कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
( ८२ )
बोधसागर
अस्थल रूप राई परमाना । प्रगटे महा नाम संधाना ॥ कला अनन्त अनंतहि धावा । बरनत जीव लक्ष नहिं आवा ॥ सत्य शब्द पावे परवाना । सोई हंस वहाँ करत पयाना ॥ जो नहिं गहत शब्द सहि दानी । सो पुनि पै नर्ककी खानी ॥ सुरति निरति ज्यों लौं लौलावा । सो हंसा जग बहुरि न आवा ॥ एही नाम सम्पूर्णन सही । एही नाम हंसा निर्वही ॥ मूलदीप तब नहीं निमासा । प्रथमहि श्रुती पुरुष प्रकाशा ॥ वही सुरति सब रचना कीन्हौं । मूल शब्द हिरदै धर लीन्हौं ॥ पुरुष गले पुहुपकी माला । हाथ अमर अंकूर रिसाला ॥ कहै कबीर सुनो धर्मदासू । एही मूल सब लोक प्रकाशू ॥ और नाम बहुत कहे भाई । पुरुष नाम हंसा लपटाई ॥
सार्वी—यही शब्द दृढ़ कर गहो, कहे कबीर समझाई ॥
अग्र विदेही नाम गहि, अग्र रूप हो जाई ॥
धर्मदास वचन
धर्मदास विनवै कर जोरी । साहेब कहो ज्ञानकी डोरी ॥ जाते मन चित्त अस्थिर होई । चरण प्रसाद पाव वर सोई ॥ महा कठिन भवसिंधु कराला । लीन्ह उवारि काटि यमजाला ॥
सद्गुरु वचन
धर्मदास भल कीन्ह विचारा । हंस राज बड भाग तुम्हारा ॥ और ध्यान सुमिरन हम भाखा । विदेह नाम सोइ न्यारे राखा ॥ सो अब तुम कह दीन्ह चिन्हाई । देह विदेह लेहु निर्माई ॥ भाग बडे वाहीके कहिये । सुरति शब्द मई बासा लहिये ॥ नाम महात्म कहां समुझाई । जेहि प्रताप यम देखि डराई ॥ ध्यान विदेह यह परभाऊ । इकोतरसे पुरुष तरि जाऊ ॥ सार शब्द सों चित नहिं लाग। सोई जीव बड आहि अभागा ॥
ज्ञानस्थितिबोध
( ८३ )
साखी-अब मैं कहब तोहि सों, ए चित करो विचार । कहै कबीर पुरुषको, यही रूप निज सार ॥
चौपाई
कहै कबीर सुनो धर्मदासा । अग्रमूल बिदेह परकाशा ॥ इच्छा पुरुष काया बंधाना । लीलागर दीप कीन्ह अस्थाना ॥ सुजन हंस जन कीन्ह विश्रामा । धरै ध्यान पुरुषकर नामा ॥ तहैंवा पुरुष कीन्ह अस्थाना । अस्थल रूपको कहों ठिकाना ॥ कंठमाल पुढुपनकी राजे । माँथे प्रभुके छत्र विगजे ॥ हाथ अमी अंकूर बिचारी । जगर मगर शोभा उजियारी ॥ उपमा काकहि वरनों भाई । कोटि भानु सोजायैं लजाई ॥ भालरूप वरनन कहि कैसा । बीस सहस्र चंद्र लखि जैसा ॥ शरवन शोभा देहु बताई । रवि सहस्र तहाँ रहे लजाई ॥ चक्षु अमीकर चितवन कैसी । सुधा सिंधु लहरे उठ जैसी ॥ नासा श्रीवा कंठ कपोला । शोभा इनकी आइ अतोला ॥ मुखारविंद अरविंदहि जानी । उदय कोटि सूरजकी खानी ॥ उभय हंस अघरमो विहरे । दामिनि दशन उठत जनु लहरे ॥ भुजा बाँह मन चिकुर बनाई । हृदय राखि उर कलित लजाई ॥
साखी-कटि नाभि पिंडुरी जंघनि, नख सिख बहुत अनूप ।
झलझलात झलकत महा, शब्दहि रूप सुरूप ॥
चौपाई
निगम नेति नेतिहि करिधावे । तिनको रूप बरन को पावै ॥ मन बुधि चित पहुँचे नहिं तहाँ । अबरण पुरुष विराजे जहाँ ॥ जहाँ लों निजमन दर्शन पावा । तहाँ लंगि वरणि कबीर सुनावा ॥ अगम अगाय गाधमो नाही । ज्योंके त्यों प्रभु सदा रहाहीं ॥ अग्र नाम पुरुषके बरणी । भवसागरकी है यह तरणी ॥
( ८४ )
बोधसागर
ध्यान बीच जिन कीन्ह समारा । ते चढ़ि हंस होहि असवारा ॥ साखी-कहै कबीरा धर्मदाससों, पहुँचे लोक मझार । लीलागर दीप जहँ पुरुष है, हंसा करत विहार ॥
धर्मदास वचन
धर्मदास जो बिनती करहीं । बचन विचार मुखै उच्चरहीं ॥ तीन लोकमें व्यापक काला । धर्मराय जिव कीन्ह विहाला ॥ इहि भूमि यम जाल पसारा । नेम जाप षट करम अचारा ॥ इहि विच सबही दुनी भुलानी । नाम सार काहू नहिं जानी ॥ एक मंत्र काहू नहिं पावा । पेड़ छोड़ डारही भुलावा ॥ प्रथम पेड़को पालन कीन्हा । पेड़ मरम काहू नहिं चीन्हा ॥
सदृश वचन
पुरुष पेड़ निरञ्जन है डारा । त्रिगुण शाखा प्रति संसारा ॥ सत्य नाम नहिं जाने कोई । सार शब्द बिन गैबी गोई ॥
साखी-नाम महातम भाषहिं, धर्मदास समझाय । जो नर प्राणी नाम बिन, ताहि काल धरि खाय ॥
चौपाई
निवृति ज्ञान जीवन समझावहु । अजर नाम सो गुप्त छिपावहु ॥ जो जियरा होवै अंकुरी । वासे कहों शब्द भरपूरी ॥ जिह्वा कहों तो जगत रिझाई । प्रकट कहों तो काल नसाई ॥ उपजै विनशैको संसारा । कैसे पूजै काल अहारा ॥
साखी-परकट जनि भाखहु, हिरदै धरो छिपाय । बीरा दै समझायहु, सदृश येहि लखाय ॥
धर्मदास वचन
धर्मदास बिनती अनुसारी । बिन पांजी कैसे निस्तारी ॥ पांजी भेद कहौ विर छानी । जाते मिटे जन्मकी खानी ॥
ज्ञानस्थितिविषय
( ८५ )
पांजी भेद पावा नहिं कोई । ताते गयो बिगोह बिगोई ॥ देहि बीच जोहि लखि पावा । ताकर आवा गमन नशावा ॥ जब तक आप चीन्ह नहिं परई । तब लग काज न एको सरई ॥
सद्गुरु वचन
धर्मदास मैं कहों बिचारी । पांजीभेद कहों अतिभारी ॥ पांजी डोरी चित न धरई । मिथ्या दोष गुरुन कहैं करई ॥ यही भेद है अगम अपारा । अब मैं कहों सकल व्यवहारा ॥ जो चीन्ह है सो दरशन पाई । हंसहि हंस मिले पुनि जाई ॥ अनुचित वचन हमारे धरई । यमकी डगरी जाय सो करई ॥
साखी-पांजी कहों समुझायके; मन बिच लोकहि जाय ॥
मूलशब्द निर्वाण है, कहै कबीर समुझाय ॥
चौपाई
मूल शब्द है गुप्त जो सारा । बिरले पावैं शब्द हमारा ॥ सत्य वचन अस्ती ना माने । गहे हंस सो पहुँच ठिकाने ॥ अग्र अर्चित सुरति सोहंगा । एहि मूल गहि हंस विहंगा ॥ अग्र विहंग नाम जो पावै । तबहीं हंसा घरको आवै ॥ विहंग शब्द जाने नहिं कोई । सो तो गये बिगोह बिगोई ॥ सुरति बिहंगता ले चित जोरी । बिहंग नाम बिहंग है डोरी ॥ बिहंग हंस विहंग है बीरा । निज सोकाम ये कहै कबीरा ॥ बिहंग शब्द बिहंग है नाला । विहंग पुरुष संग हंस बहाला ॥ सातों नाल जो आय बिहंगा । बिहंग पताल आहि जलरंगा ॥ तहैं बैठी जलरंगी शाला । बायें कर पृथ्वीकी नाला ॥ ता ऊपरहि कर्म अवतारा । कहै कबीर भेद टकसारा ॥ लघु दीरघ अक्षर नहिं जाना । कैसे संत होइ निर्वाना ॥ एक भेद जिनही लखि पावा । तिनके काल निकट नहिं आवा ॥
( ८६ )
बोधसागर
सोई सिद्ध संत है भाई । सोहं नाल चीन्ह जिनपाई ॥ पुरुषहि सम शिरसेज बिछावा । जिन जिन शब्द हमारा पावा ॥ नालहै सत्य पुरुषकी स्वासा । सो नाल पतालमें बासा ॥ तहां है पांजीको दरबारा । ता चढ़ि हंस उतरिगो पारा ॥ पाँच नाम तिहको परवाना । जो कोइ साधु हृदयमें आना ॥
पाँच नाम
साखी—आदि उदित अति अजरमन, सप्त सिंधु निज नीर । अदल अदल सोहं गहै, साहब कहै कबीर ॥
चौपाई
यही सप्त नाल हैं सही । यही हंस नाम निरबही ॥ सप्तनालके सातों नामा । बीर बिहंग करै सब कामा ॥ सिंधुनालमें हंस पठाए । पुहुप नालसो सकल सुहाए ॥ अमीनाल महाँ हंस पयाना । सुरति नालसे हंस सिधाना ॥ अग्रनाल महाँ करत अहारा । सोहंग नालको सकल पसारा ॥ अजर नालघट कीन्ह विचारा । तबै पुरुषको दर्श निहारा ॥ सप्त नाल है एके गाऊं । सोई सुरति भेद निज पाऊं ॥ सद्गुरु मिले वस्तु निज पावै । बिन सद्गुरु को भर्म मिटावै ॥ सद्गुरुदया सबै कछु पाई । बिन सद्गुरु वह जाइ नशाई ॥
साखी—सतगुरु बडा सुनार है, परखे वस्तु भैंडार । सुरतिहि निरति मिलाइके, मेटि डार खुटसार ॥ सद्गुरु सांचे शब्द हैं, कायाके गुणवान । जीवनमुक्त शब्दहि मिले, महापुरुषके ज्ञान ॥
धर्मदास उवाच
धर्मदास विनती अनुसारि । मैं सब पायब तुम बलिहारी ॥ बलिहारी सतनाम तुम्हारी । जाते भयो सबै निस्तारी ॥
ज्ञानस्थितिबोध
( ८७ )
अब प्रभु मोपर दया हि कीजे । भेद अमीको मो कहिदीजे ॥ अमी अंक केहि कारण कीन्हा । वह तो अंक मोर नहि चीन्हा ॥ सो प्रभु मोकहैं देहु चिन्हाई । अंक विस्तार कहो समुझाई ॥
सदगुरु वचन
धर्मनि तुम विनती अनुसारी । सोई भेद अब कहो विचारी ॥ ज्ञान स्थिति हम कीन्ह बखानी । जाते भई सकल उत्पानी ॥ जबहि देह धरी प्रभु आई । अमी अंक है अंक बनाई ॥ अशर नाम देह धरि आई । अंक यही मैं कहो बुझाई ॥ स्थूल धरो साहिब यहि कारण । बिन अस्थूल न वस्तु उचारन ॥ मूलहि अंक विदेह विचारा । देह धरी नामहि संचारा ॥ जो नहि होत नाम परभाऊ । तो सब जगतकाल धरिखाऊ ॥ जोकहैं लेइ नाम टकसारा । देह छूटी जाय पुरुष दुवारा ॥ जबही नाम लेतहैं हंसा । तबही काल मरत है संसा ॥ तारण हंस देहमें धरहूँ । यमको मारि मुक्ति मैं करहूँ ॥ नाम प्रताप सबै कछु भाखा । सुमिरत हंस बोल हम राखा ॥
साखी—हंस उबारन नाम यह, कहैं कबीर बखानि ।
जाय जीव सतपुरुष घर, धरमराय पछितानि ॥
चौपाई
अमी अंक जब ही प्रभु कीन्हा । उत्पति सकल ताहि हम दीन्हा ॥ पुछुप दीप सब दीप निवासा । तीन लोक याते परकाशा ॥ स्वर्ग पताल भयो पुनि सबही । अमी अंक पुरुषहि किय जबही ॥ चन्द्र सूर्य सकलहि विस्तारा । अमी अंक सो भयो संसारा ॥ अमी अंक दोइ रूप बनावा । पुरुष शक्ति सो नाम कहावा ॥ ब्रह्मा विष्णु महेश विचारा । अमी अंक ते सब संसारा ॥ अमी अंकके गुण हैं ऐसे । सोरह सुत उत्पत भये तैसे ॥ अमी अंक जब नाहीं कीन्हा । तबही सुनहि शब्दमें चीन्हा ॥
( ८८ )
बोधसागर
सोही अंक कही अब तुमसों । अंक प्रभाव सुनो तुम हमसों ॥ अमी अंक तुम राखि छिपाई । सुरतिवंत कहैं देहु लखाई ॥ अंक बिना पारस नहिं जोई । पारस बिना मुक्ति नहिं होई ॥ पारस लोहा कंचन सोई । पारस विन पहुँचे नहिं कोई ॥ पारस परस गुरु शिर नावा । गुरु पारस परसे सतभावा ॥ सार शब्द है बीजक ध्याना । पारस आहि मूल रथाना ॥ तब सुकृत मिलि सत्य समाना । सत्य शब्द निश्चय करिजाना ॥ सिखापन मानि पुरुषकर लीन्हा । बलि तुम्हार हम पारस दीन्हा ॥ नाम तुम्हार न धोखे डारों । घट भीतर सो कबहुँ न टारों ॥
साखी—सब धोखा कौ मेटिके, पारस परसे संत ।
कबीर कहै धर्मदाससो, मेटों भवका अंत ॥
धर्मदास
धर्मदास चित बहुत हुलासा । ज्यों रविउदय कमल परकाशा ॥ दयासिन्धु पूरण गुरु स्वामी । कीन्ह कृतारथ अन्तर्यामी ॥ अविचल नाम मोहिं कहदीना । सकल जीव आपन कर लीन्हा ॥ जो जिय नाम तुम्हारा पावै । अवागमन रहित घर जावै ॥ साहेब कहिये शब्द विचारी । जाते छूटै भ्रमकी बारी ॥ अन्त समै बालक कर आही । तब यम सूझ परै कहि नाही ॥ समय साधिबालक नहिं जानैं । कैसे बाचै जीव आपनै ॥ यमकी घरी पहुँचे जब आई । तहाँको भेद कहों समुझाई ॥ वह बाचै यम जाइ हँराई । कष्ट परै सब सुधि बिसराई ॥ जड़ चेतनको है यह चारो । कैसे भवसे होत उबेरो ॥
सद्गुरु वचन
पुरुष अंश सुकृत तुम आगर । भलमति पूछब धर्मनि नागर ॥ सो समुझाइ कहुँ तोहि रंगू । जाहि रंगभौ यमको अंगू ॥
ज्ञानास्थितिबोध
( ८९ )
जब आवै बालकके पाहा । पलटे देह धरै निजु नाहा ॥ भक्तिरूप धरि आवै सोई । मस्तक श्याम फेर नहिं होई ॥ जब जिय नाम करै सम्भारा । तब यमकी जड़ होवे छारा ॥ शब्द सिंधुमें रहै समाई । तहांयम कबहु निकट नहिं आई ॥ शब्दविचार बारि टढ़ करहीं । मूल हंस रखवारी धरहीं ॥ जब फिर चाहे करन पयाना । अग्रज नाम करी संधाना ॥
साखी-वंश छांय बीरा लिखो, नाम सन्धि चित लाय । कहै कबीर निःशंक हो, हंस लोक कहैं जाय ॥
जब सठहार चले लै हंसा । सत सिंधु पहुँचत गइ संसा ॥ सत सिंधु आसन जो करहीं । हृदय रूप हंसा सब धरहीं ॥ आगे लेन हंस तहैं आवहि । आरति साजि चीर पहिरावहि ॥ कुशल क्षेम पूछे सब कोई । यमकी लज्जा किहि विधि खोई ॥ कहि प्रसाद आइ यदि ठाऊं । केहिं करनी पहुँची इहिं गंजि ॥ तबै हंस उठि बोले बैना । गुरुप्रसाद पाया निज नैना ॥ गुरु मोहि वह नाम सुनाई । तेहि प्रताप आये इहि ठाई ॥ तबही हंस पुरुष सौ कहई । हंसन चाह दर्शकी अहई ॥
साखी-नाम महात्म कबीरको, तेहि प्रसाद सो आइ । बिनय करत अभिलाष चित, पुरुषहि दरस कराइ ॥
चौपाई
पुरुष बुलाइ हंस कह लीन्हा । हंसन सकल डण्डवत कीन्हा ॥ दीन सिंहासन क्षत्र जु धरहीं । हंस सुजन जन दर्शन करहीं ॥ सिंहासन बैठी सुख पावा । शब्द अहार पुरुष संग आवा ॥ जन्म मरनकी भूख बुझाई । सब सुख भुगते अग्र अघाई ॥ निरंजन सुख सुधि नहिं पावा । ब्रह्मा विष्णु बैठि पछितावा ॥ वहतो हंस कहाँ उड़ि गयऊ । आदि अंत काहू नहिं लयहू ॥
( ९० )
बोधसागर
सारखी—यह सुख ज्ञान स्थितहिमें; जो कोइ भुगते आय ।
धन्य भाग्य वा हंसके, कहै कबीर समुझाय ॥
धर्मदास वचन
धर्मदास बिनवै करजोरी । देह विदेह कहिब कछु थोरी ॥
कवने कमल उठत है बानी । कवने कमल शब्द सहिदानी ॥
कवने कमल मूल अस्थाना । कवने कमल सुरति पहिचाना ॥
कवने कमल ब्रह्मालिय वासा । कवन कमल है जीव निवासा ॥
सद्गुरु वचन
अक्षय कमल सुशब्द उचारी । सुरति कमल वानी अनुसारी ॥
श्वेत कमल निर्गुण अस्थाना । भँवर गुहा मूलहि पहिचाना ॥
कंबु नाल मूलके पास । तहवां ब्रह्म लीन है बासा ॥
अष्टकमलते उठे जो बानी । कुसुमहि दल ताके परवानी ॥
बंकहि नाल बंक है घाटा । जो हंसा चीन्है वह बाटा ॥
सारखी—बंक नालनी नवरिके, भिन्न भिन्न कर लेख ।
भँवर गुहामें पैठिके, घरियारी कर पेख ॥
सुरति कमलके बीचमें, सद्गुरुको विश्राम ।
सहस्र जाप अजपा कही, पूरुषको निज धाम ॥
चौपाई
द्वान्छ कमलमें झिलमिल तारा । अलख सरूपहिको विस्तारा ॥
विषम सरोवर है तेहि ठाई । मान सरोवर परै रहाई ॥
मान सरोवर दहिनो देही । सद्गुर पंथ तहां हो लेही ॥
आप कमल तेहिकहीं बखानी । विरले जन कीन्हहीं पहिचानी ॥
पारब्रह्म बस अधर अटारी । जगमग ज्योति जहां उजियारी ॥
हीरा रतन जटित बहु भांती । लाल अमोल गने को पांती ॥
ज्ञानस्थितिबोध
( ९१ )
रत्न कमल पै सत्य विराजे । हिरमर हंस संग बहु छाजे ॥ गोरख दंत पहुँचि नहिं कोई । पारब्रह्म अस भवन है सोई ॥ ये सब अटकहिं सुनि मंझारा । सत्य पुरुष नहिं कीन्ह विचारा ॥ चउदा कमल महुं सुत्र विराजे । द्वादश कमल गगन धुनि गजै ॥ भर्म भूलि अटके तहां ज्ञानी । भर्महिं भर्म भर्म लपटानी ॥ सुर नर मुनि पवनहि अवराधे । सिद्धहु बारे उनमनि साधे ॥ नाभी मण्डल पवन किवारा । तहैं लगि गमी कीन्ह टकसारा ॥ हमरा घर कहैं विरलन बूझा । ऊर्ध्व कमलका पंथ न सूझा ॥
साखी-सुरति कमलपर बैठिके, अमी सरोवर चाखि । कहै कबीर विचारिके, संत विवेकहि भाखि ॥ ऊर्ध्व कमलकै उपरै, परिमल बास सुवास । अमी कमल महुं बैठिके, दर्शन दर्श हुलास ॥
चौपाई
उत्पतिको वह वृक्ष बखानी । प्रलय कबहुं होवे नहिं हानी ॥ पिण्ड मांह वह वृक्ष बताऊं । अगम अगोचर गम नहिं पाऊं ॥ अगम गोष्ठि तुम पूछन लाई । सुनो धर्म अब कहौ बुझाई ॥ अगम गोष्ठि अगम व्यवहारा । अगम पंथ हम कहौ विचारा ॥ अब मैं कहौ जो गम्य बखानी । अगम गोष्ठि काहू नहिं जानी ॥ उत्पति सब मैं तुम्हैं सुनावा । ये हमते कोउ जानि न पावा ॥ उत्पति सुनु वा वृक्षकी भाई । प्रलय तेरे वह कबहुँ न आई ॥ जासों कहों अमरपुर गाऊं । बिना बीज वह वृक्ष रहाऊं ॥ बिन धरती अंकूरहि आनी । पानी रंग नहीं उत पानी ॥ मूलवृक्ष वह पुरुष बखानी । शाखा तासु निरंजन जानी ॥ डाली ब्रह्मा विष्णु मधेश्वर । पत्र तासु संसार नरेश्वर ॥ सत्य सुकृत जहँ कर विश्रामा । अछय वृक्ष जाकर है नामा ॥ पत्ररूप संसार बखाना । धर्मदास लखवो यह ज्ञाना ॥
( ९२ )
बोधसागर
साखी-पानीमें सबउपजहि, पानि जान सब कोइ । जासों पानी ऊपजा, सो रँग कैसो होइ ॥
चौपाई
रंगहि रंग रंग उपजाया । एक रंगसे सब रँग आया ॥ बहुरंगीसे पानी भयऊ । पानी रंग नाद जो कियऊ ॥ नाद रंगसे वेद उचारा । वेद रंगसे भयो संसारा ॥
साखी-हीर डोरको भाव यह संत सुजाना देखि । कहै कबीर विचारिके रंगहि रंग विशेखि ॥ पुरुष डोर तुमसों कही, सुनो संत चित लाइ । धन्य भाग्य वह जीवके, ज्ञान स्थित जो पाइ ॥
चौपाई
सो सब तोहि कहिव चित लाई । परखि लेहु हियको समुझाई ॥ पांच तत्त्व जो प्रकटे आई । पांच तत्त्व वे गुणत रहाई ॥ सोह तत्त्व तुमको न सुनावा । हृदये भीतर गुप्त छिपावा ॥ कौन शब्दसे तत्त्व जो आऊ । सो अनुसार तोहि समुझाऊ ॥ विदेह तत्त्व अगरको मूला । सोम तत्त्व आही अस्थूला ॥ अनुम तत्त्व सब दीप बखानी । अनुप तत्त्व सब दीप बखानी ॥ अंकुर तत्त्वसों सब कछु कीन्हा । ताको मरम न काहू चीन्हा ॥ पाच तत्त्व प्रगटे दुनियाई । तामहँ जीव रहै अरुझाई ॥ आप तेज वायु तत्त्व बखानी । पृथ्वी अकाश देह सब जानी ॥
धर्मदास वचन
कौने तत्त्व सो रची है देही । कौन तत्त्व है फूल सनेही ॥ कौन तत्त्व सो देहमें आवा । कौन तत्त्व निज मूल कहावा ॥
सत्गुरु वचन
अजर तत्त्व निःस्वादी कहेऊ । पुढुपतत्त्व निजमूलहि लहेऊ ॥
ज्ञानस्थितिबोध
( ९३ )
अमी तत्त्वकी देह बखानी । अजर तत्त्वमूल पहिचानी ॥ साखी-अमरपुरीको यह गुन, अमर हंस होजाइ । कबीर ज्ञान स्थिति बिना, जीव प्रलय तर जाइ॥
चौपाई
नाद प्रकट बिंदुहिं सो भयऊ । बिन्दु प्रकट नादहि जो लहिऊ॥ शब्द भेदते श्वास जो जानी । श्वासरूप शब्दहि पहिचानी ॥ नाद बिंदु जब नाहीं रहिया । तबकी बात तुमहिंसों कहिया॥ अमी अघर कीनी जब ग्रामा । नीर ब्रह्म लीनो विश्रामा ॥ नाद निरञ्जन प्रगटे जबही । श्वास प्रेम गुरु कीन्हो तबही ॥ बिन्दु सकलसे भयो पसारा । देह बिदेह सो रहत न न्यारा ॥ जब नहिं धरती नहिं आकाशा । तब नहिं सहज कूर्म परकाशा॥ चकित अण्ड चौँकरे मुचंदा । हमें देखि करि सहज अनंदा ॥ सारशब्द कबीरहि जाना । अंगहि अंग आहि बिहराना ॥ फूटा अंड कटे तब अंशा । योग जीत उपजे निःसंशा ॥ नहिं तब धरती नहिं आकाशा । साखी शब्द नहीं परकाशा ॥ तबही पुरुष कहां धौं रहेऊ । कौन तत्त्वमें वासा लहेऊ ॥ गुप्तहि तत्त्व गुप्त अस्थाना । गुप्त वस्तुमें रहे निदाना ॥ गुप्त हते तब प्रकटे भयऊ । अमर दीप उच्चारण लयऊ ॥ शब्द उचारो अमर अखंडा । बीरा सार बिदेही पंडा ॥ तादिन पुरुष आप जो रहते । कौन पिंडमें वासा करते ॥
साखी-राईभसा जो वस्तु थी, राई मर अस्थूल । लहर लहर दिल अंदरा, तहाँ पुरुषको मूल ॥
चौपाई
जब नहिं हते कूर्म नहिं कामा । आदि पुरुष कीन्हो निज नामा ॥ नाम सार हंसा जेहि पावा । वो जन चार काल पहुँचावा ॥
( ९४ )
बोधसागर
पहुँचावतमें कछु दिल मोरा । वारी लांघि सकै नहिं चोरा ॥ जो बोले तो शिर छिन जाई । खूट गहे तो अंग नशाई ॥ सारनाम सतगुरुने दीना । ताते धर्म शीस पर लीना ॥ जो कोइ करै नाम महाँ वासा । ताकहँ होइ न काल तरासा ॥ नाम प्रताप काल नश जाई । काले खेले पुरुष जाई ॥ नौ दल गुप्त हृदयमें टीका । अमर मोक्षपद पावै नीका ॥ नौदल नाम जो कहौं बिचारी । षट्दल काटि जो बाहर डारी ॥ शुभ दल शुभचित बन भरमा । भये दल क्रोध संत तज करमा ॥ अस्थित दल राखे निज मनको । पहुँचे हँस लोक सुरजनको ॥
सार्वी-यहि गुण ज्ञान स्थितिहिमें, शब्द सिंहासन सार । केहे कवीरा नाम बल, पहुँचि पुरुषके द्वार ॥
धर्मदास उवाच
धर्मदास बिनवे कर जोरी । साहब कहौं नामकी डोरी ॥ अगम निगम शारद औ शेशा । तुम दातामांगन सब देशा ॥ कहो बचन प्रभु हृदय विचारी । कैसे कूर्म लीन अवतारी ॥ आदि ब्रह्मका कहौं निवासा । केहिविधि लीन कमलमें बासा ॥
सतगुरु वचन
धर्मदास मैं कहौं बुझाई । अकथ कथा कछु कही न जाई ॥ आदि अन्तको नाहिं निवासा । आसा सार पुरुष परकाशा ॥ बिना नालको कमल अनूपा । पूरुष तामहँ कही सरूपा ॥ तबही भई अधर सों बानी । बिन रसनावह अगम निशानी ॥ बिनहि बिन्दु जिद एक कियऊ । अजय अपार सरोवर लियऊ ॥ अष्ट कमल तहां कीन्ह प्रकाशा । अष्ट पुत्र को तहां निवासा ॥ अष्टताल सुत नाम धरावा । अब मैं कहौं नाम परभावा ॥ मनसा बुद्धि निरञ्जन कीन्हा । सहज सुरतिसों उत्पति लीन्हा ॥
ज्ञानस्थितिबोध
( १६ )
रंग रेख कर्म उपराज् । सरवन सुरति वहे गुण छाज् ॥ योग संत इनको विरमाए । तिनको अंत न काहू पाए ॥ सुकृत अंश भये तेहि ठाऊँ । सोहँ सुरति अचित बनाऊँ ॥ आठ अंश ये उपजे भाई । ज्यों दर्पण प्रतिबिंब समाई ॥ पुरुष सहज सो भाषे लीना । दीप एक तुमहुँ कहँ दीना ॥ अंमो दीप प्रदीप निवासा । गर्भते कूर्म तहाँ परकाशा ॥ तबही पुरुष कूर्म उपराजा । बाहर पलंग रूप तेहि छाजा ॥ उपजे कूर्म पृथ्वीको भारा । सोरह पलंग दीप विस्तारा ॥ रचना सबहि कूर्मकह दीना । इहतो चरित सहज नहि चीन्हा ॥ साहब चरित लखे नहि कोई । सुरति पुत्र उपराजे सोई ॥ महा अपर्वल है अधिकारी । पुरुषके कहिये भण्डारी ॥ दया करी सुरतीको जबही । सुरति अंश उपराजे सबही ॥
साखी- ज्ञानस्थतिके यह गुण, सुरति कूर्म उपजाइ ।
कहै कबीरा नाम बिन, जीव अकारथ जाइ ॥
चौपाई
कूरम उदर बिदारी जबहीं । चारों अंड फूट गये तबहीं ॥ चारों अंड ब्रह्मांड सम्हारा । कृत्रिम वस्तु कीन्ह संसारा ॥ कर्ता आदिपुरुष कर नाऊ । सोई नाम निरंजन पाऊ ॥ फूटि अंड चौभंगा भयऊ । पाँचो तत्त्व तीन गुण ठयऊ ॥ पंच अमीसे सब संसारा । पंच अमीका है विस्तारा ॥ पंच अमीकर नाम न जाने । सो मन आन केल तन ठाने ॥ अमी दहे है सकल जहाना । अमी रंगसे कीन्ह ठिकाना ॥ अमी वस्तु जिनही पहिचाना । पंच अमीको सकल जहाना ॥ पंच अमीको नाम सुनाऊँ । भिन्न भिन्न सब तोहि बताऊँ ॥
( ९६ )
बोधसागर
अमीके नाम
सिंधु सुअंशहि । १ । सुरंगको नाम । २ ॥ सहजसुतमूलको नाम । ३ । अकहअमी । ४ । अंकअमी । ५ ।
सार्षी-कही कबीर धर्मदाससों, पंच अमीको नाम ।
शब्द अमीसों जानियो, प्रकट भये गुणधाम ॥
चौपाई
अमी शब्द सुमिरे जो कोई । अमीस्वरूप होहि पुनि सोई ॥ अमी शब्द जिन नाहीं पायब । सोई जीव प्रलय तर आयब ॥ मूल शब्द राखे चित सानी । अमी शब्द मृष बोले वानी ॥ पाँच बेर सुमिरे नर कोई । ताको आवा गौन न होई ॥ एहि शब्द मैं कहीं बखानी । ब्रह्मा विष्णु महेश न जानी ॥ इह पुनि नहीं निरंजन पावा । धर्मदास मैं तुमहिं बतावा ॥ शब्द अमी सुपुरुष लिख दीन्हा । एकहुअंक परै नहिं चीन्हा ॥
सार्षी-कमल अंक पंखुरि अरु, सुरति बंध सुखसेज ।
कहि कबीर संशय गई, महापुरुषके एज ॥
ज्ञानस्थितके यही गुण, अमी अमी होजाइ ।
कहे कबीर धर्मदाससों, देह हिरण्मय पाइ ॥
चौपाई
धर्मदास उठ बिनती कीन्हा । तुमरी दया पन्यो सब चीन्हा ॥ अपनो भेद कहीं विलछानी । जाते परै दरस पहिचानी ॥ वहै शब्द गुरु कहीं प्रकाशा । जामैं हवै सुकृतको वासा ॥ वही शब्दमें दर्शन होई । भिन्न भिन्न मोहि कहो बिलोई ॥ तुमहिं सगुण तुम निर्गुण रूपा । कारण कारज कहिये भूषा ॥ तुम धरती तुम पवन अकाशा । तुमहीं चांद सूरज परकाशा ॥ जलथल भीतर कीन्ह निवासा । लोकद्वीप तुमहीं परकाशा ॥
ज्ञानस्थितिबोध
( ९७ )
तुमही माली तुम फुलवारी । तुम हो करता तुमरी बारी ॥ तुम सागर जलहरी तरंगा । तुम मलीन तुम निरमल अंगा ॥ तुम हो उडुगण पर्वत चंदा । मोये तुमये हर्ष अनन्दा ॥ तुम गुपाल तुमहो दिन राती । सुर नर मुनि गंधर्व तुम ज्ञाती ॥ तुमही अलख तुमहि संसारा । तुमही हरि हर विधि अवतारा ॥ तुमही लोप अलोप अलेखा । तुमही गुप्त प्रगट सब देखा ॥ तुमही पुरुष तुमही हो प्रकृति । तुमही योग तुमहि जुगति गति ॥ चारों युग तुम करत निवासा । तुम रमता देहीमें बासा ॥
साखी--तुमहो दूसर अवर नहीं, तुमरा सकल प्रकाश । करहु दया अब मोहिपर, सत्य नाम विश्वास ॥
सद्गुरु वचन
धर्मदास तुम विनती कीन्हा । हमरो रूप न काहू चीन्हा ॥ अमरभेद अस्थलकै माहीं । जो पावै अस्थिर मन ताहीं ॥ लीलंगर द्रौप पुरुष अस्थूला । वही द्रौप उत्पतिको मूला ॥ गगन धरनी उत्पति सब नीरा । काया बीर सुनाम कबीरा ॥ याविधि पुरुष हमहि सोंकहिया। विन अंकुर जीव कहाँ रहिया ॥ नाम हमार सुमिरे जो कोई । आवा गमन रहित सो होई ॥ हमरा नाम लेत घर आवै । सुख सागर निर्मल हो जावै ॥ नाम लेत जो काल डराई । सुमिरत नाम हो दूर हो जाई ॥ हमरो नाम सार है भाई । जो चीन्हे तेहि काल न खाई ॥
साखी--नाम हमारा मुक्तामणि, पुरुष आपहि भाखी । शब्द शिरोमणि सार यह, हंस सदा चित राखि ॥
चौपाई
येहि नाम लोके पहुँचावै । सुमिरत नाम पुरुष कहैं पावै ॥ अब यह शब्द कहउ सम्भारा । सुनि हृदय महे करो विचारा ॥
नं. ८ कबीरसागर-४
( ९८ )
बोधसागर
जाते दुःख द्वंद मिटि जाई । धर्मराय बैठो पछिताई ॥ यहि नामको शिरहि चढाई । यामें सब सुख विलसे आई ॥ कपट रूप धरिहै जो कोई । भ्रमकी डगर परै पुनि सोई ॥ आदि शब्द सो नाम हमारा । जो बूझे सो उतरे पारा ॥ धन्य भाग्य हंसनके कहिए । जो या नाम मुक्ति मन गहिए ॥ सो करूणाकर बहुत उधारी । एक नाम चित लेय विचारी ॥
पाँच नाम
आदि अजर १ । अदली अदल २ । पुरुष निरक्षर नाम ३ । मुक्तामणि प्रभुनाम जो ४ । सुख सागर विश्राम ॥
साखी--ज्ञानस्थितके यह गुण नाम विवेकी पाइ ।
कहे कबीर धर्मदासको, हंस लोकको जाइ ॥
चौपाई
धर्मदास चरण चित धरही । बार बार विनवे अनुसरही ॥ पाँजी नाम मोहि कहो विचारी । जामें होय हंस निस्तारी ॥ बिन पाँजी कहा जाने भेदा । पाँजी नाम गुरु कहीन खेदा ॥
सद्गुरु वचन
धर्मदास भल कीन्ह विचारा । हंसराज बड भाग तुम्हारा ॥ नाम सिंधु पायो तुम जब ही । पाँजी निर्भय पहुँचे तब ही ॥ बिन निर्भय कोई भेद न आवे । विना भेद कैसे पहिचाने ॥ कहे कबीर होइ गुरु दाय। तबही हंस अमर घर आया ॥ अब सुनिये पाँजी को द्वारा । ता चढ़ि हंस उतरि है पारा ॥ एक नाम एक चित हो देखा । तहाँ हंसा सुख सागर पेखा ॥ पाँजी अद्भुत कहीं सुमारा । ताते होय मुक्ति व्यवहारा ॥ सोहं शब्द उलली कर देखे । तिल प्रमाण जहाँ द्वारी पेखे ॥ उलटि पवन पश्चिमको घाले । गरजे गगन मेरु तहाँ हाले ॥
ज्ञानस्थितिबोध
( ९९ )
अरध ऊर्ध्वबिच कमल अपारा । दामिनि कोटि होत उजियारा॥ पाजी नाम पंच दिल राखो । हंसा उबारन कहि यह भाखो॥
आकाशपाँजी
आदि अजर अदलीनिर नामा । सप्तसिन्धु है जियको कामा ॥ सप्तसिन्धु पाजी ले नामा । सो यह परब्रह्मको धामा ॥ यही नाम जियको रख वारा । खोलो कुंजी कुलफ केवारा ॥ हंस ले गए पुरुष दर्बारा । झिलमिल ज्योति झलक उजियारा॥ नाभि मण्डल पवन किवारा । दुरे सुनीरी मूलके द्वारा ॥ भए निरन्तर थकित शरीरा । धर्मदास कह मिले कबीरा ॥ धर्मदास यह दिलकी पाँजी । यही नाम धरि बहुऐ साँजी ॥ पिंड नाम सो दिलमें मूला । येहि नाम पहुँचे अस्थूला ॥
सार्वी-ज्ञानस्थितके यह गुन, पुरुष पाजी निज सार ।
यह पाँजी जब पावही, हंस होइ निस्तार ॥
चौपाई
हो सद्गुरुमें तुम बलिहारी । मिटि गइ तिमिर भई उजियारी॥ हों पतंग तुम भुंग गुसाई । आप सरीख कीन्ह एहि ठाई॥ सप्त सिन्धु पृथ्वीमें आहीं । सकल जगत इनहींके माहीं ॥ सप्त सिन्धु जो रहे पताला । सातनाल प्रभु कहौं रिसाला ॥ सातौ नाल कवन विधि हेरा । जामें सुषुमण होइ निवेरा ॥
सद्गुरु वचन
धर्मदास यह अकथ कहानी । बिरले हंस कीन्ह पहिचानी ॥ अगम विचार कीन्ह व्यवहारा । जासों भया सकल विस्तारा ॥ जबहीं हंसा तजे शरीरा । शब्द प्रताप होय गंभीरा ॥ सप्त सिंधु नर पावै कोई । सप्त सिंधुमें जाय समोई ॥ सप्त सिंधु आरम्भ न करई । त्यागि शरीर हंस गति धरई ॥ जाय करै मुख सागर बासा । मान सरोवर करहिं निवासा ॥
( १०० )
बोधसागर
सप्त सिन्धुके नाम सुनाऊं । भिन्न भिन्न सब तोहि लखाऊं ॥ सप्त सिन्धु अब लखि पावे कोई । समता सिन्धुमें रहे समोई ॥ योग सिन्धु अब कहों बखानी । अजांवन सिन्धु लेव पहिचानी ॥ अमर सिन्धु हंसा लखि पावे । अकह सिन्धुमें जाय समावे ॥ सुखहिं सिन्धुहि कीन्ह पैठारा । सप्तहि सन्धुहि नाम उचारा ॥
साखी-ज्ञान स्थितको पायके, मन सुस्थिर हो जाय । कहे कबीर धर्मदाससों पुरुष नाम समुझाय ॥
चौपाई
पुरुषहि नाम कहौं समुझाई । धर्मदास हिय गहो बनाई ॥ याही कारण अजपा कीन्हा । जीवन संधि परी नहिं चीन्हा ॥ पुरुषहते तब मूलके ठाऊं । तब नहिं दीपलोक अवगाऊं ॥ चौबिश पुत्र तबे नहिं रहिया । तबही वचन अम्र जो कहिया ॥ ता पाछे ओंकार जो कीन्हा । ओंकार सो सब रचि लीन्हा ॥ साहब वचन सत्य फरमाया । सत्य शब्द अक्षर निर्माया ॥ कबहुँ नाहिन अस्थिर होई । बरा बार मन देह बिगोई ॥ काया भीतर आप लखावा । ताते अजपा नाम कहावा ॥ याहि शब्दसे सुद्ध शरीरा । याहि शब्दसे मिले कबीरा ॥ याहि शब्द हृदय सुख होई । निर्मलहोहि विशहिं सबखोई ॥ अस्थिर मनकर प्रफुलित राखे । नाम संधि हृदये महाँ चाखे ॥ निर्मल हंस होत है तबही । अमरलोक पहुँचि है जबही ॥ सातों सुरति तबहि परकाशा । पुरुषहि को राखे विश्वासा ॥ उत्पति शब्द जबे निर्मावा । सो अक्षरमिलिशिवहिं कहावा ॥ शिवहि शब्दसों जीव कहावा । जीव नाम संसार कहावा ॥ सातों नाल वाहिके अंगा । जिहि जग मीतर माडो रंगा ॥ अक्षर शब्दसे शिव जो आवा । वाही अक्षर गुरु कहावा ॥
ज्ञानस्थितिवोध
( १०१ )
काशी मध्य मरे जो कोई । होहि पखान रूप तब सोई ॥ चौरासीसे रहित जो होई । पाहन रूपहि जन्म विगोई ॥ शब्द संपूरन शिव जो जाना । त्यों सुकृतके बहुत परवाना ॥ अक्षत ले आरति कर सोई । उन कर मंत्र कहत सब कोई ॥ तारक मंत्र वयसको नाहीं । पण्डित शब्द गहत मनमाहीं ॥ यही मंत्र कहत सब कोई । साहब चरण न पावैं सोई ॥ क्षमा गुरु निश्चय जो पावा । सद्गुरु शब्द अहर्निश लावा ॥ क्षमा गुरु कहिए अविनासी । मानसरोवर तटके वासी ॥ रचना भेद ले शिव कह दीना । यहि विश्वास मनहि कर लीना ॥ भवसुर केहि शिखावन एहा । सनकादिक कर चरण सनेहा ॥ यही प्रणालि गही सब कोई । गुरु निर्गुणकर भेद समोई ॥ याहीमें सब परै भुलाई । दृढ़तही जग करूप बिताई ॥ जो चाहे सुकृत कर लेखा । आप आप सो करै विवेका ॥ उनकर चीन्हि अमरपद पाई । सूक्ष्म मुक्ति नाम गुण गार्ई ॥
साखी—यह गुण ज्ञानस्थितिके, जो पावैं निज नाम । अजपा जपै कबीरको, सो पहुँचे निज धाम ॥
चौपाई
शब्द पाय लोक जिन चीन्हा । नाम अखण्डित जब धरलीन्हा ॥ मुक्तामणि निज नाम हमारा । हंस उबारहि भवसे पारा ॥
साखी—सोहं नाम हृदय धरै, और जपे नहिं जाप । मूल शब्दही रटन कर, मूल शब्द हो आप ॥ करै निरूपण शब्दको, कहै कबीर बखान । मूल ध्यान गहि पावही, सुख सागर अस्थान । मूल शब्दके येह गुन, अमी दीपक कहैं जाइ ॥ कबीर ज्ञानस्थित बिना, मूल नाम नहिं पाइ ।