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लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)

Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा द्वारा

DevanagariSanskritpublished268 पृष्ठ

क्षेत्रव्यवहारः। (१४६) सर्वदोर्युतिदलञ्चतुःस्थितं बाहुभिर्विरहितं च तद्घात्॥ मूलमस्फुटफलं चतुर्भुजे स्पष्टमेवमुदितं त्रिबाहुके ॥१९॥ अन्वयः-सर्वदोर्युतिदलं चतुःस्थितं कार्यम् ततः बाहुभिः विरहितं च कार्यम्। तद्घात् मूलं चतुर्भुजे अस्फुटफलम् भवति। एवं त्रिबाहुके स्पष्टम् फलम् उदितम्॥ १९॥ अर्थः-सब भुजाओंका योग कर आधा कर ले तब जो अंक हों उनको चार स्थानमें लिखे; फिर चार स्थानोंमें लिखे हुए अंकोंमें अलग अलग एक एक भुजको घटावे जो शेष अंक हों उनका योग करे, फिर इसी योगका मूल ले; वही चतुर्भुज क्षेत्रमें अस्फुट (ठीक नहीं) फल होता है, इसी रीतिसे त्रिभुजमें स्पष्ट (ठीक) फल होता है ॥ १९॥ उदाहरणम्- भूमिश्चतुर्दशमिता मुखमङ्कसंख्यं बाहू त्रयोदशदिवाकर- सम्मितौ च ॥ लम्बोऽपि यत्र रविसंख्यक एव तत्र क्षेत्रे फलं कथय तत्कथितं यदाद्यैः ॥१६॥ अन्वयः-यत्र क्षेत्रे चतुर्दशमिता भूमिः अंकसंख्यम् मुखं त्रयोदशदिवाकर सम्मितौ च बाहू यत्र लम्बः अपि रविसंख्यकः एव तत्र यत् आद्यैः कथितं तत् फलं कथय ॥ १६॥ अर्थः-जिस क्षेत्रमें १४ भूमि है ९ मुख है १३ और १२ दोनों भुज हैं और जहां लम्ब भी १२ है; उस क्षेत्रमें जो प्राचीनोंने कहा है वह फल कहो॥ १६॥ न्यासः-भूमिः १४ मुखम् ९ बाहू १३। १२ लम्बः १२

उक्तवत्करणेन जातं क्षेत्रफलम् १९८०० अस्याः पदं किञ्चिन्न्यनमेकचत्वारिंशच्छ- तम् १४१ इदमत्र क्षेत्रे न वास्तवम्फलं किन्तु "लम्बेन निघ्नं कुमुखैक्यखण्ड- मिति" वक्ष्यमाणकरणेन वास्तवम्फ- लम् १३८ ॥ १०

( १४६ ) लीलावती । फैलाघ-उपरोक्त रीति के अनुसार क्षेत्रफल जानने के लिये सब भुजों ९ । १२ । १४ । १३ के योग ४८ को आधा २४ किया फिर इनको चार स्थानमें लिखा; फिर एक एक स्थानमें क्रमसे भुजोंको घटाया तब जो शेष रहा १५ । १२ । १० । ११ उनका परस्पर घात किया तब १९८०० हुए; इसका मूल क्षेत्रफल है; परन्तु इसका पूरा पूरा मूल मिल नहीं सकता, इस कारण यह करणीगत फल | योगार्द्ध. | भुज. | शेष. | कहाता है; और इसका आसन्न मूल लिया तब | २४ | ९ | १५ | कुछ कम १४१ मिला; परन्तु यह क्षेत्रफल | २४ | १२ | १२ | ठीक नहीं है पर आगे जो सम- | २४ | १४ | १० | लम्बचतुर्भुजक्षेत्रके फल लानेकी रीति लिखेंगे; | २४ | १३ | ११ | "भूमि और मुखका योगकर आधा कर ले; और लम्बसे गुणा कर दे" उसी रीतिके अनुसार यहां भी भूमि १४ और मुख ९ का योग कर आधा किया तब २३/२ हुए; इनको लंब १२ से गुणा किया तब १३८ हुए; यह ठीक क्षेत्रफल है ॥ उसी क्षेत्रके दो खण्ड करके और रीतिसे क्षेत्रफल लाते हैं उपरोक्त चतुर्भुजक्षेत्रमें लम्ब डालनेसे समचतुर्भुज बनता है और एक त्रिभुज बन जाता है और चतुर्भुजके सम होनेसे मुख ९ के समान ही भूमि ९ हो जाती है, शेष ५ त्रिभुजकी भूमि हो जाता है; तब त्रिभुजमें भुज ५ कोटि १२ कर्ण १३ होता है; यही भुज और कोटि ५ । १२ का घात किया तब ६० हुए इनका आधा किया तब ३० हुए; यही त्रिभुजका फल हुआ; फिर चतुर्भुजके भुज ९ और कोटि १२ का घात किया तब १०८ हुए; इन दोनोंका योग किया तब वही १३८ ठीक फल हुआ ॥

क्षेत्रव्यवहारः। ( १४७ ) सर्वदोर्युतिदलमित्यादिना त्रिभुजे स्पष्टफलायनाय अत्र त्रिभुजस्य पूर्वोदाहृतस्य न्यासः-भूमिः १४ भुजौ १३ । १५ अनेनापि प्रकारेण त्रिबाहुके तदेव वास्तवं फलम् ८४ अत्र चतुर्भुजस्या- स्पष्टमुदितम् ॥ फैलाव-सर्वदोरीत्यादि ऊपर कही हुई रीतिसे त्रिभुजक्षेत्रमें स्पष्ट फल लानेके निमित्त यहां पूर्व उदाहरण दिये हुए ही त्रिभुजपर गणित करते हैं. यहां तीनों भुजों १३ । १५ । १४ का योग किया तब ४२ हुए; इनका आधा २१ कर चार स्थानोंमें लिखा; इनमेंसे अलग अलग एक २ भुजको घटाया तब क्रमसे शेष रहा ८ । ६ । ७ । २१ इनका घात किया तब ७०५६ हुए; इनका मूल लिया तो मिले ८४ यही क्षेत्रफल हुआ और पहले जो क्षेत्रफल लाये थे यह उसीके तुल्य है; इस कारण यह स्पष्ट फल है चतुर्भुजका तो अस्पष्ट फल दिखा चुके हैं. अथ स्थूलत्वनिरूपणार्थं सूत्रं सार्द्धं वृत्तम्- जिस रीतिके अनुसार चतुर्भुजका स्थूल आता है; वह रीति पीछे कह आये हैं; तहां जो स्थूलत्व है उसके दिखानेको नियम लिखते हैं; चतुर्भुजस्यानियतौ हि कर्णौ कथं ततोऽस्मिन्नियतम्फलं स्यात् ॥ प्रसाधितौ तच्छ्रवणौ यदाद्यैः स्वकल्पितौ तावितरत्र न स्तः ॥२०॥ अन्वयः-हि चतुर्भुजस्य कर्णौ अनियतौ ततः अस्मिन् फलं नियतं कथं स्यात् । यत् आद्यैः स्वकल्पितौ तच्छ्रवणौ प्रसाधितौ तौ इतरत्र न स्तः॥ २० ॥ अर्थः-निश्चय है कि, चतुर्भुजमें कर्ण अनियत है अर्थात् एक ही क्षेत्रमें अनेक प्रकारके कर्ण होते हैं तिस कारण यहां नियत फल किस प्रकार हो सकता है और जो प्राचीनोंने अपने अपने कल्पना किये हुए चतुर्भुजमें कर्ण साधन किये हैं वह सब स्थानमें नहीं हो सकते ॥ २० ॥ तेष्वेव बाहुष्वपरौ च कर्णावनेकधा क्षेत्रफलं ततश्च ॥ अन्वयः-तेषु एव बाहुषु कर्णौ अनेकधा भवतः।ततः क्षेत्रफलंच अनेकधा भवति॥

( १४८ ) लीलावती । अर्थ:-उन हीं भुजाओंमें कर्ण अनेक प्रकारके हो जाते हैं; तिससे क्षेत्रफल भी अनेक प्रकारका होता है ॥ चतुर्भुजे हि एकान्तरकोणावाक्रम्यान्तः प्रवेश्यमानौ भुजौ तत्संसक्तं कर्णं संकोचयतः, इतरौ तु बहिः प्रसरन्तौ स्वकर्णं वर्द्धयतः अत उक्तम्- "तेष्वेव बाहुष्वपरौ च कर्णाविति" ॥ अर्थ:-चतुर्भुजक्षेत्रमें एक एक बीचका कोना छोड़कर सन्मुखके दोनों कोणोंको खैंचनेसे भीतरको घुसते हुए भुज अपनेसे मिले हुए अपने कर्णको संकुचित करते हैं और जो भुज खैंचनेसे बाहरको फैलते हैं; वह अपने कर्णको बढ़ाते हैं; इसी- कारण ऊपर कहा है कि कर्णोंके अनेक प्रकार होनेसे फल भी अनेक प्रकारका होता है; परन्तु भुज वही रहते हैं, क्योंकि, कोनोंके खैंचनेसे वह कण तो बढ़ेगा और दूसरा कर्ण छोटा होगा तो कर्ण अनेक प्रकारके होंगे; इसी कारण उसी क्षेत्रके फल भी बहुत रीतिंके होंगे ॥ लम्बयोः कर्णयोर्वैकमनिर्दिश्यापरः कथम् ॥ पृच्छत्यनियतत्वेऽपि नियतञ्चापि तत्फलम् ॥ १ ॥ स पृच्छकः पिशाचो वा वक्ता वा नितरां ततः ॥ यो न वेत्ति चतुर्बाहुक्षेत्रस्यानियतां स्थितिम् ॥ २ ॥ अन्वयः-अपरः लम्बयोः वा कर्णयोः एकम् अनिर्दिश्य अनियतत्त्वेऽपि नियतं तत्फलं कथम् पृच्छति ॥ १ ॥ सः पिशाचः पृच्छकः वा वक्ता अपि ततः नितरां पिशाचः यः चतुर्बाहुक्षेत्रस्य अनियतां स्थितिम् न वेत्ति ॥ २ ॥ अर्थः-जो चतुर्भुज क्षेत्रके फलका प्रश्न करनेवाला लम्ब या कर्ण एक भी बिना कहे अनियत होनेपर भी चतुर्भुजका नियत फल बूझता है वह पिशाच तुल्य है यदि वक्ता उत्तर देनेको तैयार हो तो वह प्रश्न करनेवालेसे भी बडा पिशाच है क्योंकि जो चतुर्भुजकी अनियत फलकी स्थितिको नहीं जानता है ॥ १ ॥ ॥ २ ॥ समचतुर्भुजायतयोः फलानयने करणसूत्रं सार्द्धश्लोकद्वयम्- समचतुर्भुज और आयतचतुर्भुजके फल लानेकी रीति ढाई श्लोकमें- इष्टा श्रुतिस्तुल्यचतुर्भुजस्य कल्प्या च तद्वर्गविवर्जिता या ॥२१॥ चतुर्गुणा बाहुकृतिस्तदीयं मूलं द्वितीय- श्रवणप्रमाणम्॥अतुल्यकर्णाभिहतिर्द्विभक्ता फलं स्फुटं

क्षेत्रव्यवहारः । (१४९) तुल्यचतुर्भुजे स्यात् ॥२२॥ समश्रुतौ तुल्यचतुर्भुजे च तथाऽऽयते तद्भुजकोटिघातः ॥ चतुर्भुजेऽन्यत्र समानलम्बे लम्बेन निघ्नं कुमुखैक्यखण्डम्॥ २३ ॥ अन्वयः-तुल्यचतुर्भुजस्येष्टा श्रुतिः कल्प्या तद्वर्गविवर्जिता या चतुर्गुणाबाहुकृतिः तदयिम् मूलं ग्राह्यम् तत् द्वितीयश्रवणप्रमाणम् भवेत् । अतुल्यकर्णाभिहतिःद्विभक्ता कार्य्या तदा फलं तुल्यचतुर्भुजे स्फुटं स्यात् । समश्रुतौ तुल्यचतुर्भुजे तथा आयते चतुर्भुजे च तद्भुजकोटिघातः फलं स्यात् । अन्यत्र समानलम्बे क्षेत्रे कुमुखैक्यखंडं लम्बेन निघ्नम् फलम् भवति ॥ २१ ॥ २२ ॥ २३ ॥ अर्थ-समचतुर्भुजक्षेत्रमें एक इष्ट कर्ण कल्पना करै; फिर कल्पना किये हुए कर्णका वर्ग करनेसे जो अङ्क हों उनको चार ४ से गुणा किय हुए भुजके वर्गमें घटावे, जो शेष रहे उसका मूल ले वह दूसरा कर्ण होता है. चतुर्भुजमें अतुल्य कर्णोंका घातकर जो अङ्क हों उनमें दोका भाग दे तब जो फल मिलता है वह तुल्य चतुर्भुजमें स्पष्ट फल होगा; समकर्णतुल्यचतुर्भुजमें तथा समकर्ण आयतचतुर्भुजमें उस क्षेत्रकी भुजकोटिका घात करनेसे क्षेत्रफल होता है और समानलम्बविषमचतुर्भुजमें पृथ्वी और मुखका योगकर आधा कर ले; तब जो अङ्क हों उनको लम्बसे गुणा कर दे, तब क्षेत्रफल मिलता है ॥ २१ ॥ २२ ॥ २३ ॥ अत्रोद्देशकः-समचतुर्भुज, समकर्णचतुर्भुज तथा आयतचतुर्भुजका उदाहरण- क्षेत्रस्य पञ्चकृतितुल्यचतुर्भुजस्य कर्णौ ततश्च गणितं गणक प्र चक्ष्व ॥ तुल्यश्रुतैश्च खलु तस्य तथायतस्य यद्विस्तृती रस- मिताष्टमितञ्च दैर्घ्यम् ॥ १७ ॥ अन्वयः-हे गणक ! पञ्चकृतितुल्यचतुर्भुजस्य क्षेत्रस्य कर्णौ ततः गणितं च प्रचक्ष्व तथा तुल्यश्रुतेः गणितम् प्रचक्ष्व खलु यद्विस्तृतिः रसमिता दैर्घ्य च अष्टमितं तस्य आयतस्य च गणितम् प्रचक्ष्व ॥ १७ ॥ अर्थः-हे गणक ! पांचका वर्ग अर्थात् २५ तुल्य चारों भुजावाले, चतुर्भुजक्षेत्रके दोनों कर्ण और क्षेत्रफल भी कहो; तथा समकर्ण समचतुर्भुजका क्षेत्रफल कहो; और जहां चौडाई ६ है और लम्बाई ८ आठ है उस समकर्ण आयतचतुर्भुजक भी क्षेत्रफल कहो ॥ १७ ॥

( १६० ) लीलावती । प्रथमोदाहरणे न्यासः-भुजाः २५ । २५ । २५ । २५ २५ २५ अत्र त्रिंशन्मितामेकां ३० श्रुतिं प्रकल्प्य ३० यथोक्तकरणेन जाताऽन्या श्रुतिः ४० २५ २५ फलम् ६०० ४० फैलाव-इस क्षेत्रमें चारों भुजोंका प्रमाण पचीस पचीस हैं यहाँ कर्ण जाननेको तथा क्षेत्रफल जाननेको उपरोक्त नियमानुसार ३० को इष्ट कर्ण कल्पना किया फिर इस कर्ण ३० का वर्ग किया तब ९०० हुए; इनको भुज २५ के वर्ग ६२५ को चार ४ से गुणा करनेपर जो अंक हुए २५०० इनमेंसे घटाया तब १६०० शेष रहे इसका मूल लिया तब ४० मिले यही यहाँ ४० दूसरा कर्ण है; अब इन कर्णोंको जानकर उपरोक्त २५ २५ नियमानुसार दोनों कर्णों ३० । ४० का घात किया क्षे० फल. ३० तब १२०० हुए; इनमें दोका भाग दिया, तब ६०० ६०।० लब्धि हुए; यही यहाँ क्षेत्रफल है ॥ २५ २५ २५ २५ न्यासः-अथवा चतुर्दशमितामेकां १४ श्रुतिं १४ प्रकल्प्योक्तवत्करणेन जातान्या श्रुतिः ४८ २५ २५ फलञ्च ३३६ ४८ अथवा-१४ को इष्ट कर्ण माना फिर पूर्व रीति के अनुसार इस माने हुए कर्णका वर्ग किया १९६ हुए इनको भुज २५ के वर्ग ६२५ ४८ को चार ४ से गुणा करनेपर जो अङ्क हुए २५०० २५ २५ इनमें घटाया तब २३०४ बचे इनका मूल लिया तब क्षे० फल. ४८ मिले; यही दूसरे कर्णका प्रमाण है; अब क्षेत्रफल ३३६ १४ जाननेके निमित्त पूर्वोक्त रीति के अनुसार साधे हुए दोनों २५ २५ कर्णों १४ । ४८ का घात किया तब ६७२ हुए इनमें दोका भाग दिया तब ३३६ लब्धि हुए; यही यहां क्षेत्रफल है; इसी रीति से जैसे कर्णको इष्ट मानोंगे वैसे ही अनेक प्रकार के कर्ण होंगे और कर्णों के अधीन क्षेत्रफल भी अनेक होंगे, परन्तु भुज वही रहेंगे ।

क्षेत्रव्यवहारः। ( १६१ ) द्वितीयोदाहरणे न्यासः- तत्कृत्योर्योगपदं कर्णः इति जाता करणीगता श्रुतिरुभयत्र तुल्यैव १२५० गणितञ्च ६२५ दूसरे-समकर्णचतुर्भुजके उदाहरणमें क्षेत्रफल जाननेके निमित्त तथा कर्ण जाननेके निमित्त पहले कही हुई रीतिके अनुसार अर्थात् "तत्कृत्योर्योगपदं कर्णः" इस रीतिसे भुज २५ कोटि २५ के वर्गों ६२५ । ६२५ का योग किया तब १२५० हुए, इनका मूल कर्ण प्रमाण होना चाहिये परन्तु यही ठीक मूल नहीं मिलता इस कारण यह १२५० करणीगत कर्ण हुआ; दोनों स्थानोंमें कर्ण कोटिका प्रमाण समान ही है; इस कारण कर्ण प्रमाण भी दोनों स्थानोंमें समान ही होगा; अर्थात् दोनों कर्णोंका प्रमाण १२५० होगा, अब क्षेत्रफल जाननेके निमित्त ऊपर कही हुई "तद्भुजकोटिघातः" रीति के अनुसार समकर्ण होनेसे भुज २५ कोटि २५ का घात किया; तब ६२५ हुए; यही क्षेत्रफल हुआ ॥ अथायतस्य न्यासः- विस्तृतितः ६ दैर्ध्यम् ८ अस्य गणितम् ४८ । अब आयतचतुर्भुजका फल जाननेके निमित्त ऊपर कही हुई रीतिके अनुसार भूमि ८ और मुख ८ का योग किया तब १६ हुए; इनको आधा किया तब ८ आठ रहे; इनको लम्ब ६ से गुणा किया तब ४८ हुए; यही क्षेत्रफल हुआ; यहां लम्ब समान था; इस कारण "लम्बेन निघ्नं कुमुखैक्य- खण्डम्" इस रीतिसे क्षेत्रफल लाये हैं; यहाँ "तत्कृत्योर्योगपदं कर्णः" इस रीतिसे कर्ण जानकर भी समकर्ण होनेसे "तद्भुजकोटिघातः" इस रीतिसे भी

( १६२ ) लीलावती । क्षेत्रफल मालूम होजाता है; जैसे भुज ८ कोटि ६ इनके वर्गों ६४ । ३६ का योग किया तब १०० हुए;इनका मूल लिया तब १०मिले; भुज कोटि समान होनेसे दोनों कर्ण समान १० । १० ही होंगे; इस कारण समकर्ण होनेसे भुज कोटिका घात करनेसे भी वही ४८ क्षेत्रफल होगा ॥ उदाहरणम्- क्षेत्रस्य यस्य वदनं मदनारितुल्यं विश्वम्भरा द्विगुणितेन मुखेन तुल्या ॥ बाहू त्रयोदशनखप्रमितौ च लम्बः सूर्यो- न्मितश्च गणितं वद तत्र किं स्यात् ॥ १८ ॥ अन्वयः-हे गणक ! यस्य क्षेत्रस्य वदनम् मदनारितुल्यम् । द्विगुणितेन मुखेन तुल्या विश्वंभरा । त्रयोदशनखप्रमितौ च वाहू । सूर्योन्मितः च लम्बः । तत्र गणितं किं स्यात् इति वद ॥ १८ ॥ अर्थः हेगणक ! जिस क्षेत्रका मुख तो मदनारि तुल्य अर्थात् ११ है; द्विगुणित मुखके समान अर्थात् २२ भूमि है और १३ और २० प्रमाण दोनों भुज हैं; तथा सूर्य्यसंख्यक अर्थात् १२ लम्ब हैं; तहां क्षेत्रफल क्या होगा ? सो कहो ॥ १८ ॥ न्यासः- वदनम् ११ विश्वम्भरा २२ बाहू १३ । २० लम्बः १२ अत्र" सर्वदोर्युतिदलम्” इत्यादिना स्थूलफलम् २५० वास्तवं तु “ लम्बेन निघ्नं कुमुखैक्यखण्डमिति ” जातम्फलम् १९८ क्षेत्रस्य खण्डत्रयं कृत्वा फलानि पृथगानीय खण्डत्रयदर्शनम् ॥ न्यासः-प्रथमस्य भुजकोटिकर्णाः ५ । १२ । १३ द्वितीयस्यायतस्य विस्तृतिः ६ दैर्घ्यम् १२ तृतीयस्य भुजको- टिकर्णाः १६ । १२ । २० अत्र त्रिभुजयोः क्षेत्रयोः भुजकोटि- घातादर्द्धम्फलम् । आयते चतुरस्रे क्षेत्रे तद्भुजकोटिघातः फलम् ।

क्षेत्रव्यवहारः । ( १५३ ) यथा प्रथमक्षेत्रे फलम् ३० द्वितीये ७२ तृतीये ९६ एषा- मैकयं सर्वक्षेत्रफलम् १९८ जातम् । फैलाव-मुख ११ भूमि २२ दोनों भुज १३ । २० लम्ब १२ हैं अब इस उदाहरण में “सर्वदोरित्यादि” रीति से सब भुजों ११ । २० । २२ । १३ का योग किया तब ६६ हुए; इनको आधा ३३ कर चार ४ स्थानोंमें लिखा फिर अलग २ एक एक स्थानमें सब भुजोंको घटाया योगार्द्ध. भुज. शेष. | तब जो शेषाङ्क हुए उनका परस्पर घात किया ३३ ११ २२ | तब ६२९२० हुए; इनका मूल लिया तब कुछ ३३ २० १३ | कम २५० मिला; परन्तु यह ठीक नहीं ठीक ३३ २२ १३ | जाननेके निमित्त “लम्बेन निघ्नमित्यादि” इस ३३ १३ २० | रीतिसे फल लाये; अर्थात् मुख ११ और भूमि २२ इनको जोडा तब ३३ हुए; इनका आधा किया तब ३३/२ हुए; इनको लम्ब १२ से गुणा किया तब १९८ हुए यही ठीक क्षेत्रफल हुआ; अब क्षेत्रके तीन खण्ड करके अलग २ क्षेत्रफल लाकर तीनों खण्डोंपर गणित दिखलाते हैं यहां प्रथम खण्डमें भुज ५ कोटि १२ कर्ण १३ है। दूसरे खण्डमें विस्तार ६ लम्बापन १२ है। तीसरे खण्डमें भु० १६ को १२ कर्ण २० है; पहले त्रिभुजक्षेत्रमें फल लानेके लिये ५ । १२ भुजकोटिका घात किया तब ६० हुए; इनको आधा किया तब ३० हुए; यही प्रथम क्षेत्रका फल है; द्वितीयखण्ड आयत चतुर्भुजमें भुज ६ कोटि १२ का घात किया तब ७२ हुए; यही क्षेत्रके द्वितीय खण्डका फल है; तृतीय खण्ड जात्य- त्रिभुजके भुज १६ कोटि १२ का घात किया तब १९२ हुए; इनका आधा किया तब ९६ हुए यही तृतीय खण्डका क्षेत्रफल हुआ; इस प्रकार तीनों खण्डोंके फल ३० । ७२ । ९६ को जोड़नेसे वही १९८ क्षेत्रफल हुआ । CC-0. Late Pt. Manmohan Shastri Collection Jammu. Digitized by eGangotri

( १५४ ) लीलावती । अथान्यदुदाहरणम्-और उदाहरण दिखाते हैं- पञ्चाशदेकसहिता वदनं यदीयं भूः पञ्चसप्ततिमिता प्रमितोऽष्टषष्ट्या ॥ सव्यो भुजो द्विगुणविंशतिसम्मितोऽ- न्यस्तस्मिन्फलं श्रवणलम्बमिती प्रचक्ष्व ॥ १९ ॥ अन्वयः-एकसहिता पञ्चाशत यदीयं वदनम् । पञ्चसप्ततिमिता भूः अष्टषष्ट्या प्रमितः सव्यः भुजः । द्विगुणविंशतिसम्मितः अन्यः भुजः । तस्मिन् फलं श्रवणलम्बमिती च प्रचक्ष्व ॥ १९ ॥ अर्थः-५१ इक्यावन जिस क्षेत्रका मुख है; ७५ प्रमाण भूमि है, ६८ प्रमाण दायाँ भुज है, ४० प्रमाण बायाँ दूसरा भुज है; उस क्षेत्रमें फल और कर्ण तथ लम्बका प्रमाण भी कहो ॥ १९ ॥ न्यासः- वदनम् ५१ भूमिः ७५ भुजौ ६८ । ४० यहाँ मुख ५१ हैं; भूमि ७५ हैं; दोनों भुज ६८ । ४८ हैं; अत्र फलावलम्बश्रुतीनां सूत्रं वृत्तार्द्धम्- ऊपर दिखाये हुए क्षेत्रमें फल; लम्ब और कर्णके विषयमें सूत्र आधा श्लोक- ज्ञातेऽवलम्बे श्रवणः श्रुतौ तु लम्बः फलं स्यान्नियतं तु तत्र ॥ कर्णस्यानियतत्वाल्लम्बोऽप्यनियत इत्यर्थः ॥ अन्वयः-अवलम्बे ज्ञाते श्रवणः ज्ञातः स्यात् । श्रुतौ ज्ञातायां लम्बः ज्ञातः स्यात् तत्र फलं तु नियतं स्यात् ॥ अर्थः-नियत लम्ब जाननेसे नियतकर्ण ज्ञात होता है; नियतकर्ण जाननेपर नियत लम्ब ज्ञात होता है; अर्थात् लम्ब जाननेसे कर्ण जाना जाता है और कर्ण जाननेसे लम्ब जाना जाता है और लंब या कर्णके नियत होनेसे फल भी नियत होता है और यदि कर्ण सम्मुख दोनों कोणोंके खेंचनेसे अनियत हो तो लम्ब भी अनियत होता है और कर्णोंके ही अनियत होनेसे एक ही क्षेत्रके अनेक रूप

क्षेत्रव्यवहारः। (१५५) रहजाते हैं; बुद्धिमान् इस रूपभेदकी परीक्षा रस्सीका क्षेत्राकार बनाकर प्रत्यक्ष कर सकता है॥ लम्बज्ञानाय करणसूत्रं वृत्तम्- चतुर्भुजमें लम्बके जाननेकी रीति एक श्लोकमें- चतुर्भुजान्तस्त्रिभुजेऽवलम्बः प्राग्वद्भुजौ कर्णभुजौ मही भूः ॥२४॥ अन्वयः-चतुर्भुजान्तस्त्रिभुजे प्राग्वत् अवलम्बः कार्य्यः। तदा कर्णभुजौ भुजौ स्तः भूः मही स्यात् ॥ २४ ॥ अर्थः-चतुर्भुजके भीतर जो जात्यत्रिभुज है; उसमें लम्ब डाले; काण और भुजको भुजाएँ माने महीको पृथ्वी जाने ॥ २४॥ अत्र लम्बज्ञानार्थं सव्यभुजाग्राद्दक्षिणभुजमूलगामी इष्टः कर्णः सप्तसप्ततिमितः कल्पितस्तेन चतुर्भुजान्तस्त्रिभुजं कल्पितं तत्राऽसौ कर्णः एको भुजः ७७ द्वितीयस्तु सव्यभुजः ६८ भूः सैव ७५ अत्र प्राग्वल्लब्धो लम्बः ३०८/५ फैलाव-यहां लम्ब जानना हो तो बाँई भुजके मूलसे रेखाको दक्षिण भुजके अग्रमें पहुँचा दे, उसीको इष्टकर्ण कल्पना ७७ सतत्तर किया उसीसे चतुर्भुजके भीतर एक त्रिभुज बनाया; उसमें यही कल्पित कर्ण ७७ एक भुज हुआ; दूसरा सव्य भुज ६८ है; भूमि वही ७५ है यहां पहिले कही हुई "त्रिभुजे भुजयोर्योगः" इत्यादि रीतिसे आबाधा जाननेके लिये दोनों ७७। ६८ भुजोंका योग किया तब १४५ हुए उन हीं भुजाओंके अन्तर ९ से गुणा किया तब १३०५ हुए; इनमें भूमि ७५ का भाग दिया; इत्यादि क्रिया करनेसे दोनों आबाधा २३१/५ १४४/५ मिली; इन हीं आबाधाओंपरसे लंब मिला; ३०८/५

( १५६ ) लीलावती। लंबे ज्ञाते कर्णज्ञानार्थं सूत्रं वृत्तम्- लम्ब जानकर कर्ण जाननेकी रीति श्लोक एक- यल्लंबलम्बाश्रितबाहुवर्गविश्लेषमूलं कथिताऽबधा सा ॥ तदूनभूवर्गसमन्वितस्य यल्लंबवर्गस्य पदं स कर्णः ॥ २५ ॥ अन्वयः-यत् लम्बेलम्बाश्रितबाहुवर्गविश्लेषमूलं सा अबाधा कथिता। तदून भूवर्गसमन्वितस्य लंबवर्गस्य यत् पदं स कर्णः ॥ २५ ॥ अर्थः-लंब और लम्बको आश्रय करनेवाला भुज इन दोनोंके वर्गान्तरका मूल आबाधाका प्रमाण होता है; लम्बके प्रमाणसे होने जो भूमिके वर्गयुक्त लंबका वर्ग उसका जो मूल सो कर्ण है ॥ २५ ॥ अत्र सव्यभुजाग्रालम्बः किल कल्पितः ३०८/५ अतो जाता- बाधा १४४/५ तदूनभूवर्गसमन्वितस्येत्यादिना जातः कर्णः ७७॥ अर्थः-दहिने भुजके अग्रभागसे डाला हुआ लम्ब ३०८/५ है; इससे आबाधा हुई १४४/५ "तदूनभूवर्गसमन्वितस्येत्यत्यादि" रीतिसे कर्णका प्रमाण हुआ॥ ७७ ॥ द्वितीयकर्णज्ञानार्थं सूत्रं वृत्तद्वयम्- दूसरा कर्ण जाननेके लिये रीति दो श्लोकमें- इष्टोऽत्र कर्णः प्रथमं प्रकल्प्यस्त्र्यस्रे तु कर्णोभयतः स्थिते ये॥ कर्णं तयोः क्ष्मामितरौ च बाहू प्रकल्प्य लम्बावबधे प्रसाध्ये२६ आबाधयोरेकककुप्स्थयोर्यत्स्यादन्तरं तत्कृतिसंयुतस्य ॥ लम्बैक्यवर्गस्य पदं द्वितीयः कर्णो भवेत्सर्वचतुर्भुजेषु ॥ २७ ॥ अन्वयः-प्रथमम् अत्र इष्टः कर्णः प्रकल्प्यः। कर्णोभयतः तु ये त्र्यस्रे स्थिते तयोः कर्णं क्ष्मां प्रकल्प्य इतरौ च बाहू प्रकल्प्य लम्बावबधे प्रसाध्ये ॥ २६ ॥ सर्वचतुर्भुजेषु एकककुप्स्थयोः आबाधयोः यत् अन्तरं स्यात् तत्कृतिसंयुतस्य लम्बैक्यवर्गस्य पदं द्वितीयः कर्णः भवेत् ॥ २७ ॥ अर्थः-पहले यहां इष्ट कर्ण कल्पना करे; कर्णके दोनों ओर जो दो जात्य- त्रिभुज स्थित हैं उनके कर्णको भूमि कल्पना करके तथा और दोनोंको भुजकल्पना करके लंब और आबाधा साधे ॥ २६ ॥ सब चतुर्भुजक्षेत्रोंमें एक दिशामें स्थित आबाधाओंका जो अन्तर हो उसके वर्गसे युक्त लंब योगके वर्गका मूल ले; वही दूसरा कर्ण होगा ॥ २७ ॥

क्षेत्रव्यवहारः। (१५७) न्यासः- तत्र चतुर्भुजे सव्यभुजाग्राद्दक्षिण- भुजमूलगामिनः कर्णस्य मानं कल्पि- तम् ७७ तत्कर्णरेखावच्छिन्नस्य क्षेत्रस्य मध्ये कर्णरेखोभयतो ये त्र्यस्रे उत्पन्ने तयोः कर्णः भूमिस्तदितरौ च भुजौ प्रकल्प्य प्राग्वल्लम्ब आबाधा च साधिता तद्दर्शनं लम्बः ६० द्वितीयलंबः २४ आबाधयो ४५ ३२ रेकककुप्स्थयोरन्तरस्य १३ कृते १६९ लम्बैक्य ८४ कृतेश्च ७०५६ योगः ७२२५ तस्य पदं द्वितीयकर्णप्रमाणम् ॥ ८५ ॥ फैलाव-तिसी चतुर्भुज क्षेत्रमें बांई भुजाके अग्रभागसे दक्षिण भुजके मूलमें आनेवाले कर्णका प्रमाण कल्पना किया; ७७ उस कर्णकी रेखायुक्त क्षेत्रके मध्यमें कर्णके रेखाकी दोनों ओर जो दो जात्य त्रिभुज हैं उनके कर्णको भूमि जानना, तदितर रेखाओंको भुज जानना और पहले कही हुई रीतिसे लम्ब और आबाधा सिद्ध होती है वही दिखाते हैं; लम्ब प्रमाण ६० दूसरे लम्बका प्रमाण २४ दोनों आबाधा ४५ । ३२ एक दिशामें स्थित आबाधाओंके अन्तर १३ का वर्ग किया तब १६९ लम्ब योग ८४ इसका वर्ग ७०५६ अन्तरके और लम्ब योगके वर्गों १६९ । ७०५६ का योग ७२२५ इसका मूल ८५ हुआ यही दूसरे कर्णक प्रमाण है ॥ अत्रेष्टकर्णकल्पने विशेषोक्तिसूत्रं सार्द्धं वृत्तम्- इस चतुर्भुजमें इष्टकर्ण कल्पना करनेकी विशेष रीति डेढ श्लोकमें- कर्णाश्रितं स्वल्पभुजैक्यमुर्वीं प्रकल्प्य तच्छेषमितौ च बाहू ॥ साध्योऽवलम्बोऽथ तथान्यकर्णः स्वोर्व्याः कथं- चिच्छ्रवणो न दीर्घः ॥ २८ ॥ तदन्यलम्बान्न लघुस्त- थेदं ज्ञात्वेष्टकर्णः सुधिया प्रकल्प्यः ॥ SS ॥ अन्वयः-कर्णाश्रितं स्वल्पभुजैक्यम् उर्वीम् प्रकल्प्य तच्छेषमितौ च बाहू प्रकल्प्य अवलंबः साध्यः । अथ अन्यकर्णः तथा प्रकल्प्यः यथा श्रवणः स्वोर्व्याः दीर्घः

(१५८) लीलावती । न स्यात्। तथा तदन्यलम्बात् कथञ्चित् अपि लघुः न स्यात् । सुधिया इदं ज्ञात्वा इष्टकर्णः प्रकल्प्यः ॥ २८ ॥ ऽऽ ॥ अर्थः-कर्णका आश्रय करनेवाली छोटी भुजाओंके योगको भूमि कल्पना करे उससे बाकी बची रेखाओंको भुज कल्पना करे, फिर लम्ब साधन करे दूसरा कर्ण इस प्रकार कल्पना करे जैसे कर्ण अपनी भूमिसे अधिक न हो और लम्बसे किसी प्रकार न्यून न हो, बुद्धिमान् यह जानकर इष्ट कर्ण कल्पना करे ॥ २८॥ ऽऽ ॥ आशय यह है कि, विषमचतुर्भुजमें जिन इच्छित कर्णोंकी कल्पना करनेसे चतुर्भु- जका स्वरूप न बिगडे, उन कर्णोंका न्यूनसे न्यून और बडेसे बडा करनेकी यह रीति है कि, जिस कर्णको कल्पना किया चाहते हैं उसके दोनों ओर जो दो दो भुज हैं उनका अलग अलग योग करे, उन ही दोनों योगोंमें जो योग स्वल्प हो उससे भी न्यून कर्ण इष्ट कल्पना करे तो चतुर्भुजका रूप ठीक रहेगा । उस ही स्वल्पयोगके तुल्य इष्ट कर्ण कल्पना करनेसे चतुर्भुज बनाया जाय तो अक्षेत्र हो जायगा, आशय यह है कि, कर्णको बडा करनेकी मर्यादा तहांतक है जहांतक पहिले जो दोनों योग कर आये हैं, उनमें जो छोटा योग है उससे कुछ छोटा हो और छोटेसे छोटा करनेकी मर्यादा तहांतक है, जहांतक जिस कर्णको जानना चाहते हैं उससे दूसरे कर्णके आस पास जो दो दो भुज हैं उनका योग करे और योगोंमें जो छोटा हो उसको भूमि माने और उस भूमिमें जहां भुजोंका योग हुआ है वहां चिह्न कर दे, शेष दो २ भुजोंको भुज माने तब त्रिभुजकी कल्पित आकृति बनती है। तब इसी त्रिभुजमें पहले कही हुई रीतिसे आबाधा और लंब साधे, आबाधा और उधरहीकी भूमिका जो भुज है, उसका अन्तर करनेसे जो अङ्क मिले उनके वर्गमें लम्बका वर्ग जोड दे, तब जो अङ्क हों उनका मूल कर्ण होता है परन्तु इतना कर्ण कल्पना करनेसे त्रिभुज हो जायगा और यदि इससे कुछ अधिक कर्ण कल्पना किया जाय तो चतुर्भुजका स्वरूप बना रहेगा ॥ चतुर्भुजे हि एकान्तरकोणावाक्रम्य संकोच्यमानं त्रिभु- जत्वं याति तत्रैककोणे लग्नलघुभुजयोरैक्यं भूमिरितरौ भुजौ प्रकल्प्य साधितं स च लम्बादूनः सङ्कोच्यमानः कर्णः कथञ्चिदपि न स्यात्तदितरो भूमेरधिको न स्यादे- वमुभयत्राऽपि तदनुक्तमपि बुद्धिमता ज्ञायते ॥ इसका वही अभिप्राय है जो कि, अभी ऊपर सूत्रका कहचुके हैं बुद्धिमान कार्य्यवश वे दिखाई बात भी जान सकता है ॥

क्षेत्रव्यवहारः । ( १६९ ) ऊपर कहे हुए विषयको पहिले जो विषम चतुर्भुज क्षेत्र कह आये हैं उसमें बायें भुजके अग्रभागसे दाहिने भुजके मूलतक जो कर्ण ५१ है उसको बड़ा कहां पर्यंत कल्पना करे और उससे छोटा कहाँतक करे सो दिखाते हैं, यहां जिस कर्णको ६८ कल्पना करेंगे उसकी दोनों ओर दो दो भुज हैं; एक ओर तो दो भुज ६८ । ७५ यह हैं, इनका योग ४० ७५ किया तब १४३ हुए दूसरी ओर दो भुज ५१ । ४० यह है इनका योग किया तब ९१ हुए, इन दोनों योगों १४३ । ९१ में छोटा ९१ है, इष्टकर्ण इस लघु योगसे भी कुछ न्यून कल्पना करे तब चतुर्भुजका स्वरूप नहीं बिगडेगा और यदि छोटे योगके तुल्य ही इष्टकर्ण कल्पना किया जाय तो त्रिभुज हो जायगा क्योंकि, छोटे दोनों भुज खैंचके कर्णमें मिलजायेंगे जैसे कि- [चित्र विवरण: चित्र १ (त्रिभुज): ६८, ९१, ७५; "लघु योगके तुल्य इष्टकर्णकल्पना करनेसेत्रिभुज हुआ" चित्र २ (चतुर्भुज): भुजाएं ६८, ५१, ४०, ७५ चित्र ३ (स्तम्भ रूप): "लघुयोगके तुल्य इष्ट कर्ण कल्पना करनेसे बिगड़ा हुआ चतुर्भुजकारूप"] और जब चतुर्भुजके रूप न बिगाड़कर छोटेसे छोटा इष्ट कर्ण कल्पना करना चाहते हैं तब यहां जो इष्टकर्णसे अन्य कर्ण है उसकी दोनों ओर दो दो भुज हैं एक ओरकी दोनों भुज ६८ । ५१ हैं इनका योग किया तब ११९ हुए. दूसरी ओरकी दोनों भुज ७५।४० हैं, इनका योग किया तब ११५ हुए यहाँ दोनों योगों ११९ । ११५ में छोटा योग ११५ है इसको ६८ भूमि कल्पना किया और जिस स्थानपर भूमि में भुजोंका योग ५१ हुआ है तहां चिह्न कर दिया और बाकी दो भुजोंको भुज माना ७५ ११५ तब त्रिभुजका रूप बन गया वह यह है- इस क्षेत्रमें पहली रीतिसे आबाधा मिलीं ७६२४/११५, ५६०/११५ इन दोनोंमें बड़ी आबाधा बड़ी भुजके ओरकी है और छोटी आबाधा छोटी भुजके ओरकी है, अपनी आबाधा

( १६० ) लीलावती। और भुजका अन्तर करनेसे ३०२७०२४/१३२२५ हुआ इनका मूल लिया तो लम्बका प्रमाण मिला, परन्तु यहां ठीक मूल मिल नहीं सकता; इस कारण करणीगत अर्थात् लम्बका बर्गरूप ही लम्ब रहा ॥ तब क्षेत्रका आकार. अब यहां कर्णका प्रमाण जाननेके लम्बवर्ग ३०२७०२४/१३२२५ लिये एक ओरकी आबाधा और भूमिगत भुज ७६२४/११५, ७५ इन दोनोंका ६८ ५१ तथा दूसरी ओरकी आबाधा और उसी ओरकी भुज ५६०१/११५, ४० इन आबाधा आबाधा दोनोंका भी अन्तर किया तब १००१/११५ ७६२४/११५ ५६०१/११५ मिला, यह अन्तर दोनों ओरसे एक ७५ ११५ ४० सा ही मिलता है; इस अन्तरके वर्ग १००२००१/१३२२५ को लम्बके वर्ग ३०२७०२४/१३२२५ में जोडा तब हुए योगाङ्क ४०२९०२५/१३२२५ इसका मूल कर्णका प्रमाण होता है, परन्तु यहाँ ठीक मूल मिलता नहीं, इस कारण यही करणीगत कर्ण है, परन्तु यहाँ मूलके समीपका अङ्क मालूम हो सकता है, इस कारण कही हुई “वर्गेण महतेष्टेनेत्यादि” रीतिके अनुसार आसन्न मूल लेनेके लिये छेद १३२२५ और अंश ४०२९०२५ का घात किया तब ५३२८३८५५६२५ हुए; इससे वर्गरूप बड़े इष्ट १०००० से गुणा किया तब हुए ५३२८३८५५ ६२५०००० इनका मूल लिया तब मिले २३०८३२९६ इसमें गुणक इष्टके मूल १०० और हर १३२२५ इनके घात १३२२५०० का भाग दिया तब १७ ६००७९६/१३२२५०० यह कर्णके समीपका अङ्क है, अर्थात् इससे कुछ ज्यादा कर्णका प्रमाण है; यदि इससे बडा कर्ण किया जाय तब चतुर्भुज का स्वरूप बना रहेगा और इतना कर्ण करनेमें त्रिभुज हो जायगा और चतुर्भुज अक्षेत्र हो जायगा, अर्थात् ठीक विषम चतुर्भुज रखकर यदि छोटेसे छोटा कर्ण कल्पना करना हो तो १७ ६००७९६/१३२२५०० इससे कुछ बडा करें, इसी कर्णको बड़ेसे बडा करनेकी रीति तो पहले लिख ही चुके हैं कि, यह ९१ कर्ण बड़ेसे बड़े कर्णसे कुछ न्यून है. इसी प्रकार दूसरा कर्ण भी कल्पना कर लेने योग्य है ॥ विषमचतुर्भुजे फलानयनाय करणसूत्रं वृत्तार्द्धम्- विषमचतुर्भुजमें फल लानेकी रीति आधे श्लोकमें- त्र्यस्रे तु कर्णोभयतः स्थिते ये तयोः फलैक्यं फलमत्र नूनम् २९ ॥ अन्वयः-नूनम् अत्र ये त्र्यस्रे कर्णोभयतः स्थिते तयोः फलैक्यम् फलं स्यात्॥२९॥

क्षेत्रव्यवहारः। ( १६१ ) अर्थः-निश्चय है कि, इस विषम चतुर्भुज क्षेत्रमें कर्णकी दोनों ओर जो जात्य त्रिभुज हैं उनके फलका योग करनेसे फल मालूम हो जाता है ॥ २९ ॥ अनन्तरोक्तक्षेत्रान्तर्द्वयस्रयोः फले ९२४ । २३१० अनयोरैक्यम् ३२३४ तस्य फलम् ॥ अब ही ऊपर जो विषम चतुर्भुज दिखा आये हैं उसीके अन्तर्गत जो दो जात्यत्रिभुज हैं उनका फल जोडनेसे विषम चतुर्भुजका फल मिलेगा; जैसे उपरोक्त क्षेत्रमें एक त्रिभुजके दोनों भुज तो ४० और ५१ हैं और भूमि ७७ है लंब २४ हैं, इसका "लम्बगुणं भूम्यर्द्धं स्पष्टं त्रिभुजे फलं भवति" इस रीतिसे फल जाननेके लिये भूमि ७७ के आधे $\frac{७७}{२}$ को लंब २४ से गुणा किया तब ९२४ हुए. यही फल हुआ, इसी प्रकार दूसर त्रिभुजमें भुज ६८ और ७५ हैं भूमि ७७ लंब ६० है, यहां भी उसी रीतिके अनुसार भूमिके आधे $\frac{७७}{२}$ को लंब ६० से गुणा किया तब २३१० हुए. यही फल है, इन दोनों विषम चतुर्भुजान्तर्गत जात्यत्रिभुजोंके फलों ९२४ । २३१० का योग किया तब ३२३४ हुए यही ऊपर कहे हुए नियमके अनु- सार विषम चतुर्भुजका फल हुआ ॥ समानलंबस्याबाधादिज्ञानाय करणसूत्रं वृत्तद्वयम्- समानलंबविषमचतुर्भुजक्षेत्रमें आबाधा आदि जाननेकी रीति दो श्लोकमें- समानलम्बस्य चतुर्भुजस्य मुखोनभूमिं परिकल्प्य भूमिम् ॥ भुजौ भुजौ त्र्यस्रवदेव साध्ये तस्याबधे लम्बमितिस्ततश्च ॥ ३० ॥ आबाधयोना चतुरस्रभूमिस्तल्लम्बवर्गैक्यपदं श्रुतिः स्यात् ॥ समानलंबे लघुदोः कुयोगान्मुखान्यदोः संयुति- रल्पिका स्यात् ॥ ३१ ॥ अन्वयः-समानलंबस्य चतुर्भुजस्य मुखोनभूमिम् भूमिं परिकल्प्य भुजौ परि- कल्प्य तस्य अबधे त्र्यस्रवत् एव प्रसाध्ये । ततः लंबमितिः च प्रसाध्या ॥ ३०॥ चतुरस्रभूः अवधया ऊना कार्या । तल्लंबवर्गैक्यपदं श्रुतिः स्यात् । समानलंबे मुखान्यदोः संयुतिः लघुदोः कुयोगात् अल्पिका स्यात् ॥ ३१ ॥ अर्थः-समान लंब चतुर्भुजक्षेत्रकी मुखके प्रमाणसे हीन भूमिको भूमि माने और दोनों भुजाओंको भुजा माने फिर अवबाधा त्रिभुजके तुल्य साधे, तदनन्तर लंबप्रमाण ११

( १६२ ) लीलावती । साधे ॥ ३० ॥ चतुर्भुजकी भूमिमें आबाधा घटा दे, जो शेष रहे, उसके वर्गमें लंबका वर्ग जोड दे तब जो अङ्क हों उनका मूल ले वही कर्णका प्रमाण होगा, समान लम्ब विषमचतुर्भुजमें लघुभुज और भूमिके योगसे बडी भुज और मुखका योग कम होता है, अन्यथा समान लंबविषमचतुर्भुज बनता ही नहीं ॥ ३१ ॥ उदाहरणम्- द्विपञ्चाशन्मितव्येकचत्वारिंशन्मितौ भुजौ ॥ मुखं तु पञ्चविंशत्या तुल्यं षष्ट्या मही किल ॥ २०॥ अतुल्यलम्बकं क्षेत्रमिदं पूर्वैरुदाहृतम् ॥ षट्पञ्चाशत्त्रिषष्टिश्च नियते कर्णयोर्मिती ॥ कर्णौ तत्रापरौ ब्रूहि समलम्बञ्च तच्छ्रुती ॥ २१ऽऽ ॥ अन्वयः-यत्र द्विपञ्चाशन्मितव्येकचत्वारिंशन्मितौ भुजौ पञ्चविंशत्या तुल्यम् मुखं किल मही तु षष्ट्या तुल्या षट्पञ्चाशत् त्रिषष्टिः च कर्णयोः मिती नियते इदम् पूर्वैः अतुल्यलंबकं क्षेत्रम् उदाहृतम् । तथापि मन्मते तत्र अपरौ कर्णौ समलंबं तच्छ्रुती च ब्रूहि ॥ २० ॥ २१ ॥ अर्थः-जिस विषमचतुर्भुजमें ५२ और ३९ प्रमाण दो भुज हैं, २५ प्रमाण मुख है, भूमि ६० है। ५६ और ६३ प्रमाण दोनों नियत कर्ण हैं, इस क्षेत्रको प्राचीनोंने समलंब नहीं कहा है, तथापि भास्कराचार्य्यके मतसे उसी क्षेत्रमें दूसरे कर्ण और समानलंब तथा उस कर्णोंका प्रमाण भी कहो ॥ २० ॥ २१ ॥ ऽऽ ॥ आशय यह है कि, इस क्षेत्रमें प्राचीन लोग ५६ और ६३ का नियत कर्ण बताते हैं, और यह भी कहते हैं कि, इसमें समान लंब भी नहीं होते परन्तु भास्कराचार्य्य इन कर्णोंसे भी दूसरे कर्ण लाते हैं, और इसी क्षेत्रमें समान लंब भी लाते हैं और भुजाओंमें कुछ विकार भी नहीं होता,अर्थात् अक्षेत्र भी नहीं होता है ॥ न्यासः-- अत्र बृहत्कर्ण त्रिषष्टिमितं प्रकल्प्य ज्ञातः प्राग्वदन्यः कर्णः ५६ CC-0. Late Pt. Manmohan Shastri Collection Jammu. Digitized by eGangotri

क्षेत्रव्यवहारः । ( १६३ ) अथ षट्पञ्चाशत्स्थाने द्वात्रिं- शन्मितं कर्णं प्रकल्प्य प्राग्वत्सा- ध्यमाने जातं करणीखण्डद्वयम् ६२१ । २७०० अनयोर्मूलयो- २४ २३/४९ । ५१ २४/५६ रैक्यं ७६ २२/२५ द्वितीयः कर्णः फैलाव-इस चतुर्भुजक्षेत्रमें दोनों भुज ३९ । ५२ हैं; मुख २५ है; भूमि ६० है और बडा कर्ण कल्पना किया ६३ इसको इष्ट माना पहले कही हुई रीतिसें दूसरा कर्ण लाये तो ५६ मिले ॥ जब ५६ के स्थानमें कर्णका प्रमाण ३२ कल्पना किया तब पहले कही हुई रीतिके अनुसार दूसरे कर्णके वर्गरूप खण्ड ६२१ । २७०० दो पाये इनका मूल नहीं मिल सकता इस कारण यह करणीगत कर्ण रहा परन्तु पहले कही हुई “वर्गेण महतेष्टेनेत्यादि” रीतिसे आसन्न मूल लिये तब प्रथम खण्डका मूल २४ २३/४९ मिला और दूसरे खण्ड २७०० का मूल ५१ २४/५६ मिला दोनों २४ २३/४९ ५१ २४/५६ का योग किया तब ७६ २२/२५ हुए यही दूसरे कर्णका कुछ न्यूनाधिक प्रमाण है और इस क्षेत्रमें भुजा वही रहे;

( १६४ ) लीलावती । अथ तदेव क्षेत्रञ्चेत्समलंबं तदा न्यासः- मुखोनभूमिं परि- कल्प्य भूमिमिति ज्ञानार्थं त्र्यस्रं क- ल्पितम् ॥ अत्राऽबाधे जातं ३/५ १७२/५ लम्बश्च करणीगतो जातः ३८ ६२२/६२५ अयं तत्र चतुर्भुजसमलंबः लब्धो बाधोनि- तभूमेः समलंबस्य च वर्गयोगः ५०४१ अयं कर्णवर्गः। एवं बृहदाबाधातो द्वितीयकर्णवर्गः २१७६ अनयोरास- न्नमूलकरणेन जातौ कर्णौ ७१ २/५ ४६ १३/२० एवं चतुरस्रे तेष्वेव बाहुष्वन्यौ कर्णौ बहुधा भवतः । एवमनियत- त्वेऽपि नियतावेव कर्णावानीतौ ब्रह्मगुप्ताद्यैः ॥ फैलाव-जब उसी क्षेत्रको समलम्ब बनाया तब पहले कही हुई रीति के अनु- सार अर्थात् पहले यह कह आयें हैं कि; जो समलम्ब विषम चतुर्भुज क्षेत्र है उसके मुखको भूमिमें घटा दे; तब जो शेष रहे उसको भूमि जानें और दोनों भुजोंको भुज मानें; इस रीतिसे एक त्रिभुज बनजायगा तब पहले कही हुई रीति के अनु सार लम्ब लावे; इस रीति के अनुसार मुख २५ को भूमि ६० में घटाया तब ३५ रहे इनको भूमि माना और दोनों भुजोंको भुज माना और लंब भी वही रहा तब क्षेत्रका स्वरूप त्रिभुज हो गया वह यह है- अब यहाँ पहले कही हुई “त्रिभुजे भुजयोरित्यादि” रीतिसे आबाधा लाये तब ३/५ १७२/५ मिली; इनसे लंब साधा तब ३८ ६२२/६२५ हुये यह करणीगत