कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
( २८ )
जगजीवनबोध
छठी पडोसिन
यह सब बात बताओ माई । चूल्हे डारो चुल्हन कहाई ॥ जेती नारि आर्यों तेहि बारा । सबहिन आपन मता उचारा ॥ कोह काहू कोह काहु बतावैं । स्यानप आपन सबहि जतावैं ॥
ओझा और स्याने
बुढवै एक जो सीस धुनावैं । वाके शिर पर भैरों आवैं ॥ सो कह हमको बैल बधाओ । भैरोंसिघ कही बतलाओ ॥ देवी पूजक एक तब आया । देवीसिंह तब नाम बताया ॥ गाजी मुर्गी कोह चढ़ावैं । गाजीदीन तब नाम बतावैं ॥ यहि विधि अनेकनहू आये । आपन आपन उक्ति सुनाये ॥
पुरोहित
घरको पुरोहित ऐसी कही । मनको मनोरथ पूरण सही ॥ यह तो बडा सपूत कहावै । इनके तुलै कोह नहीं आवै ॥ पुरोहित कह यजमान है मेरा । कुल देवी भैरोंका चेरा ॥
चारण और भाट
चारण भाट जपै महामाई । भोजक भाट तहां चलि आई ॥ सबही मिलि दीनी आशीशा । महामाइ सुत कीन्ह बरखीशा ॥
मुसलमान फकीर
दवैश एक कहै समुझाई । नाम फकीरा कहो रे भाई ॥ बांधि गांठ गले में दीजे । सब पीरों का चारण लीजे ॥
योगी
जोगी एक तहां चलि आया । मेरी भभूत का परचा पाया ॥ कहा हमारा सुनिकै लीजे । याका नाम सदाशिव दीजे ॥
दिगम्बर
यन्त्र मन्त्र जतीकरि लाये । करि तावीज गले पहराये ॥ व्रत्र वटु सूअरदांत मंगायी । एक सुपारी माहि मढायी ॥
पिशुनके फेरमें पड़कर जगजीवनका गर्भका कौल भूल जाना और संसारी बंधनोंमें मगन होना
बाधसागर
( २१ )
भोजपत्रमें यंत्र मढाया । सात भांतिका रेशम लाया ॥ गूगल बारि धूप लै कीन्हा । सो पहिराय गलेमें दीन्हा ॥
पण्डित लोग
ब्राह्मण सबही नगरके आये । पत्रा पोथी साथहिं लाये ॥ पीपल केरे पान मँगाया । लगन साधिके नाम सुनाया ॥ जगजीवन नाम जनमका सही । याका मरण होय ना कबही ॥ द्रव्य माल दक्षिणा दीना । जनमपत्रिका लिखाय जो लीना ॥ बहु विधि सो संस्कार कराया । मोह फाँसमें पकरि दवाया ॥ गर्भ कौल तो सब विसराना । अमर रहनका जतन बहुठाना ॥ एक सो बात गुप्त ना होई । स्याना लोग कहैं सब कोई ॥ फन्द अनेकन में फन्दई । कौल किया सब गया भुलाई ॥ झूठे झूठ मिलै सब कोई । इन्ते काज एको नहिं होई ॥ पिछली कौल सबै विसरानी । महा जालमें बँधे प्राणी ॥ यह सब झूठे पाखण्ड साजू । इनसँ सरे न एको काजू ॥ साखी-कहैं कबीर सब चेतहूँ, आगे काल कराल ।
आल जँजाल तम छाडिके, पिछले लोक सँभाल ॥
चोपाई
जौन कौल गर्भ में कीया । मूरख विसारि-सब दीया ॥ फिर भी कठिन हो गया भाई । तुम करिहौ कौन उपाई ॥ इतने सब मिलि करहिं बधाई । तामें तेरा कौन सहाई ॥ तुम अबकी चेतौ जो नाहीं । मानुष जनम भाग बड पाही ॥ साखी-ये तेरे मित्र नहीं, सब वैरी करि जान ।
उबरा चाहो कालते, गुरुहि मित्र कर मान ॥
चोपाई
एक जीव बेरी बहुताई । यूथ युत्थ बाटन सब लाई ॥ कोई जीवको का तकसीरा । सबको जडिया मोह जँजीरा ॥
( ३० )
जगजीवनबोध
ज्ञान ध्यान जिव कैसे पावैं । इतने पिशुन ताहि भरमावैं ॥ देखो दिलै करि ज्ञान विचारा । किहिविधि उतरो भवजल पारा ॥ रे कुबुद्धि दुख में मत झूले । पिछला काल बोल मति भूलै ॥ इक दिन फेरि परैगा गाढा । सुशुक बांधि यम करिहैं ठाढा ॥ तुम मति जानो अमर है काया । यह दीसै सुपनेकी माया ॥ यहि चकचौंध भुलो मति कोई । संवल फूल जैसा तन होई ॥ जैसे नींद में सुपना आवै । जागि परै तब कछू न पावै ॥ यह तन ऐसे देखो भाई । झूठे झूठ मिलैं सब आई ॥ दिनाचार चटक दिखलावै । अन्तकाल ग्रासन कूँ धावै ॥ काल जंजाल सो छूटा जाई । गुरुसे प्रीति करो रे भाई ॥ सतगुरु ऐसी युक्ति लखावै । जासे जीव परम पद पावै ॥ सुनो जीव अबूझ की बाता । जनम गवाँवै करम कमाता ॥ हर्ष मोह मैं सबहि सुनाऊँ । जेते घर में सबहि दिखाऊँ ॥ एक वर्ष लगि डोल डोलावै । पशू रूपमें जनम गँवावै ॥ उखली जीभ तोतला बोलै । मातु पिता सब हर्षित डोलै ॥ आज जंजाल बोले बहकावे । त्यों त्यों हरष हिये नहिं मावे ॥ परी करै औ ऊभा धावै । बाहर भीतर दौड़ा आवै ॥ कंचन घँघुर बेगि गढ़ाई । रेशम केरी डोर पोवाई ॥ सोना रूपा बहु पहिराया । हीरा मोती भूल भुलाया ॥ बालन सँग में खेलन जावै । नाच कूद के घरही आवै ॥ मनमें आनंद करै चँचलाई । सोच फिकर कछु व्यापे नाई ॥ करै कुतूहल मनमें सोई । दिन दिन तेज सवाया होई ॥ आकुल बोलै सोच न आने । कूर कपट कर बहु सुख गाने ॥ संकटका दिन चित्त न आवै । करै अनीति जोई मन भावै ॥ चित्तमें दुर्मति रहै अति घनी । महा दुष्ट बुद्धि पापी सनी ॥ द्वादश वर्षकी भयी है देही । अनन्त उपाय करै नर केही ॥
बोधसागर
( ३१ )
प्रगट काम काया के भीतर । सोच फिकिर नहिं व्यापे अंतर॥ अन्ध करै बहुत अहंकारा । निरखै तिरिया घर घर द्वारा॥ परवश दूती आनि मिलावै । जोर करै तो पकरि मगावै ॥ नाहकको तू कान लगावै । नहिं मानै तो यमघर जावै ॥ अघ करमी होय तन डोलै । जोर बहुत गरभ सो बोलै ॥ आंखिन माहीं वर्षे लोई । ज्ञान ध्यानकी सुधि ना होई ॥ गुरु चरचाके निकट न जावै । हँसी मसखरीसों मन भावै ॥ झूठी बात करै लबराई । तासों हेतु करै मितराई ॥
साखी—यह नर गरभ भुलाइया, देखि मायाको झोल । कहै कबीर सब चेतहु, सुमिरि पाछलो कौल ॥
चौपाई
इन्द्री स्नेह न मानै चेता । माया गर्ब फिरै मैमंता ॥ ईगुण प्रगटा अन्तर माहीं । कामातुर होय करी विवाही ॥ पहले विवाही एक लुगाई । बहुत प्रेम सँग ताहि लिवाई ॥ विषय विवेक फिर उपजा भारी । पीछे व्याही सुन्दरि नारी ॥ अँगारस्वरूप कामिनि अधिकार्ई । कामातुरसों रहे लपटाई ॥ महा अनन्द भये मन माहीं । एक पलक सँग छाड़े नाहीं ॥ करै खवासी कहत है दासी । बन्धा मोह जाल की फांसी ॥ खिदमतगार सहेली घनी । कई नायिका कई रामजनी ॥ नव नव खण्डके महल बनाये । सेना केरे कलस चढाये ॥ करी बिछावन तहैं बडभारी । गादी तकिया बहुत अपारी ॥ बहुत मोलको अतर मँगावै । फूलन केरी सेज बिछावै ॥ कहैं लगि बरनूं यह विस्तारा । मायाविनको बार न पारा ॥ टपका स्वाद भया तर अन्धा । आवै यम तब करै बहु फंदा ॥ नित नित त्रिया नई संयोगा । खान पान और षट रस भोगा ॥
सद्गुरुका पाटनमें पहुँचना और एक सूखे बागमें ठहरना, उसका हरा हो जाना और राजाका खबर पाकर बाग देखने आना फिर कबीर साहबसे मिलना
( ३२ )
जगजीवनबोध
मता विषय रस कछू न सूझे । भैरों भूत शीतला पूजै ॥ भूलै कौल गरभकी बांधी । अब चकचौंध आई आंधी ॥ सबही जीव कौलकरि आवै । बाहर निकसि सब बिसरावै ॥
सतगुरुके आगमन
ऐसे जीव भूल रहे सारे । तब सतगुरु आइ पगु धारे ॥ जीव चितावन सतगुरु आये । अलीदास धोबी समझाये ॥ और हंस बहुत चेताये । फिरत फिरत पाटनपुर आये ॥
सतगुरुका पाटनपुरमें पहुँचना
सतगुरु आये पाटन ठाऊँ । जगजीवन राय बसै तेहि गाऊँ ॥ राय न मानै भक्ति विचारा । हँसे भक्तको बारम्बारा ॥ भक्त रूप सब शहर निहारा । कोउ न मानै कहा हमारा ॥ तब आपन मन कीन विचारा । कैसे मानै शब्द हमारा ॥ जाइ बाग में आसन कीन्हा । गुप्त रहे काहू नहिँ चीन्हा ॥ द्रादश वर्ष भये बाग सुखाने । सुलगे काछ होय पुराने ॥ चार कोस तेहि बाग लम्बाई । तीन कोसकी है चकलाई ॥ तहाँ जाय आसन हम कीन्हा । रहौं गुप्त काहू नहिँ चीन्हा ॥ तहवाँ मैं कौतुक अस कीया । सूखे बाग हरा कर दीया ॥ विकसे पुढुप जीव सब जागे । सबने हरियर देखा बागे ॥ माली जाय कै दीन बधाई । जागा भाग तुम्हारा भाई ॥ देखा बाग जाय तेहि वारा । फल फूलनका अन्त न पारा ॥ हर्षा माली बाहर आया । देखा बाग बहुत सुख पाया ॥ फूलन छाब भरी दुइ चारी । नाना विधिके फूल अपारी ॥ नाना विधिके मेवा लाया । ले माली दरबारि आया ॥ बैठा राजा सभा मैझारा । उमरावनको तहाँ न पारा ॥ माली सब ले धरी रसाला । राजा पूछ करे ततकाला ॥
बोधसागर
( ३३ )
राजा जगजीवन बचन
कौन देश तैं माली आया । फूल अन्नप कहाँसे लाया ॥ कौन बाग के फलन विशेषा । कानो सुनी न आँख न देखा ॥
माली बचन
नौ लखा बाग रहा होय आया । फल प्रसून सब नये बनाया ॥ सुनिके राजा हरषा भारी । संग उठी चली परजा सारी ॥
राजा बचन
कहु दिवान यह कौन प्रकारा । समझि बूझिके करो विचारा ॥ ज्योतिषी पण्डित सवैं बुलाये । पत्रा पोथी सबहीं लाये ॥
ज्योतिषी बचन
लगन सोधि सब ऐसी कही । कोइ पुरुष यहाँ आये सही ॥ है कोइ नर कै कोइ पखेहू । सोधो जाय बाग सब हेहू ॥ हेरे राय बागके माहीं । बैठे संत यक ध्यान लगाहीं ॥ राजा जाय धरा तब पाई । नगर भरेकी परजा आई ॥ कहे राजा धन मेरो भागा । दर्शन पाय अमर होय लागा ॥ आलसी घर गंगा आयी । मिटि गई गर्मी भयी शितलायी ॥
सतगुरु बचन
तब राजासों कही पुकारी । सुन राजा एक बात हमारी ॥ हम जनि भार चढाओ भाई । काहे को तुम देहु बड़ाई ॥ अच्छा बाग विमल हम चीन्हा । तासो आये आसन कीन्हा ॥ ऐसा तुमहीं बाग बनाया । नाना विध के रख लगाया ॥ आसन किया देखि हम ठारी । बहुत फूल फलकी अधिकारी ॥
राजा बचन
फिर कै राजा शीस नवाया । द्वादश वर्ष भये बाग सुखाया ॥ सूखा बाग भये बहु बारा । नहिं कोइ लोक आहे संसारा ॥
नं. ५ कबीरसागर - ३
सद्गुरुका राजाको गर्भका कौल याद दिलाना
( ३४ )
जगजीवनबोध
छाडी फल फूलनकी आसा । कोइ न आवै बागके पास । ॥ तुम समर्थ पग धारे आई । हरा हुआ बाग सब ठाई ॥ राजा कहै दया अब कीजै । मोकूँ मुक्तिदान फल दीजै ॥ मेरे मस्तक धरहू हाथा । मैं रहूँ सतगुरु तुम्हारे साथ । ॥
सतगुरु वचन
तुमको कौल भुलाना भाई । किया सो कौल गया बिसराई ॥ संकट गरभ में बाचा दीन्ह । बाहरनिकसि करमबहु कीन्ह ॥ किया कौल जब गये भुलाई । तब हम आइके चरित दिखाई ॥ बहु विधि बात कही चेताई । बाहर निकसि बुद्धि पलटाई ॥ तुमको तो कछु सूझत नाही । फन्दा मोहजाल के माहीं ॥ आवै यम दश द्वार मून्दी । तबहीं बांधि करेगा कून्दी ॥ सोच बूझ देख मन माहीं । इतने में तेरा कौन सहाहीं ॥ पिसुन मिलै सब वार न पारा । नरक बास में नाखन हारा ॥ बहु विधि तुमसों शब्द पुकारा । किया कौन नर भूल गवौरा ॥ घर घर हम सब कही पुकारी । कोइ न मानै कही हमारी ॥
हे राजा जब तू मातृगर्भमें था तब तू वचनवद्ध हुआ था कि भजनके अतिरिक्त अब और कुछ न करेगे । उस दुःखमें तो तू पुकारता था तथा हाय हाय करता था, कि मुझको इस दुःखसे निकालो । जब तू गर्भके बाहर आया तब तू अपनी प्रतिज्ञा भूल गया और शारीरिक कामना तथा पशुधर्मके वशीभूत होकर तूने कौन कौनसे कुकर्म न किये ? सत्यगुरुकी दयाको तू एकबारगी भूल गया, भोगविलासमें फँसकर अन्धा हो गया और मायाने तेरे ज्ञानको बिलकुल ही नष्ट कर दिया । जब यमदूत आवेगे और तेरी मुश्कें बांधकर नरक में लेजावेंगे तब तेरा कौन मित्र सहायता करेगा ? और तुझको उनसे कौन छुड़ावेगा ? राजा ! तू सोच तथा समझ कि, वे लोग जिन्हें तू अपना
राजाका सद्गुरुसे उद्धारकी विनती करना
बोधसागर
( ३५ )
मित्र समझता है उनमें से कौन तेरा उस समय सहायक होगा ? कौन तुझको नरकसे बचावेगा ? गर्भमें मैंने तुझको बहुत सम- झाया था सो हे गँवार ! तू उन सब बातोंको भूल गया मैंने सबसे घर घर पुकार कर कहा मेरा कहना किसी मूर्खने न माना । इतनी बात सुनकर राजा बोला ।
राजा बचन-चौपाई
अब तो गुरु होहु सहाई । मोकों यमसे लेहु छुड़ाई ॥ सबही करम बरुसकै दीजे । हूबत मोहि उबारके लीजे ॥ सैन करी पालकी मँगाई । लै सद्गुरु को माहिं बिठाई ॥ पाँव उधार काँध धर लीन्हा । तबही महल पयाना कीन्हा ॥ सद्गुरु पग धर महलके माहीं । सब रानिनको राय बुलाहीं ॥ समरथ दर्शन दीन्हा आनी । धनधन भाग्य तुम्हारो रानी ॥ सद्गुरु को पलँगा बैठाई । सब मिलि पाँव पखारो आई ॥ राजा भाखे शीश नवाई । मोकों राखो गुरु शरनाई ॥ करिये सद्गुरु जीवको काजा । दया करो मैं लाऊँ साजा ॥ अब हम शरना लेब तुम्हारी । दया करो तन दुखत हमारी ॥
सतगुरु बचन
तब कहे सतगुरु लेहु सँभारी । राजा सुनहु बात हमारी ॥ कस चले राजा लोक हमारे । मैं नहिं देखूँ लगन तुम्हारे ॥ कोटिन ज्ञान कथे असरारा । बिना लगन नहिं जीव उबारा ॥ जो कोई बूझे भक्ति हमारी । ताको चहिये लगन सँचारी ॥ जैसे लगन चकोरकी होई । चन्द्र सनेह अँगार चुगोई ॥ ऐसे लगन गुरुसे होई । धर्मराय शिर पग धर सोई ॥ तुम तो हो मोटे महाराजा । कैसे छोड़िहौ कुल मर्यादा ॥ कैसे छोड़िहौ मान बड़ाई । कैसे छोड़िहौ मुख चतुराई ॥ कैसे छोड़िहौ हाथी असवारा । कैसे छोड़िहौ अंथ भँडारा ॥
सद्गुरुका राजाको आरती करनेका उपदेश देना
( ३६ )
जगजीवनबोध
कैसे छोड़िहौ काम तरंगा । कैसे राजसे करो मन भंगा ॥ कैसे छोड़िहौ कनक जवाहिरा । कैसे छोड़िहौ कुल परिवारा ॥ तुम तो उनकी बांधी आसा । हम तो राजा कथैं निरासा ॥ जो तुम तजु अन्तरकी बाथा । तबहीं चलो हमारे साथा ॥ भक्ति कठिन करी ना जाई । काहे को हिंस करत हो राई ॥
राजा वचन
राजा कहे दोऊ कर जोरी । सुनिये समरथ बिनती मोरी ॥ नगरके सब षट् बरन बुलाऊं । यहि अवसर सब माल लुटाऊं ॥ तुम तो कह्यो बाहर लेव वासा । मैं तो देहकी छोड़ों आसा ॥ अमृत वचन पियाओ आनी । हंस उबार करो निरबानी ॥ नगर कोटकी छोड़ी आसा । निश दिन रहूं तुम्हारे पास ॥ हुकुम करो सोई मैं लाऊं । करो दया मैं शीस नवाऊं ॥ उमँग उठे हर्षित मन मोरा । थकित भये जनु चन्द्र चकोरा ॥ सूखा बाग जो फल परकाशा । तबते पूजी मनकी आशा ॥ कसनी कसो सो सहुँ शरीरा । तबहुँ प्रीत न छोड़ूँ तीरा ॥ जो तुम कहो सो भक्ति कराऊँ । दया करो तो शीश चढाऊँ ॥
सतगुरु वचन
तब समरथ अस शब्द उचारा । अब आरति का करो विस्तारा ॥ चार गुरुको चौक पुराओ । तिनका तोरायके जल अरपाओ ॥ राजा गर्भ निवारौं तोरा । भाव भक्तिसे करो निहोरा ॥ भाव भक्ति हम चाहें राजा । धन सम्पत्तिसे न कछु काजा ॥
राजा वचन
दया करो सो साज मँगाऊँ । कौन वस्तु ले आगे आऊँ ॥ मैं हूँ जीव मतीका भोरा । कहैं जानूँ चौका के व्योरा ॥ समरथ कहौ मैं आनूँ सोही । चौका जुगति बताओ मोही ॥ करहु गुरु चौका विस्तारी । जीवहि यमसों लेहु उबारी ॥
राजाका पहलेके हंसोंका हाल पूछना और सद्गुरुका उत्तर देना
बोधसागर
( ३७ )
सतगुरु वचन
चार गुरु को साज मँगाओ । चार सवा सौ पान लै आओ॥ चार सवा सेर कन्द मँगाओ । आठ अंश नारियल लै आओ॥ चार माला अरु लोटा चारो । सतगुरु आगे लाकर धारो ॥ चार थाली चार गादी कीजे । चार चँदोवा ताने लीजे ॥ चार कलस जल भरि धरवाओ । तब सतगुरुके आगे आओ ॥ सब यह साज आगे धरि दीन्हा । तब सतगुरुसे विन्ती कीन्हा ॥
राजा वचन
मैं हूँ जीव करम बहु कीना । कैसे यमसों करिहो भीना ॥ गिनत गिनत नहिं आवे चीना । बारम्बार मैं औगुन कीना ॥ ऐसा करम किया मैं भारी । कैसे यमसे लेहो उबारी ॥ एक बात गुरु कहौ विचारी । मोसम पतित आगे कोइ तारी॥ तब सतगुरु बहुत विहँसाने । फिर राजासों निरणय ठाने ॥
सतगुरु वचन
सतगुरु सत्यसुकृत मम नाऊँ । जाइ मथुरामें धारेउँ पाऊँ ॥ खेमसरी ग्वालिनी उबारी । बहुत जीव लै लोक सिधारी ॥ द्वादश पहुँचे पुरुष हजुरी । और हंस द्रौपन मँझुरी ॥ त्रेता युगे मुनिन्दर नाऊँ । नगर अयोध्या धारे पाऊँ ॥ हंस बयालिस लीन्हा लारा । पहुँचे तहाँ पुरुष दरबारा ॥ और हंस द्रौप महाँ गयऊँ । जिन जैसी जिव देह बनयऊँ ॥ अब द्वापरका कहुँ विचारा । नरहर राजका किया उधारा ॥ सात सौ हंस पावन कीन्हा । कुटुम्ब सहित पयाना दीन्हा ॥ चन्द्रविजय घर इन्दुमति नारी । संकट राजा लीन उबारी ॥ केता पूछो जीव सनेही । गिनत गिनत ना आवे छेही ॥ युगन युगन भवसागर आऊँ । जो समझे तेहि लोक पठाऊँ ॥
( ३८ )
जगजीवनबोध
शब्द हमारा मानै कोई । तौ नहिं जाय यमपुरी सोई ॥ इतनी बात कही समझायी । दिल राजाके प्रतीति समायी ॥
राजा वचन
धन्य भाग मेरा कुल कर्मा । कोटित यज्ञ कियो तप धर्मा ॥ सत्यगुरु आयदरस मोहि दीन्हा । बूझत हंस उबार कै लीन्हा ॥ हो प्रभु मोर करो निवैरा । मै तो चरण कमलका चेरा ॥ कहु सन्देश नगर में भाई । जय जीवन राय लोकको जाई ॥ नेगी जोगी सबहि बुलायी । और नगरकी परजा आई ॥ चन्दनका सिंहासन कीन्हा । चौका पूरि कलश धरि दीना ॥ सतगुरु शब्द उचारे लीना । युक्ति साजि गादी पगु दीना ॥ सब रानिनको बेगि बुलायी । करि दण्डवत् गुरुचरणा आयी ॥ जीव प्रति नरियल ले आये । सो सतगुरु को आनि चढ़ाये ॥
सारखी-सब रानी बिन्ती करें, सुनु समरथ चित लाय ।
महा अकरमी जीव हम, सबहि लेहु सुकताय ॥
चौपाई
जेठी रानी चन्द्रमति जोई । सतगुरुकी गति जानी सोई ॥ दूजी रानी है मनकी युक्ती । निर्भय होय करै गुरु भक्ती ॥ तीजी रानी है मनपोई । लज्या कारण ना मानै कोई ॥ चौथी रानी भानुमति आही । जीवत सती सुजानो ताही ॥ पांचवीं रानी धन्ना बाई । कलावंत होय आगे आई ॥ छठवीं रानी प्राणप्यारी । पूजे सन्त वह लाज निवारी ॥ सतई रानी है सत मामा । निर्भय होय जपै गुरु नामा ॥ अठवीं आनन्दकला है रानी । सतगुरुसों प्रीति निज ठानी ॥ नौवीं रानी नामपियारी । भक्तिवंत जाने संसारी ॥ दशवीं रानी है दिल दायक । सब रानीकी सो है नायक ॥ ग्यारहवीं रानी है रंगरोपा । ताके कारन राव नहिं लोपा ॥
राजा रानी इत्यादि सब परिवारका सद्गुरुकी शरणमें आना और राजकुंवरका हठ करना पीछे शरणमें आना
बोधसागर
( ३९ )
बारहवीं रानी सूरजमती । हंस रूप है ताकी गती ॥ द्वादश रानी सब बनि आयी । एक अंग होय सब भक्ति करायी ॥ राजा छडीदार पठवाई । तो वो कुँवरको लाय बुलाई ॥
छडीदार बचन
छडीदार कहै कर जोरी । राजकुँवर सुनु विन्ती मोरी ॥ राजा रानि गुरु चरणै आये । ताते तुमको बेगि बुलाये ॥ गरभवाससों करै निरुवारा । तुरत चलो जनि लावो बारा ॥
कुँवर बचन
तुम छडीदार कहो बात विचारी । कैसा गुरु है सो अधिकारी ॥
छडीदार बचन
हम मति हीन कछु नहि जाना । निश्चय आही पुरुष पुराना ॥ यह सुपने नाहीं कहुँ देखा । सुर मुनि नारद शारद पेखा ॥
कुँवर बचन
कुँवर बीनती कीन सुहाती । सुनतैं बात जुडानी छाती ॥ हंस रूप चारों हैं भाई । उमंग हरष हिये नाहि समाई ॥ जहाँ सतगुरु आसन कीन्हा । कुँवर चार आइ दर्शन लीन्हा ॥ बडा कुँवर वह सूरजभाना । गुरु स्वरूप हृदय में आना ॥ दूजा कुँवर इन्द्रमन दासा । शब्दै पीवै शब्दकी आसा ॥ तीजै कहिये चतुर्भुज कुमारा । शब्द सुनत वह सीस उतारा ॥ चौथा कुँवर विक्रम दासा । जिन तन मनकी छोडी आसा ॥ चारों कुँवर धरे गुरु पाई । तन मन धन सब प्रीति चढाई ॥ कदलौ केर पतवार धरायी । गज मुक्ताहल चौक पुरायी ॥ नरियल मोरि के मालूम कीन्हा । लिखि परवाना सबकूँ दीन्हा ॥ इतने हंस भये मन भावन । तिनको सतगुरु कीन्हा पावन ॥ तन मन धन सो बदला कीन्हा । शिरके साँट साहबको चीन्हा ॥ करी निछावर मेटे गर्भफेरा । अब तो भई भगतिकी वेरा ॥
कुकर्मी जीवके उद्धारका उपाय
( ४० )
जगजीवनबोध
सतगुरु वचन
तुमरी राय भली बनि आही । तुम गरभवासकीकौल निबाही॥ जोई कौल गरभका पालै । ताको सतगुरु होहि दयालै ॥ गरभ कौल कोई चूके भाई । असंख्य जन्म चौरासी जाई ॥
साखी-गरभ कौल चूके नहीं, वोही हंस सुजान । चौरासी भरमें नहीं, सो पहुँचे यहि परमान ॥
राजा--वचन चौपाई
राजा कहै दोऊ कर जोरी । सुनु समरथ यह विन्ती मोरी॥ महाकुर्मी जो होय प्रानी । करमनसे कैसे होय छुटानी ॥
सतगुरु वचन
तब समरथ गुरु शब्द उचारा । करमन काटि कहैं निरवारा ॥ असंख्यजन्म कर्म किय आयी । पान पान में करम कटायी ॥ जो जिव कर्म करै निरवारा । पाख पाख में कर्म सुधारा ॥ विना पान नहि कर्म कटाई । कोटिन ज्ञान करै जो भाई ॥ रेखा गुंज विचारै जानी । विना गुंज करै जिव हानी ॥ युग छत्र सो हंस उबारा । छत्र मुनी से उतरे पारा ॥ युग बन्धन ते शिष्य करीजै । असंख्यजन्मका कर्म जो छीजै॥ जैसा जीव तैसा होय पाना । सबही करम होय छय माना ॥ लगन जैमुनि आवै हाथा । धर्मराय तेहि नावै माथा ॥ गुरुशिष्य युक्ति एकजो आवै । पारसपान छत्र मुनि पावै ॥ पान एकोतर लैहैं जोई । असंख्य जन्मका कर्म नशाई ॥
राजा वचन
राजा सतगुरु विनती लायी । लगन जैमुनि देहु बतायी ॥ लगन जैमुनी कैसे पावै । कैसे सतगुरु सों लौ लावै ॥ कौन जुगति चरनामृत लेही । कैसे करै जो बने विदेही ॥
बोधसागर
( ४१ )
कौन वस्तु कहाँ लै आवै । काह भेट गुरु आगे धरावै ॥ लोकलोक गुरु कहो समझायी । कहौ हंस कहैं जाय समायी ॥ कैसे पावै लोक निवासा । कौन कौन घर करिहै वासा ॥
सतगुरु बचन
तब सतगुरु अस बचन उचारा । शिष्य होय सौपूँ भंडारा ॥ शिष्य होय सँवारे देही । लोक द्वीपकी गम्य तब लेही ॥ शिष्य होय गुरुवश करलीजै । तन मन धनही नथर कीजै ॥ जो कछु आपन भक्ति करावै । पान पान सँग लोक पहुँचावै ॥ ताकी देह बनत है भाई । तामें हंस तब जाय समाई ॥ जोइ वस्तु ध्यानमाँहि चढावै । सोई हंसा सत्यलोक पहुँचावै ॥ ताका नाम रेवती भाई । विना शिष्य कोइ पावै नाई ॥ तन मन धनको नेह न आवै । तब जिव लगन जैसुनी पावै ॥ तब राजा मन हरष अपारी । करहु शिष्य जाऊँ बलिहारी ॥
कुँवर बचन
कुँवर कहै विलम्ब किमि साहूँ । दया करो हो शीस उताहूँ ॥
रानी बचन
रानी मनमें हर्ष अनन्दा । मानों ऊगे कोटिक चन्दा ॥ तन मनसे करिहौं गुरु सेवा । हमको शिष्य करहु गुरु देवा ॥ अन्तर बात सब देहु बनायी । जैसे सीप मोती कूँ भायी ॥
सतगुरु बचन
करनी कठिन सत्य करिजानो । कहनि करनि बहुभेद बखानो ॥ कठिन करनी टले जो भाई । ताकर जीव बहुत दुख पाई ॥ शिष्य होय जब कौल बँधावे । तन मन धन सब आनि चढावे ॥ किये कौल निबाहे पूरा । करे गुरुसेवा शिष्य सोइ शूरा ॥ पूरा होय के शूर कहावे । सतगुरु बचन सदा लौलावे ॥
१ भाव ।
( ४२ )
जगजीवनबोध
करी कौल निर्बाहे नाहीं । ऐसो शिष्य सो यम मुख जाहीं ॥ तन मन चढावे वही सुख पावे । आखिर धन यौवन बहि जावे ॥ कौल करे सो जाल भुलाई । अँटके भव में नाहिं सहाई ॥ किया कौल टालि जो देई । बहु दुख संकट माथे लेई ॥ होय दुखी दुख देह समावै । ताकी देह रोग है आवै ॥ गुरु को दोष देहु जन कोई । आज्ञा मेटे सजा तेहि होई ॥ सो जिव कदी न उतरे पारा । करन द्वेष जो गुरु से धारा ॥ अन धन ताकहैं चहिये भाई । जापर सतगुरु होहि सहाई ॥ कर्म सतगुरु दया कटावे । साहब ध्यान सो फल यह पावे ॥ गुरु छोडि जो कर्म करावे । उन मनमें जो लीन रहावे ॥ सो नहिं पावै वस्तु अपारा । मनमें देखहु करहु विचारा ॥ सहज भक्ति करो तुम भाई । होय शिष्य नहिं डर कछु ताई ॥ सहज भक्ति राजा तुम करहु । शिष्य होइ भक्ति पद तरहु ॥ सहज भक्ति सबही सुखदाई । कठिन कमाई दुस्तर भाई ॥ कठिन कमाई खाँडेकी धारा । सहज भक्तिसे उतरो पारा ॥ सदा सुखारि भक्ति रस पीजै । मूली ऊपर घर नहिं कीजै ॥
राजा वचन
सब कर्म कठिन सहज कर जानू । तन मन धन कर लोभ न आनू ॥ हमको सीख अब देउ गुसाई । कौल कहैं सो चूंकू नाई ॥ जो कहैं चूकि कौल हम जावै । अपनी करनी हम भरि पावै ॥ कौल चुके सो मूँढ गवारा । विनु स्वारथ जग होवे ख्वारा ॥ रंकके हाथ रतन जो आवे । कौडी बदले काह गवाँवे ॥ अब सतगुरु दाया मोहि कीजै । चूके कौलका फलहि कहीजै ॥ फिर कैसे सो सुख पावे । कैसे वह फिर कौलमें आवे ॥ कैसे निर्धन धनै बहोरे । कैसे रोगी रोग सो छोरे ॥ अब करु शिष्य शब्द मुहिदीजै । नहिं तो देह त्याग हम कीजै ॥
आरती कराकर राजा तथा अन्य जीवोंका पान लेना
बोधसागर
( ४३ )
साखी-चरण वन्दुँ कर जोरिके, सतगुरु सुनो पुकार । लगत जैसुनि जब मिले, तबही करब अहार ॥ सतगुरु वचन-चौपाई
ऐसे कष्ट करो मत भाई । करो विचार मैं कहूँ सुनाई ॥ करो आरती साज मँगाओ । लेई पान परम सुख पाओ ॥ प्रथम सिंहासन लाइ बिछाओ । सर्वजीव एकसुरति होय आओ॥ सवा सै पान जीव प्रति लाओ । सवा सेर महाकन्द मँगाओ ॥ कपडा बस्तर धातु धराओ । ताँबा पीतल बर्तन लाओ ॥ सोना रूपा मोती हीरा । लाल जवाहिर बने सो चीरा॥ जैसो साज जोई लैं आवै । तैसो हँसा देह बनावै ॥ इतनी साज नहीं बनि आवै । ताके हेतु यह गौ ठहरावै ॥ गौ नाम पृथ्वी का होई । पृथ्वी नाम यह देह संजार्ई ॥ सोधन चले अग्रकी धारा । अगर वास तहैं होय अपारा ॥ पान संग सो देउँ पहुँचायी । लोक जात सो बार न आयी ॥ जब सतगुरु आज्ञा फरमायी । तब राजा सब साज मँगायी॥ सब ही राज जब आनि धरावा । तब सतगुरुको तरुत बिठावा ॥ जुगति साजि चरणामृत लीन्हा । तन मन धन अर्पण करदीना ॥ पुनि सतगुरु पान सो लीना । जैसो जीव तैसो तेहि दीना ॥ पाइ पान सबही चित दीना । होय अधीन सत्य सुख लीना॥ तब सतगुरु यक वचन उचारा । सबहीको कह्यो करन विचारा ॥
सतगुरु वचन
सुनु राजा यक कहूँ विचारा । मानो राजा कहा हमारा ॥ जो वस्तु तुम हम सो पाओ । रखो चेत नहि अनत गँवाओ ॥ जुगाओ शब्दै करो कमाई । हट करि रखो नहि देहु गवाई॥ सेवा करत सुरति चलि जायी । तबहि कालघर बजे बधायी ॥ जे जिव शब्द सुरति पर चाले । सबही विधि सो होय निहाले ॥
तन छूटने पर हंसका स्थान कर्मानुसार भिन्न भिन्न लोककी प्राप्ति
( ४४ )
जगजीवनबोध
सारखी-शिष्य होय तनै छिपाइ, ताका कहूँ विचार । कहै कबीर निर्भय नहीं, निश्चय यमके द्वार ॥
राजा वचन-चौपाई
राजा कहै सुनो गुरु मोरा । मैं लागत हूँ चरने तोरा ॥ सहस्र अठासी लोक बताओ । भिन्न भिन्न कै मोहि बुझाओ ॥ कौन हंस कहँ करै बसेरा । सब ही हंस कर कहँ २ डेरा ॥ उत्तर समरथ कहो बुझायी । यह सन्देह उठा मन आयी ॥ खेमसरी को कहा संदेशा । द्वादश हंस उन सँग उपदेशा ॥ चारों युगका कहा संदेशा । बहुते हंस बतायो भेशा ॥ बहुते जीवहि बोध बताये । तन छूटे सब कहाँ समाये ॥ बहुत हंस पहुँचे निज ठाई । तिनकर पता कह्यो समझाई ॥ और हंस कहाँको गयऊ । ताका बहुत संदेहा ठयऊ ॥
सतगुरु वचन
हे राजा तोहि कहि समझाऊँ । भिन्न २ कै वरनि बताऊँ ॥ जे जे जीव परवाना पावैं । सो सो जीव सत्यलोक सिधवैं ॥ परवाना की यहि अधिकाई । हंस विगोय ना कबहुँ जाई ॥ जो हंसा नहि देह बनावै । सो सब मानसरोवर जावै ॥ मान सरोवर दीप अमाना । होइ है चार भानु परमाना ॥ परवाना की यह अधिकाई । योनि गरभ बहुरि नहि आई ॥ ताते ताहि वृत्तान्त बतायी । सकल कामना तोर मिटायी ॥ सत्य सत्य सबको समझायी । जब गुरुको चरणामृत पायी ॥ जो कछु करै सुकृत कमाई । सो सब पान पर देहि चढाई ॥ हेत द्वीपमें पहुँचे जाई । तब ही हंसा देह बसाई ॥ ऐसी विधि जो पान चढावै । निज स्वरूप जीव सो पावै ॥ तापर हंस होय असवारा । पचासी पवन परे सरदारा ॥
राजाका सद्गुरुसे लोक लेजानेको विनती करना
बोधसागर
( ४५ )
जो ऐसी नाहीं बनि आवै । ताके पान संग वृषभ चढावै ॥ वृषभ चढावे पावे सोई । पढुप दीप रूप बहु होई ॥ वृषभ नाम नील है भाई । उनकी शोभा बहुतहिं पाई ॥ नाम नील वरन है स्वेता । ताको रूप कहा कहु केता ॥ जो वृषभ नहीं बनि आवै । तो लै गौ सो देह बनावै ॥ गौ देह सो पान जो पावे । मंजुल करि वह हंस रहावे ॥ दश हजार सुर झलके देही । पहुँचे हंसा होय विदेही ॥ हीरा मोती लाल जवहिरा । पान चढे पुनि देह उजिहिरा ॥ बस्तर दे पुनि पान चढावे । ज्ञान दीपमें लै पहुँचावे ॥ पांच सौ सूर्य समान सरूपा । परसत तहाँ सो होय अनूपा ॥ कंचन रूपा धातु चढावै । तैसो शोभा देहमें पावै ॥ कहुँ पुकार करो निवैरा । देह विना कहँ करै बसेरा ॥
राजा वचन
धरे राम सतगुरुको पाऊ । हो सतगुरु तुम हंस मुकताऊ ॥ सत्यगुरु मैं तुव बलि जाऊ । सर्व भेद तुम मोहिं बताऊ ॥ कछु न मोसे राखु दुराई । देत हौं तुमको पुरुष दुहाई ॥ जो तुम कहौं करौं मैं सोई । तुमसो दिल पतियाना मोई ॥ कृपा करो मैं प्रीति लगाऊँ । कसनी देहु सो सकल सहाऊँ ॥
सतगुरु वचन
तब सतगुरु कहे समझायी । काहे को तुम देत दुहायी ॥ सबही कहौं तुम पूछो तैसी । लोक राह है सो पुनि जैसी ॥ गही बाँहि उबारै तोहि राई । यहि हंसन की अहे कमाई ॥ जो तुम किरिया दीन्हा मोई । कछु न तुम सौं राखूं गोई ॥ यह कहिसतगुरु युगति बनाया । ले राजाको अंक मिलाया ॥ अंक मिला कटी सब माया । पारस रूप जो भई काया ॥
सद्गुरुका प्रसाद पाना
( ४६ )
जगजीवनबोध
अंक मिलाया भये नृप पारस । उघडी दृष्टि अधिक भै आरस॥ लोक द्रौप दृष्टि भै आई । भिन्न भिन्न सब द्रौप दिखाई ॥ भये राजा मन महा अनन्दा । मानो ऊँगे पूर्ण चन्दा ॥
राजा वचन
धन सतगुरु तुम्हरी बलिहारी । बूडत जीव तुम लीन्ह उबारी ॥ अब सतगुरु प्रसाद कछु कीजै । महा प्रसाद जीवनको दीजै ॥
सतगुरु वचन
सतगुरु कहै सुनो तुम राई । महा प्रसादकी जुगति बताई ॥ कंचन केरी थार मँगाओ । अमृतकी झारी भर लाओ ॥ आसन डारिके पुरुष बैठोओ । स्वेत बहुत सब हंस ले आओ ॥ इतना करि तब चरण खटारो । होय अधीन तन मनको मारो ॥ सुनि राजा सब युक्ती लीन्हा । सतगुरुको बहु बन्दन कीन्हा ॥ चरणखटारि पोंछि जब लियऊ । आसन बिठाय पुरुष कहँ दियऊ ॥ तब सतगुरु अस करबे लीना । सीथ प्रसाद सबनकूँ दीना ॥ पाय प्रसाद भये बड भागा । शून्य महल मन मोहरा जागा ॥ कहै समरथ कहु कैसा स्वादा । कहत बने नहि बनत अघादा ॥
सारखी-महाप्रसाद के करतही, निःतत्त्व होय जाय ।
रंचक घटमें संचरे, सतगुरु लोक दिखाय ॥
राजा वचन--चौपाई
सतगुरु कहिये बात विशेषा । लोक द्रौप सबही हम देखा ॥ धन्य सतगुरु तुम्हारे बलि जाऊँ । लोक द्रौप सब दृष्टिहि पाऊँ ॥
सतगुरु वचन
चौका युक्ती नहीं बनि आवै । महा प्रसाद कै देह बनावै ॥ तुमसे राजा कहु समझायी । पाख मास भै पान तुम पायी ॥ पुरुष पान सो पावे जबहीं । अगम ज्ञान सो सूझे तबहीं ॥
पान माहात्म्य
बोधसागर
( ४७ )
यही ज्ञान मैं भेद समझायी । तुम हंसन से कहो बुझायी ॥ हमरो प्रतिहार पान है भाई । पलपल खबर हंसकी लाई ॥ सोई वस्तु लै लोक पहुँचावे । सोई पान संग हंसन आवे ॥ जाका तुमसे कहूँ विचारा । पान लहे सो हंस हमारा ॥ जैसुनि लगन पान जो पावे । निर्भय लोक हमारे आवे ॥ पान परख विन झूठ कडिहारा । धोखे लेइ जिवन कर भारा ॥ धर्मराय माँगि है पाना । जब ही हंसा करे निर्वाना ॥ साखी-सब ही पहुँचे लोकमें, चढै पानपर अंक । कटे कर्म सब जन्मके, हंस होय निःशंक ॥
हंस ( राजा ) वचन-बोपाई
हंस कहे सुनो गुरुदेवा । जीवकि अवधि बताओ भेवा ॥ जादिन अंत अवस्था आवे । ताकर भेद हंस किमि पावे ॥ सोम शुक्र दिन औ बुधवारा । ताका कहिये चन्द्र सरदारा ॥ आपनि आपनि चौकी आवै । तौ यह जीव बहुत सुख पावै ॥ चले चूक चौकी कर फेरा । तौ कायानगरमें होय बखेरा ॥ गुरुबारका भेद बताऊँ । दो भावै गुरु दरस दिखाऊँ ॥ एकै आवै एक न आवै । ता दिन जीव बहुत दुःख पावै ॥ बार तिथि चौकी चूक करही । तो निश्चय ना बाचै देही ॥ सरब भेद मैं तोहि बताया । विरले हंस भेद यह पाया ॥ तुम सों हंस कहूँ समझायी । गुप्त भेद ना बाहिर जायी ॥ अब हम पृथ्वी परिक्रमा जावै । भूले हसन करें चितावै ॥ तुम राजा बैठि राज कराओ । सार शब्द जपन चित लाओ ॥
राजा वचन
जब सतगुरु तहाँ ऐसो कहिया । तब राजा मन चिता भइया ॥ राजा चरण धरयो तब आई । तुम विनु कैसे रहूँ गुसाई ॥ हमको राखो चरण लगायी । नहि देहु सत्यलोक पठायी ॥