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कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ
७२०कौटिल्य का अर्थशास्त्र[ तेरहवां अधिकरण

वरणान्यभिहरेयुः, देवध्वजप्रतिमाभिर्वा । ततस्तद्व्यञ्जनाः प्रमत्तवधमव- स्कन्दप्रतिग्रहमभिप्रहरणं पृष्ठतः शङ्खदुन्दुभिशब्देन वा प्रविष्टमित्यावेद- येयुः । प्राकारद्वाराट्टालकदानमनीकभेदं घातं वा कुर्युः । (१) सार्थगणवासिभिरातिवाहिकैः कन्यावाहिकैरश्वपण्यव्यवहारिभि- रुपकरणहारकैर्धान्यक्रेतृविक्रेतृभिर्वा प्रव्रजितलिङ्गिभिर्दूतैश्चदण्डातिनयनं सन्धिकर्म विश्वासनाथम् । (२) इति राजापसर्पाः । (३) एत एवाटवीनामपसर्पाः कण्टकशोधनोक्ताश्च । व्रजमटव्यासन्न- मपसर्पाः सार्थं वा चोरैर्घातयेयुः । कृतसङ्केतमन्नपानं चात्र मदनरसविद्धं वा कृत्वाऽपगच्छेयुः । गोपालकवैदेहकाश्च ततश्चोरान् गृहीतलोप्त्रभाराः मदन- रसविकारकालेऽवस्कन्दयेयुः । सङ्कर्षणदैवतीया वा मुण्डजटिलव्यञ्जनाः


अथवा देवताओं की ध्वजाओं तथा प्रतिमाओं के साथ वे हथियार वहाँ पहुँचाये जायें । उसके बाद कारु आदि के वेष में रहने वाले गुप्तचर प्रमादी पुरुषों के वध, बलात्कार, लूट-मार और चारों ओर के आक्रमण के सम्बन्ध में शंख तथा नगाड़े आदि बजाकर पीछे की ओर से हमला हो जाने की सूचना दें । जब शत्रु उनका प्रतीकार करने के लिए सेना लेकर पीछे की ओर से जाय तो इधर से वे गुप्तचर परकोटा प्रधान दरवाजा तथा उसके ऊपर की अटारी तोड़ने के साथ ही शत्रु ही सेना को पूर्ववत् विभक्त कर यथावसर उसको नष्ट कर दें ।

( १ ) उन्हीं गुप्तचरों को चाहिए कि दुर्गम मार्गों से पार करने वाले व्यापारियों के झुंड में रहते हुए, कन्याओं को ले जाते हुए, घोड़ों का व्यापार करते हुए, तत्सम्बन्धी दूसरे सौदों को बेचते हुए, सामान को इधर-उधर ढोते हुए, अनाज आदि की खरीद-फरोख्त करते हुए और संन्यासियों के वेष में रहते हुए अपनी सेनाओं को दुर्गम रास्तों से निकालकर बाहर ले आवें तथा शत्रु के विश्वास के लिए सन्धि की शर्तों का पूरा-पूरा ध्यान रखें ।

( २ ) इस प्रकार यहाँ तक राजाओं के गुप्त-पुरुषों का निरूपण किया गया ।

( ३ ) कण्टकशोधन अधिकरण में और इस अध्याय में कहे गए गुप्तचर ही आटविकों के भी समझने चाहिए । अर्थात् आवश्यकता होने पर आटविकों में भी वही गुप्तचर कार्य करें । आटविकों के बीच में रहने वाले गुप्तचरों को चाहिए कि वे जंगल के पास की गोशालाओं तथा राहगीरों को आटविकों के साथ मिलकर लूट डालें या नष्ट कर डालें, उसके बाद संकेत पाते ही उनके खाने-पीने की वस्तुओं में विष मिलाकर वहाँ से भाग निकलें । फिर ग्वालों और व्यापारियों के वेश में रहने वाले गुप्तचर चोरों द्वारा चुराये गये उस माल को स्वयं लेकर विष खाने से बेहोश

प्र० १७३ : अ० ३ ] अपसर्पप्रणिधि ७२१

प्रहवणकर्मणा मदनरसयोगाभ्यामतिसन्दध्यात् । अथावस्कन्दं दद्यात् । शौण्डिकव्यञ्जनो वा दैवतप्रेतकार्योत्सवसमाजेष्वाटविकान् सुराविक्रयोपायननिमित्तं मदनरसयोगाभ्यामतिसन्दध्यात् । अथावस्कन्दं दद्यात् । (१) ग्रामघातप्रविष्टां वा विक्षिप्य बहुधाऽटवीम् । घातयेदिति चोराणामपसर्पाः प्रकीर्तिताः ॥

इति दुर्गलम्भोपाये त्रयोदशेऽधिकरणे अपसर्पप्रणिधिर्नाम तृतीयोऽध्यायः; आदितो द्विचत्वारिंशदुत्तरशततमः ।

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उन आठविकों को गिरफ्तार कर ले, अथवा संकर्षण देवता के मानने वाले (मदिराप्रियों) मुण्डित तथा जटाधारियों के वेष में रहने वाले गुप्तचर उत्सव या सहभोज आदि के बहाने विष देकर या दूसरे तरीकों से उन आठविकों को अपने वश में कर लें, उसके बाद जब वे बेहोश हो जायँ तो उन्हें गिरफ्तार कर लें, अथवा शराब विक्रेताओं के वेष में रहने वाले गुप्तचर किसी देवकार्य, प्रेतकार्य, उत्सव तथा अन्य सामाजिक भोजों के अवसर पर अपनी विक्रयार्थ शराब में विषैले रसों का प्रयोग कर आठविकों को अपने वश में करें और जब वे बेहोश हो जायँ तो उन्हें गिरफ्तार कर लें ।

( १ ) गाँव को नष्ट करने की नियत से गाँव में प्रविष्ट हुए आठविकों के हृदय में विभिन्न प्रकार के विकार उत्पन्न कर उन्हें नष्ट कर दिया जाय । यहाँ तक आठविकों ( चोरों ) के सम्बन्ध में गुप्तचरों के कार्यों का निरूपण किया गया ।

दुर्गलम्भोपाय नामक तेरहवें अधिकरण में अपसर्पप्रणिधि नामक तीसरा अध्याय समाप्त हुआ ।

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४६ कौ०

प्रकरण १७४-१७५## पर्युपासनकर्म, अवमर्दश्च
अध्याय ४

(१) कर्शनपूर्वं पर्युपासनकर्म । जनपदं यथानिविष्टमभये स्थापयेत् । उत्थितमनुग्रहपरिहाराभ्यां निवेशयेदन्यत्रापसरतः, समग्रमन्यस्यां भूमौ निवेशयेदेकस्यां वा वासयेत् । न ह्यजनो जनपदो राज्यमजनपदं वा भवतीति कौटिल्यः ।

(२) विषमस्थस्य मुष्टिं सस्यं वा हन्याद्वीवधप्रसारौ च ।

(३) प्रसारवीवधच्छेदान्मुष्टिसस्यवधादपि ।
वमनाद् गूढघाताच जायते प्रकृतिक्षयः ॥

(४) 'प्रभूतगुणवद्धान्यकुप्ययन्त्रशस्त्रावरणविष्टिरश्मिसमग्रं मे सैन्य-


शत्रु के दुर्ग को घेर कर अपने अधिकार में करना

( १ ) विजिगीषु को चाहिए कि वह शत्रु के कोष, सैन्य और अमात्य आदि का नाश करने के साथ ही उसके दुर्ग को चारों ओर से घेर दे । किन्तु ऐसी स्थिति में विजिगीषु को ध्यान रखना चाहिए कि जनपद को किसी प्रकार का कष्ट न होने पावे, वरन्, उसकी रक्षा का सुप्रबंध करे । यदि जनपद विजिगीषु के विरुद्ध आंदोलन करे तो उसे धन देकर या कर माफ करके शांत किया जाय । किन्तु ऐसा यत्न उसी दशा में करना चाहिए जब जनपद अपने स्थान पर बना रहे; अन्यथा उसकी कुछ भी सहायता न की जाय । उस जनपद के विभिन्न भागों में अधिकाधिक आदमियों को बसाया जाय अथवा एक ही भाग में अधिक आदमियों को बसाया जाय; क्योंकि मनुष्यों से रहित प्रदेश जनपद नहीं कहला सकता और जनपदरहित भूमि राज्य नहीं कहला सकती । इसीलिए कौटिल्य का कहना है कि 'यदि जनपद न होगा तो राज्य किस पर किया जायगा ?'

( २ ) विजिगीषु को चाहिए कि वह विपत्तिग्रस्त शत्रु के अन्न, फसल, वीवध और प्रसार आदि सबको नष्ट कर दे ।

( ३ ) वीवध, प्रसार आदि का उच्छेद कर देने से तथा फसल, अनाज, व्यापार आदि को नष्ट कर देने से और अमात्य आदि प्रकृतिवर्ग कहीं दूसरी जगह ले जाने से या चुपचाप उन्हें मार देने से राजा का अपने आप क्षय हो जाता है ।

( ४ ) जब विजिगीषु यह समझे कि 'प्रभूत गुणों से संपन्न धान्य, लोहा, ताँबा,

प्र० १७४-१७५ : अ० ४ ] दुर्ग को अधिकार में करना ७२३

मृतुश्च पुरस्तात्, अपर्तुः परस्य व्याधिदुर्भिक्षनिचयरक्षाक्षयः क्रीतबलनिर्वेदो मित्रबलनिर्वेदश्च' इति पर्युपासीत ।

(१) कृत्वा स्कन्धावारस्य रक्षां वीवधासारयोः पथश्च, परिक्षिप्य दुर्गं खातसालाभ्यां, दूषयित्वोदकमवस्त्राव्य परिखाः सम्पूरयित्वा वा, सुरुङ्गा-बलकुटिकाभ्यां वप्रप्राकारौ हारयेत् ।

(२) द्वारं च गुलेन निम्नं वा पांसुमाल्याऽऽच्छादयेत् । बहुलारक्षं यन्त्रैर्घातयेत् । निष्करादुपनिष्कृष्याश्वैश्च प्रहरेयुः । विक्रमान्तरेषु च नियोग-विकल्पसमुच्चयैश्चोपायानां सिद्धिं लिप्सेत । दुर्गवासिनः ।

(३) श्येनकाकनप्तृभासशुकशारिकोलूककपोतान् ग्राहयित्वा पुच्छेष्व-ग्नियोगयुक्तान् परदुर्गे विसृजेयुः ।

वस्त्र, मशीन, हथियार, कवच, श्रमिक और रस्सी आदि सभी उपयोगी सामग्री से अपनी सेना युक्त है और ऋतु भी अपने अनुकूल है; किन्तु शत्रु का देश बीमारी, दुर्भिक्ष से अभिभूत, धन-धान्य तथा रक्षक पुरुषों से अभावग्रस्त है, उसको वेतनभोगी सेना सहायता देने से इनकार करती हो, मित्रसेना भी खिन्न हो चुकी हो और ऋतु भी उसके प्रतिकूल हो, ऐसी अवस्था में यह शत्रु के दुर्ग पर घेरा डाल दे ।

(१) शत्रु-दुर्ग पर घेरा डालने के लिए विजिगीषु को चाहिए कि पहिले वह अपनी छावनी, वीवध, असार और अपने मार्ग की रक्षा करे, फिर खाई तथा पर-कोटे के अनुसार दुर्ग को चारों ओर से घेरा डाल दे, तदनन्तर शत्रु के पानी में विष मिला दे या बाँध तोड़ कर उसे बहा दे, और अन्त में खाइयों को मिट्टी से पाट कर या किले की दीवारों तथा अटारियों पर सुरंग बनाकर दुर्ग पर आक्रमण कर दे ।

(२) दुर्ग की दरारों को कंकरीट से तथा नीची-गहरी जगहों को मिट्टी से पाट दिया जाय । दुर्ग के जिस भाग में रक्षा का अधिक प्रबन्ध हो उसे मशीनों द्वारा नष्ट कर दिया जाय । कपट से रक्षक पुरुषों को बाहर निकाल कर घोड़ों तथा हाथियों द्वारा उन पर हमला बोल दिया जाय । जब युद्धक्षेत्र में शत्रु की सेना अधिक पराक्रम-शाली जान पड़े तो साम, दान आदि उपायों के द्वारा या अवसर के अनुसार वैसा ही उपाय का प्रयोग करे या एक उपाय की जगह दूसरे उपाय को काम में लाकर अथवा अनेक उपायों को एक साथ उपयोग में लाकर दुर्गवासी शत्रु पर विजय-लाभ की चेष्टा करनी चाहिए ।

(३) बाज, कौवा, नप्ता (मुर्ग के समान); गिद्ध, तोता, मैना, उल्लू और कबूतर आदि पक्षियों को पकड़ कर उनकी पूँछ में आग लगाने वाली औषधियों को मल कर उन्हें शत्रु के दुर्ग में छोड़ दिया जाय, जिससे कि वहाँ आग लग जाय ।

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प्र० १७४-१७५ : अ० ४ ] दुर्गं को अधिकार में करना ७२५

पलाशपुष्पकेशमषितैलमधूच्छिष्टकश्रीवेष्टकयुक्तोऽग्नियोगो विश्वासघाती वा । तेनावलिप्तः शणत्रपुसवल्कवेष्टितो बाण इत्यग्नियोगः । (१) नत्वेव विद्यमाने पराक्रमेऽग्निमवसृजेत् । अविश्वास्यो ह्यग्निः दैवपीडनं च, अप्रतिसंख्यातप्राणिधान्यपशुहिरण्यकुप्यद्रव्यक्षयकरः । क्षीणनिचयं चावाप्तमपि राज्यं क्षयायैव भवति । (२) इति पर्युपासनकर्म । (३) ‘सर्वारम्भोपकरणविष्टिसम्पन्नोऽस्मि, व्याधितः पर उपधाविरुद्धप्रकृतिरकृतदुर्गकर्मनिचयो वा निरासारः सासारो वा पुरा मित्रैः सन्धत्ते’ इत्यवमर्दकालः । (४) स्वयमग्नौ जाते समुत्थापिते वा प्रहवणे प्रेक्षानीकदर्शनसङ्ग-सौरिककलहेषु नित्ययुद्धश्रान्तबले बहुलयुद्धप्रतिविद्धप्रेतपुरुषे जागरण-क्लान्तसुप्तजने दुर्दिने नदीवेगे वा नीहारसम्प्लवे वानमृद्नीयात् ।


मिलाकर बनाया गया अग्नियोग निश्चय ही विश्वासघाती होता है । (अर्थात् जहाँ आग लगने की कतई भी संभावना न हो, वहाँ भी इसका प्रयोग करने पर आग लग जाती है । अचूक अग्नियोग होने के कारण ही इसको विश्वासघात कहा गया है ।) उक्त सभी वस्तुओं के योग से सना हुआ और सन तथा ककड़ी की बेल की छाल से लपेटा हुआ बाण भी अग्नियोग होता है, अर्थात् जहाँ मारा जाता है वहीं आग लगा देता है ।

( १ ) युद्ध के प्रारम्भ में इन अग्नियों को नहीं छोड़ना चाहिए, क्योंकि अग्नि का कोई विश्वास नहीं है और फिर उसे दैवपीड़न कहा गया है । अग्निदाह से असंख्य प्राणियों, धन, धान्य, पशु एवं अनेक प्रकार के द्रव्यों का नाश हो जाता है । ऐसा नष्ट-भ्रष्ट राज्य अपने हाथ में आ जाने पर भी क्षय का ही कारण होता है ।

( २ ) यहाँ तक शत्रु-दुर्ग को घेरने के संबंध में निरूपण किया गया ।

( ३ ) जब विजिगीषु वह समझ ले कि ‘वह सब प्रकार की युद्धोपयोगी सामग्री से संपन्न है, सभी तरह के कार्य करने वाले आदमी उसके पास मौजूद हैं; उधर शत्रु व्याधिग्रस्त है, उसकी प्रकृतियाँ धोखा देने वाली हैं, दुर्ग आदि की मरम्मत तथा धान्य आदि का संग्रह भी उसने नहीं किया है, मित्र की सहायता की भी संभावना नहीं है, अथवा सहायता सम्भव होने पर भी अभी तक वह संधि करने में ही फंसा हुआ है’—ऐसे शत्रु पर फौरन चढ़ाई कर देनी चाहिए ।

( ४ ) अथवा विजिगीषु जब देखे कि ‘शत्रु के दुर्ग में अपने-आप आग लग गई है, या सब लोग पार्टियों तथा उत्सवों में व्यस्त हैं या खेल-तमाशों तथा चाँदमारी में आसक्त हैं या शराबियों ने कोई उपद्रव खड़ा कर दिया है या लगातार के युद्ध में शत्रु

७२६ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ तेरहवां अधिकरण

७२६ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ तेरहवां अधिकरण

(१) स्कन्धावारमुत्सृज्य वा वनगूढः शत्रुः सत्रान्निष्क्रान्तं घातयेत् । (२) मित्रासारमुख्यव्यञ्जनो वा संरुद्धेन मैत्रीं कृत्वा दूतमभित्यक्तं प्रेषयेत्—'इदं ते छिद्रम्, इमे दूष्याः, संरोद्धुर्वा छिद्रमयं ते कृत्यपक्षः' इति। तं प्रतिदूतमादाय निर्गच्छन्तं विजिगीषुर्गुहीत्वा दोषमभिख्याप्य प्रवास्यापगच्छेत् ततः। मित्रासारव्यञ्जनो वा संरुद्धं ब्रूयात्—'मां त्रातुमुपनिर्गच्छ, मया वा सह संरोद्धारं जहि' इति। प्रतिपन्नमुभयतः संपीडनेन घातयेत्, जीवग्राहेण वा राज्यविनिमयं कारयेत्, नगरं वास्य प्रमृद्नीयात्, सारबलं वास्य वमयित्वाऽभिहन्यात् ।


सेना थक गई है, या लंबे युद्ध के कारण शत्रु के बहुत से आदमी जख्मी हो गये हैं या मर गये हैं, या रातभर जागने तथा थक जाने के कारण लोग सोये हैं, या आकाश में दुर्दिन छाया है, या नदी में बाढ़ आ गई है, या भीषण तुषारापात हुआ है'—ऐसी अवस्था में शत्रु पर एकदम धावा बोल देना चाहिए ।

( १ ) अथवा छावनी या पड़ाव न डाल कर जंगल में जाकर छिपा जाय और जैसे ही शत्रुदल जंगल से निकलने लगे कि उसके ऊपर विजिगीषु की सेना एकदम बरस पड़े ।

( २ ) मित्र के वेष में रहने वाला या मित्र की सेना में मुखिया के वेष में रहने वाले विजिगीषु के गुप्तचर को चाहिए कि वह घिरे हुए शत्रु-राजा के साथ मित्रता करके अपने किसी वध्य पुरुष के द्वारा उसके लिए इस आशय का एक संदेश भेजे कि 'तुम्हारे अंदर अमुक-अमुक दोष हैं, अमुक-अमुक व्यक्ति तुम्हारे द्रोही हैं, घेरा डालने वाले विजिगीषु की अमुक-अमुक कमजोरियाँ हैं, और विजिगीषु के लुब्ध, क्रुद्ध, भीत आदि अमुक-अमुक लोग तुम्हारे मित्र हैं।' जब वह दूत शत्रु-राजा का उत्तर लेकर लौट रहा हो तो विजिगीषु उसको रास्ते में ही पकड़ कर उस पर अपकारी होने का दोष लगावे और इसी अपराध में उसको मार कर वहाँ से ( उस उत्तर लेखपत्र को साथ लेकर ) चला जाय । अथवा मित्र के वेष में या मित्र सेना के प्रमुख के वेष में रहने वाला वह गुप्तचर उस घिरे हुए राजा से कहे कि 'मेरी रक्षा के लिए तुम्हें तैयार हो जाना चाहिए, अथवा हम दोनों मिल कर तुमको रोकने वाले विजिगीषु को मार डालें।' जब वह इस प्रस्ताव को स्वीकार कर ले तो दोनों ओर से घेर कर उसको मार दिया जाय अथवा उसको गिरफ्तार कर उसकी जगह उसके किसी पुत्र बांधव को अभिषिक्त किया जाय या उसकी राजधानी को बरबाद कर दिया जाय । अथवा उसके सारबल को दुर्ग से बाहर निकाल कर उसको मार दिया जाय ।

प्र० १७४-१७५ : अ० ४] दुर्ग को अधिकार में करना ७२७

(१) तेन दण्डोपनताटविका व्याख्याताः । (२) दण्डोपनताटविकयोरन्यतरो वा संरुद्धस्य प्रेषयेत्—'अयं संरोद्धा व्याधितः, पार्ष्णिग्राहेणाभियुक्तः, छिद्रमन्यदुत्थितम्, अन्यस्यां भूमावपयातुकामः' इति । प्रतिपन्ने संरोद्धा स्कन्धावारमादीप्यापयायात् । ततः पूर्ववदाचरेत् । (३) पण्यसम्पातं वा कृत्वा पण्येनै नं रसविद्धेनातिसन्दध्यात् । (४) आसारव्यञ्जनो वा संरुद्धस्य दूतं प्रेषयेत्—'मया बाह्यमभिहतमुपनिर्गच्छाभिहन्तुम्' इति । प्रतिपन्नं पूर्ववदाचरेत् । (५) मित्रं बन्धुं वापदिश्य योगपुरुषाः शासनमुद्राहस्ताः प्रविश्य दुर्गं ग्राहयेयुः । (६) आसारव्यञ्जनो वा संरुद्धस्य प्रेषयेत्—'अमुष्मिन् देशे काले च


( १ ) इसी प्रकार दण्डोपनत और आटविकों के सम्बन्ध में भी समझ लेना चाहिए ।

( २ ) अथवा उन दण्डोपनत ( बलपूर्वक वश में किये गये राजा ) और आटविक ( जंगली राजा ) दोनों में से किसी एक द्वारा उस घिरे हुए शत्रु-राजा के पास यह संदेश भेजा जाय कि 'यह घेरा डालने वाला विजिगीषु आजकल व्याधिग्रस्त है, पार्ष्णिग्राह ने भी उस पर हमला कर दिया है, ऐसी स्थिति में वह यहाँ से अन्यत्र भाग जाने को तैयार है।' जब घिरा हुआ शत्रु-राजा इन बातों से सहमत हो जाय तब विजिगीषु अपनी छावनी में आग लगाकर वहाँ से चला जाय । उसके बाद पूर्ववत् शत्रु-राजा को बीच में घेर कर समाप्त कर दिया जाय ।

( ३ ) अथवा व्यापारियों के संघ द्वारा उपहारस्वरूप भेजे गये द्रव्यों में विष मिला कर उन्हें किले में पहुँचा दिया जाय ।

( ४ ) अथवा मित्र की सेना में प्रमुख अधिकारी के वेष में रहने वाला गुप्तचर घिरे हुए शत्रु-राजा के पास इस प्रकार का संदेश लेकर दूत को भेजे कि 'मैंने तुम्हारे इस बाह्य शत्रु को एकदम शक्तिहीन बना दिया है । अब इसको सर्वथा नष्ट करने के लिए तुम दुर्ग से बाहर निकल आओ।' जब शत्रु इस विश्वास पर बाहर निकल आवे तो उसे दोनों ओर से घेर कर पूर्ववत् मार दिया जाय ।

( ५ ) अथवा अपने-आपको मित्र का बंधु बताकर मुहर लगे बनावटी लेखपत्र को हाथ में लेकर गुप्तचर दुर्ग के भीतर प्रवेश कर दें और वहाँ किसी उपाय से फाटक आदि खोलकर उस दुर्ग को विजिगीषु के अधिकार में कर दें ।

( ६ ) अथवा मित्र सेना के प्रमुख अधिकारी के वेष में रहने वाला गुप्तचर उस घिरे हुए शत्रुराजा के पास यह संदेश भेजे कि 'मैं अमुक समय और अमुक स्थान में

७२४कौटिल्य का अर्थशास्त्र[ तेरहवां अधिकरण

स्कन्धावारमभिहनिष्यामि, युष्माभिरपि योद्धव्यम्' इति । प्रतिपन्नं यथोक्त-सभ्याघातसंकुलं दर्शयित्वा रात्रौ दुर्गान्निष्क्रान्तं घातयेत् ।

(१) यद्वा मित्रमावाहयेदाटविकं वा, तमुत्साहयेत्—'विक्रम्य संरुद्धे भूमिरमस्य प्रतिपद्यस्व' इति । विक्रान्तं प्रकृतिभिर्दृष्यमुख्यावग्रहेण वा घात-येत्, स्वयं वा रसेन । 'मित्रघातकोऽयम्' इत्यवाप्तार्थः ।

(२) विक्रमितुकामं वा मित्रव्यञ्जनः परस्याभिशंसेत् । आप्तभावोप-गतः प्रवीरपुरुषानस्योपघातयेत् ।

(३) सन्धि वा कृत्वा जनपदमेनं निवेशयेत्, निविष्टमन्यजनपदम-विज्ञातो हन्यात् ।

(४) अपकारयित्वा दूष्याटविकेषु वा बलैकदेशमतिनीय दुर्गमवस्कन्देन हारयेत् ।


शत्रु की छावनी पर हमला करूँगा। तुमको उस समय मेरी सहायता करनी होगी।' शत्रु जब इस बात को स्वीकार कर ले तो ठीक इसी समय और उसी स्थान पर विजिगीषु की छावनी में घमासान युद्ध छेड़ दिया जाय। उसे देखकर जब शत्रु रात में बाहर निकल आवे तो उसे बीच में ही घेर कर मार दिया जाय।

(१) अथवा विजिगीषु अपने मित्र या आटविक को वहाँ बुलाकर उसको इस प्रकार उकसाये कि 'देखो, अच्छा मौका है, तुम इस घिरे शत्रु पर आक्रमण करके उसके राज्य को हथिया लो!' जब वह ऐसा करने के लिए राजी हो जाय तो युद्ध में उसके प्रकृतिवर्ग को या दूष्यवर्ग को अपने अधीन कर उसको मरवा दिया जाय; या स्वयं ही विष आदि देकर उसको मार डाले। बाद में 'इस शत्रु ने मेरे मित्र या आटविक को मार डाला है', ऐसी अफवाह फैलाकर अपनी कार्यसिद्ध करे।

(२) अथवा मित्र के वेष में रहने वाला गुप्तचर शत्रु राजा से जाकर कहे कि 'तुम्हारे ऊपर विजिगीषु आक्रमण करने वाला है'। ऐसी बातें बताकर जब वह शत्रु राजा को अपने प्रति निश्चिन्त कर दे तब उसके प्रमुख बहादुर सैनिकों को मरवा डाले।

(३) अथवा शत्रु के साथ सन्धि करके उसे उसी जनपद में रहने दिया जाय, या उसके द्वारा दूसरे जनपद को आबाद कराया जाय और बाद में उस आबाद हुए जनपद को विजिगीषु छिपकर बरबाद कर दे।

(४) अथवा अपने दूष्य या आटविकों द्वारा अपना कुछ अपकार करा कर उन पर आक्रमण करने के बहाने शत्रु की सेना के कुछ भाग को बहुत दूर ले जाया जाय और फिर अल्प सैन्ययुक्त शत्रु के दुर्ग पर हमला कर जबरदस्ती उसको छीन लिया जाय।

प्र० १७४-१७५ : अ० ४ ] दुर्ग को अधिकार में करना ७२९

(१) दृष्यामित्राटविकद्वेष्यप्रत्यपसृताश्च कृतार्थमानसञ्ज्ञाचित्ताः परदुर्गमवस्कन्देयुः । (२) परदुर्गमवस्कन्द्य स्कन्धावारं वा पतितपराङ्मुखाभिपन्नमुक्तकेशशस्त्रभयविरूपेभ्यश्चाभयमयुध्यमानेभ्यश्च दद्युः । परदुर्गमवाप्य विशुद्धशत्रुपक्षः कृतोपांशुदण्डप्रतीकारमन्तर्बहिश्च प्रविशेत् । (३) एवं विजिगीषुरमित्रभूमिं लब्ध्वा मध्यमं लिप्सेत । तत्सिद्धावुदासीनम् । एष प्रथमो मार्गः पृथिवीं जेतुम् । (४) मध्यमोदासीनयोरभावे गुणातिशयेनारिप्रकृतीः साधयेत् । तत उत्तराः प्रकृतीः । एष द्वितीयो मार्गः । (५) मण्डलस्याभावे शत्रुणार मित्रं मित्रेण वा शत्रुमुभयतः सम्पीडनेन साधयेत् । एष तृतीयो मार्गः ।


( १ ) शत्रु के दुर्ग का अपहरण करते समय शत्रु के राजद्रोही, शत्रु, आटविक, शत्रु के पास से एक बार जाकर फिर वापिस आने वाले, विजिगीषु द्वारा धन-मान से सम्मानित और आक्रमण के समय तथा स्थान से परिचित आदि बड़े सहायक होते हैं ।

( २ ) विजिगीषु को चाहिए कि जब शत्रु की छावनी पर अधिकार कर ले तो ऐसे सैनिकों को अभयदान दे दे, जो युद्धक्षेत्र में जख्मी पड़े हों, जो युद्ध से भाग गए हों, जो अधिक विपद्ग्रस्त हों, जिनके बाल-शस्त्र अस्त-व्यस्त हों, जिनके मुख भय से विकृत हो गये हों और जो युद्ध में शामिल न हुए हों । शत्रु के दुर्ग को प्राप्त करके और वहां से शत्रुपक्ष के सभी व्यक्तियों की सफाई करने के बाद विजिगीषु को चाहिए कि वह अपना विरोध करने वाले व्यक्तियों का उपांशु वध करके दुर्ग के बाहर और भीतर प्रवेश करे ।

( ३ ) इस प्रकार शत्रु राज्य जो स्वायत्त करने के बाद विजिगीषु, मध्यम राजा को जीतने की कोशिश करे और उसको स्वायत्त कर लेने के बाद वह उदासीन राजा पर विजय प्राप्त करे । पृथिवी का साम्राज्य प्राप्त करने का यह पहिला मार्ग है ।

( ४ ) मध्यम और उदासीन राजाओं के न होने पर विजिगीषु अपने गुण-बाहुल्य के द्वारा शत्रु के प्रकृतिवर्ग को अपने अनुकूल बनाये और उसके बाद शत्रु की सेना तथा कोष को अपने अधिकार में करे । पृथिवी का आधिपत्य प्राप्त करने का यह दूसरा मार्ग है ।

( ५ ) यदि राजमण्डल का अभाव हो तो शत्रु के द्वारा मित्र को और मित्र के द्वारा शत्रु को दोनों ओर से घेर कर या दबा कर उन्हें विजिगीषु अपने वश में करे । पृथिवी को विजय करने का यह तीसरा मार्ग है ।

७३० कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ तेरहवां अधिकरण

७३० कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ तेरहवां अधिकरण

(१) शक्यमेकं वा सामन्तं साधयेत्, तेन द्विगुणो द्वितीयं, त्रिगुणस्तृती- यम् । एष चतुर्थो मार्गः पृथिवीं जेतुम् । (२) जित्वा च पृथिवीं विभक्तवर्णाश्रमां स्वधर्मेण भुञ्जीत । (३) उपजापोऽपसर्पो वा वामनं पर्युपासनम् । अवमर्दश्च पञ्चैते दुर्गलम्भस्य हेतवः ।

इति दुर्गलम्भोपाये त्रयोदशेऽधिकरणे पर्युपासनकर्म अवमर्दश्चेति चतुर्थोऽध्यायः, आदितस्त्रिचत्वारिंशदुत्तरशततमः ।

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(१) अथवा जीतने योग्य समीपस्थ सामन्त को ही पहिले अपने अनुकूल बनाया जाय । उसको मिलाकर जब अपनी शक्ति दुगुनी हो जाय तब दूसरे सामन्त को अपने अनुकूल बनाने का यत्न किया जाय । उसको भी मिलाकर जब अपनी शक्ति तिगुनी हो जाय तब विजिगीषु तीसरे सामन्त को अपने वश में करने का यत्न करे । पृथ्वी को विजय करने का यह चौथा मार्ग है ।

(२) इस प्रकार सारी पृथ्वी का साम्राज्य प्राप्त कर उस शक्तिशाली सम्राट् को चाहिए कि वह अपने साम्राज्य में वर्णों और आश्रमों की यथोचित व्यवस्था कर धर्मपूर्वक पृथिवी के राज्य का उपभोग करे ।

(३) उपजाप ( बहकाना ), अपसर्प ( गुप्तचरों द्वारा शत्रुनाश ), वामन ( विष प्रयोग ), पर्युपासन ( घेरा डालना ) और अवमर्द ( विध्वंस ), ये पाँच उपाय हैं, जिनके द्वारा शत्रु के दुर्ग को जीता जा सकता है ।

दुर्गलम्भोपाय नामक तेरहवें अधिकरण में पर्युपासनकर्म-अवमर्द नामक चौथा अध्याय समाप्त ।

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प्रकरण १७६लब्धप्रशमनम्
अध्याय ५

(१) द्विविधं विजिगीषोः समुत्थानम्, अटव्यादिकमेकग्रामादिकं च । (२) त्रिविधश्चास्य लम्भः—नवो, भूतपूर्वः, पित्र्य इति । (३) नवमवाप्य लम्भं परदोषान् स्वगुणैश्छादयेत् गुणान् गुणद्वैगुण्येन । स्वधर्मकर्मानुग्रहपरिहारदानमानकर्मभिश्च प्रकृतिप्रियहितान्यनुवर्तेत । यथासम्भाषितं च कृत्यपक्षमुपग्राहयेत् । भूयश्च कृतप्रयासम् । अविश्वास्यो हि विसंवादकः स्वेषां परेषां च भवति । प्रकृतिविरुद्धाचारश्च । तस्मात्समानशीलवेषभाषाचारतामुपगच्छेत् । देशदैवतसमाजोत्सवविहारेषु च भक्तिमनुवर्तेत ।


विजित देश में शान्ति की स्थापना

( १ ) विजिगीषु का उद्योग ( समुत्थान ) दो रूपों में फलित होता है । एक जंगल आदि के रूप में और दूसरा गाँव आदि के रूप में ।

( २ ) विजिगीषु का लाभ तीन प्रकार का होता है । १. नव २. भूतपूर्व और ३. पित्र्य ।

( ३ ) नवलाभ : विजिगीषु को चाहिए कि नए राज्य को प्राप्त कर वह शत्रु के दोषों को अपने गुणों से ढक दे और शत्रु के गुणों को अपने दुगुने गुणों से पराभूत कर दे । विजिगीषु सदा अपने धर्म, कर्म, अनुग्रह, परिहार ( करमाफी ), दान और सम्मान आदि श्रेष्ठ कार्यों के द्वारा प्रजा के अनुकूल कल्याणकारी कार्यों के करने में लगा रहे । अपनी पूर्व प्रतिज्ञा के अनुसार अपने कृत्यपक्ष को धन आदि देकर वह सदा प्रसन्न बनाये रखे और जिस प्रजाजन या मित्र ने उसके अभ्युदय में अधिक परिश्रम किया हो उसे विपुल धन देकर खूब प्रसन्न कर दे क्योंकि पहिले प्रतिज्ञा कर बाद में उससे मुकर जाने वाला अपने प्रजावर्ग के विरुद्ध आचरण करने वाला राजा अपने तथा पराये सभी का विश्वास खो बैठता है । इसलिए राजा को उचित है कि वह अपने प्रजाजनों के समान ही शील, वेष, भाषा तथा आचरण का व्यवहार करे और प्रजा के विश्वासों की तरह राष्ट्रदेवता, समाजोत्सव तथा विहारों में अपनी भक्तिभावना रखे ।

७३२ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ तेरहवां अधिकरण

(१) देशग्रामजातिसङ्घमुख्येषु चाभीक्ष्णं सत्रिणः परस्यापचारं दर्श- येयुः। माहाभाग्यं भक्तिं च तेषु स्वामिनः स्वामिसत्कारं च विद्यमानम्। उचितैश्चैनान् भोगपरिहाररक्षावेक्षणैर्भुञ्जीत। सर्वदेवताश्रमपूजनं च विद्यावाक्यधर्मशूरपुरुषाणां च भूमिद्रव्यदानपरिहारान् कारयेत्। सर्वबन्धन- मोक्षणमनुग्रहं दीनानाथव्याधितानां च। चातुर्मास्येष्वर्धमासिकमघातं, पौर्णमासीषु च चातूरात्रिकं राजदेशनक्षत्रेष्वेकरात्रिकम्। योनिबालवधं पुंस्त्वोपघातं च प्रतिषेधयेत्। यच्च कोशदण्डोपघातिकमधर्मिष्ठं वा चरित्रं मन्येत, तदपनीय धर्म्यं व्यवहारं स्थापयेत्। चोरप्रकृतीनां म्लेच्छजातीनां च स्थानविपर्यासमनेकस्थं कारयेद् दुर्गराष्ट्रदण्डमुख्यानां च। परोपगृही- तानां च मन्त्रिपुरोहितादीनां परस्य प्रत्यन्तेष्वनेकस्थं वासं कारयेत्। अप-


(१) विजिगीषु के गुप्तचरों को चाहिए कि वे देश, ग्राम, जाति, संघ और संघ-मुख्यों के पास जाकर प्रजा के प्रति किये गये शत्रु के अपकारों को बराबर दिखायें, और साथ ही देश आदि के प्रति किये गये नये विजिगीषु के उदारता, प्रेम तथा सत्कार आदि कार्यों को अच्छी तरह खोलकर रखें। विजिगीषु राजा, समुचित राज-भाग, करमाफी (परिहार) और सुख-सुविधायें (रक्षाक्षण) देकर प्रजा की रक्षा करे। विजिगीषु को चाहिए कि वह सभी धर्मों के देवताओं तथा आश्रमों की पूजा कराये और विद्वानों, वक्ताओं एवं धर्मप्राण व्यक्तियों को भूमि तथा द्रव्य देकर उनसे किसी प्रकार का राजकर वसूल न करे। जो दीन, अनाथ तथा व्याधिग्रस्त प्रजाजन हैं उनकी हर तरह से सहायता करे और कारागार में बन्द सभी अपराधियों को मुक्त कर दे। चार-चार महीने में पंद्रह दिन ऐसे रखे, जिनमें किसी को प्राणदण्ड न दिया जाय। इसी प्रकार वर्ष भर में चार पूर्णमासियां ऐसी छांट ले, जिनमें किसी का वध न किया जाय। राज्याभिषेक और राज्यविजय के नक्षत्रों में किसी का वध न किया जाय। बच्चे पैदा करने वाले मादा जानवरों तथा शिशु जानवरों के वध का सर्वथा निषेध किया जाय; और नर जानवरों को बधिया (पुंस्त्वहीन) न बनाये जाने की भी निषेधाज्ञा कर दी जाय। जिस आचरण को विजिगीषु राजा कोष और सेना के लिए हानिकर तथा धर्माचरण विरुद्ध समझे उसको दूर कर धर्मयुक्त सदाचार की स्थापना करे। चोर प्रकृति म्लेच्छ जातियों तथा दुर्ग, राष्ट्र और सेना के मुख्य अधि-कारियों को परस्पर दूर-दूर स्थानों में नियुक्त करके उनको स्थानान्तरित कर दिया जाय। शत्रु का उपकार करने वाले मंत्री, पुरोहित आदि को शत्रु के सीमा-प्रदेशों के भिन्न-भिन्न स्थानों में नियुक्त किया जाय, जिससे कि वे परस्पर न मिलने पायें। जो व्यक्ति विजिगीषु का अपकार करने में समर्थ हों अथवा विजिगीषु का विनाश करने

प्र० १७६ : अ० ५ ] लब्धप्रशमन ७३३

कारसमर्थानिन्दु क्षियतो वा भर्तृविनाशमुपांशुदण्डेन प्रशमयेत् । स्वदेशीयान् वा परेण वावरुद्धानपवाहितस्थानेषु स्थापयेत् । (१) यश्च तत्कुलीनः प्रत्यादेयमादातुं शक्तः प्रत्यन्ताटवीस्थो वा प्रबाधितुमभिजातः, तस्मै विगुणां प्रयच्छेत्; गुणवत्याश्चतुर्भागं वा कोशदण्डदानमवस्थाप्य, यदुपकुर्वाणः पौरजानपदान् कोपयेत् । कुपितैस्तैरेनं घातयेत्, प्रकृतिभिरपकृष्टमपनयेदौपघातिके वा देशे निवेशयेदिति । (२) भूतपूर्वे येन दोषेणापवृत्तः, तं प्रकृतिदोषं छादयेत् । येन च गुणेनोपावृत्तः, तं तीव्रीकुर्यादिति । (३) पित्र्ये पितृदोषाञ् छादयेत् । गुणांश्च प्रकाशयेदिति ।


की प्रवृत्ति से उसके यहाँ रहते हों उन्हें उपांशुदण्ड देकर समाप्त कर दिया जाय । अपने देश के तथा शत्रु द्वारा बन्दी बनाये गये लोगों को विजयी राजा उन अधिकार-पदों पर नियुक्त करे, जो शत्रु पक्ष के पुरुषों को पदच्युत करने से रिक्त हुए हों ।

(१) शत्रु से छीने हुए राज्य को यदि कोई शत्रुवंशज वापिस लेने में समर्थ हो, अथवा सीमांत प्रदेश के सामन्त या आटविक के द्वारा उस राज्य पर बाधा पहुँचाये जाने की संभावना हो तो विजिगीषु राजा उन्हें किसी गुणहीन (ऊसर) भूमि का कुछ हिस्सा दे दे, अथवा उन्हें गुणवती (उर्वर) भूमि का चौथा हिस्सा इस शर्त पर दे कि वह सामंत विजिगीषु का अधिकाधिक कोष और सेना देता रहेगा । ऐसा कराने का यह परिणाम होगा कि धन तथा सेना को इकट्ठा करने में सामंत अपनी प्रजा को कुपित कर देगा । इस प्रकार प्रजाजनों के कुपित हो जाने पर बाद में इन्हीं के द्वारा उस सामंत का वध कराया जाय । अथवा अमात्य आदि प्रकृतियों के द्वारा निन्दा की जाने पर उस सामंत को वहाँ से हटा दिया जाय । या उसको ऐसे प्रदेश में भेज दिया जाय, जहाँ उसके विनाश के अनेक साधन विद्यमान हों ।

(२) भूतपूर्व लाभ : अपने अपहृत भूतपूर्व राज्य को पुनः प्राप्त कर विजिगीषु राजा को चाहिए कि अपने उस दोष का वह परित्याग कर दे, जिसके कारण उसका राज्य उसके हाथ से निकल गया था और अपने जिन गुणों के कारण उसने शत्रु के हाथ से अपना राज्य पुनः प्राप्त किया हो, उनको अधिक बढ़ाये ।

(३) पित्र्य लाभ : यदि पिता के दोषों के कारण राज्य शत्रु के कब्जे में गया हो तो विजिगीषु को उचित है कि पिता के उन दोषों को छिपा दे, जिनके कारण राज्य पर शत्रु ने अधिकार कर लिया था और पिता के जो अच्छे गुण रहे हों, उनको प्रकट करता रहे ।

७३४ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ तेरहवां अधिकरण

(१) चरित्रमकृतं धर्म्यं कृतं चान्यैः प्रवर्तयेत् । प्रवर्तयेन्न चाधर्म्यं कृतं चान्यैर्निवर्तयेत् ॥

इति दुर्गलम्भोपाये त्रयोदशेऽधिकरणे लब्धप्रशमनं नाम पञ्चमोऽध्यायः;

आदितश्चतुश्चत्वारिंशदुत्तरशततमः ।

समाप्तमिदं दुर्गलम्भोपायनामकं त्रयोदशमधिकरणम् ।

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( १ ) विजिगीषु राजा को चाहिए कि विजित राज्य में वह उन धर्मयुक्त आचार-व्यवहारों का प्रचलन करे, जिसका अब तक वहाँ अभाव था, तथा जो धर्मप्रवृत्त लोग रहे हों उन्हें प्रोत्साहित करे। अधर्मयुक्त आचार-व्यवहारों को वह कतई न पनपने दे तथा जो लोग अधर्मप्रवृत्त रहे हों उन्हें यत्नपूर्वक रोके।

दुर्गलम्भोपाय नामक तेरहवें अधिकरण में लब्धप्रशमन नामक पाँचवाँ अध्याय समाप्त ।

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चौदहवाँ अधिकरण

चौदहवाँ अधिकरण

औपनिषदिक

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७३८ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ चौदहवां अधिकरण

(१) कीटो वान्यतमस्तप्तः कृष्णसर्पप्रियङ्गुभिः ।
शोषयेदेष संयोगः सद्यः प्राणहरो मतः ॥
(२) धामार्गवयातुधानमूलं भल्लातकपुष्पचूर्णयुक्तमार्धमासिकः ।
(३) व्याघातकमूलं भल्लातकपुष्पचूर्णयुक्तं कीटयोगो मासिकः । कला-
मात्रं पुरुषाणां द्विगुणं खराश्वानां चतुर्गुणं हस्त्युष्ट्राणाम् ।
(४) शतकर्दमोच्चिट्टिङ्गकरवीरकटुतुम्बीमत्स्यधूमो मदनकोद्रवपला-
लेन हस्तिकर्णपलाशपलालेन वा प्रवातानुवाते प्रणीतो यावच्चरति तावन्मा-
रयति ।
(५) पूतिकीटमत्स्यकटुतुम्बीशतकर्दमेध्मेन्द्रगोपचूर्णं पूतिकीपक्षद्रा-
रालाहेमविदारीचूर्णं वा बस्तशृङ्गखुरचूर्णयुक्तमन्धीकरो धूमः ।


(इछ्म), गिरगिट (कृकलास), छिपकली (गृहगोधिका), अंधा या विषरहित साँप (अंधाहिक), जंगली तीतर (कृकण), पूतिकीट नामक कीड़ा तथा गोमारिका नामक औषधि, इन सब का चूर्ण मिलाया जाय तो उसका धुआँ तत्काल ही प्राणान्त कर देता है।

(१) उक्त कीड़ों में से किसी भी एक को यदि आग में तपाकर सूंघ लिया जाय तो उससे शरीर सूख जाता है। यदि काले साँप को कागुन के साथ मिलाकर उसका धुआँ किया जाय तो वह भी तत्काल प्राणांत कर डालता है।

(२) यदि कड़वी तोरई और यातुधान नामक औषधि की जड़ों को भिलावा के फूलों के चूर्ण के साथ मिला लिया जाय तो वह योग पंद्रह दिन में ही प्राण ले लेता है।

(३) यदि अमलतास की जड़ को भिलावे के पुष्पचूर्ण के साथ मिलाकर उसमें पूर्वोक्त किसी तपे हुए कीड़े का योग कर दिया जाय तो उसका प्रयोग एक मास में प्राण हर लेता है। इस कीटयोग की मात्रा मनुष्य को एक कला, गधे को उससे दुगुना और हाथी-ऊटों को उसका चौगुना देना चाहिए।

(४) शतावरी, कर्दम (अगर, तगर, केसर, कस्तूरी, कुंकुम और कपूर का पीसा हुआ लेप), उच्चिटिंग (बिच्छू ?), कनेर, कडवी तुंबी और मछली, इसका धुआँ; अथवा धतूरा, कोदो और धान के पुआल के साथ, अथवा धनिया, ढाक तथा पुआल के साथ धुआँ किया जाय और उसको तेज हवा में रख दिया जाय तो जहाँ तक वह जायगा वहाँ तक के प्राणियों को मार डालेगा।

(५) पूतिकीट (पात बिच्छी), मछली, कड़वी तूंबी, शतावरी, कर्दम, ढाक की लकड़ी और इंद्रगोप (बीर बहूटी), इन सबका चूर्ण; अथवा पूतिकीट, कटेरी, राल, धतूरा और विदारी कंद इन सबका चूर्ण यदि बकरे के सींग और खुर के चूर्ण के साथ मिला दिया जाय तो उनका धुआँ अंधा बना देता है।

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