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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

( ६२ )

बोधसागर

अध्याय अठारह कहा बखानी । योग सन्यास नाम तेहि जानी॥ अर्जुन गीता भयो समापति । जो कछु कही आपुकमलापति॥

कबीर उवाच

कहै कबीर सुन धर्मनि हीता । तुम्हरे लिये बखानेउँ गीता ॥ तुम तौ भक्त जत्तते न्यारा । आवागमनके बीज तुम्हारा ॥ अब तुम परम भक्ति चितलावौ । निशिदिनसतगुरुशब्द समावौ ॥ धर्मदास बिनती इठि लाई । सुनि गीता संशय उपजाई ॥ गीता कही कृष्ण केहि कारण । अर्जुन उठे कुटुम्ब संचारण ॥ ज्ञान सुने मति निर्मल होई । मित्र औ दुष्ट एक सम होई ॥ ज्ञान सुने कछु कोध न आवै । परम पुरुषते मन चितलावै ॥ गीता कृष्ण जो कहेउ बखाना । ज्ञान सुनाइ कोध मन आना ॥ कोधविना सो युद्ध न होई । नर्क द्वार कृष्ण कहेउ सोई ॥ कोध किये अज्ञान कहावै । यह सब भेद मोहि समुझावै ॥ कृष्णमता कहि प्रकट देखाऊ । ज्ञान सुने अज्ञान न आऊ ॥

कबीर उवाच

सुनि धर्मनि यह भेद है बंका । जानत नहीं राउ औ रंका ॥ कृष्ण ठगौरी जत्त लगाई । ताते भेद न बूझौ भाई ॥ यह प्रपंच कृष्णकर आही । तीनिहु लोक सदा भर्माई ॥ चाहै छल बल युद्ध करावै । अर्जुन कैसे धनुष उठावै ॥ महामोह तेहि रहा समाई । और भांति नहि मानै भाई ॥ छलहि मता किन्हौ आपै सोई । ज्ञान सुनाइ मोह कह खोई ॥ यह तौ ज्ञान कहो परमारथ । जेहिते युद्ध होइ पुनि स्वारथ ॥ जैसी इच्छा करै जो ज्ञाना । फल पावै सेवा अनुमाना ॥ नहिं अर्जुन मनपुरुष मिलापा । कैसे कर्म होइ निष्पापा ॥ पुरुष मिलाय न कृष्ण सुनावै । कैसे अगम अगोचर पावै ॥

उग्रगीता

( ६३ )

पावै अगम कृष्ण को मानै । तीनि लोकको भूपति जानै ॥ ताते ज्ञान कहि कर्म दृढ़ावै । फिरि २ भवसागर भटकावै ॥

धर्मदास उवाच

धर्मदास कहैं सुनो गोसाई । मारग साधु जो अगम सुनाई ॥ कर्म धर्म कह पाछे मेलै । ज्ञान रूप अभ्यन्तर खेलै ॥ परम अनंद पुरुषको दर्शै । सेवक स्वामी चरण न पशैं ॥ गीता कहै औ कर्म दृढ़ावै । केहि कारण इनको भटकावै ॥ कौन ज्ञान जो भर्म बतावै । फिरि २ भवसागर भटकावै ॥

कवीर उवाच

धर्मदास मैं कहौ बुझाई । मूरुख लोग नहीं पतिआई ॥ तीनिउ लोक पुरुषपहि दीन्ह। राजे काज करावन कीन्ह। ॥ जो चाहै सो रचे बनावै । तीनि लोकते जान न पावै ॥ ज्ञानोपदेश देह जो भाई । तौ यह सृष्टि वैराग उठाई ॥ तब यह रचना सबही थाके । इनको कौन गोसाईया थापे ॥ तेहि कारण इन कर्म दृढ़ाई । अरुझी सृष्टि सकल भर्माई ॥ सतगुरु शब्द सुना कहैं दरसै । जाते प्रभु पूरण कहैं परसे ॥ गीता कहि जो कृष्ण सुनाई । तबहु न अंधा मोहि पतिआई ॥

धर्मदास उवाच

धर्मदास बिनती अनुसारि । हे सतगुरु मैं तव बलिहारी ॥ जब कर अर्जुन धनुष संभारा । कहा कीन्ह सो कहौ विचारा ॥

कवीर उवाच

सुनो संत धर्मनि निर्वाना । अंत युद्ध सब करों बखाना ॥ बहुते भांति युद्ध तिन कीन्ह। युद्ध जीति राजहि मन दीन्ह। ॥ राज युधिष्ठिर मनहि विचारा । बहुते भांति बंधु हम मारा ॥ कस प्रायश्चित्त मोक्षण होई । कहो व्यास हमसों तुम सोई ॥

( ६४ )

बोधसागर

व्यास कृष्ण मिलि मत अर्थाई । कुल हत्या कैसे मुक्ताई ॥ करो विचार अश्वमेध जो करई । यज्ञ करत हत्या परिहरई ॥ सब मिलि ऐसा मता विचारा । बहुत भांति यज्ञ करौ संभारा ॥ ताते पाप मोक्ष होइ भाई । यज्ञ करनको मता हटाई ॥ करौ यज्ञ मन भयो विश्रामा । राज मनोरथ पूर्ण कामा ॥

धर्मदास उवाच

धर्मदास विनवै कर जोरी । संशय उपजी मेटेउ मोरी ॥ पांडव कृष्णहि बहुत पियारे । किया यज्ञ तब कहाँ सिधारे ॥ कैसे गति मति उन पुनि पाई । कृष्ण सरीखो रहै समाई ॥

कबीर उवाच

धर्मदास तुम चतुर सुजाना । पूछेउ सो अब करौ बखाना ॥ कृष्ण देह जब छांडन लागे । तिनसों कहो ताहिंते आगे ॥ अवधि हमारि आय नियराई । तुम हूँ गरो हेवारे जाई ॥ अर्जुन कहहु सुनौ गोसाई । कारण कवन हेवारे जाई ॥ कृष्ण कही तब ऐसी बाता । तुम तौ बंधु कीन्ह है घाता ॥ पातक बहुत जो तुमसे भयऊ । गरै हेवारे ताते कहेऊ ॥ कहैं अर्जुन सुनु पुरुष पुराना । मारण बंधु न हम चित आना ॥ गीता ज्ञान मोहि समुझाया । युद्ध करनको अस्त्र बँधाया ॥ तुमको पातक नाहीं लागे । कर्ता करै आपु अनुरागे ॥ तुम्हरे कहे युद्ध हम कीन्हा । पातक हम शिर काहे दीन्हा ॥ पुनि तुम कह अश्वमेधहि करहू । सब पातक पाछिल परिहरहू ॥ तापर हम अश्वमेध जो कीन्हा । तबहू पातक हम शिर दीन्हा ॥ कहैं कृष्ण अर्जुन सुनु भाई । कर्म रेख मेटो नहिं जाई ॥ कर्म रेखते सब जग आवै । बार बार दुख सुख भुक्तावै ॥ चारिउ युग फिरि याहै आई । हम तुम ऐसे संग रहाई ॥

उद्गीता

( ६५ )

ताते कछु संदेह न कीजै । वेगि हेवारे पयाना दीजै ॥

धर्मदास उवाच

धर्मदास पूछै सुनु भाई । आगे कैसे भई गुसाई ॥

कबीर उवाच

कहै कबीर यह सर्ग बखाना । तुमसों वर्णन कहौं निदाना ॥ पांडव जाइ हेवारे गलिया । देह समेत युधिष्ठिर चलिया ॥ करेउ पुण्य जप तप औदाना । ताते पहुँचे स्वर्ग स्थाना ॥ और पांडवा नर्क समाने । हत्याके फल नर्क रहाने ॥ तहां जाइ कोइ बंधु न देखा । पूछेउ सबै देव मुनि शेषा ॥ कहां हमारे चारिउ भाई । केहि कारण मोहि इहां ले आई ॥ इहां कहां वे बसवे पाई । जाके खोजौं चारिउ भाई ॥ तुम राजा हो धर्म अवतारा । ताते पहुंचै स्वर्ग दुआरा ॥ बंधु तुम्हार पातक बड़ कीन्हा । ताते बास नर्कमें दीन्हा ॥

युधिष्ठिर उवाच

की उनको इहवां लै आवहु । की हमको उहवां लै जावहु ॥ जब यह विष्णु सुनो मन जानी । इनकह पुण्य बहुत पहिचानी ॥ उपजो मोह बंधु हित भाई । जाइ ले आवहु बंधु देखाई ॥ नर्क कुण्ड तेहि जाइ देखाई । बूड़ देखे चारिउ भाई ॥ और सकल परिवार घनेरा । काहू सुधि नहिं काहू केरा ॥ चारिउ भाई रोवन लागे । कर्म हीन हम बड़े अभागे ॥ राइ युधिष्ठिर मोह जनाऊ । मोह नर्क कुंड ले नाऊ ॥ दूत विष्णु सों बहुरि जनार्द । आपु युधिष्ठिर नर्कमें जाई ॥ जो कछु आज्ञा होइ गोसाई । आज्ञा मानि करौ सोइ जाई ॥ कहै विष्णु यह धर्म सरूपा । करो युधिष्ठिर पुण्य अत्रुपा ॥ जो कबहीं वे नर्क में जैहैं । अघ जीवन सब ले उत्तरे हैं ॥

नं. ८ कबीर सागर - ३

( ६६ )

बोधसागर

क्षण अंगुरी ले नर्कमो डारो । एते चारिउ बन्धु उबारो ॥ फिर लै आवहु कुंती जहवां । स्वर्ग स्थान वैकुंठ हैं जहवां ॥ ऐसी भांति करौ तहैं जाई । क्षणहि अंगुरी नर्क बुझाई ॥ ता कहैं लागि बंधु सब आये । राइ अनंद बहुत सुख पाये ॥ गये युधिष्ठिर धर्म स्थाना । धर्म पुत्र रहे धर्म ठेकाना ॥ भीम जाइकै पवन समाई । पवन पुत्र जेहि कहिये भाई ॥ अर्जुन इन्द्र पुत्र जो रहिया । इंद्रलोकमें बासा करिया ॥ सहदेव नकुल जो दूनों भाई । अश्विनि कुमार पुत्र हितलाई ॥ ऐसे स्वर्ग लोक जो किय बासा । पुण्य घटै भवसागर आसा ॥

धर्मदास उवाच

धर्मदास कहैं सुनो गोसाँई । पांडव मित्र विष्णुके आहीं ॥ गीता भागवत वेद पुकारा । दर्शन प्रभु जिन नेक निहारा ॥ ताकर आवागमन न होई । सुर नर सुनि सब भाषै सोई ॥ साधु संत मिले सब गुणगवैं । जो कोइ हरिके दर्शन पावैं ॥ ताकी मोक्ष मुक्ति होइ भाई । जरा मरणको बीज नसाई ॥ साक्षादर्शन कृष्णको लहिया । और विराट देखायो तहिया ॥ मोक्ष मुक्ति उन काहे न पाई । साहेब कहौ मोहि समुझाई ॥

कबीर उवाच

कहै कबीर सुनौ धर्मदासा । पुरुष एक आदि रहि वासा ॥ तिन्ह पुनि खासा कीन्ह प्रकाशा । धर्म धीर एक अंश नेवासा ॥ तिनते उपजेउ ॐॐकारा । माया प्रकट भई विस्तारा ॥ ब्रह्मा विष्णु उपजे तब भाई । जिन यह रची सृष्टि दुनियाई ॥ इनकह तीनलोक जो दीन्हा । राज रूप रचना तिन कीन्हा ॥ सकल बीज जो पुरुषते आया । जाते सकल सृष्टि निर्माया ॥ कामिनि जबै धर्म निज कीन्हा । कर्मरेख जो भया अधीना ॥ दश अवतार कर्म सो भयऊ । कारण कर्म इन्है निर्मयऊ ॥

उग्रगीता

( ६७ )

कर्मरेख रघुपति दुख पायउ । सीता शोक बहु पछितायउ ॥ नरसिंह शूकर रूप धरावा । मच्छ कच्छ सर्व कर्म बनावा ॥ वामन होइ बलि छलिया जाई । परशुराम होइ युद्ध कराई ॥ कर्मरेख यदुपति दुख पावा । बन २ घेनु चरावन धावा ॥ गोपी षोडश सहस्र अनंदा । तिन सँग नाचे बाल सुकुन्दा ॥ कर्मरेख भे बोध शरीरा । आवा गमन मिटो नहीं पीरा ॥ निष्कलंक है दश अवतारा । कर्मरेख भय प्रलय संचारा ॥ इनते अधिक और को आही । कर्मरेखते भुक्तत जाही ॥ अंकुरी कोइ जीव रहे भाई । सो अंकुर पुरुष ते आई ॥ तिन कह पुरुष जो चितवन कीन्हा । कैसे लोक होइ लव लीना ॥ सतगुरु यहि कारण उपजावा । हंसन कारण मोहिं पठावा ॥ मूर्खा शब्द नहिं मानै भाई । अंकुरी परवाना पाई ॥ कर्मरेख पांडव दुख पावा । कर्मरेख छूटै न छुटावा ॥ इन कहैं सब जग करता जाने । ताते आवा गमन नसाने ॥ सतगुरु मिले सत्य शब्द लखावै । कर्मरेख बंधन सुक्तावै ॥

छंद-धर्मदास तुम बूझि देखौ छल मता भगवानहो ।

मूर्ख जन उपदेश कारण गीता कियो बखान हो ॥

पांच पांडव परम मंत्री तिनको गति कैसी दर्ई ।

नर्क स्वर्गमें वास करि २ जन्म फिरि २ तिन लई ॥

सोरठा-बूझो संत सुजान, गीता कथा जो सब सुनी ।

चेतनि हंस अमानि, और सकल भरमें दुनी ॥

इति श्रीमदुग्रगीताब्रह्मज्ञानयोगमते कबीरधर्मदाससंवादे

त्यागसंन्यासव्याख्यानं नामाष्टादशोऽध्यायः ॥ १८ ॥

( ६८ )

बोधसागर

अथ उपसंहार

धर्मदास उचाव

धर्मदास विनवै कर जोरी । तुम दयालु बंदी मोरि छोरी ॥ गीता जो तुम कही बखानी । पांडवकी गति सब मैं जानी ॥ ऐसे सब जीव भरमाई । कैसेहु भांति मुक्ति नहिं थाई ॥ सोइ ज्ञान मोहिकहि समुझावौ । जरा मरण को बीज नसावौ ॥

कबीर उचाव

सुनु धर्मदास हंस पतिराया । हंसन कारण पुरुष की दया ॥ अंकुरी जिव आपु बोलाया । ताते हम कह लेन पठाया ॥ सत्य शब्द अब करौ प्रकाशा । पावै हंसा लोक निवासा ॥ उग्र ज्ञान है मता निनारा । सुक्ष्म वेद जो पुरुष संचारा ॥ पुरुष दया आनेउ संसारा । जेहिते पावै मुक्ति दुवारा ॥ अध्याय उनइस कहौं ये भाई । सुर नर मुनि जाने नहिं ताई ॥ मुक्त होइ सत्यलोकहि जावै । आदि पुरुषके दर्शन पावै ॥ प्रथमै रहनी हंस बखानो । निशि दिन रहै नाम लपटानो ॥ तीनों गुण है विषके मूला । ताते दुख सुख भये स्थूला ॥ दुइ गुण कबहीं चित नहिं धारै । रज तमको परंपच विसारै ॥ वासा करै सत्यके माहीं । आसा ताकी राखै नाहीं ॥ प्रकृति पचीस पंच तत्त्व रहई । तीनिउ गुण कारण यह वहई ॥ जो तीनिउ गुण वश करै आपै । पंच पचीस कोइ नहिं व्यापै ॥ तीनिउ गुणते न्यारा खेले । मनुआ सत्य सुमिरनमें मेले ॥ श्वास मुर्ति एक डोरी लावै । अजर अमर होइ हंस मिलावै ॥ मन पवना ले सुख मनि राखै । सोहं हंस अमीरस चाखै ॥ तहवां अनहद होइ झनकारा । विन दीपक मंदिर उजियारा ॥ अनहद सुने अकह गुप्त गावै । मन चित गहि २ सुरति लगावै ॥ तहवां रैन दिवस नहिं होई । पुरुष २ सो सुरति समोई ॥

उग्रगीता

( ६९ )

ऐसी रहनी हंस रहावै । बहुरि न योनी संकट आवै ॥

धर्मदास उवाच

धर्मदास कहै सुनो गोसाई । पुरुष नाम कहऊ समुझाई ॥ सहस्रनाम जो देव बखाना । नेति २ कह बहुरि निदाना ॥ कौन नाम को सुमिरन करई । कैसे सदा पुरुष चित धरई ॥ कैसे आवागमन मिटाई । क्षर निर अक्षर कह समुझाई ॥

कबीर उवाच

सुनु धर्मनि तुम हंस पियारे । तुम्हरो काज सकल हम सारे ॥ सुमिरन आदि मैं तुम्है सुनावौँ । सकल कामना तोर मिटावौँ ॥ नाम एक जो पुरुषको आही । अगम अपार पार नहिं जाही ॥ वेद पुराण पार नहिं पावै । ब्रह्मा विष्णु महेश्वर धावै ॥ जानि कहौँ तौ को पतिआई । अंत कहौँ तौ परलै जाई ॥ आंदे अंतमें बासा होई । निर अक्षर पावै जन सोई ॥ अक्षर कह सब जक्त बखानै । निरअक्षरको मर्म न जानै ॥ कहो न जाई लिखो ना जाई । बिन सद्गुरु कोउ नाहीं पाई ॥ सद्गुरु मिलै तो अगम लखावै । हंस अमी पीबत घर आवै ॥ अंकुरी जीव लहे निर्बाना । पावत हंस लोक पहिचाना ॥ सुतिवंत पावै निज वीरा । संग रहौँ मैं दास कबीरा ॥ जो कोई हंस प्रवाना लेई । अग्र नाम सद्गुरु कहि देई ॥ बिन सद्गुरु कोइ नाम न पावै । पूरा गुरु अकह समुझावै ॥ अकह नाम वह कहा न जाई । अकह कहि कहि गुरु समुझाई ॥ समुझत लोक परै पुनि चीन्हा । जाते लोक होइ लवलीना ॥ हरदम सुमिरे चित लगाई । लोक दीपमें जाइ समाई ॥ अजर अमर होइ लोक सिधावै । चौरासी बंधन मुक्तावै ॥ आवागमन ताहि नहिं भाई । जरा मरणका बीज नसाई ॥

( ७० )

बोधसागर

धर्मदास उवाच

धर्मदास भये बहुत अधीना । सद्गुरु पूरा तुम कहैं चीन्हा ॥ तुम्हरी दया नाम हम पावा । बन्दी छोड हंस मुक्तावा ॥ करहु दया अब अंतर्ध्यामी । लोक दीपको वरण बखानी ॥ जहवां सत्य पुरुष रह जोई । हंसा तहवाँ दर्शन होई ॥ पुरुष शोभा वरणि सुनावो । दया करो अब भेद लखावो ॥

कबीर उवाच

कहै कबीर सुनौ धर्मदासा । ऐसा भेद नहीं परकाशा ॥ यह तौ भेद अगम है भाई । वेद कितेव कहूँ नहिं पाई ॥ शेष महेश न कोई जाने । ब्रह्मा खोजत ताहि भुलाने ॥ विष्णु सदा मन सुमरिन करई । पै काहू नहिं परकट करई ॥ ज्ञान कहै तब पुरुष बतावै । सुनि पुनि आपा लै ठहरावै ॥ यह जग मूरख महा अचेता । परम पुरुषते नाहिन हेता ॥ हेत बिहूना जो नर आही । यह तौ भेद कही नहिं ताही ॥ सुरतिवंत हंसा जो होई । तासे भेद न राखेहु गोई ॥ उपज्ञान यह भेद अपारा । तुमसे कहा आज हम सारा ॥ सूक्ष्म वेद भेद जो पावै । अजर अमर होइ लोकसिधायै ॥ लोक दीप औ प्रकट बखानौ । धर्मनिसुरति रनिति सो ठानौ ॥ तीनिलोकते भिन्न पसार । सत्य लोक पुरुष दरबारा ॥ पुष्प दीप जहँ पुरुष स्थाना । आदि पुरुष जहँ बैठ अमाना ॥ सूर्य सोरह जोति निवासा । ऐसा एक हँस परकाशा ॥ श्वेतै दीप श्वेत विस्तारा । श्वेतै मंदिर श्वेतै द्वारा ॥ अजर हंस है श्वेतै भाई । सदा अनंद रहै सुखछाई ॥ श्वेत छत्र सिंहासन छाजै । अनहद शब्द सदा धुनिगाजै ॥ अक्षय वृक्ष जहँ श्वेत सोहावन । श्वेत पुरुष श्वेत फल पावन ॥ श्वेतै पान श्वेत पनवेरा । श्वेत सुपारी नरिअर केरा ॥

उग्रगीता

(७१)

श्वेत मिठाई कदली मेवा । अजर आरती हंसक मेवा ॥ सदा आरती हंस जो करई । अपने पुरुष चरणन रई ॥ असंख्यकमलश्वेत तहँ रहिया । सप्त पाखुरी कमल जो रहिया ॥ पुरुष गुप्त होइ रहे समाई । सूक्ष्म शीश तहां दरसाई ॥ संपुट पञ्च लाख है भाई । बानि उठै संपुट बिहराई ॥ उघरे संपुट दर्शन पावै । अजर हंस तहवाँ सन्तु पावै ॥ करत अनन्द सदा सुख भोगा । जरा मरण नहिं संशय सोगा ॥ जग मग जोति सदा उजियारा । कोटि सूर्यते वर्ण अपारा ॥ जहँ देखो तहँ शोभा छाजै । पूर्ण शोभा पुरुष विराजै ॥ कहा बखानौ पुरुष सरूपा । वरणि न जाइ वह रूप अनूपा ॥ जब लग तियापुरुष नहिं परसै । कहा बखाने सुख बिनु तरसै ॥ तिया पुरुष जब मिलिया भाई । तब सुख कछू कही न जाई ॥ जिन जाना तिनही पहिचाना । जैसे गूंगा सपना जाना ॥ कहा बखानौ वरणि न जाई । गूंगा गूंगे सैन लखाई ॥ ऐसा सतगुरु भेद लखावै । सुरतिवंत हंसा सन्तुपावै ॥ वाहू नदी अठारह गंडा । जेते तारा है ब्रह्मंडा ॥ एते सूर्य जो वसै अकाशा । तऊ न पुरुषके सम परकाशा ॥ पटतर तहां पुरुषकी दीजै । सतगुरु सैन समुझिकै लीजै ॥

छन्द-पुरुष शोभा कह बखानो कछु नहीं सम तूल हो ।

असंख्य सूर्य प्रकाशते वहँ जोति अगम स्थूल हो ॥

सैन करि करि नैन भरि भरि शब्द सतगुरु पर्व हो ।

पुरुष अवर न रूप जाको शोभा हंस लग दर्श हो ॥

सोरठा-उग्रगीत यह सार, गुप्त अध्याय उन्नीसमें ।

शब्द सुरति आधार, हंसा पहुँचे लोकको ॥

इति श्रीमदुग्रगीतायां एकौनविंशोऽध्यायः ॥ १९ ॥

इति श्रीबोधसागरान्तर्गत श्रीमदुग्रगीता समाप्ता

ज्ञानस्थितिबोध ग्रन्थ

अथ ग्रंथज्ञानस्थितिबोध

भारतपथिक कबीरपंथी-

स्वामी श्रीयुगलानन्द द्वारा संशोधित

खेमराज श्रीकृष्णदास,

अध्यक्ष-“श्रीवेङ्कटेश्वर” स्टीम्-प्रेस,

❁ वम्बई. ❁


पुनर्मुद्रणादि सर्वाधिकार “श्रीवेङ्कटेश्वर” मुद्रणयन्त्रालयाध्यक्षके अधीन है।

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सत्यनाम

श्री कबीर साहिब

मानव

A faint, stylized illustration of a seated figure, possibly a deity or sage, holding a bowl or plate above their head. The figure is surrounded by a decorative border.

मौलिक

सत्यसुकृत, आदि अदली, अजर, अचिन्त, पुरुष, मुनीन्द्र, करुणामय, कबीर, सुरतियोग संतान, धनी, धर्मदास, चूरामणिनाम, सुदर्शन नाम, कुलपति नाम, प्रबोध गुरुवालापीर, केवल नाम, अमोल नाम, सुरतिसनेही नाम, हक्क नाम, पाकनाम, प्रकट नाम, धीरज नाम, उग्र नाम, दया नामकी दया- वंश व्यालीसकी दया

अथ श्रीबोधसागरै

द्वारविंशतिस्वरंगः

अथ ग्रन्थज्ञानस्थितिबोधप्रारंभः

सद्गुरुभ्योनमः

सासी-सतगुरु आये लोकसे, धरी देह जग आय । जीवनबन्ध निवारिया, बन्दीछोर कहाय ॥ अन्न पानि नहि भक्षिया, नहीं गर्भ लीन्ह अवतार ।

( ७८ )

बोधसागर

पांचतत्त्व गुण तीन मयी, निर्गुण रूप सम्हार ॥ ज्ञान विविधि विधि सब कह्यो, चौदह कोटि बखान । तासो न्यारे राखिया, मूल ज्ञान निदान ॥

चौपाई

धर्मदास बचन

धर्मदास उठि विनती कीन्हा । कृपासिंधु मोहि दर्शन दीन्हा ॥ जामें यह मन अस्थिर होई । सोई भेद मोहि कहो विलोई ॥ विनथिर भये न होइ अनन्दा । मेटउ मोर भरमके फन्द ॥ आदि बचन मैं कहौं विचारी । धर्मदास यह कथा निनारी ॥ यह तो कथा बहुत अवगाहा । ज्ञान गम्य नहिं पावे थाहा ॥ ग्रन्थ अनेक कहीं बहुबानी । यह निजगम्य सुजन जन जानी ॥ यह तो ज्ञान न काहू पाया । सो मैं तुम कहैं भाषि सुनाया ॥ स्थित ज्ञान अब कहौं बखानी । जाते छूटे यमकी खानी ॥ स्थित ज्ञान बिनु मुक्ति कहैं पावे । भरमत फिरै काल सन्तावे ॥ जोई भेद पुरुष कहि दीना । सोई ज्ञान स्थिति मैं चीना ॥

साखी—यकचित यक मन होइके, रहे शब्द लौलाय । कहै कबीर धर्मदास सो, तब हंसा घर जाय ॥

धर्मदास तोहि कहौं चिताई । स्थितिज्ञान सुनौ चितलाई ॥ पहले करो रक्ष मन नेहा । तबहीं बाटै शब्द सनेहा ॥ जो सुने कहुँ चोर यह बैना । सुनिके करै अपरबल सेना ॥ बीरा सार बालक कहैं दीजै । सुरतिवन्त कह स्थिर कीजै ॥ स्थिति ज्ञान जो पावे कोई । जरा मरण रहित सो होई ॥ निरअक्षर वह नाम अपारा । ग्रन्थनसे वह रहत निनारा ॥ अक्षर ज्ञानसार में भाषा । पुरुषभेद याहीमें राषा ॥ यह पायहु तब आयव आई । धर्मदास मैं तुम्हैं लखाई ॥

ज्ञानस्थितिबोध

( ७१ )

यमराजा जेहि देखि डराना । सोई शब्द अहै निर्वाना ॥ स्थिति भेद ज्ञान नहि पावै । कास फांस कैसे मुक्तावे ॥ गुरु होइ बहियां ताहि लखावै । योनी संकट बहुरि न आवै ॥

साखी-ज्ञानस्थतिके पायते, जीवनमुक्त होइ जाय ।

कबीरा आन पुरुषकी, समरस सेज बिछाय ॥

धर्मदास उवाच

धर्मदास बिनती अनुसारी । हे सतगुरु मैं तुम बलिहारी ॥ स्थिति ज्ञान कहां तुम पावा । केहि कारण यह पुहुमी आवा ॥ सो अब मोहि कहो समुझाई । जाते मनको संशय जाई ॥ तुम प्रभु अहंहु मुक्तिके दाता । आदि अन्त कहिये विरुयाता ॥

सद्गुरु वचन

धर्मदास मैं कहौ बिचारा । हंसराज बड भाग तुम्हारा ॥ जबही हतो पुरुषके पास । पुहुपद्दीप सब दीप निवासा ॥ हंस दुखी भय कालके पास । दया पुरुष तबै परकासा ॥ अमर वचन प्रभु भाज्यो जबही । पुहुपद्दीप विकसित भौ तबही ॥

पुरुष वचन

जाहु सतायन तुम भवसागर । नौतम सुरति हौ हंस उजागर ॥ जीवन फांस कालने डारी । तिनसौ ज्ञानी करो उबारी ॥ भवसागरते जाय छुडाओ । अमरलोक हंसन बैठाओ ॥

सद्गुरु वचन

दाया होत चला मैं जबहीं । भवसागर पग दीना तबहीं ॥ देखेहुं यमराजहि वरिंवाडा । त्रास दिखावत है नौखण्डा ॥ सब जीवन कहैं फांसी लावा । जब हम जाहि तुमहि डरपावा ॥ शब्दसार कीन्हौ संधाना । धर्मराय तब देखि सकाना ॥

( ८० )

शोधसागर

सारखी-सोई शब्द तुमते कहौं, धर्मदास लेउ मानि । जीव मुक्तावहु कालसों, सत्य शब्द परमानि ॥ और बहुत सुमिरन है भाई । बिना नाम नहिं काल नशार्ई ॥

धर्मदास वचन

धर्मदास बिनवै करजोरी । भाषहु मोहिं नामकी डोरी ॥ कैसे भयो नाम जो सारा । कैसे भयो सबै विस्तारा ॥ सो यह भेद कहौ गुरु स्वामी । करिय कृपा कहिय सुखधामी॥

सद्गुरु वचन

धर्मदास मैं कहौं बुझार्ई । स्थिति ज्ञान सुनौ चितलाई ॥ आदि अंतको नहीं निवासा । तब नहिं पुत्रलोक परकाशा ॥ तब नहिं जीव जंतुकी खानी । तब नहिं अमी अमिरसआनी॥ तब नहिं देह विदेही चीन्हा । ज्योति शून्य नाहिं तब कीन्हा॥ तब नहिं हतो अग्रको मूला । अग्रहि अग्र अग्रहो झूला ॥ अग्र डोरी विहंग है नाला । विहंग अग्र तहँ आहि विशाला॥ विहंगवास सबहिन मों लीन्हा । विहंग अग्र कोह विरले चीन्हा॥ विहंग अक्षर हते प्रभु सोई । विहंग नाम महँ रहे समोई ॥ अग्र विहंग नाम सुनि लीजै । निरखिपरखि तामहँचित दीजै॥ सोई अंश तुमहिं सम तूला । जो यह गहै अग्र निज मूला ॥

सारखी-विहंग नाम प्रताप सुनि, भयो सकल विस्तार ।

कहै कबीर धर्मदास सों भारुयो शब्द विचार ॥

धर्मदास वचन

धर्मदास विनती अनुसारी । समरथ खसम जाऊँ बलिहारी॥ मोकहँ शब्द दीन्ह टकसारा । जीवन मुक्ति देह भवतारा ॥ विदेह नाम गुण कहो बखानी । जासो यमकी होवे हानी ॥

सद्गुरु वचन

धर्मदास मैं कहौं विचारा । राखो गुप्त गुप्त अनुसार ॥

ज्ञानस्थितिचोथ

( ८१ )

अगर विहंग सुरति भयउ जबहीं। हंस सुजन जन प्रगटे तबहीं ॥ विदेही अंग थान्यो प्रभु आई। विहंग इच्छा तबहीं उपजाई ॥ बिदेह देहधरि भौ उजियारा। सूर्य उदित मूदितं भये तारा ॥ देह धरे हाथ ओ पाऊँ। रतन रंग बहु रंगवाऊँ ॥ वहतो नाम सुजन जन चीन्हा। दया कीन्ह प्रभु हमहूँ दीन्हा ॥ सञ्जीवन नाम आदि प्रकाशा। हंस सुजन जन कीन्ह निवासा ॥

साखी-जोइ गहे निज नामको, सोई हंस हमार। कहैं कबीर धर्मदासों, उतरे भव जल पार ॥

धर्मदास वचन

चरण टेकि बिन्ती अनुसारी। साहब वचन जांव बलिहारी ॥ प्रथम स्थूल कहो समुझाई। बिदेह रूप जब पुरुष रहाई ॥ केतिक सज्याको परमाणा। जहँवा आप कीन स्थाना ॥ सोइ भेद प्रभु कहो निनारा। जीवन जन्म सुक्ति होय मोरा ॥

सद्गुरु वचन

धर्मदास तुम बिन्ती कीन्हा। अगम पंथ काहू नहिं चीन्हा ॥ मैं पाया सतगुरुकी दाय। धर्मदास मैं तुम्हैं लखाया ॥ जेहि विधि पुरुष रूप संधाना। सो सब तुमसों कहौ निदाना ॥ अग्रमूल विदेह स्थाना। सोइ नाम सुजन जन जाना ॥ अब लों लङ्क द्रौप दिखलाऊं। बारह पलंग विस्तार सुनाऊं ॥ बीजक अमान अखंडित द्रौपा। सत चैतन आनन्द सर्मापा ॥

साखी-अन्तरिक्ष छः पालंगभरि, लोलंग द्रौप स्थान।

तहाँ सो सब उत्पति भई, यही परमपद जान ॥

कंचन हेम द्रौप उजियारा। तहाँते उत्पति भई हमारा ॥ तेरह पालंगा है सो ठाऊं। तिल प्रमाण सेज्या निर्माऊं ॥

१ गुप्त