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माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation

माधवकर द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished404 पृष्ठ

ॐ श्रीशं वन्दे । श्रीनिकुञ्जविहारिणे नमः । ❖ माधवनिदानम् । ❖ भाषाटीकासमेतम् । प्रथम भाग । नरवरवपुधारी गोकुलानंदकारी ब्रजयुवतिविहारी रासलीलाप्रचारी । प्रणवहुँ बनवारी कंसको मानमारी सकलविघनटारी लीजिये सुधि हमारी ॥ तथा च—कर्ता भर्त्ता तथा हर्त्ता भोगमोक्षैकदायिनम् । वन्दे श्रीगिरिजाकान्तं शंकरं लोकशंकरम् ॥ परमकारुणिक श्रीसदाशिवचरणाम्बुजचंचरीक श्रीमाधवाचार्य निश्शेषविघ्नविघातार्थं और ग्रन्थकी निर्विघ्नपरिसमाप्तिके निमित्त ग्रन्थके आदिमें मंगलाचरण करते हैं— ( युग्मम् ) प्रणम्य जगदुत्पत्तिस्थितिसंहारकारणम् । स्वर्गापवर्गयोर्द्वारं त्रैलोक्यशरणं शिवम् ॥ १ ॥ ग्रन्थकर्ताकी प्रतिज्ञा । नानामुनीनां वचनैरिदानीं समासतः सद्भिषजां नियोगात् । सोपद्रवारिष्टनिदानलिङ्गो निबध्यते रोगविनिश्चयोऽयम् ॥ २ ॥ मया अयं रोगविनिश्चयो ग्रन्थः इदानीं समासतः निबध्यते, किं कृत्वा, शिवं प्रणम्य, कथंभूतं शिवं जगदुत्पत्तिस्थितिसंहारकारणम्, पुनः कथंभूतं शिवं स्वर्गा- पवर्गयोर्द्वारम्, पुनः त्रैलोक्यशरणम्, किंविशिष्टो ग्रन्थः सोपद्रवारिष्टनिदानलिंगः, कैः नानामुनीनां वचनैः, कस्मात् सद्भिषजां नियोगात् इत्यन्वयः ॥ जगत्की उत्पत्ति, पालन और प्रलयके प्रधान कारण, स्वर्ग ( सुख ) अपवर्ग ( मोक्षके ) द्वार अर्थात् दाता तथा त्रिलोकीके रक्षक शिवको प्रणाम कर अनेक सुश्रुतादि मुनीश्वरोंके वचनोंके अनुसार उत्तम वैद्योंकी आज्ञासे अब मैं संक्षेपसे २

( २ ) माधवनिदान ।

( २ ) माधवनिदान । रोगविनिश्चय नाम ग्रन्थकी रचना करता हूँ। जिसमें उपद्रव, अरिष्ट, निदान और लिंग ( चिह्न ) इनका लक्षण अच्छी रीतिसे किया गया है ॥ शिष्य-यह अतिसूक्ष्म निदानपंचक सर्वत्र ऋषिमुनियोंके जानने योग्य है उनके वाक्योंका निरादर कर मनुष्यकृत तुम्हारे ग्रन्थमें मनुष्योंकी कैसे प्रवृत्ति होवेगी ? इस कारण माधवाचार्यने-" नानामुनीनां वचनैः " इस पदको धरा अर्थात् अनेक मुनीश्वरोंके वचनोंका आशय ले मैंने यह ग्रन्थ निर्माण किया है, किंतु मेरे मनकी उक्तिसे कल्पित नहीं है। शंका-पहले ही बहुत ग्रन्थ निर्माण करे उपस्थित हैं फिर तुम्हारे इस ग्रन्थको कौन पढ़ेगा ? इस कारण माधवाचार्यने " इदानीम् " पद मूलमें धरा । इस पदका यह आशय है कि, हम ही अनेक मुनीश्वरोंके वचनोंसे अब ऐसा अलौकिक ग्रन्थ रचते हैं कि, पहिले किसी आचार्यने अद्यापि नहीं निर्माण करा । कोई वादी शंका करे कि, तुमने ग्रन्थ रचा भी परन्तु किसीने नहीं पढ़ा तो आपका ग्रन्थ निर्माण करना व्यर्थ होगा, इस कारण माधवाचार्यने " सद्धिषजां नियोगात् " यह पद धरा. इस पदका आशय यह है कि, हमारे पढनेके निमित्त कोई निदानग्रन्थ निर्माण करो ऐसे बुद्धिमान् वैद्योंके कहनेसे इस ग्रन्थकी रचना की है। शंका-श्रीमहादेवजीके हर मृड रुद्र शम्भु इत्यादि नामोंको त्यागकर शिव इस नामको क्यों प्रणाम करा ? उत्तर-इस रोगविनिश्चय ग्रन्थके पठन पाठन करनेवालोंके कल्याणकी इच्छा कर सब कामना देनेवाला कल्याणवाचक शिवनाम विचार इसीको ग्रन्थके आदिमें माधवाचार्यने प्रणाम करा ॥ अन्य निदानग्रन्थोंसे इसकी उत्तमता दिखाते हैं- नानातंत्रविहीनानां भिषजामल्पमेधसाम् । सुखं विज्ञातुमातङ्कमयमेव भविष्यति ॥ ३ ॥ अयमेव ( ग्रन्थः ) अल्पमेधसां भिषजां सुखं यथा भवति तथा आतङ्कं विज्ञातुं भविष्यति । किविशिष्टानां भिषजां नानान्त्रविहीनानामित्यन्वयः ॥ अनेक ग्रन्थोंके विचार करनेमें असमर्थ ऐसे मन्दबुद्धिवाले वैद्योंको सुखपूर्वक रोगाँनके निमित्त यही ग्रन्थ कारण होवेगा. क्योंकि, रोगके जाननाही मुख्य है सो अन्यान्तरोंमें लिखा भी है ॥ १ उपद्रवः-रोगारम्भदोषप्रकोपजन्योऽन्यविकारः।२ अरिष्टम्-नियत मरणख्यापकं लिंगम् । ३ निदानम्-रोगोत्पादको हेतुः । ४ लिङ्गम्-रोगख्यापको हेतुः तेन लिंग्यते ज्ञायते व्याधिरने- नेति व्युत्पत्त्या पूर्वरूपरूपोपशयसंप्राप्तयो विज्ञायन्ते । ५ रोगमादौ परीक्षेत ततोऽनन्तरमौष- धम् । ततः कर्म भिषक्पश्चाज्ज्ञानपूर्वं समाचरेत् ॥ १ ॥ रोगज्ञानार्थमप्रवादौ यत्नः कार्यो भिषग्वरैः । सति तस्मिन्क्रियारम्भः पुण्याय यशसे श्रिये ॥ २ ॥

निदानं पूर्वरूपाणि रूपाण्युपशयस्तथा ।

भाषाटीकासमेत । (३) रोग जाननेके पांच उपाय हैं उनको कहते हैं- निदानं पूर्वरूपाणि रूपाण्युपशयस्तथा । संप्राप्तिश्चेति विज्ञानं रोगाणां पञ्चधा स्मृतम् ॥ ४ ॥ रोगाणां विज्ञानं पञ्चधा स्मृतम् इत्यन्वयः ॥ निदान, पूर्वरूप, रूप, उपशय और संप्राप्ति ये पांच प्रकार पृथक् पृथक् और समस्त व्याधियोंके बोधक होते हैं । इस प्रकार रोगोंका जानना मुनीश्वरोंने पांच प्रकारका कहा है ॥ इस श्लोकमें "उपशयस्तथा" यह जो पद धरा इसका यह आशय है कि, जैसे निदान, पूर्वरूप और रूपसे रोग जाना जाता है उसी प्रकार उपशयसे और संप्राप्तिसे भी रोग जाना जाता है "सम्प्राप्तिश्चेति" इस पदमें च और इतिके धरनेसे यह प्रयोजन है कि, रोग जाननेके इन पांचोंसे विशेष और उपाय नहीं है। अब कहते हैं कि, रोगोंका निदान संनिकृष्ट (समीप) और विप्रकृष्ट (दूर) इन भेदोंसे दो प्रकारका है। संनिकृष्ट-उसे कहते हैं कि, जैसे कुपित वातादिक ज्वरादिक रोगोंको प्रकट करे हैं और विप्रकृष्ट-उसे कहते हैं, हेमन्तऋतुमें संचित हुआ कफ वसन्त- ऋतुमें कुपित होता है। पूर्वरूप-उसे कहते हैं जैसे ज्वरमें आलस्यादि धर्म। रूप- उसे कहते हैं जैसे १८ वें श्लोकमें लिखा है-"स्वेदावरोध" इति अर्थात्-पसीनोंका अवरोध होना इत्यादिक। उपशय-उसे कहते हैं जैसे वातरोग तैल आदिके लगानेसे शान्त होता है। सम्प्राप्ति-उसे कहते हैं जैसे १० वें श्लोकमें लिखा है-"यथा दुष्टेन दोषेण" इत्यादि। शंका-क्यों जी ! ये पांच जो व्याधि जाननेके उपाय कहे इनमें एकहीसे रोगका निश्चय हो सकता है फिर माधवाचार्यने पांच प्रकार व्यर्थ क्यों लिखे ? क्योंकि पांचोंका प्रयोजन केवल रोगका जानना है। उत्तर- तुमने कहा सो ठीक है परन्तु इन पांचोंका पृथक् पृथक् प्रयोजन है, जैसे-निदानसे यह प्रयोजन है कि, जिस वस्तुके खानेसे या लगानेसे रोग प्रगट हो उसका त्याग करनेसे रोग नहीं बढे किन्तु उलटा शान्त ही होता है और पूर्वरूपके जाननेसे यह । प्रयोजन है, जैसे-सुश्रुतमें लिखा है कि, वातज्वरके पूर्वमें घृतपान करानेसे वात- ज्वरकी उत्पत्ति नहीं हो। रूपके जाननेसे प्रयोजन है कि, व्याधि अर्थात् रोगका साध्यासाध्य और कष्टसाध्यत्वै निश्चय होता है जैसे जिस रोगका अल्प रूप होवे वह १ अर्थात् नाडी नेत्र जिह्वा मलमूत्रादिकी परीक्षाओंसे रोगोंका ज्ञान यथार्थ नहीं होता। २ वातिकज्वरपूर्वरूपे घृतपानमिति तथा च साध्यासाध्यत्वमपि ज्ञायते। ३ कष्टसाध्यके लक्षण चरकमें लिखे हैं। यथा-निमित्तपूर्वरूपाणां रूपाणां मध्यमे बले। इति।

( ४ ) माधवनिदान ।

( ४ ) माधवनिदान । सुखसाध्य और मध्यरूप कष्टसाध्य और सम्पूर्णरूप असाध्य है इनको जाननेसें असाध्यका परित्याग करना और कष्टसाध्य तथा सुखसाध्यकी औषधि करानीं उचित है । उपशयके जाननेसे यह प्रयोजन है कि सुपरीक्षित व्याधिके सम्पूर्ण लक्षण न मिलनेसे व्याधिका यथार्थ ज्ञान नहीं हो, उसको उपशयके द्वारा निश्चय करे । सो चरकमें लिखा है कि, जिस व्याधिके लक्षण प्रगट न होयं उसकी उपशय और अनुशयके द्वारा परीक्षा करे उसी प्रकार सुश्रुतमें लिखा है जैसे-उबटना तेल लगाना स्वेदनविधि इत्यादि कर्म करनेसे वातरोग शान्त न हो तो उसके रुधिरका विकार जाने और सम्प्राप्तिके जाननेसे यह प्रयोजन है कि, सम्प्राप्तिके बिना जानें पूर्वरूपादिकोंकरके जानी हुई व्याधि चिकित्साके योग्य भी है परन्तु अंशांश विकल्प बल काल आदिको जबतक नहीं जाने तबतक चिकित्सा यथार्थ नहीं हो सकती इसीसे वैद्य निदानपञ्चकका अवश्यही परिचय करें ॥ अब निदानके पर्यायवाची शब्दोंको कहते हैं- निमित्तहेत्वायतनप्रत्ययोत्थानकारणैः । निदानमाहुः पर्यायैः प्राग्रूपं येन लक्ष्यते ॥ ५ ॥ निमित्त, हेतु, आयतन, प्रत्यय, उत्थान और कारण ये निदानके पर्यायवाची शब्द शास्त्र व्यवहारके अर्थ मुनीश्वरोंने कहे हैं, इनके कहनेका कारण यह है कि, व्यवहारके वास्ते अर्थात् शास्त्रमें इन छहों शब्दोंमेंसे कोई शब्द आवे उसको निदानवाचकही जानें ॥ व्याधिके प्राग्रूपका लक्षण । उत्पित्सुरामयो दोषविशेषेणाऽनधिष्ठितः । लिंगमव्यक्तमल्पत्वाद्याधीनां तद्यथायथम् ॥ ६ ॥ येन उत्पित्सुः आमयो लक्ष्यते तत्प्राग्रूपम्-किंभूतः आमयः दोषविशेषेणाऽनधि- ष्ठितः । अतः एव ज्वरादिव्याधीनाम् अल्पत्वात् अव्यक्तं लिंगं तत् यथायथं यस्य व्याधेर्यद्रूपं तदेवाव्यक्तं पूर्वरूपम् इत्यन्वयः ॥ जिस जम्भाई आलस्य आदि करके उत्पत्ति होनेवाली व्याधिका ज्ञान होवें उसको प्राग्रूप अर्थात् पूर्वरूप कहते हैं, फिर वह व्याधि दोष ( वात पित्त कफ ) सें बहुधा अप्रगट होवे । शंका-यदि वातादिक दोषोंसे अप्रगट होवेगी तो व्याधिका प्रगट होना असम्भव है क्योंकि कारण तो वातादिक दोष हैं । जब दोषहीं १ गूढलिंगं व्याधिमुपशयानुपशयाभ्यां बुध्येत इति । २ अभ्यङ्गस्नेहस्वेदाद्यैर्वातदोषो न शाम्यति । विकारस्तत्र विज्ञेयो दुष्टमत्रास्ति शोणितम् ॥ इति ॥

भाषाटीकासमेत । ( ५ ) नहीं तो रोग कैसे प्रगट हो सकते हैं ! उत्तर-इस पदका यह अर्थ है कि दोष ( वात पित्त कफ ) का व्याधिके अल्प होनेसे अप्रगट होना रूप अर्थात् थोडा थोडा होना. अतएव तत्तत् ज्वरादिव्याधिका अपने अपने अप्रगट लक्षण पूर्वरूप तैसे तैसेही होते हैं । अब कहते हैं कि, पूर्वरूप दो प्रकारका हैं-एक सामान्य दूसरा विशिष्ट । सामान्यप्राग्रूप ( पूर्वरूप ) उसे कहते हैं जैसे दोष ( वात पित्त कफ ) से दूषित धातु उसके बिगडनेसे प्रगट होनेवाले ज्वरादि व्याधिमात्रकीही प्रतीति होवे और वात आदि दोषोंके चिह्न न मालूम हो जैसे-“ श्रमोऽरतिर्विवर्णत्वमिति ” अर्थात् ज्वरमें श्रम हो, मनका न लगना, देहका विवर्ण इत्यादि लक्षण और जिसमें होनहार रोगारम्भक दोष उन्होंके चिह्न तिसके एक अंशकी प्रतीति हो उसको विशिष्ट प्राग्रूप कहते हैं. जैसे-“ जृंभात्यर्थं समीराणात् ” अर्थात् जम्भाईका आना केवल वातके दोषसे ही है। इसमें होनहार रोग कौन ज्वर, उसका आरंभ कौन वात, उस वातका एक अंश कौन जम्भाई ऐसे और भी जानने चाहिये । इस विशिष्ट पूर्वरूपमें जम्भाई आदि रूप देखकर कदाचित् पूर्वरूपको रूप न समझना चाहिये । क्योंकि यह तो केवल व्याधिके आरम्भक दोषमात्रका सूक्ष्म चिह्न है, इस बातको दृष्टान्त देकर समझाते हैं । दृष्टान्त-जैसे तृणके समूहमें छोटी अग्निकी चिनगारी गिरनेसे धूम ( धुआँ ) मात्र प्रकट देखकर हाथ वस्त्र आदिके मारनेसे ही शान्ति कर सकते हैं, परन्तु जब अग्नि एक साथ जोरसे प्रज्वलित होगई तब शान्त नहीं होसके. ऐसे ही विशिष्ट पूर्वरूपके अल्प होनेसे चिकित्सा करनेसे शांति कर सकते हैं, परन्तु जब रूप होगया तब उसका उपाय नहीं होसकता है। इसीसे पूर्वरूप और रूपमें भेद है । अब कहते हैं-पूर्वरूप और रूप इन दोनोंमें कोई शारीरिक अर्थात् शरीरसे सम्बन्ध रखते हैं और कोई मानसिक अर्थात् मनसे सम्बन्ध रखते हैं । शारीरिक जैसे ज्वरमें मुखका विरस होना, देह भारी, नेत्रोंसे जल गिरना इत्यादिक और मानसिक जैसे मनका एक जगह न लगना और अपने हितकारक वचनोंसे शांति न होना तथा खट्टे चरपरे पदार्थपर मन चलना इत्यादि ॥ व्याधिके रूपके पर्याय शब्द । तदेव व्यक्ततां यातं रूपमित्यभिधीयते । संस्थानं व्यञ्जनं लिङ्गं लक्षणं चिह्नमाकृतिः ॥ ७ ॥ जब पूर्वोक्त प्राग्रूप प्रगट होजाय तब उसको रूप ऐसे कहते हैं और संस्थान, व्यञ्जन, लिंग, लक्षण, चिह्न और आकृति ये छः शब्द रूपके पर्यायवाचीक हैं ॥ अब उपशयके लक्षणको कहते हैं- हेतुव्याधिविपर्य्यस्तविपर्य्यस्तार्थकारिणाम् । CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

( ६ ) माधवनिदान ।

( ६ ) माधवनिदान । औषधान्नविहाराणामुपयोगं सुखावहम् ॥ ८ ॥ विद्यादुपशयं व्याधेः स हि सात्म्यमिति स्मृतः । व्याधेः सुखावहम्, उपयोगम्, उपशयं विद्यात् स सात्म्यम् इति स्मृतः । केषाम् औषधान्नविहाराणाम्, किंभूतानां हेतुव्याधिविपर्यस्तविपर्यस्तार्थकारिणाम् इत्यन्वयः । व्याधेरुपयोगः सुखावहस्तमुपशयं विद्यात् जानीयात् । उपयुज्यत इति उप- योगः सेवनं सुखमावहति सम्यगनुबन्धेन सुखमुत्पादयतीति सुखावहः, केषामुपयोगः औषधान्नविहाराणाम्, औषधं चान्नं च विहारश्चौषधान्नविहारास्तेषाम्, औषधं हरी- तक्यादि, अन्नं रक्तशाल्यादि, विहारो देहमनोनिर्वर्तितचेष्टाविशेषः,किंभूतानाम् औष- धान्नविहाराणां हेतुव्याधिविपर्यस्तविपर्यस्तार्थकारिणाम्, हेतुर्बाह्य आभ्यन्तरश्च व्याधिर्ज्वरादिः हेतुश्च व्याधिश्च हेतुव्याधी तयोर्व्यस्तसमस्तयोः विपर्यस्ता व्याधि- निदानयोर्विपरीताः तथा विपर्यस्तानाम् अर्थो विपर्यस्तार्थः तयोर्व्यस्तसमस्तयोरेव विपरीतमर्थं कुर्वन्तीति विपर्यस्तार्थकारिणः हेतुव्याधिविपर्यस्ताश्च विपर्यस्तार्थकारिणश्च हेतुव्याधिविपर्यस्तविपर्यस्तार्थकारिणः, तेषां हेतुव्याधिविपर्यस्तविपर्यस्तार्थकारिणाम् । तदायमर्थः,-निदानरोगयोर्व्यस्तसमस्तयोर्विपरीता अपि कारणरूपा इव भासमाना व्याधिरूपा इव भासमाना हेतुव्याधिविपरीतानाम् अर्थं व्याध्युपशमलक्षणं कुर्वन्तीति । यथा । हेतुविपरीतैः औषधान्नविहारैर्व्याध्युपशयः क्रियते प्रतिपक्षत्वात् एवं विपर्य- स्ताश्चिपर्यस्तार्थकारिभिरपीत्यर्थः । तत्र चोपशमानामष्टादश भेदा भवन्ति । तान् वर्ण- यति यथा-हेतुविपरीतमौषधं हेतुविपरीतमन्रं हेतुविपरीतो विहारः । यथेमे त्रयो भेदा एवमेव सर्वत्र । तथा च हेतुविपरीतानां व्याधिविपरीतानां हेतुव्याधिविपरीतानां हेतुविपरीतार्थकारिणां व्याधिविपरीतार्थकारिणां हेतुव्याधिविपरीतार्थकारिणाम् औष- धान्नविहाराणां यः सुखावह उपयोगः स उपशय इति पिण्डार्थः । अथैषां क्रमेणो- दाहरणानि भाषायां वेदितव्यानि ॥ हेतुविपरीत व्याधिविपरीत हेतुव्याधिविपरीत हेतुविपर्यस्तार्थकारी व्याधिविपर्य- स्तार्थकारी हेतुव्याधिविपर्यस्तार्थकारी ऐसे जो औषध अन्न (पथ्य) विहार (आचरण) इनका सेवन सुखकारक जानना उसको व्याधिका उपशय कहते हैं, इसका तात्पर्य यह है कि रोग और रोगका हेतु इनको सुखकारक जो औषधि पथ्य आचरणरूप प्रयोग उसको उपशय कहते हैं और व्याधिसात्म्य ये पर्यायवाचक नाम उसी उप- शयके हैं। सुखकारकके कहनेसे यह प्रयोजन है कि दाह और प्यासयुक्त नवीन ज्वरमें शीतलजलका पीना व्याधिका बढानेवाला है इससे शीतलजल सुखकर्ता न भया अतएव CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

भाषाटीकासमेत । (७) शीतल जलको उपशय न समझना चाहिये परंतु दाहयुक्त प्यासमें शीतलजल उपशय मानाजायगा क्योंकि सुखकारक है ॥ आगे अब क्रमसे उदाहरण लिखते हैं-

नामऔषधिअन्नविहार
हेतुविपरीतशीतज्वरमें गरम औषधि सोंठश्रम और बादीस प्रगट रोगपर मांसके रस और भात.दिनके सोनेसे प्रगट कफरोगपर विपरीत आचरण रातमें जागना.
व्याधिविपरीतअतिसारमें दस्त बन्द करनेवाली औषधि पाठा, आदिदस्तोंमें दस्तके बन्द कारक पथ्य मसूर.उदावर्तरोगमें शब्दपूर्वक अधोवायुका निकसना, मन्त्र आषधि धारण, देव गुरूकी सेवा करनी.
हेतुव्याधिविपरीतवातकी सूजनमें दशमूलका काढा वात और सूजन दोनोंको दूर करनेवाला है.कफकी संग्रहणीमें छाछका पीना वातनाशक कफनाशक और संग्रहणी नाशक है.स्निग्ध जो दिनके सोनेसे उत्पन्न तन्द्रा तिसमें रूक्ष तन्द्रासे विपरीत स्निग्धतानाशक रात्रिमें जागना.
हेतुविपर्यस्तार्थकारीजैसे पित्त प्रधान व्रण सूजनमें पित्तकारक उष्ण पिण्डाकी बांधना.पित्तकी सूजनमें दाहकारक अन्नका भोजन करना.जैसे वातसे पैदा उन्मादमें वासका देना.
व्याधिविपर्यस्तार्थकारीजैसे कफरोगमें वमन कारक मैनफल आदि.अतिसार रोगमें दस्तकारक दुग्ध देना.छर्दिरोगमें हाथका अगूठा गलेमें करवा कमलनाल आदिसे उलटीका लाना.
हेतुव्याधिविपर्यस्तार्थकारीजैसे अग्नि जलेपर गरम अगर लेप आदि अथवा विष पर विष.जैसे मद्यपानके करनेसे प्रगट मदात्ययरोगमें मदकारक फिर मद्य पीना.दंड कसरतसे प्रगट वातमें जलका तैरनारूप व्यायामका करना.

हेतुविपरीत औषध-जैसे शीतकफज्वरमें सोंठ, तो इसमें प्रथम समझना चाहिये कि, यहां हेतु कौन है कि, सर्दी उसका शीतल धर्म है तो अब शीत कफ यह कब शान्त होय कि, जब सर्दी और कफसे विपरीत औषध मिले ऐसी औषध कौन कि, शुंठी यह सर्दीको और कफ दोनोंको शान्त करती है तो शीतकफज्वरमें हेतुविपरीत

( ८ ) माधवनिदान ।

( ८ ) माधवनिदान । औषध सोंठ हुई ऐसे ही हेतुविपरीत अन्न जैसे श्रम और वातसे प्रगट ज्वरोंमें मांसका रस और चावल इसमें हेतु कौन कि, श्रम और वात ये कब शान्त होंय कि, श्रम और वात हरणकर्त्ता पथ्य मिलै ऐसा पथ्य कौन कि, मांसरस और चावलोंका भात ये श्रम और वातके विपरीत हैं अर्थात् नाशक हैं ऐसे ही हेतुविपरीतविहार कहिये आचरण कौन जैसे दिनके सोनेसे प्रगट कफपर रातमें जागना, यहां हेतु कौन भया कि, दिनका सोना उसके प्रगट दोष कौन कि कफ, यह कफ कब शान्त होय कि, जिस हेतुसे प्रगट भया उस हेतुसे विपरीत आचरण करा जाय तो दिनके सोनेपर उलटा आचरण कौन कि, रातमें जागना, तो यह हेतुविपरीत आचरण भया । इसी प्रकार और उदाहरण व्याधिविपरीत आदिके लिखे हुए चक्रके अनुसार बुद्धिमान् मनुष्य समझ लेवेंगे ॥ अनुपशयके लक्षण । विपरीतोऽनुपशयो व्याध्यसात्म्यमिति स्मृतः ॥ ९ ॥ जो उपशयके लक्षण कहे हैं उससे विपरीत लक्षण अनुपशयके हैं और व्याधिका असात्म्य अर्थात् असमान नाम उसी अनुपशयका पर्यायवाचक शब्द है ॥ सम्प्राप्तिके लक्षण । यथा दुष्टेन दोषेण यथा चानुविसर्पता । निवृत्तिरामयस्याऽसौ सम्प्राप्तिर्जातिरागतिः ॥ १० ॥ दोष कहिये वात पित्त कफ इनका दुष्ट होना नाम कुपित होना अनेक प्रका- रका है अर्थात् स्वकारण या दूसरेके कारण करके ऐसे कुपित दोष अपने स्थानको छोड़कर देहमें ऊपर नीचे तिरछे विचरते हैं उस विचरनेसे जो रोग प्रगट हो उसको सम्प्राप्ति कहते हैं और जाति तथा आगति ये दोनों पर्यायवाचक नाम उसी सम्प्रा- प्तिकें हैं । तात्पर्यार्थ यह है कि, मनुष्यके देहमें वात पित्त कफ ये सम्पूर्ण दोष बढकर जैसे रोगको प्रगट करें तैसे ही उसको सम्प्राप्ति कहते हैं । उदाहरण-जैसे कुपितदोषोंका आमाशयमें प्रवेश होनेसे और स्थानमें इतस्ततो गमन करनेसे तथा रसकी बहनेवाली नाडियोंके मार्गोंको रोकनेसे और पक्वाशयमें रहनेवाली अग्निको बाहर निकालनेसे तथा उसी जठर अग्निसे सर्व देहके तप्त होनेसे यह ज्वर है, ऐसा जो निश्चय कह्या जाय है उसीको सम्प्राप्ति कहते हैं, ऐसे ही अतिसारादि रोगोंकी सम्प्राप्ति जाननी चाहिये ॥ सम्प्राप्तिके भेद । संख्याविकल्पप्राधान्यबलकालविशेषतः । अब सम्प्राप्तिके भेद कहते हैं सो कहिये सो सम्प्राप्ति संख्यादि विशेषण पांच प्रकारकी है जैसे-१ संख्या, २ विकल्प, ३ प्राधान्य, ४ बल, ५ काल इति ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

विकल्परूप संप्राप्तिके लक्षण ।

भाषाटीकासमेत । (९) संख्यारूप सम्प्राप्तिके लक्षण । सा भिद्यते यथात्रैव वक्ष्यन्तेऽष्टौ ज्वरा इति ॥ ११ ॥ जैसे इसी ग्रन्थमें आगे आठ प्रकारका ज्वर पांच प्रकारकी खांसी अर्थात् रोगोंकी गणनाको ही संख्यारूप सम्प्राप्ति कहते हैं ॥ विकल्परूप संप्राप्तिके लक्षण । दोषाणां समवेतानां विकल्पोऽंशांशकल्पना । मिले हुए दोष कहिये वात पित्त कफ इनके अंशांशका अनुमान करना उसका विकल्परूपसम्प्राप्ति कहते हैं, जैसे-धुआँके निकलनेसे यह पर्वत अग्निवाला है ऐसेही यह रोगीके देहमें वातका अंश विशेष है, काहेसे कि, वातके अंश विशेष मिलनेसे इसी अनुमानको विकल्पसंप्राप्ति कहते हैं । उदाहरण-जैसे रूखी शीतल हलकी और फैलानेवाली इत्यादि गुणयुक्त जो पवन उसका रूक्ष आदि गुणयुक्त कसैला रस वातको सर्वांश करके बढानेवाला है, ऐसेही कटुरस सर्व भाव करके पित्तको बढा- नेवाला है अर्थात् कटु, उष्ण, तीक्ष्णत्व करके हींग पित्तको बढानेवाली है ऐसेही मधुररस, जैसे भैंसका दूध यह सर्व भावकरके कफ बढानेवाली है इत्यादि । इसमें “दोषाणां” जो बहुवचन है सो दोषोंके पृथक् पृथक् ग्रहणके वास्ते है और “सम- वेतानाम्” यह पद जो है सो द्वंदूज और सन्निपातके ग्रहणनिमित्त धरा है ॥ प्राधान्यरूपसंप्राप्तिके लक्षण । स्वातंत्र्यपारतंत्र्याभ्यां व्याधेः प्राधान्यमादिशेत् ॥ १२ ॥ व्याधेः स्वातंत्र्येण च पुनः पारतंत्र्येण प्राधान्यम् आदिशेत् अप्राधान्यं चेति शेष इत्यन्वयः ॥ व्याधिके स्वतन्त्रता और परतन्त्रता करके प्रधानता और अप्रधानता कही है जैसे स्वतन्त्र ज्वरको प्रधानता है और ज्वराधीन श्वास आदि रोगोंको अप्रधानता है अर्थात् व्याधिकी स्वतंत्रतासे प्रधानता और परतंत्रतासे अप्रधानता जाननी चाहिये ॥ बलरूपसंप्राप्तिके लक्षण । हेत्वादिकात्स्न्र्यावयवैर्बलाबलविशेषणम् । अत्रापि व्याधेरित्यनुवर्तते । हेत्वादीनां हेतुपूर्वरूपरूपाणां कात्स्न्र्येन साकल्येन अवयवैरेकदेशैर्बलाबलयोर्विशेषणं विशेषावबोधः इत्यन्वयः । हेतु आदिशब्दोंसे हेतु, पूर्वरूप और रूप इनके सर्व अवयव ( लक्षण ) मिल- नेसे व्याधिको बलवान् जानना और थोडे लक्षण मिलनेसे निर्बल जानना; जैसे रोगके प्रति जो निदान कहा है वह निदान सम्पूर्ण रोगोंको उत्पन्न करनेवाला है कि एकदेश, ऐसे ही पूर्वरूप भी समस्त अवयवों करिके व्याधिका प्रकाशित है यह एकदेशसे इत्यादि ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

( १० ) माधवनिदान ।

( १० ) माधवनिदान । कालरूपसंप्राप्तिके लक्षण । नक्तंदिनर्तुभुक्तांशैर्व्याधिकालो यथामलम् ॥ १३ ॥ नक्त ( रात्री ) दिन ( दिवस ) ऋतु ( वसन्तादि ) भुक्त ( आहार ) इनका अंश कहिये एकदेश उसको यथादोष ( वात, पित्त, कफ ) के अनुसार व्याधिका काल अर्थात् रोगके घटने बढनेके हेतुका समय जाने । उदाहरण-दिखाते हैं जैसे- रात्रिके तीन भाग करे प्रथम, मध्य और अन्त्य; ता रात्रिका प्रथमभाग कफका है, मध्यभाग पित्तका, अन्त्यभाग वातका है। ऐसेही दिनके भी तीन भाग करे तो पूर्वाह्न कफका, मध्याह्न पित्तका, अपराह्न वातका है। ऐसे ही ऋतु जैसे वसंत- ऋतुमें कफ, शरदऋतुमें पित्त और वर्षामें वात कुपित होता है । ऐसे ही भोजनका जैसे भोजन करनेके समय कफका काल और अन्नके पचनेके समय पित्तका काल और जब भले प्रकार परिपक्व होगया तब वातका काल. इसके जाननेसे यह प्रयोजन है कि जिसे दोष ( वात, पित्त, कफ ) का जो काल कहा है उसका उसी उसी कालमें जान लेना कठिन मालूम नहीं होता ॥ निदानपंचकका उपसंहार । इति प्रोक्तो निदानार्थः स व्यासेनोपदेक्ष्यते ॥ १४ ॥ इति कहिये यह संक्षेप प्रकारसे जो निदानार्थ कहा उसे विस्तारपूर्वक प्रतिरोगके निदान पूर्वरूपादि करके कहेंगे ॥ सर्वेषामेव रोगाणां निदानं कुपिता मलाः । तत्प्रकोपस्य तु प्रोक्तं विविधाहितसेवनम् ॥ १५ ॥ अब पूर्व चतुर्थ श्लोककी व्याख्यामें कहे निदानके दो भेद कौन संनिकृष्ट और विप्रकृष्ट, तिसमें संनिकृष्ट कौन वातादिक समीपके कारण करके सर्व रोगोंका कारण हैं सो कहते हैं- “सर्वेषामिति” कुपित भये जो मल ( वात, पित्त, कफ ) ये सम्पूर्ण रोगोंके कारण होते हैं और उन वात, पित्त, कफ दोषोंके कोपका कारण अनेक प्रकारका जो अपथ्यसेवन करना ही है ॥ निदानार्थकरो रोगो रोगस्याप्युपजायते । तद्यथा ज्वरसन्तापाद्रक्तपित्तमुदीर्यते ॥ १६ ॥ १ केचन ऋत्वंशाः कतिपयाहोरात्राणि कथयंति । यदुक्तं वाग्भटे-“ऋतवोरित्यादि सप्ताहा- वृतुसन्धिरिति स्मृतः । ” २ यदाह चरकः-“ नास्ति रोगो विना दोषैर्यस्मात्तस्माद्विचक्षणः । अनुक्तमपि दोषाणां लिंगैर्व्याधिमुपाचरेत् ॥” मलिनीकरणान्मला वातपित्तकफाः ॥

भाषाटीकासमेत । ( ११ ) रक्तपित्ताज्ज्वरस्ताभ्यां श्वासश्चाप्युपजायते । प्लीहाभिवृद्ध्या जठरं जठराच्छोफ एव च ॥ १७ ॥ अर्शोभ्यो जाठरं दुःखं गुल्मश्चाप्युपजायते । ( दिवास्वापादिदोषैश्च प्रतिश्यायश्च जायते । ) प्रतिश्यायादथो कासः कासात्संजायते क्षयः ॥ १८ ॥ क्षयो रोगस्य हेतुत्वे शोषस्याप्युपजायते । कोई प्रश्न करे कि, जो पूर्व कह आये हैं यह ही निदान है अथवा इसके व्यति- रिक्त और, इसलिये कहते हैं रोगका रोग भी निदान होता है अर्थात् जो निदानसे कार्य होता है वह ही रोगसे भी होता है. इसवास्ते दृष्टांत देकर कहते हैं-“तद्यथेति” जैसे ज्वरसन्तापसे रक्तपित्त प्रगट होता है और रक्तपित्तसे ज्वर और रक्तपित्त- ज्वरसे श्वास प्रगट होता है और प्लीहाके बढनेसे जैसे उदररोग और उदररोगसे सूजन और बवासीरसे जैसे उदररोग और गुल्म ( गोला ) रोग, दिनमें सोने आदि- कोंसे जुकाम होता है और जुकामसे खांसी तथा खांसीसे ओजप्रभृति धातुओंका क्षय होता है, यह क्षयरोग ( राजयक्ष्मा ) सम्पूर्ण रोगोंमें राजा है इसको प्रगट करते हैं ॥ ते पूर्वं केवला रोगाः पश्चाद्धेत्वर्थकारिणः ॥ १९ ॥ वे रोग प्रथम स्वतन्त्र होते हैं और पीछे जब बल मिलगया तो वेही हेत्वर्थकारी अर्थात् रोगके उत्पन्न करनेवाले होते हैं जैसे ज्वरसे रक्तपित्त होता है ॥ कश्चिद्धि रोगो रोगस्य हेतुर्भूत्वा प्रशाम्यति । न प्रशाम्यति चाप्यन्यो हेत्वर्थं कुरुतेऽपि च ॥ एवं कृच्छ्रतमा नृणां दृश्यन्ते व्याधिसङ्कराः ॥ २० ॥ अब उसी रोग उत्पन्न करनेवाली व्याधिकी विचित्रता दिखाते हैं, जैसे कोई एक रोग दूसरेका कारण हो अर्थात् दूसरे रोगको प्रगट कर आप शांत हो जाता है जैसे ज्वरके सन्तापसे रक्तपित्त होता है उस समय ज्वर दूर होजाय और रक्त- पित्त रह जावे और कोई रोग दूसरे रोगको प्रगट कर आप जैसाका तैसा बना रहता है जैसे बवासीर नहीं जाय और गुल्म तथा उदररोग पैदा होते हैं । इस प्रकार मनुष्योंके घोर क्लेशदायक मिलेहुए रोग देखनेमें आते हैं । विशेष करके चिकित्सा विरुद्ध होनेसे ये रोग कृच्छ्रतम होते हैं ॥

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( १२ ) माधवनिदान ।

( १२ ) माधवनिदान । अब कहे हुए निदानादिपंचकद्वारा रोगनिवृत्तिरूप सिद्धिको इच्छा करके अवश्य जानने योग्य कहते हैं- तस्माद्यत्नेन सद्द्वैद्यैरिच्छद्भिः सिद्धिमूत्तमाम् । ज्ञातव्यो वक्ष्यते योऽयं ज्वरादीनां विनिश्चयः ॥ २१ ॥ “तस्मात्” इति । इसी कारण उत्तम सिद्धि हमको प्राप्त हो ऐसी जिन सद्द्वैद्योंकी इच्छा है उनको ज्वरादिरोगोंका निदान जो आगे कहते हैं वह यत्नसे जानना चाहिये॥ इति श्रीमाधवभावार्थदीपिकायां माधुरीटीकायां सर्वरोगनिदानादि- पंचककथनं समाप्तम् ॥ १ ॥ ज्वरनिदानम् । अब सर्व देहके रोगोंमें प्रथम प्रगट होनेसे बली, देह इन्द्रिय मनको तपायमान करनेसे, जन्म मरणका कारण होनेसे, स्थावर जंगम प्राणियोंमें स्थिति होनेसे सम्पूर्ण शरीरके रोगोंमें चरक, सुश्रुतादि आचार्योंने ज्वरको राजा कहा है । तदुक्तं चरके- देहेन्द्रियमनस्तापी सर्वरोगाग्रजो बली । ज्वरः प्रधानो रोगाणामुक्तो भगवता पुरा ॥ १ ॥ देह इन्द्रिय मनको तपायमान करनेसे, रोगोंमें प्रथम प्रगट होनेसे बलवान् ज्वरके सब रोगोंमें प्रधानता है ॥ ज्वरकी उत्पत्ति । दक्षापमानसंक्रुद्धरुद्रनिश्वाससम्भवः । ज्वरोऽष्टधा पृथग्द्वन्द्वसंघातागन्तुजः स्मृतः ॥ २ ॥ दक्षप्रजापतिकृत तिरस्कारसे क्रोधित श्रीरुद्र भगवान्‌के श्वाससे उत्पन्न जो १ ज्वरयति शरीराणीति ज्वरः नान्ये व्याधयस्तथा दारुणा बहूपद्रवाः दुश्चिकित्स्याश्च यथा- ऽयम्, स सर्वरोगाधिपतिर्नानातिर्यग्योनिषु च बहुविधैः शब्दैः श्रूयते । यथा-“पाकः स तु नागानामभितापश्च वाजिनाम् । गवामीश्वरसंज्ञश्च मानवानां ज्वरो मतः।।अजावीनां प्रलापाख्यः करभे चालसो भवेत् । हरिद्रो महिषाणां च मृगरागा मृगेषु च॥पक्षिणामभिघातस्तु मत्स्येष्विा न्द्रमदो मतः । पक्षपातः पतंगानां व्यालेष्वाक्षिकसंज्ञकः ॥ इत्यादि” सर्वप्राणभृतश्च सज्ज्वर- एव जायन्ते सज्ज्वरा एव म्रियन्ते । अतः सर्वरोगप्रगण्यत्वाज्ज्वर एव प्रागभिहितः ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

भाषाटीकासमेत। ( १३ ) ज्वर सो आठ प्रकारका है-वात, पित्त, कफ इनसे ३, द्वंद्वज ३ सन्निपात १ और आगंतुज १ ऐसे मिलकर संक्षेपसे ज्वर आठ प्रकारका है ॥ इस श्लोकमें-“ निःश्वाससम्भव ” यह जो पद धरा है सो श्वास यहां क्रोधके लक्षण करके कहा है किन्तु ज्वरकी श्वाससे उत्पत्ति नहीं है क्योंकि, जैसे सुश्रुतमें लिखा है यथा-“ रुद्रकोपाग्निसंभूतः सर्वभूतप्रतापनः” इति । अर्थात् क्रोधित रुद्रनें ललाटस्थ तीसरे अग्निमय चक्षु ( नेत्र ) को स्पर्श कर आग्नेयबाण निर्माण किया । तथा च चरके-“ स्पृष्ट्वा ललाटे चक्षुर्वै दग्ध्वा तानसुरान्प्रभुः । बाणं क्रोधाग्निसंतप्त- मसृजच्छत्रुनाशनम्॥” इत्यादिक वाक्योंसे ज्वरमात्रकी पित्तप्रकृति जाननी, प्रयोजन यह है कि सर्वज्वरमें पित्तकी विरोधी क्रिया न करे। सो वाग्भटने कहा है यथा-“ऊष्मा पित्तादृते नास्ति नात्युष्माणं विना ज्वरः । तस्मात्पित्तविरुद्धानि त्यजेत्पित्ताधिके- ऽधिकम् ॥ ” इति । अर्थात् गरमी पित्तके विना नहीं होती और ज्वर गरमीके विना नहीं होता इसीसे ज्वरमें पित्तविरुद्ध क्रिया न करे और पित्तज्वरमें विशेषकरके पित्तविरुद्ध क्रिया त्याज्य है । अन्य आचार्य कहते हैं कि-श्रीरुद्रसे उत्पत्ति होनेसें ज्वर देवता है इस लिये ज्वरका पूजन करनेसे शांत होता है, जैसे विदेहका वाक्य है-“ज्वरस्तु पूजनैर्वापि सहसैवोपशाम्यति ” और ज्वरका स्वरूप भी हरिवंशमें लिखा है यथा-“ ज्वरस्त्रिपादस्त्रिशिराः षड्भुजो नवलोचनः । भस्मप्रहरणो रौद्रः कालान्तक- यमोपमः ॥ ” इति । अर्थात् ज्वरके तीन चरण, तीन मस्तक, छः भुजा, नव नेत्र, भस्मयुक्त देह, रौद्र, कालका भी काल और यमराजके समान है ॥ ज्वरकी सम्प्राप्ति । मिथ्याहारविहाराभ्यां दोषा ह्यामाशयाश्रयाः । बहिर्निरस्य कोष्ठाग्निं ज्वरदाः स्यू रसानुगाः ॥ ३ ॥ मिथ्या आहार ( देश काल प्रकृति आदिसे विरुद्ध और संयोगविरुद्ध भोजन ) जो दोष ( वात, पित्त, कफ ) सो नाभिस्तनके बीच आमाशयमें प्राप्त हों रसको मिथ्याविहार ( देहके पुरुषार्थसे विशेष कामका करना ) इन कारणोंसे दुष्ट हुए बिगाडकर और कोष्ठस्थानमें रहती हुई जो अग्नि उसको देहके बाहर निकाल करके प्रगट करनेवाले होते हैं ॥ यह सम्प्राप्ति शरीररोगोंकी है आगन्तुजकी नहीं है, क्योंकि, आगन्तुज रोगोंका १-अकाले चातिमात्रं च असात्म्यं यच्च भोजनम् । विषमाशनं च यद्भूक्तं मिथ्याहारःस उच्यते॥ २-अशक्तः कुरुते कर्म शक्तिमात्रं करोति वा।मिथ्याविहारमित्युक्तं सदा चैव विवर्जयेत् ॥ ३-नाभिस्तनान्तरं जन्तोरामाशय इति स्मृतः ॥

( १४ ) माधवनिदान ।

( १४ ) माधवनिदान । तो व्यथापूर्वक वातादिदोषोंके रोकनेसे प्रयोजन है, जैसे—सुश्रुतमें लिखा है श्रम और चोटके लगनेसे देहधारियोंके कुपित हुई वात सब देहको परिपूर्ण कर ज्वरको पैदा करती है और चरकमें भी लिखा है कि चोटके लगनेसे प्रगट वात रुधिरको बिगाड व्यथा और शोष तथा विवर्णयुक्त वातज्वरको प्रगट करती है । शंका-क्योंजी ! आगंतुज भी शरीररोगही है क्योंकि आगंतुजज्वरमें भी गरमी रहती है क्यों कि- “उष्मा पित्तादृते नास्ति ” इत्यादि वाक्य प्रमाण होनेसे । उत्तर-यह जो तुमने कहा सो ठीक है परन्तु इन आगंतुजरोगोंमें पित्तकी पूर्वकालसे ही उत्पत्ति नहीं होती, पीछे उत्पत्ति होती है, इससे आगन्तुजरोगोंको शारीरत्व नहीं है । इस श्लोकमें—“कोष्ठाग्निम् ” यह जो पद धरा है सो धातुकी अग्निके निवारणार्थ है अर्थात् जब धातृग्नि बाहर आय जावेगी तो दोषोंका पचना नहीं होसके और दोष पके बिना ज्वरशांति नहीं होवेगी इसलिये इसका अर्थ ऐसा न करना चाहिये “बहिर्निरस्य कोष्ठाग्निम् ” कोठेके अग्निकी गरमीको बाहर निकालकर ऐसा अर्थ करना चाहिये ॥ ज्वरके लक्षण । स्वेदावरोधः संतापः सर्वाङ्गग्रहणं तथा । युगपद्यत्र रोगे तु स ज्वरो व्यपदिश्यते ॥ ४ ॥ जिस रोगमें पसीना न आवे, देहमें सन्ताप और सर्वांगमें पीडा ये एक ही समय हों उसको ज्वर ऐसे कहते हैं ॥ शंका-क्योंजी ! पित्तज्वरमें तो पसीना आता है तो इस श्लोकमें विरुद्धता आती है—इसपर जैज्जटादिक उत्तर-लिखते हैं कि स्वेदावरोध कहिये-“स्विद्यते अनेनेति स्वेदः ” इस व्युत्पत्ति करके स्वेद कहिये अग्नि तिसका अवरोध कहिये दोषकी व्याप्ति ऐसा अर्थ करनेसे श्लोकार्थमें विरुद्धता नहीं पडती ॥ ज्वरका पूर्वरूप । श्रमोऽरतिर्विवर्णत्वं वैरस्यं नयनप्लवः । इच्छा द्वेषो मुहुश्चापि शीतवातातपादिषु ॥ ५ ॥ जृम्भाऽङ्गमर्दो गुरुता रोमहर्षोऽरुचिस्तमः । अप्रहर्षश्च शीतं च भवत्युत्पत्स्यति ज्वरे ॥ ६ ॥ कारण बिनाही श्रम कर्म करनेमें उत्साह न हो अथवा खेलनेमें अरुचि, देहमें मलिनता, मुखमें विरसता, नेत्र अश्रुपातयुक्त और सर्दी, गर्मी, पवन इनकी बार- म्बार इच्छा होना और बारम्बार द्वेष हो इसमें जो आदि शब्द है उससे जल CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

भाषाटीकासमेत । ( १५ ) और अग्निका ग्रहण है अर्थात् इनकी बारबार इच्छा और द्वेष, ये चरकका मत है । तदुक्तं चरके-“ ज्वलनातपवाम्ब्वम्बुभक्तद्वेषाभिलाषिता ” इति । अन्ये तु 'शैत्यौ- ष्ण्यसाधर्म्याजलानलौ गृह्णन्ति ते तु आदिशब्देन शयनादिकं मन्यन्ते' और अन्य आचार्य सर्दी गर्मीके साधर्म्यसे जल अग्निको कहते हैं और वे आदिशब्दसे शयन आदि मानते हैं जम्भाई अंगोंका टूटना, देह भारी रोमांचोंका होना, अन्नमें अरुचि अँधेरीके आना, आनन्दकी निवृत्ति सर्दीका लगना. शंका--क्योंजी! पूर्व कहि आये कि सर्दी गरमीकी बार २ इच्छा और बार बार द्वेष पुनः शीत पद क्यों धरा ? उत्तर--इस पदके धरनेसे सर्दीकी अधिकता दिखाई अर्थात् सर्दी विशेष लगे ये लक्षण ज्वरके पूर्व होते हैं ॥ सामान्यतो विशेषात्तु जृम्भात्यर्थं समीरणात् । पित्तान्नयनयोर्दाहः कफान्नान्नाभिनन्दनम् ॥ ७ ॥ विशेषकरके वातज्वरमें जम्भाई बहुत आती हैं, पित्तज्वरमें नेत्रोंमें दाह होता है और कफज्वरमें अरुचि होती है ॥ वातज्वरके लक्षण । वेपथुर्विषमो वेगः कण्ठौष्ठमुखशोषणम् । निद्रानाशः क्षवस्तंभो गात्राणां रौक्ष्यमेव च ॥ ८ ॥ शिरोहृद्गात्ररुग्वक्त्रवैरस्यं गाढविट्कता । शूलाध्माने जृंभणं च भवन्त्यनिलजे ज्वरे ॥ ९ ॥ कंप होना, ज्वरका विषमवेग, कण्ठ, होठ, मुख इनका सूखना, निद्राका नाश, छींकका न आना, देहका रूखापना, चकारसे नेत्र, विष्ठा, मूत्र इनका काला होना और आचार्य--“ रौक्ष्यमेव च ” इस जगह “ श्यावांगमलमूत्रता ” ऐसा पाठ कहते हैं और मस्तक हृदय गात्र इनमें पीडा । कोई शंका-करे कि गात्र पदके धर- नेसे ही मस्तक हृदय आदिका बोध होगया फिर मस्तक और हृदय पद क्यों धरा ? उत्तर-इन दोनों पदोंके धरनेसे इनमें दर्दकी अधिकता दिखाई अर्थात् मस्तक हृद- यमें बहुत पीडा होय, मुखकी विरसता, मलका रुकना, शूल, अफरा, जम्भाई ये लक्षण वातज्वरके होते हैं ॥ पित्तज्वरके लक्षण । वेगस्तीक्ष्णोऽतिसारश्च निद्रालपत्वं तथा वमिः । कण्ठोष्ठमुखनासानां पाकः स्वेदश्च जायते ॥ १० ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

( १६ ) माधवनिदान ।

( १६ ) माधवनिदान । प्रलापो वक्त्रकटुता मूर्च्छा दाहो मदस्तृषा । पीतविण्मूत्रनेत्रत्वक् पैत्तिके भ्रम एव च ॥ ११ ॥ ज्वरका तीक्ष्ण वेग हो, अतिसार यानी पित्तके वेगसे दस्तका पतला होना न कि अतिसार रोग हो, थोडी निद्रा आवे, पित्तको कफके स्थानमें पहुँचनेसे वम- नका होना, कण्ठ, होठ, मुख, नाक इनका पकना और पसीनोंका आना, बडब- डाना, मुखमें कडुआईट, मूर्च्छा, दाह, उन्मत्तपना, प्यास, विष्ठा, मूत्र, नेत्र, देहकीं त्वचा इनका पीला होना तथा भ्रम ये लक्षण पित्तज्वरमें होते हैं। शंका-क्योंजी ! भ्रमको वातविकारमें लिखा है इससे तो वातका धर्म है फिर पित्तके विकारमें भ्रम शब्द क्यों धरा ? उत्तर-तुमने कहा सो ठीक है परन्तु रोग एकही दोषसे नहीं प्रगट होता अनेक दोषोंसे होय है। सो लिखा है-" न रोगोऽप्येकदोषजः" और " पैत्तिक भ्रम एव च" इस श्लोकमें चकार जो पढा है इससे इस श्लोकमें जो तीव्र गरमी लाल चकत्ते शीतकी इच्छा दाह अरुचि इत्यादि जानने ॥ कफज्वरके लक्षण । स्तैमित्यं स्तिमितो वेग आलस्यं मधुरास्यता । शुक्लमूत्रपुरीषत्वक्स्तम्भस्तृप्तिरथापि च ॥ १२ ॥ गौरवं शीतमुत्क्लेदो रोमहर्षोऽतिनिद्रता । प्रतिश्यायोऽरुचिः कासः कफजेऽक्ष्णोश्च शुक्लता ॥ १३ ॥ स्तैमित्य ( गीले कपडेसे देहको आच्छादित कर देनेसे जैसा हो ऐसा मालूम हो ) ज्वरका मन्दवेग, आलस्य, मुख मीठा, मल मूत्र सफेद, देहका जकडना, तृप्तके सरीखा अन्नमें अरुचि, देह भारी, शीत लगे, ओकारी आवे । अन्य आचार्य कहते हैं कि, कफका थूकना, रोमांचका होना, अतिनिद्रा, रसके बहनेवालीनाडीके मार्गोंका रुकना, दस्तका थोडा उतरना, पसीना, मुखमें नोनकासा स्वाद हो, देहका थोडा गरम होना, रद्दका होना, लारका गिरना, मुखपाक तथा मुख नाकसे कफका पडना, अरुचि, खांसी, नेत्र श्वेत हों ये लक्षण कफज्वरमें होते हैं-"स्तंभस्तृप्तिरथापि च " इस पदमें जो चकार है उससे देहमें पीडा; शीतका लगना, लारका गिरना, वमन, तंद्रिकरोग, हृदय लिहसासा, गरमी प्यारी लगे, मन्दाग्नि इत्यादि जानने ॥ वातपित्तज्वरके लक्षण । तृष्णा मूर्च्छा भ्रमो दाहः स्वप्ननाशः शिरोरुजा । कण्ठास्यशोषो वमथू रोमहर्षोऽरुचिस्तमः ॥ १४ ॥ पर्वभेदश्च जृम्भा च वातपित्तज्वराकृतिः । CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

भाषाटीकासमेत । ( १७ ) प्यास, मूर्च्छा, भ्रम, दाह, निद्रानाश, मस्तकपीडा, कण्ठ, मुखका सूखना, वमन, रोमाञ्च, अरुचि, अन्धकारदर्शन, संधियोंमें पीडा और जंभाई ये वातपित्त- ज्वरके लक्षण हैं ॥ वातकफज्वरके लक्षण । स्तैमित्यं पर्वणां भेदो निद्रा गौरवमेव च ॥ १५ ॥ शिरोग्रहः प्रतिश्यायः कासः स्वेदाप्रवर्तनम् । सन्तापो मध्यवेगश्च वातश्लेष्मज्वराकृतिः ॥ १६ ॥ स्तैमित्य ( गीले कपड़ेसे देहको ढकनेसे जैसा हो ऐसा मालूम हो ) संधियोंमें फूटनी, निद्रा, देह भारी, मस्तक भारी, नाकसे पानी गिरे, खांसी, पसीनेका न आना शरीरमें दाह, ज्वरका मध्यम वेग ये वातश्लेष्मज्वरके लक्षण हैं ॥ पित्तकफज्वरके लक्षण । लिप्ततिक्तास्यता तन्द्रा मोहः कासोऽरुचिस्तृषा । मुहुर्दाहो मुहुः शीतं श्लेष्मपित्तज्वराकृतिः ॥ १७ ॥ मुख कफसे लिप्त हो तथा पित्तके जोरसे मुखमें कडुआहट, तन्द्रा, मूर्च्छा, खांसी, अरुचि, प्यास, बारंबार दाह और शीतका लगना ये कफपित्तज्वरके लक्षण हैं, स्तम्भ ( देहका जकड़ना ) पसीना, कफ, पित्तका गिरना ये सुश्रुतोक्त लक्षण और भी जानने चाहिये ॥ सन्निपातज्वरके लक्षण । क्षणे दाहः क्षणे शीतमस्थिसन्धिशिरोरुजा । संस्रावे कलुषे रक्ते निर्भुग्ने चापि लोचने ॥ १८ ॥ सस्वनौ सरुजौ कर्णौ कण्ठः शूकैरिवावृतः । तन्द्रा मोहः प्रलापश्च कासः श्वासोऽरुचिर्भ्रमः ॥ १९ ॥ परिदग्धा खरस्पर्शा जिह्वा स्रस्ताङ्गता परम् । ष्ठीवनं रक्तपित्तस्य कफेनोन्मिश्रितस्य च ॥ २० ॥ शिरसो लोठनं तृष्णा निद्रानाशो हृदि व्यथा । स्वेदमूत्रपुरीषाणां चिराद्दर्शन- मल्पशः ॥ २१ ॥ कृशत्वं नातिगात्राणां सततं कण्ठकूज- नम् । कोष्ठानां श्यावरक्तानां मण्डलानां च दर्शनम् ॥ २२ ॥ मूकत्वं स्रोतसां पाको गुरुत्वमुदरस्य च । चिरात्पाकश्च दोषाणां सन्निपातज्वराकृतिः ॥ २३ ॥

( १८ ) माधवनिदान ।

( १८ ) माधवनिदान । अकस्मात् क्षणमें दाह, क्षणभरमें शीत लगे, हाड, संधि, मस्तक इनमें शूल, अश्रुपातयुक्त काले और लाल तथा फटेसे नेत्र होजावें ( अथवा टेढ़े नेत्र हों, यह जय्यटका मत है ) कानोंमें शब्द और पीडा हो, कण्ठमें कांटे पड़जायें, तन्द्रा, बेहोशी हो, अनर्थ बोले, खांसी, श्वास, अरुचि, भ्रम ये हो; जीभ परिदग्धवत् ( काली ) और खर्दरी गोजीभके समान तथा शिथिल ( लठर ) हो पित्त रुधिर मिला कफ थूके, शिरको इधर उधर पटके, तृषा बहुत लगे, निद्राका नाश हो, हृदयमें पीडा, पसीना मूत्र मल इनका बहुत कालमें थोडा उतरना, दोषोंके पूर्ण होनेसे देहका कृश न होना, कण्ठमें कफका निरन्तर बोलना, रुधिरसे काले लाल कोठे और चकत्तोंका होना, शब्द बहुत मन्द निकले, कान नाक मुख आदि छिद्रोंका पकना, पेटका भारी होना, वात पित्त कफ इनका देरमें पाक हो “उदरस्य च” इस पदमें जो चकार है इससे वाग्भटने जो लिखे हैं कौन, शीतका लगना, दिनमें घोर निद्राका आना, नित्य रात्रिमें जागना अथवा निद्रा कभी आवेही नहीं, पसीना बहुत आवे और नहीं आवे, कभी गान करे, कभी नाचे, हंसे, रोवे और चेष्टा पलट जाय इत्यादि जानने ये सन्निपातज्वरके लक्षण जानने ॥ शंका-क्योंजी ! वातादिक दोषोंके परस्पर विरुद्ध गुण हैं फिर उनका एकत्र मिलकर एकही कार्यका करना कहीं घट सके हैं, क्योंकि परस्पर विरुद्ध गुण होनेसे जैसे अग्नि और जलके विरुद्ध गुण होनेसे एकही कार्य नहीं हो सके ऐसेही वात पित्त कफके विरुद्ध गुण हैं फिर ये कैसे सन्निपातरूपी विकारको प्रगट करते हैं ? उत्तर- इसका समाधान दृढबल आचार्यने इस प्रकार कहा है कि, गुण विरुद्ध भी वात पित्त कफ दोष हैं तथा एक संग उत्पन्न होनेसे तथा परस्पर समानगुण होनेसे एक दूसरे दोषको शांत नहीं कर सकता, जैसे-सर्पका विष सर्पको बाधक नहीं। गदाधर आचार्य इसमें और हेतु कहते हैं जैसे दैवकी इच्छासे और दोषोंके स्वभावसे तथा विरुद्ध गुण होनेसे सन्निपातमें एक दोष दूसरे दोषका नाशक नहीं है. शंका- क्योंजी ! वात पित्त कफका अलग अलग कालमें संचय होता है और अलग अलग कोप होता है इनका एक ही कालमें प्रगट होना असम्भव है तो कहिये तीनों दोष मिलकर कैसे सन्निपातज्वरको प्रगट करते हैं ? उत्तर-ये त्रिदोष प्रगट कारक कारण औषध अन्न विहारके बल करके एक ही कालमें इन तीनों दोषोंका प्रकोप होता है यह सिद्धान्त है ॥ १ कोठके ७ लक्षण भालुकिने कहे हैं यथा-“वरटीदंशसंकाशः कण्डूमान् लोहितोऽस्र- कफपित्तक्षणिकोत्पत्तिविनाशः कोठ इत्यभिधीयते सद्भिः” इति । २ विरुद्धैरपि नत्वेते गुणैर्घ्नन्ति परस्परम् । दोषास्तु सहसाम्यात्त्वाद्विषं घोरमहीनिव । ३ दैवा दोषस्वभावाद्वा दोषाणां सान्निपातिके । विरुद्धैश्च गुणैस्तैश्च नोपघातः परस्परम् ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

भाषाटीकासमेत । (१९) सन्निपातोंके भेद । सुश्रुत और वाग्भटके मतसे सन्निपात एक ही प्रकारका है परन्तु और आचार्योंके मतसे उल्बणादि भेदों करके ५२ प्रकारका है, यथा- भ्रमः पिपासा दाहश्च गौरवं शिरसोऽतिरुक् । वातपित्तोल्बणे विद्याल्लिङ्गं मन्दकफे ज्वरे ॥ १ ॥ शैत्यं कासोऽरुचिस्तन्द्रा पिपासा दाहहृद्व्यथाः । वातश्लेष्मोल्बणे व्याधौ लिङ्गं पित्ता- नुगे विदुः ॥२॥ छर्दिः शैत्यं मुहुर्दाहस्तृष्णा मोहोऽस्थिवेदना । मन्दवाते व्यवस्यन्ति लिङ्गं पित्तकफोल्बणे ॥ ३ ॥ जिस सन्निपातज्वरमें वातपित्तकी अधिकता और कफकी मन्दता हो उसमें भ्रम प्यास दाह और शरीरका भारीपन शिरमें अत्यन्त पीडा ये लक्षण जानने चाहिये ॥ १ ॥ वातकफकी अधिकता और कफकी मन्दतामें शीत लगना खांसी अरुचि तन्द्रा प्यास दाह हृदयमें दर्द होता है ॥ २ ॥ पित्त कफकी अधिकता और वातकी मन्दतामें वमन जाडा लगना बारम्बार दाह प्यास मोह हड्डियोंमें पीडा होती है ॥ ३ ॥ सन्ध्यस्थिशिरसः शूलं प्रलापो गौरवं भ्रमः । वातोल्बणे स्याद् द्वयनुगे तृष्णा कण्ठास्यशुष्कता ॥ ४ ॥ रक्तविण्मूत्रता दाहः स्वेदस्तृष्णा बलक्षयः । मूर्च्छा चेति त्रिदोषे स्याल्लिङ्गं पित्ते गरीयसि ॥ ५ ॥ आलस्यारुचिहल्लासदाहवम्यरतिभ्रमैः । कफो- ल्वणं सन्निपातं तन्द्राकासेन चादिशेत् ॥ ६ ॥ वातकी अधिकता और पित्त कफकी न्यूनतामें सन्धिस्यान और हड्डी और शिरमें शूल, बड़बडाना, शरीरका भारीपन, भ्रम प्यास कण्ठ और मुखका सूखना होता है ॥ ४ ॥ पित्तकी अधिकता और वात कफकी मन्दतावाले सन्निपातमें लाल पुरीष और लाल मूत्र दाह पसीना प्यास बलका नाश मूर्च्छा ये लक्षण होते हैं ॥ ५ ॥ कफकी अधिकता पित्तवातकी न्यूनतामें आलस्य अरुचि (में) उवकाई जलन वमन पीडा भ्रम तन्द्रा और खांसी होती है ॥ ६ ॥ प्रतिश्यायश्छर्दिरास्यं तन्द्रारुच्यग्निमार्दवम् । हीनवाते पित्त- मध्ये लिङ्गं श्लेष्माधिके मतम् ॥ ७ ॥ हारिद्रमूत्रनेत्रत्वं दाह- स्तृष्णा भ्रमोऽरुचिः । हीनवाते मध्यकफे लिङ्गं पित्ताधिके

( २० ) माधवनिदान ।

( २० ) माधवनिदान । मतम् ॥ ८ ॥ शिरोरुग्वेपथुः श्वासः प्रलापच्छर्द्यरोचकाः । हीनपित्ते मध्यकफे लिङ्गं वाताधिके मतम् ॥ ९ ॥ हीन वायु पित्त मध्यम और कफकी अधिकतामें जुकाम वमन आलस्य तन्द्रा अरुचि मन्दाग्नि होती है ॥ ७ ॥ हीन वात कफ मध्यम पित्त अधिक होवे तो पीला मूत्र और नेत्रमें पीलापन जलन प्यास भ्रम अरुचि ये लक्षण होते हैं ॥ ८ ॥ हीन पित्त और कफ मध्यम और वातकी अधिकतामें शिरमें पीडा कांपना श्वास बड़बड़ाना वमन अरुचि होती है ॥ ९ ॥ शीतकं गौरवं तन्द्रा प्रलापोऽस्थिशिरोऽतिरुक् । हीनपित्ते वातमध्ये लिङ्गं श्लेष्माधिके विदुः ॥१०॥ वर्चोभेदोऽग्निदौर्बल्यं तृष्णा दाहोऽरुचिर्भ्रमः । कफहीने वातमध्ये लिङ्गं पित्ताधिके विदुः ॥ ११ ॥ श्वासः कासप्रतिश्यायौ मुखशोषोऽति पार्श्वरुक् । कफहीने पित्तमध्ये लिङ्गं वाताधिके मतम् ॥ १२ ॥ हीन पित्त और वात मध्यम कफकी अधिकतामें शीत शरीरका भारीपन तन्द्रा बड़बड़ाना हड्डी और शिरमें अत्यन्त पीडा होती है ॥ १० ॥ हीन कफ वात मध्यम पित्तकी अधिकतामें दस्त पतला अग्नि मन्द प्यास दाह अरुचि भ्रम ये लक्षण होतें हैं ॥ ११॥ हीन पित्त मध्यम वात कफ अधिक हो तो श्वास खांसी जुकाम मुखका सूखना पसवाडेमें अत्यन्त पीडा होती है ॥ १२ ॥ ये उल्बणादि भेद चरकके मतसे कहे हैं परन्तु भालुकि आचार्यने अपने ग्रन्थमें उल्बणादिलक्षण और ही प्रकारसे कहे हैं, यथा- वातपित्ताधिको यस्य सन्निपातः प्रकुप्यति । तस्य ज्वरोऽङ्ग- मर्दस्तृट्तालुशोषप्रमीलकाः ॥ १३ ॥ आध्मानतन्द्रावरुचि- श्वासकासभ्रमश्रमाः । पित्तश्लेष्माधिको यस्य सन्निपातः प्रकुप्यति ॥ १४ ॥ अन्तर्दाहो बहिः शीतस्तस्य तन्द्रा विवर्द्धते । तुद्यते दक्षिणं पार्श्वमुरःशीर्षगलग्रहाः ॥ १५ ॥ जिस पुरुषके वात पित्त अधिक हैं जिसमें ऐसा सन्निपात कोपको प्राप्त होता है उस पुरुषके ज्वर, सब शरीरमें दर्द, प्यास, तलुवा सूखना, नेत्र मिचना, अफारा, तन्द्रा, अरुचि, श्वास, कास, भ्रम, थकावत होती है। पित्तश्लेष्म अधिकवाला सन्नि- पात कुपित हो तो भीतर जलन बाहर ठंडा और तन्द्रा अधिक बढती है। दायें पसवाडेमें सुईसी चुभती है, हृदय शिर गला पकड़ा हुआ मालूम होता है॥१३-१५॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA