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कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

Kalika Purana with Hindi Translation

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ १८५ चाहिए। भगवान् वासुदेव ने भी उन सब देवगणों को विदा करके वाराह के तेज का आहरण करने के लिए वे फिर ध्यान में परायण हो गए थे। जब धीरे-धीरे माधव प्रभु उस तेज का अपहरण करते हैं तो उस समय में वह वाराह का देह सत्व से हीन हो गया था। जब सभी देवों ने उस देह को तेज से हीन समझ लिया था उसी समय में देव अद्भुत यज्ञ वाराह के समीप में प्राप्त हुए थे। ब्रह्मा आदि समस्त देव उमा के स्वामी महोदव के समीप में गये थे कि उस समय में उस तेज को कामदेव के शासन करने के लिए अधीन करें। फिर इसके अनन्तर सभी देवों के समुदाय ने अपना-अपना तेज भगवान् वृषभध्वज में समायोजित कर दिया था उससे वे भगवान् शम्भु बहुत ही अधिक बलवान हो गये थे। इसके अनन्तर शरभ के वाले रूप उसी क्षण में गिरीश हो गये थे। वे ऊपर और नीचे के भाग से आठों पादों से युक्त अत्यन्त भैरव हो गये। वह वाराह का शरीर दो लाख योजन ऊँचाई वाला था और डेढ़ लाख योजन के विस्तार से युक्त था। ऊपर की ओर वह वाराह का शरीर एक लाख योजन के विस्तार वाला था। आधा लाख योजन पार्श्व में विस्तृत था। उस समय में ऐसा वह वाराह शरीर वर्तमान हो गया था। इसके अनन्तर उस यज्ञ पौत्री ने शिर पर चन्द्र का स्पर्श करने वाले शरभ के रूप वाले उमापति महादेव का दर्शन किया था। उनका स्वरूप लम्बी नाक, और नखों वाला था तथा काले अंगार के समान प्रभा से युक्त था। उनका मुख दीर्घ था, महान् शरीर से समन्वित था और उसमें आठ दाढ़ें थीं, जटायें धारण करने वाली पूँछ थी तथा लम्बे कानों वाला परमाधिक भयानक स्वरूप था। उसके चार पद पृष्ठ भाग में थे तथा चार अधर में थे। वह महान् घोर शब्द कर रहे थे तथा बारम्बार उछाल खा रहे थे। इसके अनन्तर आगमन करते हुए उनको देखकर तो तुरन्त ही क्रोध से दौड़ लगा रहे थे। सुवृत्त, कनक और घोर वहाँ पर क्रोध से मूर्छित होते हुए प्राप्त हो गये थे। फिर वे तीनों भाई महान शरीरधारी शरभ के समीप में आ गये थे

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और उन्होंने एक ही साथ पौत्र घातों से उत्क्षेप किया था जो कि महान बल से समन्वित थे। वे सब जितने प्रमाण वाले शरभ था उतने ही प्रमाण वाले उस समय में हो गये थे। वे तीनों पौत्री माया के द्वारा शरभ के उत्पक्षेप के अवसर पर बन गये थे। वह शरभ पृथ्वी के भाग में गहन जल के सागर में पतित हो गया था। मकरों के निवास स्थान सागर में सुवृत्त कनक और घोर के गिर जाने पर वाराह भी अपने पुत्रों के स्नेह से वशीभूत होकर और क्रोध से हे द्विजसत्तमो! उछाल खाकर सहसा उस जल से समुदाय वाले सागर में गिर गया था। उस समय में वे सब वाराह और शरभ उछाल खाते हुओं ने दिव्यलोक में सब देवों का और समस्त नक्षत्रों का भग्न कर दिया था। उनमें कुछ देवगण तो निहित हो गए थे और कुछ भूमि में नियति हो गये थे और उनमें कुछ देवज्ञान से समन्वित थे जो महर्लोक का समुपाश्रय ग्रहण करके वहाँ पर संस्थित हो गये थे। हे द्विज श्रेष्ठों! नक्षत्र विमान से महीबल में पतित हो गये थे वे सब ज्वालाओं की मालाओं से समाकुल दिखलाई दे रहे थे। उनके उत्पतन में जो वेग था वह बहुत ही अधिक दारुण था। उनसे अत्यधिक वेग वाला वायु उत्पन्न हो गया था जो बहुत ही अधिक दारुण था। उस वायु से प्रेरित हुए पर्वत पृथ्वीतल में गिर गये थे और कुछ पर्वत पुनः ही पर्वतों में पतित हो गये थे। वह वृक्षों का और जन्तुओं का विभर्दित करके बारम्बार निपातित हो गये थे। कुछ तो पर्वतों के आघातों से महीतल में नृत्यमान हो रहे थे। उन पर्वतों ने गमन करते हुओं ने बहुत सी प्रजाओं का भग्न कर दिया था। वायु के वेग से भूतल में पर्वत दिखलाई दिए थे। उनसे सदृश्यमान होते हुए अर्थात् रगड़ खाते हुए अन्य पर्वत गमन करते हुए से प्रतीत हो रहे थे। अम्भीनिधि में पतित हुए वाराहों से और शरभ से दिखाई दे रहे थे। महान ऊँचे पर्वतों से जल की राशियाँ उत्क्षिप्त हो गयी थी। एक ही क्षण में सब सागर बिना जल वाले हो गये थे क्योंकि वे सब जल की राशियों समुत्क्षिप्त होकर पृथ्वी जल में समागत हो गई

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थीं। उत्प्लावित हुई समस्त प्रजा एक ही क्षण में क्षय को प्राप्त हो गयी थी। प्लवमान होती हुई अर्थात् डुबकियाँ खाती हुई प्रजा सभी ओर से क्रियमाण हो गयी थीं। उस समय में बहुत ही अधिक करुण दृश्य हो गया था। मरने वाले लोग परस्पर में विलाप कर रहे थे। कुछ लोग कह रहे थे हा पिता, हा माता! हा तात! हा सुता! इस प्रकार से कहते हुए परमभीत और आर्त्त मनुष्य करुणापूर्वक विलाप कर रहे थे। जिस देश में वाराहों के साथ शरभ निपातित हुआ था यहाँ पर ही अधोभाग में गई हुई पृथ्वी पादों के वेग से विदारित हो गई थी। दूसरा पृथ्वी का प्रान्त पर्वतों के साथ उत्थित हुआ था जन लोकों में उनके प्रभञ्जनों सृजन किया था। उस समय में शरभ ने जन लोकों में संयुक्त पृथ्वी को पोत्रियों कचला भी सम्बद्धा को निःश्रेणी की ही भाँति देखा था। वह विस्मय से आविष्ट हुआ भीतर भ्रान्त एवं पीड़ित था। इसके अनन्तर पौत्रीगण वे सब पौत्राघात से युद्ध करने लगे थे तथा उन्होंने खुरों के प्रहरों के द्वारा दाढ़ों से और महान दारुण गात्र से क्षेत्रों से ही युद्ध किया था। इसके अनन्तर एक ही उस महान शरभ उन चारों पौत्रियों के साथ एक सहस्र वर्ष पर्यन्त एकान्त में दाढ़ों के अग्रभागों से, तीक्ष्ण नखों से, खुरों से, लांगुल के प्रहारों के द्वारा और महान शब्द वाले तुण्डाघातों से चारों उन पौत्रियों के साथ लड़ा था अर्थात् उसने युद्ध किया था। उनके प्रहारों से, वेगों से, भ्रमणों से और गमनागमनों से, आस्फोटितों से तथा अरावों से पृथक-पृथक देह के पातों से पाताल में समस्त पन्नग कद्रुजों के साथ विनिष्ट हो गये थे। इसके उपरान्त वे सब सागर का परित्याग करके पृथ्वी के मध्य में समागत हो गये थे। ये परस्पर युद्ध करते हुए रहे थे फिर यह पृथ्वी सम हो गई थी। शेष भगवान भी बड़े भारी यत्न से बल के द्वारा कच्छप को अवष्टब्ध करके भग्नशीर्ष वाले प्रत्यापित होते हुए बड़े दुःख के साथ इस पृथ्वी को धारण करने वाले हुए थे अर्थात् बड़ी कठिनाई से उन्होंने पृथ्वी को धारण किया था। अनन्त के वामनीभूत होने पर और पृथ्वी तल के समत्व को प्राप्त हो जाने पर सागरों के और पर्वतों के चलायमान होने के समस्त जन्तुओं

१८८ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ के विनिष्ट हो जाने पर त्रिपौत्रि शरभों के युद्धमान होने पर सागरों के द्वारा सम्पूर्ण जगत के आलुप्त होने पर उस समय में जलमय में चिन्ता से आविष्ट सुरश्रेष्ठ पितामह भगवान हरि से बोला-हे भगवान्! सुर-असुर और मनुष्यों के सहित समस्त भुवन विध्वंस हो गया है, यह पृथ्वी विशीर्ण हो गई हे और स्थावर तथा जंगम (चेतन) नष्ट हो गये हैं। देव, गन्धर्व, दैत्य, सरीसृप के ही धन वाले मुनिगण सब, हे जगतों के नाथ! इस समय में विध्वंस हो गये हैं। आप ही सबके पालन करने वाले हैं और आप ही जगत के प्रभु अर्थात् स्वामी हैं। इस कारण से आप हम सबका और इस पृथ्वी का, हे जगत् के स्वामिन्! पालन कीजिए। आप ही वाराह का शरीर हैं आप स्वयं ही इसका उपसंहार करिए। हे महाबाहो! चर और अचरों के साथ इस पृथ्वी को संस्थापित करिए। मार्कण्डेय महर्षि ने कहा- उन भगवान जनार्दन ने इस ब्रह्माजी के वचन का श्रवण करके अच्युत प्रभु ने उस समय में सबकी संस्थापना करने के लिए यत्न किया था। इसके उपरान्त भगवान हरि रोहित मत्स्य के रूप को धारण करने वाले होकर इस समय में वेदों के सहित सात मुनियों को धारण करने वाले हुए थे। वे श्रुति की रक्षा के परायण होकर जगत के हित के साधन करने के लिए सभी श्रुति के श्रेष्ठ कोविदों का धारण किया था। उन मुनियों के शुभ नाम बतलाये जा रहे हैं, उन मुनियों में वशिष्ठ, कश्यप, विश्वामित्र, गौतम मुनि और महती तपश्चर्या में संस्थित जमदग्नि तथा तप के निधि भरद्वाज मुनि थे। इन सबको अपने पृष्ठ भाग पर रखकर जल के मध्य में महान नौका में मुनीन्द्र को बिठाकर स्थित हुए थे। इसके अनन्तर शिव को सान्त्वना देने के लिए भगवान जनार्दन वहाँ पर गये थे जहाँ पर उन्होंने पौत्रियों के साथ युद्ध किया था। अति पौत्र पहनों से वराही के साथ भ्रान्त, निष्पीडित, प्याप्त (खुले) मुख से संयुत तथा श्वासों को लेते हुए हरि को देखकर समागत हुए थे वाराह ने पूर्व में होने वाली नृसिंह भगवान की मूर्ति का

ൠ श्रीकालिका पुराण ൠ १८९ स्मरण किया था। उनके द्वारा स्मरण किए हुए वाराह ने सखा वाराह के हित में भगवान् नृसिंह समागत हुए थे। उस अवसर पर आए हुए उन भगवान् नृसिंह का वीक्षण करके उनके कामों को अपने ही तेज में ले लिया था। वाराहों के साथ शरभ ने देखा था कि वह तेज सबके तुल्य विष्णु भगवान् के अन्दर प्रवेश कर गया था। तेज से रहित भगवान् नृसिंह का ज्ञान प्राप्त करके वाराह ने निःश्वासों के समूह को छोड़ा था अर्थात् वे बहुत कुछ निःश्वास लेने लग गये थे। फिर तो बहुत से वाराह समुद्भूत हो गये थे जिनका बहुत बड़ा आकार था और अद्भुत एवं तीक्ष्ण दाढ़ों वाले थे। वे वाराह शरभगिरीश मायाधारी और भय रहित होते हुए पीड़ित करने वाले थे। उस समय में भी नृसिंह भगवान् के साथ युद्ध किया था और बहुत अधिक गिरीश का मर्दन किया था। एक क्षण में तो पक्षियों के समान स्वरूप वाले थे और क्षण में गौएं, तुरंग और मनुष्य हो जाते थे। एक ही क्षण में नृसिंह वाराह के रूप वाले थे और वे किसी क्षण में गोमायु (शृंगाल) और वैकृतिक अर्थात् बिगड़े हुए हो जाते थे। उस युद्ध में वाराहों में अनेक भाँति के महाभयंकर स्वरूप वितन्यमान किए थे। उस अवसर पर भर्ग को उनके द्वारा निपीडित देखकर उन गिरिश के समीप में भगवान् माधव आ गये थे। भगवान् विष्णु ने अपने कर कमल से गिरीश का स्पर्श किया था और फिर उसने अपना तेज पुनः उनमें निर्धारित कर दिया। इसके अनन्तर प्रभाविष्णु भगवान् विष्णु के कर से स्पर्श होते हुए ही वह अत्यधिक प्रसन्न हृष्ट और बलवान हो गये थे। इसके अनन्तर शरभ में बहुत ऊँचा, बलवान और दृढ़नाद (गर्जन की ध्वनि) किया था जिससे ये चौदह भुवन भर गए थे अर्थात् चौदह भुवनों में फैलकर पहुँच गया था। इस रीति से नाद करने वाले उसके मुख से जो भी सीकर अर्थात् जल के कण निकले थे उनसे महान शरीरों से धारण करने वाले तथा विशाल ओज से समन्वित समुत्पन्न हो गये। जिस प्रकार से वाराह के निःश्वास से नाना रूपों को धारण करने वाले गुण हुए थे। ये वैसे ही वाराह थे प्रत्युत उनसे भी

१९० ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ अधिक बलवान थे। श्वान, वाराह, उष्ट्र के रूप वाले, प्लव, गोमायु और गौ के मुख से संयुत, रीछ, मातंग, मार्जार और शिशुमार के स्वरूप वाले कुछ सिंह और व्याघ्र के मुख वाले और कुछ सर्प और भूकक के समान मुख वाले थे, हंस की सी ग्रीवा से युक्त हय के समान वाले तथा दूसरे महिष के समान आकृति वाले थे। दूसरे मनुष्य के समान आकार वाले थे और फिर मृग तथा मेघ के सदृश मुख से समन्वित थे। कुछ केवल कबन्ध ही थे जिनके मुख नहीं थे। कुछ बिना हाथों वाले और कुछ बहुत हाथों से युक्त थे। उनके कुछ शरभ के सदृश आकारवाले थे और दूसरे कृकलास के जैसे मुख से संयुत थे। कुछ मत्स्य के सदृश मुख से युक्त थे और कुछ ग्राह के से मुख वाले थे, कुछ बहुत छोटे, कुछ बहुत बड़े बल वाले तथा कुछ कृश थे। कुछ ऐसे थे जिनके चार पैर थे, कुछ आठ पैरों से युक्त और कुछ तीन एवं दो पैरों वाले थे। कुछ एक ही पैर वाले थे और कुछ बहुत अधिक हाथों से संयुक्त थे। कुछ यक्ष तथा किंपुरुषों के समान थे। कुछ पशुओं के समान आकार वाले थे तो कुछ पंखों से संयुत थे। कुछ लम्बे उदर वाले थे तो कुछ महान उदर से संयुक्त थे। कुछ ऐसे थे जिनके उदर दीर्घ थे तथा स्थूल केशों से समन्वित एवं कुछ बहुत कानों वाले तथा कुछ बिना ही कानों वाले थे। कुछ उनमें ऐसे थे जिनके स्थूल अधर थे तो कुछ बिना ही कानों वाले थे। कुछ उनमें ऐसे थे जिनके स्थूल अधर थे तो कुछ दीर्घ दाँतों से समन्वित थे और दूसरे बड़ी लम्बीदाढ़ी मूँदों वाले थे। हे विप्रो! सभी ओर चौदह भुवनों में जो प्राणधारी थे वे उनके रूप की समानता को प्राप्त हुए थे। इस भुवन में कोई भी जन्तु अथवा स्थावर या जंगम नहीं था जिनके समान रूप से भगवान् शंकर के गण उत्पन्न न हुए हों। वे सब भिन्दिपाल, खग, परिघ और तोमरों से समन्वित थे। शकुल, आस और गदाओं से, पाशों से खट्वांग से, त्रिशूलों से, कपालों से, शक्तियों से, दोत्रों से, क्षुणियों से, ईषाग्रों से, यष्टियों से, त्रिकण्टकों से, पाशों से, परशुओं से, बाणों से और कोणदण्डों से

ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ १९१ ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ महान भीषण थे। सभी महान बल वाले और जटा और चन्द्रकाल से युक्त थे। कुछ मार्ग के रूप से, वाहन से और भूषणों तुल्य जटा, अर्धचन्द्र और शुभ्रांशु और शुभ्रशीर्ष वाले महा बलवान थे। उनमें कुछ अर्धनारीश्वर थे और कुछ ऐसे ही थे जैसे रुद्रदेव ही होंवे। कुछ तो अपने सुन्दर रूप से तथा मोहने वाले स्वरूप से कामदेव के तुल्य थे जो वनिताओं के समुदाय के साथ रति करने में समुत्सुक थे। सभी आकाश में चरण करने वाले थे और सभी स्वतन्त्रता से गमन करने वाले थे। उनमें कुछ नीलकमल के सदृश श्याम वर्ण वाले थे तो कुछ शुक्ल और लोहित थे। कुछ रक्त, पीत तथा विचित्र वर्ण से संयुत और दूसरे हरि एवं कपिल थे। कुछ आधे पीत, आधे रक्त, आधे भाग में नील और दूसरे धवल थे। कुछ कृष्ण और पीत वर्ण से युक्त थे तथा कपितय अर्द्धकृष्ण और शुक्ल वर्ण से रञ्जित थे। एक ही वर्ण वाले, कतिपय दो वर्णों से संयुत तथा दूसरे तीन वर्णों से समन्वित थे। कुछ चार पाँच और छः वर्णों से युक्त थे और हे द्विजो! कुछ दश गुणों वाले थे। सभी गज वादन करने वाले थे जिनमें कुछ डिण्डिम, पट्टह, शंख, भेरी, आनक, सकहल, गोमुख, मण्डूक, झर्झर, झर्झरी, समर्द्दल, वीणा, तन्त्री, पञ्चतन्त्री, शकर और दर्दर, कुण्ड, सतालकर तलिकाओं को वादन करते हुए सभी गण बार-बार हँसने वाले थे। वे सब वाराह की ओर मुख वाले होते हुए स्थित हो गये थे। उन सबसे वृषभध्वज भगवान शरभ ने कहा। इन वाराह के गणों का विहनन कर दो। ये निश्चय ही अपने क्रूर कर्मों द्वारा, क्रूर दृष्टि से, क्रूर युद्धों के द्वारा क्रूर होकर महान बल वाले थे। इसके अनन्तर वे सब गण अनेक आकार वाले और नाना श्रेष्ठ आयुधों से समन्वित थे। उन क्रूर दिखलाई देने वालों ने वाराह के गणों के साथ युद्ध किया था। ये सभी आकाश में सञ्चरण करने वाले थे उन्होंने जल से पूर्ण तीनों जगतों का परित्याग करके दोनों पक्ष के गण आकाश में ही युद्ध कर रहे थे। इसके पश्चात भगवान हर के प्रमथों ने वाराह के गणों को

१९२ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ एक क्षण में महान वायु जिस तरह से मेघों को हटा देता है और विनष्ट कर दिया करता है वैसे ही महान बल के रखने वाले सभी वाराह के गणों को मार दिया था। उस सब वाराह के वीर गणों के निहित हो जाने पर वराह ने चिन्तन किया था कि वह क्या पहले और पीछे ऐसा वृत्त उपस्थित हुआ है। उसके उपरान्त चिन्तन करते हुए उसके हृदय में भगवान जनार्दन ने गमन करके वह सभी कुछ वाराह वपु के हित को विज्ञापित कर दिया था। इसके अनन्तर उस समय में देह का परित्याग करने के लिए महान बलशाली ने नरसिंह को दाढ़ों के अग्रभाग के घातों से विभक्त कर दिया था। शरभ भगवान भर्ग ने मध्य में दो भागों में कर दिया था। नरसिंह के दो भागों में विभक्त होने पर उसके नर भाग से नर ही समुत्पन्न हुआ था जो दिव्य रूपशाली महान ऋषि था। उसके पाँच मुखों के भाग से नारायण श्रुत हुआ था। वह महान तेज वाले महामुनि जनार्दन हो गये थे। नर और नारायण दोनों महती मति वाले इस दृष्टि के हेतु हो गये थे। उन दोनों का प्रभाव बहुत ही दुर्धर्ष था और शास्त्र में, वेद में और तपों में सब उनका प्रभाव सहन करने के योग्य नहीं था। मत्स्य मूर्ति रक्षक के स्वरूप वाली नौका में उन दोनों को निर्धारित किया था और फिर वाराह हरि देव शरभ के समीप में प्राप्त हुए थे। मुझे समस्त जगतों के हित के सम्पादन करने के लिए वपु का त्याग अवश्य ही करना चाहिए। यह पूर्व में मैंने प्रतिज्ञा की थी उसी के लिए यह समुद्यम किया जा रहा है। वह समुद्यम भगवान हरि के द्वारा, शम्भु के द्वारा और ब्रह्म के द्वारा किया जा रहा है। ऐसा भली-भाँति चिन्तन करके उस समय में परमेश्वर शूकर के शरभ महान बलवान देव महादेव से कहा था-हे महादेव! आप मुझे परित्याग कर दो। मैं बिना किसी संशय के इस शरीर का त्याग करूँगा। यह मेरे शरीर का ज्ञात समस्त जगतों के और देवों के तथा ऋत्विजों के हित के सम्पादन करने के ही लिए हैं। मेरे देह के प्रतीकों के समूहों से यज्ञ का यूप प्रकल्पित करके, हे महाभागे! पृथक-पृथक शामित्र के सहित स्रुवा आदि की कल्पना की है।

इसके अनन्तर तीन पुत्रों के द्वारा वे उनका जगतों के हित के लिए निबंध करें। इस जगत से परिपूर्ण को सुवृत्त, घोर और कनक से रक्षा करो। यज्ञ से देव और प्रजा, यज्ञ से अन्य नियोगी यह सभी कुछ यज्ञ से ही सदा होने वाला है। यह सब जगत यज्ञों से परिपूर्ण है। मालिनी पृथ्व्वी पुनः जिससे इस गर्भ को धारण किया था वह देवी स्वयं उस समुत्पन्न पुत्र का भली-भाँति रक्षण करेगी। जिस समय में काल प्राप्त होता है उसी समय में देवी आयुष्मान बोलती है। उसके वध के विषय में जब काम से अत्यन्त आर्त्त होती है तभी इसका वध करेगी। जिस समय में भग्न हुई भारती पृथ्व्वी को नीचे की ओर होगी तभी भृंगी वाराह के रूप से उसी समय मैं उसका उद्धार करूँगा। तब आपका पुत्र अपने शरीर को कृतकृत्य अर्थात् सफल समझकर उसका त्याग कर देगा। इस प्रकार से यज्ञ वाराह के कहे जाने पर जो कि बलवान थे एक महान तेज जो ज्वालाओं की महामालाओं से दीप्त था, महाकाल था वह तेज करोड़ों सूर्यों के समान देदीप्यमान था और महान अद्भुत था। वह उस समय में वाराह के शरीर से निकलकर भगवान हरि के शरीर में प्रवेश कर गया था। हे द्विजो! उन भगवान विष्णु में वाराह के तेज से प्रविष्ट होने पर फिर भगवान हरि ने सुवृत्त, कनक और घोर से तेज से प्रविष्ट होने पर फिर भगवान हरि ने सुवृत्त, कनक और घोर से तेज को स्वयं ही आदान कर लिया था। उनके शरीर में भी तेज का भाग अलग-अलग निकलकर ज्वालाओं की माला से अत्यधिक दीप्त हो गया। वह भगवान हरि के शरीर में प्रवेश कर गया था जैसे उनका पिता को ठीक वैसे ही प्रविष्ट हो गया था। इसके अनन्तर भगवान हरि, ब्रह्मा और महादेव वराह के उस वचन की प्रतिज्ञा करके और बार-बार 'ओम' यह कहा था। 'ओम्' यह स्वीकृति के लिए प्रयुक्त होता है। उनके शरीर के परित्याग करने में उत्तम यत्न किया था। उसके उपरान्त शरभ के तुण्ड के प्रहारों से कुछ के मध्य में वाराह से शरीर का भेदन करके उसे जल में गिरा दिया था। उसका प्रथम पतन करके उसी भाँति सुवृत्त, कनक और घोर को कण्ठ भाग में भेदन कर-करके हनन कर दिया था।

१९४ ६०८ श्रीकालिका पुराण ४०२ प्राणों के परित्याग कर देने वाले वे सब महार्णव के जल में गिर गये थे। जल में पात करने के अवसर में घोर ध्वनि का विस्तार करते हुए कालानल के समय कान्ति वाले हो गये थे। वाराहों के पतित हो जाने पर ब्रह्मा, विष्णु तथा हर फिर समागत होकर सृष्टि की रचना करने के लिए चिन्तन करने लगे थे। उस अवसर पर हर के समस्त गण भर्ग के समीप में समागत हो गये थे। वे महाभाग चार भागों में विभाजित होकर उपस्थित हुए थे। हे द्विज सत्तमों! वे प्रथम छत्तीस सहस्र थे। वहाँ पर एक भाग में सोलह सहस्र संस्थित हुए थे। जो निश्चित रूप से अनेक स्वरूपों के धारण करने वाले थे। वे जटा जूटों में चन्द्रमा के अर्धभाग के द्वारा विभूषित थे। वे सभी सम्पूर्ण ऐश्वर्य से समन्वित थे और ध्यान में तत्पर हो रहे थे। वे सब योगी थे तथा मद, मात्सर्य, दम्भ और अहंकार से रहित थे। उनके समस्त पाप क्षीण हो गये थे और महान भाग वाले भगवान शम्भू के अत्यधिक प्रीति के करने वाले थे। उन्होंने परिग्रह रोग की कभी भी आकांक्षा नहीं की थी। वे सभी संसार से विमुख थे और योग से तत्पर योगी थे। ध्यान की अवस्था में विराजमान् इन भगवान् महादेव को परिवारित करके धृत व्रत थे। वे रुचि से एक परिषद का निर्माण करके क्लम से रहित होते हुए स्थित थे। जिस समय में ही अम्बिका देवी के स्वामी परमज्योति का चिन्तन किया करते हैं उसी समय में वे समस्त उनको वेष्टित कर लिया करते हैं। जो यति व्रत वाले थे वे सोलह करोड़ कहे गये हैं। वे सब सिंह और व्याघ्र आदि के समान रूप वाले और अणिमा आदि सिद्धियों के द्वारा संयुत थे। अन्य कामुक शम्भु के सचिव अर्थात् प्रणय विधान के मन्त्री थे। भगवान् हर के ही समान रूप से वे वृषभध्वज विशद हो रहे थे तथा वे उमादेवी के तुल्य सुन्दर स्वरूप वाले प्रमदाओं से समागत थीं। विचित्र माल्यों के आवरणों से युक्त थीं तथा हिमस्त्रक् की गन्ध से मण्डित थीं। उमा देवी की सहायता से संयुत और क्रीड़ा करते हुए भगवान शम्भु के पीछे भूषित होती हुई अनुगमन कर रही थीं। शृंगार और वेष के आभरण वाले वे

᪥ श्रीकालिका पुराण ᪥ १९५ आठ करोड़ गण थे। उनमें अन्य अर्ध नारीश्वर थे जो हर के समीप थे। भगवान् शंकर ने ही सदृश रूप वाले ध्यान में संस्थित में प्रवेश कर गये थे जिस समय में उमादेवी के साथ भगवान् हर सुख के सहित रमण किया करते थे। वे द्वारपाल भी अर्ध नारीश्वर हैं जो नित्य ही आकाश के मार्ग के द्वारा गमन करते हुए उनके पीछे ही अनुगमन किया करते हैं। ध्यान में संस्थित करने वाले ईश्वर का सलिल आदि के द्वारा परिचर्या किया करते हैं। अनेक शस्त्रों के धारण करने वाले शम्भु भगवान् के वे गण प्रमथ किया करते हैं। वह महान बलवान शूर संख्या में नौ करोड़ थे। दूसरे गायन करने वाले थे जो ताल मृदंग आदि के द्वारा वादन किया करते हैं तथा नृत्य करते हैं और मधुर स्वर में गाते हैं। वे अनेक रूपों के धारण करने वाले वे संख्या में तीन करोड़ थे। वे निरन्तर विचरण करने वाले महेश्वर भगवान् के पीछे गमन किया करते हैं। वे सभी मायावी, शूर थे और सब शास्त्रों के अर्थ के पारगामी ज्ञाता थे। सब जगह सभी कुछ के ज्ञान रखने वाले और सभी सर्वत्र सदा गमन करने वाले थे। वे सब मुहूर्त मात्र में सम्पूर्ण भुवन में जाकर फिर गति के द्वारा पुनः भव को प्राप्त हो जाया करते थे। वे सब महान बल से युक्त थे तथा अणिमा महिमा आदि आठों प्रकार के ऐश्वर्यों से समन्वित थे। दूसरे रुद्र नामों वाले जरा और अर्धचन्द्र से मण्डित थे। वे देवेन्द्र के आदेश से सदा ही स्वर्ग में रहा करते हैं। उनकी संख्या एक करोड़ थी और वे सब विशेष बलवान थे। वे सदा ही हर के गण भगवान् शम्भू की सेवा किया करते हैं तथा जो धर्मिष्ठ हैं अर्थात धर्म का समादर करने वाले हैं उनका पालन किया करते हैं। जो पाशुपत व्रत के धारण करने वाले हैं उनके ऊपर निरन्तर अनुग्रह किया करते हैं। जो प्रयत आत्माओं वाले योगीजन हैं उनके विघ्नों का निरन्तर हनन किया करते हैं। ये भगवान् हर के गण जो कि समस्त संख्या में छत्तीस करोड़ थे। ये गण वाराह के गणों के नाश करने के लिए तथा समस्त जगतों के

११६ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ हित सम्पादन करने के लिए और भगवान् शंकर की सेवा के लिए समुत्पन्न हुए थे । वाराह के गणों को देखकर तथा नृसिंह हरि को अवलोकित करके स्वयं शरभ के स्वरूप वाला होता हुआ और ध्यान करते हुए उस समय में नाद किया था । उनके सीकरों से ( जल कणों से ) जो उत्पन्न हुए थे इसी कारण से उनके स्वरूप भी बहुत थे । क्रूर दृष्टि से, क्रूर गति से, क्रूर युद्धों से, क्रूर कृत्यों से वाराह के इन गणों का हनन करने वाले थे क्योंकि भगवान् कपर्दी (शिव) ने कहा है । अतएव वे क्रूर कर्मों के करने वाले और भयंकर समुत्पन्न हुए थे । वे महान ओज वाले सदा क्रूर हैं । वे कर्मों को नहीं किया करते हैं । दृष्टिमात्र से ही वे क्रूर हैं वे कार्यों से क्रूर नहीं थे । वे फल, पुष्प, जल, पाक तथा मूल को भोग करते हैं । वनों पर्वतों की शिखरों में फलादि जो निवेदित किये जाते हैं उनका ग्रहण करते हैं और आहरण करने के जो पत्र पुष्पादिक हैं उनका प्राशन किया करते हैं । भर्ग का जो भोग होता है उसी भोग वाले वे महान ओज वाले भी थे । चैत्र की चतुर्दशी को छोड़कर वे आमिषों का प्राशन नहीं किया करते हैं । फिर सब गण भी वहाँ पर आमिषों का उपभोग किया करते हैं । वाराह के गणों के निहत हो जाने पर वे गण मार्ग के समीप में पहुँचकर स्वयं चारों भागों वाले होकर भूतकर्म का गान करते थे । चार भाग वाले में उनका भूतत्व उस समय में हो गया था । जो पूर्व में लोक और वेद में विदित भूतग्राम चार प्रकार का था क्योंकि यह उनसे भी अधिक था । अतएव वह भूतग्राम कहा जाया करता है । यह सब आपको बतला दिया है जिस तरह से शम्भु के गणभूत हैं । वे जो भी आहार वाले हैं, जैसे आकार वाले हैं और जो कृत्य करने वाले हैं वे महान ओज से युक्त हैं । जो इस महान् अद्भुत आख्यान का नित्य श्रवण किया करता है वह दीर्घ आयु वाला, सदा उत्साह से सम्पन्न और योग से युक्त होता है ।

श्री वाराह यज्ञोत्पत्ति वर्णन

६०२ श्रीकालिका पुराण ६०२ १९७ श्री वाराह यज्ञोत्पत्ति वर्णन ऋषियों ने कहा-यज्ञ वाराह का देह यज्ञत्व को कैसे प्राप्त हुआ था और वाराह के तीन पुत्र त्रेतात्व कैसे प्राप्त हुए थे ? यह अकालिक प्रलय भगवान ने कैसे किया था और महात्मा वाराह ने महान घोर जनों का क्षय कैसे किया था। किस प्रकार से भगवान शार्ङ्गधारी से मत्स्य के स्वरूप के द्वारा वेदों का त्राण किया था अर्थात् वेदों की सुरक्षा करके उनको सुरक्षित रखा था ? फिर दुबारा यह सृष्टि की रचना कैसे हुई थी और इस भूमि को किसने समुद्धृत किया था ? वह देह कैसे प्रवृत्त हुआ था, यह सब हे महामते! हमको बतलाइए। हे द्विज शार्दूल! इस सबका हाल आपने प्रत्यक्ष रूप से देखा। हे महती मतिवाले! आज हम सब इसके श्रवण करने वाले हो रहे हैं। अतएव हमको आप बतलाने की कृपा कीजिए। मार्कण्डेय मुनि ने कहा-हे द्विज शार्दूलोँ! जो मैंने यहाँ पर एक अद्भुत सृजन किया था उसको सुनिए। आप सब परम सावधान हो जाइए और इस समस्त वेदों के फल को प्रदान करने वाले को सुनिए । यज्ञों में देवगण सन्तुष्ट होते हैं और यज्ञ में सभी कुछ प्रतिष्ठित है। यज्ञ के द्वारा ही पृथ्वी धारण की जाती है और यज्ञ से ही प्रजा का वरण किया करता है। अन्न के द्वारा प्राणी जीवित रहा करते हैं और उस अन्न की उत्पत्ति मेघों के द्वारा होती है। वे मेघ यज्ञों से हुआ करते हैं। इसलिए यह सभी कुछ यज्ञ से ही परिपूर्ण है। वह यज्ञ भगवान शम्भु के द्वारा विदीर्ण किए हुए वाराह के शरीर से ही हुआ था। हे द्विजो! जैसा भी मैं आपको कहता हूँ उसको आप लोग परम सावधान होकर श्रवण कीजिए। मर्म के द्वारा वाराह के शरीर के विदारित होने पर उसी क्षण ब्रह्मा, विष्णु और शिव देवगण ने जल से समुद्धृत करके उस शरीर को वे आकाश के प्रति ले गये थे। उसके भेदन करने वाले भगवान विष्णु के चक्र के द्वारा वह शरीर खण्ड-खण्ड कर दिया गया था। उसके अंग की सन्धियाँ जो थीं वे यज्ञ पृथक्-पृथक् समुत्पन्न हुए थे। हे महर्षियों! जिस अंग से जो समुत्पन्न हुए थे उनका सब आप लोग

१९८ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ श्रवण कीजिए। भौंह और नासिका की सन्धि से महान अध्वर यज्ञ ज्योतिष्टोम नाम वाला उत्पन्न हुआ था। ठोड़ी, कान की सन्धि से वह्निष्टोम नामक यज्ञ समुद्भूत हुआ था। चक्षु और भौहों की सन्धि व ओष्ठों से पौनर्भवष्टोम व क्रत्यष्टोम यज्ञ समुत्पन्न हुआ। जिह्वा के मूल से वृद्धष्टोम और वृहतृष्टोम दो यज्ञ उत्पन्न हुए थे। नीचे जिह्वा के अन्तर्भाग से अतिरात्र और सर्वराज नाम वाले यज्ञों ने जन्म ग्रहण किया था। अध्यापन, ब्रह्म, यज्ञ, पितृ, यज्ञ, तर्पण, होम, दैव, बलि, मौत, नृयज्ञ, अतिथि पूजन स्नान और तर्पण पर्यन्त नित्य यज्ञ सर्वकण्ठ सन्धि से समुत्पन्न हुए थे तथा समस्त विधियाँ जिह्वा से उत्पन्न हुई थीं। वाजिमेध, महामेध तथा नरमेध ये तथा जो अन्य हिंसा के करने वाले यज्ञ हैं वे सब पादों की सन्धि से समुत्पन्न हुए थे। राजसूय यज्ञ अर्थकारी तथा वाजपेय यज्ञ पृष्ठ की सन्धि से समुद्भूत हुए थे और उसी भाँति जो ग्रहण यज्ञ थे वे भी समुत्पन्न हुए थे। प्रतिष्ठा स्वर्ग यज्ञ तथा दान श्रद्धा आदि यज्ञ हृदय की सन्धि से पैदा हुए थे। इसी तरह से सावित्री यज्ञ भी उत्पन्न हुआ था। समस्त सांसारिक अर्थात् संस्कार करने वाले अथवा संस्कारों से सम्बन्ध रखने वाले यज्ञ और जो यज्ञ प्रायश्चित करने वाले हैं। (पापों की शुद्धि के लिए जो भी व्रत, दान, होमादि किए जाते हैं वे प्रायश्चित कहे जाते हैं। ) ये सब मेढ़ की सन्धि से उत्पन्न हुए थे। रक्ष सत्र अर्थात् राक्षस यज्ञ, सर्प सत्र और सभी जो भी अभिचारिक यज्ञ हैं अर्थात् अन्य प्राणियों के मारणात्मक हैं वह सभी उनके खुरों से हुए थे। माया सृष्टि, परमेष्टिग्रीष्यति, भोग सम्भव तथा अग्निष्टोम यज्ञ लाँगूल की सन्धि में समुद्भूत हुए थे। जो नैमित्तिक यज्ञ हैं जिनको कि संकालि आदि पर्वों पर कीर्त्तित किया गया है वे और द्वादश वार्षिक सभी लांगुल सन्धि में समुत्पन्न हुए हैं। तीर्थ, प्रयोग, साम, संकर्षण यज्ञ, आर्क, आकर्षण यज्ञ ये समस्त नाड़ियों की सन्धि से उत्पन्न हुए थे। ऋचोत्कर्ष, क्षेत्रयज्ञ, ये सब जानु में समुत्पन्न हुए थे। हे द्विजसत्तमो! इस रीति के एक सहस्र आठ यज्ञ समुद्भूत थे। निरन्तर

ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ १९९ यज्ञों के लोक जिनके द्वारा इस समय में भी विभावित किए जाते हैं, उत्पन्न हुए थे। इसके पौत्र से स्रुक् उत्पन्न हुई थी और नासिका से स्रुव हुआ था। अन्य जो भी स्रुक् और स्रुव के भेद अभेद हैं वे पौत्र और नासिका से समुद्भूत हुए थे। हे मुनि सत्तमो! उसके ग्रीवा के भाग से प्राग्वंश समुद्भूत हुआ था। इष्टा पूत्ति, जयु धर्म श्रवण के छिद्र से उत्पन्न हुए थे। दाढ़ों से यूप, कुशा और रोम समुत्पन्न हुए थे। उद्गाता, अध्वर्यु, होता और शामित्र ने जन्म ग्रहण किया था। ये अग्र, दक्षिण, वाम अंग, पश्चात् पादों में संगत हैं। पुरोडाश चरु के सहित मस्तिष्क के स्रव से समुद्गत हुए थे। खुर से यज्ञ केतु ने जन्म ग्रहण किया था। रेतोभाग से आज्य और स्वधा मन्त्र समुद्गत हुए थे। यज्ञ का आलय पृष्ठभाग से और हृदय कमल से यज्ञ समुत्पन्न हुआ था। उसकी आत्मा यज्ञ पुरुष है उनकी भुजायें कक्ष से समुद्भूत हुई थीं। इसी प्रकार से जितने भी यज्ञों के भाण्ड हैं और हवियाँ हैं वे सभी यज्ञ वाराह के शरीर से हुए थे। इस रीति से उन यज्ञ वाराह का शरीर यज्ञता को प्राप्त था। ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर ने इस प्रकार से यज्ञ को करके वे फिर यत्नों में तत्पर हुए सुवृत्त, कनक और घोर के समीप में प्राप्त हुए थे। इसके अनन्तर उनके शरीरों को पिण्ड बनाकर पृथक्-पृथक् तीनों देवों ने तीन शरीरों को मुख की वायु से अर्थात् फूँक लगाकर विशेष रूप से धमन किया था। स्वयं ही जगत के सृजन करने वाले फिर दक्षिणाग्नि हो गए थे। भगवान केशव ने कनक के शरीर का धारण किया था। फिर पञ्च वैतान के भोजन करने वाला गार्हपत्याग्नि हुआ था। फिर वाह्वानीय अग्नि उसी क्षण में समुद्भूत हो गया था। इन तीनों से सम्पूर्ण जगत् व्याप्त हो गया था और वह समस्त जगत् तीन मूलों वाला है। हे द्विज श्रेष्ठों! जहाँ पर ये तीनों नित्य ही स्थित रहते हैं वहाँ पर समस्त देवगण अपने अनुचरों के साथ निवास किया करते हैं। यह तीनों का स्वरूप नित्य ही कल्याण का स्थान है और यही तीनों का स्वरूप है। यह त्रयी की विधि का स्थान हैं और यह परम

२०० ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ पुण्य का करने वाला है। जिस जनपद में ये तीनों वह्नियों का हवन किया जाता है उस जनपद में नित्य ही चतुर्वर्ग विद्यमान रहा करता है। चारों वर्ग धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष होते हैं। हे द्विज श्रेष्ठो! जो मुझसे आपने पूछा है वह मैंने सब ही आपको बतला दिया है। जिस प्रकार से यज्ञ वाराह का देह यज्ञत्व को प्राप्त हुआ था और जिस तरह से उनके पुत्रों के देह से वह्नियां हुई थी। मार्कण्डेय महर्षि ने कहा-जिस कारण से भगवान ने आकालित यह प्रलय किया था हे महाभागो! उस वाराह लोक संक्षय का आप श्रवण कीजिए। अथवा जिस तरह से भगवान शार्ङ्गधारी ने मत्स्य के स्वरूप के द्वारा वेदों का त्राण अर्थात् रक्षा की वह मैं सब पापों के विनाश करने वाला आख्यान आप लोगों को बतलाऊँगा। कपिल अवतार आख्यान प्राचीन समय में ईश्वर भगवान विष्णु महामुनि सिद्ध कपिल हुए थे जो स्वयं साक्षात् हर थे और सिद्धों के उत्तम मुनि हुए थे। इस प्रकार से सिद्ध का ध्यान करते हुए यह सम्पूर्ण जगत् स्वतः ही समुत्पन्न हुआ था क्योंकि यह भगवान हरि के शरीर से समुद्गत हुआ था इसी कारण से वह कपिल कहे गये हैं। वह एक बार स्वायम्भुव मनु के अन्तर में होकर मुनि श्रेष्ठ से यह वाक्य कहा था। कपिल देव ने कहा-हे स्वायम्भुव! आप तो मुनियों में बहुत ही अधिक श्रेष्ठ हैं। हे महापते! आप तो ब्रह्मा के ही रूप से समन्वित हैं इस समय में आप प्रार्थना करने वाले मेरे ही अभीष्ट को मुझे प्रदान करिए। यह सम्पूर्ण जगत आपका ही है और आपके द्वारा ही परिपालित है। आपने ही इस सम्पूर्ण जगत् की रचना की है और आप ही इन जगतों के स्वामी हैं। स्वर्ग में, पृथ्वी में और पाताल में, देव, मनुष्य और जन्तुओं में आप ही स्वामी हैं, वरदान देने वाले हैं। रक्षा करने वाले हैं और आप ही एक सनातन हैं अर्थात सर्वदा से चले आने वाले हैं। आप ही धाता, विधाता हैं और आप ही सब ईश्वरों के ईश्वर हैं आप में ही सब कुछ प्रतिष्ठित

൘൘ श्रीकालिका पुराण ൘൘ २०१ ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ है। इस कारण से आप कृपा करके ऐसा स्थान प्रदाए करिए जो तीनों लोकों में महान दुर्लभ होवे। मैं समस्त प्राणियों में होकर प्रत्यक्षदर्शी हूँ। मैं ज्ञानरूपी दीपिका का निर्माण करके इस जगत जात का अर्थात् पूरे जगत् का उद्धार करूँगा। इस समय अज्ञानरूपी सागर में मग्न इस सम्पूर्ण जगत को ज्ञानरूपी प्लव अर्थात् सन्तरण का साधन प्रदान करके मैं तीनों का तारण करूँगा। हे प्रभो! आप हमारे नाथ हैं। पूजा के योग्य हैं और जगत के पालक हैं। महात्मा कपिल के द्वारा इस रीति से कहे गए उन मनु ने फिर उन संशित व्रतों वाले महात्मा कपिल को उत्तर दिया। मनु ने कहा-यदि आप समस्त जगत का भला करने के लिए ज्ञान दीपिका के करने की इच्छा वाले हैं तो फिर आपको इस स्थान की प्रार्थना से क्या करना है? आपने पहले हिरण्यगर्भ के महान अद्भुत तप का तपन किया था जो बहुत ही अद्भुत स्वरूप वाला था। हे द्विज! उसने मुझसे किसी भी स्थान के लिए याचना नहीं की थी कि जहाँ पर तपश्चर्या की जावेगी। भगवान शम्भु तो सम्भोग के सर्वथा शून्य हैं उन्होंने देवों के भाव से वर्षों तक अर्थात् दस हजार वर्षों तक तपश्चर्या की थी किन्तु उन्होंने भी स्थान की कभी इच्छा नहीं की थी। देवेन्द्र, नीतिहोत्र, शमक, राक्षसों का स्वामी, यादवों के पति, मातरिश्वा तथा धनाध्यक्ष कुबेर इन सबने तीव्रतम तप किया था। जो दिक्पाल के पद की इच्छा रखने वाले थे अर्थात् दिक्पाल के पद की प्राप्ति के ही लिए इन सबने तपस्या की थी। हे महामुने! उन्होंने भी किसी भी स्थान के अनुसन्धान करने की इच्छा नहीं की थी। हे कपिल! देवों के आलय, तीर्थ, स्थल, क्षेत्र तथा पवित्र सरितायें बहुत से पुण्य परिपूर्ण स्थान इस भूमि में स्थित हैं उनमें से आप किसी भी एक स्थान की प्राप्त करके तपश्चर्या करते हैं। हे ब्रह्मन्! क्या वहाँ पर तपश्चर्या की सिद्धि नहीं होगी! फिर मुझसे किसी भी स्थान की प्रार्थना करना केवल आपका विकत्थन ही है। यह ऐसा विकत्थन करना तपस्वियों को धर्म युक्त नहीं होता है।

२०२ 卐 श्रीकालिका पुराण 卐 मार्कण्डेय महर्षि ने कहा-स्वायम्भुव मनु के इस वचन का श्रवण करके सिद्ध कपिल बहुत अधिक कुपित हुए थे और उस समय उन्होंने मनु से कहा। कपिल देव बोले-शीघ्र ही सिद्धि प्राप्त करने के लिए मैंने आपसे स्थान की प्रार्थना की थी किन्तु आप तो बहुत से हेतुओं के द्वारा मेरे ही ऊपर आक्षेप कर रहे हैं। आपके इस अत्यन्त उग्र वचन को मैं सहन करने में असमर्थ हूँ। आप स्वयं तीनों भुवनों के अध्यक्ष हैं यही आपका ऐसा गर्व है। आप मुझे आपका यह वचन क्षमा करने के योग्य नहीं है कि आप मेरी की हुई प्रार्थना को विकत्थन कह रहे हैं। ऐसा जो आप कहते हैं उसका यह फल प्राप्त करिए। यह तीनों भुवनों जिसमें देव, असुर और दानव निवास किया करते हैं इनका अब हत-प्रहत और विध्वंस बहुत ही शीघ्र हो जायेगा। जिसने इस पृथ्वी का उद्धार दिया था अथवा जिसके द्वारा यह पुनः स्थापित की गयी थी, जो इसका अन्तकर्ता है अथवा जो इसकी परिरक्षा करने वाला है वे ही सब सम्पूर्ण चराचर की हिंसा करे। हे मनुदेव! आप शीघ्र ही इन तीनों भुवनों को जल से पूर्ण देखेंगे। आपके गर्व के कारण यह सब हत-प्रहन और विध्वंस हो जायेगा। तपों के निधि मुनीन्द्र कपिलदेवे यह वचन कहकर वहीं अन्तर्धान हो गये थे और फिर वे मुनि उसी समय ब्रह्माजी के स्थान को चले गये थे। कपिल देव के इस वचन को सुनकर मनु का मुख विषाद से युक्त हो गया था। वह होनहार है, ऐसा समझकर उस मनु ने कुछ भी नहीं कहा था। इसके अनन्तर परम बुद्धिमान स्वायम्भुव मनु ने तपस्या करने के लिए ही मन में धारणा की थी। वे समस्त जगतों की भलाई के लिए भगवान् गरुड़ध्वज के दर्शन प्राप्त करने की इच्छा वाले हुए थे। वे गंगा द्वार के समीप में परम विशाल बद्रीविशाल को गमन कर गए थे। वहाँ पहुँचकर जत के धर्त्ता स्वायम्भुव मनु ने स्वयं ही पापों के विनाश करने वाली पुण्यतोया बदरी का वहाँ पर दर्शन किया था। जो सदा फलों वाली थी और नित्य ही कोमल शाद्वल की मञ्जरी से समन्वित थी, जो सुन्दर छाया वाली, मसृण और सूखे हुए यंत्रों से रहित थी।

ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ २०३ वह गंगा के जल की राशि से संसिक्त शिखा और मूल सम्पूर्ण मध्य भाग से समन्वित थी, जो निरन्तर अनेक मुनियों और तपस्वियों के द्वारा उपासना की गई थी । वह स्थान सभी प्रकार से परम शुभ था और नाना मृगों के समुदाय से संयुक्त था जिसके जल में विकसित कमल थे, वह परमाधिक रमणीक था । उस स्थान में प्रवेश करके लोकों के भावन करने वाले मुनि ने तपश्चर्या करने के लिए यत्न किया था । वे वहाँ पर नियत आहार वाले परम समाधि से संयुत हो गये थे । वहाँ पर उन्होंने भगवान हरि की समाराधना की थी जो जगत् के कारण के भी कारण हैं तथा समस्त जगतों के नाथ हैं और नीले मेघ तथा अञ्जन की प्रभा के समान से युक्त थे । मनु ने जिस भगवान के स्वरूप का ध्यान किया था उसी का वर्णन किया जाता है । वे शंख, चक्र, गदा और पद्म के धारण करने वाले हैं, कमल के सदृश लोचनों से युक्त हैं, पीत वर्ण के वस्त्र के धारण करने वाले हैं जो देव गरुड़ के ऊपर विराजमान हैं । जो जगत् से परिपूर्ण हैं, लोकों के नाथ हैं तथा व्यक्त और अव्यक्त स्वरूप वाले हैं, जो इस जगत् के बीज हैं और सहस्र नेत्रों वाले तथा सहस्र शिरों से समन्वित प्रभु हैं, जो सबमें व्यापी, सबके आधार, अज, विभु और नारायण हैं । मनु ने सर्व वेदों से परिपूर्ण इस परम मन्त्र का जाप किया । उस मन्त्र का अर्थ यह है-हिरण्यगर्भ पुरुष, प्रधान अव्यक्त रूप वाले, शुद्ध ज्ञान के स्वरूप वाले भगवान वासुदेव के लिए नमस्कार है । इस प्रकार के मन्त्र का जाप करने वाले स्वायम्भुव मनु के ऊपर जगत् के स्वामी भगवान केशव शीघ्र ही प्रसन्न हो गए थे । अब जिस रूप से भगवान ने मनु को दर्शन दिया था उसका वर्णन किया जाता है, फिर एक क्षुद्रझष (मत्स्य) होकर वे सामने प्राप्त हुए थे जो दुर्बादल के समान प्रभा से युक्त थे, जो कर्पूर कलिका के जोड़े के तुल्य नेत्रों से युगल से युक्त परम उज्ज्वल थे । उस समय में एक बहुत छोटे मत्स्य के स्वरूप से युक्त भगवान जनार्दन तपस्या करते हुए स्वायम्भुव मुनि मनु के सामने आये थे जो मनु महान आत्मा वाले थे ।

२०४ ੴ श्रीकालिका पुराण ੴ वे प्रभु उस समय में महान् आत्मा वाले, कारुण्य से युक्त, सुमन्त्रस्त अर्थात् भययुक्त गद्गदता से समन्वित उन स्वायम्भुव मनु से बोले-हे तपोनिधि! हे महाभाग! आप डरे हुए मेरी रक्षा करने के योग्य होते हैं। विशाल मत्स्यों से मैं परमभीत (डरा हुआ) हूँ जो मुझे कहीं खा न जावें इसीलिए मैं नित्य ही उद्वेग वाला रहता है। हे महाभाग! प्रतिदिन की बड़े-बड़े मत्स्य मुझे खाने के लिए मेरे पीछे दौड़ लगाया करते हैं। सभी ओर से बड़ी संख्या में बड़े मत्स्य मुझे खाने के लिए आया करते हैं। हे नाथ! आप मेरी रक्षा करने के लिए समर्थ हैं। आज बड़े-बड़े रोमों वालो से, बड़े और बहुतों के द्वारा मैं विदारित किया गया हूँ। सबसे छोटा थक गया हूँ और भागने में परम असमर्थ हूँ। मैं अपने प्राणों के रक्षित करने की इच्छा वाला हूँ। आप महान आत्मा वाले हैं ऐसे मुनि मैं आपकी शरणागति मैं प्राप्त हुआ हूँ। यह आपका परम अनुग्रह हैं। आप मेरी रक्षा कीजिए। भय से उद्भ्रान्त मन वाला मैं चंचल तरंगों वाली परम चंचल इस वृक्षों की छाया का अवलोकन करके मत्स्य की ही भाँति डर रहा हूँ। मार्कण्डेय मुन ने कहा-इसके अनन्तर इस अनेक वचन का श्रवण करके स्वायम्भुव मनु परमाधिक कृपा से समन्वित होकर उनसे बोले थे कि मैं आपकी रक्षा करने वाला हूँ। फिर हाथ में जल लेकर उस मत्स्य को उसमें निधापति करके समक्ष में उस परमक्षुद्र मत्स्य के विहार का अवलोकन करने लगे थे। इसके अनन्तर परम दयालु मनु ने सुन्दर स्वरूप वाले उस मत्स्य को जल से पूर्ण विपुल योग वाले अलिञ्जर में रखा दिया था। वह मत्स्य उन मणिक में दिन-दिन में बढ़ता हुआ सामान्य रोहित के शरीर वाला शीघ्र ही हो गया। वह महात्मा प्रतिदिन दश घट जल से पूरिपूर्ण उस मणिक को बढ़ाते रहे थे और मत्स्य को वर्धित कर दिया था। अर्थात् वह मत्स्य बड़ा होता चला गया था और बड़े-बड़े नेत्रों वाला एक बालक मत्स्य थोड़े ही समय में उस मणिक के जल के मध्य में लोमों से युक्त पीन देह वाला हो गया था। मार्कण्डेय मुनि ने कहा-स्वायम्भुव मनु ने उस प्रकार से स्थूल