कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
( १४२ )
बोधसागर
जिमि सती सरकों चढि जावै । पिब कारण वह जीव गँवावै ॥ संसार कहे वह बोलत भाई । जरबर गई प्रेम निर्वाही ॥ जीवतही जिय पीयके संग। माया भरम तजौ परसंगा ॥ जो कोइ होय हंस अंकुरी । नाम सनेह रहै परसंगा ॥ ज्यो पतंग दीपके कारन । जीवन आये अंग सब जारन ॥ अंग विदेह येह अनुसरहीं । असनबसनीकी सुधि नहिं करहीं ॥ कहत सुनत जिय तनमहँ डोलै । जीवन प्राण पवनसंग खेलै ॥
साखी-रहितहि सुक्ति कठिन है, कोइ न जानत भेद ।
शब्दहि सुरति समयके, हंसराज इह खेद ॥
जो जन पियके मद छकै, करै पियापिय पीव ।
पीव मिले हिलमिलि रहै, श्वास समानेउ जीव ॥
चौपाई
इशकभाव है कठिन अपारा । बिरले जीवहि करै सम्हारा ॥
धर्मदास कहि सुनो गुसाई । कीन्ह कृतारथ मोकहँ आई ॥
सुस्थिर ज्ञान मोहि समझावा । मनचञ्चल सुस्थिर ठहरावा ॥
कीन्ह कृतारथ मोकहँ आजू । बरनेव पुरुषहि हंस समाजू ॥
इह बरदान देहु मोहि स्वामी । कृपासिंधु गुरु अंतर्यामी ॥
चरणकमल उरसों नहिं टरही । पदपराग मनवासा धरही ॥
मन चञ्चल है कठिन कठोरा । कैसे प्रीति लगे गुरु वोरा ॥
सो समझाय देव मोहि भेदा । आदि अंत सब कीन्ह निषेदा ॥
साखी-तुम प्रभु दीनदयाल हौ, हम निज दास तुम्हार ।
भवसागरतै काठिके; दीजै पार उतार ॥
चौपाई
धर्मदास निश्चय मोहि चीन्हां । तुमरे घट हम बासा लीन्हां ॥
जहँ लगि जीव जगतमें आही । ते सब उबरहि तुमरे बांही ॥
ज्ञानस्थितिबोध
( १४३ )
वंश बयालिस जंग औतारा । तेजहु है जीवन काङ्गनहारा ॥ नाम विदेह अकह हम कीन्हौ । सोई वंश हाथ करदीन्हौ ॥ वचन हमार शब्द टकसारा । चूरामन तासे औतारा ॥ पुरुषहि अंश आहि निज सोई । शब्द अतीत नाम कहि सोई ॥ आदि नाम निरअक्षर जानौ । मुक्तामणि तिनको पहिचानौ ॥ उनसोंइ सकल गावे साँचा । सोई जीव कालसों बाँचा ॥ नहिं अक्षर नहिं आदिकि वानी । सोहंग तार पुरुषहि उतपानी ॥ इतनो भेद जानि है सोई । जो हंसा हि अंकुरी होई ॥ विच्छू मंत्र जानि नहिं पावा । सर्पकी बाँबी हाथ समावा ॥ मुक्त न होय परे यमखानी । नरक वास औँधे मुख आनी ॥ प्रेम प्रीति जाने नहिं कोई । तासों गए बिगोइ बिगोई ॥ अक्षर इशक आहि निज साँचा । जो चीन्हे सो परलै बाँचा ॥
साखी-ज्ञानस्थितिके येह गुन, इशक पुरुष निज वास ।
कहे कबीर धर्मदाससों, गाउ अक्षर विसवास ॥
चौपाई
सुर नर मुनि गण गंधर्व देवा । रहित पुरुष कर लखौ न भेवा ॥ धर्मदास मुनि प्रेम स्वभाऊ । शीस देइ तब प्रेम कहाऊ ॥ अब मैं कहौ मुक्तकर भाऊ । अक्षर मिलि है मुक्त प्रभाऊ ॥ जो देखे सो समझकर देखे । अक्षर बिना पुरुष नहिं पेखे ॥ भला बुरा सब समकर देखे । नर अरु नारि एककर लेखे ॥ पाप पुण्य शंका नहिं करई । दुख मुख दोऊ समकर धरई ॥ नर और नारि एकही घटमों । ज्यों कपास है सूतहि पटमों ॥ जल थल पवन अकास बखनौ । धर्म अधर्म एक करि जानौ ॥ पाँच पचीसौ बधन करहीं । त्रयदश पाँच ताहिंसों तरहीं ॥ रसना रसपति माया डारी । इच्छासंगम मन फटकारी ॥
( १४४ )
बोधसागर
नयन नासिका श्रवण तरंगा । जिह्वा इंद्रि करी एक संगा ॥ हाथ पाँव जीव सबमें वासा । पल २ छिन २ करहिं प्रकाशा ॥ काया माँहि शब्द पहिचानौ । मिथ्या जग स्वप्नहि सब जानौ ॥ लोभ मोह नाहिं चितधारा । निज अक्षरको करै सम्हारा ॥ अक्षर बहे शीसके माहीं । सो लखि आवै सतगुरु पाहीं ॥ उन मुनि करिकै अक्षर देखै । अक्षरमें निरअक्षर पेंखै ॥ निरअक्षर है वस्तु अपारा । जो जानै सो उतरे पारा ॥ अक्षर निर अक्षर दूजा नाहीं । दूजा करै विगुरुचन ताहीं ॥ नाम संधि हृदये महाँ राखै । अग्र विदेही अमृत चारै ॥
साखी—ज्ञानस्थितिके यह गुण, सबविधि करै सहाव ।
मनुवा अस्थिर होइ रहे, पुरुषहि दरस कराव ॥
कहे कबीर धर्मदाससों, अक्षर सुमिरहु सार ।
निरअक्षरसो प्राति करि, उतरहु भवजलपार ॥
चौपाई
धर्मदास तोहि भेद बताई । एहज्ञान काहू नहि पाई ॥
बहुतक ग्रंथ तुम्हैं समुझावा । ज्ञानस्थितसो गुप्त रहावा ॥
जब तुम कीन्हो खोज बहूता । तब एह भेद कहेब अजगूता ॥
जो यह ग्रंथ सुनै चित गहई । आवागौन तासु निर्बहई ॥
जो कोइ हंसहिहो अंकुरी । तासो भेद कहिब भरपूरी ॥
कपटरूप जाके तन होई । तासो वस्तु जो राखहु गोई ॥
येहि सिखावन पंथ चलावौ । भवसागर के जीव मुक्तावौ ॥
धर्मदास वचन
धर्मदास बिनती अनुसारी । तारण तरण जाब बलिहारी ॥
अब एक इच्छा घटमें आई । सद्वर भक्ति करौ चितलाई ॥
पान प्रमान हमहिं कह दीजे । दीन दयाल दया प्रभु कीजे ॥
ज्ञानस्थितिबोध
( १४५ )
संधिक नाम पाइ सुख होई । बिना छाप खातिर नहिं होई ॥ तब सतगुरुने साज मँगावा । कदली खम्भ आनि गडवावा ॥ चौका सोरह सुतकी कीजै । मान सिखावन हमरी लीजै ॥ धर्मदास सोई बिधि कीन्हौ । जो सद्गुरु कृपा करि दीहौ ॥ सोरह हाथ सूत्र तनवाई । सोरह धोती आनि चढाई ॥ सोरह नरियल ले परवाना । लौंग इलाची धरि मिष्ठाना ॥ मेवा अष्ट जुगुतिसो लाई । चौका चंदन कीन्ह बनाई ॥ बासन पांच धातुके धरिया । वांछा सहित गाय अनुसरिया ॥ आरति ज्योति कीन्ह परकाशा । वाजत शंख झाल तमनाशा ॥ धर्मदास औ आमिन आवा । सद्गुरु चरण हिये लव लावा ॥ चरण परखारि चरणामृत लीन्हौ । तन मन धन न्योछावर कीन्हौ ॥ षोडश शब्दहि कीन्ह उचारा । मोरत नरियर भौ उजियारा ॥ धर्मदास परवाना लीन्हौ । शिरिहि नवाय बंदगी कीन्हौ ॥ तारपीछे आमिन चलि आई । कीन्ह बंदगी शीस नवाई ॥ तब सद्गुरु दीन्हौ परवाना । आमिन हिय बहु हरष समाना ॥ धर्मदास गुरु बंदन कीन्हौ । साहब शब्द नाम जो दीन्हौ ॥ सम्भवत पन्द्रहसो चालीसा । भादों शुक्ल पाँचदिन तीसा ॥ पूर्णमासी पूर्ण जानौ । गुरुवासर शरणागति आनौ ॥ तब सद्गुरुने दीन्ह अशीसा । मुक्तिराज दीन्हो बखशीसा ॥ मुक्तामणि निज अंश हमारा । आमिनि घट लेहे औतारा ॥ उनके वंश बयालिस होई । जक्त जीव मुक्तावै सोई ॥
कहे कबीर धर्मदाससों, हम तुम दूजा नाहिं । शब्द विवेक विचार कर, जो देखा घटमाहिं ॥ शब्द सुरति औ निरति है, कहिबेको है तीन । निरति लौटि सुरतिहि मिली, सुरति शब्द लखिलीन ॥
( १४६ )
त्रोधमागर
गुरुशिष्य इमि जानिये, कहिये भिन्नहि भिन्न । शब्द सुकृत एकै भई, सुकृति घटमहँ चिह्न ॥ याहिवस्तुमों स्थिर रहौ, अस्थिर अचलसमाध । धर्मदास हर्षत भए, पायो सुखै अगाध ॥
॥ इति श्री ग्रन्थ ज्ञानस्थिति शुभमस्तु ॥ सर्वसन्त महुन्त गुरुनके चरणारविंद सम नमो सत्यते ।
संतोषबोध ग्रन्थ
अथ संतोषबोध प्रारंभ
भारतपथिक कबीरपंथी—
स्वामी श्रीयुगलानन्द द्वारा संशोधित
खेमराज श्रीकृष्णदास,
अध्यक्ष—“श्रीवेङ्कटेश्वर” स्टीम-प्रेस,
- बम्बई. *
पुनर्मुद्रणादि सर्वाधिकार “श्रीवेङ्कटेश्वर” मुद्रणयन्त्रालयाध्यक्षके अधीन है ।
१०१
संग्रह प्रकाशितः सन्
— प्रकाशकः —
सर्वविधाः साह प्रकाशकः सन्
प्रकाशकः साहसः
सर्वविधाः साह प्रकाशकः सन्
॥ १५ ॥
सर्वविधाः साह प्रकाशकः सन्
सत्यनाम
श्री कबीर साहिब
Figure 1
A faint, stylized illustration of a seated figure, possibly a deity or historical figure, wearing a crown and robes, framed by a decorative border. The figure is depicted in a meditative or formal pose, with hands resting on the lap. The background is plain, and the entire illustration is enclosed within a thin, double-lined rectangular frame.
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Figure 2
सत्यसुकृत, आदि अदली, अजर, अचिन्त, पुरुष, मुनीन्द्र, करुणामय, कबोर, सुरतियोग संतान, धनी, धर्मदास, चूशमणिनाम, सुदर्शन नाम, कुलपति नाम, प्रबोध गुरुबालापीर, केवल नाम, अमोल नाम, सुरतिसनेही नाम, हक्क नाम, पाकनाम, प्रकट नाम, धीरज नाम, उग्र नाम, दया नामकी दया- वंश व्यालीसकी दया
अथ श्रीबोधसागरे
त्रयोविंशतिस्तरंगः
छोटा संतोष बोध
★
चौपाई
धर्मदास बिनती सुन ज्ञानी । अमीशब्द भाषो मृदुवानी ॥ हम सेवक तुम सतगुरु मोरा । जीव अचेत भरमवस भोरा ॥ तिनकी आयुष्य कैसी होई । हंसन मग भाषों प्रभु सोई ॥
( १५२ )
बोधस.गर
समदश वचन शब्दकी राहू । हंसराज कहु हंसन नाहू ॥ शब्दचाल तेहि काल न पाई । कृपा करो पद बल २ जाई ॥
ज्ञानी वचन
समरथ वचन सुनो धर्मदासा । तुमसों सत्य शब्द परकाशा ॥ संतोषबोध सतहीते भयेऊ । सत्यपुरुष आपन मुख कियेऊ ॥ साधुसंतपर कीन्है दाय। मोह लोकतें जगत पठाया ॥ उठी अवाज पुष्पतें जैसी । सो वर्णन भाषौ मैं तैसी ॥
पुरुष वचन
हौ ज्ञानी तुम अंश हमाग । वचन सत्य मैं कहौ पुकारा ॥ जो कोइ साथ मोहको साधे । लोभ मोह तृष्णा गहवाधे ॥ तृष्णा वांध साथ जो पावे । आवत लोक वार नहिं लावे ॥ तृष्णा लोभ काल व्यवहारा । जो त्यजि है सो हंस हमारा ॥
ज्ञानी वचन
तत्क्षण ज्ञानी बिनती ठानी । वचन तुम्हार कोइ नहिं मानी ॥ भक्तहीन आंधर दुनियाँई । घट २ फाँस कालगइ नाई ॥ कोट वार जीवन परमोधा । कोइ एक सत्य शब्द ममसोधा ॥
साखी-पृथ्वी जाय जीवन कहि, युग २ शब्द बिताय ।
कोइ एक ज्ञानी चित गहे, आंधर ना पतियाय ॥
पुरुष वचन
जाहु वेग तुम वा संसारा । जो समझे सो उतरे पारा ॥ वार २ तुम जगमें जाई । आपन कह सब कथा सुनाई ॥
ज्ञानी वचन
धर्मदास तब जग हम आवा । आपन कह जीवन समझावा ॥ युग अंशख अर्ब बहु बीता । कै २ बार पृथ्वी हम कीता ॥ शेष गणेश महेश न ब्रह्मा । विष्णु नाम धरती नहिं थम्हा ॥
ज्ञानस्थितिबोध
( १५३ )
यह युग बीत अनन्तन बारा । युग २ आयेउ जिव रस्वारा॥ नर जाने जुलहा अवतारा । साधन काज देह हम धारा ॥ अगम शब्द नहिं जात गैवारा । बार अनेक जगत पुकारा ॥ जीवन बारहिबार पुकारा । नरदेही बहुते हँकारा ॥
साखी-जीवनसों घर २ कहा, नहिं माने उपदेश । गुप्तभाव हम तब भये, चले अमरपुर देश ॥
चौपाई
पांजी चले ठाव हम भयेऊ । सात स्वर्ग ऊपर चढ़ गयेऊ ॥ तहवां देख धर्म अस्थाना । नानझंकारी ताहि बखाना ॥ द्वारे वज्र सिला दे बैठे । बैठे हर सब जेठे ॥ धर्मराय अति प्रबल जगाती । मांगे दान जीव बहु भांती ॥ तिन हम सबको आद बढ़ावा । कैसे ज्ञानी जीवन मुक्तावा ॥ हम कहें सुनो दुष्ट वटपारा । छोड़हु रार पलकमें मारा ॥ छोड़ ठांव यम भये निनारा । पहुँचे अमरलोक मझारा ॥ पुरुष दरश कीन्हे तेहि क्षणमें । घट २ व्याप सकल जीवनमें ॥ तहाँ नहीं परवेश जमन को । बैठक पाँति सकल हंसन को ॥ हरष शोक नहिं करे कतूला । सदा बसंत फूल ऋतु फूला ॥ मोर चकोर बोल मृदु बैना । कोकला कोयल वचन सुबैना ॥ बैठक तहाँही सकल पुरुषकी । बोलत वचन अमीरस रसकी ॥
पुरुष वचन
साखी- वह सत बोले पुरुष तब, सुनो सँदेशी अंश । भवसागर बहु दिन रहे, केतक लाये हंस ॥
ज्ञानी वचन-चौपाई
रहे शब्दसों तब कर जोरी । बंदी छोर विनय सुन मोरी ॥ काम अरु कोथ मोह औ लोभा । माया फँसै जीव पर शोभा ॥
( १५४ )
बोधसागर
सकल जीव अघ आतम पुंजा । फिरि २ परहि जनमके कुंजा ॥
पुरुष वचन
तब समरथ अस वचन पुकारा । दुनियाँ जात काल मुख द्वारा ॥ हो ज्ञानी तुम बहुर सिधाओ । शब्द देव जीवन मुक्ताओ ॥ देव परवाना अपने हाथा । सकल जीव जो होय सनाथा ॥ तिनका तोरहु यम का लेशा । माथे हाथ दे कहो संदेशा ॥ नरियर धोती तान मैंगे हो । सत्य शब्द देअंक चढै हो ॥ येही शब्द येही परवाना । सत्य शब्द निश्चय कर जाना ॥ सन्त समाज सुनो तुम महिमा । गुरुपद परस दरस एक लहमा ॥ तेहि समधन नहिं जगमें औरा । कोट जन्म तीरथ फल दौरा ॥ जो कोइ साथ मंदिरमें आवे । चरण पखार चरणामृत लावे ॥ नारी पुरुष एक मत कीजे । सतगुरु दया अमीरस पीजे ॥
साखी—काम कोध तृष्णा तजे, तजै मान अपमान ।
सद्गुरु दया जाहिपर, यम शिर मरदे मान ॥
चौपाई
जो ये तक तज सेवा करहै । सो प्राणी भवसागर तरहै ॥ सेवा करत कसर भई जाई । तवै कालघर बजत बधाई ॥ सेवा करे चरण चितलाई । पाँच साथ मिल भगत कराई ॥ संतोष बोध जीवन पर भाषा । जो कोइ साधू मन दृढ़ राखा ॥ जरा मरण तिनका हो नासू । गुरु पद गह सन्त निज दासू ॥ अगम ज्ञान संतोष वरदानी । हंसा आप होय महिमानी ॥ अगम अपार ज्ञान संतोषू । सकल साधु हिलमिल परतोषू ॥ संतोष ज्ञान स्वाती सम कहिये । सज्जन सत समझ दृढ़ रहिये ॥ स्वाती ज्ञान साथ जो पावे । सो साधू सतलोक सिधावे ॥
ज्ञानस्थितिबोध
( १५५ )
साखी-ज्ञानकथा ऐसो कहे, जस स्वातीको पान । सबहिनमें जो गुण करे, सन्त लेइ बिलछान ॥
चौपाई
संतोष ज्ञान मल्यागिरि जैसे । निकट बृक्ष प्रबल हो जैसे ॥ श्रोता सुने श्रवण शुभ बानी । ज्ञानी हृदय करो बिलछानी ॥ साधू ज्ञान सुने चितलाई । ताका हंस विगोइ न जाई ॥ अन्न सोय जो भूख बुझेहै । ज्ञान सोइ जेहि लोकहि जैहै ॥ सतगुर शब्द गहे जो हियमें । बचन अमोल मानमिल पियमें ॥ जाके हृदे कपट नहिं न्याप् । सो साधू मेंटे त्रिय ताप् ॥ बहुर न देह धरे यहि जगमें । कमलपत्र सम न्यारे जलमें ॥ जो प्राणी ऐसी गहि रीती । तजतहि देह चले यम जीती ॥ काया तजे प्रीति गुरु लागी । हंस समाज पहुँच अनुरागी ॥ गुरु प्रताप मम दर्शन पावे । हंसन समसर सेज बिछावे ॥ अमृत फलके भोजन पैहो । अटल दुलीचा सेज बिछेहो ॥ क्रीट रवीस जगमगत सुहावन । अमर चीर शोभा बटु पावन ॥ षोडश रबि जनु अंग लपेटा । हरषहि शोक सकल दुख मेटा ॥
साखी-अस बीरा परताप बल, प्रबल काल क्षय होय । जेहि सद्गुर वहियाँ मिले, हंसन जाय विगोय ॥
इति श्रीछोटासंतोष बोध समाप्त
( १५६ )
बोधसागर
अथ बड़ा सन्तोषबोध प्रारंभ
चतुर्विंशतिस्तत्रंगः
○
धर्मदास वचन चौपाई
धर्मदास पूछे चितलाई । तत्त्व भेद कहिये समुझाई ॥ कौन तुरीके योजन दौरा । भाषो साहेब हम हैं भौरा ॥ तत्त्वनके स्थान चिन्हाओ । बाहर भीतर भाषि सुनाओ ॥ विनय करूं कीजे प्रभु दाय। धर्मदास गहे दोनू पाया ॥
सदगुरु वचन
धर्मनि सुनो तत्त्व व्यवहारा । निशिवासर का कहूँ विचारा ॥ तत्त्वतत्त्वका स्थान चिन्हाऊँ । कहि करि वाहर भीतर दशाऊँ ॥ स्वासासंग होय आवे जाई । तत्त्वभेद सुनियो चितलाई ॥ लालतुरी योजन परवाना । मुशकी कोजन डेठ सिधाना ॥ हरीतुरी योजन दाय जाई । पीला योजन तीन चलाई ॥ हंसा योजन चारहि ध्यावे । फिरिके दण्ड तबै ले आवै ॥ मूल कमल है तेज ठिकाना । षट दल तत्त्व अकाश बखाना ॥ कमल अष्ट दल है तत्त्वबाई । द्वादश दल पृथ्वी सु रहाई ॥ षोडश दल जलतत्त्व बखाना । धर्मदास गहि राख ठिकाना ॥ याविधि पाचौ आवै जाई । अपनी मनजिलको सुन भाई ॥ गौचतुरी रथ एक सर्वा। ता उपर मन जिव असवारा ॥ जाव पडचो है मनके हाथा । नाच नचावे राखै साथा ॥ क्षण भीरत क्षण बाहर आवै । सतगुरु मिलतो साधिलखावै ॥
साखी—अष्टपांखुरी कमल है, ता ऊपर जिव बास । ताकर मनको आसना, नख शिख तनके पास ॥
संतोषबोध
( १५७ )
धर्मदास वचन
साहेब कहो भेद टकसारा । जेहिते जिवका होय उबारा ॥ नौ तत्त्वनको भेद बताओ । सकल कामना मोर मिटाओ ॥ पाँच तत्त्व जाने सब कोई । चारि तत्त्वकी खबरि न होई ॥ पाँच तत्त्व खेले मैदाना । चारि तत्त्व रहे कौन ठिकाना ॥ कहाँ तत्त्वनको भोजन केता । ताके चेत आगम है चेत ॥ इनका सतगुरु कहो बिचारा । कहो केता तत्त्व करै अहारा ॥
सद्गुरु वचन
धर्मदास मैं अगम बताऊँ । नौ तत्त्व को भेद लखाऊँ ॥ पाँच तत्त्व खेले मैदाना । चारि तत्त्व ब्रह्मांड ठिकाना ॥ छठवाँ अग्नि तत्त्व जो होई । नैना वीच रमै पुनि सोई ॥ दोयदल कमल वरणहै चारी । बैठे निरञ्जन आसन मारी ॥ ताहि कमलको नाम बताऊँ । चारि वरणका रूप दिखाऊँ ॥ लखै शब्दसो जाने भेदा । राता पीरा श्याम सपेदा ॥
साखी—ताहि कमलको छाड़िके, कीजै शब्द विचार । पाँच तत्त्व संभारिहो, उतरो भव जल पार ॥
चौपाई
निशि बासर की स्वांसा जेती । कहूँ विचार चले दम तेती ॥ छःसै स्वास इक्कीस हजार । येते निशिदिन दमहि सुधारा ॥ ताको भोजन सबमिलि पावे । जो सतगुरु यहि भेद बतावे ॥ बीस सहस्र पंच देव पाई । ताको लेखो कहूँ समुझाई ॥ प्रतिदेव पाछे चार हजार । रहै जाप सोलहसै सारा ॥ छठवें तत्त्व निरञ्जन राई । जाप सहस्र तहाँ पहुँचाई ॥ सोलहसै मैं छःसै रहई । ताको भेद हंस कोह गहई ॥ जाप अठोतर जब रहि जाई । ताछिन शब्द सुरति मिलाई ॥
( १५८ )
बोधसागर
साठसमै बाहर चौपाई । ततछिन हंस लोक को जाई ॥ सुषुमनि तत्त्व करे असवारी । तबे कालकी पहुँचे धारी ॥
साखी--जादिन काल आसहि, पगते करे उजारि ।
भागि जीव चढ़ि बैठही, द्वार कुल्फ उधारि ॥
धर्मदास वचन--चौपाई
साहेब इतना भेद बताई । जाते काल छुवन नहि पाई ॥ सब तत्त्वनको भायो भेदा । एक २ का कह्यो निषेदा ॥ तत्त्वके संग जीव चलि जाई । कौन ठौरनमें बासा पाई ॥ कौन तत्त्व संग धरे जिवदेही । कौन तत्त्व है सुक्त सनेही ॥
सद्गुरु वचन
नौ तत्त्वनका भेद बताऊँ । द्वारा तीनको कहि समझाऊँ ॥ तेज तत्त्वमें करे पयाना । वज्रशिलामें जाय समाना ॥ आकाश तत्त्वमें छूटे भाई । तारागणमें जाय समाई ॥ वायु तत्त्वमें छाडे देहा । वन वृक्षनमें जाय उरेहा ॥ पृथ्वी तत्त्वमें छूटे भाई । तौ जीव देह पशुकी पाई ॥ जल तत्त्वमें जब छूटे जाई । नरकी देह धरे तब आई ॥ अग्नि तत्त्वमें तजै शरीरा । होय पशुपक्षी कहै कबीरा ॥ छै तत्त्वनको कह्यो विचारा । तीन तत्त्वको भेद निनारा ॥ तीन तत्त्व भेद जो पावे । निश्चय हंसा लोक सिधावे ॥
धर्मदास वचन
छै तत्त्वनको पायो भेदा । तीन तत्त्वको कहो निषेदा ॥ तीन तत्त्व देहु प्रकट बताई । जासे हंसा लोक चल जाई ॥
सद्गुरु वचन
धर्मदास सुनिये चितलाई । तीन तत्त्व मैं देउं बताई ॥ शब्द तत्त्व जो जानै भाई । सुरति तत्त्वको ध्यान लगाई ॥
संतोष बोध
( १५९ )
नीर तत्त्व जाके घट होई । ताकर आवागमन न होई ॥ नौ तत्त्वनको कह्यो विचारा । धर्मदास तुम करो सँभारा ॥ कहूँ भेद तत्त्वकी बानी । क्षत्र अधर है नाम निशानी ॥ षष्ठ कमल नैन लगि देखा । तीन भेदको कहूँ विवेका ॥ तीन भेद पुरुष तेहिके पास । छाड़े काल जीवकी आसा ॥ पुरुष शब्द हैं शीतल अंगा । तत्त्व निःअक्षर कमलके संगा ॥ आप पुरुष तेहि पिण्ड न हाथा । पुरुष बिदेहि शीश बिन गाथा ॥ कायामांहि लगी यक नाला । तहवां रहे निरंजन काला ॥ ताशिर ऊपर पांजी लागी । ताहि चढ़ि हंसा जाये आगी ॥ स्वेत औ पीत कमल है गाता । तीन तत्त्व जीव संग रहाता ॥ ताहि तत्त्वको भाव सुनाई । तीन रूप तीन महिठाई ॥ कायाक्षेत्र ताहि हम दीन्हौ । खेत कमाय सो आगम चीन्हौ ॥ सप्तपाखुरी कमल यक होई । ताकर भेद कहौ मैं सोई ॥ कमल एक लोकहै तीना । तीन लोक तीनोंपुर कीना ॥ चौथालोक अधर कहि चीन्हौ । ताकरि काल गमन नहि कीन्हौ ॥
साखी-तीनलोक विचारिके, गहे शब्द टकसार ।
कहै कबीर विचारिके, उतरो भवजलपार ॥
धर्मदास वचन चौपाई
साहेब बचन कही परमाना । तीनलोकका कहो ठिकाना ॥ चौथालोक मोहि समझाई । सुनू भेद तब मन पतिआई ॥
सतगुरु उवाच
धर्मदास मैं तोहि बुझाऊँ । तीनलोक स्थान चिन्हाऊँ ॥ ब्रह्मलोक लिंग अस्थाना । तहाँते उत्पति होय निदाना ॥ विष्णुलोक नाभी विस्तारा । शिवका लोकहै हृदय मैझारा ॥
( १६० )
बोधसागर
चौथालोक अधर अस्थाना । कहै कबीर मैं कह्यौ बिधाना ॥ ताहि लोकको ध्यान लगावे । चलत हंस काल नहि पावे ॥
सारखी-अधर करै जब आसन, पिण्ड झरोखे नूर । मैं अदली कदली बसूँ, कहाँ खोजै बडि दूर ॥
धर्मदास उवाच चौपाई
साहेब लोक कहा हम जाना । और भेद कछु कहो बखाना ॥ सात पांखडी वरणि दिखाओ । भिन्न २ करि मोहिं लखाओ ॥
सद्गुरु उवाच
सात पांखडी कहूँ ठिकाना । धर्मनि बचन सत्कर माना ॥ श्रवण दोय पांखडी जाना । सुने शब्द तबही सुख माना ॥ होय पांखडी नैन बखानी । पापदृष्टि सबही क्षय हानी ॥ पांचये पांखडी कहूँ बिचारा । रसना शब्द उठै हंकारा ॥ छठी गांखडी इन्द्री जानी । उत्पत्ति बिन्दुले डारे तानी ॥ सातवीं पांखडी हेठ बतावा । खोजै कमल स्थिर घर पावा ॥ पांखडी सात कमल है एका । भीतर ताहि जीव मन ठेका ॥ ताहि कमलमें तार लगाई । सोई तारको चीन्हों भाई ॥ सोही तार अधर ले राखा । जो कोई साधु हृदयमें ताका ॥ ताहि तारका बहुत पसारा । खंड ब्रह्मांड पताला संबारा ॥ ताहि तारमें डोरी लागी । बिरला चीन्हे संत सभागी ॥ श्वेतभाव तारको अंगा । नाम निःअक्षर ताके संगा ॥
सारखी--कहै कबीर धर्मदाससे, गुप्त निःअक्षर नाम ॥ निःअक्षर लखपावई, होय जीवको काम ।
धर्मदास उवाच चौपाई
कमलभेद तुम भले सुनाया । अक्षरभेद सोइ हम पाया ॥ साहेब कहो जीव किमि आया । नरदेही कैसे करि पाया ॥
संतोषबोध
( १६१ )
कैसे घटमें कीन पसारा । कौन अस्थल बैठक संवारा ॥ इतना भेद कहां समझाई । सतगुरु मैं तुम बलि जाई ॥
सद्गुरु उवाच
धर्मदास सुनियो चितलाई । जो बूझे सो देखै बताई ॥ पवनजीव ब्रह्माण्ड रहाई । ता पीछे नाभी चलजाई ॥ नयन नासिका कीना साखी । मूल कमल सुरति गहि राखी ॥ चक्षुज्योति जो बरै उजियारा । हिरदाकमल ब्रह्माण्ड मझारा ॥ जीव बैठे द्रौपन में जाई । काया क्षेत्रमें जाय समाई ॥ ता बिधि घटमें जीवहि आया । रज बीजहीते पिंड बँधाया ॥ शीश स्वारि बांही निर्माई । कंठ कमल हृदय बनाई ॥ ता ऊपर द्विपि बदन सवारा । पवनजीवसे भय उजियारा ॥ कमल सबज स्वेत है राता । नाभी सकल पुनि सब गाता ॥ ता पीछे दोय खम्भ लगाया । रचिकाया पुनि जीव समाया ॥ स्वाती पवन पुरुषकी स्वांसा । जिन कीना जीवन संग बासा ॥ ताको भेद सुना धर्मदासा । तौलि लेहु सत्ताइस मासा ॥ छिन छिन पलपल आवै भाई । जीव संधि लेखे नहि पाई ॥ प्रथम घडी ब्रह्माण्ड रहाई । दूजी घडी नाभी चल जाई ॥
साखी-तीजी घडीके बीतते, फिर तहँवा चलजाय ॥
अस बिधि रहनी जीवकी, कहै कबीर समझाय ॥
धर्मदास वचन चौपाई
जा बिधि जीव देहमें आया । सोई भेद हम निज कर पाया ॥ दयावंत प्रभु और बताई । छुटै हंस कौन दिशि जाई ॥ काया तजिकै होय न्हारा । कौन दिशा हंस पगुधारा ॥ तौन ठाम मोहि देहु बताई । तहां सुरति राखूं ठहराई ॥
नं. ८ कबीरसागर -