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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

( १८ )

बोधसागर

एहि विधि रची सकल दुनियाई । लोभ मोह लालच बरिआई ॥ रचिकै खानि करिय रजधानी । राज पाठ सिंहासन ठानी ॥ तुम आद्या अरु हम अभिमानी । बारह खण्ड छह लोकके बानी ॥ ( तुम अंश हमही अविनाशी । बारह खण्ड छः लोकके बासी ) ॥ पाप पुण्य दोष रची अपारा । जाकहैं सेवै यह संसारा ॥ पाप पुण्य हठ फन्दा होई । जामहैं अरुझि रहै सब कोई ॥ योग ज्ञान व्रत संयम पूजा । सोलहमहीं और नहिं दूजा ॥ रची क्षुधा मायादि विकारा । पुरुष लोकको मूँदिये द्वारा ॥ रची क्रोध माया विकरारा । पुरुष लोकको सुँद्यो द्वारा ॥ पुरुषलोक इहई रचि लीजै । इकछत राज हमहि तुम कीजै ॥ तुमरे, संग है पारस सूर। जाते होय सकल विधि पूरा ॥ जेहि ते लोक पुरुष प्रकाश। सो पारस है तुमरे पास ॥ सो पारस अब हमको देहू। रंग हमारा सबै तुम लेहू ॥ कामिनी कहे वचन बुद्धि धीरा । उपजेहु कालरूप बलवीरा ॥ जो जो वचन कहेउ तुम भाई । सो हमरे चित्त एक न आई ॥ पुरुष लोक कस मुदा दुदयारा । लेउ आप अपने शिरभारा ॥ जो छल हमते कीन्हहु भाई । तैसो छल तुम्ह भुगतहु जाई ॥ पारस कामिनी धरा दुराई । हाथ मले शिर धुनी पछताई ॥ हाथ मिजि छिन छिन पछिताई । कहे कामिनि धर्महि समुझाई ॥ कामिनि कहै कुबुद्धि समझाई । हम तुम चलहुँ पुरुष पहुँ जाई ॥ बकसै पुरुष दयाकरि तोही । शीश नवायके लीन्हसि मोही ॥ विन दीयें बरिआई लेहौं । पुरुष लोक पुनि जाए न पैहौं ॥ कामिनि कहा वचन परवाना । धर्मरायके भयो अभिमाना ॥ कामिनि तोरि बुद्धि है थोरी । अबना जाऊ पुरुषशकी खोरी ॥ पुरुषलोक इहई रचि राखा । रच्यो बिचारि बुद्धि बलभाखा ॥

श्वासगुञ्जार

( १९ )

अब तौ पुरुषप्रास नहिं मोही । गहौं बांहको राखा तोही ॥ तैं कन्या का डहकसि मोही । रचा पुरुष मम कारण तोही ॥ (तैं कामिनि कठोर निर्मोही । ) " " " " " ॥ पहिले वचन विरहते बोली । लागी कठिन कामकी गोली ॥ काम सतावै निश दिन मोही । दे पारसकी लीलहुँ तोही ॥ कामिनि कहै धर्म सुनु बाता । चढि कालिमा तोहरे गाता ॥ इठ निग्रह कामिनि किहु ताही । धर्मराय पकरी तब बाँही ॥ गही बांह कामिनिकी जबही । काम बाण घट व्यापे तबही ॥ धर्मरोष कामिनिपर कीन्हौं । गहिपगर्शासलीलतेहि लीन्हौं ॥ लीलत कामिनि शब्द उचारा । पुरुष २ करि कीन्ह पुकारा ॥ कामिनि पुरुष नामजब लीन्हौं । आज्ञा पुरुष अंशही दीन्हौं ॥ योगजीत आये तेहि वारा । सुर्त बान सो कालहि मारा ॥ पुरुष कोपि ताऊपर कीन्हा । कन्या उगलधर्मतब दीन्हौं ॥ (उगली कन्या बाहेर आई । ) " " " " " ॥ हाहाकार रोषके धावा । कामिनि पारस कहाँ चोरावा ॥ कामिनि कम्प देख विषधारा । पारस मानसरोवर डारा ॥ मानसरोवर झलतै अंगा । गयउ पताल जहाँ जलरंगा ॥ परीक्षा चार पारस परवाना । उपजी चारखान निरवाना ॥ एक परीक्षाते सरबर गयऊ । पारसके सम पारस ठयऊ ॥ दूजो अंश भयो निरवाना । शिला सिंध पर्वत परमाना ॥ रतन शिला ताहिकी धारा । सो पाजी वारे संचारा ॥ तीसर अंश नार प्रगटयऊ । अंशहि अंश चत्रगुन भयऊ ॥ चौथा अंश कामिनिअनुमाना । जाते स्वर्ग नर्क परवाना ॥ अंशहि अंश अंशते मानी । एक प्रती चौगुना उत्पानी ॥ चार २ गुण गुणहि समाना । अंशते अंश चत्र परवाना ॥

( २० )

बोधसागर

पारस मानसरोवर माही । पारस बुद्धि आपही आहीं ॥ पारस कामी न बहुत डुरावे । सुर्त सनेह तहां फिर आवे ॥ पारस अंत नाहे ठहराई । बासरूप कामिनिसंग धाई ॥ कामिन कालपुरुष पद परसे । पारसनीर नेत्र मह दरसे ॥ नैन निरख मूरत अतुरागी । धर्म अंश कामिनितन लागी ॥ पारस अंश चितै नहीं डोले । बहुरि २ कामिनसों बोले ॥ पारस अंशघट रक्षा छपाई । निकसी कन्या बाहर आई ॥ जेहि कारणकामिनि हठ कीना । पारस संग छान सो लीना ॥ उत्पत्ति पारस धर्म तब पावा । कन्या रही ताहिके ठाँवा ॥ जब लगि कन्या भइ सियानी । तब लगि धर्म रची सब खानी ॥ खानि वानी रचि कीन पसारा । बेदवाद बहुमत विस्तारा ॥

दोहा-रचना रची लोककी, शांशि घर रहा समय ।

पुरुष नाम जानै नहीं, ताते लोक न जाय ॥

(रचा रची लोककी, नख सिख रहा समाइ ।)

पुरुष नाम जाने विना, सत्य लोक नहीं जाइ ॥)

चौपाई

पुरुष नाम ज्ञानी जो पावे । लोक दीप पलमौंहि ढहावे ॥ पुरुष नाम जानै नहीं भेदा । रचे खानि चौरासी फन्दा ॥

” ” ” (चित चंचलऔअन्धअभेदा) ॥

दुख सुख सबै रची बहुभांती । जरा मरण पूजा औ पाती ॥ रचि सब खानिबैठि अभिमानी । तब लगि पुत्री भई सयानी ॥ उपजा जोबन रसको भावा । तब कन्या कहँ विरह सतावा ॥ कामिनी कहे धर्मसो बानी । हमतो तुमरे हाथ विकानी ॥ सुर्त डोला एके पारस लीन्हा । मदन भुवङ्गमके वसि कीन्हा ॥ जोबन विरह महामद गाजे । विनु संयोग गर्भ नहीं छाजे ॥

श्वसगुञ्जार

( २१ )

मोह महाञ्जर बरषे लागी । मन समाध कामिनि सों लागी॥ गर्भ किये मा करदी राजा । कामिनि सोह दुहु दिशवाजा ॥ मनसालहर उद मद मन भएउ । काम दहन धन आहुत दयेऊ ॥ उपजा मदन मोह औगाहा । पुत्री पितासों भयउ विवाहा ॥

साखी-बहनीसे बेटी भई, बेटीसों भइ नार ।

नारीसों माता भई, मनसा लहर पसार ॥

चौपाई

बरबस धर्मराय हरलीन्हा । बिन लेखा रजधानी कीन्हा ॥ विषया वेद व्याह जमनाता । चौदह काल संघ उतपाता ॥ चौदह पारस लोक निसानी । शब्द व्याह चौदह यमहानी ॥ मनसा व्याह देव तिषगंधी । हंसना हंस भगत युगबंधी ॥ सुतें हंस घट रचो विदानी । धर्म समाध वसाए आनी ॥ उपजा मदन मोह औगाहा । कन्या पिताहितबभयाविवाहा ॥

(कन्या व्याकुल भई तेहि माहा ।) " " " "

धर्मराजको उपज्यो भावा । कामिनि हृदय हाथ बतलावा ॥ उपजी रंग रोषकी खानी । कामिनि चरण गहो तब जानी ॥ मनसा लहरि ताहि तेह दीन्हा । उपजी तीन लोककर चीन्हा ॥ कामिनि संग करे मुख भारी । उपजा तीनि लोक अधिकारी ॥ तीनहि शक्ति पुरुष संघ दीन्हा । तीनों सुत उपजावे लीन्हा ॥

(पांच तत्त्व तीन गुण चीन्हा ।) " " " "

तीनउ सुत उपजे बहुरंगा । पारस रहा धर्मके संगा ॥

( पारस रहा ताके संगा ।) " " " "

तीनहुँ सुत उपजे अधिकाा । धर्मराय तब भया निरारा ॥

तीनों सुत कहँ दीन्ही भारा । धर्मराय ऊंच भये निरारा ॥

राजपाट कामिनि कहँ दीन्हा । आपन बास शून्यमहँ लीन्हा ॥

( २२ )

बोधसागर

कामिनि दर्श सदा लौ लावै । राज पाट सब कीर्ति बनावै ॥

“ ” ” ( । तीनों सुतको राज सिखावै ) ॥ राज नीति सुत चित्तिहि धरहीं । मनसा ध्यान पिताको करहीं ॥ खोजत खोजत बहु युग गयऊ । पिता पुत्रसों भेट न भयऊ ॥ ध्यान धरत बहुते युग गयऊ । ) ” ” ” ”

कामिनि पुरुष एकसंग रहऊ । सुतकी बात पुरुष सों कहऊ ॥ वहाँकी बात न सुतसों भाखे । करै दुलार सदासँग राखे ॥ इहि विधिबहुतदिवसचलिगयऊ । सुत न खोज पिताकर कियऊ ॥ धरत ध्यान बहुते युग गयऊ । पिताको खोज करत तब भयऊ ॥ मातासों पूछे सुत बाता । पिता हमार कहाँ गये माता ॥ माता कहै सुतन्हसों बानी । पिता तुम्हार हमहुँ नहि जानी ॥ रचना सकल हमहीं होई । हमसो दूसरा और न कोई ॥ रचना सब मोहीते होई । दूसर जान परो नहि कोई ॥ हमही पिता हमही हैं माता । हमही तीनि लोककी दाता ॥ हमहीं छाँडि कोइ दूसर नाही । तुम जो पूछहुँ सो कहँ काहीं ॥ तीन लोक महाँ दूसर नाही । माता कपट करै मन माहीं ॥ तब सुत सोच कीन्ह मनमाहीं । पिताका भेद बतावत नाही ॥ आपु आपु कह सुत सब हूठे । माता वचन कहै सब झूठे ॥ तब माता कहै बचन रिसाई । पिताको दर्श करहु तुम जाई ॥ माता कहै फूल लै धावहु । पिताके शीस परसिके आवहु ॥ पुढुप सामाधि वासले धाओ । पिताके शीस परसिके आओ ॥ चले पुत्र पिताकी आसा । पिता रहे पुत्रनके पास ॥ खोजत बहुत दिवस चलिगयऊ । पिताको दर्श कतहुँ नहि भयऊ ॥ तीनों सुत सो दर्शन भयऊ । ” ” ” ” ॥ पिता निकट सुत दूरि सिधाये । खोजत कतहुँ अन्त नहि पाये ॥

शवासुखार

( २३ )

खोजि थाकि माता पई आए । काहु साँच काहु झूठ सुनाए ॥ ब्रह्महि भाषा झूठ संदेशा । सकुचि वचननहिं कहेवोमहेशा ॥ भाषा विष्णु सत्यकी रेखा । खोजि थाकि पिता नहिं देखा ॥ माता बिहँसि कही तब बानी । ब्रह्मा झूठ झूठ तौ खानी ॥ शिव लजाय शिर नीचे राखा । साँच झूठ एको नहिं भाषा ॥ ताते करहु योग तप जाई । जटा बढाय विश्रुति रमाई ॥ ( तुम सुत करो योग तप जाई । शीश जटा तन भवम चढाई ) ॥ लेहु आमण्डल भेषसो कीन्हौ । शिवको थापि भवनी दीन्हा ॥

साखी—जप तप योग समै हठ, आगे ध्यान पसार ।

माना कह्यो क्रोध करि, चतुरमुख अन्ध अहार ॥

मातहि कीन्ह विष्णु पर दाय। मुखहि चूमके कण्ठ लगाया ॥ सत्य वचन सुत बोलेउ बानी । तीनहु लोक करहु रजधानी ॥ शिव ब्रह्मा करिहैं तोर सेवा । गण गन्धर्व ऋषि मुनि देवा ॥ ब्रह्मा मोसों झूठ लगावा । तेहि कारण विधि झूठ कहावा ॥ ब्रह्मा वेद पढ़े बहु भांति । कुकरम कर दिवस औ राती ॥ ( विद्या वेद पढ़े बहु भांती । कुकरम करे दिवस औ राती ) ॥ एहि अवगुण गायत्री गार्ई । ब्रह्मा दोष शाप तिन पाई ॥ मृत्यु लोक गो धरे शरीरा । अघ भुगते चौरासी थीरा ॥ गोय होय नारी कल्यारी । अघनिचोए होए पातक भारी ॥ जहाँ लग पुहुप खान परकाशा । निरधिन ठारे तुम्हारो बासा ॥ झूठी बात वेद में निर्माई । च्यार वर्णमें बड़ी बड़ाई ॥ पहिले चारों वरन पुजावै । दक्षिणा कारण गरा कटावै ॥ गरा कटाए करावे पूजा । गायलै सभे ब्रह्मा नहीं दूजा ॥ लए मूँड पडिवो रमाई । ब्राह्मण भए सो काल कसाई ॥

( २४ )

बोधसागर

खाए अखज चले एडाई । जस मडवाको स्थान अघाई ॥ ब्राह्मणहुको झूठी आसा । हरि नहिं भजे न हरिके दासा ॥ कहके बिर ब्रह्मा करोए । उत्तम जन्म पाय जड खोए ॥ जूठी बात वेद निरमाई । चार वर्ण आश्रमहिं दृढ़ाई ॥ ऋषि अगसी सहस्र बखानी । ते ब्रह्माके सुत उतपानी ॥ जेते ऋषि तेते मतधारी । अस्तुति करि हसेब तुम्हारी ॥ ब्रह्मादिक सुनि देव गण भारी । अस्तुति करिहैं विष्णु तुम्हारी ॥ निशिदिन ध्यानपिताकोधरिहो । किंचित ध्यानजोतअनुसरिहो ॥

साखी-विचलि गयउ निजनामको, गहे कुमारग जानि । तीनलोकगुण विस्तरेऊ, निरञ्जन आदि भवानि ॥

चौपाई

कहै कबीर सुनौ धर्मदासा । दोऊमिलि यह मत परकाशा ॥ यह सब खेल कामनी कीन्हा । निरञ्जन बास झून्यभी लीन्हा ॥ ज्योति निरंजन ध्यान लखाई । शिव ब्रह्माको भेद सुनाई ॥ सेवहु विष्णु निरञ्जन ध्याना । हे सुत वचन निश्चय मम जाना ॥ ताते ज्ञान अगम फैलाहो । जाते तामस सिद्ध कहा हो ॥ सिद्ध न कामत होइहै भारी । ज्ञान अगम गुण होहि भिखारी ॥ अंश दहन तन तामस भारी । असुरभाव पशु वासु वतारी ॥ मतपा खंड ठगोरी टोना । षट् दर्शन पाखंड खिलोना ॥ यंत्र मन्त्र विखया अधिकारी । अन्तर ध्यान भक्त बुव धारी ॥ तव गुण सहस्र नाम ऊचरिहे । एक अंश चौसठ योगिन होइहे ॥ कर खपरलें मंगल गैहे । यह उपदेश महादेव देहे ॥ ( शंकर चिह्न इहै सो पैहैं । ) " " " " ॥ रजशुचि सतगुन दया समानी । असुरहतन भक्तन रजधानी ॥ आगम कहो संघ सुनि लिन्हेउ । जहां जसभावतहांतस कीन्हेउ ॥

शवासुआर

( २५ )

चारि खानि ब्रह्मे निरमाई । चामहि त्वचा लुब्ध लौ लाई ॥ शिवको वरन भेद नहीं होई । क्रोधरूप धरि भेष विगोई ॥ मात विष्णुपर दाया कीन्हौ । पिता दिखाय निकटहि दीन्हौ ॥ (अनुभव दया विष्णु परकीन्हौ । )

पिताको दर्श विष्णु जब पावा । तब माता कह शीश नवावा ॥ माता पिता एक है गयऊ । विष्णु देखि चित हर्षित भयऊ ॥ माता पिता एक मिलि गयऊ । विष्णु समाय जोति महाँगयऊ ॥ तेहि पाछे जग सिरजे लेऊ । ताको वरण सविस्तर कहेऊ ॥ प्रथमें चारि खानि निरमाई । लक्ष चौरासी योनि बनाई ॥ चारि खानिकी चारिउ बानी । उपजी तीनिलोक सहिदानी ॥ चारि खानि रचि कियो पसारा । चारि वरन पाखण्ड सँवारा ॥ (चौदहभुवन करचो विस्तारा । )

लक्ष चौरासी योनी कीन्हौ । चारि खानि महाँ एकही चीन्हौ ॥ लक्ष चौरासी बचन बखाना । चारि खानि जीव एकै साना ॥ रचना रची सखा बहु रंगा । सुर नर मुनि गणका मतरंगा ॥ कामदेवकी कला अंगंगा । पशु पक्षी सुर नर मुनि संगा ॥ कामकला सबही भरमावै । शिव शक्ती संग काम लगावै ॥ उत्पति प्रलय रची अविनाशी । कामिनि काम कालकी फाँशी ॥ कनक कामिनी फन्द बनावा । तेहि फन्दे सबही अरुझावा ॥ कनक कामिनी फंदा कीन्हा । चार खानिमें एकै चीन्हा ॥ नर बानर कीट पतंग सँवारी । सबके सँग करै रखवारी ॥ (नर नारि जत खान सँवारी । सब घट काम करै रखवारी ॥ पशु पक्षी जत कीट पतंगा । रक्षक भक्षक सबके सङ्गा ॥ शवासा सार होय गुआरी । पांचों तत्त्व सँग विस्तारी ॥ पांचों तत्त्व तुरै बल जोरा । तापर चढ़े साहु औ चौरा ॥

( २६ )

बोधसागर

चारिउ खानि होय गुञ्जारा । स्वासा चलै अखंडित धारा ॥ देहदशा जस पुरुष सवारा । तैसी देह रची करतारा ॥ पांच तत्त्व तीनों गुण साजा । आठ काठ पिंजरा उपराजा ॥

( अष्टधातु पिंजरा उपराजा ) ॥

पिंजरामें सुगना एक रहई । वाकी गति मञ्जारी लहई ॥ (यामध्य सुवना एक रहई । दावपरे मैजारी गहई ) ॥ सुगना पढ़ै दिवस औ राती । रक्षक पिंजरा ऊपर सँघाती ॥ रक्षक भक्षक सङ्ग रहावै । सदा पढ़ावै घात लगावै ॥

) एक घातक एक सुआ पढ़ावै ॥

जस सुअना पिंजरा महाँ गहई । ऐसो देह प्राण दुख सहई ॥ नख सिख रचाकाल फुलवारी । फूली वास कुबास सवारी ॥ कनक कामिनी काल बनाई । चारि खानि महाँ रहा समाई ॥ कामिनि काम सँवारे जानी । चारिउ बखानि रहा विकशानी ॥ चारि खानि महाँ श्याम अमाना । काल कुटिल तेहि माहि समाना ॥ काल कलाकी खानि बनाई । शिव शक्ती महाँ रहा समाई ॥ (दया क्षमाकी खानि बनाई । नर नारि महाँ रहा समाई ) ॥ सुरनर मुनि सबही कह डहकै । चारिखानि सबके घट महकै ॥ चारिखानिकी सब उत्पानी । जेतिक तीन कोक सहिदानी ॥ तीन लोक श्वासा विस्तारा । स्वासाते भा सकल पसारा ॥ श्वासा संग काल अवतारा । विष अमृत दोनों संचारा ॥ श्वासा संगम काल औकाली । श्वास संग भये वनमाली ॥ प्रकृति पचीस सङ्ग जञाली । पञ्च पांचदश माल तमाली ॥ चन्द्र सूर श्वासा संग पूरा । इंगला पिंगला सुष्मनि जोरा ॥

दोहा-श्वासा संग श्वासा, तेहिसे उपजा बरि आर ।

चन्द्रसूर्य हैं श्वासामध्ये, सकल विधिविस्तार ॥

श्वसगुञ्जार

( २७ )

शिव शक्ति सुखधाम है, जो चितज्ञानसमाय । सुखसागर अभिराम है, कालत्रासठरिजाय ॥

चौपाई

चन्द्र सूर जीवन सहिदानी । शक्ति शिवकी उपजे खानी ॥ (संयोग जड़ चित विदानी ) ॥

एक संग विष लहरी समानी । एक संग बसे अमृतकी खानी ॥ एक संग मन बसे अपारा । एक संग अमी जीव रखवारा ॥ एक संग काम क्रोध दुखभारी । लोभ मोह पाण्ड विकारी ॥ अहंकार लालच औ ममता । घिन्न औछतिलाज प्रतिहता ॥ एते एक वीरके साथी । माया मद जस मैगर हाथी ॥ एक संग शीतल शीलसुभेपी । इक संग छेमा सुबुधि विशेषी ॥ एक संग भक्ति रहे हितकारी । ज्ञान विवेक संतोष सुधारी ॥ दया दीनता निर्भय रमता । धीरज मतीसहज सुधि समता ॥ दुई घर दुवो राव कर वासा । इक घर राहु केतु प्रकाशा ॥ राहु अमावस सूर्यहि आसे । आसे केतु पूरणीमा चंद्रहीफाँसे ॥ दोउ करे यहि भांति बसेरा । खन बाहर खन भीतर डेरा ॥

( दोउ करे एक नगर बसेरा ) ॥

एकहि रथ दोऊ असवारा । बाहर भीतर मध्य दुवारा ॥ पांचों अविचल तुरे तुषवारा । ता ऊपर है जीव असवारा ॥ एक तुरे पियरे पट नेहा । एक नील रंग है देहा ॥ कुबेत एक लाल बहु रंगी । एस सजुज हरियारे अंगी ॥ एक श्याम सुशकी रंग भारी । पांचों एकते एक अधिकारी ॥ एक श्याम बदन रूपचारी । आप आप पांचों अधिकारी ॥ पांचों बसे एकही संग। एकही रथ मन जीव सुसंगा ॥ एक तब ले पांचों वासा । दाना घास पानीकी आसा ॥

( २८ )

बोधसागर

पांचों पांच घाट जल पीवै । दाना घास खाए सुख जीवै ॥ पांचों तुरै पहली पल धावै । छिनबाँधहि छिनछोरि कुदावै ॥ छिनबाहिर छिनभीतर आवहि । पांचों पांच ढुंड फिरि धावहि ॥ सुसरवर पार सो तवे ले आवै । सकल पराश तवे ले आवै ॥ इहि प्रकार जाही ओर आवहि । कोइ नियरे कोई दूर सिधावहि ॥ सुरंग तुरै जोजन भरि जावै । सुसकि योजन डेढ सिधावै ॥ हरियर दुह योजन पर जावै । योजन तीन पति पहुँचावै ॥ हंसा चारि योजन जो जावै । फिरिके दंडवत बेलै आवै ॥ (श्याम रंग आवै नाहिं जाई) ॥

यहि विधि पांचों आवै जाहीं । अपनि अपनि मंजिलके माहीं ॥ पांच तुरै रथ एक सुधारा । ताऊपर मन जीव असवारा ॥ जीव पराहै मनके हाथा । नाच नचावै राखै साथा ॥ पांचों तुरै होय असवारा । घेरे काल कलीके द्वारा ॥ यहि धोखा गहि जीव झुलाना । सत्य शब्दको भाव न जाना ॥ सत्य लोकके तुरै तुखारा । ताऊ पर सतगुरु असवारा ॥ हाहाकार करै चहुँ भाती । करै शिकार दिवस औ राती ॥ रथ ऊपर चढ़ि तुरो कुदावै । मारि जनावर ले घर आवै ॥ मारै बाण जान पर तानी । नख शिर वेधे धाव न जानी ॥ ताहि जानवरके शिर नाही । रुधिर मांस देह नहिं ताही ॥ देखत देहदृष्टि नहिं आवै । बिन देखे असमाने धावै ॥ ( बिन देखे असमानहि धावे । ता धोकेमें जिव डहकावे ) ॥ ऐसा देखो जनावर जोरा । बन औ नगर करै घनघोरा ॥ ऐसो विषम जनावर भारी । मारि पारधी लीन्ह संभारी ॥ मारि जनावर नगर बसावै । वाहि ओल देहे बिलमावै ॥ एक नगर दुह रहे नरेशा । भित्र २ दोनों कर देशा ॥

शवासुञ्जार

( २९ )

ताहि नगर दुइ महल बनाये । दुइ दरवानी तहाँ रह्याये ॥ महा विकार दोऊ दरवानी । दोऊ रायकी सेवा ठानी ॥ करै उत्तपन्न दोऊ रजधानी । धर्म धीर औ आदि भवानी ॥ जो कछु उत्पति शहरमें होई । सो सब बांटे लेहि नृप दोई ॥ बांटे खजाना धरै दुराई । लेखा खरच उठावहि राई ॥ लेखा जानि खरच उठाई । लेखा खरच उठावै आई ॥ एक हवेली दस दरवाजा । अहुठ हाथ गढभीतर राजा ॥ राजा प्रजा सबैहि रहवै । इकछत राज चले नहि पावै ॥ दोउ राहुके शहर बताऊँ । बाहर भीतर प्रकट दिखाऊँ ॥ एक घर बसे मोह नृप भारी । ताकी साज विषय अधिकारी ॥ दूसरे घर विवेक बलधारी । ताकी सात सबै हितकारी ॥ इकघर राजा एकघर रानी । विधि संयोग मिलावै आनी ॥ एकघर सूर एक घर चन्दा । एक तेज विष अमृत मन्दा ॥ इकघर शक्ती इकघर शीवा । इकघर मन एकघर जीवा ॥ इकघर पाप एकघर पुन्या । इकघर सांच एकघर शुन्या ॥ इकघर भक्षक बसे अपारा । इकघर रक्षक है रखवारा ॥ इक राजा कर रक्षक नाऊ । रक्षा करै सदा सब ठाऊ ॥ एक राजाकर भक्षक नाऊ । भक्षै सबै न छाड़ि काऊ ॥ दूनों नृपति एकपुर माहीं । एक रथ चढ़ै एक सङ्ग ताही ॥ प्रथमहि भक्षक होइ असवारा । तहाँ जाय जहाँ है करतारा ॥ विषम सरोवर पहुँचे जाई । पैठि विषम जल माहि नहाई ॥ करि असनान तीर्थ परसै । झाई झलकि ज्योति तहाँ दरसै ॥ दुइ प्रतिमाको दर्शन पावै । आदि निरंजन ज्योतिदिखावै ॥ काली कालरूप विस्तारा । नाना रंग तरङ्ग अपारा ॥ देखि रूप मन हर्ष समावै । ज्यों पतङ्ग दीपक कहँ धावै ॥

नं. १० बोधसागर - ४

( ३० )

बोधसागर

देखत बहुत सुहावन ज्योती । नाना रङ्ग लागे बहु मोती ॥ जब परसै तब तेज अपारा । लागे आंच महा विष झारा ॥ सो विष लै भक्षक घर आवै । आनि जीव कहैं घोरि पियावै ॥ विषपिलाय जिव घात लगावै । रथते उत्तरि आपु घर आवै ॥ जब विष चढ़े आप बिसरावै । तब रथ चढ़िके रक्षक धावै ॥ रक्षक दूरि देश कहैं धावै । विषम सरोवर पार सिधावै ॥ विषम सरोवर तजि है पारा । जाइ जहाँ सतनाम पियारा ॥ अमर चोलना देखे जाई । चरण स्वरूप महाँ रहे समाई ॥ परसे सुरति नामकै पाया । मिटे जहर भइ निर्मलकाया ॥ दया तूरे चढ़ि उत्तरे पारा । परसे अमी तत्त्व विस्तारा ॥ अमी तत्त्व तूरे जब परसे । अग्र ज्योति अखंडित दुरसै ॥ वरषै अमृत अग्रही धारा । पिवे जीव विष होय निनारा ॥ सुख सागरमें सुधारस पीवै । लै अमृत फिरि घरहि सिधावै ॥ घरमें आइ रहा ठहराई । अग्र अमी धर राख छिपाई ॥ घरी आध घर माहि जुडावै । भक्षक जहर बहुरि लै आवै ॥ फेरि जहर जीवहि पहुँचावै । जीव सुख होइ अमी गँवावै ॥ जब भक्षक विष जीव पिआवै । फिर रक्षक अमृतकह धावै ॥ एहि विधि रक्षक भक्षक धावहि । एक विष एक अमृत लावहि ॥ विषम सरोवर भक्षक जाई । रक्षक सुख सागर पहुँचाई ॥ इहिविधि दोऊ करै रजधानी । इक दारुण इक शीतल बानी ॥ जादिनघर विधिने दुइकीन्हा । तादिन सोंपि खजाना दीन्हा ॥ दोइ नृपतिके दोइ स्वरूपा । राखै दाम चन्द सूर भूपा ॥ इकघर सूर्य एक घर चन्दा । इक दुख दारुण एक अनन्दा ॥ सकल समाज दोऊके हाथा । अविधि समानखजानासाथा ॥ भयर मता दोऊ घर भारी । श्वासा सार सुधारि सुधारी ॥

श्वसगुञ्जार

( ३१ )

बाँटिके दाम दोउ घर दीन्हों । अमृतविष विश्वासकर कीन्हों॥ रचि खानी बहु रंग अपारा । देह माहिं बहु देह सुधारा ॥ (रची देह बहु रंग अपारा । विष अमृत बहु रंग अपारा) ॥ अग्र देह एक देह मैझारा । बाहर भीतर मध्य दुआरा ॥ (अष्ट देह यदि देह मैझारा । बाहर भीतर मध्य अखारा) ॥ चारि विमल हैं चारि तरंगा । चारि सुरंग एक बहु रंगा ॥ (चारि विमल हैं फटिक तरंगा । चारि सुरंग श्याम बहुरंगा) ॥ दुइ उज्वल हैं बाहर वासा । दुइ उज्वल जलमध्य प्रकाशा॥ (दुइ उज्वल दल मध्य प्रकाशा । श्याम सुरंग अधर दुइवासा) ॥ श्वासा सुरंग अधर दुइवासा । जरद नील घर माहिं निवासा ॥ बाहर दुइ सफेद बहुरंगा । रूप अनन्त सत शक्ती संगा ॥ पार बसै सत्त्व सुकृतको डेरा । मध्यमें विषम सरोवर घेरा ॥ निस्तत्त्वकमलसुकृतसंयवासा । विषम सरोवर काल निवासा ॥ पुहुपदीप साहेबको वासा । सुखसागर ज्ञानी रहि वासा ॥ ताके और काल उच्छवासा । मान सरोवर काम निवासा ॥ ताके और कालकी आसा । विषम सरोवर काम निवासा ॥ सबके डरे निरंजन वासा । धरम दास तुम लखो तमाशा ॥ धर्मराह सुख पौन उड़ाई । विषकी लहरि ध्वजा फहराई ॥ ज्ञानीके सुख ज्ञान प्रकाशा । अमरसार सुधा रहि वासा ॥ गुप्त झांझरी पुरुष बनाई । अक्षे अमान ध्वजा फहराई ॥ प्रकट झांझरी काल प्रकाशा । तेजपूज विविधि रहिवासा ॥ जो रचना बाहरकी भाषा । सो रचना भीतर रचि राखा ॥ जो भीतर सो बाहर दरशै । तत्त्वहि तत्त्व तत्त्वतहँ दरशै ॥ तत्त्वकि रथचढ़ि बाहर आई । अमीकी रथ तहाँ परशै धाई ॥ क्षण बाहेर क्षण भीतर आवै । सतगुरुमिलै औ सहज बुझावै ॥ ( निरखि परखि जब हेरे जाई । )

( ३२ )

बोधसागर

चारि तीर्थमहँ प्रतिमा भारी । सत्यसुकृत तहाँ पुरुष औ नारी ॥ स्वासा संयम राह सुधारी । देवल चारि देव हैं चारी ॥ घट भीतर घट राह अपारा । चाँद सूर्य ताके रखवारा ॥ उत्तर चँद तीरथ कहँ धावै । परसि तीर्थ अमृत लै आवै ॥ एकजीव दुइ अंग समाना । जन्द्र सूर्यके हाथ विकाना ॥ दक्षिण स्वर तीरथको धावै । तीरथ परसि जहर लै आवै ॥ शुक्लपक्ष जब पूनो जब आवै । तबही जीव चन्द्र घर आवै ॥ जलरैंग तत्व चँद असवारा । सो परसै घाइअमृत रसधारा ॥ जीव चन्द्रके साथेहि धावै । योजन चारि पार पहुँचावै ॥ करि असनान पुरुष पग परसै । निर्मल ज्योति अखंडितदरसै ॥ जब फिरि चन्द्र सरोवर आवै । बहुरि जीवसँगहि फिरि धावै ॥ आवत जात बार नहिँ लावै । पल पल जीव दरसतहाँ पावै ॥ कृष्णपक्ष अमावस जब आवै । तब फिरि जिव सूर्यघर आवै ॥ सूर्य तेजपर होइ असवारा । बरसै अग्नि अखण्डित धारा ॥ जाय निकसि योजन परवाना । विषय सरोवर करै अस्नाना ॥ परसै देव निरंजन पाई । लागे झार जीव कुँभिलाई ॥ जीव सूर्य फिरि कमल समावै । पल बाहर पल भीतर आवै ॥ सूर्यसंग विष पीवै अघाई । मूर्च्छित होय चन्द्रघर जाई ॥ जाय अमावस परिवा आवै । चढि रथ ऊपर चन्द्र सिधावै ॥ वायु तत्वपर होय सवारा । चले चंद दुइ योजन पारा ॥ विषम सरोवर पार सिधावै । मान सरोवर पारस पावै ॥ नागिनि एक सरोवर माहीं । पीय अमृत विषछांडे ताहीं ॥ सो विष खाय चन्द्रघर आवै । अमृतकी कछु खबर न पावै ॥ पल पल करै तीर्थ अस्नाना । भीतर बाहर एक समाना ॥ अमृत रहै भुजंगिनि पासा । भीतर बाहर एक प्रकासा ॥

श्वसगुआर

( ३३ )

साइ विष लेय तीर्थको आवै । चंद्र कमल पर जाय समावै ॥ एहिविधि चंद्रपक्ष चलि जाई । पाछै जीव सूर्य घर जाई ॥ पूनिमा बीते परिवा आवै । तब रथ चढिके सूर्य सिधवै ॥ सुरंग तुरै पर होय असवारा । योजन तीनि जाय चढिपारा ॥ सुखसागरमें पैठि नहाई । परसै योग सँताय न पाई ॥ अमृत मानसरोवर माहां । कामिनि दूरि धरै बोले ताहां ॥ सो अमान सुखसागर माहां । सूर्यके संग पीवे जिव ताहां ॥ पिये अमी जिव सूर्यके संग । मिटै तपत होय शीतलअंगा ॥ पल भीतर पल बाहर आवै । पीवै अमी रस तेज समावै ॥ जबही सूर्य अमीरस पावै । चंद्रहि पकरि आपुघर लावै ॥ जब चंदा आवै रवि द्वारा । होइ संक्रमण तेज अपारा ॥ तेज किरण पूरण जब होई । दरशाहि काल तपै रवि सोई ॥ तपै तेज बारहको धावै । सुखसागरमें पड़ि नहावै ॥ सुखसागरमें कर अस्नाना । उदितकमलहोइ द्वादश भाना ॥ सूर्यपर चंद होय जब जोरा । तब घर काल करै घनचोरा ॥ चन्द्र सूर्य कह राहु जो फाँसे । पल चन्दा पल सूर्यहि आसे ॥ इहि विधि देह डुइनको बाजी । पूनम धरिहि अमावससाजी ॥ चन्द्र सूर्य लै जाय अकाशा । सुखमुनिके घरदोजकर फाँसा ॥ मुसकि तुरौपर होइ असवारा । घरे शशि सूर्य अकाशके द्वारा ॥ जंबूद्वीप काल अस्थाना । सहज शून्य कह करै पयाना ॥ सहज शून्यमहैं पहुँचे जाई । सहज रहावै संग लगाई ॥ योजन डेठ सहजकर बासा । तहवाँ करै काल रहवासा ॥ सहज कालसों अंतर नाही । जीवहि छलै सहजकी बाही ॥ पलमें जंबूद्वीपहि आवै । पलमहैं सहज शून्यकहैं धावै ॥ एहिविधि चंद्र सूर्य दोह कांसै । काल सहज होय जीव गरासै ॥

( ३४ )

बोधसागर

चंद्र सूर्य दोउ अमृत पावै । काल सहज संग बाण लगावै ॥ बाण लगाय श्रुधा लेइ छीनी । जहर देइ चिव बुद्धि मलीनी ॥ जीवहि सदा कालकी आसा । तजि अमृत विष करही आसा ॥ कालहि राहु केतु होइ आवै । कालहि चंद्रहि सूर्य सतावै ॥ कालहि अमृत जीवसों लेही । कालहि जल थल बाजी देही ॥ कालहि प्रहण असत है जाई । देह विष अमृत लेइ छुडाई ॥ कालहि आगे पाछे धावै । कालहि रचै काल बिगडावै ॥ कालहि चारि खानि रचि राखा । कालहि सब घट बोलै भाखा ॥ घट २ काल करै रखवारी । एक देह दुइ अंग सँवारी ॥ एकअंग चंद एक अंग सूर । श्वासा पारस हाल हजूर ॥ इकइस हजार छःसै श्वासा । इतने एक घरी परकाशा ॥ निशिवासर बीते युग चारी । देओं अंग श्वासा संचारी ॥ दश हजार आठसै भारी । श्वासा चंद्र रनेह सुधारी ॥ जेतिक श्वासा चंद्र सनेहा । तेतिक चलै सूर्य सँग नेहा ॥ दशहजार तीनसै घाटी । चले चन्द्र अरु सूर्यकी बाटी ॥ दुइ हजार दुइसै अधिकारा । ताको भेद एक विस्तारा ॥ मध्यद्वार सहजके जाई । ता सुन्नह मों रहै ठहराई ॥ बारईस हजार चारिसै ऊने । जाप जपे जिव आप विहूने ॥ एकजीव तीनों घर संगा । राहु केतु शशि सूर्य अनंगा ॥ जाप जपै और तीर्थ नहाई । परसै देवल देय सहाई ॥ जब जिव सत्य सुकृत पगपरशे । तब निज ज्योति अखंडितदरशे ॥ जब जीव आदि निरञ्जन दरशे । हीरामें ज्योति तत्वजसपरशे ॥ तासु भेद मैं कहां बनाई । असिले गगनरु श्रुधा छुडाई ॥ जब परिवा पूनमकी साथी । तब चंद्रहि ले आवहि बाँधी ॥ राहुकाल होइ जाय समाई । अमृत छोड़ि पीवै दुखदाई ॥

श्वासगुआर

( ३५ )

चन्द्रके सुगममें जीवहि आसे । ग्रहण लगाय शून्यमहँ फांसे ॥ राहु काल जिव चन्द्र समाई । विष तजि मृत होइ छुड़ाई ॥ इहि विधि राहु चन्द्र कह घेरे । गहन गरासि ज्ञान कह फेरे ॥ अमृत छोड़ि विष सङ्ग लगावै । ज्ञान गर्मी उपजे नहिं पावै ॥ इहि विधि सूर्यहि केतु गरासे । अमृत हरि विष तेज तरासे ॥ इहि विधि दोउ सतावै काला । ता सँग जीवहि करै बिहाला ॥ जब चन्दा कह राहु गरासै । करमकाल ब्याल होय फासै ॥ उग्र होत है थास विवेखै । शशि और सूर्य दोऊ घर देखै ॥ छांडि केतु आप घर आवै । अपने घरमहँ सूर्य समावै ॥ सुरंग तुरेपर बाहर जाई । सुखसागर महँ पैठि नहाई ॥ योग सन्ताइनके पग परशै । निर्मलज्योति अखण्डितदर्शै ॥ अमृत पीवे तेज बल पावै । पल पल पीवे बहुरिघर आवै ॥ आपुहि मह विष अछप छिपावै । बहु विधि अमी सुधारस पावै ॥ पल भीतर पल बाहर जाई । जीवका मूल परसि सुखहाई ॥ पुनि जो चले सूर्यकी श्वासा । पूरण तत्व तेज परकासा ॥ कबहुँ सूर्य चन्द्र घर जाई । चन्द्रहि लाभ सूर्य पछिताई ॥ ज्यों लगि रहै चन्द्रघर सूर। तब लगि अमी अमान हजुरा ॥ इहि विधि तत्व छानि जब आवै । विद्वत्पुरुष हो अधिक पढ़ावै ॥ चन्द्र सनेह जीव तब पावै । पावे जानि भव बहुरि न आवै ॥ शशि और सूर्यग्रहण जब होई । तब देखै तन भेद बिलोई ॥ ग्रहण आसि छांडि जब कूरा । तब घर आवै शशि और सूर। ॥ अपने अपने घर जब आवै । तब नहिं कोई तत्व गवावै ॥ एकके घर एक जब आवै । कोई जीते कोई तत्व गवावै ॥ ग्रहण आस होत जब जाने । तो शशि घरही सुरलै आने ॥ शशि घर आवै शशि घरजाई । अग्रवास बासै लौलाई ॥

( ३६ )

बोधसागर

पुडुपबास तिल राखै छाई । तबके बासना बाहर जाई ॥ पुडुपके भीतर बास रहाई । सोई बास बाहर महकाई ॥ बाहरते भीतर लै आवै । ताके भीतर आनि समावै ॥ ताते वासन बाहर जाई । तिलके भीतर है ठहराई ॥ तिलते वासन बाहर आवै । बाहरते जो भीतर समावै ॥ भीतर वेधि एक जब होई । बास तेलमो रहै समोई ॥ समय-तौ लगि वास बहुत विधि, ज्यों लगि परैना तेल । तेल लाज छाड़िके डारै, दुइ मिलि होय फुलेल ॥

चौपाई

बास तेल मई रहे समाई । तेल काड़ि नहिं बाहर जाई ॥ तेलके संग बास महकाई । बासके संग तेल रहु छाई ॥ समय-लहा बास जहाँ तेल रहु जहाँ तेल तहाँ बास । एकै संग दूनों बसौ, महकै वास सुवास ॥

चौपाई

इहि विधि रहै दोऊ इक ठाऊँ । एकै बासना एक सुभाऊ ॥ बाहर कहि जब अंग लगावै । दुहे प्रतिमाको रूप दिखावै ॥ सुरति फूल मन तिलकी खानी । नाम बास जीव तेल बसानी ॥ बाहर फूल भीतर फुलवारी । रवि शशि करै दोय रखवारी ॥ तिल फूले विखियाकी खानी । दिनफूले निशि गिरतनजानी ॥ ऐसो फूल कुत्रिम उपराजा । तत्त्व तैल सबमध्य विराजा ॥ सोई तत्त्व मो अन्न सनेहा । तत्त्वहि तत्त्व मिलै तिल देहा ॥ तिल औ फूल एक सम कियऊ । तेहि पाछै पुनि प्राण बसियऊ ॥ दुख दीयते निकसेउ तेल । फुल देह तजि भयऊ फुलेला ॥ यहि विधि गुरु शिष्य जो होई । मुक्ति पंथ पावै पुनि सोई ॥ धर्मदास यह अद्भुत बानी । कही विचारि सुकृत सहिदानी ॥

शवासुआर

( ३७ )

उत्पत्तिकी गति सब हम पाईं । परलैकी गति कहौ बुझाईं ॥ रक्षक भक्षक एकहि सङ्ग । कहौ विचारि दोऊको अङ्ग ॥ जब साहब शिवशक्ति बनाईं । सो तो गम्य सबै हम पाईं ॥ सो शिवशक्तिकालरचिराखा । दोनों अङ्गधरि प्रकटी भाखा ॥ कामरूप विष वाण बनाया । कला अनन्तधरि प्रकटी काया ॥ घर घर शिवशक्तीसुत नारी । विरह वियोगसोगसुख भारी ॥ नाना रूप रंग उपराजा । उपजनविनसनसुखदुखसाजा ॥ कुल व्यवहार सकुचऔं लाजा । नात गौत रस लीला साजा ॥ चारि खानि बानिधरि गाजा । चारि बर्ण औ शर्म उपराजा ॥ लाज वरन कूरी कुल काजू । योग्य यज्ञ व्रत दान समाजू ॥ संपत्ति बिपत्ति रंक औ राजा । अन्न वस्त्र माया उपराजा ॥ सब ऊपर मन आप विराजा । मनबसि होय सैर सब काजा ॥ मन इन्द्री मई भोग संयोगा । मनै स्वाद औ स्वाद वियोगा ॥ मनहरता मन करता सोगा । मने रोग औ दुखसुख भोगा ॥ मनते कोई और न दूजा । मनसाहब मन सेवक पूजा ॥ मन देवल मन प्रतिमा साजा । मनपूजा मन तीर्थ विराजा ॥ मन शिवभक्ती विरह अपारा । रुधिरबिन्दु मनसिरजनहारा ॥ मनै जियावन मरने हारा । मनहिअशुभशुभ कर्मव्योहारा ॥ कर्मा कर्म मनहिते होई । भोग करै भुगतावै सोई ॥ मन भर्मित मन चेतन हारा । चारि खानि मनखेल पसारा ॥ मनशीतल मन तेज अपारा । मनश्वासा मन बोलनि हारा ॥ समय-चन्द्र सूर्य संग मन वसे, शुभ अशुभ मन आहि । श्वासा श्वासा मन बसे, कहि बरण गुण ताहि ॥

चौपाई

खानि खानिमनहोयअसवारा । फैलि रहा मन अगम अपारा ॥