ममताका निशान लेकर आगे बढ़ा ॥
तब विवेक निजमन्त्री तुरंत हँकारेऊँ ॥
कहु मन्त्री दृढ आगम समा विचारऊँ ॥
टीका-मोहराजाकी सेना रणमें प्रस्तुत देखकर विवेक राजाने अपने मंत्रियोंसे संमति पूछी कि, हे मित्रवरो ! समयानुसार विचार बतलाइये जिससे मोह राजाको प्राप्त कर सकें ।
लड़ाईकी तय्यारी
विवेकसागर
(१०१)
सुमती कहे सुनु पुंगव मतिके आगरा ॥ समर वृद्धिके कीजे जगत उजागरा ॥ प्रथमहीं दूत पठाय नीति बहु विधि कहो ॥ नहि माने सतभाय तबहि आयुध गहो ॥
टीका—विवेक राजाके पूछनेपर सुमतिने कहा कि, हे राजन् ! आप बुद्धिमान हो विग्रह करनेमें जहाँतक हो विचार कर कार्य करना चाहिये । प्रथम दूत भेजकर मोहको बहुत प्रकारसे नीति द्वारा समझाइये यदि वह मान जाय तब तो ठीक ही है और नहीं तो फिर पीछे हथियार उठाकर युद्ध करना चाहिये ॥
शील दूत कहैं बोली शिशुवापन दीनेऊ ॥ चलयो तुरत शिर नाय विदा जब कीनेऊ ॥
टीका—हे धर्मदास ! जब सुमतिने इस प्रकारसे कहकर नीति का मार्ग बताया तब विवेक राजाने शीलको बुलाकर कहा कि, हे शील ! आप दूत बनकर मोहराजाके पास जाओ । और जो कुछ मोह राजासे कहना था वह सब अच्छी प्रकार शीलको सिखाकर विदा किया । फिर तो शीलविवेकके पाससे चल कर मोह राजाके दरबारमें पहुँचा ॥
मोह आदि भ्राता जे सबहि सुनायऊ ॥ बन्धु विमात संदेश सो सबहि बुझायऊ ॥
टीका—शील दूतने मोह राजाकी सभामें जहाँ सब भाइयों सहित मोह राजा बैठा था पहुँच उसके सौतेले भाई विवेकका संदेश सुनाया ॥
कारण कौन विरोधेऊ बोलहु नागरा ॥ बन्धव सम होय कीजे राज उजागरा ॥
(१०२)
विवेकसागर
टीका-शीलने मोहकी सभामें कहा कि, हे चतुर राजा मोह ! किस कारणसे आपने विरोध ठाना है सो कहिये, आपको तो सब भाइयोंके साथ मिलकर पूर्ण शक्तिके साथ राज्य करना चाहिये ! देखिये तो-
मन राजा तुवतात त्रिभुवनपति स्वामिया ॥
शुभ अरु अशुभको कारण अन्तर्यामिया ॥
अनुमादिक अनुगामि अनुज त्रिदशपति ॥
तेहिके सुत कुमति कहा कीनी गति ॥
टीका-आपके पिता मनराजा जो हैं सो स्वर्ग (सत्तेगुण) मृत्युलोक (रजोगुण) और पाताल (तमोगुण) के राजा हैं तीनों लोकमें उनका आन फिरता है । और वही मनराजा शुभ अशुभ दोनोंका कारणस्वरूप हो अन्तर्यामी बना हुआ है ? हे मोह राजा ! आपके पिता आपके पीछे २ सदा आपको मद (काम) देते रहते हैं और जहाँ २ आप जाते हो सदा आपके पीछे वह भी जाते हैं । और आपके पिताका जन्म आपके पश्चात् होकर तेरहों भुवनके राजा बनते हैं । ऐसा समर्थ राजा मन उसके पुत्र होकर आपने यह कुमति क्यों ठानी है ।
अनुमादिक शब्द अनु और मादिक शब्दोंके संयोगसे बना है इसका अर्थ है अनु = पीछे । मादिक = मद करनेवाला अर्थात् पीछे जो मद अर्थात् काम करे उसे कहते हैं अनुमादिका । यहाँ मन जब प्रवृत्तिमें लुब्ध होता है तब मोहकी प्रबलता होती है । मोहकी प्रबलता होने पर मन सदा उसको सहायता देता है ।
अनुगामी शब्दका अर्थ है पीछे चलनेवाला, जब मन प्रवृत्तिमें लुब्ध होता है तब सदा मोहके पीछेही पीछे दौड़ता रहता है अर्थात् जहाँ मोह दृढ़ होता है वहाँही मन भी लुब्ध होता है उससे अलग नहीं होता ।
अन्तर्यामी कहिये सवके अन्तर अर्थात् अन्तःकरण का जाननेवाला हो ।
विवेकसागर
(१०३)
अनुज कहते हैं (अनु = पीछे, ज = जन्मना) पीछे जन्म लेनेवा-लेको सो यहाँ मन को अनुज कहनेका तात्पर्य यह है कि जहाँ मोह नहीं हो वहाँ मन भी नहीं होता। इस शरीरमें मोह दृढ़ होनेहीसे मन की विशेष प्रवृत्ति इसमें होती है।
त्रयोदशपति (त्रयोदश = तेरह, पति = राजा) तेरह जो पांच ज्ञानेन्द्री और पांच कर्मेन्द्री तथा बुद्धि, चित्त, अहंकार इन तेरहों का राजा है। अर्थात् जब ये इंद्रियाँ विषयमें प्रवृत्त होती हैं तब मनमें उन विषयोंका राग उत्पन्न होता है। इन तेरहोंको पश्चात् उन विषयोंमें मन प्रगट होने पर भी आप सबका राजा बन जाता है। अर्थात् प्रथम इंद्रियाँ विषय को ग्रहण करती हैं पश्चात् मन उनके ऊपर राज करने लग जाता है, इंद्रियाँ सब मनकी आज्ञाकारिणी बनती हैं और मन उनका शासक राजा बनता है।
छन्द-कुमति कीन्हो अयश दीन्हो बन्धु चित्त धरिबूझिये ॥ अंत गर्व न रहत काहू मिथ्या आश न कीजिये ॥ भुनत मोह राज समाज युत्थप क्रोध दारुण खर भरचो ॥ चाहत संघारन दूतको जिमि आज्य अनिल में परचो ॥
टीका-शीलने कहा है मोहराज ! ऐसे प्रतापी जो आपके पिता मन राजा हैं उनको भी आपने अपने इस विरोधसे अय-शका भागी बनाया है। सब यही कहेंगे कि देखो मनराजा ऐसा हो गया है कि अपने पुत्रोंको भी सम्हाल नहीं ले सकता, उसके पुत्र सब स्वतन्त्र बनकर परस्पर कटे मरते हैं। इस हेतु हे मोह-राजा ! आप कुमतिके कहनेमें न आकर बन्धु विरोधमत कीजिये। और यदि इस बात को नहीं मानते हैं तब इस बातको स्मरण
(१०४)
विवेकसागर
रखिये कि, गर्व किसीको रहा नहीं हैं इस लिये मिथ्या आशा को छोड़कर सब भाई प्रेमपूर्वक राज्य करो ।
हे धर्मदास ! शील दूतके उपर्युक्त शिक्षाप्रद वचन सुनकर मोह राजा सहित उसके सर्व समाज और सेनाभरमें कठिन क्रोधका आविर्भाव हुआ । सब चारों ओरसे लाल र आखें करके शीलको इस प्रकार देखने लगे मानो उसे नाश करनाही चाहते हैं । शीलदूतको विवेक राजाने तो समझा बुझाकर मोहको युद्धसे रोकने और सन्धि कराने के लिये भेजा था, किन्तु दूतके वचनने मोह के समाजमें उल्टाही फल प्रगट किया । जिस प्रकार जलती हुई अग्निमें घृत पडनेसे उसकी ज्वाला और भी बढ़ती है उसी प्रकार मोहकी सेनाका क्रोध अधिक बढ़ गया । मोहराजाने उसी क्रोधके आवेशमें शीलसे कहा ।
जाय कहौ निजनाथही जो उबरन चहै ॥ भागै तजि पितुराज मौनव्रत गहि रहै ॥
टीका-मोहने कहा है शील ! अपने राजा से जाकर कहो कि, यदि वह अपना कुशल चाहता है तो चुपचाप पिता (मन) के राजसे निकल कर अन्यत्र भाग जावे । अथवा यदि राज्यमें रहनाही है तो मौनव्रत धारण करके अपना कालक्षेप करले ।
मोह राजाके ऐसे गर्वित वचन को सुनकर शीलदूत विवेक राजाके पास पहुँचा ।
दूत वचन प्रति उत्तर आय सुनायउ ॥ सुनत विवेक समाज निशान बजायउ ॥
टीका-शीलने विवेक राजाके सम्मुख आकर मोह राजाके दरबारमें जो जो कुछ बीता था सब सुनाय दिया । जब विवेक-
युद्ध वर्णन
विवेकसागर
(१०५)
ने देखा कि मोहराजा किसी प्रकार नहीं मानता तब युद्धके लिये प्रस्थान करनेकी आज्ञा देदी । आज्ञा पातेही निशानदार सबसे पहले निशान लेकर आगे निकला और उसके साथ ही साथ बाजेवाले भी रणका बाजा बजाते हुए रवाने हुए ॥
महा मोह कुलाहल रिपुदल आयुक्त ॥
अहं डिम्भ युत्थ व्याकुल बहुत सिधायुक्त ॥
टीका-इधर तो विवेक राजाकी सेनाने चढ़ायी की । उधर शील दूतको कड़ी २ बातोंको सुनाकर मोह राजा विवेक राजाको भय-भीत जानकर आनन्द विलासमें अचेत हो गया । इतनेहीमें विवेक राजाके दलके निकट पहुँचने पर दूतोंने जाकर मोह राजाको समाचार दिया कि, विवेक राजाकी सेना युद्ध करनेके लिये सजग होकर आगयी है । दूतके वज्र समान वचनको सुनते ही मोह राजाकी सेनाभरमें कोलाहल मच गया । अहंकार सेना और दम्भ दोनोंही सेनापति बहुत व्याकुल होगये और अपनी सेनाको लेकर वेभी आगे बढ़े । डिम्भ शब्द दम्भ शब्दका अपभ्रंश है ॥
(मोहवश हो देहाभिमानमें पड़े हुए विषयासक्त मनुष्योंके हृदयमें सत्संग और सत्शास्त्रोंके श्रवण द्वारा जब विवेक प्रवेश करने लगता है उस समय हृदयमें घबराहट उत्पन्न होती है )
चल्यो तुरत गहि शूल कुबुद्धि आयुध गह्यो ॥
समर युक्त है आयो अघमंत्री कह्यो ॥
टीका-घबराहटमें पड़ा हुआ मोह राजा पापमंत्रीके कहनेसे स्वयम् शूल और कुबुद्धि शास्त्रोंको धारण कर युद्ध करनेके लिये तैयार हो आया । राजाको स्वयं रणमें जानेके लिये प्रस्तुत
काम और सुभतिका युद्ध
( १०६ )
विवेकसागर
देखकर सेनापतियोंमें से काम सेनापति हाथ जोड़कर कहने लगा ॥ कामसेन सेनापति तेहि शिर नायऊ ॥ हे स्वामी केहि कारण निजहिं सिधारहु ॥
टीका-सेनापति कामसेन शिर नवा करके मोह राजासे कहने लगा कि हे स्वामी ! आप स्वयम् युद्धके लिये क्यों जाते हैं ?
आज्ञा करौ विवेकहिं गहिलै आवऊँ ॥
भ्राता सब सेनापति तुरत बँधावऊँ ॥
टीका-हे राजन् ! यदि आप आज्ञा करो तो राजाको उसके सब भाइयों और सेनापतियों सहित बांधकर ले आऊँ । कामसेनकी युक्ति और उत्साहपूर्वक वचनको सुनकर मोहराजाने उसे युद्धमें जानेकी आज्ञा दी । तब-
आयसु मांगि चले तब रिणुदल आयऊ ॥
रदपट फरकत आतुल वचन सुनायऊ ॥
टीका-मोह राजासे आज्ञा मांगकर काम विवेक राजाके दलके सन्मुख आकर उपस्थित हुआ । उस समय कामके हाँठ क्रोधके मारे फरक रहे थे । क्रोधके आवेशमें आकर कामने विवेक-राजाकी ओर सम्बोधन करके बहुत आतुरतासे कहना आरम्भ किया । रद = दांतपट = परदा अर्थात् दांतोंका परदा हाँठ ॥
रे विवेक तोहि कच धरि तुरत संहारि हैं ॥
मोहि देखत कौन सो मूल उच्चारि हैं ॥
टीका-काम विवेकराजासे कहता है रे विवेक ! देख अभी तेरे बाल पकड़कर मैं तेरा नाश कर देता हूँ । देखे कौन मेरे सम्मुख शब्द भी बोल सकता है ? मैं तेरा मूल नाश करता हूँ ।
( अन्तःकरण जब शुद्ध हो जाता है तब उसी शुद्ध अन्तःकरण
विवेकसागर
(१०७)
में विवेक प्रगट होता । इस कारण विवेकका मूल शुद्ध अन्तःकरण है जिस समय मनुष्यको काम उत्पन्न होता है उस समय अन्तःकरण मलिन वासना और देहाभिमानसे पूर्ण हो जाता है तब शुद्धान्तःकरणका अभाव होकर मलिन अन्तःकरणका प्रादुर्भाव होता है ) ॥
मूल गही उधार डारूँ मोसन करत सरभरै ॥
विचार सुनि बोलत विवेकहि संपुट युगकरधरै ॥
टीका—काम कहता है रे विवेक तू क्या मेरी बराबरी करना चाहता है ? मैं तेरे मूलको ही उखाड़ कर फेंक दूँगा । कामके ऐसे अहंकार युत वचनको सुनकर विचारने राजा विवेकसे हाथ जोड़कर विनय किया कि—
सुनु सुमतिनायक परमलायक दास कौतुक देखिये ॥ काम क्रोध अभिमानिया नट चेटका सम लेखिये ॥
टीका—हे सुमतिके मालिक परम योग्य विवेकराजा ! इन काम क्रोध और अभिमानादिकोंको नाटकी चेटकियोंके समान जानिये । इनका बलही क्या ? सुझा दासके कौतुकको देखिये । इस प्रकार विनय करके और विवेककी आज्ञा लेकर विचार रणमें कामके सम्मुख उपस्थित हुआ ॥
एक दिशि गर्जत काम विचार तब उभय दिशा ॥ काम करत बल जब अंत तब तरजत रसा ॥
टीका—हे धर्मदास ! अब एक ओर तो महा दुर्धर्ष काम गरजने लगा और दूसरी ओर विचार अपना प्रकाश फैलाने लगा । अब दोनोंका युद्ध होना आरम्भ हुआ । कामने जब अपना पौरुष कहके सुनाया, तब विचारने उसको तुच्छ बताया विचारके मुखसे तिरस्कारके वचन सुनकर काम कहने लगा ॥
(१०८)
विवेकसागर
रे विचार मतिहीन सकल वशि मैं कियो ॥
ब्रह्मा विष्णु महेश सबहि ताजन दियो ॥
टीका-काम कहता है रे मतिहीन विचार ! तेरी क्या विसात है, मैंने सब चराचरको अपने वशमें कर लिया है । औरकी कौन कहै ब्रह्मा विष्णु शिव आदि सबको मैंने ताजन दिया है, (मारा है) । इतनेही नहीं मेरे बलका प्रताप तू और सुनले ।
सुरपति शसि द्वि राते गौतम त्रिय कही ॥
विवेक विचार जो थाके बासा मैं गही ॥
टीका-रे विचार ! सुन जिस समय मैंने इंद्र और चन्द्रमा को वशमें किया, तब उनकी बुद्धि नष्ट होगयी, विवेक विचार सब जाता रहा और मेरी आज्ञासेही परम पवित्र गौतम मुनिकी पतिव्रता स्त्रीको भ्रष्ट किया । उस समयभी मैंने तुम दोनों (विवेक और विचार) को पराजय किया था । इतनी ही नहीं और भी सुन ।
व्यास पिता मीन दुहिता रतिबर बस कियो ॥
सुमन शरासन बाण शिवहि बेध्यो हियो ॥
टीका-रे विचार व्यासके पिता परमज्ञान और विवेक विचार में प्रसिद्ध जो पराशर ऋषि थे उन्हींको जब मैंने अपना बाण मारा तब वहाँ भी तुम्हारा कोई बश नहीं चला, उन्हींने मछली के पेट से निकली मत्स्यगन्धा (मच्छोदरी) से नदी के बीचमें भोग किया । और जब मैंने अपने बाणका लक्ष्य शिवजी को बनाया तब उन्होंने कामातुर होकर मोहिनी को पकड़ने की इच्छा की ।
दोहा-कहि कहाय मनसिज हस्यो, बोल्यो वचन उदार ॥
मो सम्मुख जलपै कहा, मेरो बल अपार ॥
विवेकसागर
( १०९ )
मो रति अति दुस्तरण लखि, जीतैं मोहिं जग कोन ॥ ज्ञान विवेकै आहिदे, लखत मोहिं करि गौन ॥ पग नहिं टिकत सुधर्मको, नहिं धीरज ठहराय ॥ मेरी दृष्टि परतही, वैरागो नशि जाय ॥ मैं मन हरचो विरञ्चि को, निज पुत्री वश कीन ॥ शतंमख द्विजंजाया निरखी, भयो परम अर्धान ॥ है कोतो बल अंग तुव, अरे सुभट कहु मोहि ॥ मेटों मार विलम्ब नहिं, प्रलय करत हौं तोहि ॥ पछितान्यो कांप्यो हृदय, शोचत वस्तु विचार ॥ हौं निर्बल वैराग बिन, अहै सबल अतिमार ॥ वस्तु विचार फिरे तबै, महा समर भय मान ॥ तुरते राय विवेक पहैं, बन्धन कीन्है आन ॥ मन संकोचि दृग नीच करि, कहत वचन नृपपास ॥ मेरो बल पहुँचे नहीं, निष्फल भयी सब आस ॥ तब मन्त्री सत्संग कर, औ दूजी अभ्यास ॥ उत्तम मन्त्र विचार के, कहत नृपति के पास ॥ मकरध्वज भुज बल अमित, बाक वीर समरत्थ ॥ वस्तु विचार महाबली, करे ताहि निजहत्थ ॥ दीजै ताहि सहायको, भक्ति ज्ञान वैराग ॥ विजय करे रण सहजही, वस्तु विचार बडभाग ॥ सुनि विवेक मन सुख भयो, मान्यो मन्त्र हिय जु ॥ तीनों तुरत बुलाइके, ताके संग किय जु ॥ बल पायो फूलो हृदय, चले समर समुहाय ॥ मनसा भूमि सुहावनी, रचे युद्ध तहैं जाय ॥
१ इन्द्र । २ गौतमकी स्त्री । ३ कामदेव ।
( ११० )
विवेकसागर
ठाढो सहित सहाय तब, मदन वीर बलवान ॥ दृष्टि परचो वैराग जब, कछुक दृष्टि सकुचान ॥ वस्तु विचार बोल्यो तबै, महाबली रण गाज ॥ सो हैं करत विवेककी, कित जै हैं रिपु भाज ॥ महाकोप करि बोल्यो, तबहीं सबल अनंग ॥ मो सन्मुख एतो बकै. करौ क्षणकमें भंग ॥ कुसुम धनुष वर हाथले, करों बाण सन्धान ॥ सकल अंग पलमें हैं, मेरो बल अप्रमान ॥ छूटे शर जो समर के, भयो युद्ध भयभीत ॥ गावत युगल समाज तहैं, रणरसमत्त जु गीत ॥ तब विचार वैरागसो, बूझत मन्त्र विचार ॥ अहौ बन्धु कीजे कहा. बडो सकल यह मार ॥ तब वैराग विचार के, दीन्हो मतो अन्त ॥ अहो बन्धु शोचत कहा, शोधो शुद्ध स्वरूप ॥ जग मिथ्या रजु सर्पवत, सत्य ब्रह्म निरधार ॥ छुद्र निंद्य नहिं चित धरो, हरो अनंग विकार ॥ जब वैराग महा बली, दीन्हो मतो अभंग ॥ वस्तु विचार चल्यो तबै, धरि उर परम उमंग ॥ रे निलज्ज पापी कुटिल, दुर्बुद्धी धृक तोह ॥ कहा वस्तु विचार ने, दुष्ट पिसन जन मोह ॥ कहो मार अतिदर्प करि, मैं मन मोहो भूप ॥ शंकरको मन मोहेऊँ, धरचो मोहिनी रूप ॥ मैं पराशर दहन कियो, रावणको घर खोय ॥ श्रुद्धी ऋषि वनमें छल्यो, परे त्रिशो वश सोय ॥ जीत्यो एक कटाक्षमें विद्यामित्र सुधीर ॥
१ विश्वामित्रजी मैनकाको देखकर कामातुर हुए थे जिससे शकुंतला का जन्म हुआ ।
विवेकसागर
(१११)
देवंअंगना संग लै, छूटचो धीर शरीर ॥ वस्तु विचार बोल्यो तवै अब जान्यो तुव भेद ॥ कहा नारि जहैगर्व तोही, अस्थि मांस त्वच मेद ॥ यह मलकी पुतली प्रगट, नख शिख भरी विकार ॥ प्रगट निरंतर मल खवै, अष्ट याम नव द्वार ॥ तांसो संगति जो करै, अति मलीन सो जान ॥ शूकर विष्टा अशुभ योनि, कह तिनको परमान ॥ पुनि मनसिज बोले तवै, सुनहु वस्तु विचार ॥ कियो भोग नहि नारिको, वृथा जन्म संसार ॥ बडो पदार्थ नारि जग, विनु तिय धामन काम ॥ ताको धर्म कहु न सघे, जाके घर नहि बाम ॥ ताते त्रिय सो धन्य है, तिहि पुर देखु निहारि ॥ सावित्री आज विष्णु ले, उमा लिये त्रिपुरारि ॥ कहै विचार यद्यपि अहै, ब्रह्मादिक ढिग बाम ॥ मो सहाय तद्यपि सबै, सदा मुक्ति निःकाम ॥ सनकादिक मुनि जनकसे; नहिचितवत तुवरश्च ॥ वस्तुविचार स्वरूप लहि, नाशे जगत प्रपञ्च ॥ गयी खबर तेहि भूल वह, रे निलञ्ज मदमत्थ ॥ हनुमान यक क्षणकमों, शंकर लायो हृत्थ ॥ उठचो मदन तब कोपिकरि, गह्यो बेगिकर चाप ॥ इषुवर्षा लाग करन, वर्णत नारि प्रताप ॥ कञ्चन सो तन भूल मले, दृग कमलनके भाय ॥ ऊँचे उरज विराजहीं, को न देखि ललचाय ॥ चन्द्र वदन तन क्षीण करि, जंघ केदली समान ॥
१ मनका इन्द्रके स्वर्ग की अप्सरा है इस कारण इसको देवअंगना लिखा । २ ले = लक्ष्मी ।
( ११२ )
विवेकसागर
तापर चीर सुगन्ध बहु, भूषण भूपति जान ॥ विकट दृष्टि जबहीं करै, सुर नर सुनि वश होत ॥ कठिन कटाक्षै जब भिदौ, तब कहैं ज्ञान उदोत ॥ पुनि विचार बोल्ह्यो तबै, जहैं तिय तोहिगुमान ॥ नरक परै तेहि संगते, संगति नाशै ज्ञान ॥ सोरठा-नारी वरने रूप, दुष्ट चित्त विष सो भरी ॥ वरणें को कविअनूप, चन्द्र वदन कञ्चन तनय ॥ दोहा-अहै अस्थिको पींजरा, चाम लपेटे जाहि ॥ ऊपर चादर रंगि दर्ई, भीतर विष्टा आहि ॥ नंगी करि जो देखिये, यह तन सुन्दर रूप ॥ यामो कछु धोखो नहीं, प्रकट पिशाच स्वरूप ॥ पृथक् अंग जो देखिये, रुधिर अभूषण गन्ध ॥ तब मलीन चर कीच, सो भरी देखिये रन्ध ॥ विष सों ढिग गुण अग्नि सो चितवनि बाण समान ॥ हित सों ढिग मन मिलन सो, सुखचुरैल पकवान ॥ सो नर पावन है सदा, जो न करै तिय साथ ॥ धरे पखौवा मोरके, नन्दनन्द हू माथ ॥
प्रबोध चन्द्रोदय ।
बोले वस्तु विचार मृद नहीं बूझई ॥ अंध चक्षुविहीन निपट नहीं सूझई ॥ कौन पुरुषको नारीलिंग उभयो कहाँ ॥ आतम ब्रह्म स्वरूप सबनमें रमि रहा ॥ कित अनंग कित संग विवेक ते पाइये ॥ सच्चिदानंदसर्वव्यापक चित्तमें ध्याइये ॥
विवेकसागर
(११३)
भेद अभेद दोऊ सम ज्ञान विचारहू ॥ अंत अवस्था जानि सोई निरवारहू ॥
टीका—कामके डींग मारनेको सुनकर वस्तु विचारने कहा रे सूठ काम ! तू मूर्ख है तेरेको समझ नहीं पडता है; तू अन्या है तुझको कुछ सूझता नहीं है ।
एकही ब्रह्म आत्मस्वरूप होकर जब सबमें रम रहा है तब स्त्री और पुरुष यह दो लिंग कहाँ हैं । जब एकही सच्चिदानन्द सबमें व्यापक हो रहा है तब कहाँ काम है और कहाँ रति है । जिसने इस प्रकारसे निज स्वरूपको विवेककी सहायतासे जानकर भेदा-भेद को नाश कर दिया है उसके लिये तेरा अस्तित्वही नहीं तब तेरा वश क्या । स्वरूपज्ञान प्राप्त होतेही तेरी अंत अवस्था आजाती है फिर तेरा बल उसके ऊपर नहीं चलता । किस दृष्टि को धारण करनेसे तेरा बल नहीं चलता सो सुन । छन्द—निरवारि देखे छानि लेखे दुतिय नहिं कोई कहा ॥
नरवत इत उत करत जहँ तहँ ब्रह्म सब मो रमि रहा ॥
टीका—विवेकी पुरुष ब्रह्म विचारको प्राप्त करनेके लिये जब अन्वयव्यतिरेक करके स्वात्मज्ञानको जानता है और अपने प्राप्त ज्ञानकी परीक्षाके लिये सर्व शास्त्र और आचार्योंके मतको छानता है तब उसे विचार ज्ञान द्वारा स्वात्म-निश्चयात्मक प्राप्त होता है जिससे वह सर्व स्त्री पुरुष जड़ चैतन्य सब ही एक ब्रह्मकी ही लीला देखता है । जिस प्रकार नटको जाननेवाला पुरुष उसके अनेक स्वार्गोंमें भी उसे नट ही जानता है, उसे उसके स्वार्गोंमें दूसरा भाव कदापि नहीं होता । उसी प्रकार ब्रह्मतत्त्वको जाननेवाले पुरुषकी दृष्टिमें जब द्वितीया है ही नहीं तब तेरी स्थिति कहाँ है ।
क्रोध और क्षमाका युद्ध
(११४)
विवेकसागर
इत काम सुनिके अस्त्र डारे आनिके चरण परचो ॥ विचार ब्रह्म उर्द्ध वीर्य मोह भय वश स्वरभरचो ॥
टीका-हे धर्मदास ! वस्तु विचारके निर्मल ब्रह्मज्ञानरूपी बाणसे विंघा हुआ काम तेजहीन होगया और अपने सर्व अभिमान और घमण्ड को भूलकर विचारके आगे अपना हथियार डालकर उसके आधीन होगया । उसके आधीन होतेही उसकी स्त्री रति आदि सब आकर विवेकरायके आगे माथा नवाकर अपने सब पराक्रम छोडकर आधीन होगयी ।
(जिस समय मन कामातुर होता है उसी समय ब्रह्मविचार द्वारा इसे मारनेसे वीर्यका बल जिसके बलसे काम अपना पराक्रम दिखाता है एकदम शान्त हो जाता है ।)
कामको मंरते देख मोह राजाके दलमें खलबली मच गयी स्वयम् मोह भी भयभीत हुआ तब-
क्रोध मोह सुनि तुरतही निजबल भावेऊ ॥
मोसन करि संग्राम कवन पत राखेऊ ॥
विचार विवेक सहित सब सेन संधारि हौं ॥
करौं निकंटराज वचन प्रतिपारि हौं ॥
टीका-हे धर्मदास ! काम सेनाके मरनेका समाचार और उसके मरनेसे राजाके भयभीत होनेकी खबर जब क्रोधको पहुँची तब वह उसी समय रणके लिये तैयार होकर मोहराजाके निकट जाकर कहने लगा हे राजन् ! क्या आप जानते नहीं हैं कि, मुझसे संग्राम करके किसीकी पत बची नहीं है । मैं तो सबको जीतनेवाला आपकी सेवाके लिये तैयार हूँ तब आप एक काम
१ मरना और शत्रुके अधीन होना इन दोनों बातोंमेंसे अधीन हो जाना मान अपमान सूचक होने से मृत्युसे भी अधिक है इस कारण “मरते देख” लिखा है ।
विवेकसंगर
(११५)
के मरने से ऐसी चिन्तामें क्यों डूबे हुए हैं। देखिये प्रतिज्ञा करके कहता हूँ कि, अभी संग्राममें जाकर विचार विवेक सहित उसकी समस्त सेनाका नाश करके आपका राज्य निष्कंठक बना दूंगा। आप किसी प्रकारकी भी चिन्ता न करें। इस प्रकार अपनी बड़ाई आपही करके रणभूमिमें जाकर उपस्थित हुआ।
दोहा-मोह भूप यह सुनतहि, होगया व्याकुल अंग ॥
बूझे मन्त्रिन से यहै, जूझे बन्धु अनंग ॥
बड़ो सुभट मोसे नमो, हुतो सहस कन्दर्प ॥
मो जावत सो हत गयो, हुस्तर कठिन जो सर्प ॥
महामोहको वचन सुनि, मोह उठयो गण गाजि ॥
मेरे बन्धुहि मारिके, कित जैहैं रण भाजि ॥
मेटौं मारि विवेकमन, ज्ञाने देहुँ बहाय ॥
शील सत्य संतोष सब, चितवत जाहि पराय ॥
हौं जब प्रगटो तेज है, संग पुत्र मम चार ॥
व्याकुल करि वैराग्यको, हरौं भक्ति परिवार ॥
असत्संग मन्त्री कहै, हे प्रभु बडभट क्रोध ॥
आयुस जाको दीजिये, विजय करै रण बोध ॥
हरण्यो मोह नरेश तब, सुन्यो क्रोध बल शूर ॥
आज्ञा तब रणको दर्द, करौ रिपुहि चकचूर ॥
चल्यो क्रोध वंदन कियो, प्रभु आज्ञा धरि माथ ॥
आइ गयो रणभूमिमें, दलबल लीन्हैं साथ ॥
टीका-क्रोधका रणमें आगमन सुनकर विवेक राजाने भी विचार करके अपना योद्धा भेजा ॥
तब विवेक क्षमा कहैं आयसु दीन्हिया ॥
सुभट दोऊ संग्राम समागम कीन्हिया ॥
(११६)
विवेकसागर
टीका-विवेक राजाने मंत्रियोंसे विचार करके क्रोधके सन्मुख क्षमाको संग्रामके लिये भेजा । अब दोनों ओरकी सेनाके बीचमें एक ओरसे महा विकाल क्रोध और दूसरी ओरसे महाकोमलांगी परमशान्त क्षमाका युद्ध आरंभ हुआ ॥
दोहा-नृप विवेकविस्मित भयो, सुनतहि क्रोध प्रभाव ॥ बृह्यो मंत्रिनसे यहै, कांजे कौन उपाय ॥ दियो मन्त्र सत्संग वर, धीरज अचल सवीर ॥ क्षमा नारि मन भावती, पुत्र आर्य्यव धीर ॥ धीरज रु क्षमा पठायो, ज्ञान भक्ति ता संग ॥ तेज क्रोधको सहजही, क्षमा करे तन भंग ॥ धीरज क्षमा विदा कियो, पुत्र आर्य्यव जान ॥ दीन्है सकल सहायको, विमल भक्ति अरु ज्ञान ॥ धीरज धरि धीरज चलयो, गयो आप रणभूमि ॥ जहाँ क्रोध गर्जत रह्यो, नयन मद झूमि ॥ मिलि दृष्टिसे दृष्टि जब, भयो क्रोध रिस अंग ॥ गरज्यो सन्मुख जायके, मारि करौं बल भंग ॥
क्षमाको सन्मुख लड़नेके लिये आया देखकर क्रोध गरज कर कहने लगा ।
क्रोध कहै सुनु भीता मोहिं न जानसी ॥ कम्पित है त्रिलोक मरण निज ठानसी ॥
टीका-क्रोधने कहा हे डरपोक क्षमा ! क्या तू मुझे नहीं जानती है कि, मेरे भयसे तीनों लोक कम्पायमान हो रहे हैं ऐसा जानकरके भी तू मरनेके लिये सामने क्यों आयी है ॥
क्रोध सँधारैउ छित्तिपति राज जित कित कियो ॥ क्रोधविश सुरलोक दैतन जहरहि दियो ॥
विवेकसागर
(११७)
क्रोध कटुक अतिदार्शनको आडो तोही ॥ तेहिको हात संधार मम दरैरा पर जोही ॥
टीका-क्रोध कहता है कि, हमने असंख्य राजाओंका नाश करके उनका राज तितर वितर कर दिया है। हमारेही कर्तव्यसे देवोंने राक्षसोंको विषपिला दिया था। हमारी सेना ऐसी प्रलय है कि जो इसके सम्मुख आता है उसका ऐसा नाश हो जाता है कि कहीं पता भी नहीं लगता। भला ऐसी बिकट सेनाके समक्ष तू क्या वस्तु है और तेरा रक्षककौन है कि तू मेरे सम्मुख आयी है॥
दोहा-कहा बापुरी भक्ति है, कहा बापुरो ज्ञान ॥
कहा बापुरी क्षमा तू, कहा तोहि गुमान ॥
कहा नृपति तुव रंक है, कहा धर्म सन्तोष ॥
सम्मुख मेरे ना टिकै, जब चित्तवो भरि रोष ॥
इस प्रकार कहकर फिर क्रोध कहने लगा ॥
माता पिशाची कुजन बन्धु करनकी सामानते ॥
गुरु कौन बापुरा वदन देखुँ मोहि सू बडज्ञानते ॥
निजनारिको अपमान करि वृषली सो लोकसमाज है ॥
क्षण सुरति ते तेहि काटिके तब करूँ राज विराज है ॥
टीका-हे क्षमा ! मेरे पिता राजा मनने अपनी स्त्री निवृत्तिका अपमान करके उसको लौंडीसे भी नीच गतिको पहुँचा दिया है, जिससे समाजमें वह पिशाचनीके समानही आदरको पाती है। और तेरे भाई जो विवेक आदि हैं ये तो महा दुष्ट हैं और तू तो तेजहीन साक्षात् वर्णसंकर समान देख पडती है। हाँ तेरे को मेरे सम्मुख आनेकी शिक्षा देनेवाला गुरु कौन बापुरा है। क्या वह मुझसे अधिक ज्ञानी है ? अब देख क्षणमात्रमें दृष्टि डालतेही तेरे सब परिवारका नाशकरके निवृत्तिका नामही मिटा देता हूँ ॥
नं. ३ कबीरसागर - ६
(११८)
विवेकसागर
दोहा—तबै भक्तिको बोलि ढिग, कहै क्षमा सुसकाय ॥ वचन कोध कै सुनतहिं, तुरतहिं देव बहाय ॥ कोपि कोध बोल्यो तबै, धिग धिग है तुव मात ॥ नाम निवृत्ति जासु तुव, प्रगट भयो कुल घात ॥ तब क्षमा निज पियतन, चितई दृष्टि पसार ॥ कोपि वचन सुनि करिक्षमा, सहियेशब्द विचार ॥ कछो कोध अतिरिस भरे, रे धीरज मतिहीन ॥ कहा प्रातहि आइ तुम, अशुभ दृष्टि मुहि दीन ॥ लियो ज्ञानको बोलिके, क्षमा आपने तीर ॥ कहत वचन और कछू, मेटि कोधकी पीर ॥ कहत वचन अति रिस भरचो, रक्त वर्ण कर नयन ॥ तन पर स्वेद कंपित अधर; सुखते कटुतर वयन ॥ प्रकट भइ हिंसा तबै, कोध नारि विकराल ॥ अब सबको धीरज गयो, प्रगट भयी ज्यों काज ॥ बोली हिंसा रिसभरि, लिये खड्ग विपरीति ॥ कोपि क्षमा मारण चली, लिये खड्ग अपकीर्ति ॥ शतमुंख निजगुरु मारचो, शंभु सतीको तात ॥ कहुको मोरे जियतते, निकसि बाहिरें जात ॥ सुर नरमुनि व्याकुल किये, ताहि सकै कहि कौन ॥ लगी समाधि युगाधि भर, ताहि छुडावत मौन ॥ क्षमा कहे भृगु लात जब, हनी विष्णुके हीय ॥ क्षमा किये प्रभुता भयी, सुर नर मुनिके जीय ॥ क्षमा नाम यह भूमिको, लहत सकल अपराध ॥ है सबके अपराध शिर, जेहि वन्दे सुर साथ ॥
१ इन्द्र । २ इन्द्रको ब्रह्मज्ञानके उपदेश देनेवाले दध्यङ्गकृष्णिये थे । इन्द्रने इनका धार काट लिया था उपनिषदोंमें इसकी कथा प्रसिद्ध है आत्मपुराणमें विस्तार से है ।
विवेकसागर
(११९)
बहुरि क्रोध बोल्यो तहाँ, धरे भार बहु भूमि ॥ मोर भार सहस्रके, जाय पताल झूमि ॥ को मोरी तेजै सहे, कहा बडो अस वीर ॥ ब्रह्मा विष्णु महेश हू, सो उर धरत न धीर ॥ कहे क्षमा पुनि भक्ति सो, हम सब विधि लछु आहि ॥ कब सम्पति यह क्रोधकी, क्यों पटतरि हैं ताहि ॥ क्रोध सुभट बोल्यो तबै, कहत वचन यह क्रूर ॥ मेटो मार विलम्ब नहीं, दया धर्म बड शूर ॥ जैसे कोऊ यत्न करी संग्रहि कीन्हो वित्त ॥ तस्कर पलमें लैगयो, शोक अग्नि जर वित्त ॥ क्षुधा पिपासा नींद पुनि, सिन्धु तरहि ज्यों यार ॥ गोपद लै बोलो तिन्हैं, ऐसेही वरियार ॥ जबै क्षमा सब सहि रहि, गहि रहि भगवत आस ॥ हृदय समझ बोलत भयी, हम तो हैं तुव दास ॥
यों कहत तुरत क्षमा कहे पौरुष बोलेऊ ॥
कुशल कुशल कहि फिर उत्तर खोलेऊ ॥
टीका—हे धर्मदास ! जिस समय क्रोधने महा कटु और हृदयमें शूल उत्पन्न करनेवाले महानिन्द्य वचन कहकर क्षमाके समस्त परिवारको गाली दियो उस समय भी क्षमा शान्तिसे कहने लगी हे क्रोध ! आपने जो कुछ कहा बहुत अच्छा कहा वाह ! वाह ! ऐसेही चाहिये ! इस प्रकार बार बार उसकी स्तुति करती हुई क्षमाने कहा आपने जो कुछ अपना पुरुषार्थ और बल वर्णन किया सब ठीक है । इसमें क्या संदेह आप बहुत बडे हैं । इस प्रकारसे क्षमाके कहनेपर क्रोधने उसकी बातोंको कटाक्ष समझकर और भी अपनी शक्ति अधिक प्रकाशित की । और—