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कौषीतकि ब्राह्मणोपनिषद् (हिन्दी अनुवाद सहित)

Kaushitaki Brahmana Upanishad with Hindi Translation

स्वामी महेश्वरानन्द गिरि द्वारा

स्रोत: मेहता चैरिटेबल ट्रस्ट दिल्ली · मेहता चैरिटेबल ट्रस्ट दिल्ली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished56 पृष्ठ

११ सबसे पहिचाना जाता है। इस प्रकार का सब विश्व है। तू भी सर्व रूप है, इस प्रकार के वेद के मंत्र से कहा जाता है॥२५॥ यजूंदरः सामशिरा असावृङ्‌मूर्तिरव्यः। स ब्रह्मेति हि विज्ञेय ऋषिर्ब्रह्ममयो महानिति।। तमाह केन पौंसनानि नामान्याप्नोतीति प्राणनेति।।२६।। यजुष् उदर रूप हैं साम मस्तक रूप है। ऋक् उसकी मूर्ति रूप है इस प्रकार अक्षर ब्रह्म है, उसको ऋषि ब्रह्ममय अथवा महान् रूप से जाने। ब्रह्म उससे पूछता है "मेरे पुलिंग नाम तूने किस प्रकार प्राप्त किये?" वह उत्तर देता है "प्राण से।" ॥२६॥ ब्रूयात्केन स्त्रीनामानीति वाचेति केन नपुंसकनामानीति मनसेति केन गन्धानिति घ्राणेनेति ब्रूयात्केन रूपाणीति चक्षुषेति केन शब्दानिति श्रोत्रेणेति केनान्नरसानिति ।।२७।। "मेरे स्त्री लिंग कें नाम किस प्रकार प्राप्त किये?" तब कहता है "वाणी से"। "मेरे नपुंसक नाम किस प्रकार प्राप्त किये" तब कहता है "मन से"। गंध किससे? "घ्राणेन्द्रिय से"। "रूप किससे?" चक्षु से"। "शब्द किससे?" "श्रोत्रेन्द्रिय से"। "अन्न का रस किससे?" ।।२७।। जिह्वयेति केन कर्माणीति हस्ताभ्यामिति केन सुखदुःखे इति शरीरेणेति केनानन्दं रतिं प्रजातिमित्युपस्थेनेति केनेत्या इति पादाभ्यामिति केन धियो विज्ञातव्यं कामानिति प्रज्ञयेति प्रब्रूयात् ।।२८।। "जिह्वा से"। "कर्म किससे"? "हाथों से"। "सुख दुख किससे?" "शरीर से"। "आनन्द रति और प्रजा किससे?" "उपस्थेन्द्रिय से"। "गति किससे?" "पग से"। "बुद्धि किससे पहिचानती है?" "प्रज्ञा

१२ से” इस प्रकार उससे कहना चाहिये ।।२८ ।। तमाहापो वै खलु मे ह्यसावयं ते लोक इति सा या ब्रह्मणि चितिर्या व्यष्टिस्तां चितिं जयति तां व्यष्टिं व्यश्नुते य एवं वेद य एवं वेद ।।२६ ।। पीछे ब्रह्म उससे कहता है “यह जल मेरा है, उस जल से बना हुआ यह लोक तेरा है।” जिसको इस ब्रह्म ज्ञान होता है वह ब्रह्म में जो सम्पत्ति है, उसको जीतता है और ब्रह्म में जो कुछ शक्ति है वह उसको प्राप्त होती है।।२६।।

१३ द्वितीयोऽध्यायः प्राणो ब्रह्मेति ह स्माह कौषीतकिस्तस्य ह वा एतस्य प्राणस्य ब्रह्मणो मनो दूतं वाक्परिवेष्ट्री चक्षुर्गात्रं क्षोत्रं संश्रावयितृ ।।१।। कौषीतकि कहने लगे :— प्राणं ब्रह्म रूप है, प्राण जो ब्रह्म रूप है उसका दूत रूप मन है, वाणी परोसने वाली है। चक्षु शरीर का रक्षक रूप है और श्रोत्र द्वारपाल है ।।१।। यो हवा एतस्य प्राणस्य ब्रह्मणो मनो दूतं वेद दूतवान्भवति यश्चक्षुर्गोप्तृ गोप्तृमान्भवति यः श्रोत्रं संश्रावयितृ संश्रावयितृमान्भवति ।।२।। प्राण रूप ब्रह्म का ,मन दूत है, ऐसे जो जानता है वह दूत वाला होता है, चक्षु को रक्षक जानने वाला रक्षक वाला होता है। जो श्रोत्र को द्वारपाल जानता है वह द्वारपाल से युक्त होता है ।।२।। यो वाचं परिवेष्ट्रीं परिवेष्ट्रीमान्भवति तस्मै वा एतस्मै प्राणाय ब्रह्मण एताः सर्वा देवता अयाचमाना बलिं हरन्ति तथा एवास्मै सर्वाणि भूतान्ययाचनायैव बलिं हरन्ति ।।३।। जो वाणी को परोसने वाली जानता है वह परोसने वाले से युक्त होता है। इस प्राण रूप ब्रह्म के लिये सब देवता अर्थात् इन्द्रियां न मांगने पर भी बलि लाते हैं इसी प्रकार उसकी उपासना करने वाला नहीं मांगे तो भी सब प्राणी बलि लाते हैं ।।३।। य एवं वेद तस्योपनिषन्न याचेदिति तद्यथा ग्रामं भिक्षित्वा लब्ध्वोपविशेन्नाहमतो दत्तमश्नीयामिति य एवैनं पुरस्तात्प्रत्या- चक्षीरंस्त एवैनमुपमन्त्रयन्ते ददाम त इत्येष धर्मो याचतो भवत्यनन्तरस्त्वेवैनमुपमन्त्रयन्ते ददाम त इति ।।४।।

१४ जो इस प्रकार जानता है, उसका परम रहस्य व्रत यह है कि वह किसी से कुछ न मांगे। जैसे एक मनुष्य ग्राम में भिक्षा मांगने जाता है, तब उसको कुछ नही मिलता तब वह ऐसा कह कर बैठता है कि अब मैं भिक्षा में मिला हुआ भक्षण न करूंगा, तब जो लोग भिक्षा देने के लिये मना करते थे वे भी उसको बुलाकर कर देने लगते हैं। जो याचना नहीं करता उसका इस प्रकार का धर्म हैं, परन्तु धन देने वाले ‘हम तुझको देंगे’ ऐसा कह कर बुलाते हैं ।।४।। प्राणो ब्रह्मेति ह स्माह पैंग्यस्तस्य ह वा एतस्य प्राणस्य ब्रह्मणो वाक्व परस्ताच्चक्षुरारुन्धे ।।५।। पैंग्य बोला :- प्राण यह ही ब्रह्म है। प्राण रूप ब्रह्मको वाणी के पीछे चक्षु आवरण करते हैं, चक्षु के पीछे श्रोत्र आवरण करते हैं। श्रोत्र के पीछे मन आवरण करता है और मन के पीछे प्राण आवरण करते हैं।।५।। तस्मै वा एतस्मै प्राणाय ब्रह्मण एताः सर्वा देवता अयाचमानाय बलिं हरन्ति तथा एवास्मै सर्वाणि भूतान्ययाचमानाय बलिं हरन्ति य एवं वेद। यस्योपनिषन्न याचेदिति तद्यथा ग्रामं भिक्षित्वा लब्ध्वोपविशेन्नाहमतो दत्तमश्नीयामिति य एवैनं पुरस्तात्प्रत्याचक्षीरंस्त एवैनमुपमन्त्रयन्ते ददाम त इत्येष धर्मो याचितो भवत्यनन्तरस्त्वे वैनमुपमन्त्रयन्ते ददाम त इति ।।६।। देवता-इन्द्रियां न मांगने पर इस प्राण रूप ब्रह्म को बलि लाकर देते हैं। इसी प्रकार प्राण की ब्रह्म रूप से उपासना करने वाले को नहीं मांगने पर भी प्राणी बलि लाकर देते हैं। ऊपर के समान नहीं मांगने वाले को सब देते हैं ।।६।। अथात एकधनावरोधनं यदेकधनमभिध्यायात्पौर्णमास्यां

१५ वामावास्यां वा शुद्धपक्षे वा. पुण्ये नक्षत्रेऽग्निमुपसमाधाय परिसमुह्य परिस्तीर्य पर्युक्ष्यतोत्पूय दक्षिण जान्वाच्य स्रुवेण वा चमसेन वा कंसेन वैता आज्याहुतीर्जुहोति वाङ्नामदेवतावरोधिनी सा मेऽमुष्मादिदमवरुन्द्धां तस्यै स्वाहा प्राणो नाम देवतावरोधिनी सा मेऽमुष्मादिदमवरुन्द्धां तस्यै स्वाहा चक्षुर्नाम देवतावरोधिनी सा मेऽमुष्मादिदमवरुन्द्धां तस्यै स्वाहा श्रोत्रं ना देवतावरोधिनी सा मेऽमुष्मादिदमवरुन्द्धां तस्यै स्वाहा।।७।। अब उत्तम धनकी प्राप्तिका उपाय कहते हैं उस उत्तम धनकी इच्छा करने वाला मनुष्य पौर्णिमा या आमावस्या को अथवा शुक्ल पक्ष में किसी शुभ नक्षत्र पर अग्नि सिद्ध करे। अग्नि के चारों ओर की भूमिको झाड़ कर उसके चारों ओर दर्भ बिछावे, जल के छींटे लगावे और दाहिना घोंटू झुका कर स्रुवा से अथवा चम्मच से अथवा कांसे के किसी पात्र से आगे लिखे के अनुसार आहुति दे। “वाणी नाम का देवता अवरोधी (प्राप्त कराने वाला) है, वह मुझको उससे मिला दे, उसके लिये स्वाहा।” “प्राण नाम का देवता अवरोधी है, वह मुझको उससे यह प्राप्त करादे, उसके लिये स्वाहा।” “नेत्र नाम का देवता अवरोधी है, वह मुझको उससे यह प्राप्त करादे, उसके लिये स्वाहा” “श्रोत्र नामका देवता अवरोधी है, वह मुझको उसके यह प्राप्त करादे, उसके लिये स्वाहा।।७।। मनो नाम देवतावरोधिनी सा मेऽमुष्मादिदमवरुन्द्धां तस्यै स्वाहा प्रज्ञा नाम देवतावरोधिनी सा मेऽमुष्मादिदमवरुन्द्धां तस्यै स्वाहेत्यथ धूमगन्धं प्रजिघ्रायाज्यलेपेनांगायनुविमृज्य वाचयमोऽभि- प्रवृज्यार्थं ब्रूवीत दूतं वा प्रहिणुयाल्लभते हैव ।।८ ।। “मन नामका देवता अवरोधी है, वह मुझको उससे यह प्राप्त करादे, उसके लिये स्वाहा।” “प्रज्ञा नामका देवता अवरोधी है, वह

१६ मुझको उससे यह प्राप्त करादे उसके लिये स्वाहा"। (यह आहुतियां देने के बाद) वह नाक से धुयें को सूंघे और सर्वांग में घृत का लेपन करे, मौन धारण करते हुए (वह पदार्थ जिसके पास हो उसके पास) चला जाय और अपनी इच्छा प्रकट करे अथवा किसी दूत को भेज कर ऐसा करे। उसको अर्थ की प्राप्ति हो जायेगी ॥ ८ ॥ अथातो दैवःस्मरो यस्य प्रियो बुभूषेद् यस्यै वा एषां वैतेषांमेवैतस्मिन्पर्वण्यग्निमुपसमाधायैतयैवावृत्तैता आज्याहुतीर्जु- होति ।। ६ ।। अब देवस्मर (देवंताओं से पूर्ण होने वाली कामना) कहते हैं। जिस किसी एक पुरुष को वां स्त्री को अथवा अनेक पुरुषों को वा स्त्रियों को हम प्रिय हों ऐसी किसी को इच्छा हो तो वह ऊपर लिखे हुए मुहूर्त पर बराबर उसी रीति के अनुसार अग्नि में नीचे लिखे मन्त्रों से आहुतियां दें॥ ६॥ वाचं ते मयि जुहोम्यसौ स्वाहा प्राणं ते मयि जुहोम्यसौ स्वाहा चक्षुस्ते मयि जुहोम्यसौ स्वाहा श्रात्रं ते मयि जुहोम्यसौ स्वाहा मनस्ते मयि जुहोम्यसौ स्वाहा ॥ १० ।। तेरे वाणी का यह मैं अपने में हवन करता हूँ स्वाहा। तेरे श्रोत्र का मैं अपने में हवन करता हूँ स्वाहा। तेरे मनका यह मैं अपने में हवन करता हूँ स्वाहा ॥१०॥ प्रज्ञानं ते मयि जुहोम्यसौ स्वाहेत्यथ धूमगन्धं प्रजिघ्रायाज्यलेपेनांगान्यनुविमृज्य वाचंमयोऽभिप्रवृज्य संस्पर्श जिगमिषेदपि वाताद्वा संभाषमाणस्तिष्ठेत्प्रियो हैव भवति स्मरन्ति हैवास्य ॥११॥ तेरे प्रज्ञान का यह मैं अपने में हवन करता हूँ स्वाहा! (ये आहुतियां

१७ देने के पश्चात्) वह नाक से धूयें को सूंघे और सब अंगों में घृत का लेन करे, मौन धारण करते हुए उससे स्पर्श हो इस प्रकार उसके पास जाने की इच्छा करे अथवा दूर से वैसा कहता हुआ खड़ा रहे। निश्चय यह प्रिय हो जायेगा और वे उसको याद करेंगे ।।११।। अथातः सांयमनं प्रतर्दनमान्तरमग्निहोत्रमित्याचक्षते यावद्वै पुरुषो भासते न तावत्प्राणितुं शक्नोति प्राण तदा वाचि जुहोति यावद्वै। ।१२ ।। अब प्रतर्दन का अनुष्ठान किया हुआ संयमन (निरोधन) कहते हैं—इसी को आन्तर अग्निहोत्र कहते हैं। मनुष्य जब तक बोलता रहता है, तब तक वह श्वास-प्रश्वास नहीं ले सकता ।।१२ ।। पुरुषः प्राणिति न तावद्भाषितुं शक्नोति वाचं तदा प्राणे जुहोत्येतेऽनन्तेऽमृताहुतीर्जाग्रच्च स्वपंश्च संततमव्यवच्छिन्नं जुहोत्यथ या अन्या ।।१३।। इस समय वह अपने वाणी में प्राण का हवन करता है और जब तक वह श्वास-प्रश्वास करता रहता है तब तक वह अपने प्राण का वाणी में हवन करता है—वह जागता हो या निद्रित हो ।।१३।। आहुतयोऽन्तवत्यस्ताः कर्ममय्यो भवन्त्येतद्ध वै पूर्वे विद्वांसोऽग्निहोत्रं जुहवांचक्रुः ।।१४ ।। यह कभी न समाप्त होने वाली अखण्ड आहुतियाँ बराबर हुआ करती हैं। सामान्य आहुतियाँ अन्त वाली होती हैं क्योंकि वे कर्म रूप हैं। प्राचीन काल के विद्वान् लोग इस अग्निहोत्र को करते थे ।।१४।। उक्थं ब्रह्मेति ह स्माह शुष्कभृंगारस्तदृगित्युपासीत सर्वाणि हास्मै भूतानि श्रैष्ठ्यायाभ्यर्च्चन्ते तद्यजुरित्युपासीत सर्वाणि हास्मै भूतानि श्रैष्ठ्याय युज्यन्ते तत्सामेत्युपासीत ।।१५।।

१८ उक्थ ब्रह्म है, ऐसा शुष्क भृङ्गार ने कहा है। यह उक्थ और ऋक् एक ही है ऐसा समझ कर उसका मनन करे। सब प्राणी उसी को श्रेष्ठ मानकर उसकी ही अर्चना करते हैं। वह और यजुर्वेद एक ही है ऐसा समझ कर उसका मनन करे ।।१५ ।। सर्वाणि हास्मै भूतानि श्रेष्ठ्याय सन्नमन्ते तच्छ्रीरित्युपासीत तद्यश इत्युपासीत त्त्तेज इत्युपासीत तद्यथैतच्छास्त्राणां श्रीमत्तमं यशस्वितमं ।।१६ ।। प्राणी उसी को श्रेष्ठ मान के उसका योग करते हैं (ध्यान करते हैं)। वह और साम एक ही है ऐसा समझ कर उसका मनन करे। समस्त प्राणी उसको श्रेष्ठ मानकर उसको नमस्कार करते हैं। यह और ऐश्वर्य एक ही है, ऐसा ध्यान करे, यह और यश एक ही है ऐसा ध्यान करे। यह और तेज एक ही है ऐसा ध्यान करे ।।१६ ।। तेजस्वितमं भवति तथा एवैवं विद्वान्सर्वेषां भूतानां श्रीमत्तमो यशस्वितमस्तेजस्वितमो भवति तमेतमैष्टकं कर्ममयमात्मान- मध्वर्युः संस्करोति तस्मिन्यजुर्मयं प्रवयति यजुर्मयं ऋङ्मये साममयमुद्गाता स एष सर्वस्यै त्रयीविद्याया आत्मैष उ एवास्यात्मा एतदात्मा भवति य एवं वेद ।।१७ ।। जिस प्रकार धनुष सब शस्त्रों में अत्यन्त श्रीयुक्त और अत्यन्त तेजस्वी होता है उसी प्रकार यह जानने वाला मनुष्य समस्त प्राणियों में अत्यन्त श्रीयुक्त, अत्यंत यशस्वी और अत्यंत तेजस्वी होता है। कर्म का साधन रूप समिधां से प्रज्वलित अग्नि ही वह स्वयं है ऐसा अध्वर्यु मानता है और वह यज्ञ का यजुर्भाग उसमें प्रवेश कराता है। होता यजुर्भाग में ऋग् भाग का प्रवेश कराता है। उद्गाता ऋग् भाग में साम भाग का प्रवेश कराता है, वही त्रयी विद्या का आत्मा है, सचमुच वही उसका आत्मा है—यह जो जानता है वह वही हो जाता है ।।१७।।

१६ अथातः सर्वजितः कौषीतकेस्त्रीण्युपासनानि भवन्ति यज्ञोपवीतं कृत्वाप आचम्य त्रिरुदपात्रं प्रसिच्योद्यन्तमादित्यमुपतिष्ठेत वर्गोऽसिपाप्मानं में वृङ्ग्धीत्येतयैवावृता मध्ये सन्तमुद्वर्गोऽसि पाप्मानं म उद्धृङ्ग्धीत्येतयैवावृतास्तं यन्तं संवर्गोऽसि पाप्मानं मे संवृङ्ग्धीति यदहोरात्राभ्यां पापं करोति सं तद्वृङ्क्ते ।। १८ ।। जब सर्वजित कौषीतकि (नामक प्रयोग) कहते हैं। इसके तीन प्रकार होते हैं। यज्ञोपवीत पहन कर और आचमन करके जल के पात्र का तीन बार सिंचन करके उदय होने वाले आदित्य की प्रार्थना करे—"तू वर्ग (दुखों से मुक्त करने वाला) है, मुझे पातकों से मुक्त कर।" इसी प्रकार सूर्य मध्याह्न होने पर वह प्रार्थना करे—"तू दुखों से मुक्त करने वाले में श्रेष्ठ है, मुझे पातकों से मुक्त कर।" इसी प्रकार अस्त समय में सूर्य की प्रार्थना करे—"तू सम्पूर्ण रीति से पातकों से मुक्त करने वाला है मुझे समस्त पातकों से मुक्त कर। इस प्रकार दिन में और रात में किये हुए, समस्त पापों का वह नाश करता है। इसी प्रकार यह जानने वाला मनुष्य भी सूर्य की उपासना करता है और उससे वह दिन और रात में किये हुए सब पातकों का नाश करता है।।१८।। अथ मासि मास्यमावास्यायां पश्चाच्चन्द्रमसं दृश्यमानमुपतिष्ठे- तैतयैवावृता हरिततृणाभ्यामथ वाक् प्रत्यस्यति यत्ते सुसीमं हृदयमधिश्चन्द्रमसि श्रितम् ।। तेनामृतत्वस्येशानं माहं पौत्रमघं रुदमिति न हास्मात्पूर्वाः प्रजाः प्रयन्तीति नु जातपुत्रस्याथाजात- पुत्रस्याह ।। आप्यायस्व समेतु ते सन्ते पयांसि समुयन्तु वाजा यमादित्या अंशुमाप्याययन्तीत्येतास्तिस्र ऋचो जपित्वा नास्माकं प्राणेन प्रजया पशुभिराप्याययस्वेति दैवीमावृतमावर्त आदित्यस्यावृत- मन्वावर्त इति दक्षिणं बाहुमन्वावर्तते ।। १९ ।। अब प्रति मास अमावस्या के पश्चात पश्चिम में स्थित चन्द्र की

उपासना करे अथवा चन्द्र की ओर दो दूर्वांकुर फेंक कर कहे—"हे मरण रहित आनन्दमय देव चन्द्र में रहे हुए तेरे कोमल हृदय से ऐसा करो कि मुझे मेरे पुत्र के आपत्ति सम्बन्धी शोक करने का प्रसंग कभी न आवे।" उसकी सन्तति उसके आगे कभी नहीं मरेगी जिसके पहिले से पुत्र है उसके सम्बन्ध में यह समझना ।। जिसके अभी पुत्र नहीं है उसके सम्बन्ध में कहते हैं—ऐसा मनुष्य आगे लिखी हुई ऋग्वेद की तीन ऋचायें पठन करे—"आप्या यस्व समेतु ते" (ऋ० १-६१-१६) (हे सोम तेरी समृद्धि हो और तेरे अंगों में सामर्थ्य प्राप्त हो), "सन्तेपयाँसि समुयन्तु वाजा" (ऋ० १-३१-४) (दूध और अन्न तुझे प्राप्त हो), "यमादित्या अंशुमाप्या ययन्ति" (ऋ० १-६१-१८) (जिस किरण को सूर्य आनन्दमयं बनाता है)। इन तीन ऋचाओं का जप करके वह प्रार्थना करे—"हमारे प्राण, सन्तति और हमारे पशु इनसे (हमारे शत्रुओं को) समृद्ध न कर। जो हमारा द्वेष करते हैं और जिनका हम द्वेष करते हैं उनका प्राण, उनकी सन्तति, उनके पशु इनसे हमारी समृद्धि करे। इस प्रकार मैं दैवी आवृत्ति करता हूँ।" ऐसा कहकर चन्द्र की तरफ दाहिना हाथ ऊंचा करके पुनः दूर्वांकुर प्रदान करे ।।१६।। अथ पौर्णमास्यां पुरस्ताच्चन्द्रमसं दृश्यमानमुपतिष्ठेतैतयैवावृता सोमो राजासि विचक्षणः पञ्चमुखोऽसि प्रजापतिर्ब्राह्मणस्त एकं मुखं तेन मुखेन राज्ञोऽत्सि ।।२०।। पौर्णमासी के दिन चन्द्र पूर्व की ओर दिखाई देता है। उसकी इसी प्रकार पूजा करते समय यह प्रार्थना करे—"तू सोम है, राजा है, ज्ञानी है, पंच मुख वाला है, प्रजापति है, ब्राह्मण मेरा एक मुख है उस एक मुख से तू राजाओं को खाता है ।।२०।। तेन मुखेन मामन्नादं कुरु ।। राजा त एकं मुखं तेन मुखेन विशोऽत्सि तेनैव मुखेन मामन्नदं कुरु ।। श्येनस्त एकं मुखं तेन

२१ मुखेन पक्षिणोऽत्सि तेन मुखेन मामन्नादं कुरु ।।२१।। उसी मुख से मुझे अन्न खाने वाला कर। क्षत्रिय तेरा एक मुख है, उस मुख से तू वैश्यों को खाता है। उसी मुख में मुझे अन्न खाने वाला कर। श्येन पक्षी तेरा एक मुख है, उस मुख से तू पक्षियों को खाता है। उसी मुख से तू मुझे अन्न खाने वाला कर ।।२१।। अग्निस्त एकं मुख तेन मुखेनेमं लोकमत्सि तेन मुखेन मामन्नादं कुरु। त्वयि पञ्चमं मुखं तेन मुखेन सर्वाणि भूतान्यत्सि तेन मुखेन मामन्नादं कुरु।। मास्माकं प्राणेन प्रजया पशुभिरवक्षेष्ठा ।।२२।। अग्नि तेरा एक मुख है, उस मुखसे तू इस लोक को खाता है। उस मुख से तू मुझे अन्न खाने वाला कर। तुझमें पाँचवाँ मुख है उससे तू सब भूतों को खाता है, उससे तू मुझे अन्न खाने वाला कर। हमारे प्राण, हमारी सन्तति, हमारे पशु इनसे तेरा क्षय न हो ।।२१।। योऽस्मान्द्वेष्टि यं च वयं द्विष्मस्तस्य प्राणेन प्रजया पशुभिरवक्षीयस्वेति स्थितिदैवीमावृतमावर्त आदित्यस्यावृतमन्वावर्त इति दक्षिणं बाहुमन्वावर्तते ।।२२।। जो हमारा द्वेष करता है और जिससे हम द्वेष करते हैं उसका प्राण, उसकी सन्तति, उसके पशु इनसे तू क्षीण हो” । इस प्रकार मैं देवों का संचार कराता हूँ, मैं आदित्य का संचार अनुसरता हूँ। ऐसा कह कर दाहिना हाथ ऊंचा करके दूर्वांकुर प्रदार करे ।।२२।। अथ संवेश्यञ्जायायै हृदयमभिमृशेत् ।। यत्ते सुसीमे हृदये हितमन्तः प्रजापतौ ।। मन्येऽहं मां तद्विद्वांसं माहं पौत्रमघं रुदमिति न हास्मात्पूर्वाः प्रजाः प्रैति ।।२३।। अब अपनी स्त्री को पास बुलाकर, उसके हृदय को स्पर्श करके

२२ कहे-जो मुझमें तेरे कोमल हृदय में प्रजापति के अर्थ प्रविष्ट हुआ है, उससे कभी नाश न होने वाले आनन्द को प्राप्त हुई, हे सुन्दरी, तुझे पुत्र सम्बन्धी शोक करने का प्रसंग कभी न प्राप्त हो। उसकी सन्तति उसके पहिले कभी नहीं मरेगी ।।२३।। अथ प्रोष्यायन्पुत्रस्य मूर्धानमभिमृशति ं गादंगात् संभवसि हृदयादधिजायसे । आत्मा वै पुत्रनामासि स जीव शरदः शतम् ।। असाविति नामास्य गृह्णाति। अश्मा भव परशुर्भव हिरण्यमस्तृतं भव ।।२४।। प्रवास करके वापस आने पर पुत्र का मस्तक सूँघे कहे तू मेरे प्रत्येक अवयव से उत्पन्न हुआ है, तू हृदय से उत्पन्न हुआ है, हे पुत्र सचमुख तू मेरी आत्मा है, सो तू सौ वर्ष पर्यन्त जी।" वह उसका नाम लेकर कहे "तू पत्थर हो, तू परशु हो, सोने का डेला हो ।।२४।। तेजो वै पुत्रनामासि स जीव शरदः शतम् ।। असाविति नामास्य गृह्णाति । येन प्रजापतिः प्रजाः पर्यगृह्णीतारिष्ट्यै तेन त्वा परिगृह्णाम्यसावित्यथास्य दाक्षेणे कर्णे जपति अस्मै प्रयन्धि मघवन्नृजीषिन्नितीन्द्र श्रेष्ठानि द्रविणानि धेहीति सव्ये माच्छिथा मा व्यथिष्ठाः शतं शरद आयुषो जीव पुत्र। ते नाम्ना मूर्धानमभिजिघ्राम्यसाविति त्रिरस्य मूर्धानमभिजिघ्रेद् गवां त्वा हिंकारेणाभिहिंकरोमीति त्रिरस्य मूर्धानमभिहिंकुर्यात् ।।२५।। हे पुत्र, तू सचमुच तेज है सो तू सौ वर्ष तक जी।" उसका नाम लेकर आलिंगन करते हुए वह कहता है- प्रजापति ने प्राणी मात्र का कल्याण के लिये आलिंगन किया, वैसे ही मैं तेरा आलिंगन करता हूँ। पश्चात् पुत्र के दाहिने कान में यह मन्त्र कहे- "अस्मे प्रयन्धि मघवन्नृजीषिन् (ऋ० ३-२६-१०) (हे चपल इन्द्र तू इसको दे)" और

२३

बांए कान में कहे— 'इन्द्र श्रेष्ठानि द्रविणानि धेहि (ऋ० २-२१-६) (हे इन्द्र तू श्रेष्ठ द्रव्य दे), पश्चात् तीन बार मस्तक सूँघते हुए कहे" तू हमारा वंश छेद न कर, दुखी न होते हुए सौ वर्ष तक जी। हे पुत्र यह मैं तेरा नाम लेकर तेरा मस्तक सूंघता हूँ।।' पश्चात् “मैं गाय के हुँकार के समान तुझ पर हुँकारता हू”, ऐसा कह कर वह पुत्र के मस्तक पर तीन बार हुँकार करे।। २५ ।। अथातो दैवः परिमर एतद्वै ब्रह्म दीप्यते यदग्निर्ज्वलत्यथैतन्म्रियते यन्न ज्वलति तस्यादित्यमेव तेजो गच्छति वायुं प्राण एतद्वै ब्रह्म दीप्यते ।।२६ ।। अब देवपरिमर (सब देवताओं का ब्रह्म में लीन होना) कहते हैं—अग्नि जलते हुए ब्रह्म ही प्रकाशता है, वह नहीं जलता है, तब मरता है। उसका तेज सूर्य में जाता है और प्राण वायु में जाता हैं सूर्य प्रकाशता है तब ब्रह्म ही प्रकाशता है ।। २६ ।। यदादित्यो दृश्यतेऽथैतन्म्रियते यन्न दृश्यते तस्य चन्द्रमसमेव तेजो गच्छति वायुं प्राण एतद्वै ब्रह्म दीप्यते यच्चन्द्रमा दृश्यतेऽथैतन्म्रियते यन्न दृश्यते तस्य विद्युतमेव तेजो गच्छति वायु प्राण एतद्वै ब्रह्म दीप्यते यद्विद्युद्विद्योततेऽथैतन्म्रियते यन्न विद्योतते तस्य वायुमेव तेजो गच्छति वायुं प्राणस्ता वा एताः सर्वा देवता वायुमेव प्रविश्य वायौ सृप्ता न मृच्छन्ते तस्मादेव पुनरुदीरत इत्यधिदैवतमथाध्यात्मम् ।।२७ ।। वह नहीं दीखता तब मर जाता है। उसका तेज चन्द्रमा ही में जाता है, प्राण वायु में जाता है। चन्द्र दीखता है तब ब्रह्म की प्रकाशता है—वह नहीं दीखता तब मर जाता है। उसका तेज बिजली में जाता है और प्राण वायु में जाता हैं बिजली चमकती है तब ब्रह्म ही प्रकाशता है,

२४ वह नहीं चमकती तब मरता है। उसका तेज वायु में जाता है, और प्राण वायु में जाता है। इस प्रकार यह देवता वायु में प्रवेश करके वायु में रहते हैं, नष्ट नहीं होते। उसी वायु से वे सदा बाहर निकलते हैं- यह देवता सम्बन्धी कथन हुआ, अब शरीर सम्बन्धी कहते हैं ।।२७।। एतद्वै ब्रह्म दीप्यते यद्वाचा वदत्यथैतन्म्रियते यन्न वदति तस्य चक्षुरेव तेजो गच्छति प्राणं प्राण एतद्वै ब्रह्म दीप्यते यच्चक्षुषा पश्यत्यथैतन्म्रियते यन्न पश्यति तस्य श्रोत्रमेव तेजो गच्छति प्राणं प्राण एतद्वै ब्रह्म दीप्यते यच्छ्रोत्रेण शृणोत्यथैतन्म्रियते यन्न शृणोति तस्य मन एव तेजो गच्छति प्राणं प्राण एतद्वै ब्रह्म दीप्यते ।।२८।। मनुष्य वाणी से बोलता है तब ब्रह्म ही प्रकाशता है, जब नहीं बोलता तब मर जाता हैं. उसका तेज नेत्र में ही जाता है, प्राण प्राण में जाता है। मनुष्य आंखों से देखता है तब ब्रह्म ही प्रकाशता है और नहीं देखता तब मरता है। उसका तेज कान ही में जाता है और प्राण में जाता है। अब मनुष्य कान से सुनता है, तब ब्रह्म ही प्रकाशता है और नहीं सुनता तब मर जाता है। उसका तेज मन ही में जाता है, प्राण प्राण में जाता है। मनुष्य मनसे विचार करता है ।।२८।। यन्मनसा ध्यायत्यथैतन्म्रियते यन्न ध्यायति तस्य प्राणमेव तेजो गच्छति प्राणं प्राणस्ता वा एताः सर्वा देवताः प्राणमेव प्रविश्य प्राणे सुप्ता न मूर्च्छन्ते ।।२६।। तब ब्रह्म ही प्रकाशता है जब नहीं विचार करता तब मर जाता हैं उसका तेज़ मन में जाता है और प्राण प्राण में जाता हैं इस प्रकार ये सब देवता (इन्द्रियां) प्राण ही में प्रवेश करके प्राण ही में लीन रहते हैं और नष्ट नहीं होते ।।२६।। तस्माद्वैव पुनरुदीरते तद्यदिह वा एवंविद्वांस उभौ

२५ पर्वतावभिप्रवर्तेयातां तुस्तूर्षमाणौ दक्षिणश्चोत्तरश्च न हैवैनं स्तृण्वीयातामथ य एनं द्विषन्ति यांश्च स्वयं द्वेष्टि त एनं सर्वे परितो म्रियन्ते ।।३०।। उसी प्राण से वे फिर बाहर निकलते हैं। यह दक्षिण और उत्तर के दोनों पर्वत ऐसा जानने वाले को पीस डालने के लिये आगे बढ़ने पर भी नहीं पीस सकेंगे। परन्तु जो उससे द्वेष करते हैं और वे सब जिससे वह द्वेष करता है उसके पास आकर मर जाते हैं।।३०।। अथातो निःश्रेयसादानं एता ह वै देवता अहंश्रेयसे विवदमाना अस्माच्छरीरादुच्चक्रमुस्तद्दारुभूतं शिश्येथैतद्वाक्प्रविवेश ।।३१।। अब निःश्रेयसादान (प्राणों का श्रेष्ठत्व ग्रहण) कहते हैं, देवता अपनी श्रेष्ठता के लिये वाद करने लगे और शरीर के बाहर निकल गये और शरीर लकड़ी के समान पड़ा रहा। पश्चात् वाणी ने उसमें प्रवेश किया।।३१।। तद्वाचा वदच्छिश्य एव् अथैनच्चक्षुः प्रविवेश तद्वाचा वदच्चक्षुषा पश्यच्छिश्य एवाथैतच्छ्रोत्रं प्रविवेश तद्वाचा वदच्चक्षुषा पश्यच्छ्रोत्रेण शृण्वच्छिश्य एवाथैतन्मनः प्रविवेश तद्वाचा वदच्चक्षुषा पश्यच्छ्रोत्रेण शृण्वन्मनसा ध्यायच्छिश्य एवाथैतत्प्राणाः प्रविवेश तत्तत एव समुत्तस्थौ तद्देवाः प्राणे निःश्रेयसं विचिन्त्य प्राणमेव प्रज्ञात्मानमभिसंस्तूय सहैतैः सर्वैरस्माल्लोकदुच्चक्रमुस्ते वायुप्रतिष्ठा आकाशात्मानः स्वर्युस्तथा एवैवंविद्वान् सर्वेषां भूतानां प्राणमेव प्रज्ञात्मानमभिसंस्तूय सहैतैः सर्वैरस्माच्छरीरादुत्क्रामति न वायुप्रतिष्ठा आकाशात्मा न स्वरेति स तद्भवति ।।३२।। परन्तु वाणी से बोलता हुआ भी वह पड़ा ही रहा। पश्चात् नेत्र ने प्रवेश किया परन्तु वाणी से बोलता हुआ और नेत्र से देखता हुआ

२६ भी वह पड़ा रहा। पश्चात् कर्णेन्द्रिय ने प्रवेश किया परन्तु वाणी से बोलता, नेत्रों से देखता और कर्णों से सुनता हुआ भी वह पड़ा ही रहा। पश्चात् मन ने उसमें प्रवेश किया परन्तु वाणी से बोलता हुआ, नेत्रों से देखता हुआ, कानों से सुनता हुआ और मन से विचार करता हुआ भी वह पड़ा ही रहा। पश्चात् प्राण ने उसमें प्रवेश किया-तत्काल ही वह उठ खड़ा हुआ। तब प्राण का श्रेष्ठत्व स्वीकार करे प्राण ही एक जानने वाला आत्मा है ऐसा जानकर सब देवता प्राणों के साथ उस शरीर से बाहर निकले और वायु में स्थिर होकर और आकाश में लीन होकर स्वर्गलोक में गये। ऐसा जानने वाले मनुष्य को प्राणों का श्रेष्ठत्व विदित होता है और प्राण ही प्रज्ञात्मा है ऐसा वह जानता है और इसी प्रकार वह शरीर से बाहर निकलता है और वायु में स्थिर होकर और आकाश में लय होकर स्वर्गलोक में जाता है।।३२।। यत्रैतद्देवास्तत्प्राप्य तदमृतो भवति यदमृता देवाः ।। ३३ ।। जिस स्थान में वे देवता होते हैं उस स्थान में वह जाता है इस अवस्था को पहुँचने पर यह जानने वाला मनुष्य उन देवताओं को प्राप्त हुए अमरत्व से अमर हो जाता है।।३३।। अथातः पितापुत्रीयं संप्रदानमिति चाचक्षते पिता पुत्रं प्रेष्यान्नह्वयति नवैस्तृणैरगारं संस्तीर्याग्निमुपसमाधायोदकुम्भं सपात्रमुपनिधायाहतेन वाससा संप्रच्छन्नः स्वयं श्येत एत्य पुत्र उपरिष्टादभिनिपद्यत इन्द्रियैरस्येन्द्रियाणि संस्पृश्यापि वास्याभिमुखत एवासीताथास्मै संप्रयच्छति वाचं मे त्वयि दधानीति पिता वाचं ते मयि।।३४।। अब आगे पिता पुत्रीय सम्प्रदान (पिता का पुत्र को देने का उपदेश), कहते हैं-(पिता मरते समय अपने पुत्र को बुलाता है) उसके पहले

२७ घर में नयी घास बिछाकर, अग्नि सिद्ध करके, उसके पास पात्रों के साथ पानी का घड़ा रखकर श्वेत वस्त्र पहन करके और कोरा कपड़ा ओढ़कर आ बैठता है और पुत्र के ऊपर झुकता है और अपने इन्द्रियों से उसकी इन्द्रियों को स्पर्श करता है अथवा वह उसके आगे बैठकर यह उपदेश करे— "मेरी वाणी तुममें स्थित हो।" पुत्र कहे "तुम्हारी वाणी मैं ग्रहण करता हूँ ।।३४।। दध इति पुत्रः प्राणं में त्वयि दधानीति पिता प्राणं ते मयि दध इति पुत्रश्चक्षु में त्वयि दधानीति पिता चक्षुस्ते मयि दध इति पुत्रः श्रोत्रं में त्वयि दधानीति पिता श्रोत्रं ते मयि दध इति पुत्रो मनो में त्वयि ।।३५।। पिता कहे, "मेरा प्राण तुझमें प्रविष्ट हो।" पुत्र कहे, "तुम्हारा प्राण मैं ग्रहण करता हूँ।" पिता कहे, "मेरे नेत्र तुझमें स्थित हों" पुत्र कहे, "तुम्हारे नेत्र मैं ग्रहण करता हूँ।" पिता कहे, "मेरा कर्ण तुझमें प्रविष्ट हो।" पुत्र कहे "तुम्हारे कर्ण अपने में ग्रहण करता हूँ।" पिता कहे, "मेरा अन्न रस तुझमें स्थित हो।" ।।३५।। दधानीति पिता मनस्ते मयि दध इति पुत्रोऽन्नरसान्मे त्वयि दधानीति पितान्नरसांस्ते मयि दध इति पुत्रः कर्माणि में त्वयि दधनीति पिता कर्माणि ते मयि दध इति ।।३६।। पुत्र कहे, "तुम्हारे अन्न रस को अपने में ग्रहण करता हूँ।" पिता कहे, "मैं अपने कर्म तुझको देता हूँ। पुत्र कहे, "मैं तुम्हारे कर्म अपने में ग्रहण करता हूँ।" पिता कहे, "मैं अपने सुख दुःख तुझमें प्रविष्ट कराता हूँ ।।३६।। पुत्रः सुखदुःखे मे त्वयि दधानीति पिता आनन्दं रतिं प्रजातिं ते मयि दध इति पुत्र इत्यां में त्वयि दधानीति ।।३७।।

२८ पुत्र कहे, “तुम्हारे सुख दुःख मैं ग्रहण करता हूँ।” पिता कहे “मेरा आनंद, संतोप तुझे प्राप्त हो।” पुत्र कहे, “तुम्हारा आनन्द, सन्तोष और सन्तति अपने में ग्रहण करता हूँ।।३७।। पिता इत्यां ते मयि दध इति पुत्रो धियो विज्ञातव्यं कामान्मे त्वयि दधानीति पिता धियो विज्ञातव्यं कामांस्ते मयि दध इति पुत्रोऽथ दक्षिणावृदुपनिष्क्रामति तं पितानुमन्त्रयते यशोब्रह्मवर्च- समन्नाद्यं कीर्तिस्त्वा जुषतामित्यथेतरः सव्यमसमन्ववेक्षते पाणि- नान्तर्धाय वसनान्तेन वा प्रच्छाद्य स्वर्गांल्लोकान्कामानवाप्नुहीति स यद्यगदः ।।३८ ।। पिता कहे, “मेरा गमन तुझमे होने दे।” पुत्र कहे, “तुम्हारा गमन मैं अपने में कराता हूँ।” पिता कहे “मेरा मन तुझमें रहने दे।” पुत्र कहे, “तुम्हारा मन मैं मुझमें प्रविष्ट कराता हूँ।” पिता कहे, “मेरी प्रज्ञा तुझमें रहने दे।” पुत्र कहे, “तुम्हारी प्रज्ञा को मैं ग्रहण करता हूँ।” यदि वह बहुत बीमार हो तो “मेरे प्राण तुझमें रहने दे” इतना कहे और पुत्र “तुम्हारे प्राण मैं अपने में ग्रहण करता हूँ” ऐसा उत्तर दे। पश्चात् दाहिने नेत्र से पिता को देखते हुए पुत्र पिता को प्रदक्षिणा करते हुए चला जाता है। पिता उसको बुलाकर कहता है “मेरा यश, ब्रह्मवर्चस् और सम्मान तुझे हमेशा प्राप्त हो।” इसके पश्चात् कोई अपने हाथ से अथवा वस्त्र से अपने को ढककर स्कन्ध से पीछे देखे और कहे, स्वर्गलोक तथा सम्पूर्ण इच्छित पदार्थ तुझको प्राप्त हो। इसके पश्चात् यदि पिता अच्छा हो जाय तो वह पुत्र के अधिकार में रहे।।३८।। स्यात्पुत्रस्यैश्वर्ये पिता वसेत्परिव्राव्रजेद्यद्युवै प्रेयाद्यदेवैनं समापयति तथा समापयितव्यो भवति तथा समापयितव्यो भवति।।३६।।

२६ अथवा संन्यास ग्रहण करे। परन्तु यदि मर जाय तो उसकी अंत क्रिया योग्यता के अनुसार कर दे। उसकी क्रिया योग्यता के अनुसार कर दे। । ३६ । ।

३० तृतीयोध्यायः ॐ प्रतर्द्नो ह वै देवोदासिरिन्द्रस्य प्रिय धामोपजगाम युद्धेन पौरुषेण च तं हेन्द्र उवाच प्रतर्दन वरं ते ददानीति से होवाच प्रतर्दनस्त्वमेव मे वृणीष्व यं त्वं मनुष्याय हिततमं मन्यस इति ।।१।। दिवोदास का पुत्र प्रतर्दन युद्ध और पराक्रम से इन्द्र के परम धाम को पहुँचा, उससे इन्द्र ने कहा, “हे प्रतर्दन! मैं तुझे क्या वरदान दूं?” प्रतर्दन ने कहा “आपको जो पसन्द हो जिसको आप मनुष्य के लिये सर्वाधिक हितकारी समझते हों वह वरदान मुझे दीजिये ।।१।। तं हेन्द्र उवाच न वै वरं परस्मै वृणीते त्वमेव वृणीष्वेत्यवरो वै तर्हि किल म इति होवाच प्रतर्दनोऽथो खल्विन्द्रः सत्यादेव नेयाय सत्यं हीन्द्रः स होवाच मामेव विजानीह्येतदेवाहं मनुष्याय हिततमं मन्ये यन्मां विजानीयात् त्रिशीर्षाणं त्वाष्ट्रमहनमरुन्मुखान्यतीन्साला- वृकेभ्यः प्रायच्छं बहीः संधा अतिक्रम्य दिवि प्रह्लादीयान- तृणमहमन्तरिक्षे पौलोमान्पृथिव्यां कालखाञ्जान् तस्य मे तत्र न लोम च नामीयते स यो मां विजानीयान्नाय केन च कर्मणा लोको मीयते न मातृवधेन न पितृवधेन न स्तेयेन न भ्रूणहत्यया नास्य पापं च न चकृषो मुखान्नीलं वेतींति ।।२।। इन्द्र बोला “कोई दूसरेको दिया वरदान स्वयं पसन्द नहीं करता, अतः तू अपने लिये आप ही वरदान मांग।” प्रतर्दन बोला “मुझे पसन्द करने के लिये कुछ है ही नहीं।” इन्द्र ने कभी सत्य का त्याग नहीं किया क्योंकि इन्द्र सत्य रूप है। इन्द्र बोला “तू मुझ ही को जान, मनुष्य के लिये मैं यही उत्तम हित मानता हूँ कि यह मुझे पहिचाने।