कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
( ३८ )
बोधसागर
चारि खानि मन रहा समाई । चारि चक्र चढ़ि बोले आई ॥ रोम रोम मन रहा समाई । आपहि मारे आपहि खाई ॥ आपहि भिक्षुक आपहि दाता । आपहि ईश्वर आपु विधाता ॥ आपहि चोर आप रखवारा । आपहि रचे आप संहारा ॥ आपहि सीखै आप बिसरावै । आपहि मेटे आप बनावै ॥ आपहि अन्य आपडिठिहारा । आपहिज्योतिआपउजियारा ॥ आपहितिमिर आप अँधियारा । आपहि मासपक्ष व्यवहारा ॥ आप निरक्षर अक्षर होई । गुप्त प्रकट होय बोले सोई ॥ नानारङ्ग ज्योति दिखलावै । आदि अन्त मनमनहिसमावै ॥ मनही नाद शून्य महाँ बोले । मनही ज्योति शून्यमहाँ डोले ॥ मनही कह सब ध्यान लगावै । मनको अन्त न कोई पावै ॥ मनही शास्त्र वेद है चारी । तीनलोक मन कथा पसारी ॥ निर्गुण सगुण मनहीकी वाजी । कवी पुराण कोकमन साजी ॥ ब्रह्मज्ञान कथि मनहि सुनावै । आपु छिपाय दूसर दिखलावै ॥
समय-आदिअन्तमन कर्ता, चारि खानि मनबास ।
बन्द छोरि करी मोपै, कहू मन्त्र प्रकाश ॥
चौपाई
सुनहुँ संदेश हंसपति आगर । पुरुष पुराण हंसपति सागर ॥ सुरति पुरुष हंसनके नायक । ज्ञान अतृप्त सुनी चितलायक ॥ कहो अग्र आग्रकी खानी । कहो ज्ञान विज्ञान बखानी ॥ चार खानिके श्वासा जेती । कहो बिचारि चले दम तेती ॥ अचल खानिप्रथमहि विस्तारा । तेहि पाछे पिंडज अनुसारा ॥ तिसरे अण्डज खानि सचारा । चौथे ऊषमज रचा अपारा ॥ चारि खानिको रचना भारी । चारि खानि संगहि अनुसारि ॥ प्रथम खानि सतसुकृत कीन्हा । रचना रचे निरञ्जन लीन्हा ॥
श्वासगुप्कार
( ३९ )
प्रथम अक्षय वृक्ष प्रभु कीन्हां । अक्षय बट है ताकर छीन्हां ॥ आदि अन्त पिंडज अनुसारा । जाते जग शिवशक्ति सुधारा ॥ तिसरे अंडज अर्ध निवासा । जाते जग पंछी परकासा ॥ चौथी खानि अमीरज कौन्हा । तेहि संयम उषमजकर चीन्हा ॥ चारि खानिकी चारिज बानी । श्वासा नेह देह सहिदानी ॥ चारि खानि मह एकै श्वासा । कहुँ खंडित कहुँ पूर प्रकाशा ॥ अचल खानिकी श्वासा भारी । चालि तीस पांच अधिकारी ॥ गिनती सौ हजार औ लाखा । श्वासा अचल खानि महराखा ॥ चारि पहर चारिज जग भारी । तीनी पहर श्वासा अधिकारी ॥ एक पहर वह उनमुनि रहै । ताते काल न आतुर गहै ॥ तीन तत्त्वकी रचना भारी । अचल खानकी देह सुधारी ॥ धरती तत्त्व भास अस्थूला । जल औ तेज ताहि कर मूला ॥ बाँए आकाश नहिं रहिवासा । तातेजड अचल खानि परगासा ॥ तत्त्व बिहून देह अनुसार । ताते जड नहिं वचन उचारा ॥ गहन ग्रास होत नहिं ताही । ताते बहु विधि बाढत जाही ॥ जाको गहन गारसे काला । सौ नहिं बाढे बेलि बेहाला ॥ अचलखानि बहुभांति सँवारी । नाना रंग रूप अधिकारी ॥ कतहुँ छोट कतहुँ बड भारी । कतहुँ साय सरवन सुधारी ॥ एक सुक्षम है एक अस्थूला । एक अमृत एक विषकर मूला ॥ एक खात पलमह मरि जाई । एक खातकछु अवधि बढाई ॥ इक खट्टा इक कडुवा होई । एक मधुररस खावे सोई ॥ एक विसौइध विषके रूपा । नामशब्द गुण भेद अन्त्रपा ॥ पांच सदा औ पांचौ रोगा । पांचौ औषध पांचौ भोगा ॥ पांच वास और पांच कुबासा । पांच पचीस रंग परकासा ॥ पांच पानि पांचौ रहि बासा । पांच शुभ और पांचविश्वासा ॥
( ४० )
बोधसागर
पांच पांच सकल पसारा । पांच रंग श्वासा अनुसारा ॥ तीनि तत्त्व अस्थूल निवासा । तीनि मध्य दुई बाहर वासा ॥ पांच तत्त्व सब इनके पास । जहाँलिंगआपलखनि परकासा ॥ पांच तत्त्व तीन गुण साजा । नारि एक तामध्य विराजा ॥ अचल खानिमह कीन्हे वासा । तामध्ये श्वासा रहि वासा ॥ चन्द्र सूर्य बिन श्वासाहीनी । ताते खानि जड भई मसीनी ॥ अचल खानि ताते जड होई । सूर्य चन्द्र नहि मध्य समोई ॥ नारी एक श्वासा संग ताहां । जहाँलै अचलखानिजगमाहां ॥ नारिसुषुमण अचल घटबासा । ताहि संग श्वासा रहि वासा ॥ ता घट दोई नारी नहीं होई । ताते चन्द्र सूर्य नहि दोई ॥ इंगला पिंगला नाहिन बासा । ताते रवि शशि नाहि निवासा ॥ चन्द्र सूर्य घटके रखवारा । एहि डोले एहि बोलन हारा ॥ चन्द्र सूर्य बिन जागे नाहीं । ताते अचल खानि जगमाहीं ॥ दुई दिन कोई मास गलिजाई । कोई छ मास कोई वर्ष रहाई ॥ कोई दश वर्ष माह जग राते । कोई तीस चालिस तन बासे ॥ कोइ पचास साठि रहि वासा । कोइ सत्तरी कोई असी नेवासा ॥ वर्ष इकावन कोई तन राखा । कोइ सौ हजार कोइ लाखा ॥ कोइ कोटि कोइ अरब निवासा । कोइ पेड चारों युग बासा ॥ इहिविधि अचलखानिकरभावा । औषधि व्याधिरोग उपजावा ॥ एक सजीवन जड़ी अनूपा । एक जडी विश्व तेज सरूपा ॥
समय-कोई शीतल कोइ तेज है, कोइ पारसकी खानि ।
फूल विना फल ऊपजै, सब फलफूल समानि ॥
चौपाई
इहिविधि अचलखानिउपजावा । तेहि पाछे अंडज निरमावा ॥
अंडज खानि सजीवक कीन्हा । चन्द्र सूर्य सङ्ग जीवन दीन्हा ॥
शवासुञ्जार्
( ४१ )
नख शिख खचोप उपराजा । श्वासा सहज अर्थ धुनिगाजा ॥ दुह सूर्य एक सहज घर शुन्या । तिहिं घर कर्म पापनहिं पुन्या ॥ दुई घर इंगला पिंगलाभारी । चांद सूर्य संग जीव संचारी ॥ ताकी श्वासा शक्ति सुधारी । अमृत प्रसन्नसहज सुख भारी ॥ पाँच तत्त्व रथ साजी थारा । तापर चंद्र सूर्य असवारा ॥ ताके संग जीव उठि धावै । मन तरंग रूप उपजावै ॥ सुरंग तुरै पर होय असवारा । सूर्य स्नेह जाए चढ़ि पारा ॥ विषम सरोवर पहुँचे जाई । विष धारामें पैठि नहाई ॥ करि असनान ध्यान लौ लावै । धर्मराय कह माथ नवावै ॥ परसै राय निरंजन देवा । पल मल करै ज्योतिकर सेवा ॥ चरण परसि भरमत घर आवै । रविजीवहि विष आनि पिवावै ॥ रवि रथ रहै चन्द्र उठि धावै । तुरै लीला सरवर पहुँचावै ॥ जीवसहित शशि पहुँच्यो जाई । मान सरोवर पढ़ि नहाई ॥ करि असनान देवपग परशै । कामिनि देह कमलमहँ दरशै ॥ लेके वास चन्द्र घर आवै । घर आवत यम ग्रहण लगावै ॥ पल पल कमल कमल महनावै । अंडज खानि दर्श नहिं पावै ॥ परसै चरण सरोवर दोई । आवत जात न लागे कोई ॥ श्वासा नेह देह व्यवहारा । एक लाख औ सात हजार ॥ एतिक श्वासा अंडज खानी । करै कुलाहल बोले बानी ॥ तत्त्व चले जोजन एक दोई । झाझरि पाटन बसे बिलोई ॥ खाज अखाज विचारै नाहीं । भर्मत फिरै सदा भव माहीं ॥ पल धरती पल फिरै अकासा । जल थल महिँहफिरै उदासा ॥ कायाके बहु रूप सवारी । नानारंग वरन विष धारी ॥ चञ्चल कुटिल कला मनधरहीं । नाना बानि शब्द उच्चरहीं ॥ करै कल्पना जगमँह भारी । नाचै गावै करै खुमारी ॥
( ४२ )
बोधसागर
उड़ि अकाश तरुवर फलखाहीं । पानी उत्तरि पीवै जगमाहीं ॥ जो चन्दा घर चन्दा आवै । तो चन्दा सत्यलोक सिधावै ॥ मान सरोवर पैठि नहावै । विष तजि अमृत घर ले आवै ॥ पुष्प द्रौप होय फिरि घर आवै । पुष्प द्रौपमहँ जाय समावै ॥ एहि विधि चन्द्रग्रहणको देखे । चन्द्र अंशकी श्वास बिवेखे ॥ आयु अंश श्वासा महँ पावै । तो चन्दा नहि मूल गमावै ॥ अंश जो आयु घरहिफिरिआवै । पूरी तत्व सदा सुखपावै ॥ उग्रह होते सुरघर आवै । तादिन चंदा मूल गमावै ॥ एहि विधि सूर सतावे काला । ग्रहण गरासि करे जंजाला ॥ उग्रह होते श्वास विवेखे । शशि औ सुर दोऊ घर देखे ॥ जहाँ पीवै पानी सब आवै । तहाँ दूतलै फंदा लावै ॥ एक तरुवर बनलासा लावहि । एकजल पीत चुगत सँतावहि ॥ एक पींजरा महँ जीव आवहि । रामनाम कह सदा पढावहि ॥ एक अमृत मुक्ताफल खाही । एकजलाहारफलआनिअघाही ॥ एक जीव मारिकै करै अहारा । एक जीव जीवहि कर चारा ॥ एक जोने बल बजाये अधीना । एकउज्वलजल ज्योतिमलीना ॥ जीव एकमत बहुत अपारा । एकउज्वलजलज्योतिअपारा ॥ श्वासा तेजी ज्ञानगा देहा । काम कलाते बहुत सनेहा ॥ अंडज देह महाबल भारी । वचन बिचारि करै सब झारी ॥ शुभ औ अशुभ दुही हैं ताहीं । एक मधुर एक तेज सुहाहीं ॥ एक सुहावन वचन सुनावहि । एक अपावन सुनतन भावहि ॥ तीनलोक भरि रहा समार्ई । ज्ञान गुमान करे सेवकाई ॥ त्रिविध ज्ञान लीए तन डौले । ऋतुऋतु बिरहका लिपै बोले ॥ तेजहीन नाना दशा कीन्हार् । ताकर भेद न काहू चीन्हार् ॥
श्वासयुञ्जार
( ४३ )
समय-एक अधीन एक दारुण, एकलै एके खाय । वह बानी जगमों कहहि, सुनौ भेद चितलाय ॥
चौपाई
अण्डज कला अनन्त सुधारा । तेहि पीछै पिण्डज अनुसार ॥ कला अपार तत्व बहुरङ्ग । सिरजी पिण्डज भ्रमके सङ्ग ॥ पांचतत्व निश वासर सङ्ग । जाकर पहर ताहिके रङ्ग ॥ पाँचो पाँच तत्वके साथी । गाय भैंस घोडा और हाथी ॥ खर्च कंटनी छेरी खारी । चुहि चाही मंजारी पारी ॥ सो नहीं सुवरी कीनरी भाली । माली नौसी गही कङ्काली ॥ कहाँ लगी बरनौ बहुभाँती । मढ़ही ते नरकी उतपाती ॥ पांच तत्व सबहीके संग । श्वासाके सँग चले तुरंगा ॥ पाँचौं तत्व पाँच पुरजाहीं । प्रीत पाँच हैं छत्रके माहीं ॥ पाँच कुच पाँच मोकामा । पाँच सरोवर पाँचहि धामा ॥ पाँचै देवल पाँचै देवा । पाँचै करहि पाँच कर सेवा ॥ पाँचों मह सम पाँच उदासी । पाँचों पाँच शून्य अविनाशी ॥ पाँचों आवही पाँचौं जाहीं । पाँचौं पाँच महँ पाँच समाई ॥ पाँच शून्य पाँच अस्थूला । पाँचै पाँच पाँचकर मूला ॥ पाँचहि होयघर एकजो आवै । पाँच पाँच तबही समुझावै ॥ पाँचौं सात राइ होइ धावै । तिनहींके घर मंगल गावै ॥ पाँच तीन जब सात समावै । पंद्रह मेटि एक घर आवै ॥ पाँचहि तीन सात एक धारा । पाँचों नाद बजावन हारा ॥ पाँचौका है खेल अपारा । पाँचों करही एक विस्तारा ॥ पाँचौं दशके माँहि समाई । पाँचौं आवहि पाँचौं जाई ॥ भौर गुफा पाँचोंकर याना । बाजै ताल मृदंग बँधाना ॥ जब पाँचौं दशके घर जाई । तब दश पाँचहि आनि समाई ॥
( ४४ )
बोधसागर
जब दश पाँच गुफामहँ आवहि । मधुरी तान अर्धधुनिगावहि ॥ कोई घंटा कोह ताल बजावहि । कोई शंखनाद कोई झालरिलावहि ॥ कोई किंकिनिचिचिनिकिन्नरिवीना । कोई भेरिभृदंग औढोलसहीना ॥ कोई तारी कोई बेन बजावहि । रहसि रहसि नानागुणगावहि ॥ सारंग जल तरंग धुनिधारी । तबलाचहुँ ओरनरसिगाडफारी ॥ इहिविधि भोरगुफा धुनि गाजै । नानारंग मधुर धुनि बाजै ॥ बाजे बाजन होइ धुनि गाजा । बिछुली चमके मोहै राजा ॥ दश औ पाँच पचीस समावै । तब घरनी घरियार बजावै ॥ पांच पचीस दश दशहि समावै । गुफाके ऊपर सुरली बजावै ॥ बाजै सुरली कला अनन्ता । जागै कमला सो मैं मन्ता ॥ निर्झर झरे गुफाके द्वारा । रवि शशिपांचतत्त्वउजियारा ॥ श्वासा सार सहज घर वासा । रविशशि पांचतत्त्व परकाशा ॥ और गुफामहँ बाजन बाजै । रवि शशि श्वासासंयमगाजै ॥
समय-नाना बाजन बाजहीं, नानारंग अपार ।
मन औ जिव इक संगहीं, अविनाशीके द्वार ॥
चौपाई
मन नाचै पल लै औ गावै । आप नाचिके जिवहि नचावै ॥ जीव नचै अविनाशी आगे । मन जिव रहे सदा संगलागे ॥ आनंदधाम होत दिनराती । दीसे ज्योति दीवा बिखुबाती ॥ सुरली बाजै निर्झर झरे । नाडी सुषम मन्दिर भरे ॥ निर्भय सदा न जाति अजाती । निर्वश सदा न पूजा पाती ॥ स्वर्ग नर्क औ नदी है ताहाँ । ज्योति उजागर निर्गुण नाहाँ ॥ सरगुण निरगुण एके माहा । दीखै ज्योति निरंजन ताहा ॥ सात तीन पाँचों जब एका । दुइ घर वास एक घर ठेका ॥ उतरि गुफासे जब घर आवै । आपु आपु कहचहुँ दिश धावै ॥
श्वासगुप्कार
( ४५ )
पल घर आवै पल घर जाई । पांचतत्त्व संग सदा सहाई ॥ पांच तत्त्व श्वासा असवारा । फिरहिं शहरवार औ पारा ॥ जहाँ बाहर है शहर देवाला । तहाँ पांचो तुरै फिरै चौफाला ॥ ता ऊपर आतम चढ़ि धावै । पल बाहर पल भीतर आवै ॥ पांच तुरै श्वासा चढ़ि धावै । सरवर पांच परसि घर आवै ॥ सरवर पांच पांच तहाँ घाटा । गली एक पर्वत डुइ बाटा ॥ पांचौ तत्त्व चलै एक साथ । रविशशि श्वासा नाथ अनाथा ॥ पांचौ तत्त्व घर बाहर जाई । ता संग कमल हरी उमगाई ॥ जादिन पांच तत्त्व नहिं आवै । एक तत्त्व निश वासर धावै ॥ ता दिन पांच तत्त्व गुणपावै । लखै तुरै जो बाहर धावै ॥ बाहर चाल चलत गहि लेई । श्वास सुभाव बंद तहाँ देई ॥ एक तत्त्व निश वासर धावै । दुसरी तत्त्व संग नहिं लावै ॥ पांचौ तत्त्व चीन्हि जब पावै । जो बाहर चलै तासु गुणु पावै ॥ पांचौ तत्त्व जीव संग आवै । पल बाहर पल भीतर धावै ॥ ताकर पावै पांचों मोकामा । लेइ तत्त्व पांचोंके धामा ॥ पांचों पांच सरोवर जाहीं । अमी अमान विरह रसखाहीं ॥ दुई पुहुप सुख सागर परशै । अमी अंक सत्य सुकृतै दरशै ॥ तहाँ अमीरस पीवत अधाना । रवि शशि संग जीव निर्वाना ॥ उत्पति पारस तहवाँ पावै । ले पारस फिरि घरहि सिधावै ॥ द्वेमन विष एक मनहै अमाना । परसै आदि अन्त शहिदाना ॥ कालि काल जोति उजियारा । तहाँ एक नागिनवसे अपारा ॥ सो नागिन घर भीतर बासा । बाहर भीतर एक निवासा ॥ नख शिख बेधि रहा विष पूरा । श्वासा संयम शशि और सूरा ॥ पांचै तत्त्व रहो घट पाँचा । पांचहि साथ जीवकर साँचा ॥ रवि शशि श्वासा संग बसावै । उत्पति प्रलय गहन लगावै ॥
( ४६ )
बोधसागर
दुइ घर रवि शशि जीव बसावै । इक घर राहु केतु भच्छावै ॥ चारिउ चारि दिशा चलि जाई । फिर चारिऊ एकमाँह समाई ॥ दुइ झंझरी परशि फिरि आवै । दुइ फिरि झंझरी बाहर धावै ॥ घर आवत राखै अटकावै । राहु केतु दोई रहन लगावै ॥ जादिन पांच तत्त्व नहिं धावै । तादिन कालगहन नहिं लावै ॥ दुवो तुरै जा निकसे धाई । फोरी द्वारी बाहर जाई ॥ बाहर अमी अमान अमाया । उत्पति पारस नारी काया ॥ नारी नेह निरञ्जन काया । ताते शिव शक्ती उपजाया ॥ एहि निजबुझहु धरमन भाया । नाना वानी वरन बनाया ॥ शिवकाया पति सूर्य सनेहा । ऊगे चन्द्र शक्तिकी देहा ॥ शिवकी देह सूर्य प्रभु साजा । शक्ती देह चन्द्र है राजा ॥ रवि शशि पांच तत्त्वदइकाया । एक एक संग उपजे काया ॥ एकतत्त्व निश वासर धावै । जीवका मूल परोस सुखपावै ॥ जीव मूल पारस परवाना । लेउत्पति पारस जाय ठिकाना ॥ मन जिव तत्त्व एक चढि धावै । लै पारस अपने घर आवै ॥ पारस आनि जगावे कामा । बिरह बाण मारे संग्रामा ॥ दोई तत्त्व निर्वाण उजागर । दुइ घटशिवशक्ती मनि आगर ॥ पारस एक दुवोंकी काया । चंद्र सूर्य संगही उपजाया ॥ चंद्र उगै शक्तीकी देहा । चलै तत्त्व जलरंग सनेहा ॥ एक तत्त्व चंद्र घर धारा । सात रोज एकै व्यवहारा ॥ सात वार निश वासर धावै । पल पल बढै घटै नहिं पावै ॥ पारस परसि होइ जिव पूरा । शक्तीशशि घरशिव घरसुरा ॥ एकतत्त्व संग पारस पावै । राहु केतु नहिं गहन लगावै ॥ तत्त्व तार टूटै नहिं पावै । बिना सिधनी काल समावै ॥ एकै पेली एक जो धावै । तौ शक्ती नहिं पारस पावै ॥
शवासगुप्कार
( ४७ )
टूटे तार तत्वकी जबही । काल सन्धि पावै घट तबही ॥ टूटे तत्व होय दुख क्रा । चन्द्रहि पेली ऊगै घर सूर । ॥ धरि शशि सूर्य काल लै जाई । बांधि अकाश राखै विरमाई ॥ चन्द्र सूर्य आसा सहिदानी । पारस तत्व लेइ अस छानी ॥ पारस टूटत होय मलीना । निशवासर जीव काल अधीना ॥ पारस सङ्गहि लेइ निचोई । छांडि देइ जब जाने सोई ॥ छिन बाहर छिन भीतर धाया । जरामरण व्यापै आ माया ॥ एक तत्व सङ्ग सबै विगोई । एक तत्व उपजे सब कोई ॥ शिव घर सूर्य होय उजियारा । एक तत्व निश वासर धारा ॥ पारस परसि होय विधिधूरा । प्रेम प्रकाश ऊगै घट सूर । ॥ एकतत्व चलै रवि धारा । सूर्य सिंध घट तेज अपारा ॥ शक्ती देह चन्द्र रखवारा । चले तत्व जल रङ्ग अपारा ॥ एकतत्व निशवासर धावै । सातबार टूटे नहिं पावै ॥ एक समाधि रहत अस्थूला । तब शक्ती घट फूले फूला ॥ फूलत फूल तहां अकुलाई । मनबिकार तन रुधिर चलाई ॥ ताहि समै तन खीर समावै । शिव सनेह रचि काम जनावै ॥ ताहि समै शिवशक्ती परशै । रति रुचि अमी गर्भ तेहि द्रशै ॥ रहै गर्भ कामिनिकी देहा । उपजे जातक वरन सनेहा ॥ पुरुष देह शशि चलैजो धारा । कन्या उपजै कला अपारा ॥ सूर्य सनेह चलै जो धारा । उपजै कन्या कला अपारा ॥ सूर्य सनेह चलै जो धारा । उपजे सूरति सार कुमार । ॥ रहै गर्भ तब काया साजै । रुधिर मांस तिलतिल उपराजै ॥ पांच तत्व तीनों गुण मूला । तासों रचे गर्भ अस्थूला ॥ शिवके आस बांये स्वरूपा । शक्ती गहै जानिके रूपा ॥ शिवके रूप शक्ति गहि लेई । तब सांचा मई जावन देई ॥
( ४८ )
बोधसागर
जावन जा मैं सांचा माहीं । थाका होय रुचिरके ताहीं ॥ तेहि थाककी रचना भारी । तीन लोककी विष सँवारी ॥ तीन लोककी जेतिक खानी । सो सब थाका माधि समानी ॥ उपजा थाका थाल सँवारी । गर्भभेद यह कहौ बिचारी ॥ थल थहाए माल निरमाया । महलहिके माहीं जलहि समाया ॥ जलके मध्य महल बनवाया । महलहिके मधि रचना लाया ॥ महलके बार धन वह छाजा । पवरि पगार बना दरवाजा ॥ सांचा अर्ज जरै नहि कबही । शोच मटिर चाहे सबही ॥ सांचा मांहिलोकदियोर सडारी । नख शिख शोभा सबै सुधारी ॥ तीनहि लोक रचा पलमाहीं । गढके गढ पति गासौ ताहीं ॥ प्रथमें सायर सात सुधारा । पर्वत अहुट रच्यो अधिकारा ॥ अठारह सहस्र बहतारि नारा । पांचतन्त्र सब साज सुधारा ॥ अठारह गंडा नदी बनाई । सब तरि नीर रहा पुनि छाई ॥ लोहू हान स्तंभ अस्थूला । बढे लिंग सवारे मूला ॥ आगे सवारे दुइ भुज दंडा । सात द्वीप द्वीप पुहमी नौ खंडा ॥ बहुरि सवारे दूनौ खम्भा । मदन महा बहल उपजे रम्भा ॥ नासिका चढाई मस्तक भारा । दुइकर जोरिकै निकासी धारा ॥ श्रवने नेत्र रुचि अर्ध बनाई । कीला कीला मधी नवाई ॥ नौमी कूटी दश गुफा बनाई । सात भँवर नौ नाल लगाई ॥ उत्तर मेरु सिरजा अस्थूला । सरवर माहि कमल बहु फूला ॥ नाभि माह नखशिख करलाई । फूला फूल बास घट छाई ॥ बाहर बास तन मांह समाई । सोई बास इन्द्री होय धाई ॥ इन्द्री रसना रङ्ग जनाई । लिंग जल हरिसे भूमि बनाई ॥ आठो अङ्ग रचा अस्थूला । शिवशक्ती दोउ सम तूला ॥ सोह अङ्ग शक्ती सोह अंगशीवा । शो एक एक सम नीवा ॥
शवासुगुप्कार
( ४९ )
नख शिख अंग एक अनुहारी । देह स्वभाव वचन दुह मारी ॥ शक्ति देह विरह अधिकारी । शिव आशिष शक्तिको चारी ॥ इहि विधि रचना रची बिलोई । गर्भ सनेह संपूरन सोई ॥ नखशिख रचा गर्भ अस्थाना । सात द्रौप नौखण्ड वखाना ॥ एक द्रौपमें सातों दीपा । सात सुकृत तेहिमाय समीपा ॥ प्रथमै गर्भ द्रौप उपजावा । ता ऊपर रचना बिलमावा ॥ एकद्रौप नौखण्ड बनावा । त्रिकुटी सात तहाँ निरमावा ॥ एक द्रौपमें सातों नाला । सातों कमल अधर दुहमाला ॥ सरवर सात कमल तहाँ साता । रंग पांच पांचौ उतपाता ॥ पांचके मध्यहि पांच रसीला । त्रिकुटीमध्य एकतहाँ कीला ॥ ता कीलामहँ कानी लागी । पौन सनेह आतमा जागी ॥ ता कीलामहँ लागी होरी । खूटा गाडि पवन झकझोरी ॥ ता खूटा महँ डोरि लगाई । मन पवना गहि राखु झुलाई ॥ झुलि मन पवन झुलावे चेरी । इक घर शून्य एक घर फेरी ॥ खूटा होय पवन झकझोरे । इंगला पिंगला सुषुमण जोरे ॥ रवि शशि मनपौना गहि जोरी । खूट न लागि सबनकी डोरी ॥ मेरे दंडपर खूटा गाडा । नदी तीन ता ऊपर बाडा ॥ खूटाकी बाई दिशि है गंगा । विमल शीतल बहे नीर तरंग्गा ॥ चन्द्र सनेही जिव जल परशै । सुरति स्वरूप धनी दिल दरशै ॥ तासु खूटाके दहिने अंगा । यमुना नदी बहै बहुरंग्गा ॥ कीर्ति नीर और पीत तुरंगा । लहर लाल तेज विष संग्गा ॥ तहाँ बसै सुर जीवके साथ । खल एक बयालिस हाथा ॥ कला अनंत रूप रस नाथा । सबै अर्थ नहि दीसै माथा ॥ बाढि नदी जो दोउ करारा । शीतल तेज बहै दोउ धारा ॥ तिसरी नदी है गुप्त प्रवाहा । नाजल थाह न होय अथाहा ॥
( ५० )
बोधसागर
खूँटा तर होय निकरी धारा । चली सरस्वती फोरि पगारा ॥ मध्य लहरि विषधार सखानी । गंगा यमुना मध्य समानी ॥ त्रिकुटी संगम भयउ मिलावा । मनही पवन लेत विरमावा ॥ भैंवरगुफा माधवकर थाना । बसै त्रिवेणी प्रयाग स्थाना ॥ त्रिवेणी तट वसै प्रयागा । जागत सोवै भाग अभाग ॥ गनि गंधर्व सुनि सबके थाना । सुरनर करै पैठि अस्नाना ॥ तैतिस कोटि देवगण नारी । किन्नर गुणी कंचनी भारी ॥ यक्ष यक्षनी देव कुमारी । नागसुता अप्सरा सुभारी ॥ चटि विमानसबकरिहैजोहारी । काया मध्य इहअदभुत भारी ॥ असुरपिशाचचारिखानिजुलाहल । त्रिवेणी तट करी कुलाहल ॥ यक्ष यक्ष असुर सब देवा । बसे ग्राम करै माधव सेवा ॥ तीन लोक जब जीव निवासा । सो सब करै त्रिवेणी बासा ॥ तेहि त्रिवेणी तट माधो देवा । सब मिलि करै ताहिकी सेवा ॥ तब प्रयाग होइ चटि प्रवाहा । गंगासागर संगम जाहा ॥ देश देश गंगा फिरि आई । घाट घाट बहु क्षेत्र बनाई ॥ जहां तहां जप ध्यान लगावै । योग्य यज्ञ व्रत प्राप्त नहावै ॥ ऋतु बसंत प्रयागहि धावहि । मकर महीना वजार लगावहि ॥ अरध उरध बिच लागी हाटा । भीतर बाहर औघट घाटा ॥ गर्भमाहि सब युगति बनावा । तीनि कचहरि तहां बसावा ॥ जहां नदी संगम परवाना । तहैंवा रचा एक अस्थाना ॥ संगम बीच गुफाके तीरा । सातहि द्वार गुफामहैं बीरा ॥ एकद्वार होय शब्द सुधारे । एक द्वार होय रूप निहारे ॥ एक द्वार होय बास बसावै । एक द्वार होय अग्नि समावै ॥ एक द्वार होय खाद संवारे । एक द्वार होय न्याय निवारे ॥ एक द्वार होय नाद उचारै । सत्य सुकृतकी रहनि विचारे ॥
शवासुञ्जार
( ५१ )
सात नाल चौदह सुरभाऊ । सातों करहै एक सुभाऊ ॥ सातों सात शून्य मह वासा । सातों बसै गुफाके पास ॥ गुफाके मध्य कंदरा वासा । तहां सातों मिलि करै निवासा ॥ एतिक कुञ्ज द्रौपरी शोभा । आवागमन मोहमद लोभा ॥ कुञ्ज भँवरकी रचना भारी । शून्यसहज धुनिसकल सुधारी ॥ दुवहु नाल कैसे के सोरी । एक सुखवंकनाल मह जोरी ॥ अग्र नील अमरकी डोरी । शोभानाल होय विष रसघोरी ॥ कुञ्ज द्रौप रचि सुधर बनावा । नेह अमर पद क्षीर समावा ॥ सुधर द्रौप परनाभि सँवारा । नाभी मण्डल पौन किंवारा ॥ पौन घोर नाभी रस कीला । मध्य सरोंवर जंबू शीला ॥ जम्बु द्रौप यम करहि स्थाना । ताहि द्रौपमाहि जीव भुलाना ॥ नाभि द्रौप रचि कच्छ बनावा । इंद्री आसनको रंग सुभावा ॥ कच्छ कला निज द्रौप सुधारा । ऋतु वसन्त जावन विस्तारा ॥ कच्छ द्रौप काशी अस्थाना । नरनारी हि करै अस्नाना ॥ वरुणा असी गंगके तीरा । मनि कर्णिका निर्मल नीरा ॥ लिंग जलहरी माहि समाना । नर नारि पूजही धर ध्याना ॥ पूजहि कामिनी मंगल गावहि । रहसि रहसि लिंगही न्हवावहि ॥ अक्षत चंदन बिल्व चढावहि । धूप दीप दे तत्त्व लगावहि ॥ भामिनी भाव फूलरंग धरही । करि असनान बसन भुइधरही ॥ सोइ बसन नर नाटक माँही । काशी तेहि बसनकी छाँही ॥ सोइ बसनकी वास उडानी । योग भोग छलकी सहिदानी ॥ बसन कुसुम दल ध्वजा उडाई । कच्छ द्रौप शिव शिव शरनाई ॥ कच्छ द्रौप रचा रस कोपा । लिंग जलहरी घर घर रोपा ॥ कच्छ द्रौप शिवको अस्थाना । शक्तिमांहि शिव आप समाना ॥ शिवशक्ती रंग रूप रसीला । शिवसमान शक्ती गहि लीला ॥
( ५२ )
बोधसागर
गर्भ सनेह रचा जब द्वीपा । लिंग जलहली सदा समीपा ॥ कच्छद्वीप रचि पूरन कीन्हौ । पाछे पच्छ द्वीप पग दीहौ ॥ पच्छ द्वीप रचि रंग बढावा । रंग रोस है विरत स्वभावा ॥ प्लक्षद्वीप रचि पच्छ पसारा । प्लक्षद्वीप रचि गर्भ सुधारा ॥
समय-कच्छद्वीप तट पच्छद्वीप है, कच्छ प्लक्षकर भाव ।
दुनो द्वीप कर एक कला है, रंगरोष कर दाव ॥
पुक्षद्वीप रचि गर्भ संभारा । पाछे मानद्वीप विस्तारा ॥ पुक्षद्वीप बाहेर सुधारा । द्वीप ही कच्छप के द्वारा ॥ बारह द्वीप रचि पूरण कीन्हा । पाछे मीनद्वीप पग दीन्हा ॥ मीनद्वीप रस कंज अमाना । करहि कुलाहल द्वीप समाना ॥ मीन द्वीप रचि प्रगटी माया । पूरन भई गर्भ मई काया ॥ मीनद्वीप तनको व्यवहारा । चमकै चपल ज्योति उजियारा ॥ चली चिकुर चित्र बलवानी । दामिनि दमकै बलके बढानी ॥ मीनद्वीप मन मदन महीपा । सुख दुःख साँराग दीपा ॥ मीनद्वीप रचि पूरण कीन्हौ । पाछे सुधाद्वीप पग दीन्हौ ॥ मीनद्वीप सुख अमृत लीन्हौ । पाछे सुधाद्वीप पग दीन्हौ ॥ मीनद्वीप सुख अमृत नेहा । चक्र सुदर्शन द्वीप उरेहा ॥ सुदर्शनचक्र द्वीप निर्बाना । सुधा वारि सत्य शुक्तिहिसाना ॥ सुदर्शनद्वीप पति गुण आगर । परमानंद परम गुणसागर ॥ सातों द्वीप रचा निर्बाना । काया ब्रह्म भया बंधाना ॥ द्वीप सुधारी कमल परकासा । कमलबास प्रगटी चहुँ पासा ॥ प्रथमहि मकाद्वीप निरमावा । उमराव कमल तेहि माह बनावा ॥ उमर कमल मकरि कस जाना । लाख पंखुरी दलकी अनुपाना ॥ मकर तार डोरी तहां लागी । दरशे सुरति सदा अखुरागी ॥ दूजे पद्म द्वीप निरमावा । कमल कूर्म तेहि माँहि बनावा ॥
श्वासगुआर
( ५३ )
ताकी डोरी सुतसम देखा । कमलनालके मध्य विशेषा ॥ तीजे द्रौप लंबनी नेहा । धर्मकमल तेहि मांहि सनेहा ॥ ताकी डोरी अग्र सनेहा । अग्रनाक तेहि मांह उरेहा ॥ चौथे द्रौप झांझरी कीन्हौ । कूर्म कमल दामिनको चीन्हौ ॥ ताकी डोरी सहल स्वरूपा । चमके धारा तार अनूपा ॥ पांचए झिलमिल द्रौप संवारा । ताके कमल कुसुम सुखसारा ॥ ताकी डोरी धुआंके नेहा । अन्ध कार अकार उगैहा ॥ पांचौ द्रौप अर्ध रहि वासा । पांचौ कमल ता ऊपर वासा ॥ पांचौ कमलमें प्रतिमा पांचा । लागी डोरी अर्ध धर सांचा ॥ कोई लक्ष कोई ऊत बनावै । कोई हजार कोई सब निरमावै ॥ कोई कमल पंखुरी सांचा । डोरी अर्ध पांचहुँके पांचा ॥ ब्रह्माद्रौप घरमांहि निवाना । तेहि मँह ऊर्ध्वकमल परकाशा ॥ प्रथमहि अमी कमल निरमावा । अमी अमान अर्धधुनि छावा ॥ तहवां होइ श्वासगुआ । बरसै अमी अखण्डित धारा ॥ अमी अमोल अर्ध रहि वासा । श्वासासार पुढुप परकासा ॥ निश वासरको जाने मूला । श्वासासार शब्दसम तूला ॥ निश दिन होय श्वासा गुंजारा । सातसै ग्यारह माठ हजारा ॥ अमी कमल अमान सो नाला । अट्टाईसदल पंखुरी रिसाला ॥ तेहि मँह चले पवनकी धारा । श्वासा साथ शब्द गुंजारा ॥ निश वासर श्वासा विस्तारा । छः सै अर्ब इकीस हजारा ॥ उनतालिस हजार एकसै आवै । एतिक चिकुरदार होय धावै ॥ दुइ दल कमलहै श्वासा आवै । इकइस हजार छः सैः धावै ॥ बाइस हजार चारिसै ऊने । जाप जापै जिव आप बिहूने ॥ एतिक श्वास दोइ दलमें आवै । पल बाहर पल भीतर धावै ॥ दूसर कमल झलाझल माँहा । झलकै ज्योति अर्धधुनि ताँहा ॥
( ५४ )
बोधसागर
सहस्र पंखुरी कमल अनूपा । तहाँ वसै मनज्योति स्वरूपा ॥ ताहि कमल पर बाजन बाजै । बानी अधर मधुर धुनि गाजै ॥ कूर्म कमल मकरंदी राजा । तहाँ विराजति शोभित साजा ॥ तहाँ घरनि घरियार बजावै । घनी घनी टंकोर लगावै ॥ दश और पचहत्तर श्वासा । इतना एक घरी परकासा ॥ एतिक श्वासा सहज घर आवै । तहाँ घरनि घरियार बजावै ॥ छसे पचहत्तर की सहदानी । एक टंकोर टोकावै जानी ॥ इहि विधि चारि टंकोर टोकावै । ताकर भेद सन्त कोई पावै ॥ राहु केतु सँग ब्यालिनि रोकै । ताको मर्म कोइ जनि अलोकै ॥ एक पहर मारै विधि पूरा । गहन गरासै शशि औ शूरा ॥ गहन गरासत निरखै श्वासा । रवि शशि राहु केतुपरकाशा ॥ ताहि संग एक नागिनी रहै । घड़ी घड़ी वह जीवहि गहै ॥ श्वासा सोहंगम गहन गरासै । आगम जानिके जीवहि त्रासै ॥ श्वासा सोरह गहन लगावै । छठये मासहि काल सतावै ॥ श्वासा परख घरीकी राखै । दमहि चलै सो आगम भाखै ॥ एहिविधि श्वासचलैपुनिजबही । दुइ हजार सातसे तबही ॥ पुजे घरि पूरण होय जबही । पहरके टोर मारै पुनि तबहीं ॥ एतिक श्वासा प्रहर प्रमाना । घरि चारि गरज बंधाना ॥ आठ घरी दुपहरि जब आवै । टोकै गहर गहन नहि लावै ॥ चारि घरी चारिउ युग मूला । चारि प्रहर चारिउ समतूला ॥ चारिउ युग एक पहरके माहीं । चारि प्रहर चारि युग ताहीं ॥ प्रथम प्रहर सतयुग परवाना । तापर प्रथम घरी निर्वाना ॥ सतयुगमें युग चारि अपारा । चारिउ युगको नाम निरारा ॥ प्रथमहि सतयुग रोपै थाना । चारों युग तेहि माँहि समाना ॥ सतयुग प्रथम घरी निर्वाना । कीलक युग तेहिमाँहि समाना ॥
श्वासयुञ्जार
( ५५ )
कीलक युगकी श्वास सारा । छहसै सत्रे पाँच सुधारा ॥ एति श्वासा कीलक युग माहीं । परसे जीव अघरकी छाहीं ॥ बीतत घरी गरज चहराई । काल टकोरा मारे धाई ॥ इह युग अन्त कहावे घरी । नागिनि आसे सन्मुख खरी ॥ प्रथम कीलक होय संधारा । पाछे युगका मत रित्तारा ॥ सतयुग धरि दूसर जब आवै । तेहि श्वास कमत युग पावै ॥ कमत युग होइ कोधवरियारा । उत्पति थोर बहुत संधारा ॥ कमत युगकी श्वासा जाने । छः सै सत्रह पाँच बखानै ॥ एतिक श्वासा कामत युगमाहीं । गुण अवगुण दोछ निरखेहु ताहीं ॥ बीतत कामतक मोद युग आवै । तिसरी घरी वासना धावै ॥ आवा गौन विचारि कोई । युग कमोद सुख पावै सोई ॥ तिसरी घरी सतयुगके आई । तब कमोद युग होय सहाई ॥ युग कमोद सतयुग मई आवै । दुखी सुखी नर सब सुख पावै ॥ युग कमोदकी परलै होई । दुखी सुखी जाने सब कोई ॥ तब जो होई सूर्य संचारा । महाविरोध उपजे अधिकारा ॥ चन्द सनेह होय जो हीना । महासुफल तन होय मलीना ॥ श्वासा चलै सातसै भारी । युग कमोदकी कथनी हैन्यारी ॥ युग कंकवत कि होय प्रकाशा । अतिही दुर्ज विषयकी त्रासा ॥ चौथी घरी कोध बेकारा । महा कठिन होई ताकी धारा ॥ चौथी घरी निकट जब आवै । सतयुग अंत कंकवत पावै ॥ सतयुग अंत होय नहीं पावै । युग कंकवत आय शिरनावे ॥ युत कंकवतकाल बरिआरा । कायाके बहु करै विकारा ॥ काया कहर गरासै आई । तब न भेद मैं कहौ बुझाई ॥ काया कहर हो परचण्डा । नख शिख व्यापि रहै नौखण्डा ॥
( ५६ )
बोधसागर
युग कंकवत कालकी बानी । कालकला मति सब दिन जानी ॥ युग कंकवत महाबल योधा । अन्तकाल सतयुग पथ सोधा ॥ सतयुग अन्त कंकवत मांही । अन्त कालकी व्यापै छांही ॥ युग कंकवत मोह की खानी । काम क्रोध ममता लपटानी ॥ अन्तकाल सतयुगकर भयञ्ज । चारिञ् जुग परलैतर गयञ्ज ॥
समय-एकहि युगके बीते, चारों युग भये नाश ।
एकनद चारिञ् युगखाण, सतयुग कीन्ह गरास ॥
चौपाई
कीलक कमोद चंद सनेहा । कमत कंकवत सूर्य सनेहा ॥ भाजुग अन्त एक संग चारी । चारि घरी शब्द एक नाद संघारी ॥ एक नाद एक पहर कहावा । चारि घरी तेहि मांहि समावा ॥ चारि घरी चारिञ् युग बीते । शब्दनाद रवि शशि धर जीते ॥ सतयुग अन्त बाजु घरियारा । त्रेतायुग कर भया विस्तारा ॥ दुसरे युग भयो विश्वासा । दूसरे पहर तेज प्रकासा ॥ तेज लगन श्वासा रही बासा । ताते दूसर युग परकासा ॥ त्रेता युगकर भा अनुसारा । त्रेता युगहि ते व्यवहारा ॥ त्रेता युगकी पंखुरी चारी । चारि घरी युग चारि बिचारी ॥ जैसा युग सतयुग महाँ देखा । सोई गति त्रेता महाँ लेखा ॥ जब जब अन्त होय युग केरा । तब तब नाद काल घन घेरा ॥ त्रेता युग महाँ कला अपारा । योग व्रत तीरथ आचारा ॥ प्रथम घरी होय क्रोध अपारा । अहंकार अभिमान पहारा ॥ ताकर नाम चिंता युग राखा । चित चञ्चल चकित अभिलाषा ॥ चकितयुग अलोप जब भयञ्ज । ठोकि टकोर नाद तब कियञ्ज ॥ होत नाद मृतु अंधा धावै । लागत पलकमल नहिं लावै ॥ चकित युग बीती जब गयञ्ज । तेहि पाछै बुद्धि युग भयञ्ज ॥
श्वसगुआर
( ५७ )
बुद्धी युगकी बुद्धी अपारा । तायुग महाकाल बरियारा ॥ ज्ञान गयँद होइ असवारा । बुद्धि युगमान फोरे महिभारा ॥ बुधिकबधिक बाँधिकरे कमाई । विषे चतुराई कुमति समाई ॥ एही विधि बुधि युगचलि जाई । तेहि पीछे मन बरतैं आई ॥ मन मतंग महामद माता । तेज तपस्या व्यापै गाता ॥ मनयुग ऊंच नीच सतलीला । बरपै झारी विषैको शीला ॥ मन युगकी श्वासा बहुरंगी । ज्यों जलमध्ये उठै तरंगी ॥ मन युगराज बीतिगा जबही । अहंकार युग उपजा तबही ॥ अहंकार युग अनंत समाना । मरै पतंग हार नहीं माना ॥ हारे नहीं आपु अहंकारा । गरजै छुन्छ हारे सुख भारा ॥ अहंकार युग श्वासा ऊनी । गरचि घुमडिबरपै फिरि सूनी ॥ अहंकार ऊद्रेग अपारा । श्वासा हीन तत्व छिनधारा ॥ अहंकार युग बीते जबही । त्रेताकी परलै भइ तबही ॥ त्रेता अन्तकाल जब कीन्हों । आधी निशा टंकोरजोदीन्हों ॥ आधी रात नाद घन बाजा । महानिशान मेघ जनु गाजा ॥ त्रेता आदि अन्त व्यवहारा । उपजा द्रवा परकला अपारा ॥ द्वापर युगकी कला अनन्ता । सुखदुखमध्य आदिदुखअन्ता ॥ प्रथम घरी द्वापरकी आई । अर्थनाम युग महा समाई ॥ अर्थनाम युग द्वापर माहां । अर्थ अहर्निश व्यापै ताहां ॥ अर्थनाम युग घरी समाना । घरिकै बीते युग क्षय माना ॥ एक युग बीते दूसर आवा । धर्मनाम युग तहीं धरावा ॥ धर्मयुग धरनी धरु साँचा । श्वासा छहसै सतरी पाँचा ॥ धर्मधार औ धीर तुरझा । धर्मयुग रोग वियोग सुरझा ॥ धर्मनाम युग बीते जबही । गहर काल युग बरतैं तबही ॥ गहरकाल युग कहर कमाई । रविरथ बीच ध्वजा फहराई ॥