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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

अनुरागसागर

( ९९ )

धर्मराय वचन

कहे धर्म कस मोहिं दुखावहु । भन्छ हमार लोक पहुँचावहु॥ तीनों युग गवने संसारा । भवसागर तुम मोर उजारा॥ हारी वचन पुरुष मोहि दीन्हा । तुम कस जीव छुड़ावन लीन्हा॥ और बंधु जो आवत कोई । छिनमहैं ताकहैं खाँव विलोई॥ तुमते कछु न मोर बसाई । तुम्हरे बल हंसा घर जाई ॥ अब तुम फेर जाहु सगमाहीं । शब्द तुम्हार सुनै कोउ नाहीं॥ करम भरम मम असकै ठाटा । ताते कोई न पावै वाटा ॥ घर घर भरम भूत उपजावा । धोखा दे दे जीव नचावा ॥ भरत भूत है सब कहैं लागे । तोहि चिन्है ताकहैं भ्रम भागे ॥ मद्य मांस खावै नर लोई । सर्व मांस प्रिय नरको होई ॥ आपन पंथ मैं कीन परगासा । मांम मद्य सब मानुष त्रासा ॥ चण्डी जोगिन भूत पुजाओं । यही भ्रम है जग जहै माडाओं॥ बांधि बहुफंदहिं फन्द फन्दाओ । अंतकाल कर सुधि बिसराओ॥ तुम्हरी भक्ति कठिन है भाई । कोई न मनिहैं कहौं बुझाई ॥

ज्ञानी वचन

धर्मरायते बड़ छल कीन्हा । छल तुम्हार सकलो हम चीन्हा॥ पुरुष वचन दूसर नहिं होई । ताते तुम जीवन कहैं खोई ॥ पुरुष मोहि जो आज्ञा देही । तो सब होय नाम सनेही ॥ ताते सहजहिं जीव चेताऊँ । अंकुरी जीव सकल मुकताऊँ॥ कोटि फन्द जो तुम रचिराखा । वेद शास्त्र निज महिमा भाखा ॥ प्रकट कला जो धरि जग जाऊँ । तो सब जीवनको मुकताऊँ ॥ जो अस करौं वचन तब डोलै । वचन अखंड अड़ोल अमोलै॥ जो जियरा अंकुरी शुभ होई । शब्द हमार मानि है सोई ॥ अंकुरी जीव सकल मुकताओं । फन्दा काटि लोक लैजाओं ॥ काटि भरम जो देहौं ताही । भरम तुम्हार मानि हैं नाहीं ॥

धर्मरायका बाट रोकना और कबीर साहबका उसे परास्त कर आगे बढ़ना

( १०० )

अनुरागसागर

छन्द

सत्य शब्द दिदाय सबहीं, भ्रम तोरि सब डारिहौं ॥ छलतोर सब चिन्हाइ तवहीं, नामबल जियतारिहौं ॥ मनवचनसत्य जो मोहि चीन्ही, एकतत्त्वलौं लाइहौं ॥ तवसीस तुम्हारे पांव देहीं, अमललोक जिव आइहै ६८ सो ०-मर्दहि तोरा मान, सूरग हंस सुजान कोइ ॥ सत्यशब्द सहिदान, चीन्हहि हंसहरषअती ॥७२॥

धर्मराय वचन

कहै धर्म जीवन सुखदाई । बात एक सुहि कहो बुझाई ॥ जो जिव रहे तुम्हैं लौं आई । ताके निकट काल नहिं जाई ॥ दूत हमार ताहि नहिं पावै । मूर्छित दूत मोहि पहीं आवै ॥ यह नहिं बूझ परी मोहिं भाई । तौन भेद मोहिं कहो बुझाई ॥

ज्ञानीवचन

सुनहु धर्म जो पूछेहु मोही । सो सब हाल कहो मैं तोहीं ॥ सुन धर्म तुम सत सहिदानी । सोतोसत्य शब्द आहि निर्वानी ॥ पुरुष नाम है गुप्त परमाना । प्रकट नामसत हंस बखाना ॥ नाम हमार हंस जो गहई । भवसागर सो सो निरबहई ॥ दूत तुम्हार होय बल थोरा । जब मम हंस नाम ले मोरा ॥

धर्मराय वचन

कहै धर्म सुनु अन्तर्यामी । कृपा करो अब मोपर स्वामी ॥ यहि युग कौन नाम तुव होई । सो जनि मोपर राखहु गोई ॥ वीरा अंक गुप्त गन आऊ । ध्यान अंग सब मोहि बताऊ ॥ केहि कारण तुम जाहु संसारा । सोइ कहहु मोहि भेद गुन न्यारा ॥ हमहूँ जीवन शब्द चेतायब । पुरुषलोक कहैं जीव पठायब ॥ मोहिं दास आपन कर लीजै । शब्द सार प्रभु मोकहैं दीजै ॥

निरंजनका कबीर साहबसे नामभेद पूछना

अनुरागसागर

( १०१ )

ज्ञानी वचन

सुनहु धर्म तुम कस छल करहु । प्रगट सुदास गुप्त छल धरहु ॥ गुप्त भेद नहिं देहौं तोहीं । पुरुष अवाज कही नहिं मोहीं ॥ नाम कबीर मोर कलिमाहीं । कबीर कहत यम निकट न जाहीं

धर्मराय वचन

कहे धर्म तुम मोहिं डुरै हो । खेल एक पुन हमहु खेलै हो ॥ ऐसी छल बुधि करब बनाई । हंस अनेक लेव संग लाई ॥ तुम्हार नाम ले पंथ चलायब । यहि विधि जीवन धोख दिखायब

ज्ञानी वचन

अरे काल तू प्ररुष द्रोही । छलमति कहा सुनावसि मोही ॥ जो जिव होई है शब्द सनेही । छल तुम्हार नहिं लागै तेही ॥ जौहरी हंस लेहिं पहिचानी । परखि हैं ज्ञान ग्रंथ मम वानी ॥ जेहि जीव मैं थापब जाई । छल तुम्हार तेहि देव चिन्हाई ॥

कबीर वचन धर्मदासप्रति

यहि सुनत धर्मराय गहु मौना । है अन्तर्धान गयो निज भौना ॥ धर्मनि कठिन काल गति नन्दा । छल बुध कै जीवन कहैं फन्द्रा ॥

धर्मदास वचन

कह धर्मनि प्रभु मोहि सुनाओ । आगल चरित्र कहि समझाओ ॥

जगन्नाथ मंदिरकी स्थापनाका वृत्तान्त

कबीर वचन धर्मदासप्रति

राजा इन्द्रदमन तेहि काला । देश उड़ेसेको महिपाला ॥

सदगुरु वचन

राजा इन्द्रदमन तहैं रहई । मंडप काज युगति सो कहई ॥ कृष्ण देह छांड़ी पुनि जबही । इन्द्रदमन सपना भा तबही ॥ स्वप्नेमें हरि अस ताहि बताई । मेरो मंदिर देहु उठाई ॥ मोकहैं स्थापन कर राजा । तोपह मैं आयउ यहि काजा ॥

( १०२ )

अनुरागसागर

राजा यहि विधि सपना पाई । ततक्षण मंडप काम लगाई॥ मंडप उठा पूर्ण भा कामा । उदधि आय बोरा तेहि ठामा॥ पुनि जब मंदिर लाग उठावा । क्रोधवंत सागर तब धावा ॥ क्षणमें धाय सकल सो बोरे । जगन्नाथको मंदिर तोरे ॥ मंडप सो षट बार बनायी । उदधि दौर तिहिं लेत डुबायी॥ हारा नृप करि यतन उपायी । हरिमंदिर तहैं उठे न भाई ॥ मंदिरकी यह दशा विचारी । वर पूरब मन माहिं सम्हारी॥ हम सन काल मांग अन्याई । बाचा बन्ध तहाँ हम जाई॥ आसन उदधि तीर हम कीन्हा । काहू जीव न मोही चीन्हा ॥ पीछे उदधि तीर हम आई । चौरा तहैं बनायउ जाई ॥ इन्द्रदमन तब सपना पावा । जहो राय तुम काम लगावा॥ मंडप शंक न राखो राजा । इहवाँ हम आये यहि काजा॥ जाहु बेगि जनि लावहु बारा । निश्चय मानहु वचन हमारा॥ राजा मंडप काम लगायो । मंडप देखि उदधि चल आयो॥ सागर लहर उठी तिहि बारा । आवत लहर क्रोधचित धारा॥ उदधि उमंग क्रोध अति आवे । पुरुषोत्तम पुर रहम ना पावे॥ उमंगेउ लहर अकाशे जायी । उदधि आय चौरा नियरायी॥ दरश हमार उदधि जब पाई । अति भय मान रहो ठहराई॥

छन्द

रूप धारयो विप्रको तब, उदधि हमपहैं आइया ॥ चरण गहिके माथ नायो, सर्म हम नहिं पाइया ॥

उदधि वचन

जगन्नाथ हम भोर स्वामी, ताहि ते हम आइया ॥ अपराध मेरो क्षमा कीजे, भेद अब हम पाइया ॥ ६९ ॥

अनुरागसागर

( १०३ )

सो०-तुम प्रभु दीनदयाल, रघुपति बोइल दिवाइये। वचन करो प्रतिपाल कर जोरै विनती करो ॥७३॥ कीन्हेउ गवन लंक रघुबीरा । उदधि बाँध उतरे रणधीरा ॥ जो कोइ करै जोरावरि आयी । अलखनिरंजन बोइल दिखाई ॥ मोपर दया करहु तुम स्वामी । लेउ ओइल सुनु अन्तरयामी ॥

कबीर वचन

ओइल तुम्हार उदधि हम चीन्हा । बोरहु नगर द्वारका दीन्हा ॥ यह सुनि उदधि धरे तब पाई । चरण टेकिके चले हरषाई ॥ उदधि उमङ्ग लहर तब धायी । बोरचो नगर द्वारका जाई ॥ मण्डप काम पूर तब भयऊ । हरिको थापन तहवाँ कियऊ ॥ तब हरि पण्डन स्वपन जनावा । दासकबीर मोहिपहँ आवा ॥ आसन सागर तीर बनायी । उदधि उमङ्ग नीरतहँ आयी ॥ दरश कबीर उदधि हट जाई । यहि विधि मण्डप मोर बचाई ॥ पण्डा उदधि तीर चलि आये । करि अस्नान मंडप चलि आये ॥ पण्डन अस पासंड लगायी । प्रथम दरश मछेच्छ दिखायी ॥ हरिके दर्शन मैं नहिं पावा । प्रथमहि हम चौरालग आवा ॥ तब हम कौतुक एक बनाये । कहाँ वचन नहिं राखु छिपाये ॥ मंडप पूजन जब पण्डा गयऊ । तहँवा एक चरित अस भयऊ ॥ जहँ लग मूरति मण्डप माहीं । भये कबीर रूप धर ताहीं ॥ हर मूरति कहँ पण्डा देखा । भये कबीर रूप धर भेखा ॥ अक्षत पुहुप ले विप्र भुलाई । नहिं ठाकुर कहँ पूजहुँ भाई ॥ देखि चरित्र विप्र सिर नाया । हे स्वामी तुम मर्म न पाया ॥

पण्डा वचन

हम तुम काहि नहीं मनलाया । ताते मोहि चरित्र दिखाया ॥ क्षमा अपराध करो प्रभु मोरा । विनती करो दोइ करजोरा ॥

जगन्नाथकी स्थापना का वृत्तांत

( १०४ )

अनुरागसागर

कबीर वचन । छन्द

वचन एक मैं कहों तोसों, विप्र सुनु तू कान दे ॥ पूज ठाकुर दीन्ह आयसु, भाव दुविधा छोड दे ॥ भ्रम भोजन करे जो जिव, अंगहीन हो ताहिको॥ करे भोजन छूत राखे, सीस उठटे ताहिको ॥७०॥ सोरठा-चौराकरिव्यवहार, भ्रमाविमोचनज्ञानहृद ॥ तहाँते कियो पसार, धर्मदास सुनु कानदे ॥७१॥

धर्मदास वचन

धर्मदास कहे सतगुरु पूरा । तुम प्रसाद भयो दुख दूरा ॥ जेहि विधि हरि कहँ थापउ जाई । सो साहिब सब मोहिँ सुनाई ॥ ता पीछे कहवों तुम गयऊ । कौन जीव कैसे सुकतयऊ ॥ कलयुगकेर कहो परभाऊ । और हंस परमोषेउ काऊ ॥ सो माहि वरणि कहो गुरुदेवा । कौन जीव कीन्ही तुम सेवा ॥

कबीर वचन

धर्मदास तुम बूझहु भेदा । सो सब हमसों कहो निषेदा ॥

चार गुरुकी स्थापनाका वृत्तांत

सुनहु सन्त यह ज्ञान अनुषा । गज थलदेस परमोध्यो भूषा ॥

रायबंकेजी

रायबंकेज नाम तेही आही । दीनेउ सार शब्द पुनि ताही ॥ कीन्ह्यो ताहि जीवन कडिहारा । सो जीवनका करै उबारा ॥

सहतेजी

शिलमिली दीप तहाँ चलि आये । सहतेजी एकसन्त चिताये ॥ ताहुको कडिहारी दीन्हा । जब उन मोकहँ निजकर चीन्हा ॥

१ किसी ग्रन्थमें यह चौपाई ऐसे लिखी है— सुनो संत यह कथा अनुषा । गज अस्थल परमोध्यो भूषा ॥

जगुजी

अनुरागसागर

( १०६ )

चतुरभुज

तहाँते चलि आये धर्मदासा । राय चतुरभुजपति जहँ वासा ॥ ताकर देश आहि दरभङ्गा । परखिसि मोहि सतपर संगा ॥ देखि अधीन ताहि समझावा । ज्ञान भक्ति विधि ताहि हद्दावा ॥ हद्दाता देखि ताहि पुनि थापा । मिला मोहि छाडि भ्रम आपा ॥ मायामोह न तनिको कीन्हा । अमर नाम तब ताही दीन्हा ॥ ताहूँ कहँ कडिहारी दीन्हा । चतुरभुजशब्द हेत करि लीन्हा ॥

छन्द

हँस निरमल ज्ञान रहनी, गहनी नाम उजागरा ॥ कुल कानि सबै बिसारि विषया, जौहरी गुण नागरा ॥ चतुरभुज बंकेज औ सहतेज, तुम चौथ सही ॥ चारिहँ कडिहार जिवके, गिरानिश्चल हम कही ७१ ॥ सो०-जम्बुदीपके जीव, तुम्हरी बाँह मोकहँ मिला ॥ गहे वचन दृढ पीव, ताहि काल पावे नहीं ॥ ७५ ॥

धर्मदास वचन

धन सत गुरु तुम मोहिं चेतावा । काल फंदसे मोहिं मुक्तावा ॥ मैं क्रिकर तुम दासके दासा । लीन्हों मोरि काटि जमफांसा ॥ मोते चित अतिहरष समाना । तव गुण मोहिं न जाय बखाना ॥ भागी जीव शब्द तुव माना । पूरण भाग जो तुव व्रत ठाना ॥ मैं अघकर्मि कुटिल कठोरा । रहेउँ अचेत भ्रम जिव मोरा ॥ कहा जानि तुम मोहिं जगाये । कौने तप हम दशन पाये ॥ सो समुझाय कहो जियमूला । रबि तब गिरा कमल मनफूला ॥

धर्मदासके पिछले जन्मोंकी कथा कबीर वचन

इच्छा कर जो पूछा मोही । अब मैं गोइ न राखौं तोही ॥ धर्मनि सुनहु पाछली बाता । तोहि समझाय कहों विख्याता ॥

धर्मदासके पिछले जन्मकी कथा

( १०६ )

अनुरागसागर

सन्त सुदर्शन द्वापर भयञ् । तासुकथा तोहि प्रथम सुनयञ् ॥ तेहि ले गयो देशनिज जबहीं । विनती बहुत कीन तिन तबहीं ॥

सुपच वचन

कहे सुपच सतगुरु सुनलीजै । हमरे मात पिता गति दीजै ॥ बन्दी छोड़ करो प्रभु जाई । यमके देश बहुत दुख पाई ॥ मैं बहु भांति पिता समुझावा । मातु पिता परतीति न पावा ॥ बालकवत नहिं ज्ञान सिखावा । भक्ति करत नहिं मोहि डरावा ॥ भक्ति तुम्हारी करन जब लागे । कबहुँ न द्रोह कीन्ह मम आगे ॥ अधिक हर्ष ताही चित होई । ताते विनती करौ प्रभु सोई ॥ आनहु तेहि सत शब्द दृढ़ाई । बन्दीछोर जीव सुकताई ॥

कबीर वचन धर्मदासप्रति

विनती बहुत संत जब कीन्हा । ताकर वचन मान हम लीन्हा ॥ ताकर विनय बहुरि जग आवा । कलियुग नाम कबीर कहावा ॥ हम इक वचन निरंजन हारा । वाचा बंध उदनि पगु धारा ॥ और दीप हंसन उपदेशा । जम्बुदीप पुनि कीन प्रवेशा ॥ सन्त सुदर्शनके पितु माता । लक्ष्मी नर हर नाम सुहाता ॥ सुपच देह छोड़ी तिन भाई । मानुष जन्म धरे तिन आई ॥

सुपच सुदर्शन माता पिताके पहला जन्म कुलपति और महेश्वरीकी कथा

सन्त सुदर्शन केर प्रतापा । मानुष देह विप्रके छापा । दोनों जन्म होय तब लीन्हा । पुनि विधि मिलै ताहि कहँ दीन्हा ॥ कुलपति नाम विप्रकर कहिया । नारि नाम महेसरि रहिया ॥ बहुत अधीन पुत्र हित नारी । करि अस्नान सुर्यव्रत धारी ॥ अञ्जल ले विनवै कर जोरी । रुदन करे चित सुत कह दौरी ॥ तत्क्षण हम अञ्जल पर आवा । हम कहँ देखि नारि हरषावा ॥ बाल रूप धरि भेंटयो बोही । विप्र नारि गृह ले गइ मोही ॥

चन्दन साहूकी कथा

अनुरागसागर

( १०७ )

कहै नारि कृपा प्रभु कीन्हा । सूर्य व्रत करफल यह दीन्हा॥ बहुत दिवसलग तहाँ रहाये । नारि पुरुष मिल सेवा लाये॥ रहे दरिद्रते दुखी अपारा । हम मनमहँ असकीन विचारा॥ प्रथमहि दरिद्रता इनकर टारों। पुनिभक्तिमुक्तिकरवचनउचारों॥ जब हम पलना झटक झकोरा । मिलत सुवर्ण ताहि इकतोरा॥ नितप्रति सोन मिलै इक तोला । ताते भये वह सुखी अमोला॥ पुनि हम सत्य शब्द गोहराई । बहुप्रकारसे उनहि समुझाई॥ ता हृदये नहिं शब्द समायी । बालक ज्ञान प्रतीत न आई॥ ताहि देह चीन्हेसि नहिं मोहीं । भयोगुप्त तहँ तन तजि वोहीं॥

सुपच सुदर्शनके पिता माताके दूसरे जन्ममें चन्दसाहु और ऊदाकी कथा

नारि द्विज दोई तन त्यागा । दरश प्रभाव मनुजतनु जागा॥ पुनि दोनों भये अंशु मिलाऊ । रहहि नगर चन्द वारे नाऊ॥ ऊदा नाम नारी कहँ भयऊ । पुरुष नाम चन्दन धरि गयऊ॥ परसोतमते हम चलि आये । तब चन्दवारा जाइ पगटाये॥ बालक रूप कीन्ह तेहि ठामा । कीन्हेउताल माहि विश्रामा॥ कमल पत्र पर आसन लाई । आठ पहर हम तहाँ रहाई॥ पीछे ऊदा अस्नानहि आयी । सुन्दर बालक देखि लुभाई॥ दरश दियोदेहि शिशुतनधारी । लेगई बालक निज घर नारी॥ ले बालक गृह अपने आई । चन्दन साहु अस कहा सुनाई॥

चन्दनसाहु वचन

कहु नारी बालक कहँ पायी । कौने विधिते इहँवा लायी ॥ ऊदावचन

कह ऊदा जल बालक पावा । सुन्दर देखि मोर मन भावा॥ चन्दनसाहुवचन

कह चन्दनते मूरख नारी । वेगि जाहु दै बालक डारी ॥ जाति कुटुम्बहँसिहँ सब लोगा । हँसत लोग उपजे तन सोगा॥

नीमा नीरुका वृत्तांत

( १०८ )

अनुरागसागर

कबीरवचन धर्मदास प्रति

ऊदा त्रास पुरुष कर माना । चन्दन साहु जवै रिसियाना॥

चन्दनस हुवचन धर्मदास प्रति

बालक चेरी लेहु उठाई । लै बालक जल नेहु खसाई॥

कबीर वचन धर्मदास प्रति

चल चेरी बालक कहैं लीन्हा । जलमहँडारनताहिचितदीन्हा॥

चलिभइ मोहि पवारन जवहीं । अन्तरधान भयो मैं तवहीं ॥

भयउ गुप्त तेहि करसे भाई । रुदन करे दोनों बिलखाई ॥

बिकल होय मन दूदत डोलै । मुग्धज्ञान कछु मुखनहिं बोलै॥

सुपच सुदर्शनके माता पिता तीसरे जन्ममें नीमा हुए

यहिविधिबहुतदिवसचलिगयऊ।तजितनजन्मबहुरितिनपयऊ

मानुष तन जुलहा कुल दीन्हा । दोउ संयोग बहुरिविधि कीन्हा॥

काशी नगर रहे पुनि सोई । नीरू नाम जुलहा होई ॥

नारि गवन लावे मग सोई । जेठमास बरसाइत होई ॥

नारि लिवाय आय मगमाहीं । जलअचवन गहबनिताहीं ॥

ताल नाहिं पुरइन पनवारा । शिशु होय मैं तहैं पगुधारा ॥

तहाँ जस बालकै रहैं पौढाई । करौं कुतूहल बाल स्वभाई ॥

नीमा दृष्टि परी तिहि ठाऊ । देखत दर्श भयो अति चाऊ॥

जिमिरविदरशपडुमबिगसाना । धाय गयो धन रंक समाना॥

धाय गही कर लिया उठायी । बालक लै नीरूपहैं आयी ॥

जुलहा रोष कीन्ह तेहि वारी । बेगि देहु तुम बालक डारी॥

हर्ष गुनावन नारी लाई । तब हम तासो वचन सुनाई॥

१ बरसाइत बटसावित्रीका अपभ्रंश है । यह बटसावित्री व्रत ज्येष्ठ शुद्धपूर्णिमासीको होता है इसकी विस्तारपूर्वक कथा महाभारतमें है । उसी दिन कबीर साहब नीमा और नूरीको मिले थे इस कारणसे कबीर पंथियोंमें बरसाइत महात्म पंथकी कथा प्रचलित है । और उस दिन कबीरपंथी लोग बहुत उत्सव मनाते हैं

रतनाकी कथा

अनुरागसागर

( १०९ )

छन्द

सुनहु वचन हमारे नीमा, तोहि कहहु समझायके ॥ प्रीत पिछली कारणे तुहि, दरस दीन्हो आयके ॥ आपने गृह मोहि लै चलु, चीन्हिके जो गुरु करो ॥ देऊँ नाम दृढाय तो कहै, फन्द यमके नापरो ॥७२॥ सो०-सुनत वचन अस नारि, नीरूत्रास न राखेउ ॥ लै गइ गेह मैझार, काशि नगर तब पहुँचेउ ॥७६॥ नारी न मान त्रास तेहि केरा । रंक धनद सम लै चलि डेरा ॥ जोलहा देखि नारि लौलीना । लेइ चलो अस आयसु दीना ॥ दिवस अनेक रहे तेहि ठाई । कैसहु तेहि परतीत न आई ॥ बहुत दिवस तेहि भवन रहावा । बालक जान न शब्द समावा ॥

सुपुत्र सुदर्शनके माता पिताका बोथे जन्ममें मथुरामें

प्रगट होकर सत्यलोक जाना

त्रिन परतीत काजा नहि होई । दृढ कै गहहु परतीत विलोई ॥ ताहि देह पुनि मोहि न चीन्हा । जानि पुत्र मोहि संग न कीन्हा ॥ तजि सो देह बहुरि जो भाई । देह धरी सो देहुँ चिन्हाई ॥ जुलहाकी तब अवधि सिरानी । मथुरा देह धरी तिन आनी ॥ हम तहैं जाय दरश तिन दीन्हा । शब्द हमारा मानसों लीन्हा ॥ रतना भक्ति करे चितलाई । नारि पुरुष परवाना पाई ॥ ता कहै दीन्हेउ लोक निवासा । अंकुरी पठये निज दासा ॥ पुरुष चरण भेटे उरलाई । शोभा देह हंसकर पाई ॥ देखत हंस पुरुष हरषाने । सुकृति अंश कही मन माने ॥ बहुत दिवस लगि लोक रहाये । तब लगि काल जीव संताये ॥ जीवनहुः स्वअतिशय भयो भाई । तबही पुरुष सुकृत हंकराई ॥

मुकुत अंशको पृथ्वीपर भेजनेका वृत्तांत

( ११० )

अनुरागसागर

आज्ञा कीन्हा जाहु संसारा । काल अपार बल जीव दुखारा॥ लोक संदेशा ताहि सुनाओ । देह नाम जीवन मुकताओ॥ आज्ञा सुनत सुकृत हरषाये । तुरतहिं लोक पयाना आये॥ सुकृत देखि काल हरषाई । इन कहैं तो हम लेब फँसाई॥ करि उपाय बहुत तब काला । सुकृत फँसाय जलमहैं डाला॥ बहुत दिवस गयो जब बीता । एकहु जीव न कालहिं जीता॥ जीव पुकार सतलोक सुनाये । तबहीं पुरुष मोकहैं हँकराये॥

कबीरसाहबका धर्मदासजीको चितानके लिये लोकसे पृथ्वीपर

आना पुरुष वचन

पुरुष अवाज उठी तिहि बारा । ज्ञानी वेगि जाहु संसारा ॥ जीवन काज अंश पठवायी । सुकृत अंश जग प्रगटे जायी॥ दीन्ह आज्ञा तेहिको भाई । शब्द भेद वाही समझाई ॥ लावहु जीवन नाम अधारा । जीवन खेइ उतारो पारा ॥ सुनत आज्ञा वहि कीन पयाना । बहुरि न आये देश अमाना ॥ सुकृत भवसागर चलि गयऊ । काल जालते सुधि बिसरयऊ ॥ तिन कहैं जाय चितावहु ज्ञानी । जेहि ते पंथ चले निरवानी ॥ वंस व्यालिस अंस हमारा । सुकृत गृह लैहैं औतारा ॥ ज्ञानी वेगि जाहु तुम अंसा । अब सुकृत अंसकर मेटहु फँसा ॥

कबीर वचन

चलेहु हम तव सीस नवाई । धर्मदास अब तुम लग आई॥ धर्मदास तुम नीरु औतारा । आमिन नीम प्रगट बिचारा ॥ तुम तो आहू प्रिय मम अंसा । जाकारन हम कीन्हा बहुसंसा ॥ पुरुषहि आज्ञा तुमरे ढिग आये । पिछली हेतु पुनि याद कराये ॥ यहि संयोग हम दर्शन दीन्हा । धर्मनि अबकी तुम मोहि चीन्हा ॥ पुरुष अवाज कहू तुम पासा । चीन्हेहु शब्द गहो विश्वासा ॥ धाय परे चरणन धर्मदासा । नैन बारि भर प्रगट प्रगासा ॥

मुकुत अंश (धर्मदास) को चितानेके लिये कबीरसाहबका पृथ्वीपर आना

अनुरागसागर

( १११ )

धरहि न धीरज बहुत संतोषा । तुम साहिब मेढहु जिवधोखा॥ धरे न धीरज बहुत प्रबोधे । बिछुरिजननिजिमिमिल्यो अबोधे युग पग गहे सीस भुई लाये । निपट अधीरन उठत उठाये ॥ बिलखत बदन वचन नहीं बोले । सुरति चरणते नेक न डोले ॥ निरखत बदन बहुरोपदगहहीं । गदगद हृदय गिरा नहिं कहहीं॥ बिलखत बदन स्वास नहिं डोले । उनसुनिदशा पलक नहिं खोले॥

धर्मराज वचन

बहुरि चरण गहि रोवहिं भारी । धन्य प्रभु मोहितारनतनधारी॥ धरि धीरज तब बोले सम्हारी । मोकहैं प्रभु तारन पगधारी ॥ अब प्रभु दया करहु यहि मोही । एकौ पल ना विसरों तोही ॥ निशिदिन रहों चरण तुम साथ । यह बर दीजै करहु सनाथा ॥

कबीर वचन

धर्मदास निह संशय रहहु । प्रेम प्रतीति नाम दिढ़ गहहु ॥ चीन्हेउ मोहि तोर भ्रम भागा । रहै सदा तुम दृढ़ अनुरागा॥ मन बचकर्म जाहि जो गहई । सो तेहि तज अंत कस रहई॥ आपन चाल बिना दुख पावे । मिथ्या दोष गुरु कहैं लावे॥ पंथ सुपंथ गुरु समझावे । शिष्य अचेतन हृदय समावे॥ तुम तो अंश हमारे आहु । बहुतक जीव लोक ले जाहु ॥ चार माहि तुम अधिक पियारे । किहि कारण तुम शोचविचारे॥ हम तुमसों कछु अन्तर नाही । परक शब्द देखो हियमाहीं ॥ मन बच कर्म मोहि लौ लावे । हृदये बुतिया भाव न आवे॥ तुम्हरे घट हम वासा कीन्हा । निश्चय हम आपन कर लीन्हा ॥

छन्द

आपनो कर लीन्ह धर्मनि, रहो निःसंशय हिये ॥ करहु जीव उबार दृढ़ है, नाम अविचल तुहि दिये ॥

( ११२ )

अनुरागसागर

मुक्ति कारण शब्द धारण पुरुष सुमिरण सारहो ॥ सुरति बीरा अंकधीरा जीविका निस्तार हो ॥७६॥ सो०-तुमतौ हौ धर्मदास, जंबुदीप कड़िहार जिव ॥ पावे लोक निवास, तुहि समेत सुमिरे मुझे ॥७७॥

धर्मदास वचन

धन सतगुरु धन तुम्हरी वानी। मुहि अपनाय दीन्ह गनि आनी ॥ मोहि आय तुम लीन्ह जगायी । धन्य भाग्य हम दर्शन पायी ॥ धन साहब मुनि शाप न कीन्हा । मम शिर चरण सरोरुह दीन्हा ॥ मैं आपन दिन शुभ करि जाना । तुम्हरे दरश मोक्ष परमाना ॥ अब अस दया करहु दुख भंजन । कबहुँ मोहि न धरे निरंजन ॥ काल जाल जौनी बिधि छूटे । यमबंधन जौनी बिधि टूटे ॥ सोई उपाय प्रभु अब कीजे । सार शब्द बताय मोहि दीजे ॥

कबीर वचन

धर्मदास तुम सुकृत अंशा । लेह पान अब मेटहु संशा ॥ धर्मदास आपन करि लेऊँ । चौका करि परवाना देखै ॥ तिनका तुडाय लेहु परवाना । कालदशा छुटे अभिमाना ॥ शालिग्रामको छाड़हु आसा । गहि सत शब्द होहु तुम दासा ॥ दश औतार ईश्वरी माया । यह सब देखु कालकी छाया ॥ तुम जग जीव चितावन आये । काल फंद तुम आय फसाये ॥ अबहुँ चेत करो धर्मदासा । पुरुषहि शब्द करो परकासा ॥ ले परवाना जीव चिताओ । काल जालते हंस मुक्ताओ ॥ यहि कारज तुम जगमें आये । अबन करहु दोसर मन भाये ॥

१ कर्णधार मल्लाह नाव खेकर पार उतारनेवाला भवसागर से गुरु पार उतारते हैं इस कारण उन्हें कड़िहार कहते हैं।

कबीरसाहबका चौका करके धर्मदासजीको परवाना देना आरती विधि

अनुरागसागर

( ११३ )

छन्द

चतुर्भुज बंकेज सहतेज, और चौथे तुम अहौ ॥ चार गुरुकडिहार जगके वचन यह निश्चय गहौ ॥ यही चार अंश संसारमें, जीव काज प्रगटाइया ॥ स्वसंवेदसोइनसंग दियो, जेहि सुनि काल भगाइया ॥७४॥

सोरठा-चरोंमें धर्मदास, जम्बुदीपके गुरु साहि ॥ व्यालिस वंश विलास तैं जीव तेहि शरणगहि ॥७८॥

आरतीविधिवर्णन

कबीर साहबका चौका करके धर्मदासको परवाना देना धर्मदास वचन

धर्मदास पद गहि अनुरागा । हो प्रभु मोहि कीन्ह सुभागा ॥ हे प्रभु ! नहि रसना प्रभुताई । अमित रसन गुण वरनिन जाई ॥ महिमा अमित अहै तुम स्वामी । केहि विधि बरनों अंतरयामी ॥ मैं सब विधि अयोग्य अविचारी । मुझ अधमहिं तुम लीन उबारी ॥ अब चौका भेद कहो मुहि स्वामी । काहि कहहु तिनका सुखभामी ॥ जो तुम कहो करौ मैं सोई । तामहैं फेर न परि हैं कोई ॥

कबीर वचन चौकाका साज

धर्मदास सुनु आरति साजा । जाते भागि चले यमराजा ॥ सात हाथको बस्तर लाओ । श्वेत चँदोबा छत्र तनाओ ॥ घर आंगन सब शुद्ध कराओ । चौका करि चन्दन छिड़काओ ॥ तापर आँटा चौक पुराओ । सवासेर तंदुल ले आओ ॥ स्वेत सिंहासन तहाँ बिछाई । नाना सुगंध धरु तहाँ लगाई ॥ स्वेत मिठाई स्वेतै पाना । पुंगीफल स्वेतहि परमाना ॥ लौंग इलायची कपुर सँवारो । मेवा अष्ट केरा पनवारो ॥

कबीरसाहबका धर्मदासको उपदेश देना

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नारायणदासजीका कबीरसाहबकी अवज्ञा करना

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