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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

( ७० )

बोधसागर

धर्मदास उवाच

धर्मदास भये बहुत अधीना । सद्गुरु पूरा तुम कहैं चीन्हा ॥ तुम्हरी दया नाम हम पावा । बन्दी छोड हंस मुक्तावा ॥ करहु दया अब अंतर्ध्यामी । लोक दीपको वरण बखानी ॥ जहवां सत्य पुरुष रह जोई । हंसा तहवाँ दर्शन होई ॥ पुरुष शोभा वरणि सुनावो । दया करो अब भेद लखावो ॥

कबीर उवाच

कहै कबीर सुनौ धर्मदासा । ऐसा भेद नहीं परकाशा ॥ यह तौ भेद अगम है भाई । वेद कितेव कहूँ नहिं पाई ॥ शेष महेश न कोई जाने । ब्रह्मा खोजत ताहि भुलाने ॥ विष्णु सदा मन सुमरिन करई । पै काहू नहिं परकट करई ॥ ज्ञान कहै तब पुरुष बतावै । सुनि पुनि आपा लै ठहरावै ॥ यह जग मूरख महा अचेता । परम पुरुषते नाहिन हेता ॥ हेत बिहूना जो नर आही । यह तौ भेद कही नहिं ताही ॥ सुरतिवंत हंसा जो होई । तासे भेद न राखेहु गोई ॥ उपज्ञान यह भेद अपारा । तुमसे कहा आज हम सारा ॥ सूक्ष्म वेद भेद जो पावै । अजर अमर होइ लोकसिधायै ॥ लोक दीप औ प्रकट बखानौ । धर्मनिसुरति रनिति सो ठानौ ॥ तीनिलोकते भिन्न पसार । सत्य लोक पुरुष दरबारा ॥ पुष्प दीप जहँ पुरुष स्थाना । आदि पुरुष जहँ बैठ अमाना ॥ सूर्य सोरह जोति निवासा । ऐसा एक हँस परकाशा ॥ श्वेतै दीप श्वेत विस्तारा । श्वेतै मंदिर श्वेतै द्वारा ॥ अजर हंस है श्वेतै भाई । सदा अनंद रहै सुखछाई ॥ श्वेत छत्र सिंहासन छाजै । अनहद शब्द सदा धुनिगाजै ॥ अक्षय वृक्ष जहँ श्वेत सोहावन । श्वेत पुरुष श्वेत फल पावन ॥ श्वेतै पान श्वेत पनवेरा । श्वेत सुपारी नरिअर केरा ॥

उग्रगीता

(७१)

श्वेत मिठाई कदली मेवा । अजर आरती हंसक मेवा ॥ सदा आरती हंस जो करई । अपने पुरुष चरणन रई ॥ असंख्यकमलश्वेत तहँ रहिया । सप्त पाखुरी कमल जो रहिया ॥ पुरुष गुप्त होइ रहे समाई । सूक्ष्म शीश तहां दरसाई ॥ संपुट पञ्च लाख है भाई । बानि उठै संपुट बिहराई ॥ उघरे संपुट दर्शन पावै । अजर हंस तहवाँ सन्तु पावै ॥ करत अनन्द सदा सुख भोगा । जरा मरण नहिं संशय सोगा ॥ जग मग जोति सदा उजियारा । कोटि सूर्यते वर्ण अपारा ॥ जहँ देखो तहँ शोभा छाजै । पूर्ण शोभा पुरुष विराजै ॥ कहा बखानौ पुरुष सरूपा । वरणि न जाइ वह रूप अनूपा ॥ जब लग तियापुरुष नहिं परसै । कहा बखाने सुख बिनु तरसै ॥ तिया पुरुष जब मिलिया भाई । तब सुख कछू कही न जाई ॥ जिन जाना तिनही पहिचाना । जैसे गूंगा सपना जाना ॥ कहा बखानौ वरणि न जाई । गूंगा गूंगे सैन लखाई ॥ ऐसा सतगुरु भेद लखावै । सुरतिवंत हंसा सन्तुपावै ॥ वाहू नदी अठारह गंडा । जेते तारा है ब्रह्मंडा ॥ एते सूर्य जो वसै अकाशा । तऊ न पुरुषके सम परकाशा ॥ पटतर तहां पुरुषकी दीजै । सतगुरु सैन समुझिकै लीजै ॥

छन्द-पुरुष शोभा कह बखानो कछु नहीं सम तूल हो ।

असंख्य सूर्य प्रकाशते वहँ जोति अगम स्थूल हो ॥

सैन करि करि नैन भरि भरि शब्द सतगुरु पर्व हो ।

पुरुष अवर न रूप जाको शोभा हंस लग दर्श हो ॥

सोरठा-उग्रगीत यह सार, गुप्त अध्याय उन्नीसमें ।

शब्द सुरति आधार, हंसा पहुँचे लोकको ॥

इति श्रीमदुग्रगीतायां एकौनविंशोऽध्यायः ॥ १९ ॥

इति श्रीबोधसागरान्तर्गत श्रीमदुग्रगीता समाप्ता

ज्ञानस्थितिबोध ग्रन्थ

अथ ग्रंथज्ञानस्थितिबोध

भारतपथिक कबीरपंथी-

स्वामी श्रीयुगलानन्द द्वारा संशोधित

खेमराज श्रीकृष्णदास,

अध्यक्ष-“श्रीवेङ्कटेश्वर” स्टीम्-प्रेस,

❁ वम्बई. ❁


पुनर्मुद्रणादि सर्वाधिकार “श्रीवेङ्कटेश्वर” मुद्रणयन्त्रालयाध्यक्षके अधीन है।

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सत्यनाम

श्री कबीर साहिब

मानव

A faint, stylized illustration of a seated figure, possibly a deity or sage, holding a bowl or plate above their head. The figure is surrounded by a decorative border.

मौलिक

सत्यसुकृत, आदि अदली, अजर, अचिन्त, पुरुष, मुनीन्द्र, करुणामय, कबीर, सुरतियोग संतान, धनी, धर्मदास, चूरामणिनाम, सुदर्शन नाम, कुलपति नाम, प्रबोध गुरुवालापीर, केवल नाम, अमोल नाम, सुरतिसनेही नाम, हक्क नाम, पाकनाम, प्रकट नाम, धीरज नाम, उग्र नाम, दया नामकी दया- वंश व्यालीसकी दया

अथ श्रीबोधसागरै

द्वारविंशतिस्वरंगः

अथ ग्रन्थज्ञानस्थितिबोधप्रारंभः

सद्गुरुभ्योनमः

सासी-सतगुरु आये लोकसे, धरी देह जग आय । जीवनबन्ध निवारिया, बन्दीछोर कहाय ॥ अन्न पानि नहि भक्षिया, नहीं गर्भ लीन्ह अवतार ।

( ७८ )

बोधसागर

पांचतत्त्व गुण तीन मयी, निर्गुण रूप सम्हार ॥ ज्ञान विविधि विधि सब कह्यो, चौदह कोटि बखान । तासो न्यारे राखिया, मूल ज्ञान निदान ॥

चौपाई

धर्मदास बचन

धर्मदास उठि विनती कीन्हा । कृपासिंधु मोहि दर्शन दीन्हा ॥ जामें यह मन अस्थिर होई । सोई भेद मोहि कहो विलोई ॥ विनथिर भये न होइ अनन्दा । मेटउ मोर भरमके फन्द ॥ आदि बचन मैं कहौं विचारी । धर्मदास यह कथा निनारी ॥ यह तो कथा बहुत अवगाहा । ज्ञान गम्य नहिं पावे थाहा ॥ ग्रन्थ अनेक कहीं बहुबानी । यह निजगम्य सुजन जन जानी ॥ यह तो ज्ञान न काहू पाया । सो मैं तुम कहैं भाषि सुनाया ॥ स्थित ज्ञान अब कहौं बखानी । जाते छूटे यमकी खानी ॥ स्थित ज्ञान बिनु मुक्ति कहैं पावे । भरमत फिरै काल सन्तावे ॥ जोई भेद पुरुष कहि दीना । सोई ज्ञान स्थिति मैं चीना ॥

साखी—यकचित यक मन होइके, रहे शब्द लौलाय । कहै कबीर धर्मदास सो, तब हंसा घर जाय ॥

धर्मदास तोहि कहौं चिताई । स्थितिज्ञान सुनौ चितलाई ॥ पहले करो रक्ष मन नेहा । तबहीं बाटै शब्द सनेहा ॥ जो सुने कहुँ चोर यह बैना । सुनिके करै अपरबल सेना ॥ बीरा सार बालक कहैं दीजै । सुरतिवन्त कह स्थिर कीजै ॥ स्थिति ज्ञान जो पावे कोई । जरा मरण रहित सो होई ॥ निरअक्षर वह नाम अपारा । ग्रन्थनसे वह रहत निनारा ॥ अक्षर ज्ञानसार में भाषा । पुरुषभेद याहीमें राषा ॥ यह पायहु तब आयव आई । धर्मदास मैं तुम्हैं लखाई ॥

ज्ञानस्थितिबोध

( ७१ )

यमराजा जेहि देखि डराना । सोई शब्द अहै निर्वाना ॥ स्थिति भेद ज्ञान नहि पावै । कास फांस कैसे मुक्तावे ॥ गुरु होइ बहियां ताहि लखावै । योनी संकट बहुरि न आवै ॥

साखी-ज्ञानस्थतिके पायते, जीवनमुक्त होइ जाय ।

कबीरा आन पुरुषकी, समरस सेज बिछाय ॥

धर्मदास उवाच

धर्मदास बिनती अनुसारी । हे सतगुरु मैं तुम बलिहारी ॥ स्थिति ज्ञान कहां तुम पावा । केहि कारण यह पुहुमी आवा ॥ सो अब मोहि कहो समुझाई । जाते मनको संशय जाई ॥ तुम प्रभु अहंहु मुक्तिके दाता । आदि अन्त कहिये विरुयाता ॥

सद्गुरु वचन

धर्मदास मैं कहौ बिचारा । हंसराज बड भाग तुम्हारा ॥ जबही हतो पुरुषके पास । पुहुपद्दीप सब दीप निवासा ॥ हंस दुखी भय कालके पास । दया पुरुष तबै परकासा ॥ अमर वचन प्रभु भाज्यो जबही । पुहुपद्दीप विकसित भौ तबही ॥

पुरुष वचन

जाहु सतायन तुम भवसागर । नौतम सुरति हौ हंस उजागर ॥ जीवन फांस कालने डारी । तिनसौ ज्ञानी करो उबारी ॥ भवसागरते जाय छुडाओ । अमरलोक हंसन बैठाओ ॥

सद्गुरु वचन

दाया होत चला मैं जबहीं । भवसागर पग दीना तबहीं ॥ देखेहुं यमराजहि वरिंवाडा । त्रास दिखावत है नौखण्डा ॥ सब जीवन कहैं फांसी लावा । जब हम जाहि तुमहि डरपावा ॥ शब्दसार कीन्हौ संधाना । धर्मराय तब देखि सकाना ॥

( ८० )

शोधसागर

सारखी-सोई शब्द तुमते कहौं, धर्मदास लेउ मानि । जीव मुक्तावहु कालसों, सत्य शब्द परमानि ॥ और बहुत सुमिरन है भाई । बिना नाम नहिं काल नशार्ई ॥

धर्मदास वचन

धर्मदास बिनवै करजोरी । भाषहु मोहिं नामकी डोरी ॥ कैसे भयो नाम जो सारा । कैसे भयो सबै विस्तारा ॥ सो यह भेद कहौ गुरु स्वामी । करिय कृपा कहिय सुखधामी॥

सद्गुरु वचन

धर्मदास मैं कहौं बुझार्ई । स्थिति ज्ञान सुनौ चितलाई ॥ आदि अंतको नहीं निवासा । तब नहिं पुत्रलोक परकाशा ॥ तब नहिं जीव जंतुकी खानी । तब नहिं अमी अमिरसआनी॥ तब नहिं देह विदेही चीन्हा । ज्योति शून्य नाहिं तब कीन्हा॥ तब नहिं हतो अग्रको मूला । अग्रहि अग्र अग्रहो झूला ॥ अग्र डोरी विहंग है नाला । विहंग अग्र तहँ आहि विशाला॥ विहंगवास सबहिन मों लीन्हा । विहंग अग्र कोह विरले चीन्हा॥ विहंग अक्षर हते प्रभु सोई । विहंग नाम महँ रहे समोई ॥ अग्र विहंग नाम सुनि लीजै । निरखिपरखि तामहँचित दीजै॥ सोई अंश तुमहिं सम तूला । जो यह गहै अग्र निज मूला ॥

सारखी-विहंग नाम प्रताप सुनि, भयो सकल विस्तार ।

कहै कबीर धर्मदास सों भारुयो शब्द विचार ॥

धर्मदास वचन

धर्मदास विनती अनुसारी । समरथ खसम जाऊँ बलिहारी॥ मोकहँ शब्द दीन्ह टकसारा । जीवन मुक्ति देह भवतारा ॥ विदेह नाम गुण कहो बखानी । जासो यमकी होवे हानी ॥

सद्गुरु वचन

धर्मदास मैं कहौं विचारा । राखो गुप्त गुप्त अनुसार ॥

ज्ञानस्थितिचोथ

( ८१ )

अगर विहंग सुरति भयउ जबहीं। हंस सुजन जन प्रगटे तबहीं ॥ विदेही अंग थान्यो प्रभु आई। विहंग इच्छा तबहीं उपजाई ॥ बिदेह देहधरि भौ उजियारा। सूर्य उदित मूदितं भये तारा ॥ देह धरे हाथ ओ पाऊँ। रतन रंग बहु रंगवाऊँ ॥ वहतो नाम सुजन जन चीन्हा। दया कीन्ह प्रभु हमहूँ दीन्हा ॥ सञ्जीवन नाम आदि प्रकाशा। हंस सुजन जन कीन्ह निवासा ॥

साखी-जोइ गहे निज नामको, सोई हंस हमार। कहैं कबीर धर्मदासों, उतरे भव जल पार ॥

धर्मदास वचन

चरण टेकि बिन्ती अनुसारी। साहब वचन जांव बलिहारी ॥ प्रथम स्थूल कहो समुझाई। बिदेह रूप जब पुरुष रहाई ॥ केतिक सज्याको परमाणा। जहँवा आप कीन स्थाना ॥ सोइ भेद प्रभु कहो निनारा। जीवन जन्म सुक्ति होय मोरा ॥

सद्गुरु वचन

धर्मदास तुम बिन्ती कीन्हा। अगम पंथ काहू नहिं चीन्हा ॥ मैं पाया सतगुरुकी दाय। धर्मदास मैं तुम्हैं लखाया ॥ जेहि विधि पुरुष रूप संधाना। सो सब तुमसों कहौ निदाना ॥ अग्रमूल विदेह स्थाना। सोइ नाम सुजन जन जाना ॥ अब लों लङ्क द्रौप दिखलाऊं। बारह पलंग विस्तार सुनाऊं ॥ बीजक अमान अखंडित द्रौपा। सत चैतन आनन्द सर्मापा ॥

साखी-अन्तरिक्ष छः पालंगभरि, लोलंग द्रौप स्थान।

तहाँ सो सब उत्पति भई, यही परमपद जान ॥

कंचन हेम द्रौप उजियारा। तहाँते उत्पति भई हमारा ॥ तेरह पालंगा है सो ठाऊं। तिल प्रमाण सेज्या निर्माऊं ॥

१ गुप्त

( ८२ )

बोधसागर

अस्थल रूप राई परमाना । प्रगटे महा नाम संधाना ॥ कला अनन्त अनंतहि धावा । बरनत जीव लक्ष नहिं आवा ॥ सत्य शब्द पावे परवाना । सोई हंस वहाँ करत पयाना ॥ जो नहिं गहत शब्द सहि दानी । सो पुनि पै नर्ककी खानी ॥ सुरति निरति ज्यों लौं लौलावा । सो हंसा जग बहुरि न आवा ॥ एही नाम सम्पूर्णन सही । एही नाम हंसा निर्वही ॥ मूलदीप तब नहीं निमासा । प्रथमहि श्रुती पुरुष प्रकाशा ॥ वही सुरति सब रचना कीन्हौं । मूल शब्द हिरदै धर लीन्हौं ॥ पुरुष गले पुहुपकी माला । हाथ अमर अंकूर रिसाला ॥ कहै कबीर सुनो धर्मदासू । एही मूल सब लोक प्रकाशू ॥ और नाम बहुत कहे भाई । पुरुष नाम हंसा लपटाई ॥

सार्वी—यही शब्द दृढ़ कर गहो, कहे कबीर समझाई ॥

अग्र विदेही नाम गहि, अग्र रूप हो जाई ॥

धर्मदास वचन

धर्मदास विनवै कर जोरी । साहेब कहो ज्ञानकी डोरी ॥ जाते मन चित्त अस्थिर होई । चरण प्रसाद पाव वर सोई ॥ महा कठिन भवसिंधु कराला । लीन्ह उवारि काटि यमजाला ॥

सद्गुरु वचन

धर्मदास भल कीन्ह विचारा । हंस राज बड भाग तुम्हारा ॥ और ध्यान सुमिरन हम भाखा । विदेह नाम सोइ न्यारे राखा ॥ सो अब तुम कह दीन्ह चिन्हाई । देह विदेह लेहु निर्माई ॥ भाग बडे वाहीके कहिये । सुरति शब्द मई बासा लहिये ॥ नाम महात्म कहां समुझाई । जेहि प्रताप यम देखि डराई ॥ ध्यान विदेह यह परभाऊ । इकोतरसे पुरुष तरि जाऊ ॥ सार शब्द सों चित नहिं लाग। सोई जीव बड आहि अभागा ॥

ज्ञानस्थितिबोध

( ८३ )

साखी-अब मैं कहब तोहि सों, ए चित करो विचार । कहै कबीर पुरुषको, यही रूप निज सार ॥

चौपाई

कहै कबीर सुनो धर्मदासा । अग्रमूल बिदेह परकाशा ॥ इच्छा पुरुष काया बंधाना । लीलागर दीप कीन्ह अस्थाना ॥ सुजन हंस जन कीन्ह विश्रामा । धरै ध्यान पुरुषकर नामा ॥ तहैंवा पुरुष कीन्ह अस्थाना । अस्थल रूपको कहों ठिकाना ॥ कंठमाल पुढुपनकी राजे । माँथे प्रभुके छत्र विगजे ॥ हाथ अमी अंकूर बिचारी । जगर मगर शोभा उजियारी ॥ उपमा काकहि वरनों भाई । कोटि भानु सोजायैं लजाई ॥ भालरूप वरनन कहि कैसा । बीस सहस्र चंद्र लखि जैसा ॥ शरवन शोभा देहु बताई । रवि सहस्र तहाँ रहे लजाई ॥ चक्षु अमीकर चितवन कैसी । सुधा सिंधु लहरे उठ जैसी ॥ नासा श्रीवा कंठ कपोला । शोभा इनकी आइ अतोला ॥ मुखारविंद अरविंदहि जानी । उदय कोटि सूरजकी खानी ॥ उभय हंस अघरमो विहरे । दामिनि दशन उठत जनु लहरे ॥ भुजा बाँह मन चिकुर बनाई । हृदय राखि उर कलित लजाई ॥

साखी-कटि नाभि पिंडुरी जंघनि, नख सिख बहुत अनूप ।

झलझलात झलकत महा, शब्दहि रूप सुरूप ॥

चौपाई

निगम नेति नेतिहि करिधावे । तिनको रूप बरन को पावै ॥ मन बुधि चित पहुँचे नहिं तहाँ । अबरण पुरुष विराजे जहाँ ॥ जहाँ लों निजमन दर्शन पावा । तहाँ लंगि वरणि कबीर सुनावा ॥ अगम अगाय गाधमो नाही । ज्योंके त्यों प्रभु सदा रहाहीं ॥ अग्र नाम पुरुषके बरणी । भवसागरकी है यह तरणी ॥

( ८४ )

बोधसागर

ध्यान बीच जिन कीन्ह समारा । ते चढ़ि हंस होहि असवारा ॥ साखी-कहै कबीरा धर्मदाससों, पहुँचे लोक मझार । लीलागर दीप जहँ पुरुष है, हंसा करत विहार ॥

धर्मदास वचन

धर्मदास जो बिनती करहीं । बचन विचार मुखै उच्चरहीं ॥ तीन लोकमें व्यापक काला । धर्मराय जिव कीन्ह विहाला ॥ इहि भूमि यम जाल पसारा । नेम जाप षट करम अचारा ॥ इहि विच सबही दुनी भुलानी । नाम सार काहू नहिं जानी ॥ एक मंत्र काहू नहिं पावा । पेड़ छोड़ डारही भुलावा ॥ प्रथम पेड़को पालन कीन्हा । पेड़ मरम काहू नहिं चीन्हा ॥

सदृश वचन

पुरुष पेड़ निरञ्जन है डारा । त्रिगुण शाखा प्रति संसारा ॥ सत्य नाम नहिं जाने कोई । सार शब्द बिन गैबी गोई ॥

साखी-नाम महातम भाषहिं, धर्मदास समझाय । जो नर प्राणी नाम बिन, ताहि काल धरि खाय ॥

चौपाई

निवृति ज्ञान जीवन समझावहु । अजर नाम सो गुप्त छिपावहु ॥ जो जियरा होवै अंकुरी । वासे कहों शब्द भरपूरी ॥ जिह्वा कहों तो जगत रिझाई । प्रकट कहों तो काल नसाई ॥ उपजै विनशैको संसारा । कैसे पूजै काल अहारा ॥

साखी-परकट जनि भाखहु, हिरदै धरो छिपाय । बीरा दै समझायहु, सदृश येहि लखाय ॥

धर्मदास वचन

धर्मदास बिनती अनुसारी । बिन पांजी कैसे निस्तारी ॥ पांजी भेद कहौ विर छानी । जाते मिटे जन्मकी खानी ॥

ज्ञानस्थितिविषय

( ८५ )

पांजी भेद पावा नहिं कोई । ताते गयो बिगोह बिगोई ॥ देहि बीच जोहि लखि पावा । ताकर आवा गमन नशावा ॥ जब तक आप चीन्ह नहिं परई । तब लग काज न एको सरई ॥

सद्गुरु वचन

धर्मदास मैं कहों बिचारी । पांजीभेद कहों अतिभारी ॥ पांजी डोरी चित न धरई । मिथ्या दोष गुरुन कहैं करई ॥ यही भेद है अगम अपारा । अब मैं कहों सकल व्यवहारा ॥ जो चीन्ह है सो दरशन पाई । हंसहि हंस मिले पुनि जाई ॥ अनुचित वचन हमारे धरई । यमकी डगरी जाय सो करई ॥

साखी-पांजी कहों समुझायके; मन बिच लोकहि जाय ॥

मूलशब्द निर्वाण है, कहै कबीर समुझाय ॥

चौपाई

मूल शब्द है गुप्त जो सारा । बिरले पावैं शब्द हमारा ॥ सत्य वचन अस्ती ना माने । गहे हंस सो पहुँच ठिकाने ॥ अग्र अर्चित सुरति सोहंगा । एहि मूल गहि हंस विहंगा ॥ अग्र विहंग नाम जो पावै । तबहीं हंसा घरको आवै ॥ विहंग शब्द जाने नहिं कोई । सो तो गये बिगोह बिगोई ॥ सुरति बिहंगता ले चित जोरी । बिहंग नाम बिहंग है डोरी ॥ बिहंग हंस विहंग है बीरा । निज सोकाम ये कहै कबीरा ॥ बिहंग शब्द बिहंग है नाला । विहंग पुरुष संग हंस बहाला ॥ सातों नाल जो आय बिहंगा । बिहंग पताल आहि जलरंगा ॥ तहैं बैठी जलरंगी शाला । बायें कर पृथ्वीकी नाला ॥ ता ऊपरहि कर्म अवतारा । कहै कबीर भेद टकसारा ॥ लघु दीरघ अक्षर नहिं जाना । कैसे संत होइ निर्वाना ॥ एक भेद जिनही लखि पावा । तिनके काल निकट नहिं आवा ॥

( ८६ )

बोधसागर

सोई सिद्ध संत है भाई । सोहं नाल चीन्ह जिनपाई ॥ पुरुषहि सम शिरसेज बिछावा । जिन जिन शब्द हमारा पावा ॥ नालहै सत्य पुरुषकी स्वासा । सो नाल पतालमें बासा ॥ तहां है पांजीको दरबारा । ता चढ़ि हंस उतरिगो पारा ॥ पाँच नाम तिहको परवाना । जो कोइ साधु हृदयमें आना ॥

पाँच नाम

साखी—आदि उदित अति अजरमन, सप्त सिंधु निज नीर । अदल अदल सोहं गहै, साहब कहै कबीर ॥

चौपाई

यही सप्त नाल हैं सही । यही हंस नाम निरबही ॥ सप्तनालके सातों नामा । बीर बिहंग करै सब कामा ॥ सिंधुनालमें हंस पठाए । पुहुप नालसो सकल सुहाए ॥ अमीनाल महाँ हंस पयाना । सुरति नालसे हंस सिधाना ॥ अग्रनाल महाँ करत अहारा । सोहंग नालको सकल पसारा ॥ अजर नालघट कीन्ह विचारा । तबै पुरुषको दर्श निहारा ॥ सप्त नाल है एके गाऊं । सोई सुरति भेद निज पाऊं ॥ सद्गुरु मिले वस्तु निज पावै । बिन सद्गुरु को भर्म मिटावै ॥ सद्गुरुदया सबै कछु पाई । बिन सद्गुरु वह जाइ नशाई ॥

साखी—सतगुरु बडा सुनार है, परखे वस्तु भैंडार । सुरतिहि निरति मिलाइके, मेटि डार खुटसार ॥ सद्गुरु सांचे शब्द हैं, कायाके गुणवान । जीवनमुक्त शब्दहि मिले, महापुरुषके ज्ञान ॥

धर्मदास उवाच

धर्मदास विनती अनुसारि । मैं सब पायब तुम बलिहारी ॥ बलिहारी सतनाम तुम्हारी । जाते भयो सबै निस्तारी ॥

ज्ञानस्थितिबोध

( ८७ )

अब प्रभु मोपर दया हि कीजे । भेद अमीको मो कहिदीजे ॥ अमी अंक केहि कारण कीन्हा । वह तो अंक मोर नहि चीन्हा ॥ सो प्रभु मोकहैं देहु चिन्हाई । अंक विस्तार कहो समुझाई ॥

सदगुरु वचन

धर्मनि तुम विनती अनुसारी । सोई भेद अब कहो विचारी ॥ ज्ञान स्थिति हम कीन्ह बखानी । जाते भई सकल उत्पानी ॥ जबहि देह धरी प्रभु आई । अमी अंक है अंक बनाई ॥ अशर नाम देह धरि आई । अंक यही मैं कहो बुझाई ॥ स्थूल धरो साहिब यहि कारण । बिन अस्थूल न वस्तु उचारन ॥ मूलहि अंक विदेह विचारा । देह धरी नामहि संचारा ॥ जो नहि होत नाम परभाऊ । तो सब जगतकाल धरिखाऊ ॥ जोकहैं लेइ नाम टकसारा । देह छूटी जाय पुरुष दुवारा ॥ जबही नाम लेतहैं हंसा । तबही काल मरत है संसा ॥ तारण हंस देहमें धरहूँ । यमको मारि मुक्ति मैं करहूँ ॥ नाम प्रताप सबै कछु भाखा । सुमिरत हंस बोल हम राखा ॥

साखी—हंस उबारन नाम यह, कहैं कबीर बखानि ।

जाय जीव सतपुरुष घर, धरमराय पछितानि ॥

चौपाई

अमी अंक जब ही प्रभु कीन्हा । उत्पति सकल ताहि हम दीन्हा ॥ पुछुप दीप सब दीप निवासा । तीन लोक याते परकाशा ॥ स्वर्ग पताल भयो पुनि सबही । अमी अंक पुरुषहि किय जबही ॥ चन्द्र सूर्य सकलहि विस्तारा । अमी अंक सो भयो संसारा ॥ अमी अंक दोइ रूप बनावा । पुरुष शक्ति सो नाम कहावा ॥ ब्रह्मा विष्णु महेश विचारा । अमी अंक ते सब संसारा ॥ अमी अंकके गुण हैं ऐसे । सोरह सुत उत्पत भये तैसे ॥ अमी अंक जब नाहीं कीन्हा । तबही सुनहि शब्दमें चीन्हा ॥

( ८८ )

बोधसागर

सोही अंक कही अब तुमसों । अंक प्रभाव सुनो तुम हमसों ॥ अमी अंक तुम राखि छिपाई । सुरतिवंत कहैं देहु लखाई ॥ अंक बिना पारस नहिं जोई । पारस बिना मुक्ति नहिं होई ॥ पारस लोहा कंचन सोई । पारस विन पहुँचे नहिं कोई ॥ पारस परस गुरु शिर नावा । गुरु पारस परसे सतभावा ॥ सार शब्द है बीजक ध्याना । पारस आहि मूल रथाना ॥ तब सुकृत मिलि सत्य समाना । सत्य शब्द निश्चय करिजाना ॥ सिखापन मानि पुरुषकर लीन्हा । बलि तुम्हार हम पारस दीन्हा ॥ नाम तुम्हार न धोखे डारों । घट भीतर सो कबहुँ न टारों ॥

साखी—सब धोखा कौ मेटिके, पारस परसे संत ।

कबीर कहै धर्मदाससो, मेटों भवका अंत ॥

धर्मदास

धर्मदास चित बहुत हुलासा । ज्यों रविउदय कमल परकाशा ॥ दयासिन्धु पूरण गुरु स्वामी । कीन्ह कृतारथ अन्तर्यामी ॥ अविचल नाम मोहिं कहदीना । सकल जीव आपन कर लीन्हा ॥ जो जिय नाम तुम्हारा पावै । अवागमन रहित घर जावै ॥ साहेब कहिये शब्द विचारी । जाते छूटै भ्रमकी बारी ॥ अन्त समै बालक कर आही । तब यम सूझ परै कहि नाही ॥ समय साधिबालक नहिं जानैं । कैसे बाचै जीव आपनै ॥ यमकी घरी पहुँचे जब आई । तहाँको भेद कहों समुझाई ॥ वह बाचै यम जाइ हँराई । कष्ट परै सब सुधि बिसराई ॥ जड़ चेतनको है यह चारो । कैसे भवसे होत उबेरो ॥

सद्गुरु वचन

पुरुष अंश सुकृत तुम आगर । भलमति पूछब धर्मनि नागर ॥ सो समुझाइ कहुँ तोहि रंगू । जाहि रंगभौ यमको अंगू ॥

ज्ञानास्थितिबोध

( ८९ )

जब आवै बालकके पाहा । पलटे देह धरै निजु नाहा ॥ भक्तिरूप धरि आवै सोई । मस्तक श्याम फेर नहिं होई ॥ जब जिय नाम करै सम्भारा । तब यमकी जड़ होवे छारा ॥ शब्द सिंधुमें रहै समाई । तहांयम कबहु निकट नहिं आई ॥ शब्दविचार बारि टढ़ करहीं । मूल हंस रखवारी धरहीं ॥ जब फिर चाहे करन पयाना । अग्रज नाम करी संधाना ॥

साखी-वंश छांय बीरा लिखो, नाम सन्धि चित लाय । कहै कबीर निःशंक हो, हंस लोक कहैं जाय ॥

जब सठहार चले लै हंसा । सत सिंधु पहुँचत गइ संसा ॥ सत सिंधु आसन जो करहीं । हृदय रूप हंसा सब धरहीं ॥ आगे लेन हंस तहैं आवहि । आरति साजि चीर पहिरावहि ॥ कुशल क्षेम पूछे सब कोई । यमकी लज्जा किहि विधि खोई ॥ कहि प्रसाद आइ यदि ठाऊं । केहिं करनी पहुँची इहिं गंजि ॥ तबै हंस उठि बोले बैना । गुरुप्रसाद पाया निज नैना ॥ गुरु मोहि वह नाम सुनाई । तेहि प्रताप आये इहि ठाई ॥ तबही हंस पुरुष सौ कहई । हंसन चाह दर्शकी अहई ॥

साखी-नाम महात्म कबीरको, तेहि प्रसाद सो आइ । बिनय करत अभिलाष चित, पुरुषहि दरस कराइ ॥

चौपाई

पुरुष बुलाइ हंस कह लीन्हा । हंसन सकल डण्डवत कीन्हा ॥ दीन सिंहासन क्षत्र जु धरहीं । हंस सुजन जन दर्शन करहीं ॥ सिंहासन बैठी सुख पावा । शब्द अहार पुरुष संग आवा ॥ जन्म मरनकी भूख बुझाई । सब सुख भुगते अग्र अघाई ॥ निरंजन सुख सुधि नहिं पावा । ब्रह्मा विष्णु बैठि पछितावा ॥ वहतो हंस कहाँ उड़ि गयऊ । आदि अंत काहू नहिं लयहू ॥