कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
( १३६ )
बोधसागर
साखी—गुरु शिष्य एके भए, भिन्न न कबहुँ होय । दुर्मति दिलसो मारिकै, सुरति शब्द चित पोय ॥
धर्मदासबचन--चौपाई
धर्मदास तब बिनती कीन्हौ । चरण पकरिके विन्ती लीन्हौ ॥ ब्रह्मा विष्णु महेश्वर देवा । केहिविधि उपजे सो कहि भेवा ॥ चारि मुक्तिको भेद बतावौ । सुस्थिर ज्ञान मोहि समझावौ ॥
सत्गुरु बचन
सदगुरु बचन विहसि कर बोले । मुक्ति भेद कहुँ परदा खोले ॥ आदिहि पुरुष निरञ्जन कीन्हौ । माया आदि ताहि कह दीन्हौ ॥ तिहि संयोग भये त्रिय बारी । ब्रह्मा विष्णु महेश विचारी ॥ चार मुक्तिके वे हैं राजा । पँचइ मुक्ति भिन्न उपराजा ॥ प्रथम मुक्ति सालोक बताई । मारग वाम ताहि कर आई ॥ दूजी मुक्ति समीप कहावा । निर्वाण मार्ग हो ताकहँ पावा ॥ तीसरि मुक्ति स्वरूप बखानी । अघोर मार्गही ताकर जानी ॥ चौथी मुक्ति कहिये सायोजा । सर्मग मार्ग कलमा पढ़ रोजा ॥ चारों मुक्ति निरञ्जन लीन्हौ । तिनके बसहि जीव सबकीन्हौ ॥ अब सुन पांचइ मुक्ति विचारा । धर्मदास परखो मतसारा ॥ जीवनमुक्ति दरस तब लहये । मृतकदसा होय नामहि गहिये ॥ सत्य वचन मुखसो उच्चरई । नाम सार हृदये महाँ धरई ॥ नियम धर्म षट्कर्म अचारा । त्रिगुण फंदसों रहै निन्यारा ॥ सुरति निरति नामसों राखै । सद्गुरु बचन सत्यकर भाखै ॥ लोभ मोहसों रह निह न्यारा । करम क्रोधते आप उवारा ॥ दुख सुखकी कछु संशय नाही । पाप पुण्य नाही चित माहीं ॥ अरथ द्रव्य मिथ्याकर मानै । जीवन जन्म नाम पहिचानै ॥ दया क्षमा कुल टूट कहावा । विषमें हरषन चितमें लावा ॥
ज्ञानस्थितिबोध
( १३७ )
सो जिव उतरहि भवजल पारा । जो यह चाल चले निर्धारा ॥ अर्ध ऊर्धका करहि विचारा । सत्यनाम हृदये मर्हधारा ॥ उलटि कमल सुलटा जब करई। मनहि समेटि सुरति चित धरई॥ समसर पवन योगि कह तारै । पवन डोरि स्वासा निरुवारै ॥ सोहं तार घडहिमें देखे । स्वेत भँवर गहि शब्द विशेषे॥ भँवर गुफामहँ जगमग जोती । वा घर बरवै माणिक मोती ॥ निहकामी निरवानी जानी । निहरूपी निश्चितहि बखानी ॥
सारखी—आदि सुहंग बखानऊ, स्वर्ग पताल भरि ठौर ।
कहे कबीर धर्मदाससों, वही हंस शिरमौर ॥
चौपाई
सुरहि कमल याजीकर छोरा । सुरति करै तब देखि निहोरा ॥ ऐसी सुरति निरति मन राखै । सांचै दरश पुरुषके भाखै ॥ जबही दरश परश पुनि होवै । जन्म जन्मके कश्मल धोवै ॥ जीवन मुक्ति होइ पुनि तबही । संधिक नाम आव घट तबही ॥ कागरूप सब चाल मिटाई । गुरुप्रसाद हंस गति पाई ॥ निर्मल जीव हंसगति भयऊ । नाम संधि हृदयेमहँ लहेऊ ॥ वंश प्रताप साँचकर चीन्हा । नाम सार अमृतसर लीन्हौ ॥ जीवनमुक्ति देहमहँ पाई । हिम्मर रूप धरे सो आई ॥ जाती बरन पलटे सब अंगी । सद्वरु साँचे मिलि बहुरंगी ॥
सारखी—मलयागिरकी वास ज्यो, दीपक ज्योति पतंग ।
पारस छुइ कंचन भया, स्वाति सीपके संग ॥
चौपाई
स्वाती सीप नाम मिटि दोई । मुक्ता हल तेहि कह सब कोई॥
धर्मदास वचन
धर्मदास गुरु चरण न परई । शीश नवाय दण्डवत करई ॥ धन्यभाग्य दर्शन प्रभु दीन्हौ । अधम जीव पावन कर लीन्हौ॥
( १३८ )
बोधसागर
साहब दया दास पर कीजै । विदेह मुक्ति कर भेद जो दीजै॥ विदेह मुक्ति किम देह समाई । कौन भांति हंसा लखि पाई ॥ छुच्छी नदी रैन अति भारी । सलिलप्यासकिम मिटे दुखारी॥ पाँचो तत्त्व पाँच गति संग। त्रिगुणफंद जीव यह रंगा ॥ नऊ नाटीक कहे घटमाहीं । स्वासारूप जीव सँग ताहीं ॥ मनकी कला अनेक पसारा । काम क्रोध तृष्णा अधिकारा ॥ लोभ मोह चिन्ता अतिभारी । जड़ता गर्भ कुटिल विस्तारी ॥ इनके संग काग गति पाई । हंसवरण किमि होय गोसाँई ॥ यही अंग मन चितवन कीन्हौ । केहिविधि साहब तुम कह चीन्हौ॥
साखी-धर्मदास बिनती करै, साहब बंधन छोर । सब अंगमें भरि रहै, विदेह अंगको चोर ॥
सद्गुरु वचन
सद्गुरु वचन सुनो धर्मदासा । अगम भेद तोहि कहों प्रकाशा॥ विदेहमुक्ति तुम पूछिब आई । सो सब कथा कहो ससुझाई ॥ पुरुष विदेह कमलमों रहेऊ । सुरति विदेह शब्द जौ ठयऊ॥ लोक दीप सब सुरतिहिं कीन्हौ । तेहि पाछे मन उत्पन कीन्हौ ॥ विदेह मुक्तिकी डोरी चीन्हौ । शब्द सुरतिके हाथहिं दीन्हौ ॥ मनहिं समेटि सुरति पहिचानी । सुरति जाय तब शब्द समानी॥ शब्द सुरतिकर बांधो भेला । भवसागरसे दीन्हों हेला ॥ शब्द विदेह गुरूकर बासा । सुरतिस्वरूपी शिष्य निवासा॥ सुरति शब्दमें लीन्हो बासा । सुरतिस्वरूपी शिष्य निवासा॥ मायाजाल कृत्रिम सब लेखो । अग्रझलक नैननमें देखो ॥ कूप झांकि हो वचन विदेही । अग्नी जार उठावै सेही ॥ अग्र शब्द तबही लखि पावै । मृतक दिशा हो सुरति समावै॥ शीतल तपत स्वाद नहिं जानै । जन्म मरण शंका नहिं आने ॥
ज्ञानस्थितिबोध
( १३९ )
चलते फिरत वचन अस भाखा । चेत अचेत बोध नहीं राखा ॥ पुत्री पिता बंधु नहीं जानै । माता बहिन नाहिं पहिचानै ॥ श्रीहि अभूषण धरै न अंगा । तृषा क्षुधा नहीं स्वाद उमंगा ॥ ऊंच नीचकी नाहिं बिचारी । धर्म अधर्म दोऊसे न्यारी ॥ दुख सुख सब एकहि करिजानी । विदेह अंग ऐसे पहिचानी ॥
साखी-काया सीप सम जानिये, स्वातिशब्द पट आन । परख नेह संपुट बँधौं, मुक्ताहल उतपान ॥
चौपाई
धर्मदास इह भेद विदेहा । इह धन धन्य और सब खेहा ॥ जस चकोर चंदा कह ताकै । याविधि लिप्त नामके नाकै ॥ कमलचक्र है मनको रूपा । स्वप्नरूप भर्मित वह भूपा ॥ पाँच पचीस कठिन बिकारा । देह बीच इन राज पसारा ॥ सेमर फूल जस किरुवां आवा । देखि फूल बहु हरष बढ़ावा ॥ जुंगल गारत सुआ उड़ानो । रोम रोम मिथ्या कर जानो ॥ जाना नहीं विवेक बिचारा । ठोक कपार चलो झँखमारा ॥ मायारूप आहि इमि भाई ! जिमि फूल सेमर सुन्दरताई ॥
साखी-नारीरूप नर देखिके, कूकर सम लिपटाय । बिषय वासनाँ बँधि रहि, विदेहमुक्ति किमि पाव ॥
चौपाई
घरी घरी मन काम जगावै । ज्ञान भुलाय नाम विशरावै ॥ स्वप्न माँहि सोई छल करई । गुप्तवासना हृदये धरई ॥ कूद कूपके अगिन मँझारा । राखै कौन जीव निजु सारा ॥ सम्मुख आय बाघके कोई । भक्षण यतन करै वह सोई ॥ रक्षक शब्द जाहि तन गाजै । उलटो काल तहाँसों भाजै ॥ यही शब्द घट राखि समाई । माया ताहि खान नहीं पाई ॥
( १४० )
बोधसागर
सारवस्तु घटमों पहिचानौ । रोम रोम अस्थिर ठहरानौ ॥ काया सकल कालकी बारी । निसदिन ध्यान शब्द चितधारी ॥ देही सकल कालकी जानै । विदेह अंग आपहि पहिचानै ॥ देह विदेह नेह गुण जानै । आपा मेटि आदि गुण ठानै ॥ याविधि मनमों रहनी करई । आपा मेटि आदि गुण धरई ॥
सारखी—कहै कबीर वह आपहै, नहिं सुमरन नहिं जाप ।
धर्मदास लिखि लीजियो, अकह अगोचर छाप ॥
चौपाई
अकह अंश जब कहत रहावा । पांचतत्त्व गुणतीन समावा ॥ चलत हँसत बोलत बहुबानी । आपुन राजा रंक समानी ॥ माता पिता धरणि घर कीन्हे । आपुहि योग भोग सब चीन्हे ॥ गृह निकरे पुत्रहिं उपजावे । अपहि षट्कर्मन कह सावे ॥ भूख प्यास तृष्णा बहु सहिया । दुख सुखको संगीसोहिरहिया ॥ अर्थ द्रव्य सुमिरण सों राखै । मिथ्या सत्य आप सुख भाखै ॥ सुमिरण भजन आपही करई । अकला बै अकला संचरई ॥ भली बुरीको करत बिचारा । आपहि पाप पुण्य बिस्तारा ॥ कबहुक संत असंत कहावे । मनके भाव अनेक दिखावे ॥ आपही सेवा करै करावे । खीझे हँसे मनहि पछितावे ॥
सारखी—आप आपही रमि रहो, आत्मरूप परवान ।
यासों रहित अपार है, परमात्म सुस्थान ॥
चौपाई
तब साहब अस वचन उचारा । रहित मुक्ति सब इनसो न्यारा ॥ रहित भाव जो घटमें देखो । आवा गौन रहितई लेखो ॥ रहित पुरुष कह तबही पावे । अस्थिर ज्ञान चित्तमहैं लावे ॥
ज्ञानस्थितिबोध
( १४१ )
लिखे पढ़ै नहिं पावै भाई । बिन सतगुरुको देह लखाई ॥ प्रेमसुधारस तबही पावै । गुरु बहियां मिलि भेद लखावै ॥ चित आनंद अस्थिर तब जानै। सुमिरन भजन नाम पहिचानै ॥ मातु पिता सुत नारि पियारी । पुरजनजलसम रहनि विचारी ॥ नाम गोत्र तन शीतल कीन्हां । मिथ्या नारिपुत्र कुल चीन्हां ॥ भूखहि प्यास गई तन ताको । दुख औ सुखकी आसन जाको ॥ अर्थ द्रव्य मिथ्या करि जानी । बुधकी बुधी रहित कर मानी ॥ भली बुरीकी नहीं विवेका । जहाँ देखो तहाँ आनंद पेखा ॥ पाप पुण्यकी संशय नाहीं । संत कुसंत रहित जो आहीं ॥ मन बुधि चितते रहे भुलाई । पांच पचीस राखि अरुझाई ॥ बैठे उठे दूजा नहिं आनै । उत्तम मन अमृतरस सानै ॥ मन अरु वचन रहित करि जानै। खासा बीज नाम धुनि तानै ॥ नयन नासिका रहित अनन्दा । उदित भए जनु पूरण चन्दा ॥ हाथ पांव इन्द्री बस कीन्हे । सुर्य चन्द्र रहित घर चीन्हे ॥ जो देखे सो रहितै देखे । रहित अनन्द अवर नहिं पेखे ॥ सब गुण सहित रहन है ज्ञानी । रहित बिना है भेद दिवानी ॥ जब ही रहित आप वह कीन्हां । पुरुषहि समसर जो जिय चीन्हां ॥ रहित शब्दमों है मतवाला । ताकहँ देखि मूर्छि रहि काला ॥ सुरति सम्हार नाम दृढ़ लीजे । नाम सुधारस भरि भरि पीजे ॥
साखी-इहगुण ज्ञानस्थितिहिको, रहित मुक्तिकर भेद । कहे कबीर धर्मदाससों, नाम अमोलिक लेव । रूप मगन मन हो रहौ, अंग अंग सुखधाम । जिमि मिसि कागद पत्रही, होत सुअक्षर नाम ।
चौपाई
प्रेम पियाला कठिन रहाई । सत्यरूप धरि पीवे अघाई ॥
( १४२ )
बोधसागर
जिमि सती सरकों चढि जावै । पिब कारण वह जीव गँवावै ॥ संसार कहे वह बोलत भाई । जरबर गई प्रेम निर्वाही ॥ जीवतही जिय पीयके संग। माया भरम तजौ परसंगा ॥ जो कोइ होय हंस अंकुरी । नाम सनेह रहै परसंगा ॥ ज्यो पतंग दीपके कारन । जीवन आये अंग सब जारन ॥ अंग विदेह येह अनुसरहीं । असनबसनीकी सुधि नहिं करहीं ॥ कहत सुनत जिय तनमहँ डोलै । जीवन प्राण पवनसंग खेलै ॥
साखी-रहितहि सुक्ति कठिन है, कोइ न जानत भेद ।
शब्दहि सुरति समयके, हंसराज इह खेद ॥
जो जन पियके मद छकै, करै पियापिय पीव ।
पीव मिले हिलमिलि रहै, श्वास समानेउ जीव ॥
चौपाई
इशकभाव है कठिन अपारा । बिरले जीवहि करै सम्हारा ॥
धर्मदास कहि सुनो गुसाई । कीन्ह कृतारथ मोकहँ आई ॥
सुस्थिर ज्ञान मोहि समझावा । मनचञ्चल सुस्थिर ठहरावा ॥
कीन्ह कृतारथ मोकहँ आजू । बरनेव पुरुषहि हंस समाजू ॥
इह बरदान देहु मोहि स्वामी । कृपासिंधु गुरु अंतर्यामी ॥
चरणकमल उरसों नहिं टरही । पदपराग मनवासा धरही ॥
मन चञ्चल है कठिन कठोरा । कैसे प्रीति लगे गुरु वोरा ॥
सो समझाय देव मोहि भेदा । आदि अंत सब कीन्ह निषेदा ॥
साखी-तुम प्रभु दीनदयाल हौ, हम निज दास तुम्हार ।
भवसागरतै काठिके; दीजै पार उतार ॥
चौपाई
धर्मदास निश्चय मोहि चीन्हां । तुमरे घट हम बासा लीन्हां ॥
जहँ लगि जीव जगतमें आही । ते सब उबरहि तुमरे बांही ॥
ज्ञानस्थितिबोध
( १४३ )
वंश बयालिस जंग औतारा । तेजहु है जीवन काङ्गनहारा ॥ नाम विदेह अकह हम कीन्हौ । सोई वंश हाथ करदीन्हौ ॥ वचन हमार शब्द टकसारा । चूरामन तासे औतारा ॥ पुरुषहि अंश आहि निज सोई । शब्द अतीत नाम कहि सोई ॥ आदि नाम निरअक्षर जानौ । मुक्तामणि तिनको पहिचानौ ॥ उनसोंइ सकल गावे साँचा । सोई जीव कालसों बाँचा ॥ नहिं अक्षर नहिं आदिकि वानी । सोहंग तार पुरुषहि उतपानी ॥ इतनो भेद जानि है सोई । जो हंसा हि अंकुरी होई ॥ विच्छू मंत्र जानि नहिं पावा । सर्पकी बाँबी हाथ समावा ॥ मुक्त न होय परे यमखानी । नरक वास औँधे मुख आनी ॥ प्रेम प्रीति जाने नहिं कोई । तासों गए बिगोइ बिगोई ॥ अक्षर इशक आहि निज साँचा । जो चीन्हे सो परलै बाँचा ॥
साखी-ज्ञानस्थितिके येह गुन, इशक पुरुष निज वास ।
कहे कबीर धर्मदाससों, गाउ अक्षर विसवास ॥
चौपाई
सुर नर मुनि गण गंधर्व देवा । रहित पुरुष कर लखौ न भेवा ॥ धर्मदास मुनि प्रेम स्वभाऊ । शीस देइ तब प्रेम कहाऊ ॥ अब मैं कहौ मुक्तकर भाऊ । अक्षर मिलि है मुक्त प्रभाऊ ॥ जो देखे सो समझकर देखे । अक्षर बिना पुरुष नहिं पेखे ॥ भला बुरा सब समकर देखे । नर अरु नारि एककर लेखे ॥ पाप पुण्य शंका नहिं करई । दुख मुख दोऊ समकर धरई ॥ नर और नारि एकही घटमों । ज्यों कपास है सूतहि पटमों ॥ जल थल पवन अकास बखनौ । धर्म अधर्म एक करि जानौ ॥ पाँच पचीसौ बधन करहीं । त्रयदश पाँच ताहिंसों तरहीं ॥ रसना रसपति माया डारी । इच्छासंगम मन फटकारी ॥
( १४४ )
बोधसागर
नयन नासिका श्रवण तरंगा । जिह्वा इंद्रि करी एक संगा ॥ हाथ पाँव जीव सबमें वासा । पल २ छिन २ करहिं प्रकाशा ॥ काया माँहि शब्द पहिचानौ । मिथ्या जग स्वप्नहि सब जानौ ॥ लोभ मोह नाहिं चितधारा । निज अक्षरको करै सम्हारा ॥ अक्षर बहे शीसके माहीं । सो लखि आवै सतगुरु पाहीं ॥ उन मुनि करिकै अक्षर देखै । अक्षरमें निरअक्षर पेंखै ॥ निरअक्षर है वस्तु अपारा । जो जानै सो उतरे पारा ॥ अक्षर निर अक्षर दूजा नाहीं । दूजा करै विगुरुचन ताहीं ॥ नाम संधि हृदये महाँ राखै । अग्र विदेही अमृत चारै ॥
साखी—ज्ञानस्थितिके यह गुण, सबविधि करै सहाव ।
मनुवा अस्थिर होइ रहे, पुरुषहि दरस कराव ॥
कहे कबीर धर्मदाससों, अक्षर सुमिरहु सार ।
निरअक्षरसो प्राति करि, उतरहु भवजलपार ॥
चौपाई
धर्मदास तोहि भेद बताई । एहज्ञान काहू नहि पाई ॥
बहुतक ग्रंथ तुम्हैं समुझावा । ज्ञानस्थितसो गुप्त रहावा ॥
जब तुम कीन्हो खोज बहूता । तब एह भेद कहेब अजगूता ॥
जो यह ग्रंथ सुनै चित गहई । आवागौन तासु निर्बहई ॥
जो कोइ हंसहिहो अंकुरी । तासो भेद कहिब भरपूरी ॥
कपटरूप जाके तन होई । तासो वस्तु जो राखहु गोई ॥
येहि सिखावन पंथ चलावौ । भवसागर के जीव मुक्तावौ ॥
धर्मदास वचन
धर्मदास बिनती अनुसारी । तारण तरण जाब बलिहारी ॥
अब एक इच्छा घटमें आई । सद्वर भक्ति करौ चितलाई ॥
पान प्रमान हमहिं कह दीजे । दीन दयाल दया प्रभु कीजे ॥
ज्ञानस्थितिबोध
( १४५ )
संधिक नाम पाइ सुख होई । बिना छाप खातिर नहिं होई ॥ तब सतगुरुने साज मँगावा । कदली खम्भ आनि गडवावा ॥ चौका सोरह सुतकी कीजै । मान सिखावन हमरी लीजै ॥ धर्मदास सोई बिधि कीन्हौ । जो सद्गुरु कृपा करि दीहौ ॥ सोरह हाथ सूत्र तनवाई । सोरह धोती आनि चढाई ॥ सोरह नरियल ले परवाना । लौंग इलाची धरि मिष्ठाना ॥ मेवा अष्ट जुगुतिसो लाई । चौका चंदन कीन्ह बनाई ॥ बासन पांच धातुके धरिया । वांछा सहित गाय अनुसरिया ॥ आरति ज्योति कीन्ह परकाशा । वाजत शंख झाल तमनाशा ॥ धर्मदास औ आमिन आवा । सद्गुरु चरण हिये लव लावा ॥ चरण परखारि चरणामृत लीन्हौ । तन मन धन न्योछावर कीन्हौ ॥ षोडश शब्दहि कीन्ह उचारा । मोरत नरियर भौ उजियारा ॥ धर्मदास परवाना लीन्हौ । शिरिहि नवाय बंदगी कीन्हौ ॥ तारपीछे आमिन चलि आई । कीन्ह बंदगी शीस नवाई ॥ तब सद्गुरु दीन्हौ परवाना । आमिन हिय बहु हरष समाना ॥ धर्मदास गुरु बंदन कीन्हौ । साहब शब्द नाम जो दीन्हौ ॥ सम्भवत पन्द्रहसो चालीसा । भादों शुक्ल पाँचदिन तीसा ॥ पूर्णमासी पूर्ण जानौ । गुरुवासर शरणागति आनौ ॥ तब सद्गुरुने दीन्ह अशीसा । मुक्तिराज दीन्हो बखशीसा ॥ मुक्तामणि निज अंश हमारा । आमिनि घट लेहे औतारा ॥ उनके वंश बयालिस होई । जक्त जीव मुक्तावै सोई ॥
कहे कबीर धर्मदाससों, हम तुम दूजा नाहिं । शब्द विवेक विचार कर, जो देखा घटमाहिं ॥ शब्द सुरति औ निरति है, कहिबेको है तीन । निरति लौटि सुरतिहि मिली, सुरति शब्द लखिलीन ॥
( १४६ )
त्रोधमागर
गुरुशिष्य इमि जानिये, कहिये भिन्नहि भिन्न । शब्द सुकृत एकै भई, सुकृति घटमहँ चिह्न ॥ याहिवस्तुमों स्थिर रहौ, अस्थिर अचलसमाध । धर्मदास हर्षत भए, पायो सुखै अगाध ॥
॥ इति श्री ग्रन्थ ज्ञानस्थिति शुभमस्तु ॥ सर्वसन्त महुन्त गुरुनके चरणारविंद सम नमो सत्यते ।
संतोषबोध ग्रन्थ
अथ संतोषबोध प्रारंभ
भारतपथिक कबीरपंथी—
स्वामी श्रीयुगलानन्द द्वारा संशोधित
खेमराज श्रीकृष्णदास,
अध्यक्ष—“श्रीवेङ्कटेश्वर” स्टीम-प्रेस,
- बम्बई. *
पुनर्मुद्रणादि सर्वाधिकार “श्रीवेङ्कटेश्वर” मुद्रणयन्त्रालयाध्यक्षके अधीन है ।
१०१
संग्रह प्रकाशितः सन्
— प्रकाशकः —
सर्वविधाः साह प्रकाशकः सन्
प्रकाशकः साहसः
सर्वविधाः साह प्रकाशकः सन्
॥ १५ ॥
सर्वविधाः साह प्रकाशकः सन्
सत्यनाम
श्री कबीर साहिब
Figure 1
A faint, stylized illustration of a seated figure, possibly a deity or historical figure, wearing a crown and robes, framed by a decorative border. The figure is depicted in a meditative or formal pose, with hands resting on the lap. The background is plain, and the entire illustration is enclosed within a thin, double-lined rectangular frame.
Page 10
Figure 2
सत्यसुकृत, आदि अदली, अजर, अचिन्त, पुरुष, मुनीन्द्र, करुणामय, कबोर, सुरतियोग संतान, धनी, धर्मदास, चूशमणिनाम, सुदर्शन नाम, कुलपति नाम, प्रबोध गुरुबालापीर, केवल नाम, अमोल नाम, सुरतिसनेही नाम, हक्क नाम, पाकनाम, प्रकट नाम, धीरज नाम, उग्र नाम, दया नामकी दया- वंश व्यालीसकी दया
अथ श्रीबोधसागरे
त्रयोविंशतिस्तरंगः
छोटा संतोष बोध
★
चौपाई
धर्मदास बिनती सुन ज्ञानी । अमीशब्द भाषो मृदुवानी ॥ हम सेवक तुम सतगुरु मोरा । जीव अचेत भरमवस भोरा ॥ तिनकी आयुष्य कैसी होई । हंसन मग भाषों प्रभु सोई ॥
( १५२ )
बोधस.गर
समदश वचन शब्दकी राहू । हंसराज कहु हंसन नाहू ॥ शब्दचाल तेहि काल न पाई । कृपा करो पद बल २ जाई ॥
ज्ञानी वचन
समरथ वचन सुनो धर्मदासा । तुमसों सत्य शब्द परकाशा ॥ संतोषबोध सतहीते भयेऊ । सत्यपुरुष आपन मुख कियेऊ ॥ साधुसंतपर कीन्है दाय। मोह लोकतें जगत पठाया ॥ उठी अवाज पुष्पतें जैसी । सो वर्णन भाषौ मैं तैसी ॥
पुरुष वचन
हौ ज्ञानी तुम अंश हमाग । वचन सत्य मैं कहौ पुकारा ॥ जो कोइ साथ मोहको साधे । लोभ मोह तृष्णा गहवाधे ॥ तृष्णा वांध साथ जो पावे । आवत लोक वार नहिं लावे ॥ तृष्णा लोभ काल व्यवहारा । जो त्यजि है सो हंस हमारा ॥
ज्ञानी वचन
तत्क्षण ज्ञानी बिनती ठानी । वचन तुम्हार कोइ नहिं मानी ॥ भक्तहीन आंधर दुनियाँई । घट २ फाँस कालगइ नाई ॥ कोट वार जीवन परमोधा । कोइ एक सत्य शब्द ममसोधा ॥
साखी-पृथ्वी जाय जीवन कहि, युग २ शब्द बिताय ।
कोइ एक ज्ञानी चित गहे, आंधर ना पतियाय ॥
पुरुष वचन
जाहु वेग तुम वा संसारा । जो समझे सो उतरे पारा ॥ वार २ तुम जगमें जाई । आपन कह सब कथा सुनाई ॥
ज्ञानी वचन
धर्मदास तब जग हम आवा । आपन कह जीवन समझावा ॥ युग अंशख अर्ब बहु बीता । कै २ बार पृथ्वी हम कीता ॥ शेष गणेश महेश न ब्रह्मा । विष्णु नाम धरती नहिं थम्हा ॥
ज्ञानस्थितिबोध
( १५३ )
यह युग बीत अनन्तन बारा । युग २ आयेउ जिव रस्वारा॥ नर जाने जुलहा अवतारा । साधन काज देह हम धारा ॥ अगम शब्द नहिं जात गैवारा । बार अनेक जगत पुकारा ॥ जीवन बारहिबार पुकारा । नरदेही बहुते हँकारा ॥
साखी-जीवनसों घर २ कहा, नहिं माने उपदेश । गुप्तभाव हम तब भये, चले अमरपुर देश ॥
चौपाई
पांजी चले ठाव हम भयेऊ । सात स्वर्ग ऊपर चढ़ गयेऊ ॥ तहवां देख धर्म अस्थाना । नानझंकारी ताहि बखाना ॥ द्वारे वज्र सिला दे बैठे । बैठे हर सब जेठे ॥ धर्मराय अति प्रबल जगाती । मांगे दान जीव बहु भांती ॥ तिन हम सबको आद बढ़ावा । कैसे ज्ञानी जीवन मुक्तावा ॥ हम कहें सुनो दुष्ट वटपारा । छोड़हु रार पलकमें मारा ॥ छोड़ ठांव यम भये निनारा । पहुँचे अमरलोक मझारा ॥ पुरुष दरश कीन्हे तेहि क्षणमें । घट २ व्याप सकल जीवनमें ॥ तहाँ नहीं परवेश जमन को । बैठक पाँति सकल हंसन को ॥ हरष शोक नहिं करे कतूला । सदा बसंत फूल ऋतु फूला ॥ मोर चकोर बोल मृदु बैना । कोकला कोयल वचन सुबैना ॥ बैठक तहाँही सकल पुरुषकी । बोलत वचन अमीरस रसकी ॥
पुरुष वचन
साखी- वह सत बोले पुरुष तब, सुनो सँदेशी अंश । भवसागर बहु दिन रहे, केतक लाये हंस ॥
ज्ञानी वचन-चौपाई
रहे शब्दसों तब कर जोरी । बंदी छोर विनय सुन मोरी ॥ काम अरु कोथ मोह औ लोभा । माया फँसै जीव पर शोभा ॥
( १५४ )
बोधसागर
सकल जीव अघ आतम पुंजा । फिरि २ परहि जनमके कुंजा ॥
पुरुष वचन
तब समरथ अस वचन पुकारा । दुनियाँ जात काल मुख द्वारा ॥ हो ज्ञानी तुम बहुर सिधाओ । शब्द देव जीवन मुक्ताओ ॥ देव परवाना अपने हाथा । सकल जीव जो होय सनाथा ॥ तिनका तोरहु यम का लेशा । माथे हाथ दे कहो संदेशा ॥ नरियर धोती तान मैंगे हो । सत्य शब्द देअंक चढै हो ॥ येही शब्द येही परवाना । सत्य शब्द निश्चय कर जाना ॥ सन्त समाज सुनो तुम महिमा । गुरुपद परस दरस एक लहमा ॥ तेहि समधन नहिं जगमें औरा । कोट जन्म तीरथ फल दौरा ॥ जो कोइ साथ मंदिरमें आवे । चरण पखार चरणामृत लावे ॥ नारी पुरुष एक मत कीजे । सतगुरु दया अमीरस पीजे ॥
साखी—काम कोध तृष्णा तजे, तजै मान अपमान ।
सद्गुरु दया जाहिपर, यम शिर मरदे मान ॥
चौपाई
जो ये तक तज सेवा करहै । सो प्राणी भवसागर तरहै ॥ सेवा करत कसर भई जाई । तवै कालघर बजत बधाई ॥ सेवा करे चरण चितलाई । पाँच साथ मिल भगत कराई ॥ संतोष बोध जीवन पर भाषा । जो कोइ साधू मन दृढ़ राखा ॥ जरा मरण तिनका हो नासू । गुरु पद गह सन्त निज दासू ॥ अगम ज्ञान संतोष वरदानी । हंसा आप होय महिमानी ॥ अगम अपार ज्ञान संतोषू । सकल साधु हिलमिल परतोषू ॥ संतोष ज्ञान स्वाती सम कहिये । सज्जन सत समझ दृढ़ रहिये ॥ स्वाती ज्ञान साथ जो पावे । सो साधू सतलोक सिधावे ॥
ज्ञानस्थितिबोध
( १५५ )
साखी-ज्ञानकथा ऐसो कहे, जस स्वातीको पान । सबहिनमें जो गुण करे, सन्त लेइ बिलछान ॥
चौपाई
संतोष ज्ञान मल्यागिरि जैसे । निकट बृक्ष प्रबल हो जैसे ॥ श्रोता सुने श्रवण शुभ बानी । ज्ञानी हृदय करो बिलछानी ॥ साधू ज्ञान सुने चितलाई । ताका हंस विगोइ न जाई ॥ अन्न सोय जो भूख बुझेहै । ज्ञान सोइ जेहि लोकहि जैहै ॥ सतगुर शब्द गहे जो हियमें । बचन अमोल मानमिल पियमें ॥ जाके हृदे कपट नहिं न्याप् । सो साधू मेंटे त्रिय ताप् ॥ बहुर न देह धरे यहि जगमें । कमलपत्र सम न्यारे जलमें ॥ जो प्राणी ऐसी गहि रीती । तजतहि देह चले यम जीती ॥ काया तजे प्रीति गुरु लागी । हंस समाज पहुँच अनुरागी ॥ गुरु प्रताप मम दर्शन पावे । हंसन समसर सेज बिछावे ॥ अमृत फलके भोजन पैहो । अटल दुलीचा सेज बिछेहो ॥ क्रीट रवीस जगमगत सुहावन । अमर चीर शोभा बटु पावन ॥ षोडश रबि जनु अंग लपेटा । हरषहि शोक सकल दुख मेटा ॥
साखी-अस बीरा परताप बल, प्रबल काल क्षय होय । जेहि सद्गुर वहियाँ मिले, हंसन जाय विगोय ॥
इति श्रीछोटासंतोष बोध समाप्त