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कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

प्र० ६७ : अ० २ ] शान्ति और उद्योग ४४७

(१) भूम्येकान्तरं प्रकृतिमित्रं मातृपितृसम्बन्धं सहजं धनजीवितहेतो-
राश्रितं कृत्रिममिति ।
(२) अरिविजिगीष्वोर्भूम्यनन्तरः संहतासंहतयोरनुग्रहसमर्थो निग्रहे
चासंहतयोर्मध्यमः ।
(३) अरिविजिगीषुमध्यानां बहिः प्रकृतिभ्यो बलवत्तरः संहतासंह-
तानामरि‌विजिगीषुमध्यमानामनुग्रहे समर्थो निग्रहे चासंहतानामुदासीनः ।
इति प्रकृतयः ।
(४) विजिगीषुमित्रं मित्रमित्रं वास्य प्रकृतयस्तिस्रः । ताः पञ्चभि-
रमात्यजनपददुर्गकोशदण्डप्रकृतिभिरेकैकशः संयुक्ता मण्डलमष्टादशकं
भवति । अनेन मण्डलपृथक्त्वं व्याख्यातमरिमध्यमोदासीनानाम् ।
(५) चतुर्मण्डलसंक्षेपः । द्वादश राजप्रकृतयः, षष्टिर्द्रव्यप्रकृतयः,
संक्षेपेण द्विसप्ततिः ।
(६) तासां यथास्वं सम्पदः ।
(७) शक्तिः सिद्धिश्च । बलं शक्तिः । सुखं सिद्धिः ।


( १ ) विजिगीषु के राज्य से एक राज्य को छोड़ कर उसके बाद का स्वभावतः मित्र राजा और विजिगीषु का ममेरा या फुफेरा भाई, ये सहजमित्र हैं । धन या जीवन-जीविका के लिए आश्रय लेने वाला कृत्रिममित्र कहलाता है ।

( २ ) अरि और विजिगीषु राजाओं की संधि में संधि का समर्थक और विग्रह में विग्रह का समर्थक राजा मध्यम कहलाता है ।

( ३ ) अरि विजिगीषु और मध्यम की प्रकृतियों के अतिरिक्त, शक्तिशाली मध्यम राजा से भी बलवान्, अरि, विजिगीषु और मध्यम की संधि में संधि का समर्थक और उनके विग्रह में विग्रह का समर्थक राजा उदासीन कहलाता है । इस प्रकार बारह राजप्रकृतियों का निरूपण किया गया ।

( ४ ) विजिगीषु, मित्र और मित्रमित्र ये तीन प्रकृति हैं । इन तीनों की अलग-अलग अमात्य, जनपद, दुर्ग, कोष और दण्ड, ये पाँच प्रकृतियाँ, एक साथ मिलकर अठारह प्रकृतियों का एक मंडल होता है । अरि, मध्यम और उदासीन आदि के मंडलों का यही क्रम समझना चाहिए ।

( ५ ) इस प्रकार चार मंडलों का संक्षेप में निरूपण किया गया । बारह राज-प्रकृतियाँ और साठ अमात्य आदि द्रव्य प्रकृतियाँ मिलकर बहत्तर प्रकृतियाँ कही जाती हैं ।

( ६ ) उनकी संपत्तियों का विवेचन पहिले किया जा चुका है ।

( ७ ) इसी प्रकार शक्ति और सिद्धि के संबंध में भी समझना चाहिए । शक्ति को बल और सिद्धि को सुख कहा जाता है ।

४४८ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ छठा अधिकरण

(१) शक्तिस्त्रिविधा-ज्ञानबलं मन्त्रशक्तिः, कोशदण्डबलं प्रभुशक्तिः, विक्रमबलमुत्साहशक्तिः। (२) एवं सिद्धिस्त्रिविधैव मंत्रशक्तिसाध्या मंत्रसिद्धिः, प्रभुशक्तिसाध्या प्रभुसिद्धिः उत्साहशक्तिसाध्या उत्साहसिद्धिरिति। ताभिरभ्युच्चितो ज्यायान् भवति। अपचितो हीनः। तुल्यशक्तिः समः। तस्माच्छक्तिं सिद्धिं च घटेतात्मन्यावेशयितुम्। साधारणो वा द्रव्यप्रकृतिष्वानन्तर्येण शौचवशेन वा दूष्यामित्राभ्यां वाऽपकृष्टुं यतेत। (३) यदि वा पश्येत्—'अमित्रो मे शक्तियुक्तो वाग्दण्डपारुष्यार्थदूषणैः प्रकृतिरुपहनिष्यति, सिद्धियुक्तो वा मृगयाद्यूतमद्यस्त्रीभिः प्रमादं गमिष्यति, स विरक्तप्रकृतिरुपक्षीणः प्रमत्तो वा साध्यो मे भविष्यति, विग्रहाभियुक्तो वा सर्वसन्दोहेनैकस्थो दुर्गस्थो वा स्थास्यति, स संहतसैन्यो मित्रदुर्गवियुक्तः साध्यो मे भविष्यति, बलवान् वा राजा परतः शत्रुमुच्छेत्तुकामस्तमुच्छिद्य-मानमुच्छिन्द्यात्' इति। 'बलवता प्रार्थितस्य मे विपन्नकर्मारम्भस्य वा


(१) शक्ति अर्थात् बल के तीन भेद हैं : ज्ञानवल, कोषबल और विक्रमवल। ज्ञानबल ही मंत्रशक्ति है, कोष-सेना बल ही प्रभुशक्ति है और विक्रमवल ही उत्साह-शक्ति है।

(२) इसी प्रकार सिद्धि के भी तीन भेद हैं : मंत्रसिद्धि, प्रभुसिद्धि और उत्साह-सिद्धि। मंत्रशक्ति से होने वाली सिद्धि मंत्रसिद्धि, प्रभुशक्ति से होने वाली सिद्धि प्रभु-सिद्धि और उत्साहशक्ति से होने वाली सिद्धि उत्साहसिद्धि कहलाती है। इन शक्तियों से संपन्न राजा श्रेष्ठ; उनसे रहित अधम और समान शक्ति वाला मध्यम कहा जाता है। इसलिए राजा को चाहिए कि वह अपनी शक्ति तथा सिद्धि को बढ़ाने के लिये निरंतर यत्नशील रहे। जो राजा स्वयं अपनी शक्ति-सिद्धि को बढ़ाने में असमर्थ हो वह इस कार्य को अपनी अमात्य आदि द्रव्य प्रकृतियों के द्वारा या अपनी सुविधा के अनुसार संपन्न करे; और दूष्य तथा शत्रु की शक्ति-सिद्धि को नष्ट करने का यत्न करे।

(३) यदि वह राजा ऐसा देखे कि : मेरा शक्तिशाली शत्रुराजा वाक्पारुष्य, दण्डपारुष्य और अर्थदोष से अपनी अमात्य आदि द्रव्यप्रकृतियों से रुष्ट कर देगा; अथवा वह मृगया, द्यूत और स्त्रियों में आसक्त होकर प्रमादी बन जायेगा; तब निश्चित ही वह प्रकृतियों से विरक्त और प्रमादी शत्रुराजा को 'मैं आसानी से जीत सकूंगा, अथवा जब मैं अपनी संपूर्ण सैन्यशक्ति को लेकर उससे युद्ध करने जाऊँगा तो वह अपनी शक्ति पर गर्वित हो कर किसी स्थान या दुर्ग में अकेला मेरे मुकाबले की प्रतीक्षा में रहेगा'—ऐसी स्थिति में वह मेरी सेना से घिर जायेगा तथा उसको मित्र एवं दुर्ग से कोई सहायता न मिल पावेगी और तब उसे मैं आसानी से जीत सकूंगा,

मण्डलयोनि नामक षष्ठ अधिकरण में शमव्यायामिक नामक दूसरा अध्याय समाप्त ।

प्र० ६७ : अ० २ ] शान्ति और उद्योग ४४९

साहाय्यं दास्यति, मध्यमलिप्सायां च' इति । एवमादिषु कारणेष्वप्यमित्रस्यापि शक्ति सिद्धिं चेच्छेत् ।

(१) नेमिमेकान्तरान् राज्ञः कृत्वा चानन्तरानरान् । नाभिमात्मानमायच्छेन्नेता प्रकृतिमण्डले ॥ (२) मध्ये ह्युपहितः शत्रुर्नेतुर्मित्रस्य चोभयोः । उच्छेद्यः पीडनीयो वा बलवानपि जायते ॥

इति मण्डलयोनौ षष्ठाधिकरणे शमव्यायामिकं नाम द्वितीयोऽध्यायः, आदितः सप्तनवतितमः ।

समाप्तमिदं मण्डलयोनिर्नाम षष्ठमधिकरणम्

—: ० :—


अथवा वह बलवान् शत्रुराजा अपने दूसरे शत्रु का उच्छेद करके ही रुक जायेगा, अथवा किसी दूसरे बलवान् के साथ युद्ध करने पर मुझे क्षीणशक्ति देख कर, मुझे मध्यम राजा बनाने की अभिलाषा से, वह मेरी सहायता करेगा' इस प्रकार की विशेष स्थितियों में वह शत्रु की शक्ति-सिद्धि की भी सम्भावना करें ।

( १ ) नेता विजिगीषु को चाहिए कि वह राजमंडल रूपी चक्र में अपने मित्र राजाओं को नेमि, पास के राजाओं को अरा और स्वयं को नाभि स्थान में समझे ।

( २ ) जो बलवान् शत्रु विजिगीषु और मित्र के बीच में आ जाय वह जीत लिया जाता है या बहुत तंग किया जाता है ।

मण्डलयोनि नामक षष्ठ अधिकरण में शमव्यायामिक नामक दूसरा अध्याय समाप्त ।

—: ० :—

२९ कौ०

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सातवाँ अधिकरण

सातवाँ अधिकरण

षाड्गुण्य

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प्रकरण ९८-९९षाड्गुण्यसमुद्देशः,
अध्याय १क्षयस्थानवृद्धिनिश्चयश्च

(१) षाड्गुण्यस्य प्रकृतिमण्डलं योनिः।
(२) सन्धिविग्रहासनयानद्वैधीभावाः षाड्गुण्यमित्याचार्याः।
(३) द्वैगुण्यमिति वातव्याधिः, सन्धिविग्रहाभ्यां हि षाड्गुण्यं सम्पद्यत इति।
(४) षाड्गुण्यमेवैतदवस्थाभेदादिति कौटिल्यः।
(५) तत्र पणबन्धः सन्धिः, अपकारो विग्रहः, उपेक्षणमासनम्, अभ्युच्चयो यानं, परार्पणं संश्रयः, सन्धिविग्रहोपादानं द्वैधीभाव इति षड्गुणाः।
(६) परस्माद्धीयमानः सन्दधीत। अभ्युच्चीयमानो विगृह्णीयात्। न मां परो नाहं परमुपहन्तुं शक्त इत्यासीत्। गुणातिशययुक्तो यायात्। शक्तिहीनः संश्रयेत। सहायसाध्ये कार्ये द्वैधीभावं गच्छेत्।


छह गुणों का उद्देश और क्षय, स्थान तथा वृद्धि का निश्चय

(१) सात प्रकृतियाँ और बारह राजमंडल ही छह गुणों के आधार हैं।

(२) पुरातन आचार्यों ने १. संधि, २. विग्रह, ३. यान, ४. आसन, ५. संश्रय और ६. द्वैधीभाव ये छह गुण बताये हैं।

(३) आचार्य वातव्याधि का कहना है कि गुण तो दो ही हैं : संधि और विग्रह, बाकी तो उन्हीं के अवांतर भेद हैं।

(४) किन्तु आचार्य कौटिल्य का अभिमत है कि गुण तो छह ही हैं, संधि और विग्रह से बाकी चार गुण सर्वथा भिन्न हैं, इसलिए इन दोनों में उनका अन्तर्भाव कैसे संभव है ?

(५) उनमें दो राजाओं का कुछ शर्तों पर मेल हो जाना सन्धि, शत्रु का कोई अपकार करना विग्रह, उपेक्षा करना आसन, चढ़ाई करना यान, आत्मसमर्पण करना संश्रय, और संधि-विग्रह दोनों से काम लेना द्वैधीभाव कहलाता है—यही छह गुण हैं।

(६) शत्रु की तुलना में अपने को निर्बल समझने पर संधि कर लेनी चाहिए। यदि शत्रु की तुलना में स्वयं को बलवान् समझा जाय तो विग्रह.कर देना चाहिए। यदि शत्रुबल और आत्मबल में कोई अन्तर न समझे तो आसन को अपना लेना

४५४ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ सातवाँ अधिकरण

४५४ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ सातवाँ अधिकरण

(१) इति गुणावस्थापनम् । (२) तेषां यस्मिन् वा गुणे स्थितः पश्येत् 'इहस्थः शक्ष्यामि दुर्गसेतु-कर्मवणिक्पथशून्यनिवेशखनिद्रव्यहस्तिवनकर्माण्‍यात्मनः प्रवर्तयितुं परस्य चैतानि कर्माण्युपहन्तुम्' इति तमातिष्ठेत्, सा वृद्धिः । (३) 'आशुतरा मे वृद्धिर्भूयस्तरा वृद्ध्युदयतरा वा भविष्यति विप-रीता परस्य' इति ज्ञात्वा परवृद्धिमुपेक्षेत । तुल्यकालफलोदयायां वृद्धौ सन्धिमुपेयात् । (४) यस्मिन् वा गुणे स्थितः स्वकर्मणामुपघातं पश्येन्नेतरस्य तस्मिन्न तिष्ठेत् । एष क्षयः । (५) 'चिरतरेणाल्पतरं वृद्ध्युदयतरं वा क्षेष्ये, विपरीतं परः' इति ज्ञात्वा क्षयमुपेक्षेत । (६) तुल्यकालफलोदये वा क्षये सन्धिमुपेयात् ।


चाहिए। यदि स्वयं को सर्वसंपन्न एवं शक्तिसंपन्न समझे तो चढ़ाई ( यान ) कर देनी चाहिए। अपने को निरा अशक्त समझने पर संश्रय से काम लेना चाहिए। यदि सहायता की अपेक्षा समझे तो द्वैधीभाव को अपनाना चाहिए।

( १ ) यहाँ तक छह गुणों का निरूपण किया गया ।

( २ ) उक्त गुणों में जिस गुण का आश्रय प्राप्त करने पर वह समझे कि, 'मैं इस को अपना कर अपने दुर्ग, सेतुकर्म, व्यापार, नई बस्ती बसाना, खान, लकड़ी के जंगल, हाथियों के जंगल आदि कार्यों को कर सकूँगा और शत्रु के इन कार्यों को नष्ट कर सकूँगा उसका ही आश्रय ले'—इस प्रकार के गुण का आलंबन ही वृद्धि है।

( ३ ) यदि वह समझे कि 'मेरी वृद्धि शीघ्र होगी और शत्रु की देर से, मेरी वृद्धि अधिक होगी और शत्रु की कम, हम दोनों की एक ही समय में बराबर वृद्धि होने पर भी शत्रु की वृद्धि ह्रासोन्मुख होगी और मेरी उदयोन्मुख', ऐसी अवस्था में शत्रु की वृद्धि की कोई चिंता न करे । यदि वह देखे कि शत्रु की वृद्धि भी समानरूप से उदय की ओर अग्रसर हो तो उसके साथ सन्धि कर ले ।

( ४ ) जिस गुण को अपनाने से अपने कार्यों का नाश और शत्रुकार्यों की कोई क्षति न हो, उसको कदापि न अपनाना चाहिए। इस प्रकार के गुण का अवलंबन ही क्षय है।

( ५ ) यदि वह ऐसा समझे कि 'मेरा क्षय बहुत दिनों बाद होगा और शत्रु का जल्दी, मेरा क्षय थोड़ा होगा और शत्रु का अधिक मेरा क्षय उदयोन्मुख होगा और शत्रु का क्षीणोन्मुख,' तो अपने क्षय की कोई परवाह न करे।

( ६ ) यदि शत्रु का क्षय अपने ही समान उदयोन्मुख समझे तो उससे सन्धि कर ले ।

प्र० ९८-९९ : अ० १ ] सन्ध्यादि छह गुण ४५५

(१) यस्मिन् वा गुणे स्थितः स्वकर्मवृद्धिं क्षयं वा नाभिपश्येत्, एतत्तस्थानम्।

(२) 'ह्रस्वतरं वृद्धद्युदयतरं वा स्थास्यामि विपरीतं पर' इति ज्ञात्वा स्थानमुपेक्षेत।

(३) तुल्यकालफलोदये वा स्थाने सन्धिमुपेयादित्याचार्याः।

(४) नैतद्विभाषितमिति कौटिल्यः।

(५) यदि वा पश्येत्—'सन्धौ' स्थितो महाफलैः स्वकर्मभिः परकर्माण्युपहनिष्यामि, महाफलानि वा स्वकर्माण्युपभोक्ष्ये, परकर्माणि वा, सन्धिविश्वासेन वा योगोपनिषत्प्रणिधिभिः परकर्माण्युपहनिष्यामि, सुखं वा सानुग्रहपरिहारसौकर्यं फललाभभूयस्त्वेन स्वकर्मणा परकर्मयोगावहं जनमास्रावयिष्यामि, बलिनातिमात्रेण वा संहितः परः स्वकर्मोपघातं प्राप्स्यति, तेन वा विगृहीतो मया सन्धत्ते, तेन अस्य विग्रहं दीर्घं करिष्यामि, मया वा संहितस्य मद्द्वेषिणो जनपदं पीडयिष्यति, परोपहतो वास्य जन-


(१) अथवा जिस गुण का आश्रय लेने पर अपनी वृद्धि और अपना क्षय कुछ भी न देखे, ऐसी समान स्थिति को स्थान कहते हैं।

(२) यदि वह समझे कि 'मेरी ऐसी दशा थोड़े समय तक रहेगी और शत्रु की बहुत दिनों तक; मेरी यह दशा उदयोन्मुख होगी और शत्रु की क्षयोन्मुख', ऐसी स्थिति में अपनी उस दशा की कोई चिन्ता न करे।

(३) पुरातन आचार्यों का सुझाव है कि 'यदि शत्रु राजा का भी स्थान समकालीन और उदयोन्मुखी हो तो उसके साथ सन्धि कर लेनी चाहिए।'

(४) किन्तु आचार्य कौटिल्य का कहना है कि 'पूर्वाचार्यों का यह सुझाव बहुत ही अनुपयुक्त है।'

(५) किसी विशेष स्थिति में यदि विजिगीषु राजा यह देखे कि 'सन्धि कर लेने पर अपने शक्तिशाली कर्मों से मैं शत्रु के कर्मों का उन्मूलन कर दूँगा; या अपने ही महान फलदायक कर्मों की भाँति शत्रु के कर्मों का उपभोग भी संधि-विश्वास से कर सकूँगा अथवा संधि के बहाने गुप्तचरों तथा विष प्रयोगों द्वारा शत्रु के कर्मों को नष्ट कर सकूँगा, या सन्धि के बहाने शत्रु के कार्यकुशल व्यक्तियों को उत्तम फल तथा पर्याप्त लाभ का प्रलोभन देकर अपने देश में खींच लाऊँगा, जिससे मेरे कृष्य आदि कार्य अधिक लाभदायी होंगे, अथवा अधिक बलवान् शत्रु के साथ संधि करने पर शत्रु को बहुत धन देना पड़ेगा और कोष को क्षीण करने पर वह अपने कर्मों को क्षीण कर लेगा, अथवा शत्रु का जिसके साथ विग्रह हो उसके साथ संधि करके मैं अपने शत्रु के साथ होने वाले विग्रह को अधिक दिनों तक बनाये रखूँगा, अथवा

४५६ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ सातवां अधिकरण

४५६ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ सातवां अधिकरण

पदो मामागमिष्यति ततः कर्मसु वृद्धिं प्राप्स्यामि, विपन्नकर्मारम्भो वा विषयस्थः परः कर्मसु न मे विक्रमेत, परतः प्रवृत्तकर्मारम्भो वा ताभ्यां संहितः कर्मसु वृद्धिं प्राप्स्यामि, शत्रुप्रतिबद्धं वा शत्रुना सन्धिं विधाय मण्डलं भेत्स्यामि, भिन्नमवाप्स्यामि, दण्डानुग्रहेण वा शत्रुमुपगृह्य मण्डल-लिप्सायां विद्वेषं ग्राहयिष्यामि, विद्विष्टं तेनैव घातयिष्यामि' इति सन्धिना वृद्धिमातिष्ठेत् ।

(१) यदि वा पश्येत्—'आयुधीयप्रायः श्रेणीप्रायो वा मे जनपदः शैल-वननदीदुर्गैकद्वारारक्षो वा शक्ष्यति पराभियोगं प्रतिहन्तुमिति, विषयान्ते दुर्गमविषह्यमपाकृतो वा शक्ष्यामि परकर्माण्युपहन्तुमिति, व्यसनपीडोपह-तोत्साहो वा परः संप्राप्तकर्मोपघातकाल इति, विगृहीतस्यान्यतो वा शक्ष्यामि जनपदमपवाहयितुमिति विग्रहे स्थितो वृद्धिमातिष्ठेत् ।

(२) यदि वा मन्येत—'न मे शक्तः परः कर्माण्युपहन्तुम्, नाहं तस्य


इसके साथ संधि करके यह मेरे शत्रु राष्ट्र को पीडा पहुँचायेगा, या दूसरे से सताया हुआ दूसरा राष्ट्र, इसके साथ संधि कर लेने पर मेरे चंगुल में आ जायेगा, जिससे मैं अपने कर्मों को अधिक बढ़ा सकूँगा, या दुर्ग आदि के नष्ट हो जाने पर आपत्ति में पड़ा मेरा शत्रु मुझ पर आक्रमण न कर सकेगा या कदाचित् दूसरे शत्रु की सहायता से उसने अपने कार्यों का पुनरुद्धार करना आरंभ कर दिया, तब भी दोनों के साथ संधि करके मैं अपने कार्यों को उन्नत बनाये रख सकूँगा, या शत्रु के साथ मिले हुए मंडल को, शत्रु के साथ संधि करके, उन दोनों में फूट डाल दूँगा, तथा मंडल से भिन्न हुए राजा को अपने वश में कर सकूँगा, अथवा सैनिक सहायता से वश में करके मैं मंडल के साथ मिल जाने की उसकी इच्छा को उलट दूँगा, बाद में द्वेष हो जाने पर मंडल के द्वारा ही उसको मरवा दूँगा'—इस प्रकार की स्थितियों में संधि करके अपनी उन्नति करनी चाहिए ।

(१) इसके विपरीत, विजिगीषु राजा यदि समझे कि 'मेरे देश में आयुधजीवी क्षत्रिय और कृषक अधिक हैं, मेरे देश में पहाड़, जंगल, नदी तथा किले बहुत हैं, मेरे राज्य में जाने-आने के लिए भी एक ही मार्ग है, शत्रु के किसी भी आक्रमण का प्रतीकार मेरा देश हर तरह से करने में समर्थ है, या राज्य की सीमा पर अति दुर्भेद्य दुर्ग का आश्रय लेकर शत्रु के कार्यों का विनाशकाल अब समीप आ पहुँचा है, अथवा विग्रह करते हुए शत्रु के जनपद को मैं किसी दूसरे रास्ते से पार कर लूंगा'—यदि ऐसा समझे तो विग्रह कर दे । ऐसी अवस्थाओं में विग्रह करके ही वह अपनी उन्नति करे ।

(२) अथवा विजीगीषु समझे कि 'शत्रु मेरे कार्यों को नष्ट नहीं कर सकता है और मैं भी उसके कार्यों का नाश नहीं कर सकता हूँ, अथवा समान शक्ति वाले कुत्तों

प्र० ९८-९९ : अ० १ ] सन्ध्यादि छह गुण ४५७

कर्मोपघाती वा, व्यसनमस्य श्ववराहयोरिव कलहे वा स्वकर्मानुष्ठानपरो वा वर्धिष्ये' इत्यासनेन वृद्धिमातिष्ठेत् ।

(१) यदि वा मन्येत—'यानसाध्यः कर्मोपघातः शत्रोः प्रतिविहित-स्वकर्मरक्षश्चास्मि' । इति यानेन वृद्धिमातिष्ठेत् ।

(२) यदि वा मन्येत—'नास्मि शक्तः परकर्माण्युपहन्तुं स्वकर्मोपघातं वा त्रातुम्' इति बलवन्तमाश्रितः स्वकर्मानुष्ठानेन क्षयात्स्थानं स्थानाद्वृद्धिं चाकांक्षेत ।

(३) यदि वा मन्येत—'सन्धिनेकतः स्वकर्माणि प्रवर्तयिष्यामि, विग्रहे-णैकतः परकर्माण्युपहनिष्यामि' इति द्वैधीभावेन वृद्धिमातिष्ठेत् ।

(४) एवं षड्भिर्गुणैरेतैः स्थितः प्रकृतिमण्डले ।
पर्येषेत क्षयात् स्थानं स्थानाद् वृद्धिं च कर्मसु ॥

इति षाड्गुण्ये सप्तमेऽधिकरणे षाड्गुण्यसमुद्देशक्षयस्थानवृद्धिनिश्चयो नाम प्रथमोऽध्यायः; आदितोऽष्टनवनवतितमः ।

—: ० :—


तथा सूअरों के समान हमारा विग्रह हो जाने पर भी अपने कर्मों के अनुष्ठान में निरत रह कर मैं अपनी उन्नति कर सकूँगा, तो आसन का आश्रय लेकर वह अपनी उन्नति करे ।

(१) अथवा यदि समझें कि 'शत्रु के कर्मों का नाश यान से हो सकेगा और मैंने अपने कर्मों की रक्षा का पूरा प्रबंध कर दिया है' तो यान का आश्रय लेकर अपनी उन्नति करें ।

(२) अथवा यदि वह समझे कि मैं शत्रु के कर्मों को नाश कर सकूँगा और अपने कार्यों को उसके आक्रमणों से बचा न पाऊँगा' तो बलवान् का आश्रय लेकर अपने कार्यों का अनुष्ठान करता हुआ वह क्षय से स्थान और स्थान से वृद्धि की आकांक्षा करे ।

(३) और, अथवा ऐसा समझे कि 'मैं एक शत्रु के साथ सन्धि करके अपने कार्यों को पूर्ववत् करता रहूँगा और दूसरे के साथ विग्रह करके उसके कर्मों का नाश कर सकूँगा' तो द्वैधीभाव का आश्रय लेकर अपनी उन्नति का यत्न करे ।

(४) इस प्रकार अमात्य आदि प्रकृतिमण्डल में स्थित राजा को चाहिए कि वह सन्धि, विग्रह आदि छह गुणों का आश्रय लेकर क्षयावस्था को पार करके स्थान की और स्थानावस्था को पार करके वृद्धि की आकांक्षा करे ।

षाड्गुण्य नामक सप्तम अधिकरण में पहला अध्याय समाप्त ।

—: ० :—

प्रकरण १००संश्रयवृत्तिः
अध्याय २

(१) सन्धिविग्रहयोस्तुल्यायां वृद्धौ सन्धिमुपेयात् । विग्रहे हि क्षयव्ययप्रवासप्रत्यवाया भवन्ति ।
(२) तेनासनयानयोरासनं व्याख्यातम् ।
(३) द्वैधीभावसंश्रययोर्द्वैधीभावं गच्छेत् । द्वैधीभूतो हि स्वकर्मप्रधान आत्मन एवोपकरोति । संश्रितस्तु परस्योपकरोति, नात्मनः ।
(४) यद्वलः सामन्तः तद्विशिष्टबलमाश्रयेत । तद्विशिष्टबलाभावे तमेवाश्रितः कोशदण्डभूमीनामन्यतमेनास्योपकर्तुमदृष्टः प्रयतेत । महादोषो हि विशिष्टसमागमो राज्ञामन्यत्रारिविगृहीतात् ।


बलवान् का आश्रय

( १ ) विजिगीषु राजा सन्धि और विग्रह में जब एक समान लाभ होता देखे तो अपनी उन्नति के लिए सन्धि का ही अवलम्बन करे; क्योंकि विग्रह करने पर प्रजा का नाश, धान्य आदि की क्षति, प्रवास और प्रत्यवाय आदि अनेक प्रकार के कष्ट झेलने पड़ते हैं ।

( २ ) इसी प्रकार आसन और यान के द्वारा समान लाभ की स्थिति में आसन को ही अपनाना चाहिए ।

( ३ ) द्वैधीभाव और संश्रय के समान लाभ होने पर द्वैधीभाव को ही ग्रहण करना चाहिए; क्योंकि ऐसा करने पर राजा अपने कार्यों को करता हुआ अपनी उन्नति करता है । इसके विपरीत संश्रय का सहारा लेने वाला राजा अपने आश्रय-दाता का ही अधिक उपकार करता है, अपना नहीं ।

( ४ ) आश्रय उसका लिया जाना चाहिए, जो अपने शत्रु राजा ( सामन्त ) से बलवान् हो । यदि ऐसा बलवान् राजा कोई न मिले तो अपने शत्रु राजा का ही आश्रय लेना चाहिए; और दूर से ही वह धन, सेना, भूमि आदि को देकर उसका उपकार करे, उसके पास न आये । क्योंकि बलवान् राजा का साथ कभी-कभी महान् अनर्थकारी सिद्ध होता है । लेकिन उस बलवान् राजा ने यदि किसी शत्रु से दुश्मनी ठानी हो तो उसके साथ रहने में कोई हानि नहीं है ।

प्र० १०० : अ० २ ] बलवान् का आश्रय ४५९

(१) अशक्ये दण्डोपनतवद् वर्तेत । (२) यदा चास्य प्राणहरं व्याधिमन्तःकोपं शत्रुवृद्धिं मित्रव्यसनमुपस्थितं वा तन्निमित्तामात्मनश्च वृद्धिं पश्येत्, तदा सम्भाव्यव्याधिधर्मकार्यापदेशेनापयायात् । स्वविषयस्थो वा नोपगच्छेत् । आसन्नो वास्य छिद्रेषु प्रहरेत् । (३) बलीयसोर्वा मध्यगतस्त्राणसमर्थमाश्रयेत् । यस्य वानन्तर्धिः स्यात् । उभौ वा । कपालसंश्रयस्तिष्ठेत् । मूलहरमितरस्येतरमपदिशन् भेदमुभयोर्वा परस्परादेशं प्रयुञ्जीत । भिन्नयोरुपांशुदण्डम् । (४) पार्श्वस्थो वा बलस्थयोरासन्नभयात् प्रतिकुर्वीत । दुर्गापाश्रयो वा द्वैधीभूतस्तिष्ठेत् । सन्धिविग्रहक्रमहेतुभिर्वा चेष्टेत । दूष्यामित्राटविकानुभयोरुपगृह्णीयात् । एतयोरन्यतरं गच्छंस्तैरेवान्यतरस्य व्यसने प्रहरेत् ।


( १ ) यदि बलवान् राजा के निकट गये बिना उसको प्रसन्न करना असम्भव जान पड़े तो अपनी सेना देकर उससे मिल-जुल कर नम्रतापूर्वक उसी के पास रहे ।

( २ ) और जब देखे कि वह बलवान् राजा किसी प्राणांतक व्याधि से ग्रस्त है, अथवा उसका पुरोहित आदि प्रकृतियाँ उससे असन्तुष्ट हैं, या उसके शत्रु बहुत बढ़ गये हैं, या अपने मित्र के ऊपर कोई बड़ी विपत्ति आई है; और इन्हीं कारणों से अपनी उन्नति का मार्ग देखे, तो किसी व्याधि या धर्मकार्य का बहाना कर वहाँ से अपने देश को कूच कर दे । यदि ये सभी व्याधियां-विपत्तियां स्वयं उसके देश में पैदा हो गई हों तो किसी व्याधि या धर्मकार्य के निमित्त बुलाये जाने पर भी वह अपने देश को न छोड़े । अथवा बलवान् राजा के पास रहकर ही वह उसके छिद्रों पर बराबर आघात करता रहे ।

( ३ ) अथवा दो बलवान् राजाओं के बीच में रहता हुआ वह अपनी रक्षा करने में समर्थ राजा के आश्रय में रहे । अथवा अपने समीपस्थ राजा का आश्रय ले । यदि दोनों ही समीप हों तो कपाल सन्धि के द्वारा दोनों का अनुग्रह प्राप्त करे । दोनों को वह एक-दूसरे का अपकार करने वाला बताता रहे । एक दूसरे के द्रव्य का नाश करने वाला बताकर उन दोनों में वह फूट डाल दे । इस प्रकार फूट डाल कर वह गुप्त उपायों द्वारा चुपचाप उन्हें मरवा दे ।

( ४ ) अथवा उन दोनों बलवान् राजाओं में जिसकी ओर से शीघ्र ही भय की आशंका देखे उसके पास रहता हुआ अपनी भावी आपत्ति का प्रतीकार करे । अथवा दुर्ग का आश्रय लेकर द्वैधीभाव द्वारा एक के साथ सन्धि कर दूसरे से विग्रह कर दे । अथवा सन्धि-विग्रह के निमित्तों को लेकर वह अपनी उन्नति का उपाय सोचे । अथवा उन दोनों ही प्रतिद्वन्द्वी राजाओं के दूष्य, शत्रु और आटविक आदि को उच्च दान-

४६०कौटिल्य का अर्थशास्त्र[ सातवाँ अधिकरण

द्वाभ्यामुपहितो वा मण्डलापाश्रयस्तिष्ठेत् । मध्यममुदासीनं वा संश्रयेत । तेन सहैकमुपगृह्येतरमुच्छिद्यादुभौ वा ।

(१) द्वाभ्यामुच्छिन्नो वा मध्यमोदासीनयोस्तत्पक्षीयाणां वा राज्ञां न्यायवृत्तिमाश्रयेत । तुल्यानां वा यस्य प्रकृतयः सुखयेयुरेनं, यत्रस्थो वा शक्नुयादात्मानमुद्धर्तुं, यत्र पूर्वपुरुषोचिता गतिरासन्नः सम्बन्धो वा मित्राणि भूयांसीति शक्तिमन्ति वा भवेयुः ।

(२) प्रियो यस्य भवेद् यो वाप्रियोऽस्य कतरस्तयोः ।
प्रियो यस्य स तं गच्छेदित्याश्रयगतिः परा ॥

इति षाड्गुण्ये सप्तमेऽधिकरणे संश्रयवृत्तिर्नाम द्वितीयोऽध्यायः,
आदित एकोनशततमः ।

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सम्मान देकर अपने वश में कर ले । तदनन्तर किसी एक का मुक़ाबला करता हुआ उसके जिस पक्ष को वह कमजोर समझे दूष्य आदि के द्वारा उस पर प्रहार कर दे । यदि दोनों ही उसके लिये पीड़ाकर हों तो वह मण्डल की शरण में चला जाय । अथवा मध्यम या उदासीन राजा का आश्रय ले ले । किसी एक के साथ रहता हुआ वह दान-संमान देकर उसको अपने वश में कर ले और दूसरे का उच्छेद करा दे; यदि हो सके तो दोनों का ही उच्छेद कर दे ।

( १ ) अथवा दोनों से पीड़ित हुआ वह मध्यम, उदासीन या उनके पक्ष के किसी न्यायपरायण राजा का आश्रय ले ले । यदि उनमें से अनेक राजा न्यायपरायण हों तो जिसकी अमात्य आदि प्रकृतियाँ अपने अनुकूल हों उसी का आश्रय ले । अथवा जिसके साथ रहता हुआ वह अपना उद्धार कर सके; अथवा जिसके साथ परम्परा से विवाहादि अन्तरंग सम्बन्ध रहे हों; अथवा जहाँ बहुत-से शक्तिशाली मित्र हों; उसका आश्रय ले ले ।

( २ ) जो जिसका प्रिय है, वे दोनों एक-दूसरे के अवश्य प्रिय होते हैं । इसलिए जो जिसका प्रिय हो, वह उसी का आश्रय ले । यही सर्वश्रेष्ठ आश्रयस्थान बताया गया है ।

षाड्गुण्य नामक सप्तम अधिकरण में संश्रयवृत्ति नामक दूसरा अध्याय समाप्त ।

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प्रकरण १०१, १०२समहीनज्यायसा
अध्याय ३गुणाभिनिवेशो हीनसन्ध्यश्च

(१) विजिगीषुः शक्त्यपेक्षः षाड्गुण्यमुपयुञ्जीत । समज्यायोभ्यां सन्धयेत । हीनेन विगृह्णीयात् । विगृहीतो हि ज्यायसा हस्तिना पादयुद्धमिवाभ्युपैति । समेन चामं पात्रमामेनाहतमिवोभयतः क्षयं करोति । कुम्भेनेवाश्मा हीनेनैकान्तसिद्धिमवाप्नोति ।

(२) ज्यायांश्चेत् सन्धिमिच्छेत्, दण्डोपनतवृत्तमाबलीयसं वा योगमातिष्ठेत् ।

(३) समश्चेन्न सन्धिमिच्छेत्, यावन्मात्रमपकुर्यात् तावन्मात्रमस्य प्रत्यपकुर्यात् । तेजो हि सन्धानकारणं, नातप्तं लोहं लोहेन सन्धत्त इति ।


सम, हीन तथा बलवान् राजाओं के चरित्र; और हीन राजा के साथ सन्धि

( १ ) विजिगीषु राजा को चाहिए कि वह अपने सामर्थ्य के अनुसार सन्धि आदि छह गुणों में जिसको उचित समझे उसी को व्यवहार में लाये । उसके लिए उचित यही है कि बराबर तथा बड़ी शक्ति वाले राजा के साथ वह सन्धि कर ले; और शक्तिहीन के साथ विग्रह कर दे । क्योंकि अधिक शक्ति वाले के साथ विग्रह करने पर हीन शक्ति राजा की वही दुर्दशा होती है, जो कि गजारोही सैनिकों के साथ युद्ध में पैदल लड़ने वाली सेना की होती है । और समान बल-विक्रम वाले के साथ विग्रह करने पर वे दोनों ही उसी प्रकार नष्ट हो जाते हैं, जैसे दो कच्चे घड़े आपस में भिड़ जाने से दोनों ही नष्ट हो जाते हैं । और हीन शक्ति के साथ विग्रह करने का वही सुपरिणाम होता है जो पत्थर से घड़े पर चोट मारने से होता है ।

( २ ) यदि अधिक शक्तिशाली राजा सन्धि करने के लिए तैयार न हो तो दण्डोपनतवृत्त और आबलीयस अधिकरणों में निर्दिष्ट उपायों का प्रयोग करना चाहिए ।

( ३ ) यदि समान शक्ति वाला राजा सन्धि न करना चाहे तो वह जितना नुकसान पहुँचावे उतना ही नुकसान उसका भी करना चाहिए; क्योंकि तेज ही सन्धि का कारण सिद्ध होता है । बिना तपा लोहा दूसरे लोहे के साथ कभी नहीं मिल पाता है ।

४६२ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ सातवां अधिकरण

४६२ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ सातवां अधिकरण

(१) हीनश्चेत् सर्वत्रानुप्रणतस्तिष्ठेत् सन्धिमुपेयात् । आरण्योऽग्निरिव हि दुःखामर्षजं तेजो विक्रमयति । मण्डलस्य चानुग्राह्यो भवति । (२) संहितश्चेत् ‘परप्रकृतयो लुब्धक्षीणापचकिताः प्रत्यादानभयाद्वा नोपगच्छन्ति’ इति पश्येद्धीनोऽपि विगृह्णीयात् । (३) विगृहीतश्चेत् ‘प्रकृतयो लुब्धक्षीणापचरिताः विग्रहोद्विग्ना वा मां नोपगच्छन्ति’ इति पश्येत् । ज्यायानपि सन्धीयेत, विग्रहोद्वेगं वा शमयेत् । ‘व्यसनयौगपद्ये गुरुव्यसनोऽस्मि, लघुव्यसनः परः सुखेन प्रतिकृत्य व्यसन-मात्मनोऽभियुज्यात्’ इति पश्येत् । ज्यायानपि सन्धीयेत । (४) सन्धिविग्रहयोश्चेत् परकर्शनमात्मोपचयं वा नाभिपश्येत्, ज्याया-नप्यासीत् । (५) परव्यसनमप्रतिकार्यं चेत् पश्येत्, हीनोऽप्यभियायात् । (६) अप्रतिकार्यासन्नव्यसनो वा ज्यायानपि संश्रयेत । सन्धिनैकतो विग्रहेणैकतश्चेत् कार्यसिद्धिं पश्येत्, ज्यायानपि द्वैधीभूतस्तिष्ठेदिति ।


(१) यदि हीन शक्ति राजा प्रत्येक विषय में नम्र ही बना रहे तो उससे सन्धि कर लेनी चाहिए । क्योंकि दुःख और अमर्ष से पैदा हुआ तेज जंगल में लगी हुई आग के समान है; बहुत संभव है कि विजिगीषु के सन्धि न करने पर हीन शक्ति राजा का तेज उसको विक्रमशाली बना दे और उस दशा में वह मण्डल का कृपापात्र बन जाय ।

(२) यदि हीनशक्ति राजा सन्धि कर देने पर भी यह देखे कि ‘शत्रु के अमात्य आदि प्रकृतिजन अपनी नीचता या असन्तोष के कारण या बदला लिये जाने के भय से मुझे नहीं अपना रहे हैं’ तो विग्रह कर दे ।

(३) अधिक बलसम्पन्न विजिगीषु, हीनशक्ति राजा के साथ विग्रह करने पर यदि देखे कि ‘अमात्य आदि प्रकृतिजन लोभी, क्षीण तथा चरित्रहीन होने के कारण अथवा विग्रह से उद्विग्न होने के कारण मुझसे अनुराग नहीं रखते’ तो सन्धि कर ले । या विग्रह से पैदा हुई उद्विग्नता को वह शान्त करे । अथवा जब देखे कि ‘मेरे ऊपर भी आपत्ति है और शत्रु के ऊपर भी; मेरी आपत्ति बहुत बड़ी है और शत्रु की बहुत थोड़ी; वह सुगमता से अपनी आपत्ति का प्रतीकार करके मेरा मुकाबला करने के लिए तैयार हो जायेगा’ तो शक्तिहीन के साथ भी सन्धि कर ले ।

(४) यदि अधिक शक्तिशाली विजिगीषु भी यह समझे कि ‘सन्धि या विग्रह करने पर शत्रु का ह्रास और मेरी वृद्धि संभव न होगी’ तो आसन का आश्रय ले ।

(५) यदि हीनशक्ति विजिगीषु भी यह देखे कि ‘शत्रु अपनी आपत्ति का प्रती-कार करने में असमर्थ है’ तो तत्काल ही उस पर चढ़ाई कर दे ।

(६) प्रतीकार से शान्त न होने वाली आपत्ति को समीप आया देखकर अधिक शक्तिसंपन्न विजिगीषु को भी चाहिए कि वह संश्रयवृत्ति का अवलम्बन करे । यदि

प्र० १०१-१०२ : अ० ३ ] शक्ति के अनुसार व्यवहार ४६३

(१) एवं समस्य षाड्गुण्योपयोगः । तत्र तु प्रतिविशेषः— (२) प्रवृत्तचक्रेणाक्रान्तो राज्ञा बलवताबलः । सन्धिनापनमेत्तूर्णं कोशदण्डात्मभूमिभिः ॥ (३) स्वयं संख्यातदण्डेन दण्डस्य विभवेन वा । उपस्थातव्यमित्येष सन्धिरात्मामिषो मतः ॥ (४) सेनापतिकुमाराभ्यामुपस्थातव्यमित्ययम् । पुरुषान्तरसन्धिः स्यान्नात्मनेत्यात्मरक्षणः ॥ (५) एकेनान्यत्र यातव्यं स्वयं दण्डेन वेत्ययम् । अदृष्टपुरुषः सन्धिर्दण्डमुख्यात्मरक्षणः ॥ (६) मुख्यस्त्रीबन्धनं कुर्यात् पूर्वयोः पश्चिमे त्वरिम् । साधयेद् गूढमित्येते दण्डोपनतसन्धयः ॥ (७) कोशदानेन शेषाणां प्रकृतीनां विमोक्षणम् ।


एक के साथ सन्धि द्वारा और दूसरे के साथ विग्रह द्वारा अपनी कार्यसिद्धि समझे तो अधिक शक्तिशाली विजिगीषु द्वैधीभाव का अवलम्बन करे ।

( १ ) इस प्रकार सम, हीन और अधिक शक्ति के विजिगीषु राजाओं में पारस्परिक सन्धि आदि छह गुणों के उपयोग का निरूपण किया गया । अब उनमें से हीन शक्ति वाले के प्रति कुछ विशेष बातों का निर्देश किया जाता है ।

( २ ) सेना आदि के द्वारा बलवान् राजा से दबाये हुए निर्बल राजा को चाहिए कि तत्काल वह धन, सेना और भूमि आदि के सहित आत्मसमर्पण करके बलवान् राजा के सामने झुक जाय ।

( ३ ) जब विजित राजा; विजयी राजा के कथनानुसार अपनी शक्तिभर सेना तथा धन लेकर आत्मसमर्पण कर दे तो उस संधि को आमिषसन्धि कहते हैं ।

( ४ ) सेनापति और राजकुमार को शत्रुराजा की सेवा में पेश करके जो संधि की जाती है । उसको पुरुषांतर संधि कहते हैं । इसी को आत्मरक्षण संधि भी कहते हैं, क्योंकि इसमें राजा शत्रु के दरबार में न जाने से आत्मरक्षा कर लेता है ।

( ५ ) शत्रु के कार्य की सिद्धि के लिए जब 'मैं स्वयं अकेला ही जाऊँगा या मेरी सेना ही जायेगी' ऐसा कहकर संधि की जाती है तब उसे अदृष्टपुरुषसंधि कहते हैं । इस संधि को दण्डमुख्यात्मरक्षण संधि भी कहते हैं, क्योंकि इसमें मुख्य सैनिकों और राजा की रक्षा हो जाती है ।

( ६ ) उक्त तीनों संधियों में से पहिली दो संधियों में विश्वास के लिए शक्तिशाली राजा प्रमुख राजपुरुषों की कन्याओं से विवाह करे और तीसरी संधि में शत्रु को विष आदि गूढ प्रयोगों के द्वारा वश में करे । इन तीनों संधियों का एक नाम दण्डोपनतसंधि है ।

( ७ ) जिस संधि में बलवान् शत्रु द्वारा युद्ध में गिरफ्तार किये गये अमात्य

४६४कौटिल्य का अर्थशास्त्र[ सातवां अधिकरण

परिक्रयो भवेत् सन्धिः स एव च यथासुखम् ॥
(१) स्कन्धोपनेयो बहुधा ज्ञेयः सन्धिरुपग्रहः ।
निरुद्धो देशकालाभ्यामत्ययः स्यादुपग्रहः ॥
विषह्यदानादायत्यां क्षमः स्त्रीबन्धनादपि ।
सुवर्णसन्धिविश्वासादेकीभावगतो भवेत् ॥
(२) विपरीतः कपालः स्यादत्यादानादभाषितः ।
पूर्वयोः प्रणयेत् कुप्यं हस्त्यश्वं वा गरान्वितम् ॥
(३) तृतीये प्रणयेदधं कथयन् कर्मणां क्षयम् ।
तिष्ठेच्चतुर्थ इत्येते कोशोपनतसन्धयः ॥
(४) भूम्येकदेशत्यागेन देशप्रकृतिरक्षणम् ।
आदिष्टसन्धित्रेष्टो गूढस्तेनोपघातिनः ॥

आदि प्रकृतिजनों को धन देकर छुड़ाया जाय उसे परिक्रयसन्धि कहते हैं। और यही संधि जब सुविधानुसार किस्तवार धन अदा करने की शर्त पर की जाय तो उपग्रह-सन्धि कहाती है। जब किस्तवार देय धन के लिए समय और स्थान निश्चित किये जाते हैं तब इसी उपग्रहसन्धि को प्रत्ययसन्धि कहते हैं।

( १ ) सुविधानुसार नियत समय में नियमित धन राशि दे देने के कारण यह संधि कन्यादानसंधि के नाम से भी कहीं कहीं प्रसिद्ध है, क्योंकि यह सन्धि भविष्य में अच्छा फल देनेवाली एवं तपे हुए सुवर्ण को आपस में मिला देने के समान शत्रु और विजिगीषु को मिलाने का साधन सिद्ध होती है। इसलिए इसका एक नाम सुवर्ण सन्धि भी दिया गया है।

( २ ) जिस सन्धि में संपूर्ण धनराशि तत्काल ही अदा कर देने की शर्त होती है उसकी कपालसन्धि कहते हैं। शास्त्रों में इस दुरभिसन्धि को कोई स्थान नहीं दिया गया है। उक्त चार सन्धियों में से पहिली दो सन्धियों में कपड़ा, कवच, लोहा; तांबा आदि वस्तुएँ शत्रु राजा को दे, या उसके इच्छानुसार बूढ़े हाथी-घोड़े पेश करे, किन्तु उनको ऐसा विष दिया गया हो, जिससे दो-तीन दिनों के भीतर उनकी मृत्यु हो जाय।

( ३ ) तीसरी सन्धि में देय धन का कुछ हिस्सा देकर कह दे कि 'आजकल मेरे कार्य बहुत बिगड़ गये हैं, इतने ही पर सन्तोष कीजिए'। चौथी कपालिक सन्धि में मध्यम या उदासीन राजा का आश्रय लेकर 'देता हूँ' 'देता हूँ' कहता हुआ समय को टाल दे। इन चारों सन्धियों का एक नाम कोशोपनतसन्धि भी कहा जाता है

( ४ ) राष्ट्र और प्रकृति की रक्षा के लिए भूमि का कुछ भाग देकर जो सन्धि की जाती है उसे आदिष्टसन्धि कहते हैं। जो विजिगीषु उस दी हुई भूमि में गूढ पुरुषों और चोरों के द्वारा उपद्रव करने में समर्थ हो उसके लिए यह सन्धि बड़े मौके की है।

प्र० १०१-१०२ : अ० ३ ] शक्ति के अनुसार व्यवहार ४६५

(१) भूमीनामात्तसाराणां मूलवर्जं प्रणामनम् ।
उच्छिन्नसन्धिरस्तत्रैष परव्यसनकांक्षिणः ॥
(२) फलदानेन भूमीनां मोक्षणं स्यादवक्रयः ।
फलातिमुक्तो भूमिभ्यः सन्धिः स परदूषणः ॥
(३) कुर्याद्वेक्षणं पूर्वौ पश्चिमौ त्वबलीयसम् ।
आदाय फलमित्येते देशोपनतसन्धयः ॥
(४) स्वकार्याणां वशेनैते देशे काले च भाषिताः ।
आबलीयसिकाः कार्यास्त्रिविधा हीनसन्धयः ॥

इति षाड्गुण्ये सप्तमेऽधिकरणे समहीनज्यायसां गुणाभिनिवेशो
हीनसन्धिर्नाम तृतीयोऽध्यायः,
आदितः शततमः ।

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( १ ) राजधानी और दुर्गों को छोड़ कर सारहीन भूमि शत्रु को देकर जो संधि की जाती है उसको उच्छिन्नसन्धि कहते हैं । यह सन्धि उस राजा के लिए बड़ी हितकर है जो इस इन्तजारी में हो कि कब शत्रु पर विपत्ति पड़े और कब में अपनी भूमि को वापिस ले लूं ।

( २ ) जिस सन्धि में भूमि की पैदावार को देकर भूमि को छुड़ा लिया जाय उसका नाम अपक्रयसन्धि है, किन्तु जिस सन्धि में पैदावार के अलावा कुछ और भी देना पड़े उसको परदूषणसन्धि कहते हैं ।

( ३ ) इन चारों प्रकार की सन्धियों में पहिली आदिष्ट और उच्छिन्न, दो सन्धियों के समय शत्रु की विपत्ति की प्रतीक्षा करनी चाहिए, और पिछली दो सन्धियों में भूमि की पैदावार को लेकर अबलीयस प्रकरण में निर्दिष्ट उपायों से शत्रु का प्रतीकार करना चाहिए । भूमि देने के कारण इन चारों सन्धियों को भूम्युपनतसन्धि या देशोपनतसन्धि इन नामों में भी कहा जाता है ।

( ४ ) इस प्रकार निर्बल राजा को उचित है कि वह उक्त दण्डोपनत, कोषोपनत और देशोपनत, इन तीन प्रकार की हीन सन्धियों को अपने कार्य, देश तथा समय के अनुसार उपयोग में लाये ।

षाड्गुण्य नामक सप्तम अधिकरण में हीनसन्धि नामक
तीसरा अध्याय समाप्त ।

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३० कौ०

प्रकरण १०३-१०७विगृह्यासनं, सन्धायासनं, विगृह्ययानं, सन्ध्याययानं, सम्भूयप्रयाणं च
अध्याय ४

(१) सन्धिविग्रहयोरासनं यानं च व्याख्यातम् । स्थानमासनमुपेक्षणं चेत्यासनपर्यायाः । (२) विशेषस्तु गुणैकदेशे स्थानम् । स्ववृद्धिप्राप्त्यर्थमासनम् । उपायानामप्रयोग उपेक्षणमिति । (३) सन्धानकामयोररिविजिगीष्वोरुपहन्तुमशक्तयोर्विगृह्यासनं सन्धाय वा । (४) यदा वा पश्येत्—'स्वदण्डैर्मित्राटवीदण्डैर्वा समं ज्यायांसं वा कर्शयितुमुत्सहे' इति, तदा कृतबाह्याभ्यन्तरकृत्यो विगृह्यासीत । (५) यदा वा पश्येत्—'उत्साहयुक्ता मे प्रकृतयः संहता विवृद्धाः स्वकर्मण्यव्याहताश्चरिष्यन्ति, परस्य वा कर्माण्युपहनिष्यन्ति' इति, तदा विगृह्यासीत ।


विग्रह करके आसन और यान का अवलंबन

( १ ) पूर्वाचार्यों ने यान तथा आसन को सन्धि और विग्रह के अन्तर्गत ही माना है । स्थान, आसन और उपेक्षण; ये तीन शब्द आसन के पर्यायवाची हैं ।

( २ ) आसनरूप गुण की अल्पावस्था में स्थान शब्द का प्रयोग रूढ है । आशय यह है कि आसन को ग्रहण करने पर भी यदि शत्रु के अपकार का बदला न चुकाया जा सके ऐसी अवस्था में आसन शब्द के लिए विशेष रूप से स्थान शब्द का प्रयोग किया जाता है । अपनी वृद्धि के लिए जब इस गुण का अवलम्बन किया जाय तो उसे आसन कहते हैं । लड़ते हुए उपायों का प्रयोग न करना अथवा थोड़ा प्रयोग करना उपेक्षण कहलाता है ।

( ३ ) विग्रह करके आसन का अवलम्बन : एक-दूसरे को हानि पहुचाने में असमर्थ सन्धि की इच्छा रखने वाले विजिगीषु और शत्रु राजा को चाहिए कि वे विग्रह करके आसन का अवलम्बन करें या सन्धि करके आसन का अवलम्बन करें ।

( ४ ) अथवा जब विजिगीषु देखे कि 'अपनी तथा मित्र की या आटविक राजा की सेना के द्वारा, मैं बराबर के या अधिक शक्तिवाले शत्रु राजा की सेना को पराजित कर सकूँगा' तो भीतर और बाहर की सब व्यवस्था ठीक करके विग्रह करके चुप होकर बैठ जाय ।

( ५ ) अथवा जब देखे कि 'मेरी अमात्य आदि प्रकृतियाँ पूरे उत्साह पर तथा