माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)
Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation
माधवकर द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
( १० ) माधवनिदानकी-
( १० ) माधवनिदानकी-
| विषय. | पृष्ठाङ्क. | विषय. | पृष्ठाङ्क. |
|---|---|---|---|
| श्लीपदनिदानम् । | आगन्तुजव्रणनिदानम् । | ||
| श्लीपदकी सम्प्राप्ति, वातजश्लीपद | २२० | व्रणकी संख्या और सम्प्राप्ति | २३२ |
| पित्तजश्लीपद, श्लैष्मिक श्लीपद | २२१ | छिन्नके लक्षण, भिन्नके लक्षण | २३३ |
| असाध्य लक्षण | ” | कोष्ठके लक्षण, कोष्ठके भेदोंके लक्षण | ” |
| श्लीपदमें कफको प्राधान्य | ” | आमाशयस्थित रक्तके लक्षण | २३४ |
| श्लीपद कौनसे देशमें उत्पन्न होय | ” | पक्वाशयस्थके लक्षण, विद्धव्रणके लक्षण | ” |
| असाध्य लक्षण | ” | क्षतके लक्षण, पिच्चितके लक्षण | ” |
| विद्रधिनिदानम् । | घृष्टके लक्षण, सशल्यव्रणके लक्षण, कोष्ठके लक्षण | २३५ | |
| वातजविद्रधिके लक्षण | २२२ | असाध्य कोष्ठभेद | ” |
| पित्तकी विद्रधिके लक्षण | ” | मांस, शिरा, स्नायु और अस्थि और सन्धि | |
| कफकी विद्रधिके लक्षण | २२३ | इन मर्मोंमें चोट लगनेके सामान्य लक्षण | ” |
| पकनेके अनन्तर उनका स्राव | ” | मर्मरहित शिराविद्धके लक्षण | २३६ |
| सन्निपातकी विद्रधिके लक्षण | ” | स्नायुविद्धके लक्षण, संधिविद्धिके लक्षण | २३६ |
| आगन्तुजविद्रधिकी सम्प्राप्ति | ” | हड्डी विन्ध गईहो उसके लक्षण | ” |
| रक्तजविद्रधिके लक्षण, अन्तर्विद्रधिके लक्षण | २२४ | शिरादिमर्मविद्ध लक्षण | ” |
| विद्रधिके स्थान | ” | मांसविद्धके लक्षण, सर्वव्रणके उपद्रव | २३७ |
| स्रावनिर्गम, विद्रधिमें साध्यासाध्य | २२५ | भग्ननिदानम् । | |
| असाध्य लक्षण | ” | भग्नके दो प्रकार, संधिभग्नके लक्षण | २३७ |
| व्रणनिदानम् । | संधिभग्नके सामान्य लक्षण | ” | |
| वातादिभेदसे व्रणके लक्षण | २२६ | कांडभग्नकथन | २३८ |
| कच्चे फोडेके लक्षण, पच्यमानव्रणके लक्षण | ” | कांडभग्नके सामान्य लक्षण, कष्टसाध्यके लक्षण | २३९ |
| पक्वव्रणके लक्षण | २२७ | असाध्य लक्षण | ” |
| पकनेके समय तीनों दोषोंका सम्बन्ध | २२८ | असावधानतासे असाध्यता | २४० |
| राध न निकालनेसे परिणाम | ” | अस्थिविशेष करके भग्नविशेष | ” |
| आमादिलक्षणज्ञानसे वैद्यके गुणदोष | ” | नाडीव्रणनिदानम् । | |
| अपक्व पक्वकी उपेक्षा करनेमें दोष | ” | नाडीव्रणसंख्या-रूप सम्प्राप्ति | २४१ |
| शारीरव्रणनिदानम् । | वातजनाडीव्रणके लक्षण, पित्तके नाडीव्रणके लक्षण | ” | |
| वातिक व्रण, पित्तव्रणके लक्षण | २२९ | कफनाडीव्रणके लक्षण | २४२ |
| कफव्रणके लक्षण, रक्तज द्वन्द्वज व्रणके लक्षण | ” | सन्निपातजनाडीव्रणके लक्षण | ” |
| सुखव्रणके लक्षण | २३० | शल्यजनाडीव्रणके लक्षण, साध्यासाध्य लक्षण | ” |
| कृच्छ्र साध्य और असाध्यके लक्षण | ” | भगन्दरनिदानम् । | |
| दुष्टव्रणके लक्षण, शुद्धव्रणके लक्षण | ” | भगन्दरका पूर्वरूप, शतपोनकके लक्षण | २४३ |
| भरनेवाले व्रणके लक्षण | ” | उष्ट्रशिरोधरके लक्षण | ” |
| जो व्रण भरगया हो उसके लक्षण | २३१ | परिस्रावी भगन्दरके लक्षण | २४४ |
| व्याधिविशेष करके व्रणकां कृच्छ्रसाध्यत्व | ” | शम्बूकावर्तके लक्षण, उन्मार्गिभगन्दरके लक्षण | ” |
| साध्यासाध्य लक्षण, असाध्यव्रणके लक्षण | ” | साध्यासाध्य लक्षण, असाध्यके लक्षण | ” |
| दूसरे असाध्य लक्षण | ” | उपदंशनिदानम् । | |
| व्रणरोगमें अपथ्य | २३२ | उपदंशके कारण, वातोपदंशके लक्षण | २४५ |
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विषयानुक्रमणिका । ( ११ ) विषय. पृष्ठांक. विषय. पृष्ठांक. पित्तोपदंश व रक्तोपदंशके लक्षण २४५ विचर्चिकाके लक्षण, वातजादिक कुष्ठोंके लक्षण २५६ कफोपदंशके लक्षण ,, रसादि सप्तधातुगतकुष्ठोंके लक्षण २५७ सन्निपातोपदंशके लक्षण ,, रक्तगतकुष्ठके लक्षण, मांसगतकुष्ठके लक्षण ,, असाध्य लक्षण २४६ मेदोगतकुष्ठके लक्षण, अस्थिमज्जागतकुष्ठके लक्षण ,, लिंगवार्तके लक्षण ,, शुक्रार्तवगतकुष्ठके लक्षण ,, फिरंगरोगनिदानम् । साध्यादिभेद २५८ फिरंगशब्दकी निरुक्ति २४७ कुष्ठमें प्रधानदोषके लक्षण ,, विप्रकृष्टनिदान ,, किलासनिदान २५९ इसका रूप, फिरंग रोगके उपद्रव ,, वातादिभेदसे उनके लक्षण ,, साध्यासाध्य कष्टसाध्यत्व २४८ श्वित्रके साध्यासाध्य लक्षण ,, शूकदोषनिदानम् । किलासके असाध्य लक्षण, सांसर्गिक रोग २६० सर्षपिकाके लक्षण २४८ शीतपित्तोद्दर्दकोठनिदानम् । अष्ठीलाके लक्षण ,, शीतपित्तके निदान और सम्प्राप्ति व पूर्वरूप २६१ ग्रन्थितके लक्षण २४९ उद्दर्दके लक्षण, उद्दर्दका दूसरा धर्म ,, कुंभिकाके लक्षण, अलजीके लक्षण ,, कोठके लक्षण २६२ मृदितके लक्षण, संमूढपिटिकाके लक्षण ,, अम्लपित्तनिदानम् । अवमन्थके लक्षण, पुष्करिकाके लक्षण ,, निदानपूर्वकअम्लपित्तका स्वरूप २६२ स्पर्शहानिके लक्षण २५० अम्लपित्तके लक्षण, अधोगत अम्लपित्तके लक्षण ,, उत्तमाके लक्षण, शतपोनकके लक्षण ,, ऊर्ध्वगतअम्लपित्तके लक्षण २६३ त्वक्पाकके लक्षण, शोणितार्बुदके लक्षण ,, कफपित्तजन्यअम्लपित्तके लक्षण ,, मांसार्बुदके लक्षण, मांसपाकके लक्षण ,, अम्लपित्तके साध्यासाध्यविचार ,, विद्रधिके लक्षण २५१ अम्लपित्तमें केवल वायुका और वातकफका संसर्ग ,, तिलकालकके लक्षण ,, वातयुक्त अम्लपित्तके लक्षण २६४ असाध्य शूकदोषके लक्षण ,, कफयुक्त अम्लपित्तके लक्षण ,, कुष्ठनिदानम् । वातकफयुक्त अम्लपित्तके लक्षण ,, दोषाधिक्यसे कुष्ठके भेद २५२ कफपित्तयुक्त अम्लपित्तके लक्षण ,, कुष्ठके पूर्वरूप ,, विसर्पनिदानम् । सप्तमहाकुष्ठोंके लक्षण २५३ विसर्पका निदानपूर्वक संख्यादिकथन २६५ औदुंबरकुष्ठके लक्षण, मंडलकुष्ठके लक्षण ,, वातविसर्पके लक्षण ,, ऋक्षजिह्वकुष्ठके लक्षण २५४ पित्तविसर्पके लक्षण, कफविसर्पके लक्षण २६६ पुण्डरीककुष्ठके लक्षण, सिध्मकुष्ठके लक्षण ,, सन्निपातज विसर्पके लक्षण, अग्निविसर्पके लक्षण ,, काकणकुष्ठके लक्षण ,, ग्रंथिविसर्पके लक्षण, कर्दमविसर्पके लक्षण २६७ ग्यारह क्षुद्रकुष्ठोंके लक्षण, किटिभकुष्ठके लक्षण ,, क्षतजविसर्पके लक्षण, विसर्पके उपद्रव २६८ वैपादिक कुष्ठके लक्षण २५५ साध्यासाध्य लक्षण २६९ अलसकुष्ठके लक्षण, दद्रुमण्डलके लक्षण ,, विस्फोटकनिदानम् । चर्मदलके लक्षण, पामाकुष्ठके लक्षण ,, विस्फोटकके लक्षण, विस्फोटकस्वरूप २६९ कच्छूकुष्ठके लक्षण ,, वातविस्फोटकके लक्षण, पित्तविस्फोटकके लक्षण २७० विस्फोटककुष्ठके लक्षण, शतारुकुष्ठके लक्षण २५६
( १२ ) माधवनिदानकी-
( १२ ) माधवनिदानकी- विषय. पृष्ठांक. | विषय. पृष्ठांक. कफविस्फोटकके लक्षण २७० | कक्षा ( कखलाई ) के लक्षण २७९ कफपित्तात्मकविस्फोटकके लक्षण ,, | गन्धमालाके लक्षण २८० वातपित्तात्मक विस्फोटकके लक्षण ,, | अग्निरोहिणी ( कालीफुन्सी ) ,, कफवातात्मकविस्फोटकके लक्षण ,, | चिप्पके लक्षण, अनुशयके लक्षण ,, सन्निपातविस्फोटकके लक्षण ,, | विदारिकाके लक्षण ,, रक्तजविस्फोटकके लक्षण २७१ | शर्कराके लक्षण २८१ साध्यासाध्यविचार, विस्फोटकके उपद्रव ,, | शर्करादके लक्षण ,, मसूरिकानिदानम् । | पाददारीके लक्षण, कदर ( ठेक ) के लक्षण ,, कारण और संप्राप्ति २७१ | अलसक ( खारुवा ) के लक्षण २८२ मसूरिकाके पूर्वरूप २७२ | इन्द्रलुप्त ( चाई ) के लक्षण ,, वातकी मसूरिकाके लक्षण ,, | दारुणकके लक्षण, अरूंषिकाके लक्षण २८३ पित्तकी मसूरिकाके लक्षण ,, | पलित ( सफेद बाल ) के लक्षण ,, रक्तजमसूरिकाके लक्षण, कफजमसूरिकाके लक्षण २७३ | मुखदूषिकाके लक्षण ,, त्रिदोषजमसूरिकाके लक्षण ,, | पद्मिनीकंटकके लक्षण २८४ चर्मपिटिकाके लक्षण ,, | जतुमणि ( लहसन ) के लक्षण ,, रोमांतिकाके लक्षण २७४ | माष ( मस्सा ) के लक्षण ,, रसादिसप्तधातुगतके लक्षण ,, | तिलकालक ( तिल ) के लक्षण ,, रसगतमसूरिकाके लक्षण ,, | न्यच्छके लक्षण २८५ रक्तगत मसूरिकाके लक्षण ,, | व्यंग ( झांई ) के लक्षण नीलिकाके लक्षण ,, मांसगतके लक्षण, मेदोगतके लक्षण ,, | परिवर्त्तिकाके लक्षण ,, अस्थिमज्जागतके लक्षण २७५ | अवपाटिकाके लक्षण, निरुद्धप्रकाशके लक्षण २८६ शुक्रगतके लक्षण ,, | सन्निरुद्धगुदके लक्षण, अहिपूतनके लक्षण २८७ सप्तधातुगतमसूरिकाके दोषके | वृषणकच्छूके लक्षण ,, संबंधसे लक्षण ,, | गुदभ्रंशके लक्षण २८८ धातुगत और दोषज मसूरि | शूकरदंष्ट्रके लक्षण ,, कामे कौन कौन साध्य | मुखरोगनिदानम् । कष्टसाध्य मसूरिकाके लक्षण २७६ | मुखरोगोंकी संख्या २८८ असाध्य मसूरिकाके लक्षण ,, | ओष्ठरोगकी संप्राप्ति २८९ सर्व मसूरिकाके अवस्थाविशेष करके लक्षण ,, | वातिक ओष्ठरोगके लक्षण ,, मसूरिकाके उपद्रव २७७ | पैत्तिकके लक्षण, श्लैष्मिकके लक्षण ,, क्षुद्ररोगनिदानम् । | सान्निपातिकके लक्षण, रक्तजके लक्षण ,, अजगल्लिकाके लक्षण २७७ | मांसजके लक्षण २९० यवप्रख्याके लक्षण, अन्त्रालजीके लक्षण ,, | मेदोजके लक्षण, अभिघातजके लक्षण ,, विवृतापिडिकाके लक्षण २७८ | दन्तमूलगत १६ रोग । कच्छपिकाके लक्षण, वल्मीकपिटिकाके लक्षण ,, | शीतादके लक्षण २९० इन्द्रवृद्धाके लक्षण, गर्दभिकाके लक्षण ,, | दन्तपुप्पुटके लक्षण, दन्तवेष्टके लक्षण २९१ पाषाणगर्दभके लक्षण २७९ | शौषिरके लक्षण, महाशौषिरके लक्षण ,, पनशिकाके लक्षण, जालगर्दभके लक्षण ,, | परिदरके लक्षण, उपकुशके लक्षण २९२ इरिवेलिकाके लक्षण ,, | CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
विषयानुक्रमणिका । ( १३ ) विषय. पृष्ठांक. विषय. पृष्ठांक. वैदर्भके लक्षण, खलीवर्धनके लक्षण,करालके लक्षण २९२ कृमिकर्णके लक्षण ३०४ अधिमांसकके लक्षण, नाड़ीव्रणके लक्षण २९३ कानमें पतंगादि कीड़ा धरनेके कारण " दन्तगत ८ रोग । द्विविधकर्णविद्रधिके लक्षण " दालनके लक्षण, कृमिदन्तकके लक्षण २९३ कर्णपाकके लक्षण, पूतिकर्णके लक्षण " भंजनकके लक्षण " वातजके लक्षण ३०५ दन्तहर्षके लक्षण, दन्तर्र्शकराके लक्षण २९४ पित्तजके लक्षण, कफजके लक्षण " कपालिकाके लक्षण, श्यावदंतके लक्षण " सन्निपातजके लक्षण " हनुमोक्षके लक्षण २९५ कर्णपालीके रोग । जिह्वागत ५ रोग । कर्णशोथके लक्षण ३०५ वातजके लक्षण, पित्तजके लक्षण, कफजके लक्षण २९५ परिपोटकके लक्षण ३०६ अलासके लक्षण " उत्पातके लक्षण " उपजिह्वके लक्षण २९६ उन्मन्थकके ल०, दुःखवर्धनके लक्षण " तालुगत ९ रोग । परिलेहीके लक्षण " कण्ठशुण्डीके लक्षण, तुण्डिकेरीके लक्षण २९६ नासारोगनिदानम् । अधुषके लक्षण, कच्छपके लक्षण, अर्बुदके लक्षण " पीनसके लक्षण ३०७ मांससंघातके लक्षण, तालुपुप्पुटके लक्षण २९७ पूतिनस्यके ल०, नासापाकके लक्षण " तालुशोष तथा तालुपाकके लक्षण " पूयरक्तके लक्षण, क्षवथु ( छींक ) के लक्षण " कंठगत १७ रोग । आगन्तुजक्षवथुके लक्षण ३०८ पांचरोहिणीकी सामान्य सम्प्राप्ति २९७ भ्रंशथुके ल०, दीप्तके लक्षण " वातजाके लक्षण " प्रतिनाहके लक्षण, नासास्रावके लक्षण " पित्तजाके लक्षण, कफजाके लक्षण २९८ नासापरिशोषके लक्षण " त्रिदोषजाक लक्षण, रक्तजाके लक्षण " चिकित्साभेदार्थ पीनसके आमपक्वके लक्षण ३०९ कंठशालूकके लक्षण, अधिजिह्वकके लक्षण " प्रतिश्यायकी संप्राप्ति " वलयके लक्षण, " चयादिक्रमसे इसका दूसरा निदान " घलासके लक्षण, एकवृंदके लक्षण, वृंदके लक्षण २९९ पूर्वरूपके लक्षण, वातिक प्रतिश्यायके लक्षण ३१० शतघ्नीके लक्षण, गिलायुके लक्षण ३०० पैत्तिकप्रतिश्यायके लक्षण, श्लैष्मिकप्रतिश्यायके लक्षण,, गलविद्रधिके लक्षण, गलोघके लक्षण " सान्निपातिकके लक्षण, दुष्टप्रतिश्यायके लक्षण ३११ स्वरघ्नेके लक्षण " रक्तप्रतिश्यायके लक्षण, " मांसतानके लक्षण ३०१ असाध्य लक्षण, प्रतिश्यायके अन्यविकार ३१२ विदारीके लक्षण, मुखपाक ( मुख आना ) " नेत्ररोगनिदानम् । वातजके लक्षण, पित्तजके लक्षण " नेत्ररोगका कारण ३१३ कफजके लक्षण, असाध्यमुखरोगके लक्षण " सुश्रुतमतसे नेत्ररोगकी सम्प्राप्ति " कर्णरोगनिदानम् । अभिष्यंद ( नेत्र आनाके ) लक्षण ३१४ कर्णशूलके लक्षण, कर्णनादके लक्षण ३०२ वाताभिष्यन्दके लक्षण, पित्ताभिष्यन्दके लक्षण " बाधिर्य ( बहराके ) लक्षण ३०३ कफजाभिष्यन्दके लक्षण " कर्णक्ष्वेडके लक्षण, कर्णस्रावके लक्षण " रक्तजाभिष्यन्दके लक्षण ३१५ कर्णकण्डूके लक्षण, कर्णगूथके लक्षण " अभिष्यन्दसे अधिमन्थकी उत्पत्ति " कर्णप्रतिनाहके लक्षण " दूसरे सामान्य लक्षण "
( १४ ) माधवनिदानकी-
( १४ ) माधवनिदानकी-
| विषय. | पृष्ठांक. | विषय. | पृष्ठांक. |
|---|---|---|---|
| दोषभेदसे कालमर्यादाके लक्षण | ३१५ | नेत्रकी सन्धिके रोग । | |
| नेत्ररोगके सामान्य लक्षण | ,, | पूयालसके ल०, उपनाहके लक्षण | ३२९ |
| निरामके लक्षण, शोथसहित नेत्रपाकके लक्षण | ३१६ | स्राव अथवा नेत्रनाडीके लक्षण | ,, |
| हताधिमन्थके लक्षण | ,, | पर्वणी व अलजीके ल०, कृमिग्रंथिके लक्षण | ३३० |
| वातपर्ययके लक्षण, शुष्काक्षिपाकके लक्षण | ३१७ | वर्त्मरोग (मर्मस्थानके) रोग । | |
| अन्यतोवातके लक्षण, अम्लाध्युषितके लक्षण | ,, | उत्संगपिडिकाके लक्षण | ३३० |
| शिरोत्पातके लक्षण, शिराहर्षके लक्षण | ३१८ | कुंभिकाके लक्षण | ३३१ |
| नेत्रोंके काले रंगमें रोग । | पोथकीके लक्षण, वर्त्मशर्कराके लक्षण | ,, | |
| सव्रण शुक्र लक्षण, सव्रण शुक्रके साध्यासाध्य ल० | ३१८ | अर्शोवर्त्मके लक्षण, शुष्कार्र्शके लक्षण | ,, |
| अव्रण शुक्रके लक्षण | ३१९ | अञ्जनके लक्षण | ,, |
| अव्रण अवस्था विशेषकरके साध्य लक्षण | ,, | बहलवर्त्मके लक्षण | ३३२ |
| सव्रण अवस्थाभेदकरके असाध्य लक्षण | ,, | वर्त्मबन्धके लक्षण | ,, |
| दूसरे असाध्य लक्षण | ,, | क्लिष्टवर्त्मके लक्षण, वर्त्मकद्दमके लक्षण | ,, |
| अक्षिपाकात्ययके लक्षण, अजकाजातके लक्षण | ३२० | श्याववर्त्मके लक्षण | ,, |
| दृष्टिके रोग । | प्रक्लिन्नवर्त्मके लक्षण | ३३३ | |
| पहले पटलमें दोष जानेसे उसके लक्षण | ३२० | अक्लिन्नवर्त्मके लक्षण, वातहतवर्त्मके लक्षण | ,, |
| दृष्टिका प्रमाण सुश्रुत मतसे | ,, | अर्बुदके लक्षण, निमेषके लक्षण | ,, |
| प्रसंगवशसे पटल (मण्डल) का भेद | ,, | शोणितार्शके लक्षण | ३३४ |
| द्वितीयपटलस्थितदोषके लक्षण | ३२१ | लगणके लक्षण, बिसवर्त्मके लक्षण | ,, |
| तृतीयपटलगतदोषके लक्षण | ,, | कुम्भनके लक्षण | ,, |
| चतुर्थपटलगततिमिरके लक्षण | ३२२ | पक्ष्मकोपके लक्षण | ३३५ |
| तृतीयपटलाश्रितकाचदोषकी दूसरी संज्ञा | ,, | पक्ष्मशातके लक्षण, नेत्ररोगोंकी संख्या | ,, |
| दोषविशेष करके रूपका दीखना | ३२३ | शिरोरोगनिदानम् । | |
| पित्तसे दूसरे परिम्लायी संज्ञक तिमिर, लक्षण | ,, | वातजके लक्षण, पैत्तिकके लक्षण | ३३६ |
| रोगभेदसे लिंगनाशको षड्विधत्व | ३२४ | श्लैष्मिकके लक्षण, सान्निपातिकके लक्षण | ,, |
| वातिकरोगके विशेष लक्षण | ,, | रक्तजके लक्षण | ३३७ |
| दृष्टिमण्डलगत रोगके लक्षण | ,, | क्षयजके लक्षण, कृमिजके लक्षण | ,, |
| सर्वदृष्टिरोगकी संख्या, पित्तविदग्धके लक्षण | ३२५ | सूर्यावर्त्तके लक्षण, अनंतवातके लक्षण | ,, |
| दिवांधके लक्षण, कफविदग्धदृष्टिके लक्षण | ,, | अर्धावभेद (आधीसीसी) के लक्षण | ३३८ |
| नक्तान्ध (रतौंधी) के लक्षण | ,, | शंखकके लक्षण | ,, |
| धूमदर्शीके लक्षण, ह्रस्वदृष्टिके लक्षण | ३२६ | प्रदररोगनिदानम् । | |
| नकुलान्ध्यके लक्षण, गम्भीरदृष्टिके लक्षण | ,, | प्रदररोगके सामान्य रूप-उपद्रवके लक्षण | ३३९ |
| आगन्तुकलिंगनाशके लक्षण | ,, | श्लैष्मिकके लक्षण | ३४० |
| आनिमित्तके लक्षण | ३२७ | पैत्तिकके लक्षण | ,, |
| अर्र्मरोग (५) प्रकारका है | ,, | वातिकके लक्षण, त्रिदोषजके लक्षण | ,, |
| शुक्तिरोगके लक्षण, अर्जुनके लक्षण | ३२८ | विशुद्धार्तवके लक्षण | ,, |
| पिष्टकके लक्षण, जालके लक्षण | ,, | योनिव्यापत्तिनिदानम् । | |
| शिराजपिटिकाके लक्षण, बलासके लक्षण | ३२९ | योनिके बीस रोगोंके लक्षण | ३४१ |
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विषयानुक्रमणिका । ( १५ ) विषय. पृष्ठांक. विषय. पृष्ठांक. स्राव और पातके लक्षण ३४३ स्थावरविषके सामान्य लक्षण ३५६ गर्भ अकालमें कैसे गिरे इसका निदानपूर्वक दृष्टान्त ,, विष देनेवालेके ढूँढनेके निमित्त लक्षण ,, प्रसूत होते समय मूढगर्भ होनेका लक्षण ,, मूलादिविषोंके लक्षण ३५७ मूढ गर्भकी आठ प्रकारकी गति ३४४ विषलिप्तशस्त्रहतके लक्षण ,, असाध्य मूढगर्भ और गर्भिणीके लक्षण ,, सर्पविष यह अति तीक्ष्ण है इसीसे प्रथम मृतगर्भके लक्षण ३४५ सर्पोंकी जाति कथन ,, गर्भमरण हेतु ,, सर्पोंके भेद ३५९ गर्भिणीके दूसरे असाध्य लक्षण ,, भोगीसर्पके काटनेपर वातादिकोंके लक्षण ,, सूतिकारोगनिदानम् । विशिष्टदेशमें तथा विशिष्ट नक्षत्रमें काटनेके प्रसूतिरोगकी उत्पत्ति, असाध्य लक्षण ३४६ असाध्य लक्षण ३६० स्तनरोगनिदानम् । गर्मी होनेसे विषके जोरका लक्षण ,, स्तन्य ( दूध ) के रोग ३४७ दूसरे असाध्य लक्षण ,, वातादिकसे दूषित दूधके लक्षण ,, दूषितविषके लक्षण, तूषीविषके लक्षण ३६१ शुद्धदूधके लक्षण ३४८ स्थान भेदकरके उसके विशिष्ट लक्षण ३६२ बालरोगनिदानम् । दूषीविषकी निरुक्ति ,, वातदूषित दूधके ( रोग ) ३४९ इन दोनों विषोंके लक्षण ३६३ पित्तदूषित दूधके रोग ,, दूषीविषके साध्यादि लक्षण ,, कफदूषित दूधके रोग ,, लूताविषकी उत्पत्ति ,, बालकोंकी अन्तर्गत पीडा जाननेका उपाय ,, उनके काटनेके सामान्य लक्षण ३६४ द्वन्द्वज और सन्निपातज दूषित दुग्धके रोग ३५० दूषीविष लूताके काटनेके लक्षण ,, कुक्कूणकके लक्षण ,, प्राणहरलूताके लक्षण ,, पारिगर्भिकके लक्षण ३५१ दूषीविषआखुके लक्षण ,, तालुकण्टक लक्षण ,, प्राणहरमूषकविषके लक्षण ३६५ महापद्मविसर्पके लक्षण ,, कृकलास ( सरट ) के काटेके लक्षण ,, और विकार जो बालकोंके होत उनका लक्षण ,, वृश्चिकविषके लक्षण ,, सामान्यग्रहजुष्टके लक्षण ३५२ वृश्चिकविषके असाध्य लक्षण ३६६ स्कन्दग्रहगृहीत बालकके लक्षण ,, कणभदष्टके लक्षण ,, स्कन्दापस्मारके लक्षण ३५३ उच्चिटिंगर ( झींगर ) विषके लक्षण ,, शकुनिग्रहके लक्षण ,, मण्डूक ( मेढक ) के विषके लक्षण ,, रेवतीग्रहके लक्षण ,, विषैले मत्स्य ( मछली ) के विषके लक्षण ३६७ पूतनाग्रहके लक्षण ,, सविषजलौका ( जोंक ) के विषके लक्षण ,, अन्धपूतनाग्रहके लक्षण ,, गृहगोधिका ( छिपकली ) के विषके लक्षण ,, शीतपूतनाग्रहके लक्षण ३५४ शतपदी ( कानखजूरा ) के विषके लक्षण ,, मुखमण्डिकाग्रहके लक्षण ,, मशक ( मच्छर वा डांस ) के विषके लक्षण ,, नैगमेय ग्रहके लक्षण ,, असाध्यमशकक्षतके लक्षण ३६८ विषरोगनिदानम् । सविषमक्षिका ( मक्खी ) दंशके लक्षण ,, विषके स्थान ३५५ चतुष्पादादिकोंके विषके साधारण लक्षण ,, जंगमविषके सामान्य लक्षण ३५६ विष उतर गया हो उसके लक्षण ,,
क्लीबके लक्षण ३६९ सुश्रुतसे -शुक्रदोषनिदानं ,,
( १६ ) माधव० विषयानुक्रमणिका । विषय. पृष्ठाङ्क. । विषय. पृष्ठांक. परिशिष्ट ( ग्रन्थशेष । कफदूषित शुक्रके लक्षण, शुद्ध शुक्रके लक्षण ३७७ क्लीबके लक्षण ३६९ सुश्रुतसे -शुक्रदोषनिदानं ,, क्लैब्यके सामान्य लक्षण ,, आर्तवदोषके लक्षण, विष्टम्भगर्भके लक्षण ३७८ बीजोपघात क्लीबके लक्षण ,, उपविष्टगर्भके लक्षण ३७९ ध्वजभंगक्लीवकी उत्पत्ति ३७० मन्थरज्वर ( मोतीज्वर ) के लक्षण ,, ध्वजभंगके लक्षण ३७१ अलर्क ( कुत्ते ) के विषनिदान ,, आसेक्य नपुंसकके लक्षण ३७२ उसके काटनेके लक्षण ,, सौगंधिक नपुंसकके लक्षण ,, विषैले अन्य प्राणियोंका संग्रह ,, कुंभिक नपुंसकके लक्षण ,, सविषनिर्विष दंशके लक्षण, असाध्य लक्षण ३८० ईर्ष्याकनपुंसकके लक्षण ३७३ जलसत्रासनामाके लक्षण ,, महाषंढनपुंसकके लक्षण ,, गौधेरकवंशके लक्षण ३८१ नारीषंढ नपुंसकके लक्षण ,, सर्पपिका दंशके लक्षण ,, उक्तश्लोकोंका संग्रह ,, विश्वम्भरादष्टके लक्षण ,, जरासंभव नपुंसकके लक्षण ३७४ अंहिंडकादष्टके लक्षण ३८२ जगसंभव ( दूसरे ) नपुंसकके लक्षण ,, कण्ठूमकादष्टके लक्षण ,, क्षयजक्लीबके लक्षण ,, शूकवृन्दादि दष्टके लक्षण ,, असाध्य नपुंसकके लक्षण ३७५ पिपीलिकादंशके लक्षण ,, शुक्रार्तवदोषनिदानम् ३७६ स्नायुके निदान ,, दूषित शुक्रके भेद ,, ध्वजभंगके संगृहीत श्लोक ,, वातदूषित शुक्रके लक्षण ३७७ रोगानुक्रमणिका ३८३ पित्तदूषित शुक्रके लक्षण ,, टीकाकर्त्ताकी वंशावली ३८४ इति विषयानुक्रमणिका समाप्ता ॥
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ॐ श्रीशं वन्दे । श्रीनिकुञ्जविहारिणे नमः । ❖ माधवनिदानम् । ❖ भाषाटीकासमेतम् । प्रथम भाग । नरवरवपुधारी गोकुलानंदकारी ब्रजयुवतिविहारी रासलीलाप्रचारी । प्रणवहुँ बनवारी कंसको मानमारी सकलविघनटारी लीजिये सुधि हमारी ॥ तथा च—कर्ता भर्त्ता तथा हर्त्ता भोगमोक्षैकदायिनम् । वन्दे श्रीगिरिजाकान्तं शंकरं लोकशंकरम् ॥ परमकारुणिक श्रीसदाशिवचरणाम्बुजचंचरीक श्रीमाधवाचार्य निश्शेषविघ्नविघातार्थं और ग्रन्थकी निर्विघ्नपरिसमाप्तिके निमित्त ग्रन्थके आदिमें मंगलाचरण करते हैं— ( युग्मम् ) प्रणम्य जगदुत्पत्तिस्थितिसंहारकारणम् । स्वर्गापवर्गयोर्द्वारं त्रैलोक्यशरणं शिवम् ॥ १ ॥ ग्रन्थकर्ताकी प्रतिज्ञा । नानामुनीनां वचनैरिदानीं समासतः सद्भिषजां नियोगात् । सोपद्रवारिष्टनिदानलिङ्गो निबध्यते रोगविनिश्चयोऽयम् ॥ २ ॥ मया अयं रोगविनिश्चयो ग्रन्थः इदानीं समासतः निबध्यते, किं कृत्वा, शिवं प्रणम्य, कथंभूतं शिवं जगदुत्पत्तिस्थितिसंहारकारणम्, पुनः कथंभूतं शिवं स्वर्गा- पवर्गयोर्द्वारम्, पुनः त्रैलोक्यशरणम्, किंविशिष्टो ग्रन्थः सोपद्रवारिष्टनिदानलिंगः, कैः नानामुनीनां वचनैः, कस्मात् सद्भिषजां नियोगात् इत्यन्वयः ॥ जगत्की उत्पत्ति, पालन और प्रलयके प्रधान कारण, स्वर्ग ( सुख ) अपवर्ग ( मोक्षके ) द्वार अर्थात् दाता तथा त्रिलोकीके रक्षक शिवको प्रणाम कर अनेक सुश्रुतादि मुनीश्वरोंके वचनोंके अनुसार उत्तम वैद्योंकी आज्ञासे अब मैं संक्षेपसे २
( २ ) माधवनिदान ।
( २ ) माधवनिदान । रोगविनिश्चय नाम ग्रन्थकी रचना करता हूँ। जिसमें उपद्रव, अरिष्ट, निदान और लिंग ( चिह्न ) इनका लक्षण अच्छी रीतिसे किया गया है ॥ शिष्य-यह अतिसूक्ष्म निदानपंचक सर्वत्र ऋषिमुनियोंके जानने योग्य है उनके वाक्योंका निरादर कर मनुष्यकृत तुम्हारे ग्रन्थमें मनुष्योंकी कैसे प्रवृत्ति होवेगी ? इस कारण माधवाचार्यने-" नानामुनीनां वचनैः " इस पदको धरा अर्थात् अनेक मुनीश्वरोंके वचनोंका आशय ले मैंने यह ग्रन्थ निर्माण किया है, किंतु मेरे मनकी उक्तिसे कल्पित नहीं है। शंका-पहले ही बहुत ग्रन्थ निर्माण करे उपस्थित हैं फिर तुम्हारे इस ग्रन्थको कौन पढ़ेगा ? इस कारण माधवाचार्यने " इदानीम् " पद मूलमें धरा । इस पदका यह आशय है कि, हम ही अनेक मुनीश्वरोंके वचनोंसे अब ऐसा अलौकिक ग्रन्थ रचते हैं कि, पहिले किसी आचार्यने अद्यापि नहीं निर्माण करा । कोई वादी शंका करे कि, तुमने ग्रन्थ रचा भी परन्तु किसीने नहीं पढ़ा तो आपका ग्रन्थ निर्माण करना व्यर्थ होगा, इस कारण माधवाचार्यने " सद्धिषजां नियोगात् " यह पद धरा. इस पदका आशय यह है कि, हमारे पढनेके निमित्त कोई निदानग्रन्थ निर्माण करो ऐसे बुद्धिमान् वैद्योंके कहनेसे इस ग्रन्थकी रचना की है। शंका-श्रीमहादेवजीके हर मृड रुद्र शम्भु इत्यादि नामोंको त्यागकर शिव इस नामको क्यों प्रणाम करा ? उत्तर-इस रोगविनिश्चय ग्रन्थके पठन पाठन करनेवालोंके कल्याणकी इच्छा कर सब कामना देनेवाला कल्याणवाचक शिवनाम विचार इसीको ग्रन्थके आदिमें माधवाचार्यने प्रणाम करा ॥ अन्य निदानग्रन्थोंसे इसकी उत्तमता दिखाते हैं- नानातंत्रविहीनानां भिषजामल्पमेधसाम् । सुखं विज्ञातुमातङ्कमयमेव भविष्यति ॥ ३ ॥ अयमेव ( ग्रन्थः ) अल्पमेधसां भिषजां सुखं यथा भवति तथा आतङ्कं विज्ञातुं भविष्यति । किविशिष्टानां भिषजां नानान्त्रविहीनानामित्यन्वयः ॥ अनेक ग्रन्थोंके विचार करनेमें असमर्थ ऐसे मन्दबुद्धिवाले वैद्योंको सुखपूर्वक रोगाँनके निमित्त यही ग्रन्थ कारण होवेगा. क्योंकि, रोगके जाननाही मुख्य है सो अन्यान्तरोंमें लिखा भी है ॥ १ उपद्रवः-रोगारम्भदोषप्रकोपजन्योऽन्यविकारः।२ अरिष्टम्-नियत मरणख्यापकं लिंगम् । ३ निदानम्-रोगोत्पादको हेतुः । ४ लिङ्गम्-रोगख्यापको हेतुः तेन लिंग्यते ज्ञायते व्याधिरने- नेति व्युत्पत्त्या पूर्वरूपरूपोपशयसंप्राप्तयो विज्ञायन्ते । ५ रोगमादौ परीक्षेत ततोऽनन्तरमौष- धम् । ततः कर्म भिषक्पश्चाज्ज्ञानपूर्वं समाचरेत् ॥ १ ॥ रोगज्ञानार्थमप्रवादौ यत्नः कार्यो भिषग्वरैः । सति तस्मिन्क्रियारम्भः पुण्याय यशसे श्रिये ॥ २ ॥
निदानं पूर्वरूपाणि रूपाण्युपशयस्तथा ।
भाषाटीकासमेत । (३) रोग जाननेके पांच उपाय हैं उनको कहते हैं- निदानं पूर्वरूपाणि रूपाण्युपशयस्तथा । संप्राप्तिश्चेति विज्ञानं रोगाणां पञ्चधा स्मृतम् ॥ ४ ॥ रोगाणां विज्ञानं पञ्चधा स्मृतम् इत्यन्वयः ॥ निदान, पूर्वरूप, रूप, उपशय और संप्राप्ति ये पांच प्रकार पृथक् पृथक् और समस्त व्याधियोंके बोधक होते हैं । इस प्रकार रोगोंका जानना मुनीश्वरोंने पांच प्रकारका कहा है ॥ इस श्लोकमें "उपशयस्तथा" यह जो पद धरा इसका यह आशय है कि, जैसे निदान, पूर्वरूप और रूपसे रोग जाना जाता है उसी प्रकार उपशयसे और संप्राप्तिसे भी रोग जाना जाता है "सम्प्राप्तिश्चेति" इस पदमें च और इतिके धरनेसे यह प्रयोजन है कि, रोग जाननेके इन पांचोंसे विशेष और उपाय नहीं है। अब कहते हैं कि, रोगोंका निदान संनिकृष्ट (समीप) और विप्रकृष्ट (दूर) इन भेदोंसे दो प्रकारका है। संनिकृष्ट-उसे कहते हैं कि, जैसे कुपित वातादिक ज्वरादिक रोगोंको प्रकट करे हैं और विप्रकृष्ट-उसे कहते हैं, हेमन्तऋतुमें संचित हुआ कफ वसन्त- ऋतुमें कुपित होता है। पूर्वरूप-उसे कहते हैं जैसे ज्वरमें आलस्यादि धर्म। रूप- उसे कहते हैं जैसे १८ वें श्लोकमें लिखा है-"स्वेदावरोध" इति अर्थात्-पसीनोंका अवरोध होना इत्यादिक। उपशय-उसे कहते हैं जैसे वातरोग तैल आदिके लगानेसे शान्त होता है। सम्प्राप्ति-उसे कहते हैं जैसे १० वें श्लोकमें लिखा है-"यथा दुष्टेन दोषेण" इत्यादि। शंका-क्यों जी ! ये पांच जो व्याधि जाननेके उपाय कहे इनमें एकहीसे रोगका निश्चय हो सकता है फिर माधवाचार्यने पांच प्रकार व्यर्थ क्यों लिखे ? क्योंकि पांचोंका प्रयोजन केवल रोगका जानना है। उत्तर- तुमने कहा सो ठीक है परन्तु इन पांचोंका पृथक् पृथक् प्रयोजन है, जैसे-निदानसे यह प्रयोजन है कि, जिस वस्तुके खानेसे या लगानेसे रोग प्रगट हो उसका त्याग करनेसे रोग नहीं बढे किन्तु उलटा शान्त ही होता है और पूर्वरूपके जाननेसे यह । प्रयोजन है, जैसे-सुश्रुतमें लिखा है कि, वातज्वरके पूर्वमें घृतपान करानेसे वात- ज्वरकी उत्पत्ति नहीं हो। रूपके जाननेसे प्रयोजन है कि, व्याधि अर्थात् रोगका साध्यासाध्य और कष्टसाध्यत्वै निश्चय होता है जैसे जिस रोगका अल्प रूप होवे वह १ अर्थात् नाडी नेत्र जिह्वा मलमूत्रादिकी परीक्षाओंसे रोगोंका ज्ञान यथार्थ नहीं होता। २ वातिकज्वरपूर्वरूपे घृतपानमिति तथा च साध्यासाध्यत्वमपि ज्ञायते। ३ कष्टसाध्यके लक्षण चरकमें लिखे हैं। यथा-निमित्तपूर्वरूपाणां रूपाणां मध्यमे बले। इति।
( ४ ) माधवनिदान ।
( ४ ) माधवनिदान । सुखसाध्य और मध्यरूप कष्टसाध्य और सम्पूर्णरूप असाध्य है इनको जाननेसें असाध्यका परित्याग करना और कष्टसाध्य तथा सुखसाध्यकी औषधि करानीं उचित है । उपशयके जाननेसे यह प्रयोजन है कि सुपरीक्षित व्याधिके सम्पूर्ण लक्षण न मिलनेसे व्याधिका यथार्थ ज्ञान नहीं हो, उसको उपशयके द्वारा निश्चय करे । सो चरकमें लिखा है कि, जिस व्याधिके लक्षण प्रगट न होयं उसकी उपशय और अनुशयके द्वारा परीक्षा करे उसी प्रकार सुश्रुतमें लिखा है जैसे-उबटना तेल लगाना स्वेदनविधि इत्यादि कर्म करनेसे वातरोग शान्त न हो तो उसके रुधिरका विकार जाने और सम्प्राप्तिके जाननेसे यह प्रयोजन है कि, सम्प्राप्तिके बिना जानें पूर्वरूपादिकोंकरके जानी हुई व्याधि चिकित्साके योग्य भी है परन्तु अंशांश विकल्प बल काल आदिको जबतक नहीं जाने तबतक चिकित्सा यथार्थ नहीं हो सकती इसीसे वैद्य निदानपञ्चकका अवश्यही परिचय करें ॥ अब निदानके पर्यायवाची शब्दोंको कहते हैं- निमित्तहेत्वायतनप्रत्ययोत्थानकारणैः । निदानमाहुः पर्यायैः प्राग्रूपं येन लक्ष्यते ॥ ५ ॥ निमित्त, हेतु, आयतन, प्रत्यय, उत्थान और कारण ये निदानके पर्यायवाची शब्द शास्त्र व्यवहारके अर्थ मुनीश्वरोंने कहे हैं, इनके कहनेका कारण यह है कि, व्यवहारके वास्ते अर्थात् शास्त्रमें इन छहों शब्दोंमेंसे कोई शब्द आवे उसको निदानवाचकही जानें ॥ व्याधिके प्राग्रूपका लक्षण । उत्पित्सुरामयो दोषविशेषेणाऽनधिष्ठितः । लिंगमव्यक्तमल्पत्वाद्याधीनां तद्यथायथम् ॥ ६ ॥ येन उत्पित्सुः आमयो लक्ष्यते तत्प्राग्रूपम्-किंभूतः आमयः दोषविशेषेणाऽनधि- ष्ठितः । अतः एव ज्वरादिव्याधीनाम् अल्पत्वात् अव्यक्तं लिंगं तत् यथायथं यस्य व्याधेर्यद्रूपं तदेवाव्यक्तं पूर्वरूपम् इत्यन्वयः ॥ जिस जम्भाई आलस्य आदि करके उत्पत्ति होनेवाली व्याधिका ज्ञान होवें उसको प्राग्रूप अर्थात् पूर्वरूप कहते हैं, फिर वह व्याधि दोष ( वात पित्त कफ ) सें बहुधा अप्रगट होवे । शंका-यदि वातादिक दोषोंसे अप्रगट होवेगी तो व्याधिका प्रगट होना असम्भव है क्योंकि कारण तो वातादिक दोष हैं । जब दोषहीं १ गूढलिंगं व्याधिमुपशयानुपशयाभ्यां बुध्येत इति । २ अभ्यङ्गस्नेहस्वेदाद्यैर्वातदोषो न शाम्यति । विकारस्तत्र विज्ञेयो दुष्टमत्रास्ति शोणितम् ॥ इति ॥
भाषाटीकासमेत । ( ५ ) नहीं तो रोग कैसे प्रगट हो सकते हैं ! उत्तर-इस पदका यह अर्थ है कि दोष ( वात पित्त कफ ) का व्याधिके अल्प होनेसे अप्रगट होना रूप अर्थात् थोडा थोडा होना. अतएव तत्तत् ज्वरादिव्याधिका अपने अपने अप्रगट लक्षण पूर्वरूप तैसे तैसेही होते हैं । अब कहते हैं कि, पूर्वरूप दो प्रकारका हैं-एक सामान्य दूसरा विशिष्ट । सामान्यप्राग्रूप ( पूर्वरूप ) उसे कहते हैं जैसे दोष ( वात पित्त कफ ) से दूषित धातु उसके बिगडनेसे प्रगट होनेवाले ज्वरादि व्याधिमात्रकीही प्रतीति होवे और वात आदि दोषोंके चिह्न न मालूम हो जैसे-“ श्रमोऽरतिर्विवर्णत्वमिति ” अर्थात् ज्वरमें श्रम हो, मनका न लगना, देहका विवर्ण इत्यादि लक्षण और जिसमें होनहार रोगारम्भक दोष उन्होंके चिह्न तिसके एक अंशकी प्रतीति हो उसको विशिष्ट प्राग्रूप कहते हैं. जैसे-“ जृंभात्यर्थं समीराणात् ” अर्थात् जम्भाईका आना केवल वातके दोषसे ही है। इसमें होनहार रोग कौन ज्वर, उसका आरंभ कौन वात, उस वातका एक अंश कौन जम्भाई ऐसे और भी जानने चाहिये । इस विशिष्ट पूर्वरूपमें जम्भाई आदि रूप देखकर कदाचित् पूर्वरूपको रूप न समझना चाहिये । क्योंकि यह तो केवल व्याधिके आरम्भक दोषमात्रका सूक्ष्म चिह्न है, इस बातको दृष्टान्त देकर समझाते हैं । दृष्टान्त-जैसे तृणके समूहमें छोटी अग्निकी चिनगारी गिरनेसे धूम ( धुआँ ) मात्र प्रकट देखकर हाथ वस्त्र आदिके मारनेसे ही शान्ति कर सकते हैं, परन्तु जब अग्नि एक साथ जोरसे प्रज्वलित होगई तब शान्त नहीं होसके. ऐसे ही विशिष्ट पूर्वरूपके अल्प होनेसे चिकित्सा करनेसे शांति कर सकते हैं, परन्तु जब रूप होगया तब उसका उपाय नहीं होसकता है। इसीसे पूर्वरूप और रूपमें भेद है । अब कहते हैं-पूर्वरूप और रूप इन दोनोंमें कोई शारीरिक अर्थात् शरीरसे सम्बन्ध रखते हैं और कोई मानसिक अर्थात् मनसे सम्बन्ध रखते हैं । शारीरिक जैसे ज्वरमें मुखका विरस होना, देह भारी, नेत्रोंसे जल गिरना इत्यादिक और मानसिक जैसे मनका एक जगह न लगना और अपने हितकारक वचनोंसे शांति न होना तथा खट्टे चरपरे पदार्थपर मन चलना इत्यादि ॥ व्याधिके रूपके पर्याय शब्द । तदेव व्यक्ततां यातं रूपमित्यभिधीयते । संस्थानं व्यञ्जनं लिङ्गं लक्षणं चिह्नमाकृतिः ॥ ७ ॥ जब पूर्वोक्त प्राग्रूप प्रगट होजाय तब उसको रूप ऐसे कहते हैं और संस्थान, व्यञ्जन, लिंग, लक्षण, चिह्न और आकृति ये छः शब्द रूपके पर्यायवाचीक हैं ॥ अब उपशयके लक्षणको कहते हैं- हेतुव्याधिविपर्य्यस्तविपर्य्यस्तार्थकारिणाम् । CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
( ६ ) माधवनिदान ।
( ६ ) माधवनिदान । औषधान्नविहाराणामुपयोगं सुखावहम् ॥ ८ ॥ विद्यादुपशयं व्याधेः स हि सात्म्यमिति स्मृतः । व्याधेः सुखावहम्, उपयोगम्, उपशयं विद्यात् स सात्म्यम् इति स्मृतः । केषाम् औषधान्नविहाराणाम्, किंभूतानां हेतुव्याधिविपर्यस्तविपर्यस्तार्थकारिणाम् इत्यन्वयः । व्याधेरुपयोगः सुखावहस्तमुपशयं विद्यात् जानीयात् । उपयुज्यत इति उप- योगः सेवनं सुखमावहति सम्यगनुबन्धेन सुखमुत्पादयतीति सुखावहः, केषामुपयोगः औषधान्नविहाराणाम्, औषधं चान्नं च विहारश्चौषधान्नविहारास्तेषाम्, औषधं हरी- तक्यादि, अन्नं रक्तशाल्यादि, विहारो देहमनोनिर्वर्तितचेष्टाविशेषः,किंभूतानाम् औष- धान्नविहाराणां हेतुव्याधिविपर्यस्तविपर्यस्तार्थकारिणाम्, हेतुर्बाह्य आभ्यन्तरश्च व्याधिर्ज्वरादिः हेतुश्च व्याधिश्च हेतुव्याधी तयोर्व्यस्तसमस्तयोः विपर्यस्ता व्याधि- निदानयोर्विपरीताः तथा विपर्यस्तानाम् अर्थो विपर्यस्तार्थः तयोर्व्यस्तसमस्तयोरेव विपरीतमर्थं कुर्वन्तीति विपर्यस्तार्थकारिणः हेतुव्याधिविपर्यस्ताश्च विपर्यस्तार्थकारिणश्च हेतुव्याधिविपर्यस्तविपर्यस्तार्थकारिणः, तेषां हेतुव्याधिविपर्यस्तविपर्यस्तार्थकारिणाम् । तदायमर्थः,-निदानरोगयोर्व्यस्तसमस्तयोर्विपरीता अपि कारणरूपा इव भासमाना व्याधिरूपा इव भासमाना हेतुव्याधिविपरीतानाम् अर्थं व्याध्युपशमलक्षणं कुर्वन्तीति । यथा । हेतुविपरीतैः औषधान्नविहारैर्व्याध्युपशयः क्रियते प्रतिपक्षत्वात् एवं विपर्य- स्ताश्चिपर्यस्तार्थकारिभिरपीत्यर्थः । तत्र चोपशमानामष्टादश भेदा भवन्ति । तान् वर्ण- यति यथा-हेतुविपरीतमौषधं हेतुविपरीतमन्रं हेतुविपरीतो विहारः । यथेमे त्रयो भेदा एवमेव सर्वत्र । तथा च हेतुविपरीतानां व्याधिविपरीतानां हेतुव्याधिविपरीतानां हेतुविपरीतार्थकारिणां व्याधिविपरीतार्थकारिणां हेतुव्याधिविपरीतार्थकारिणाम् औष- धान्नविहाराणां यः सुखावह उपयोगः स उपशय इति पिण्डार्थः । अथैषां क्रमेणो- दाहरणानि भाषायां वेदितव्यानि ॥ हेतुविपरीत व्याधिविपरीत हेतुव्याधिविपरीत हेतुविपर्यस्तार्थकारी व्याधिविपर्य- स्तार्थकारी हेतुव्याधिविपर्यस्तार्थकारी ऐसे जो औषध अन्न (पथ्य) विहार (आचरण) इनका सेवन सुखकारक जानना उसको व्याधिका उपशय कहते हैं, इसका तात्पर्य यह है कि रोग और रोगका हेतु इनको सुखकारक जो औषधि पथ्य आचरणरूप प्रयोग उसको उपशय कहते हैं और व्याधिसात्म्य ये पर्यायवाचक नाम उसी उप- शयके हैं। सुखकारकके कहनेसे यह प्रयोजन है कि दाह और प्यासयुक्त नवीन ज्वरमें शीतलजलका पीना व्याधिका बढानेवाला है इससे शीतलजल सुखकर्ता न भया अतएव CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
भाषाटीकासमेत । (७) शीतल जलको उपशय न समझना चाहिये परंतु दाहयुक्त प्यासमें शीतलजल उपशय मानाजायगा क्योंकि सुखकारक है ॥ आगे अब क्रमसे उदाहरण लिखते हैं-
| नाम | औषधि | अन्न | विहार |
|---|---|---|---|
| हेतुविपरीत | शीतज्वरमें गरम औषधि सोंठ | श्रम और बादीस प्रगट रोगपर मांसके रस और भात. | दिनके सोनेसे प्रगट कफरोगपर विपरीत आचरण रातमें जागना. |
| व्याधिविपरीत | अतिसारमें दस्त बन्द करनेवाली औषधि पाठा, आदि | दस्तोंमें दस्तके बन्द कारक पथ्य मसूर. | उदावर्तरोगमें शब्दपूर्वक अधोवायुका निकसना, मन्त्र आषधि धारण, देव गुरूकी सेवा करनी. |
| हेतुव्याधिविपरीत | वातकी सूजनमें दशमूलका काढा वात और सूजन दोनोंको दूर करनेवाला है. | कफकी संग्रहणीमें छाछका पीना वातनाशक कफनाशक और संग्रहणी नाशक है. | स्निग्ध जो दिनके सोनेसे उत्पन्न तन्द्रा तिसमें रूक्ष तन्द्रासे विपरीत स्निग्धतानाशक रात्रिमें जागना. |
| हेतुविपर्यस्तार्थकारी | जैसे पित्त प्रधान व्रण सूजनमें पित्तकारक उष्ण पिण्डाकी बांधना. | पित्तकी सूजनमें दाहकारक अन्नका भोजन करना. | जैसे वातसे पैदा उन्मादमें वासका देना. |
| व्याधिविपर्यस्तार्थकारी | जैसे कफरोगमें वमन कारक मैनफल आदि. | अतिसार रोगमें दस्तकारक दुग्ध देना. | छर्दिरोगमें हाथका अगूठा गलेमें करवा कमलनाल आदिसे उलटीका लाना. |
| हेतुव्याधिविपर्यस्तार्थकारी | जैसे अग्नि जलेपर गरम अगर लेप आदि अथवा विष पर विष. | जैसे मद्यपानके करनेसे प्रगट मदात्ययरोगमें मदकारक फिर मद्य पीना. | दंड कसरतसे प्रगट वातमें जलका तैरनारूप व्यायामका करना. |
हेतुविपरीत औषध-जैसे शीतकफज्वरमें सोंठ, तो इसमें प्रथम समझना चाहिये कि, यहां हेतु कौन है कि, सर्दी उसका शीतल धर्म है तो अब शीत कफ यह कब शान्त होय कि, जब सर्दी और कफसे विपरीत औषध मिले ऐसी औषध कौन कि, शुंठी यह सर्दीको और कफ दोनोंको शान्त करती है तो शीतकफज्वरमें हेतुविपरीत
( ८ ) माधवनिदान ।
( ८ ) माधवनिदान । औषध सोंठ हुई ऐसे ही हेतुविपरीत अन्न जैसे श्रम और वातसे प्रगट ज्वरोंमें मांसका रस और चावल इसमें हेतु कौन कि, श्रम और वात ये कब शान्त होंय कि, श्रम और वात हरणकर्त्ता पथ्य मिलै ऐसा पथ्य कौन कि, मांसरस और चावलोंका भात ये श्रम और वातके विपरीत हैं अर्थात् नाशक हैं ऐसे ही हेतुविपरीतविहार कहिये आचरण कौन जैसे दिनके सोनेसे प्रगट कफपर रातमें जागना, यहां हेतु कौन भया कि, दिनका सोना उसके प्रगट दोष कौन कि कफ, यह कफ कब शान्त होय कि, जिस हेतुसे प्रगट भया उस हेतुसे विपरीत आचरण करा जाय तो दिनके सोनेपर उलटा आचरण कौन कि, रातमें जागना, तो यह हेतुविपरीत आचरण भया । इसी प्रकार और उदाहरण व्याधिविपरीत आदिके लिखे हुए चक्रके अनुसार बुद्धिमान् मनुष्य समझ लेवेंगे ॥ अनुपशयके लक्षण । विपरीतोऽनुपशयो व्याध्यसात्म्यमिति स्मृतः ॥ ९ ॥ जो उपशयके लक्षण कहे हैं उससे विपरीत लक्षण अनुपशयके हैं और व्याधिका असात्म्य अर्थात् असमान नाम उसी अनुपशयका पर्यायवाचक शब्द है ॥ सम्प्राप्तिके लक्षण । यथा दुष्टेन दोषेण यथा चानुविसर्पता । निवृत्तिरामयस्याऽसौ सम्प्राप्तिर्जातिरागतिः ॥ १० ॥ दोष कहिये वात पित्त कफ इनका दुष्ट होना नाम कुपित होना अनेक प्रका- रका है अर्थात् स्वकारण या दूसरेके कारण करके ऐसे कुपित दोष अपने स्थानको छोड़कर देहमें ऊपर नीचे तिरछे विचरते हैं उस विचरनेसे जो रोग प्रगट हो उसको सम्प्राप्ति कहते हैं और जाति तथा आगति ये दोनों पर्यायवाचक नाम उसी सम्प्रा- प्तिकें हैं । तात्पर्यार्थ यह है कि, मनुष्यके देहमें वात पित्त कफ ये सम्पूर्ण दोष बढकर जैसे रोगको प्रगट करें तैसे ही उसको सम्प्राप्ति कहते हैं । उदाहरण-जैसे कुपितदोषोंका आमाशयमें प्रवेश होनेसे और स्थानमें इतस्ततो गमन करनेसे तथा रसकी बहनेवाली नाडियोंके मार्गोंको रोकनेसे और पक्वाशयमें रहनेवाली अग्निको बाहर निकालनेसे तथा उसी जठर अग्निसे सर्व देहके तप्त होनेसे यह ज्वर है, ऐसा जो निश्चय कह्या जाय है उसीको सम्प्राप्ति कहते हैं, ऐसे ही अतिसारादि रोगोंकी सम्प्राप्ति जाननी चाहिये ॥ सम्प्राप्तिके भेद । संख्याविकल्पप्राधान्यबलकालविशेषतः । अब सम्प्राप्तिके भेद कहते हैं सो कहिये सो सम्प्राप्ति संख्यादि विशेषण पांच प्रकारकी है जैसे-१ संख्या, २ विकल्प, ३ प्राधान्य, ४ बल, ५ काल इति ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
विकल्परूप संप्राप्तिके लक्षण ।
भाषाटीकासमेत । (९) संख्यारूप सम्प्राप्तिके लक्षण । सा भिद्यते यथात्रैव वक्ष्यन्तेऽष्टौ ज्वरा इति ॥ ११ ॥ जैसे इसी ग्रन्थमें आगे आठ प्रकारका ज्वर पांच प्रकारकी खांसी अर्थात् रोगोंकी गणनाको ही संख्यारूप सम्प्राप्ति कहते हैं ॥ विकल्परूप संप्राप्तिके लक्षण । दोषाणां समवेतानां विकल्पोऽंशांशकल्पना । मिले हुए दोष कहिये वात पित्त कफ इनके अंशांशका अनुमान करना उसका विकल्परूपसम्प्राप्ति कहते हैं, जैसे-धुआँके निकलनेसे यह पर्वत अग्निवाला है ऐसेही यह रोगीके देहमें वातका अंश विशेष है, काहेसे कि, वातके अंश विशेष मिलनेसे इसी अनुमानको विकल्पसंप्राप्ति कहते हैं । उदाहरण-जैसे रूखी शीतल हलकी और फैलानेवाली इत्यादि गुणयुक्त जो पवन उसका रूक्ष आदि गुणयुक्त कसैला रस वातको सर्वांश करके बढानेवाला है, ऐसेही कटुरस सर्व भाव करके पित्तको बढा- नेवाला है अर्थात् कटु, उष्ण, तीक्ष्णत्व करके हींग पित्तको बढानेवाली है ऐसेही मधुररस, जैसे भैंसका दूध यह सर्व भावकरके कफ बढानेवाली है इत्यादि । इसमें “दोषाणां” जो बहुवचन है सो दोषोंके पृथक् पृथक् ग्रहणके वास्ते है और “सम- वेतानाम्” यह पद जो है सो द्वंदूज और सन्निपातके ग्रहणनिमित्त धरा है ॥ प्राधान्यरूपसंप्राप्तिके लक्षण । स्वातंत्र्यपारतंत्र्याभ्यां व्याधेः प्राधान्यमादिशेत् ॥ १२ ॥ व्याधेः स्वातंत्र्येण च पुनः पारतंत्र्येण प्राधान्यम् आदिशेत् अप्राधान्यं चेति शेष इत्यन्वयः ॥ व्याधिके स्वतन्त्रता और परतन्त्रता करके प्रधानता और अप्रधानता कही है जैसे स्वतन्त्र ज्वरको प्रधानता है और ज्वराधीन श्वास आदि रोगोंको अप्रधानता है अर्थात् व्याधिकी स्वतंत्रतासे प्रधानता और परतंत्रतासे अप्रधानता जाननी चाहिये ॥ बलरूपसंप्राप्तिके लक्षण । हेत्वादिकात्स्न्र्यावयवैर्बलाबलविशेषणम् । अत्रापि व्याधेरित्यनुवर्तते । हेत्वादीनां हेतुपूर्वरूपरूपाणां कात्स्न्र्येन साकल्येन अवयवैरेकदेशैर्बलाबलयोर्विशेषणं विशेषावबोधः इत्यन्वयः । हेतु आदिशब्दोंसे हेतु, पूर्वरूप और रूप इनके सर्व अवयव ( लक्षण ) मिल- नेसे व्याधिको बलवान् जानना और थोडे लक्षण मिलनेसे निर्बल जानना; जैसे रोगके प्रति जो निदान कहा है वह निदान सम्पूर्ण रोगोंको उत्पन्न करनेवाला है कि एकदेश, ऐसे ही पूर्वरूप भी समस्त अवयवों करिके व्याधिका प्रकाशित है यह एकदेशसे इत्यादि ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
( १० ) माधवनिदान ।
( १० ) माधवनिदान । कालरूपसंप्राप्तिके लक्षण । नक्तंदिनर्तुभुक्तांशैर्व्याधिकालो यथामलम् ॥ १३ ॥ नक्त ( रात्री ) दिन ( दिवस ) ऋतु ( वसन्तादि ) भुक्त ( आहार ) इनका अंश कहिये एकदेश उसको यथादोष ( वात, पित्त, कफ ) के अनुसार व्याधिका काल अर्थात् रोगके घटने बढनेके हेतुका समय जाने । उदाहरण-दिखाते हैं जैसे- रात्रिके तीन भाग करे प्रथम, मध्य और अन्त्य; ता रात्रिका प्रथमभाग कफका है, मध्यभाग पित्तका, अन्त्यभाग वातका है। ऐसेही दिनके भी तीन भाग करे तो पूर्वाह्न कफका, मध्याह्न पित्तका, अपराह्न वातका है। ऐसे ही ऋतु जैसे वसंत- ऋतुमें कफ, शरदऋतुमें पित्त और वर्षामें वात कुपित होता है । ऐसे ही भोजनका जैसे भोजन करनेके समय कफका काल और अन्नके पचनेके समय पित्तका काल और जब भले प्रकार परिपक्व होगया तब वातका काल. इसके जाननेसे यह प्रयोजन है कि जिसे दोष ( वात, पित्त, कफ ) का जो काल कहा है उसका उसी उसी कालमें जान लेना कठिन मालूम नहीं होता ॥ निदानपंचकका उपसंहार । इति प्रोक्तो निदानार्थः स व्यासेनोपदेक्ष्यते ॥ १४ ॥ इति कहिये यह संक्षेप प्रकारसे जो निदानार्थ कहा उसे विस्तारपूर्वक प्रतिरोगके निदान पूर्वरूपादि करके कहेंगे ॥ सर्वेषामेव रोगाणां निदानं कुपिता मलाः । तत्प्रकोपस्य तु प्रोक्तं विविधाहितसेवनम् ॥ १५ ॥ अब पूर्व चतुर्थ श्लोककी व्याख्यामें कहे निदानके दो भेद कौन संनिकृष्ट और विप्रकृष्ट, तिसमें संनिकृष्ट कौन वातादिक समीपके कारण करके सर्व रोगोंका कारण हैं सो कहते हैं- “सर्वेषामिति” कुपित भये जो मल ( वात, पित्त, कफ ) ये सम्पूर्ण रोगोंके कारण होते हैं और उन वात, पित्त, कफ दोषोंके कोपका कारण अनेक प्रकारका जो अपथ्यसेवन करना ही है ॥ निदानार्थकरो रोगो रोगस्याप्युपजायते । तद्यथा ज्वरसन्तापाद्रक्तपित्तमुदीर्यते ॥ १६ ॥ १ केचन ऋत्वंशाः कतिपयाहोरात्राणि कथयंति । यदुक्तं वाग्भटे-“ऋतवोरित्यादि सप्ताहा- वृतुसन्धिरिति स्मृतः । ” २ यदाह चरकः-“ नास्ति रोगो विना दोषैर्यस्मात्तस्माद्विचक्षणः । अनुक्तमपि दोषाणां लिंगैर्व्याधिमुपाचरेत् ॥” मलिनीकरणान्मला वातपित्तकफाः ॥
भाषाटीकासमेत । ( ११ ) रक्तपित्ताज्ज्वरस्ताभ्यां श्वासश्चाप्युपजायते । प्लीहाभिवृद्ध्या जठरं जठराच्छोफ एव च ॥ १७ ॥ अर्शोभ्यो जाठरं दुःखं गुल्मश्चाप्युपजायते । ( दिवास्वापादिदोषैश्च प्रतिश्यायश्च जायते । ) प्रतिश्यायादथो कासः कासात्संजायते क्षयः ॥ १८ ॥ क्षयो रोगस्य हेतुत्वे शोषस्याप्युपजायते । कोई प्रश्न करे कि, जो पूर्व कह आये हैं यह ही निदान है अथवा इसके व्यति- रिक्त और, इसलिये कहते हैं रोगका रोग भी निदान होता है अर्थात् जो निदानसे कार्य होता है वह ही रोगसे भी होता है. इसवास्ते दृष्टांत देकर कहते हैं-“तद्यथेति” जैसे ज्वरसन्तापसे रक्तपित्त प्रगट होता है और रक्तपित्तसे ज्वर और रक्तपित्त- ज्वरसे श्वास प्रगट होता है और प्लीहाके बढनेसे जैसे उदररोग और उदररोगसे सूजन और बवासीरसे जैसे उदररोग और गुल्म ( गोला ) रोग, दिनमें सोने आदि- कोंसे जुकाम होता है और जुकामसे खांसी तथा खांसीसे ओजप्रभृति धातुओंका क्षय होता है, यह क्षयरोग ( राजयक्ष्मा ) सम्पूर्ण रोगोंमें राजा है इसको प्रगट करते हैं ॥ ते पूर्वं केवला रोगाः पश्चाद्धेत्वर्थकारिणः ॥ १९ ॥ वे रोग प्रथम स्वतन्त्र होते हैं और पीछे जब बल मिलगया तो वेही हेत्वर्थकारी अर्थात् रोगके उत्पन्न करनेवाले होते हैं जैसे ज्वरसे रक्तपित्त होता है ॥ कश्चिद्धि रोगो रोगस्य हेतुर्भूत्वा प्रशाम्यति । न प्रशाम्यति चाप्यन्यो हेत्वर्थं कुरुतेऽपि च ॥ एवं कृच्छ्रतमा नृणां दृश्यन्ते व्याधिसङ्कराः ॥ २० ॥ अब उसी रोग उत्पन्न करनेवाली व्याधिकी विचित्रता दिखाते हैं, जैसे कोई एक रोग दूसरेका कारण हो अर्थात् दूसरे रोगको प्रगट कर आप शांत हो जाता है जैसे ज्वरके सन्तापसे रक्तपित्त होता है उस समय ज्वर दूर होजाय और रक्त- पित्त रह जावे और कोई रोग दूसरे रोगको प्रगट कर आप जैसाका तैसा बना रहता है जैसे बवासीर नहीं जाय और गुल्म तथा उदररोग पैदा होते हैं । इस प्रकार मनुष्योंके घोर क्लेशदायक मिलेहुए रोग देखनेमें आते हैं । विशेष करके चिकित्सा विरुद्ध होनेसे ये रोग कृच्छ्रतम होते हैं ॥
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( १२ ) माधवनिदान ।
( १२ ) माधवनिदान । अब कहे हुए निदानादिपंचकद्वारा रोगनिवृत्तिरूप सिद्धिको इच्छा करके अवश्य जानने योग्य कहते हैं- तस्माद्यत्नेन सद्द्वैद्यैरिच्छद्भिः सिद्धिमूत्तमाम् । ज्ञातव्यो वक्ष्यते योऽयं ज्वरादीनां विनिश्चयः ॥ २१ ॥ “तस्मात्” इति । इसी कारण उत्तम सिद्धि हमको प्राप्त हो ऐसी जिन सद्द्वैद्योंकी इच्छा है उनको ज्वरादिरोगोंका निदान जो आगे कहते हैं वह यत्नसे जानना चाहिये॥ इति श्रीमाधवभावार्थदीपिकायां माधुरीटीकायां सर्वरोगनिदानादि- पंचककथनं समाप्तम् ॥ १ ॥ ज्वरनिदानम् । अब सर्व देहके रोगोंमें प्रथम प्रगट होनेसे बली, देह इन्द्रिय मनको तपायमान करनेसे, जन्म मरणका कारण होनेसे, स्थावर जंगम प्राणियोंमें स्थिति होनेसे सम्पूर्ण शरीरके रोगोंमें चरक, सुश्रुतादि आचार्योंने ज्वरको राजा कहा है । तदुक्तं चरके- देहेन्द्रियमनस्तापी सर्वरोगाग्रजो बली । ज्वरः प्रधानो रोगाणामुक्तो भगवता पुरा ॥ १ ॥ देह इन्द्रिय मनको तपायमान करनेसे, रोगोंमें प्रथम प्रगट होनेसे बलवान् ज्वरके सब रोगोंमें प्रधानता है ॥ ज्वरकी उत्पत्ति । दक्षापमानसंक्रुद्धरुद्रनिश्वाससम्भवः । ज्वरोऽष्टधा पृथग्द्वन्द्वसंघातागन्तुजः स्मृतः ॥ २ ॥ दक्षप्रजापतिकृत तिरस्कारसे क्रोधित श्रीरुद्र भगवान्के श्वाससे उत्पन्न जो १ ज्वरयति शरीराणीति ज्वरः नान्ये व्याधयस्तथा दारुणा बहूपद्रवाः दुश्चिकित्स्याश्च यथा- ऽयम्, स सर्वरोगाधिपतिर्नानातिर्यग्योनिषु च बहुविधैः शब्दैः श्रूयते । यथा-“पाकः स तु नागानामभितापश्च वाजिनाम् । गवामीश्वरसंज्ञश्च मानवानां ज्वरो मतः।।अजावीनां प्रलापाख्यः करभे चालसो भवेत् । हरिद्रो महिषाणां च मृगरागा मृगेषु च॥पक्षिणामभिघातस्तु मत्स्येष्विा न्द्रमदो मतः । पक्षपातः पतंगानां व्यालेष्वाक्षिकसंज्ञकः ॥ इत्यादि” सर्वप्राणभृतश्च सज्ज्वर- एव जायन्ते सज्ज्वरा एव म्रियन्ते । अतः सर्वरोगप्रगण्यत्वाज्ज्वर एव प्रागभिहितः ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
भाषाटीकासमेत। ( १३ ) ज्वर सो आठ प्रकारका है-वात, पित्त, कफ इनसे ३, द्वंद्वज ३ सन्निपात १ और आगंतुज १ ऐसे मिलकर संक्षेपसे ज्वर आठ प्रकारका है ॥ इस श्लोकमें-“ निःश्वाससम्भव ” यह जो पद धरा है सो श्वास यहां क्रोधके लक्षण करके कहा है किन्तु ज्वरकी श्वाससे उत्पत्ति नहीं है क्योंकि, जैसे सुश्रुतमें लिखा है यथा-“ रुद्रकोपाग्निसंभूतः सर्वभूतप्रतापनः” इति । अर्थात् क्रोधित रुद्रनें ललाटस्थ तीसरे अग्निमय चक्षु ( नेत्र ) को स्पर्श कर आग्नेयबाण निर्माण किया । तथा च चरके-“ स्पृष्ट्वा ललाटे चक्षुर्वै दग्ध्वा तानसुरान्प्रभुः । बाणं क्रोधाग्निसंतप्त- मसृजच्छत्रुनाशनम्॥” इत्यादिक वाक्योंसे ज्वरमात्रकी पित्तप्रकृति जाननी, प्रयोजन यह है कि सर्वज्वरमें पित्तकी विरोधी क्रिया न करे। सो वाग्भटने कहा है यथा-“ऊष्मा पित्तादृते नास्ति नात्युष्माणं विना ज्वरः । तस्मात्पित्तविरुद्धानि त्यजेत्पित्ताधिके- ऽधिकम् ॥ ” इति । अर्थात् गरमी पित्तके विना नहीं होती और ज्वर गरमीके विना नहीं होता इसीसे ज्वरमें पित्तविरुद्ध क्रिया न करे और पित्तज्वरमें विशेषकरके पित्तविरुद्ध क्रिया त्याज्य है । अन्य आचार्य कहते हैं कि-श्रीरुद्रसे उत्पत्ति होनेसें ज्वर देवता है इस लिये ज्वरका पूजन करनेसे शांत होता है, जैसे विदेहका वाक्य है-“ज्वरस्तु पूजनैर्वापि सहसैवोपशाम्यति ” और ज्वरका स्वरूप भी हरिवंशमें लिखा है यथा-“ ज्वरस्त्रिपादस्त्रिशिराः षड्भुजो नवलोचनः । भस्मप्रहरणो रौद्रः कालान्तक- यमोपमः ॥ ” इति । अर्थात् ज्वरके तीन चरण, तीन मस्तक, छः भुजा, नव नेत्र, भस्मयुक्त देह, रौद्र, कालका भी काल और यमराजके समान है ॥ ज्वरकी सम्प्राप्ति । मिथ्याहारविहाराभ्यां दोषा ह्यामाशयाश्रयाः । बहिर्निरस्य कोष्ठाग्निं ज्वरदाः स्यू रसानुगाः ॥ ३ ॥ मिथ्या आहार ( देश काल प्रकृति आदिसे विरुद्ध और संयोगविरुद्ध भोजन ) जो दोष ( वात, पित्त, कफ ) सो नाभिस्तनके बीच आमाशयमें प्राप्त हों रसको मिथ्याविहार ( देहके पुरुषार्थसे विशेष कामका करना ) इन कारणोंसे दुष्ट हुए बिगाडकर और कोष्ठस्थानमें रहती हुई जो अग्नि उसको देहके बाहर निकाल करके प्रगट करनेवाले होते हैं ॥ यह सम्प्राप्ति शरीररोगोंकी है आगन्तुजकी नहीं है, क्योंकि, आगन्तुज रोगोंका १-अकाले चातिमात्रं च असात्म्यं यच्च भोजनम् । विषमाशनं च यद्भूक्तं मिथ्याहारःस उच्यते॥ २-अशक्तः कुरुते कर्म शक्तिमात्रं करोति वा।मिथ्याविहारमित्युक्तं सदा चैव विवर्जयेत् ॥ ३-नाभिस्तनान्तरं जन्तोरामाशय इति स्मृतः ॥