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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

( ९२ )

बोधसागर

समाधान होइ आगम पावै । ता घट चोर न मूसन आवै ॥ लगन जानि जो पाँजी पावै । तत्त्व सनेह विलोक सिधायै ॥ आगमकी गति काया देखै । पर्वत नाम मंडल हित लेखै ॥ पर्वत पांच नाम अनुमाना । कहौ भेद सुन संत सुजाना ॥ पाँचौ पर्वत नजरि समावै । काया भेद नजरि तब आवै ॥ रवि लीला एक पर्वत भारी । चंद उनेह दूसर अधिकारी ॥ दुइके बीच सुमेर अनुमाना । देखत ताहि हंस निर्बाना ॥ चौथे मलय गिरि कैलासा । गोमत नाम पँचए परकासा ॥ पाँचौ पर्वत देखै सोई । गुरुगमि बुद्धि जाहि तन होई ॥ जब देखै तब कुशल शरीरा । विन देखै जानै तन पीरा ॥ रवि गिरि जादिन नजरेनआवै । तेजहि तन ना कष्ट जनावै ॥ चन्द्र शिखर जादिन नहि देखै । द्रव्यशोक कछु हानि विवेखै ॥ जादिन कैलास नजरेनहि आवै । मित्र हानि दुख खबरिजनावै ॥ गोमत पहार नजरि नहि आवै । काया कष्ट देश दुख पावै ॥ गिरि सुमेर जादिनहीं देखै । अन्तकाल तन घाव विशेषै ॥ रसना कान नजरि नहि आवै । मास सातमहँ काल चलावै ॥ जाकी रसना चूमक वासा । सो नहि देखै सदा निवासा ॥ पर्वत धवला नजरि नहि आवै । मास एक महँ मृत्यु जनावै ॥ तादिन काल चौकीअग आवै । ध्रुवमंडल नजरै नहि आवै ॥ सो सतगुरु जो होय सयाना । जैमुन जानि देह तेहि पाना ॥ जबतै काया आगम नहि पावै । तबतै अमी बीज नहि पावै ॥ काम बसी पावे जो ताही । बोरे विषम सरोवर माहीं ॥ काया श्वास चलै पर मेहा । काल वश्य होय छाँडे देहा ॥ पश्चिम लहरी जो गावै जानी । पांजी द्वार लखै सहिदानी ॥ चंद उगे सूर्य अथवै जबही । हंस सुजन तन यागै तबही ॥

शवासगुप्कार

( ९३ )

पूरी तत्त्व होय असवारा । पहुँचे सत्य लोक दरबारा ॥ सिंधु तेज होय तजै शरीरा । चले तेज चौराशी हीरा ॥ उत्पनि लगन देह तजि जाई । संकट गर्भ धरे नहीं आई ॥ अपनी काया आपु बिचारे । आपन आगम आपु सुधारे ॥ औरो आगम कहो बुझाई । जातें अवधि आनकी पाई ॥ गुरु आपु घट परखै जानी । तब पावै शिष्यकी सहिदानी ॥ तन परि आस परै जो प्राणी । तब निरखै ताकी सहिदानी ॥ झाँई झमकि जोत नहीं दरशै । काया कष्ट काल नहीं परशै ॥ गगन अवाज सुने नहीं बानी । कर पल्लवकी लखै निशानी ॥ मधीक जल्लौ दूना करई । पल्लौ सब पुहुमीमें धरई ॥ जेठा पल्लव ऊपर उठावै । तासु लहुरा उठि देखलावै ॥ निपल सहुरा पल्लौ उठि आवै । तासु जेठ वह अटल रहावै ॥ अटल रहै की यह सहिदानी । काया कष्ट होय नहीं हानी ॥ सो पल्लौ पुहुमीते डोले । देह तजै अस आगम बोले ॥ दरश भयावन वदन मलीना । लंपट बोलै काल अधीना ॥ ताही भूत ताहि दिखलावै । महा भयंकर मोट दरसावै ॥ कर पग शीतल सबै शरीरा । माथ तपै औ पायर बीरा ॥ औषध का गुण व्यापै नाही । निश्चय अन्तकाल है ताहीं ॥ नासिका नेह बासा नहीं आवै । थोथरी जिह्वा स्वाद न भावै ॥ हाथ पाँव पुहुमी मँहें मेलै । काँपे मेरु काल सँग खेलै ॥ छिन छिन माथ डुलावे सोई । जानहु अन्त काल पेहि होई ॥ आपन भाव दिखावै जबही । विषम कालाघट व्यापै तबही ॥ स्वपने शीश काटि कोई लेई । श्यामवरण कामिनि रति देई ॥ भइसा गदहा हाथी देखे । नाग श्वान औ भालु विशेषे ॥ झूरी बींद परै निशि सोई । चलै देह तजि सर्वस खोई ॥

नं. १० बोधसागर - ६

( ९४ )

बोधसागर

समय-गगन गरजै बिखुरी ना चमकैँ, तहां दुनो बन्द देईं। कहैं कबीर दिन पांच सातमें, हंस पयाना लेई ॥

चौपाई

काया परिचय भेद विचारैं । आपु तरे औरन कहैं तारैं ॥ सो सतगुरु जो होय सयाना । श्वासा नेह करै बन्धाना ॥ परिखै लगन तत्त्व निर्वाना । गुण अगुण सब करै बखाना ॥ निश्वासर चले सुरकी धारा । कायाकष्ट होइ अधिकारा ॥ तिथि अनुमान लखै सहिदानी । श्वासा सूर चले बलहानी ॥ बधिकके पहरे आपु उबारैं । चन्द सनेह भेद निरुवारैं ॥ श्वाशा सार गहै सहिदानी । शशिके घर महाँ सूर्य उगानी ॥ जेतिक श्वासा सूर्य उगाई । चन्दाके घर पीवे अघाई ॥ काया कष्टताप मिटि जाई । शील हंस होवै सुखदाई ॥ कालकी अवधि मिटावै जानी । समाधान होइ गहै निशानी ॥ तेज सुनरकी खा अतिचारा । ताते चले चन्द्रकी धारा ॥ महा अनन्द सफल तन होई । काल कला नहिं व्यापै सोई ॥ जब जब काल सतावे आनी । तब तब भेद करे बिल छानी ॥ साधैं लहरि समुद्र सनेही । तबसुख पावै यह जग देही ॥ साधन करै कहैं लौलीना । तत्त्व स्नेह होय नहिं छीना ॥ प्राण आत्माके गुण पावै । जो सतगुरु निज भेद बतावै ॥ परिचय तत्त्व साधना करई । धोखै प्राण न कबहुँ परई ॥ रूखा रूखा करै अहारा । सोई गहिहै भेद विस्तारा ॥ काम क्रोध तजि करै फकीरी । ज्ञान बुधि धारै तत्त्व धीरी ॥ वाद विवाद सबै विसरावे । दुविधा दूसर निकर न आवै ॥ श्वासा सार गहै गुंजारा । जाप जपै सतनाम पियारा ॥ अजपा जाप जपै सुखदाई । आवै न जाय रहै ठहराई ॥

श्वासगुञ्जार

( १५ )

चारि कमलकी परिचय जानै । गहै भेद निज तत्त्व बखानै ॥ फाहा रोपि करै निरुबारा । आदि अन्त सब करै सुधारा ॥ योजन चार करै बन्धाना । आसन मारि रहै निर्वाना ॥ चारि योजन खूटी विस्तारा । रूई फाहा जो करै सुधारा ॥ सुधा रूई नर नाटक माहीं । खूँटी ऊपर रोपै छाहीं ॥ बैठे आसन भूल सुधारी । देखै परिचय श्वास विचारी ॥ चले श्वास रतना गति नेहा । रवि शशि उदय विचारे देहा ॥ फाहा सनमुख बैठि रहावै । निरखे ताहि तत्त्व जब धावै ॥ पांचौ फाहा रोपै जानी । तत्त्व सनेह करै विलछानी ॥ रविके घर होय श्वासा आवै । योजन एक तीन तहां धावै ॥ एक योजन एक एकै विचारा । प्रलय प्रचंड तेजकी धारा ॥ ताहि लगनकी गहै निशानी । कछु सुखउपजैकछु होयहानी ॥ मूलकमल ताकर रहि बासा । तेजपुंज है बुद्धि प्रकाशा ॥ ताहि कमलकी देखे आशा । मूलकमल तब होय प्रकाशा ॥ तासु लगन लै साजहु बीरा । उपजै बुद्धि ज्ञान गंभीरा ॥ ताहि लगनकी पांजी पावै । तेजपंज मह बहुरि न आवै ॥ दूजै योजन तजि प्रकाशा । ताहि तत्त्व की देखै आशा ॥ निर्वृत कमल महाँ ताकर बासा । काया मध्य सुभर रहि बासा ॥ योजन तीन जो है विस्तारा । पृथ्वी तत्त्व जानकी धारा ॥ ताहां बसै पवन बल वीरा । जाहि पवन संग उपजै छीरा ॥ ताके संघ सँवारहु वीरा । निर्मल हंस होय गंभीरा ॥ श्वासा साथ पारस सहिदानी । विन रसनाकी बोले बानी ॥ दुसरी घडी चन्द्र सनेहा । गहो विचार देखिकै देहा ॥ ताकी श्वासा चल चोचण्डा । कहे कबीर मिटै दुखदण्डा ॥ झीनी श्वास होइ गुञ्जारा । चले प्रचंड बासुकी धारा ॥

( ९६ )

बोधसागर

दुई योजन पैज बिचारा । पौनविजय बल तहाँ सुधारा ॥ पुहुप कमलमहँ ताकर वासा । देहमध्य नाभी रहि वासा ॥ जाते होय क्षीर बंधाना । होइ खटाई स्वाद अमाना ॥ पुहुप कमल होइ लगन विचारै । पौन सनेह पान निरुवारै ॥ ताहि तत्त्व श्वासा चढि धावै । सोइ कमल जानि जो पावै ॥ जौन कमल तत्त्वकी धारा । तौन कमल नेव बिस्तारा ॥ जाहि तत्त्व सँग पान पठावै । ताहि कमलमहँ ले पहुँचावै ॥ आन कमलपर जीवकर बासा । आनते पान करै परकासा ॥ आन कमलमहँ पहुँचे याना । धोखे काल करे पछताना ॥ जाहि कमलपर जिवका बासा । तहाँ बयान कर रहु प्रकासा ॥ बालक की जिह्वा रहि बासा । सुभर कमलमहँ करै निवासा ॥ ताही लगन जीवके गहई । पावत पान काल न दहई ॥ संशय कमल देहु जनि पाना । नहिं तौ हंस होय अज्ञाना ॥ उपरहि पान लेइ यमराजा । संकट शिष्य गुरुकह लाजा ॥ सुरति कमल जीवकर बासा । ताहि कमलपर साथहु श्वासा ॥ पूरी तत्त्व चलै जब धारा । योजन चारि जाय चढिपारा ॥ सुरति कमलपर ताकर बासा । तहँवा पान करै परकासा ॥ पालता पौन ताहिके संगा । परसत ताहि होय नहिं भंगा ॥ पवन सजीवक करै अनुमाना । सो हंसहि लै जाय ठिकाना ॥

समय-चारि कमलमहँ चारि पौनहैं, चारिउ कमल अपीव ।

दाज पान सुधारिके, जाहि कमलपर जीव ॥

चतुरंगीकी लच्छ नहिं, तबहि सुधारहु पान ।

द्रादश कमल बिचारि हो, चौकाके अनुमान ॥

चौका चन्दन कीजियो, मलयागिरिको नाम ।

चारों कमल सुधारिकै, मध्य ताहिके धाम ॥

श्वासगुञ्जार

( १७ )

चौका चारि सुधारके, चारि कमल अस्थान । चारिउ पौन उरेहिके, देखो सुरति अमान ॥ सुरति सनेही पौन कहैं, सुमिरहु सुरति सुधार । चारिउ अंक सुधारिके, जल दल धरेउ सुधार ॥ प्रथमहि चौका कीजिये, चारि खूँट अनुमान । चौरासी द्रौप सुधारिहै, सत्य लोक सहिदान ॥ ऊपर पँखुरी द्रौपके, भीतर चौका चारि । द्वादशदल निर्वाण है, देखो सुरति बिचारि ॥ माया छत्र विस्तारहु, सती नाम विश्वास । द्वादशदल तहाँ सुरचिके, कीएहु प्रेम प्रकाश ॥ जापर बसे निरक्षर, ताहि तत्त्वको नाम । शब्दसुधारस खानि है, हम तुम तेहिके धाम ॥ शब्द सुरतिको नाम गहि, सुमिरै शब्द सुधार । तब सिंहासन पग धरै, रचै लोक विस्तार ॥

चौपाई

कदली दल आनेहु पनवारा । धरहु नारियर प्रेम सुधारा ॥ सनमुख कलशाले साजेउ जानी । बाती पांच धरेउ तहाँ आनी ॥ आसन लिखेहु लगनको नामा । भर्म्मभूत भाजै तजि धामा ॥ दहिने राखहु दल परवाना । मेटै जहर अभी धरि ध्याना ॥ निर्मल नीरकी देह दुहाई । जहर नीरकी दशा मिटाई ॥ आसन लेई लगनको नामा । लगन सनेह सुधरै धामा ॥ खरचा पांच धरेउ तिहि माहां । प्रकटे सत्य शब्दकी छाहां ॥ बहुबिधि बाससुगन्धमिलायहु । चौकाके दहिने धरवायहु ॥ ताके निकट शिला अस्थाना । रेखा रोपि करेहु बन्धाना ॥ सत्यशब्द ले रखै बनायहु । ताके ऊपर शिला बैठायहु ॥

( १८ )

बोधसागर

शिला ऊपर फिरि अंकसुधारैहु । शुक्तीकी श्वासा तहँ चारेहु ॥ ता ऊपर पुनि धरहु कपूरा । काल अंश होवै सब दूरा ॥ चौकाके बाएँ अस्थाना । आरति थार धरेहु सहिदाना ॥ आद्याके श्वासा सुख मूरी । ताको नाम सुधारहु पूरी ॥ अंक सुधारिके आसन कीन्हैहु । ताके ऊपर थार जु दीन्हैहु ॥ तिसरी श्वास करुणा मैं उचारहु । सुमिरणसारसत्यमुखभाखहु ॥ सुगन्ध सुपारी तापर राखहु । चौका कलश मध्य अस्थाना । धरहु मध्य धोती औ पाना ॥ नरियर मिष्ठानमध्यमें राखेहु । धोती पान बचनअभिलाषेहु ॥ इहिविधिकी यह सब विधिपूरा । सुमिरतके हम होव हजूरा ॥ लोक निशान पुरुषजो भाखा । सो हम गुप्त एको नहिं राखा ॥ सब विधि ज्ञान तुम्हें हमदीन्हाँ । अब हम लोक पयाना कीन्हाँ ॥ नारियर है ब्रह्मा कर माथा । सो हम दीन्ह तुम्हारे हाथा ॥ ताके मध्य जीव सहिदानी । मानतताहिकियहु विलछानी ॥ ज्योति कपूर कियेहु प्रसङ्गा । काल अंग परसतहोइ भङ्गा ॥ सतएँ श्वासा ताके सङ्गा । जाते यमकर मिटै तरंगा ॥ जैसी लक्ष्य जीवके पासा । हाथ नारियर नीकसुतासा ॥ कर्मौ जीव कर्मके बांधा । निर्णय भेद न जानहिं अन्धा ॥ अङ्ग छिपाइ करै जिव बोटा । ताकर होय नारियर खोटा ॥ निर्मल हँस होय सुखदाई । मोरत नारियर वास उडाई ॥ निर्मल अंकुर सेतपुर होई । शब्द सनेही प्रीतम सोई ॥ जैसी दशा जीवकी जानी । प्रकट होय जब नरियरभानी ॥ जेते लपट तासुकी काया । सो नरियरमें होय सुभाया ॥ नरियर एक होय जलरंगी । सतगुरु सत्यशब्द परसंगी ॥ पारसते ताकी उत्पानी । हँस दया धीर निकसी खानी ॥

श्वसगुञ्जार

( ११ )

कर्मी एक रोष निर्मावा । निरखत ताहि तत्त्व कर भावा॥ कपट सनेह कर्म सहिदानी । ताकर अङ्गसत्य करै हानी ॥ शब्द विचारि करेहु गुरुआई । पूरी तत्त्व लेहु सङ्ग लाई ॥ जेतिक लक्ष जीवकी काया । तेते पान साथ निर्माया ॥ रेखा गुञ्ज विचारेहु जानी । विषमतिछर करिहैजिम हानी ॥ गुरुकी रेखा जाहि पर होई । छत्र सोहावन पर्शे मिति सोई ॥ गुञ्ज औ छत्र शरन मुक्तायहु । ताहि पानपर अंक चढायहु ॥ सत्य शब्द पारस परसायहु । ॥ पारस मनि है तत्त्व सनेही । तासु लगन लै पान उरेही ॥ पावत पान हंस घर जाही । पौन सजीवक जावन नेहा । तत्त्व लगन लै सुरति सनेहा ॥ सत्य नाम मुक्तत सठिहारा । सो सहिदानी पान सुधारा ॥ छत्रके छल होई जेहि पाना । तापर अंक लिखै निर्बाना ॥ जाहि देहु हंसन कह खाहा । पान छत्र मणि दीजै ताहा ॥ निशदिन रहैं जो सुरति समानी । सो दीजै सीखन सहिदानी ॥ धर्मदास तुम जेठे भाई । हम लहुरे कीन्हा अधिकार्ई ॥ तुम्हरी वस्तु तुमहि कहैं दीन्हा । अब हम लोक पयाना कीन्हा ॥ जेते जीव आहि जगमाही । सो सब आवै तुम्हारे बाही ॥ तुम्हरे शिर जीवन कर भारा । आदि अन्तको तुम कडिहारा ॥ तुमरे हाथ जीवकर काजा । काल डसैं तब तुम कहैंलाजा ॥ वंश वयालिस कुलके राजा । ज्ञान गम्य सबै तेहि साजा ॥ उन्हके पास जीव जेते जावैं । सो सब सत्य लोक कह आवैं ॥ बंशके बंश छत्र मनिहारा । सोइ शब्द सुत वंश हमारा ॥ जेहिवां देइ सो लेकर जाई । काल डसैं नहि मोरि दुहाई ॥ बंशके बाँह जीव जत आवैं । यमकी नाक छेदि घर जावैं ॥

( १०० )

बोधसागर

बंश बयालिस राज तुम्हारा । जिन्हसों पन्थ चलै संसारा ॥ कोटिन्ह दगा वंशपर पराई । कहै कबीर नाम बल ताई ॥ नाम कबीर पान है सारा । इहै नाम काल हंस उबारा ॥ नाम कबीर कहो गुरुराई । बावन लाख दगा मिटि जाई ॥ जाहि देहु औ नाम निशानी । हंस उबारि करै राजधानी ॥ वंश समाहि हंस हिया माँही । हंस देहि जीवन कह वाही ॥ अहर्निश नाम हमारो लेई । ताको काल दगा नहि देई ॥ भजनी भजन करे सुकहावै । अमर सनेह समाधि लगावै ॥ शाल दशा धरि हंस उबारै । विषम लहरि भवसागर तारै ॥ वैश बयालिस अँश हमारा । करपग शीश छत्र निआरा ॥ कलावन्त शूद्र सुखदाई । हँसके नायक शरण सहाई ॥ वैशके चरण शीश कुरबानी । अङ्ग अङ्ग हमरी सहिदानी ॥ जाके मस्तक दीन्है हाथा । काल करम नहि ताके साथा ॥ चरण छुए रज अमृत लेई । ताकह काल दगा नहि देई ॥ दया प्रीत सब जानत रहई । काल कर्म सब दूरि खँदे रही ॥ जासों कहै सत्य हित बानी । ताकी काल करे नहि हानी ॥ जौन जीव सत्य पारस पावै । छोड़ै देह लोक सो आवै ॥ सुख सनेहसो पारस पावै । सो निश्चय सुखसागर आवै ॥ देह धरि प्रकटे संसारा । शब्द विदेह हंस रखवारा ॥ जाकह देहि सत्यकर भारा । सोई शब्द सुत वंश हमारा ॥ करनी करै वंशकी चाला । ताको नाहि सतावै काला ॥ करहुँ राज औ पन्थ चलावहु । शब्द सनेह हँस सुकतावहु ॥ राज पाट सौंपो अनुमाना । जम्बुद्वीप छत्र करहि अपारा ॥ आगे चलि है पन्थ विस्तारा । कालकला छल करहि अपारा ॥ तुमरे घर प्रकटीहि अन्याई । हँस दशा धरि पन्थ ननाई ॥

श्वसगुआर

( १०१ )

कपटकी भक्ति करहि विचारा । लाजधाज पाखंड पसारा ॥ ज्ञानदशा धरि पंथ चलैहै । ममता बाँधि जीव भरमैहै ॥ तहाँ आपु दृढ़ राखहु ज्ञाना । कालकिकला होय पिंसि माना ॥ बाहर काल चतुराइ भखीही । सदा अमान सुक्ति ते रखीही ॥ सत्य दुहाई फिरिहैं जहाँ । टिकै न कील कलाकी तहाँ ॥ जो जिव शब्द हमार न मानी । सो जाने वो है यमकी खानी ॥ आन मेटि दुविधा फैलइहै । सो जिव सपनेहु मोहि न पड़है ॥ शब्दकी शरण गहहि लौलाई । निर्मल हंस होइ सुखदाई ॥ काल कला धरि प्रकटहि आई । विरलै हंस रहै ठहराई ॥ काल कला मुख भापहि जबही । छुटिहैं चित्त हंसन कर तबही ॥ भापहि ज्ञानदृष्टि व्यवहारा । सुरति डोलाई करै अतिचारा ॥ कालपंथ महाँ प्रकटिहि आई । ज्ञानमेटि भापहि चतुराई ॥ शब्द वंशकी निंदा करि हैं । ममता बाँधि कालमुख परि हैं ॥ आप थापी वंश उठै हैं । शब्द मेटि जीवन भरमै हैं ॥ एक परिपच बाँधि हैं सोई । जो नहि हंस हमारी होई ॥ जब परिपच सुनाइहि काला । शब्दन सुमिरै तेहि करै बेहाला ॥ मन बच आश शब्दकी करि है । कालकी चाल चित्तना धरि है ॥ मन वच जानि शब्द कहैं धरि है । निश्चय सत्यलोक सो जैहै ॥ पाषण्डकी गति देहु बहाई । शब्दकी शरण गहै चितलाई ॥ शब्दकी आप शब्द लौ लाई । शब्द छोड़ि नहि आन चलाई ॥ शब्द पाइ करि है अभ्यासा । सुमिरन भजन शब्द विश्वासा ॥ अमर समाधि शब्द अवराधे । अक्षरमांह निरक्षर साधे ॥ पूरी तत्व लखै जो कोई । पूरण ज्ञानगम्य जेहि होई ॥ वंश सदाहि या तत्व समाई । बंद करै तो मोरि दुहाई ॥ बंश दयाते सब मिटि जाई । सुमिरि बंश बयालिस पाई ॥

( १०२ )

बोधसागर

समय-मनसा वाचा कर्मणा, तत्त्वहि तत्त्व समाय ।

अक्षरमांहि निरक्षर दरशौ, अधर ध्वजा फहराय ॥

दामिनि कैसी दमक जिमि, ऐसी शब्दकी डोर ।

कहे कबीर पहुँचाइ हों, हंस सुजनकी जोर ॥

चौपाई

अक्षर मृंह निरक्षर पावै । छोड़ि देह पांजीकी धावै ॥

पांजी द्वार सत्यकी धारा । जलरंग चौकि सुकृत रखवारा ॥

आदि अन्त हम तुमकह दीन्हा । अब हम लोग पयाना कीन्हा ॥

तुम साहब सतलोक सिधाए । हम सेवक संसार रहाए ॥

निश बासर तुमहीं लै लैहों । पलपल दरश तुमहिको दैहों ॥

छिन छिन रहो तुम्हारे पास । धर्मदास मोहि तुम्हरो आसा ॥

तुम हो भाई प्रेमहित मोरा । हंसन जाय करो बैदि छोरा ॥

लोक बोडइसा बैठे रहिहौ । गुहालोक बिरले सों कहि हौ ॥

समय-भेद पुरुषको तासों कहिहों, जो शब्द पारखी होय ।

शब्द पारखी मिलै नहिं, तासों राखेहु गोय ॥

चन्द्र सूर्य चढ़ि जल पिवैं, विनु रसना रस सोय ।

तासों कहि हों शब्दनिरक्षर, नेह धरो जनि गोय ॥

विनु रसना रस पीवन जाने, कहा निरक्षर पावै ।

कहे कबीर ताहि परिहरहु, काल कला धरि आवै ॥

सूक्ष्म वेद भेद नहिं जाने, कथनी कथि लपटान ।

गुरुगम भेद विचारे नाहीं, यमपुर जाय निदान ॥

चंद सनेह लखै सहिदानी, तुरति होय असवार ।

दुई करजोरी महारस पीवैं, सतगुरु शरण अधार ॥

संयम करै अधर धुनि साधै, सत्यसुकृत रखवार ।

गुरुकी दया साधुकी संगति, उतरे भवजल पार ॥

शवासुआर

( १०३ )

काया परिचय जानिके, पकरै हठ कडिहार । नाव लगावै घाट कह, खेइ उत्तरे पार ॥ पश्चिम लहर जो गावै, नाव लगावै घाट । उत्तरि पांजी सोधिके, तब पावै निज घाट ॥ चंद उदय जब होत है, सूर्य अस्त बलहीन । इहै लगन है आदि की, जैसुनिकरसुरलीन ॥ जलरंग महलमें जाई रहै, करै जाइ विश्राम । सतगुरु शब्द बतावहि, तब पावै निज धाम ॥ अन्तकी राह बराइके, चले आदिकी राह । आसन पावै लोक महँ अक्षय वृक्षकी छाँह ॥ धर्मदास हंसनके नायक, माथै राखहु नाम । अब हम चले लोक कहँ, तुम जाय करौ विश्राम ॥

चौपाई

स्वेत मिठाई उत्तम पान । सत्यबचन भाषहु प्रमान ॥ आरति करी कीन्हेउ भाऊ । नरियर मोरपांच मिलिपाऊ ॥ भक्तिभाव कीन्हेऊ बहुभांती । सतगुरु दूलह संत बराती ॥ शब्द सुरति ते गाँठि जुरावहु । भावर की बंदन पहिरावहु ॥ तिलकबन्दन बहुविधि कीन्हेउ । पांचसाधुमिलिआशिष दीन्हेउ ॥ पञ्च जने मिलि अर्पण कीन्हेउ । डरत तिन्है पुहमीमें दीन्हेउ ॥

समय-डर पारस डर प्रेमगुरु, डर करनी डर सार ।

डरता रहै सो ऊबरे, गाफिल खासीमार ॥

तत्त्व तिलक तिहुँ लोकमें, सत्यनामनिज सार ।

जन कबीर मस्तक दिया, शोभा अगम अपार ॥

शोभा अगम अपार, पार बिरलै जन पावै ।

अमर लोकको जाय, बहुरि कबहुँ नहि आवै ॥

( १०४ )

बोधसागर

अखण्ड फनिमनी तिलक है, अक्षय वृक्ष है सार। अमर महात्मा जानिकै, करैतिलकतत्त्वसार ॥ त्रिकुटी अग्रे मूल है, भुक्तुटीमध्यनिशान । ब्रह्मद्वीप अस्थूल है, अग्रतिलक निरवान ॥ अग्र तिलक शिर सोहै, बैसाखी अनुहार । शोभा अविचल नामकी, देखहुसुरति विचार ॥ जासु तिलक अस्थान है, तासु नाम अस्थीर । खंभ लिलाटै सोभही, तत्त्वतिलकगम्भीर ॥ संता अयनकी खानिहै, महिमा है निजुनाम । अक्षयनामतेहितिलकको, क्षयनहिं अक्षयविश्राम ॥ मध्यगुफा जहां सुरति है, ऊपर तिलकको धाम । अमर समाधि लगावै, अंग अंग अस्थान ॥ कंठी कंठ विराजै, उज्वल हंस अमान । मुख उज्वल चक्षु उज्वल, उज्वल दशा न होय ॥ जो उज्वल है भीतर, ऊपर उज्वल सोय । अंतर कपट मलीनता, ऊपर और न होय ॥ जौन भाव भीतर बसै, ऊपर बरतै सोय । ( भीतर और न देखिये, ऊपर और न होय ) ॥ जौन चाल संसारकी, तौन संतको नाहि । डीभि चालु करनी करे, संत कही नहिं ताहि ॥ साधु सती औ शूरमा, ज्ञानी औ गजदंत । एतौ निकसि न बहुरे, जो युगजायै अनंत ॥ साधु चाल जो जानिहै, साधु कहावैं सोय । बिन साधै साधू नहीं, साधु कहांति होय ॥

श्वसगुञ्जार

( १०५ )

साधु कहावन कठिन है, ज्यों खांडेकी धार । डगमग है तौ कटि परै, गहै तो उतरे पार ॥ साधू सोई जानिये, जो चले साधुकी चाल । परमारथ लागा रहै, बोले बचन रसाल ॥ संगति करिये साधुकी, हरै सकल तन व्याधि । नीची संगति असाधुकी, आठों पहर उपाधि ॥ निश वासर साधु मिलै, मिटै विषम तन पीर । तासु नेह नहिं छोंडिहौं, सदा सुफल तनथीर ॥ साधुनसों संगति करै, जागत सोवत हाल । तासु संगमै ऐ वरहों, ज्यों कर सदा रुमाल ॥ जाके हृदये सत्यहो, सोई सुकृतके साथ । साधु २ सोहावे ताहि, खोजि लेह नगमनीमाथ ॥ साधु न संकट सों परै अगमन हमही होय । दुर्जन मारि बहाइहैं, पला न पकरै कोय ॥ तन मन शीतल शब्दपर, बोलत बचन रसाल । कहै कबीर तेहि दासको, गांजि सकै ना काल ॥ ररा काग विष बोकरा, कूकर नाग मञ्जार । नाहर विषधर दूत, भूत वट औ पार ॥ सब कह बाधी कबीर, आन घाट बाटलै डार । बाट घाट बन औघट, मोहिं खसमकी आश ॥ मते चलौं कबीरके, कबहि न होय बिनाश । भागे यमदूत भूत यम, काल न तिनुका टूट ॥ हंस चले हैं लोक कहैं, काल रहा शिर कूट ॥ चौपाई

धर्मदास सुनो शब्द सन्देश । जाहि देहु ताहि मिटै अन्देशा ॥ जाके घट तुम्हरी सहिदानी । तहाँ प्रगट हम तुमहि समानी ॥

( १०६ )

बोधसागर

जो कोई लेह तुम्हारो नावा । ताके शिर मह मन्दिर छावा ॥ सन्त दसाधरि पन्थ चलावहु । छापा तिलक कंठी पहिरावहु ॥ वैरागी वैराग्य पढावहु । गृहि बासी रहनी समझायहु ॥ वैरागी उन मुनि घर करई । हर्ष शोक कछु चित नहिं धरई ॥ रूखा सूखा करै अहारा । निशदिनरविशशिस्मूरहि सुधारा ॥ विकशित बदन भजनके आगर । शीतल सदा प्रेम सुखसागर ॥ वैरागी आसन आरंभै । माला तिलक सुमिरिनि थंभै ॥ पश्चिम लहरि जो गावै जानी । अजपा जाप जपै सहिदानी ॥ रहिता रहै बहै नहिं कबही । सो वैरागी पावै हमही ॥ हमै पाय हमही अस होई । आवा गौन मिटावै सोई ॥ आवा गौन मिटावै काया । सदा अधीन रहै तत्त्व समाया ॥ काया धरि काया कह बोधै । आवा गौन रहित घर शोधै ॥ जीवत मरै मरै पुनि जीवै । उनमनि बसै महारस पीवै ॥ महा शून्य मां रहे समाई । मरै न जीवै आवै न जाई ॥ ऐसी विधि वैरागी सोई । हममिलि रहे हमहि असहोई ॥ गृही होइकै रहै उदासा । शब्द कमाइ शब्द विश्वासा ॥ गृही दगा कोटि जो पाई । कहै कबीर भक्ति बतलाई ॥ गृही भाव भक्ती जो साथै । सन्त साधु सेवा आराधै ॥ घर तजि बाहर कबहि न जाई । गुरु नाम भक्ति करै लौलाई ॥ भक्ति करै निर्भय सहिदानी । गुरु औ साधु एककरि जानी ॥ जहाँ साधु तहाँ सतगुरु वासा । जहाँ सतगुरु तहाँ मुक्ति निवासा ॥ जहाँ मुक्ति तहाँ लोक उजागर । जहाँ लोक तहाँ रहै सुखसागर ॥ जहाँ सुख सागर तहाँ कबीरा । भक्ति मध्य बाहर औ तीरा ॥ जहाँ मध्य तहाँ पुरुष अमान । जहाँ बाहे तहाँ हंस सुजान ॥ जहाँ तीर तहाँ निर्मल धीर । जरा मरण नहिं न्यापै पीर ॥

शवासगुञ्जार

( १०७ )

जहां पीर तहां संशय धीर । संशय मध्य असंशय नीर ॥ जहां नीर तहां सुख संतोषा । जरा मरण नहीं ब्यापै धोखा ॥ जहां धोख तहां आवै धीर । जहां धीर तहां गहिर गम्भीर ॥ जहां गँभीर तहां थिर होई । जहां थिर तहां लहरि न सोई ॥ लहरि नाहिं तहां आपै होई । आपा मेटि होई रहै समोई ॥ ममता मोह लहरि तजि जोई । भाव भक्तिके मानुष गोई ॥ मनसा गहै होय निर्वाना । पावै सत्य सही अस्थाना ॥ नातरु फिरि आवै संसारा ।

संसार आइके भक्ति कमाई । भक्ति कमाइके भक्ति कहाई ॥ भक्ति कहाइके रहै उदासा । सतगुरु मिले सत्य विश्वासा ॥ सतगुरुते दूसरे गुरु नाही । आवा गौन रहित घर जाही ॥ सतगुरु मिलै तो संशय भागे । संशय बहुरि अङ्ग नहीं लागे ॥ सतगुरु सुख संतोषके नायक । परमारथ सो सदा सहायक ॥

समय-साधु बडे परमारथी, घन ज्यों वरवै आय ।

तत बुझावै आनकी, आपनो आपन लाय ॥

जैसे वृक्ष न फल भखै, नदी न अँचवै नीर ।

त्यों परमारथ कारने, संतन धरो शरीर ॥

सन्त सराहिये ताहिको, जाके सतगुरु टेक ।

टेक निबाहै देह भरि, रहै शब्द मिलि एक ॥

सत्यशब्द हितमानिकै, सुमिरि सतगुरु धीर ।

धर्मदास तुव वंशके, एके गुरु कबीर ॥

चौपाई

सत्य सुकृत सुमिरै चित माही । टूटत वज्र राखि लेउ राही ॥

समय-सत्य सुकृतके बाल कह, जो चितवे कर दीठ ।

ताजन लगै चौहटै, गुनहगारके पीठ ॥

( १०८ )

बोधसागर

जिह्वा कहौ तो जग तरे, प्रकट कह्यो न जाय । गुप्त प्रवाना लेहु हो धर्मनि, राखो शीश चढाय॥ हँसा तुम मतडरपौ कालसों कर मेरि परतीत । सत्य लोक पहुँचाइहौं, चलिहों भवजल जीत ॥ इति ग्रंथ उदय टकसार, श्वास गुंजार सम्पूर्ण । जो देखा सो लिखा, मम दोष न दीजिए ॥

भूल चूक अक्षर लेव सुधारी ॥ समय नाम गोसाँई साहेब लक्ष्मणदासजीको कोटि कोटि दण्डवत् सब संतन महंतनको कोटि कोटि दण्डवत् । मोकाम गोरखपूर महछा काजीपूर छोटा लीखा भवानी बकस सब संतनके किंकर ॥ असल पुस्तकानुसार नकल किया ।

इति श्वासगुञ्जार संपूर्ण


श्रीबोधसागरे—

आगमनिगमबोध

भारतपथिक कबीरपंथी

स्वामी श्रीयुगलानन्दद्वारा संगृहीत

मुद्रक व प्रकाशक—

गंगाविष्णु श्रीकृष्णदास,

अध्यक्ष—“लक्ष्मीवेङ्कटेश्वर” स्टीम्-प्रेस,

कल्याण-बम्बई.


पुनर्मुद्रणादि सर्वाधिकार ‘श्रीवेंकटेश्वर’ मुद्रणयन्त्रालयाध्यक्षाधीन है

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सत्यनाम

श्री कबीर साहिब