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माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation

माधवकर द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished404 पृष्ठ

भाषाटीकासमेत । ( १६३ ) आमवातका विशेष लक्षण । पित्तात्सदाहरागं च सशूलं पवनानुगम् । स्तैमित्यं गुरु कण्डूकं कफजुष्टं तमादिशेत् ॥ १२ ॥ पित्तसे जो आमवात होय उसमें दाह और लाल रंग होय है। वादीके आम- वातमें शूल होय है। कफसम्बन्धी आमवातमें देहमें आर्द्रता ( गीला ) और भारीपन तथा खुजली चले है ॥ साध्यासाध्यविचार । एकदोषानुगः साध्यो द्विदोषो याप्य उच्यते । सर्वदेहचरः शोथः स कृच्छ्रः सान्निपातिकः ॥ १३ ॥ एक दोषका आमवातरोग साध्य है, दो दोषोंका याप्य है और सर्वदेह विचरने- वाली सूजन अथवा त्रिदोषसे प्रगट आमवातरोग कष्टसाध्य जानना ॥ इति श्रीपण्डितदत्तराममाथुरप्रणीतमाधवार्थबोधिनीमाथुरीभाषाटीकायाम् आमवातनिदानं समाप्तम् ॥ अथ शूलनिदानम् । ඞ——𑁍——ඞ दोषैः पृथक्समस्तामद्वन्द्वैः शूलोऽष्टधा भवेत् । सर्वेष्वेतेषु शूलेषु प्रायेण पवनः प्रभुः ॥ १ ॥ वात, पित्त, कफ इनसे तीन प्रकारका, एक सन्निपातसे, एक आमसे और तीन द्वन्द्वज ऐसे सब मिलकर आठ प्रकारका शूलरोग है। इन सब शूलोंमें वादीका शूल प्रबल है। ज्वरके समान शूलरोगकी प्रथम उत्पत्ति हारीतमें कही है, सो इस प्रकार- कामदेवके नाश करनेके अर्थ शिवने क्रोधसे त्रिशूलको फेंका, उस त्रिशूलको अपने सन्मुख आता हुआ देख कामदेव भयभीत होकर विष्णु भगवान्‌के देहमें प्रवेश करगया । तदनन्तर वह त्रिशूल विष्णुकी हुंकारसे मूर्च्छित होकर गिरा तो पृथ्वीमें शूल इस नामसे प्रसिद्ध भया। तबसे वह शूल पञ्चभूतात्मकदेहधारी मनुष्योंको पीडा करने लगा। इस प्रकार इसकी उत्पत्ति है । शिवके त्रिशूलसे उत्पन्न भया तथा शूलके घावके समान पीडा करे है इसीसे इसको शूल कहते हैं ॥ १ अनंगनाशाय हरस्त्रिशूलं मुमोच कोपान्मकरध्वजश्च । तमापतन्तं सहसा निरीक्ष्य भया- र्दितो विष्णुतनूं प्रविष्टः ॥ स विष्णुहुंकारविमोहितात्मा पपात भूमौ प्रथितः स शूलः । स पञ्च- भूतानुगतः शरीरं प्रदूषयत्यस्य हि पूर्वसृष्टिः ॥

( १६४ ) माधवनिदान ।

( १६४ ) माधवनिदान । वातशूलके कारण और लक्षण । व्यायामयानादतिमैथुनाच्च प्रजागराच्छीतजलातिपानात् । कलायमुद्गाढकिकोरदूषादत्यर्थरूक्षाध्यशनाभिघातात् ॥ २ ॥ कषायतिक्तादिविरूढजान्नविरुद्धवल्लूरकशुष्कशाकात् । विट्शुक्रमूत्रानिलवेगरोधाच्छोकोपवासादातिहास्यभाषात् ॥ ३ ॥ वायुः प्रवृद्धो जनयेद्धि शूलं हृत्पार्श्वपृष्ठत्रिकबस्तिदेशे । जीर्णे प्रदोषे च घनागमे च शीते च कोपं समुपैति गाढम् ॥ ४ ॥ मुहुर्मुहुश्चोपशमप्रकोपौ विण्मूत्रसंस्तम्भनतोदभेदैः । संस्वेदनाभ्यञ्जनमर्दनाद्यैः स्निग्धोष्णभोज्यैश्च शमं प्रयाति ॥ ५ ॥ दंडकसरत, बहुत चलना, अतिमैथुन, अत्यन्त जागना, बहुत शीतल जल पीना, मटर, मूंग, अरहर, कोदों अत्यन्त रूखे पदार्थके सेवनसे और अध्यशन ( भोजनके ऊपर भोजन ), लकडी आदिके लगनेसे, कसैली, कडवी, भीगा अन्न जिसमें अंकुर निकस आये हों, विरुद्ध क्षीर-मछली आदि, सूखा मांस, सूखा शाक ( कचरिया आदि) इनके सेवन करनेसे, मल, मूत्र, शुक्र और अधोवायु इनके वेगको रोकनेसे, शोकसे, उपवास ( व्रत ) के करनेसे, अत्यन्त हँसनेसे, बहुत बोलनेसे कोपको प्राप्त भई जो वात सो बढकर हृदय पसवाडा पीठ त्रिकस्थान और मूत्रस्थानमें शूलको करे और वह भोजन पचनेके पीछे प्रदोषकालमें, वर्षाकालमें, शीतकालमें इन दिनोंमें शूल अत्यन्त कोप करे और बारंबार कोप होय, मल मूत्रका अवरोध, पीडा और भेद ये लक्षण वातशूलके हैं तथा स्वेदन और अभ्यं- जन तथा मर्दन इत्यादिकसे और चिकने गरम अन्नसे यह शूल शांत होता है ॥ पित्तशूलके कारण और लक्षण । क्षारातितीक्ष्णोष्णविदाहितैलनिष्पावपिण्याककुलित्थयूषैः । कट्वम्लसौवीरसुराविकारैः क्रोधानलायासरविप्रतापैः ॥ ६ ॥ ग्राम्यातियोगादशनैर्विदग्धैः पित्तं प्रकुप्याशु करोति शूलम् । तृण्मोहदाहार्तिकरं हि नाभ्यां संस्वेदमूर्च्छाभ्रमशोषयुक्तम् ॥७॥ मध्यंदिने कुप्यति चार्धरात्रे विदाहकाले जलदात्यये च ॥ शीते तु शीतैः समुपैति शान्तिं सुस्वादुशीतैरपि भोजनैश्च ॥८॥

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भाषाटीकासमेत। ( १६५ ) यवक्षार आदि खार, मिरच आदि तीखी और गरम, विदाहकारक, बांस और करील आदि, तेल, सिंबी, खल, कुलथी, यूष, कडुआ, खट्टा, सौवीर ( कांजी ), सुराविकार ( मद्यविशेष ), क्रोधसे, अग्निके समीप रहना, परिश्रम, सूर्यकी तीव्र धूपमें डोलना, अतिमैथुन करना, विदाहकारक अन्न आदि इन कारणोंसे पित्त कुपित होकर नाभिस्थानमें शूल उत्पन्न करता है। वह शूल तृषा, मोह, दाह, पीडा इनको करे और पसीना, मूर्च्छा, भ्रम, शोष इनको करे, दोपहरके समय, मध्यरात्रिमें, अन्नके विदाहकालमें, शरत्कालमें शूल अधिक होय। शीतकालमें शीतल पदार्थसे और अत्यन्त मधुर मीठे शीतल अन्नसे यह शूल शांत होता है॥ कफशूलके कारण और लक्षण। आनूपवारिजकिलाटपयोविकारैर्मांसेक्षुपिष्टकृशरातिलशष्कु- लीभिः। अन्यैर्बलासजननैरपि हेतुभिश्च श्लेष्मा प्रकोपमुप- गम्य करोति शूलम्॥ ९॥ हृल्लासकाससदनारुचिसंप्रसेकै- रामाशये स्तिमितकोष्ठशिरोगुरुत्वैः। भुक्ते सदैव हि रुजं कुरुतेऽतिमात्रं सूर्योदये च शिशिरे कुसुमागमे च॥ १०॥ जलके समीप रहनेवाले पक्षियोंका मांस, मछली आदिका मांस, दही वृत मक्खन आदि दूधके विकार, मांस, ईखका रस, पिसा अन्न उडदकी पिठ्ठी वगै- रह, खिचडी, तिल, पूरी, कचौडी आदि और कफकारकपदार्थ खानेसे कफ कुपित होकर आमाशयमें शूलरोगको प्रगट करे। उसमें सूखी रूह, खांसी, ग्लानि, अरुचि, मुखसे लार गिरे, बद्धकोष्ठता, मस्तक भारी हो ये लक्षण होयँ। भोजन करते समय पीडा होय, सूर्योदयके समय, शिशिरऋतुमें और वसन्तकालमें शूल बहुत होय॥ सन्निपातशूलके लक्षण। सर्वेषु दोषेषु च सर्वलिङ्गं विद्याद्भिषक् सर्वभवं हि शूलम्। सुकष्टमेनं विषवज्रकल्पं विवर्जनीयं प्रवदन्ति तज्ज्ञाः॥ ११॥ सम्पूर्ण दोषोंके कोप होनेमें वात पित्त कफ तीनों शूलके लक्षण होते हैं उसीको सन्निपातका शूल कहते हैं। यह बडा दुःखदायक है, विष और वज्रके तुल्य है, इसको विद्वान् असाध्य कहते हैं॥ आमशूलके लक्षण। आटोपहल्लासवमीगुरुत्वस्तैमित्यमानाहकफप्रसेकैः। कफस्य लिङ्गेन समानलिङ्गमामोद्भवं शूलमुदाहरन्ति॥ १२॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

( १६६ ) माधवनिदान ।

( १६६ ) माधवनिदान । पेटमें गुडगुड़ाहट होय, उबकाइयोंका आना, दह, देह भारी, मन्दता, अफरा, मुखसे कफका स्राव इन लक्षणोंसे तथा कफशूल लक्षणोंके समान ऐसे शूलको आमशूल कहते हैं ॥ द्वन्द्वजशूलोंके लक्षण । बस्तौ हृत्कण्ठपार्श्वेषु स शूलः कफवातिकः । कुक्षौ हृन्नाभि- पार्श्वेषु स शूलः कफपैत्तिकः ॥ १३ ॥ दाहज्वरकरो घोरो विज्ञेयो वातपैत्तिकः । एकदोषोत्थितः साध्यः कृच्छ्रसाध्यो द्विदोषजः ॥ सर्वदोषोत्थितो घोरस्त्वसाध्यो भूर्युपद्रवः ॥ १४ ॥ वस्ति ( मूत्रस्थान ), हृदय, कण्ठ, पसवाडे इन ठिकाने शूल होय वह ( कफ- वातिक ) जानना. कूख हृदय नाभि और पसवाडे इनमें कफपित्तका शूल होय है, दाहज्वर करनेवाला ऐसा भयंकर शूल होय वह वातपित्तका जानना । एक दोषका शूलरोग साध्य है, दो दोषोंका कृच्छ्रसाध्य और तीनों दोषोंका भयंकर और बहुत उपद्रवयुक्त होय वह शूल असाध्य जानना ॥ ग्रन्थांतरोक्तशूलके स्थान । वातात्मकं बस्तिगतं वदन्ति पित्तात्मकं चापि वदन्ति नाभ्याम् । हृत्पार्श्वकुक्षौ कफसन्निदिष्टं सर्वेषु देशेषु च सन्निपातात् ॥ १ ॥ वातका शूल बस्तिमें होता है, पित्तका नाभिमें, कफका हृदय पसवाडा कोखमें, सन्निपातका सब जगह होता है ॥ शूलके उपद्रव । वेदना च तृषा मूर्च्छा आनाहो गौरवारुची । कासश्वासौ च हिक्का च शूलस्योपद्रवाः स्मृताः ॥ २ ॥ वेदना, तृषा, मूर्च्छा, अफरा, गुरुता, अरुचि, कास, श्वास और हिचकी ये शूलके उपद्रव जानने ॥ परिणामशूलनिदान । स्वैर्निदानैः प्रकुपितो वायुः सन्निहितस्तथा। कफपित्ते समा- वृत्य शूलकारी भवेद्वली ॥ १५ ॥ भुक्ते जीर्यति यच्छूलं तदेव परिणामजम् । तस्य लक्षणमप्येतत्समासेनाभिधीयते १६॥ अपने रौक्ष आदि कारणोंसे वायु कुपित होकर कफपित्तके समीप जाय उसको आवृत कर बली होकर शूलको उत्पन्न करे, आहार पचनेके समय जो शूल होय उसको परिणामशूल कहते हैं; उसके लक्षण संक्षेपसे कहता हूँ ॥

भाषाटीकासमेत । ( १६७ ) वातिक परिणामशूलके लक्षण । आध्मानाटोपविण्मूत्रनिबन्धारतिवेपनैः । स्निग्धोष्णोपशमप्रायं वातिकं तद्वदेद्भिषक् ॥ १७ ॥ पेटका फूलना तथा पेटमें गुडगुडशब्द, मलमूत्रका अवरोध, अरति ( मनका न लगना ), कम्प ये लक्षण हों और चिकना, गरम पदार्थसे शांत होय ऐसे शूलको वातिक कहते हैं ॥ पैत्तिक परिणामशूलके लक्षण । तृष्णादाहारतिस्वेदकट्वम्ललवणोत्तरम् । शूलं शीतशमप्रायं पैत्तिकं लक्षयेद् बुधः ॥ १८ ॥ प्यास, दाह, चित्तका न लगना, पसीना ये लक्षण होयँ । तीखा, खट्टा, नोनका ऐसे पदार्थ खानेसे बढनेवाला और शीतल पदार्थके सेवनसे शांत होय ऐसा शूल पित्तका जानना ॥ श्लैष्मिक परिणामशूलके लक्षण । छर्दिहल्लाससंमोहस्वल्परुग्दीर्घसन्तति । कटुतिक्तोपशान्तं च तच्च ज्ञेयं कफात्मकम् ॥ १९ ॥ वमन, अफरा और संमोह ( इंद्रिय और मनको मोह ) ये लक्षण जिसमें बहुत होयँ, पीडा थोडी होय, शूल बहुत दिन रहे, कडुवे और तीखे पदार्थसे शांत होय उस शूलको कफात्मक जानना ॥ द्विदोषज और त्रिदोषजके लक्षण । संसृष्टलक्षणं यच्च द्विदोषं परिकल्पयेत् । त्रिदोषजमसाध्यं तु क्षीणमांसबलानलम् ॥ २० ॥ जिसमें दो दोषोंके लक्षण मिले हों उसको द्वंद्वज कहते हैं और तीन दोषोंके लक्षणोंसे त्रिदोषज जानना । मांस बल और अग्नि ये जिसके क्षीण होगये हों ऐसा शूलरोग असाध्य जानना ॥ अन्नके उपद्रवसे प्रगट शूलके लक्षण । जीर्णे जीर्यत्यजीर्णे वा यच्छूलमुपजायते । पथ्यापथ्यप्रयोगेन भोजनाभोजनेन च ॥ न शमं याति नियमात्सोऽन्नद्रव उदाहृतः ॥ २१ ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

( १६८ माधवनिदान ।

( १६८ माधवनिदान । अन्न पचगया होय अथवा पचरहा हो अथवा अजीर्ण हो अर्थात् सर्वदा जो शूल प्रगट होय यह पथ्यापथ्यके योगसे अथवा भोजन करनेसे किंवा न भोजन करनेसे नियमसे शांत नहीं होय, उसको अन्नद्रवशूल कहते हैं, यह शूल त्रिदोष विकृ- तसे एक प्रकारका है, परन्तु असाध्य नहीं है, क्योंकि इसकी चिकित्सा कही है ॥ इति श्रीपण्डितदत्तराममाथुरप्रणीतमाधवार्थबोधिनीमाथुरीभाषाटीकायां परिणामशूलनिदानं समाप्तम् ॥ अथोदावर्त्तनिदानम् । -:-:-:- उदावर्त्तके कारण । वातविण्मूत्रजृम्भास्त्रक्षवोद्गारवमीन्द्रियैः । क्षुत्तृष्णोच्छ्वासनिद्राणां धृत्योदावर्त्तसंभवः ॥ १ ॥ अधोवायु, विष्ठा, मूत्र, जम्भाई, अश्रुपात, छींक, डकार, वमन, शुक्र, भूख, प्यास, श्वास और निद्रा इन तेरह वेगोंके रोकनेसे उदावर्त्तरोग उत्पन्न होता है । तेरहके नियमके करनेसे यह प्रयोजन है कि, क्रोध, लोभ, मन इत्यादि वेगोंके धारण करनेसे रोग उत्पन्न नहीं होता । क्योंकि, इनके रोकनेसे तो स्वस्थता प्राप्त होती है । सब उदावर्त्तोमें मुख्य कारण वायु है । उदावर्त्तकी निरुक्ति इस प्रकार है- “उद्भूतेन वेगविधारणेन आवृतस्य वायोरावर्त्तनमुदावर्त्तः” ॥ तेरह उदावर्त्तोके लक्षण क्रमसे कहते हैं- वातमूत्रपुरीषाणां सङ्गो ऽध्मानं क्लमो रुजः । जठरे वातजाश्चान्ये रोगाः स्युर्वातनिग्रहात् ॥ २ ॥ अधोवायुके रोकनेसे अधोवायु, मल, मूत्र ये बन्ध हो जायँ, पेट फूल जावे, अनायासश्रम और पेटमें बादीसे पीडा होय तथा और वातकृत तोद (शूलादि- पीडा) होय ॥ आटोपशूलौ परिकर्त्तिका च संगः पुरीषस्य तथोर्ध्ववातः । पुरीषमास्यादथ वा निरेति पुरीषवेगेऽभिहते नरस्य ॥ ३ ॥ मलके वेग रोकनेसे पेटमें गुडगुडाहट होय, शूल हो, गुदामें कतरनेकीसी पीडा होय, मल उतरे नहीं, डकार आवे, अथवा मल मुखके द्वारा निकले ॥

भाषाटीकासमेत । (१६९) वस्तिमेहनयोः शूलं मूत्रकृच्छ्रं शिरोरुजा । विनामो वंक्षणानाहः स्याल्लिङ्गं मूत्रनिग्रहे ॥ ४ ॥ मूत्रके वेग रोकनेसे बस्ति ( मूत्राशय ) और शिश्न इंद्रिय इनमें पीडा होय, मूत्र कष्टसे उतरे, मस्तककी पीडासे शरीर सीधा होय नहीं, पेटमें अफरा होय ॥ मन्यागलस्तम्भशिरोविकारा जृंभोपरोधात्पवनात्मकाः स्युः । तथाऽक्षिनासावदनामयाश्च भवन्ति तीव्राः सह कर्णरोगैः ॥ ५ ॥ जम्भाई आती हुईके रोकनेसे, मन्या कहिये नाडीके पीछेकी नस और गला इनका और वातजन्य विकार मस्तकमें होयँ, उसी प्रकार नेत्ररोग, नासारोग, मुख- रोग और कर्णरोग ये तीव्र होते हैं ॥ आनन्दजं वाप्यथ शोकजं वा नेत्रोदकं प्राप्तममुञ्चतो हि । शिरोगुरुत्वं नयनामयाश्च भवन्ति तीव्राः सह पीनसेन ॥ ६ ॥ आनन्दसे अथवा शोकसे प्रकट अश्रुपातका जो मनुष्य नहीं त्याग करे उसके इतने रोग प्रगट होयँ-मस्तक भारी रहे, नेत्ररोग और पीनस ये प्रबल हों ॥ मन्यास्तम्भशिरःशूलमर्दिताधर्धावभेदकौ । इन्द्रियाणां च दौर्बल्यं क्षवथोः स्याद्विधारणात् ॥ ७ ॥ मन्या ( नाडके पिछाडीकी नस ) का स्तम्भ कहिये जकड जाना, शिरमें शूलका चलना, आधा मुख टेढा हो जाय, अर्धांगवात और सब इंद्रिय दुर्बल होजायँ इतने रोग आती हुई छींक रोकनेसे होते हैं ॥ कण्ठास्यपूर्णत्वमतीव तोदः कूजश्च वायोरथवाऽप्रवृत्तिः । उद्गारवेगेऽभिहते भवन्ति घोरा विकाराः पवनप्रसूताः ॥ ८ ॥ आती हुई डकारके वेग रोकनेसे वातजन्य इतने रोग होते हैं-कण्ठ और मुख भारीसा मालूम होय, अत्यन्त नोचनेकीसी पीडा होय, अव्यक्त भाषण ( जो समझमें न आवे ) ॥ कण्डूकोठारुचिव्यङ्गशोफपाण्ड्वामयज्वराः । कुष्ठहृल्लासवीसर्पाऽश्छर्दिनिग्रहजा गदाः ॥ ९ ॥ जो मनुष्य आतीहुई वमनके वेगको रोके उसके अंगोंमें खुजली चले, देहमें चकत्ते हो जायँ, अरुचि, मुखपर झांईंसी पडे, सूजन, पांडुरोग, ज्वर, कुष्ठ, खाली रह, विसर्प ये होयँ ॥

( १७० ) माधवनिदान ।

( १७० ) माधवनिदान । मूत्राशये वै गुदमुष्कयोश्च शोथो रुजा मूत्रविनिग्रहश्च । शुक्राश्मरी तत्स्रवणं भवेच्च ते ते विकारा विहते च शुक्रे॥१०॥ मैथुन करते समय वीर्य निकलनेको जो मनुष्य रोके अथवा और प्रकारसे शुक्रके वेगको रोके उसके मूत्राशयमें सूजन होय तथा गुदामें और अंडकोशोंमें पीडा होय, मूत्र बडे कष्टसे उतरे, शुक्राश्मरी ( पथरीके निदानमें आगे कहेंगे सो ) होय, शुक्रका स्राव होय, ऐसे अनेक प्रकारके रोग होयँ ॥ तन्द्राङ्गमर्दारुचिः श्रमश्च क्षुधाभिघातात्कृशता च दृष्टेः । भूखके रोकनेसे तन्द्रा, अंगोंका टूटना, अरुचि, श्रम और दृष्टिका मन्द होना ये रोग प्रगट होयँ । चकारसे कृशता और दुर्बलता होय यह अन्य ग्रन्थसे जानना ॥ कण्ठास्यशोषः श्रवणावरोधस्तृषाभिघाताद्धृदये व्यथा वै ॥११॥ प्यासके रोकनेसे कण्ठ और मुखका सूखना, कानोंसे मन्द सुनना और हृदयमें पीडा ये लक्षण होयँ ॥ श्रान्तस्य निःश्वासविनिग्रहेण हृद्रोगमोहावथवापि गुल्मः । जो मनुष्य हारगया और वह श्वासको रोके उसके हृदयरोग, मोह और वाय- गोला इतने रोग होयँ ॥ जृम्भाऽङ्गमर्दाक्षिशिरोऽतिजाड्यं निद्राभिघातादथ वापि तन्द्रा॥१२॥ आतीहुई निद्राके रोकनेसे जम्भाई, अंगोंका टूटना, नेत्र और मस्तककी अत्यन्त जडता होना और तन्द्रा होय । इस प्रकार वेग रोकनेसे प्रगट रोगोंको कहे ॥ अब रूक्षादिकारणोंसे कुपित वायुसे उत्पन्न होनेवाले उदावर्त्त रोगोंको कहते हैं- वायुः कोष्ठानुगो रूक्षकषायकटुतिक्तकैः । भोजनैः कुपितः सद्य उदावर्त्तं करोति च ॥ १३॥ वातमूत्रपुरीषाश्रुकफमेदो- वहानि वै । स्रोतांस्युदावर्त्तयति पुरीषं चातिवर्त्तयेत् ॥१४॥ ततो हृद्वस्तिशूलार्तो हृल्लासारतिपीडितः। वातमूत्रपुरीषाणि कृच्छ्रेण लभते नरः ॥ १५ ॥ श्वासकासप्रतिश्यायदाहमोह- तृषाज्वरान् । वमिहिक्काशिरोरोगमनःश्रवणविभ्रमान् ॥१६॥ बहूनन्यांश्च लभते विकारान् वातकोपजान् ॥ १७ ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

भाषाटीकासमेत । ( १७१ ) रूखा, कसैला, तीखा और कडुवा ऐसे भोजन करनेसे कोष्ठगत वायु मल, मूत्र, अश्रुपात, कफ और मेद इनके बहनेवाली नाडियोंके मार्गको रोकदे, मलको सुखाय दे, तब रोगी हृदय मूत्रस्थानमें शूलके होनेसे विकल हो, सूखी रह, अस्व- स्थपना इनसे पीडित हो, मलमूत्र और वात ये कष्टसे उतरें और श्वास, खांसी, पीनस, दाह, मोह, प्यास, ज्वर, वमन, हिचकी, मस्तकरोग, मनकी भ्रांति, मन्द सुने तथा वातकोपसे और भी बहुतसे विकार होयं ॥ आनाहरोगनिदान । आमं शकृद्वा निचितं क्रमेण भूयो विबद्धं विगुणानेलेन । प्रवर्तमानं न यथास्वमेनं विकारमानाहमुदाहरन्ति ॥ १ ॥ तस्मिन्भवत्यामसमुद्भवे तु तृष्णाप्रतिश्यायशिरोविदाहाः । आमाशये शूलमथो गुरुत्वं हृत्स्तंभ उद्गारविघातनं च ॥ २ ॥ स्तंभः कटीपृष्ठपुरीषमूत्रे शूलोऽथ मूर्च्छा शकृतश्च छर्दिः । श्वासश्च पक्वाशयजे भवन्ति तथाऽलसोक्तानि च लक्षणानि ॥३॥ आम अथवा पुरीष क्रमसे संचित हो विगुण वायुसे बारंबार विबद्ध होकर अपने मार्गसे अच्छी रीतिसे प्रवृत्त होय नहीं, इस विकारको आनाह कहते हैं । आमसे प्रगट अनाहरोगसे प्यास, पीनस, मस्तकमें दाह, आमाशयमें शूल, देहमें भारीपना, हृदयका जकड जाना, शूल, मूर्च्छा, डकार, कमर, पीठ, मल, मूत्र इनका रुकना, शूल, मूर्च्छा और विष्ठा मिलीहुई रह और श्वास ये लक्षण होयं । पक्वाशयमें आनाह रोग होनेसे अलसकरोगोक्त लक्षण ( आध्मानवातोरोधादिक ) होते हैं ॥ असाध्य लक्षण । तृष्णार्दितं परिक्लिष्टं क्षीणं शूलैरुपद्रुतम् । शकृद्वमन्तं मतिमानुदावर्तिनमुत्सृजेत् ॥ ४ ॥ प्याससे पीडित, क्लेशयुक्त, क्षीण, शूलसे पीडित और मलको रह करनेवाला ऐसे उदावर्त्तरोगीको वैद्य त्याग दे ॥ इति श्रीपण्डितदत्तराममाथुरनिर्मितमाधवार्थबोधिनीमाथुरीभाषा- टीकायामुदावर्त्तनिदानं समाप्तम् ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

( १७२ ) माधवनिदान ।

( १७२ ) माधवनिदान । अथ गुल्मनिदानम् । ----------------------❖---------------------- दुष्टा वातादयोऽत्यर्थं मिथ्याहारविहारतः । कुर्वन्ति पञ्चधा गुल्मं कोष्ठान्तर्ग्रन्थिरूपिणम् ॥ तस्य पञ्चविधं स्थानं पार्श्वहृन्नाभिबस्तयः ॥ १ ॥ मिथ्या आहार और मिथ्या विहार करनेसे अत्यन्त दुष्ट भये वातादि दोष कोष्ठ ( पेट ) में ग्रंथरूप ( गांठ ) पांच प्रकारका गुल्मरोग उत्पन्न करे हैं। उस गुल्मरोगके पांच स्थान हैं, दोनों पसवाडे, हृदय, नाभि और बस्ति ॥ गुल्मके सामान्यरूप । हृन्नाभ्योरन्तरे ग्रन्थिः सञ्चारी यदि वाऽचलः । वृत्तश्चयोपचयवान्स गुल्म इति कीर्तितः ॥ २ ॥ हृदय और नाभि तथा वस्ती ( मूत्रस्थान ) इनमें चलायमान अथवा निश्चल, गोल कभी घटे कभी बढे ऐसी ग्रन्थि ( गांठ ) हो उसको गुल्मं ( गोला ) का रोग कहते हैं । इस श्लोकमें नाभिशब्दसे बस्तीका ग्रहण करा है ॥ गुल्मकी सम्प्राप्ति । स व्यस्तैर्जायते दोषैः समस्तैरपि चोच्छ्रितैः । पुरुषाणां तथा स्त्रीणां ज्ञेयो रक्तेन चापरः ॥ ३ ॥ कुपित भये दोषोंसे पृथक् २ तीन और सब दोष मिलकर एक ये चार प्रकारके गुल्म पुरुषोंके होते हैं और स्त्रियोंके रक्त ( रज ) के दोषसे एक प्रकारका गुल्म होय है, परन्तु प्रथम जो लिख आये हैं कि, गुल्मरोग पांच प्रकारका है सो इसका निश्चय नहीं है क्योंकि, रक्तगुल्म स्त्रियोंके होता है, पुरुषोंके नहीं होता, धातुरूप रक्तज गुल्म जो है सो स्त्री पुरुष दोनोंके होता है, यह क्षीरपाणिका मत है। पांच प्रका- रका गुल्म है इसपर बहुत शास्त्रार्थ और मतमतांतर हैं जिनको देखनेकी इच्छा हो सो मधुकोश और आतंकदर्पण टीकामें देख लेवें ॥ गुल्मके पूर्वरूप । उद्गारबाहुल्यपुरीषबन्धतृप्त्यक्षमत्वान्त्रनिकूजनानि । आटोपमाध्मानमपक्तिशक्तिरासन्नगुल्मस्य वदन्ति चिह्नम् ॥ ४ ॥ १ सपिण्डितदोषो गुडकेन मीयत इति गुल्मः । २ क्षीरपाणिः- “स्त्रीणामार्तवजो गुल्मो न पुंसामुपजायते । अन्यस्त्वसृग्भवो गुल्मः स्त्रीणां पुंसां च जायते ॥”

भाषाटीकासमेत । ( १७३ ) डकार बहुत आवै, मलका अवरोध होय, अन्नमें अरुचि होय, सामर्थ्यका नाश होना, आंत बोले, पेटमें गुडगुड शब्द होय और अफरा होय, मंदाग्नि होना ये लक्षण होयं तो जानना कि, गुल्म ( गोला ) रोग शीघ्र प्रगट होना चाहता है अर्थात् ये गुल्मके पूर्वरूपके लक्षण हैं ॥ गुल्मके साधारण लक्षण । अरुचिः कृच्छ्रविण्मूत्रं वातेनान्त्रविकूजनम् । आनाहश्चोर्ध्ववातत्वं सर्वगुल्मेषु लक्षयेत् ॥ ५ ॥ अरुचि, मल-मूत्र कष्टसे उतरें, वादीसे आंत बोले, पेट फूल आवे, ऊर्ध्ववात होय ये लक्षण सब गुल्मोंमें होते हैं । सब गुल्मरोगमें वात कारण है सो चरक और सुश्रुतमें भी लिखा है ॥ वातगुल्मके कारण और लक्षण । रूक्षान्नपानं विषमातिमात्रं विचेष्टनं वेगविनिग्रहश्च । शोकाभिघातोऽतिमलक्षयश्च निरन्नता चानिलगुल्महेतुः ॥ ६ ॥ यः स्थानसंस्थानरुजा विकल्पं विद्वातसङ्गं गलवक्त्रशोषम् । श्यावारुणत्वं शिशिरज्वरं च हृत्कुक्षिपार्श्वांसशिरोरुजं च ॥ ७॥ करोति जीर्णेऽप्यधिकं च कोपं भुक्ते मृदुत्वं समुपैति पश्चात् । वातात्स गुल्मो न च तत्र रूक्षं कषायतिक्तं कटु चोपशेते ॥ ८॥ रूखा, विषम और अतिमात्र ऐसे अन्नपान सेवन करनेसे, बलवान् पुरुषसे लडना, मल मूत्र आदि वेगोंके धारण करनेसे, शोक और अभिघात ( लकडी आदिकी चोट ) से, विरेचन आदिसे, मलका क्षय करना, उपवास ये सब वात- गुल्मके कारण हैं । जो गुल्म कभी नाभि, बस्ती, पसवाडेमें चला जाय तथा कभी लंबा कभी मोटा गोल अथवा छोटा होय, तथा उसमें पीडा कभी थोडी कभी बहुत होय, तोद भेद ( सुई चुभानेकीसी पीडा ) होय अथवा अनेक प्रकारकी पीडा होय, मलकी और अधोवायुकी अच्छी रीतिसे प्रवृत्ति होय नहीं, गला और मुख सूखै, शरीरका वर्ण नीला अथवा लाल होय, शीतज्वर, हृदय, कूख, पसवाडे, कंधा और मस्तक इनमें पीडा होय और गोला जीर्ण होनेपर अधिक कोप करे १ गुल्मिनामनिलशांतिरुपायैः सर्वशो विविधदाचरणीया । मारुतेऽत्र विजितेऽन्यमुदीर्णं दोषमल्पमपि कर्म निहन्यात् ॥ इति । २ कुपिताऽनिलमूलत्वादगूढमूलोदयादपि । गुल्मवद्वा विशालत्वाद् गुल्म इत्यभिधीयते ॥ इति ।

( १७४ ) माधवनिदान ।

( १७४ ) माधवनिदान । और भोजनके करनेके पिछाडी नरम हो जाय, वह गोला बादीसे प्रगट होय है उसमें रूखा कसैला कडुवा तीखा पदार्थ खानेसे सुख नहीं होय ॥ पित्तगुल्मके कारण और लक्षण । कट्वम्लतीक्ष्णोष्णविदाहिरूक्षं क्रोधातिमद्यार्कहुताशसेवा । आमाभिघातो रुधिरं च दुष्टं पैत्तस्य गुल्मस्य निमित्तमुक्तम् ॥ ९ ॥ ज्वरः पिपासा वदनाङ्गरागः शूलं महज्जीर्यति भोजने च । स्वेदो विदाहो व्रणवच्च गुल्मः स्पर्शासहः पैत्तिकगुल्मरूपम् ॥ १०॥ कटु, खट्टा, तीक्ष्ण रस, दाहकारक (वंशकरीलादिक), रूखा ऐसे भोजन कर- नेसे, क्रोधसे, अति मद्यपानसे, सूर्यकी धूपमें डोलनेसे, अग्निके समीप रहनेसे, विदग्ध अजीर्णसे, दुष्ट भया रस उससे, अभिघात कहिये लकडी आदि लगनेसे रुधिरका बिगडना ये पित्तगुल्मके कारण कहे हैं। ज्वर, प्यास, मुख और अंगोंमें लालपना, अन्न पचनेके समय अत्यन्त शूल होय, पसीना आवे, जलन होय, फोडाके समान स्पर्श सहा न जाय ये पित्तगुल्मके लक्षण हैं ॥ कफके और सन्निपातके गुल्मके कारण और लक्षण । शीतं गुरु स्निग्धमचेष्टनं च संपूर्णं प्रस्वपनं दिवा च । गुल्मस्य हेतुः कफसंभवस्य सर्वस्तु दुष्टो निचयात्मकस्य ॥ ११ ॥ स्तैमित्यशीतज्वरगात्रसादहृल्लासकासारुचिगौरवाणि । शैत्यं रुगल्पा कठिनोन्नतत्वं गुल्मस्य रूपाणि कफात्मकस्य ॥१२॥ शीतल, भारी, चिकने ऐसे पदार्थके सेवनसे, तृप्तिकी अपेक्षा अधिक भोजन करना, दिनमें सोना यह कफोत्पन्न गुल्म होनेके कारण हैं और जो वातजादि तीनों गुल्मके कारण कहे हैं वे सन्निपातगुल्मके कारण जानने । देहका गीलापना, शीतज्वर शरीरकी ग्लानि, सूखी रद् (उबकी), खांसी, भारीपना, शीतका लगना, थोडी पीडा होय गुल्म (गोला) कठिन होय और ऊंचा होय इतने ये सब कफात्मकगुल्मके लक्षण हैं ॥ द्वन्द्वजगुल्मके लक्षण । निमित्तलिङ्गान्युपलभ्य गुल्मे संसर्गजे दोषबलाबलं च । व्यामिश्रलिङ्गानपरांश्च गुल्मांस्त्रीनादिशेदौषधकल्पनार्थम् ॥ १३ ॥ द्वन्द्वज गुल्ममें कारण लक्षण और दोषोंका बलाबल जानकर चिकित्सा कर- नेके वास्ते मिश्र लक्षणसे और तीन गुल्म समझने चाहिये, अर्थात् एक दोष बल-

होयँ तो चिकित्सा न करे ॥

भाषाटीकासमेत । ( १७५ ) वान् होय तो चिकित्सा करनी चाहिये और द्विदोष बलवान् वा त्रिदोष बलवान् होयँ तो चिकित्सा न करे ॥ सन्निपातगुल्मके लक्षण । महारुजं दाहपरीतमश्मवद्घनोन्नतं शीघ्रविदाहदारुणम् । मनःशरीराग्निवलापहारिणं त्रिदोषजं गुल्ममसाध्यमादिशेत् ॥ १४॥ भारी पीडा करनेवाला, दाहकरके व्याप्त, पत्थरके समान कठिन तथा ऊंचा और शीघ्र दाहकरके भयंकर, मन, शरीर, अग्नि और बल इनका नाश करनेवाला अर्थात् मनको विकल करनेवाला, शरीरको कृश करनेवाला और विवर्ण करनेवाला, अग्नि- वैषम्यादिकारक, असामर्थ्य करनेवाला, ऐसा त्रिदोषज गुल्म असाध्य जानना ॥ रक्तगुल्मके लक्षण । नवप्रसूताऽहितभोजना या या चामगर्भं विसृजेदृत्तौ वा । वायुर्हि तस्याः परिगृह्य रक्तं करोति गुल्मं सरुजं सदाहम् ॥ १५ ॥ पैत्तस्य लिङ्गेन समानलिङ्गं विशेषणं चाप्यपरं निबोध । यः स्पन्दते पिण्डित एव नाङ्गैश्चिरात्सशूलः समगर्भलिङ्गः ॥ स रौधिरः स्त्रीभव एव गुल्मो मासे व्यतीते दशमे चिकित्स्यः॥१६॥ नई प्रसूत भई स्त्रीके अपथ्य सेवन करनेसे, अथवा अपक्व गर्भपात होनेसे अथवा ऋतुकालके समय अपथ्य भोजन करनेसे वायु कुपित होकर उस स्त्रीके रुधिर ( जो ऋतुसमय निकले उस ) को लेकर गुल्म करे । वह गुल्म पीडायुक्त दाहयुक्त होय और पित्तगुल्मके जो लक्षण कहे हैं वे सब इसमें होजाते हैं और इसमें दूसरे विशेष लक्षण होते हैं, उनको कहता हूं सुनो-यह गुल्म बहुत देरमें गोल गोल हिलै, अवयव कहिये हाथ पैरके साथ नहीं हिले शूलयुक्त होय, गर्भके समान सब लक्षण मिले अर्थात् मुखसे पानी छूटे, मुख पीला पडजाय, स्तनका अग्रभाग काला होजाय और दोहदादि लक्षण सब मिलें, ये सब लक्षण व्याधिके प्रभावसे होते हैं । जैसे क्षय रोगवालेको स्त्रीरमणकी इच्छा और काले नख ताल्वादिक होते हैं । यह रक्तजगुल्म स्त्रियोंके होय है, दश महीने व्यतीत होजायँ तब इस रक्तगुल्मकी चिकित्सा करनी चाहिये । कोई कहते हैं कि, यह गर्भ है अथवा रक्तगुल्म है, यह शंका जानकर माधवाचार्यने ( दश महीने व्यतीत होने- पर ) ऐसा कहा है, कारण इसका यह है कि, नववां और दशवां महीना यह प्रसूत होनेका समय है। शंका-क्यों जी ! “ यः स्पन्दते पिंडित एव नांगैः ” इत्यादिक

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( १७६ ) माधवनिदान ।

( १७६ ) माधवनिदान । विशेषणोंसे स्पष्ट प्रतीति होय है, क्यों कि गर्भ तो निरंतर प्रत्येक अवयवके साथ शूलरहित फडकता है, और रक्तगुल्मके इससे विपरीत लक्षण हैं फिर दश महीने व्यतीत होनेपर चिकित्सा करनी चाहिये यह क्यों कहा ? उत्तर-इसका कारण इस प्रकार है कि, इस रोगमें जब दश महीने व्यतीत होजायँ तब चिकित्सा करे वो सुखसाध्य होय है, कुछ प्रसवके नियमसे नहीं कहा, क्योंकि प्रसव ग्यारह बारह महीनेमें भी होय है सो चरकमें भी लिखा है-“ तं स्त्री प्रसूते सुचिरेण गर्भ स्पष्टो यदा वर्षगणैरपि स्यात् ” जैसे जीर्ण ज्वर होनेपर दूध पीना और दस्तका लेना हितकारक होय है। इससे ग्रन्थान्तरोंमें भी लिखा है- “ज्वरे तुल्यर्तुदोषत्वं प्रमेहे तुल्यदूष्यता । रक्तगुल्मे पुराणत्वं सुखसाध्यस्य लक्षणम् ॥ ” इस रक्तगुल्मको दश महीने व्यतीत होनेपर पुरानपना होय है और जैज्जटने भी कहा है कि दश महीनेके पहिले मर्दनादि क्रिया करनेसे गर्भाशयके विकार होय हैं। क्योंकि, रुधिर उस ठिकानेपर जमा होय है और ग्यारहवें महीनेमें गुल्मका गोला बहुत अच्छा जम जाता है इसीसे ग्यारहवे महीनेमें स्नेहादिकरके सब शरीर मृदु (नरम) करनेसे मर्दन करे तो गर्भाशय भले प्रकार अच्छा रहे ॥ अब कहते हैं कि, बहुत दिनका गुल्मरोग ऐसी अवस्था होनेपर असाध्य हो जाय है उसको कहते हैं- सञ्चितः क्रमशो गुल्मो महावास्तुपरिग्रहः । कृतमूलः शिरानद्धो यदा कूर्म इवोन्नतः ॥ १७॥ दौर्बल्यारुचिहृल्लासकासच्छर्द्यरति- ज्वरैः । तृष्णातन्द्राप्रतिश्यायैर्युज्यते न स सिध्यति ॥ १८ ॥ क्रमक्रमसे बढा गुल्म जब जब उदर (पेट)में फैलजाय और धातुओंमें उसका मूल जाय पहुँचे तथा उसपर नाडियोंका जाल लिपटजाय और कछुएकी पीठके समान गुल्म ऊंचा होय, तब इस रोगीके निःसत्त्वपना, अरुचि, सूखी रह, खांसी, वमन, अरति और ज्वर तथा प्यास, तन्द्रा और पीनस ये लक्षण होयं ऐसा रोगी असाध्य है ॥ असाध्य लक्षण । गृहीत्वा सज्ज्वरः श्वासहृच्छर्द्यतीसारपीडितम् । हृन्नाभिहस्तपादेषु शोथः क्षिपति गुल्मिनम् ॥ १९ ॥ श्वासः शूलं पिपासाऽन्नविद्वेषो ग्रन्थिमूढता । जायते दुर्बलत्वं च गुल्मिनां मरणाय वै ॥ २० ॥ वमन और अतिसार इनसे पीडित ऐसे गुल्मरोगीके हृदय, नाभी, हाथ, पैर इन ठिकाने सूजन होय और ज्वर, दमा जिसके होयं ऐसे लक्षण होनेसे रोगी

भाषाटीकासमेत । ( १७७ ) बचे नहीं । श्वास, शूल, प्यास, अन्नमें अरुचि और गुल्मकी गांठका एकाएकी नष्ट होजाना और दुर्बलता ये लक्षण होनेसे जानना कि, गुल्मरोगवालेकी मृत्यु समीप है। शंका-क्यों जी ! अन्तर्विद्रधि और गुल्मरोग इनमें क्या भेद है। इन दोनोंके स्थान और स्वरूप तौ एकसे हैं फिर भेद क्या है ? उत्तर-तुमने कहा सो ठीक है अन्तर्विद्रधि पचता है गुल्म नहीं पचे है इसका कारण यह है कि गुल्म तो निराश्रय है। सो सुश्रुतने कहा भी है-- न निबन्धोऽस्ति गुल्मस्य विद्रधिः सनिबन्धनः । गुल्मस्तिष्ठति दोषे स्वे विद्रधिर्मांसशोणिते ॥ विद्रधिः पच्यते तस्माद्गुल्मश्चापि न पच्यते ॥ २१ ॥ गुल्मका निबंध नहीं और विद्रधिका निबंध है, गुल्म अपने दोषोंमें रहता है और विद्रधिका ठिकाना मांस रुधिरमें है, इसीसे विद्रधिका पाक होय है और गुल्मका पाक नहीं होय ॥ इति श्रीपण्डितदत्तराममाथुरनिर्मितमाधवार्थबोधिनीमाथुरी- भाषाटीकायां गुल्मरोगनिदानं समाप्तम् ॥ अथ हृद्रोगनिदानम् । अत्युष्णगुर्वम्लकषायतिक्तैः श्रमाभिघाताध्यशनप्रसङ्गैः । संचिन्तनैर्वेगविधारणैश्च हृदामयः पञ्चविधः प्रदिष्टः ॥ १ ॥ अतिगरम, अतिभारी, अतिखट्टा, अतिकषैला, अतिकडुवा ऐसे पदार्थ सेवन करनेसे, श्रम ( धनुष आदिका खैंचना ) अभिघात ( हृदयमें चोट लगना ) और भोजनके ऊपर भोजन नित्य करनेसे, संचिंतन ( राजाके भयसे चिन्ता ), मल मूत्र आदि वेगोंके रोकनेसे, वातादिकके क्षयसे और सन्निपातकरके तथा कृमिसे हृदयका रोग होता है, वह पांच प्रकारका है ॥ हृद्रोगकी सम्प्राप्ति और सामान्य लक्षण । दूषयित्वा रसं दोषा विगुणा हृदयं गताः । हृदि बाधां प्रकुर्वन्ति हृद्रोगं तं प्रचक्षते ॥ २ ॥ कुपित भये दोष रसको ( जो कि हृदयमें रहता है), दुष्ट करके हृदयमें अनेक प्रकारकी पीडा करे उसको हृदयरोग कहते हैं ॥

( १७८ ) माधवनिदान ।

( १७८ ) माधवनिदान । वातहृद्रोगके लक्षण । आयम्यते मारुतजे हृदयं तुद्यते तथा । निर्मथ्यते दीर्यते च स्फोट्यते पाट्यतेऽपि च ॥ ३ ॥ वातज हृदयरोगमें हृदय ईंचासरीखा, सुईसे टोनेसरीखा, फोडनेसरीखा, दो टुकडा करनेके समान, मथनेके समान, कुल्हाडीसे फोडनेके समान करे है ॥ पित्तके हृद्रोगके लक्षण । तृष्णोष्णदाहमोहाः स्युः पैत्तिके हृदयक्लमः । धूमायनं च मूर्च्छा च स्वेदः शोषो मुखस्य च ॥ ४ ॥ पित्तके हृदयरोगमें प्यास, किंचित् दाह, मोह और हृदयकी ग्लानि, धूआं निक- लतासा मालूम होय, मूर्च्छा, पसीना और मुखका सूखना ये लक्षण होते हैं ॥ कफके हृदयरोगके लक्षण । गौरवं कफसंस्त्रावोऽरुचिः स्तम्भोऽग्निमार्दवम् । माधुर्यमपि चास्यस्य बलासो वर्तते हृदि ॥ ५ ॥ कफसे हृदय व्याप्त होनेसे भारीपना, कफका गिरना, अरुचि, हृदय जकडजाय, मन्दाग्नि, मुखमें मिठास ये लक्षण होते हैं ॥ त्रिदोषजहृद्रोगके लक्षण । विद्यात्त्रिदोषं त्वपि सर्वलिङ्गं- जिसमें सब लक्षण मिलते होंयँ वह त्रिदोषका हृद्रोग जानना इसमें कुछ भी अपथ्य होनेसे गांठ उत्पन्न होती है, उस गांठसे कृमि पैदा होती हैं, ऐसे चरकमें कहा है ॥ कृमिज हृद्रोगके लक्षण । -तीव्रार्तितोदं कृमिजं सकण्डु । उत्क्लेदः ष्ठीवनं तोदः शूलं हृल्लासकस्तमः । अरुचिः श्यावनेत्रत्वं शोषश्च कृमिजे भवेत् ॥ ६ ॥ तीव्र पीडा करके तथा नोचनेकीसी पीडा करके तथा खुजली करके युक्त ऐसा हृद्रोग कृमिजन्य जानना । उत्क्लेद ( ओकारी आनेके समान मालूम हो ), थूकना, तोद ( सुई चुभानेकीसी पीडा ), शूल, हृल्लास, अँधेरा आवे, अरुचि, नेत्र काले पडजायँ और मुखशोष ये लक्षण कृमिज हृदयरोगमें होते हैं । जैज्जटका यह मत १ त्रिदोषजे तु हृद्रोगे यो दुरात्मा निषेवते । तिलक्षीरगुडादींश्चेद्ग्रन्थिस्तस्योपजायते ॥ मर्मैकदेशे संक्लेदं रसश्चाप्युपगच्छति । संक्लेदात् कृमयश्चान्ये भवंत्युपहतात्मनः ॥ * CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA

भाषाटीकासमेत । ( १७९ ) है कि, उत्क्लेशसे लेकर तमपर्यन्त त्रिदोषके लक्षण कहे हैं। जैसे तोद, शूल ये वादीसे होयँ । उत्क्लेश, हल्लास और ष्ठीवन ये कफसे और तम यह पित्तसे लक्षण होता है और अरुचिसे लेकर शोषपर्यन्त कृमिज हृद्रोगके लक्षण जानने । इस विषयमें प्रत्येक आचार्योंके भिन्न २ मत हैं ॥ सर्वोके उपद्रव । क्लोम्नः सादो भ्रमः शोषो ज्ञेयास्तेषामुपद्रवाः । कृमिजे कृमिजातीनां श्लैष्मिकाणां च ये मताः ॥ ७ ॥ क्लोम कहिये पिपासा ( प्यास ) के स्थान उसमें ग्लानि होय, भ्रम, शोष ये सब उन हृद्रोगोंके उपद्रव जानने और कफकी कृमिरोगके जो पिछाडी कह आये हैं सोई कृमिज हृद्रोगोंके लक्षण होते हैं । तथा “ हल्लासमास्यस्रवणमविपाकमरोच- कम् ।” इत्यादि ॥ इति श्रीपण्डितदत्तराममाथुरप्रणीतमाधवार्थबोधिनीमाथुरीभाषाटीकायां हृद्रोगनिदानं समाप्तम् ॥ अथ मूत्रकृच्छ्रनिदानम् ।

व्यायामतीक्ष्णौषधरूक्षमद्यप्रसंगनित्यद्रुतपृष्ठयानात् । आनूपमांसाध्यशनादजीर्णात्स्युर्मूत्रकृच्छ्राणि नृणामिहाष्टौ ॥ १॥ व्यायाम ( दण्डकसरत आदि ), तीक्ष्णौषध ( राई आदि ) रूखा पदार्थ और नित्यप्रति मद्यपान करना इनसे और निरन्तर घोडेपर चढनेसे और जलसमीप रह- नेवाली पक्षी ( हंस, सारस, चकवां, आदि) का मांस खानेसे, भोजनके ऊपर भोजन करनेसे और कच्चे पदार्थ इत्यादिकोंके खानेसे मनुष्योंके आठ प्रकारका मूत्रकृच्छ्र रोग होता है। पृथक् दोषोंसे ३, सन्निपातसे १, चोट लगनेका १, मल रोकनेका १, वीर्य रोकनेका १ और पथरीका १ ये सब मिलकरके आठ भये ॥ मूत्रकृच्छ्रकी सम्प्राप्ति । पृथङ्मलाः स्वैः कुपिता निदानैः सर्वेऽथवा कोपमुपेत्य बस्तौ । मूत्रस्य मार्गं परिपीडयन्ति यदा तदा मूत्रयतीह कृच्छ्रात् ॥ २ ॥ अपने अपने कारणोंसे कुपित भये जो वातादिक सब अलग दोष बस्तीमें कुपित होकर मूत्रके मार्गको पीडित करें, तब मनुष्यके बडे कष्टसे मूत्र उतरे ॥

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( १८० ) माधवनिदान ।

( १८० ) माधवनिदान । वातिक मूत्रकृच्छ्रके लक्षण । तीव्रार्तिरुग्वंक्षणबस्तिमेढ्रे स्वल्पं मुहुर्मूत्रयतीह वातात् । वातके मूत्रकृच्छ्रसे वंक्षण ( जंघा और ऊरु इनकी सन्धि ), मूत्राशय और इंद्रिय इनमें पीडा और मूत्र बारम्बार थोडा २ उतरे ॥ पैत्तिकमूत्रकृच्छ्रके लक्षण । पीतं सरक्तं सरुजं सदाहं कृच्छ्रं मुहुर्मूत्रयतीह पित्तात् ॥ ३ ॥ पैत्तिकमें पीला, कुछ लाल, पीडायुक्त, जलनके साथ बारम्बार कष्टसे मूत्र उतरे ॥ कफमूत्रकृच्छ्रके लक्षण । बस्तेः सलिङ्गस्य गुरुत्वशोथौ मूत्रं सपिच्छं कफमूत्रकृच्छ्रे । कफके मूत्रकृच्छ्रमें लिंग और मूत्राशय भारी हो, सूजन और मूत्र चिकना होय ॥ सन्निपातमूत्रकृच्छ्रके लक्षण । सर्वाणि रूपाणि तु सन्निपाताद्भवन्ति तत्कृच्छ्रतमं हि कृच्छ्रम् ॥ ४ ॥ सन्निपातके मूत्रकृच्छ्रमें सर्व लक्षण होते हैं। यह मूत्रकृच्छ्र कष्टसाध्य है ॥ शल्यजमूत्रकृच्छ्रके लक्षण । मूत्रवाहिषु शल्येन क्षतेष्वभिहतेषु च । मूत्रकृच्छ्रं तदाघाताज्जायते भृशदारुणम् ॥ वातकृच्छ्रेण तुल्यानि तस्य लिङ्गानि लक्षयेत् ॥ ५ ॥ मूत्र बहानेवाले स्रोत (मार्ग) शल्य (तीर आदि) से बिंधजायँ अथवा पीडित होयँ तो उस घातसे भयंकर मूत्रकृच्छ्र होय है, इसके लक्षण वातमूत्रकृच्छ्रके समान होयँ ॥ मलके मूत्रकृच्छ्रके लक्षण । शकृतस्तु प्रतीघाताद्वायुर्विगुणतां गतः । आध्मानं वातसङ्गं च मूत्रसङ्गं करोति च ॥ ६ ॥ मल ( विष्ठा ) के अवरोध होनेसे वायु विगुण ( उलटा ) होकर अफरा वात- शूल और मूत्रनाश करे तब मूत्रकृच्छ्र प्रगट होय ॥ अश्मरीजन्य मूत्रकृच्छ्र । अश्मरीहेतु तत्पूर्वं मूत्रकृच्छ्रमुदाहरेत् ॥ ७ ॥ पथरीके योगसे जो मूत्रकृच्छ्र होय उसको पथरीका मूत्रकृच्छ्र कहते हैं ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

भाषाटीकासमेत । ( १८१ ) शुक्रजमूत्रकृच्छ्रके लक्षण । शुक्रे दोषैरुपहते मूत्रमार्गे विधारिते । सशुक्रं मूत्रयेत्कृच्छ्राद्वस्तिमेहनशूलवान् ॥ ८ ॥ दोषोंके योगसे शुक्र ( वीर्य ) दुष्ट होकर मूत्रमार्गमें गमन करे, तब उस मनुष्यके मूत्राशय और लिङ्ग इनमें शूल होय और मूतते समय मूत्रके सङ्ग वीर्य पतन होय ॥ अश्मरी और शर्करा इनके साम्य और अवान्तरभेद । अश्मरी शर्करा चैव तुल्यसम्भवलक्षणे । विशेषणं शर्करायाः शृणु कीर्त्तयतो मम ॥ ९ ॥ पच्यमानाऽश्मरी पित्ताच्छोष्यमाणा च वायुना । विमुक्तकफसन्धाना क्षरन्ती शर्करा मता ॥ १० ॥ हृत्पीडा वेपथुः शूलं कुक्षावग्निश्च दुर्बलः। तया भवति मूर्च्छा च मूत्रकृच्छ्रं च दारुणम् ॥ ११ ॥ अश्मरी ( पथरी ) और शर्करा इन दोनोंकी संप्राप्ति और लक्षण समान हैं परन्तु इनमें थोडासा भेद है उसको कहता हूं सुनो, पित्तसे पकनेवाली और वायुसे शुष्क होनेवाली ऐसी पथरी कफसंबन्धी न होय, तब मूत्रके मार्गसे रेतके समान झरने लगे, उसको शर्करा कहते हैं । उस शर्करायोगसे हृदयमें पीडा, कम्प, कूखमें शूल, मन्दाग्नि, मूर्च्छा और भयंकर मूत्रकृच्छ्र ये रोग होयें ॥ इति श्रीपण्डितदत्तराममाथुरनिर्मितमाधवार्थदीपिकामाथुरीभाषाटीकायां मूत्रकृच्छ्रनिदानं समाप्तम् ॥ अथ मूत्राघातनिदानम् । जायन्ते कुपितैर्दोषैर्मूत्राघातास्त्रयोदश । प्रायो मूत्रविघाताद्यैर्वातकुण्डलिकादयः ॥ १ ॥ मूत्रके वेग रोकनेसे ( आदिशब्दसे मल शुक्रादि वेग रोकना और रूक्ष भोजन आदि जानना ) कुपित भये दोषोंसे वातकुण्डलिकादि तेरह प्रकारके मूत्रा- घातरोगको करे ॥ वातकुण्डलिकाके लक्षण । रौक्ष्याद्वेगविघाताद्वा वायुर्बस्तौ सवेदनः ।

( १८२ ) माधवनिदान ।

( १८२ ) माधवनिदान । मूत्रमाविश्य चरति विगुणः कुण्डलीकृतः ॥ २ ॥ मूत्रमल्पमल्पमथवा सरुजं संप्रवर्तते । वातकुण्डलिकां तां तु व्याधिं विद्यात्सुदारुणम् ॥ ३ ॥ रूखे पदार्थ खानेसे अथवा मलमूत्रादिवेगोंके धारण करनेसे कुपित भई जो वायु सो बस्ती ( मूत्राशय ) में प्राप्त हो पीडा करे और मूत्रसे मिलकर मूत्रके वेगको विगुण ( उलटा ) करके वहां आय कुण्डलके आकार ( गोलाकार ) मूत्राशयमें विचरे तब मनुष्य उस वातसे पीडित हो मूत्रको बारंबार थोडा थोडा पीडाके साथ त्याग करे, इस दारुण व्याधिको वातकुण्डलिकारोग कहते हैं ॥ अष्ठीलाके लक्षण । आध्मापयन्बस्तिगुदं रुध्वा वायुश्चलोन्नताम् । कुर्यात्तीव्रातिमष्ठीलां मूत्रमार्गावरोधिनीम् ॥ ४ ॥ बस्ति ( मूत्राशय ) और गुदा इनमें यह वायु अफरा करे तथा बस्ति और गुदाकी वायुको रोककर चञ्चल और उन्नत ( ऊंची ) ऐसी अष्ठीला ( पत्थरकी पिण्डीके सदृश ) को प्रगट करे, यह मूत्रके मार्गको रोकनेवाली और भयंकर पीडा करनेवाली है ॥ वातबस्तिके लक्षण । वेगं विधारयेद्यस्तु मूत्रस्याकुशलो नरः । निरुणद्धि मुखं तस्य बस्तेर्बस्तिगतोऽनिलः ॥ ५ ॥ मूत्रसङ्गो भवेत्तेन बस्तिकुक्षिनिपीडितः । वातबस्तिः स विज्ञेयो व्याधिः कृच्छ्रप्रसाधनः ॥ ६ ॥ जो मनुष्य अड ( जिद्द ) से मूत्रबाधाको रोके उसके बस्ति ( मूत्राशय ) का वायु बस्तिके मुखको बन्द करदे तब उसका मूत्र बंद होजाय और वह वायु बस्तिमें और कूंखमें पीडा करे, उस व्याधिको वातबस्ति ऐसे कहते हैं । यह बडे कष्टसे साध्य होय ॥ मूत्रातीतके लक्षण । चिरं धारयतो मूत्रं त्वरया न प्रवर्तते । मेहमानस्य मन्दं वा मूत्रातीतः स उच्यते ॥ ७ ॥ मूत्रको बहुत देर रोकनेसे पीछे वह जल्दी नहीं उतरे । मूतते समय धीरे धीरे उतरे इस रोगको मूत्रातीत कहते हैं ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA