महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
अध्याय (पृष्ठ 1112)
हिडिम्ब-वध
भीमसेन और घटोत्कच
तत्पश्चात् काले मेघके समान उस राक्षसके शरीरको भीमने क्रोधपूर्वक तुरंत ऊपर उठा लिया और उसे सौ बार घुमाया ॥ २५ ॥
भीम उवाच वृथामांसैर्वृथापुष्टो वृथावृद्धो वृथामतिः । वृथामरणमर्हस्त्वं वृथाद्य न भविष्यसि ॥ २६ ॥ इसके बाद भीम उस राक्षससे बोले—अरे निशाचर! तू व्यर्थ मांससे व्यर्थ ही पुष्ट होकर व्यर्थ ही बड़ा हुआ है। तेरी बुद्धि भी व्यर्थ है। इसीसे तू व्यर्थ मृत्युके योग्य है। इसलिये आज तू व्यर्थ ही अपनी इहलीला समाप्त करेगा (बाहुयुद्धमें मृत्यु होनेके कारण तू स्वर्ग और कीर्तिसे वंचित हो जायगा) ॥ २६ ॥ क्षेममद्य करिष्यामि यथा वनमकण्टकम् । न पुनर्मानुषान् हत्वा भक्षयिष्यसि राक्षस ॥ २७ ॥ राक्षस! आज तुझे मारकर मैं इस वनको निष्कण्टक एवं मंगलमय बना दूँगा, जिससे फिर तू मनुष्योंको मारकर नहीं खा सकेगा ॥ २७ ॥
अर्जुन उवाच यदि वा मन्यसे भारं त्वमिमं राक्षसं युधि । करोमि तव साहाय्यं शीघ्रमेष निपात्यताम् ॥ २८ ॥ अर्जुन बोले—भैया! यदि तुम युद्धमें इस राक्षसको अपने लिये भार समझ रहे हो तो मैं तुम्हारी सहायता करता हूँ। तुम इसे शीघ्र मार गिराओ ॥ २८ ॥ अथवाप्यहमेवैनं हनिष्यामि वृकोदर । कृतकर्मा परिश्रान्तः साधु तावदुपारम ॥ २९ ॥ वृकोदर! अथवा मैं ही इसे मार डालूँगा। तुम अधिक युद्ध करके थक गये हो। अतः कुछ देर अच्छी तरह विश्राम कर लो ॥ २९ ॥
वैशम्पायन उवाच तस्य तद् वचनं श्रुत्वा भीमसेनोऽत्यमर्षणः । निष्पिष्यैनं बलाद् भूमौ पशुमारममारयत् ॥ ३० ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! अर्जुनकी यह बात सुनकर भीमसेन अत्यन्त क्रोधमें भर गये। उन्होंने बलपूर्वक राक्षसको पृथ्वीपर दे मारा और उसे रगड़ते हुए पशुकी तरह मारना आरम्भ किया ॥ ३० ॥ स मार्यमाणो भीमेन ननाद विपुलं स्वनम् । पूरयंस्तद् वनं सर्वं जलार्द्र इव दुन्दुभिः ॥ ३१ ॥
इस प्रकार भीमसेनकी मार पड़नेपर वह राक्षस जलसे भीगे हुए नगारेकी-सी ध्वनिसे सम्पूर्ण वनको गुँजाता हुआ जोर-जोरसे चीखने लगा ॥ ३१ ॥ बाहुभ्यां योक्त्रयित्वा तं बलवान् पाण्डुनन्दनः । मध्ये भङ्क्त्वा महाबाहुर्हर्षयामास पाण्डवान् ॥ ३२ ॥ तब महाबाहु बलवान् पाण्डुनन्दन भीमसेनने उसे दोनों भुजाओंसे बाँधकर उलटा मोड़ दिया और उसकी कमर तोड़कर पाण्डवोंका हर्ष बढ़ाया ॥ ३२ ॥ हिडिम्बं निहतं दृष्ट्वा संहृष्टास्ते तरस्विनः । अपूजयन् नरव्याघ्रं भीमसेनमरिंदमम् ॥ ३३ ॥ हिडिम्बको मारा गया देख वे महान् वेगशाली पाण्डव अत्यन्त हर्षसे उल्लसित हो उठे और उन्होंने शत्रुओंका दमन करनेवाले नरश्रेष्ठ भीमसेनकी भूरि-भूरि प्रशंसा की ॥ ३३ ॥ अभिपूज्य महात्मानं भीमं भीमपराक्रमम् । पुनरेवार्जुनो वाक्यमुवाचेदं वृकोदरम् ॥ ३४ ॥ इस प्रकार भयंकर पराक्रमी महात्मा भीमकी प्रशंसा करके अर्जुनने पुनः उनसे यह बात कही— ॥ ३४ ॥ न दूरं नगरं मन्ये वनादस्मादहं विभो । शीघ्रं गच्छाम भद्रं ते न नो विद्यात् सुयोधनः ॥ ३५ ॥ ‘प्रभो! मैं समझता हूँ, इस वनसे नगर अब दूर नहीं है। तुम्हारा कल्याण हो। अब हमलोग शीघ्र चलें, जिससे दुर्योधनको हमारा पता न लग सके’ ॥ ३५ ॥ ततः सर्वे तथेत्युक्त्वा सह मात्रा महारथाः । प्रययुः पुरुषव्याघ्रा हिडिम्बा चैव राक्षसी ॥ ३६ ॥ तब सभी पुरुषसिंह महारथी पाण्डव ‘(ठीक है,) ऐसा ही करें’ यों कहकर माताके साथ वहाँसे चल दिये। हिडिम्बा राक्षसी भी उनके साथ हो ली ॥ ३६ ॥
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि हिडिम्बवधपर्वणि हिडिम्बवधे त्रिपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १५३ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत हिडिम्बवधपर्वमें हिडिम्बासुरके वधसे सम्बन्ध रखनेवाला एक सौ तिरपनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १५३ ॥
१५४-
चतुष्पञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः
युधिष्ठिरका भीमसेनको हिडिम्बाके वधसे रोकना, हिडिम्बाकी भीमसेनके लिये प्रार्थना, भीमसेन और हिडिम्बाका मिलन तथा घटोत्कचकी उत्पत्ति
(वैशम्पायन उवाच
सा तानेवापतत् तूर्णं भगिनी तस्य रक्षसः ।
अब्रुवाणा हिडिम्बा तु राक्षसी पाण्डवान् प्रति ॥
अभिवाद्य ततः कुन्तीं धर्मराजं च पाण्डवम् ।
अभिपूज्य च तान् सर्वान् भीमसेनमभाषत ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! हिडिम्बा-सुरकी बहिन राक्षसी हिडिम्बा बिना कुछ कहे-सुने तुरंत पाण्डवोंके ही पास आयी और फिर माता कुन्ती तथा पाण्डुनन्दन धर्मराज युधिष्ठिरको प्रणाम करके उन सबके प्रति समादरका भाव प्रकट करती हुई भीमसेनसे बोली।
हिडिम्बोवाच
अहं ते दर्शनादेव मन्मथस्य वशं गता ।
क्रूरं भ्रातृवचो हित्वा सा त्वामेवानुरुन्धती ॥
राक्षसे रौद्रसंकाशे तवापश्यं विचेष्टितम् ।
अहं शुश्रूषुरिच्छेयं तव गात्रं निषेवितुम् ॥)
हिडिम्बाने कहा—(आर्यपुत्र!) आपके दर्शनमात्रसे मैं कामदेवके अधीन हो गयी और अपने भाईके क्रूरतापूर्ण वचनोंकी अवहेलना करके आपका ही अनुसरण करने लगी। उस भयंकर आकृतिवाले राक्षसपर आपने जो पराक्रम प्रकट किया है, उसे मैंने अपनी आँखों देखा है; अतः मैं सेविका आपके शरीरकी सेवा करना चाहती हूँ।
भीमसेन उवाच
स्मरन्ति वैरं रक्षांसि मायामाश्रित्य मोहिनीम् ।
हिडिम्बे व्रज पन्थानं त्वमिमं भ्रातृसेवितम् ॥ १ ॥
भीमसेन बोले— हिडिम्बे! राक्षस मोहिनी मायाका आश्रय लेकर बहुत दिनोंतक वैरका स्मरण रखते हैं, अतः तू भी अपने भाईके ही मार्गपर चली जा ॥ १ ॥
युधिष्ठिर उवाच
क्रुद्धोऽपि पुरुषव्याघ्र भीम मा स्म स्त्रियं वधीः ।
शरीरगुप्त्यभ्यधिकं धर्मं गोपाय पाण्डव ॥ २ ॥
यह सुनकर युधिष्ठिरने कहा—पुरुषसिंह भीम! यद्यपि तुम क्रोधसे भरे हुए हो, तो भी स्त्रीका वध न करो। पाण्डुनन्दन! शरीरकी रक्षाकी अपेक्षा भी अधिक तत्परतासे धर्मकी रक्षा करो ॥ २ ॥
वधाभिप्रायमायान्तमवधीस्त्वं महाबलम् ।
रक्षसस्तस्य भगिनी किं नः क्रुद्धा करिष्यति ॥ ३ ॥
महाबली हिडिम्ब हमलोगोंको मारनेके अभिप्रायसे आ रहा था। अतः तुमने जो उसका वध किया, वह उचित ही है। उस राक्षसकी बहिन हिडिम्बा यदि क्रोध भी करे तो हमारा क्या कर लेगी? ॥ ३ ॥
वैशम्पायन उवाच
हिडिम्बा तु ततः कुन्तीमभिवाद्य कृताञ्जलिः ।
युधिष्ठिरं तु कौन्तेयमिदं वचनमब्रवीत् ॥ ४ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! तदनन्तर हिडिम्बाने हाथ जोड़कर कुन्तीदेवी तथा उनके पुत्र युधिष्ठिरको प्रणाम करके इस प्रकार कहा— ॥ ४ ॥
आर्ये जानासि यद् दुःखमिह स्त्रीणामनङ्गजम् ।
तदिदं मामनुप्राप्तं भीमसेनकृतं शुभे ॥ ५ ॥
‘आर्ये! स्त्रियोंको इस जगत्में जो कामजनित पीड़ा होती है, उसे आप जानती ही हैं। शुभे! आपके पुत्र भीमसेनकी ओरसे मुझे वही कामदेवजनित कष्ट प्राप्त हुआ है ॥ ५ ॥
सोढं तत् परमं दुःखं मया कालप्रतीक्षया ।
सोऽयमभ्यागतः कालो भविता मे सुखोदयः ॥ ६ ॥
‘मैंने समयकी प्रतीक्षामें उस महान् दुःखको सहन किया है। अब वह समय आ गया है। आशा है, मुझे अभीष्ट सुखकी प्राप्ति होगी ॥ ६ ॥
मया ह्युत्सृज्य सुहृदः स्वधर्मं स्वजनं तथा ।
वृतोऽयं पुरुषव्याघ्रस्तव पुत्रः पतिः शुभे ॥ ७ ॥
‘शुभे! मैंने अपने हितैषी सुहृदों, स्वजनों तथा स्वधर्मका परित्याग करके आपके पुत्र पुरुषसिंह भीमसेनको अपना पति चुना है ॥ ७ ॥
वीरेणाहं तथानेन त्वया चापि यशस्विनि ।
प्रत्याख्याता न जीवामि सत्यमेतद् ब्रवीमि ते ॥ ८ ॥
‘यशस्विनि! यदि ये वीरवर भीमसेन या आप मेरी इस प्रार्थनाको ठुकरा देंगी तो मैं जीवित नहीं रह सकूँगी। यह मैं आपसे सत्य कहती हूँ ॥ ८ ॥
तदर्हसि कृपां कर्तुं मयि त्वं वरवर्णिनि ।
मत्वा मूढेति तन्मा त्वं भक्ता वानुगतेति वा ॥ ९ ॥
‘अतः वरवर्णिनि! आपको मुझे एक मूढ़ स्वभावकी स्त्री मानकर या अपनी भक्ता जानकर अथवा अनुचरी (सेविका) समझकर मुझपर कृपा करनी चाहिये ॥ ९ ॥ भर्त्रानिेन महाभागे संयोजय सुतेन ह । तमुपादाय गच्छेयं यथेष्टं देवरूपिणम् । पुनश्चैवानयिष्यामि विस्रम्भं कुरु मे शुभे ॥ १० ॥ ‘महाभागे! मुझे अपने इस पुत्रसे, जो मेरे मनोनीत पति हैं, मिलनेका अवसर दीजिये। मैं इन देवस्वरूप स्वामीको लेकर अपने अभीष्ट स्थानपर जाऊँगी और पुनः निश्चित समयपर इन्हें आपके समीप ले आऊँगी। शुभे! आप मेरा विश्वास कीजिये ॥ १० ॥ अहं हि मनसा ध्याता सर्वान् नेष्यामि वः सदा । (न यातुधान्यहं त्वार्ये न चास्मि रजनीचरी । कन्या रक्षस्सु साध्व्यस्मि राज्ञि सालकटङ्कटी ॥ पुत्रेण तव संयुक्ता युवतिर्देववर्णिनी । सर्वान् वोऽहमुपस्थास्ये पुरस्कृत्य वृकोदरम् ॥ अप्रमत्ता प्रमत्तेषु शुश्रूषुरसकृत् त्वहम् ।) वृजिनात् तारयिष्यामि दुर्गेषु विषमेषु च ॥ ११ ॥ पृष्ठेन वो वहिष्यामि शीघ्रं गतिमभीप्सतः । यूयं प्रसादं कुरुत भीमसेनो भजेत माम् ॥ १२ ॥ ‘आप अपने मनसे जब-जब मेरा स्मरण करेंगे, तब-तब सदा ही (सेवामें उपस्थित हो) मैं आपलोगोंको अभीष्ट स्थानोंमें पहुँचा दिया करूँगी। आर्ये! मैं न तो यातुधानी हूँ और न निशाचरी ही हूँ। महारानी! मैं राक्षस जातिकी सुशीला कन्या हूँ और मेरा नाम सालकटंकटी है। मैं देवोपम कान्तिसे युक्त और युवावस्थासे सम्पन्न हूँ। मेरे हृदयका संयोग आपके पुत्र भीमसेनके साथ हुआ है। मैं वृकोदरको सामने रखकर आप सब लोगोंकी सेवामें उपस्थित रहूँगी। आपलोग असावधान हों, तो भी मैं पूरी सावधानी रखकर निरन्तर आपकी सेवामें संलग्न रहूँगी। आपको संकटोंसे बचाऊँगी। दुर्गम एवं विषम स्थानोंमें यदि आप शीघ्रतापूर्वक अभीष्ट लक्ष्यतक जाना चाहते हों तो मैं आप सब लोगोंको अपनी पीठपर बिठाकर वहाँ पहुँचाऊँगी। आपलोग मुझपर कृपा करें, जिससे भीमसेन मुझे स्वीकार कर लें ॥ ११-१२ ॥ आपदस्तरणे प्राणान् धारयेद् येन तेन वा । सर्वमावृत्य कर्तव्यं तं धर्ममनुवर्तता ॥ १३ ॥ ‘जिस उपायसे भी आपत्तिसे छुटकारा मिले और प्राणोंकी रक्षा हो सके, धर्मका अनुसरण करनेवाले पुरुषको वह सब स्वीकार करके उस उपायको काममें लाना चाहिये ॥ १३ ॥ आपत्सु यो धारयति धर्मं धर्मविदुत्तमः ।
व्यसनं ह्येव धर्मस्य धर्मिणामापदुच्यते ॥ १४ ॥ ‘जो आपत्तिकालमें धर्मको धारण करता है, वही धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ है। धर्मपालनमें संकट उपस्थित होना ही धर्मात्मा पुरुषोंके लिये आपत्ति कही जाती है॥ १४ ॥
पुण्यं प्राणान् धारयति पुण्यं प्राणदमुच्यते । येन येनाचरेद् धर्मं तस्मिन् गर्हा न विद्यते ॥ १५ ॥ ‘पुण्य ही प्राणोंको धारण करता है, इसलिये पुण्य प्राणदाता कहलाता है; अतः जिस-जिस उपायसे धर्मका आचरण हो सके, उसके करनेमें कोई निन्दाकी बात नहीं है॥ १५ ॥
(महतोऽत्र स्त्रियं कामाद् बाधितां त्राहि मामपि । धर्मार्थकाममोक्षेषु दयां कुर्वन्ति साधवः ॥ तं तु धर्ममिति प्राहुर्मुनयो धर्मवत्सलाः । दिव्यज्ञानेन पश्यामि अतीतानागतानहम् ॥ तस्माद् वक्ष्यामि वः श्रेय आसन्नं सर उत्तमम् । अद्यासाद्य सरः स्नात्वा विश्रम्य च वनस्पतौ ॥ व्यासं कमलपत्राक्षं दृष्ट्वा शोकं विहास्यथ ॥ धार्तराष्ट्राद् विवासश्च दहनं वारणावते । त्राणं च विदुरात् तुभ्यं विदितं ज्ञानचक्षुषा ॥ आवासे शालिहोत्रस्य स च वासं विधास्यति । वर्षवातातपसहः अयं पुण्यो वनस्पतिः ॥ पीतमात्रे तु पानीये क्षुत्पिपासे विनश्यतः । तपसा शालिहोत्रेण सरो वृक्षश्च निर्मितः ॥ कादम्बाः सारसा हंसाः कुरर्यः कुररैः सह । रुवन्ति मधुरं गीतं गान्धर्वस्वनमिश्रितम् ॥
‘मैं महती कामवेदनासे पीड़ित एक नारी हूँ, अतः आप मेरी भी रक्षा कीजिये। साधु पुरुष धर्म, अर्थ, काम और मोक्षकी सिद्धिके सभी पुरुषार्थोंके लिये शरणागतोंपर दया करते हैं। धर्मानुरागी महर्षि दयाको ही श्रेष्ठ धर्म मानते हैं। मैं दिव्य ज्ञानसे भूत और भविष्यकी घटनाओंको देखती हूँ। अतः आपलोगोंके कल्याणकी बात बता रही हूँ। यहाँसे थोड़ी ही दूरपर एक उत्तम सरोवर है। आपलोग आज वहाँ जाकर उस सरोवरमें स्नान करके वृक्षके नीचे विश्राम करें। कुछ दिन बाद कमलनयन व्यासजीका दर्शन पाकर आपलोग शोकमुक्त हो जायेंगे। दुर्योधनके द्वारा आपलोगोंका हस्तिनापुरसे निकाला जाना, वारणावत नगरमें जलाया जाना और विदुरजीके प्रयत्नसे आप सब लोगोंकी रक्षा होनी आदि बातें उन्हें ज्ञानदृष्टिसे ज्ञात हो गयी हैं। वे महात्मा व्यास शालिहोत्र मुनिके आश्रममें निवास करेंगे। उनके आश्रमका वह पवित्र वृक्ष सर्दी, गर्मी और वर्षाको अच्छी तरह सहनेवाला है। वहाँ केवल जल पी लेनेसे भूख-प्यास दूर हो जाती है। शालिहोत्र मुनिने
अपनी तपस्याद्वारा पूर्वोक्त सरोवर और वृक्षका निर्माण किया है। वहाँ कादम्ब, सारस, हंस, कुररी और कुरर आदि पक्षी संगीतकी ध्वनिसे मिश्रित मधुर गीत गाते रहते हैं'।
वैशम्पायन उवाच
तस्यास्तद् वचनं श्रुत्वा कुन्ती वचनमब्रवीत् ।
युधिष्ठिरं महाप्राज्ञं सर्वशास्त्रविशारदम् ।।
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! हिडिम्बाका यह वचन सुनकर कुन्तीदेवीने सम्पूर्ण शास्त्रोंमें पारंगत परम बुद्धिमान् युधिष्ठिरसे इस प्रकार कहा।
कुन्त्युवाच
त्वं हि धर्मभृतां श्रेष्ठ मयोक्तं शृणु भारत ।
राक्षस्येषा हि वाक्येन धर्मं वदति साधु वै ।।
भावेन दुष्टा भीमं सा किं करिष्यति राक्षसी ।
भजतां पाण्डवं वीरमपत्यार्थं यदीच्छसि ।।)
**कुन्ती बोली—**धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ भारत! मैं जो कहती हूँ, उसे तुम सुनो; यह राक्षसी अपनी वाणीद्वारा तो उत्तम धर्मका ही प्रतिपादन करती है। यदि इसकी हार्दिक भावना भीमसेनके प्रति दूषित हो, तो भी यह उनका क्या बिगाड़ लेगी? अतः यदि तुम्हारी सम्मति हो तो यह संतानके लिये कुछ कालतक मेरे वीर पुत्र पाण्डुनन्दन भीमसेनकी सेवामें रहे।
युधिष्ठिर उवाच
एवमेतद् यथाऽऽत्थ त्वं हिडिम्बे नात्र संशयः ।
स्थातव्यं तु त्वया सत्ये यथा ब्रूयां सुमध्यमे ।। १६ ।।
**युधिष्ठिर बोले—**हिडिम्बे! तुम जैसा कह रही हो, वह सब ठीक है; इसमें संशय नहीं है। परंतु सुमध्यमे! मैं जैसे कहूँ, उसी प्रकार तुम्हें सत्यपर स्थिर रहना चाहिये ।। १६ ।।
स्नातं कृताह्निकं भद्रे कृतकौतुकमङ्गलम् ।
भीमसेनं भजेथास्त्वं प्रागस्तगमनाद् रवेः ।। १७ ।।
भद्रे! जब भीमसेन स्नान, नित्यकर्म तथा मांगलिक वेशभूषा आदि धारण कर लें, तब तुम प्रतिदिन उनके साथ रहकर सूर्यास्त होनेसे पहलेतक ही उनकी सेवा कर सकती हो ।। १७ ।।
अहस्सु विहरानेन यथाकामं मनोजवा ।
अयं त्वानयितव्यस्ते भीमसेनः सदा निशि ।। १८ ।।
तुम मनके समान वेगसे चलने-फिरनेवाली हो, अतः दिनभर तो तुम इनके साथ अपनी इच्छाके अनुसार विहार करो, परंतु रातको सदा ही तुम्हें भीमसेनको (हमारे पास) पहुँचा देना होगा ।। १८ ।।
(प्राक् संध्यातो विमोक्तव्यो रक्षितव्यश्च नित्यशः । एवं रमस्व भीमेन यावद् गर्भस्य वेदनम् ।। एष ते समयो भद्रे शुश्रूष्यश्चाप्रमत्तया । नित्यानुकूलया भूत्वा कर्तव्यं शोभनं त्वया ।।
संध्याकाल आनेसे पहले ही इन्हें छोड़ देना होगा और नित्य-निरन्तर इनकी रक्षा करनी होगी। इस शर्तपर तुम भीमसेनके साथ सुखपूर्वक तबतक रहो, जबतक कि तुम्हें यह पता न चल जाय कि तुम्हारे गर्भमें बालक आ गया है। भद्रे! यही तुम्हारे लिये पालन करनेयोग्य नियम है। तुम्हें सावधान होकर भीमसेनकी सेवा करनी चाहिये और नित्य उनके अनुकूल होकर सदा उनकी भलाईमें संलग्न रहना चाहिये।
युधिष्ठिरेणैवमुक्ता कुन्त्या चाङ्केऽधिरोपिता । भीमार्जुनान्तरगता यमाभ्यां च पुरस्कृता ।। तिर्यग् युधिष्ठिरे याति हिडिम्बा भीमगामिनी । शालिहोत्रसरो रम्यमासेदुस्ते जलार्थिनः ।। तत् तथेति प्रतिज्ञाय हिडिम्बा राक्षसी तदा । वनस्पतितलं गत्वा परिमृज्य गृहं यथा ।। पाण्डवानां च वासं सा कृत्वा पर्णमयं तथा ।
आत्मनश्च तथा कुन्त्या एकोद्देशे चकार सा ।। पाण्डवास्तु ततः स्नात्वा शुद्धाः संध्यामुपास्य च । तृषिताः क्षुत्पिपासाार्ता जलमात्रेण वर्तयन् ।। शालिहोत्रस्ततो ज्ञात्वा क्षुधार्तान् पाण्डवांस्तदा । मनसा चिन्तयामास पानीयं भोजनं महत् । ततस्ते पाण्डवाः सर्वे विश्रान्ताः पृ्थया सह ।। यथा जतुगृहे वृत्तं राक्षसेन कृतं च यत् । कृत्वा कथा बहुविधाः कथान्ते पाण्डुनन्दनम् ।। कुन्तिराजसुता वाक्यं भीमसेनमथाब्रवीत् ।।
युधिष्ठिरके यों कहनेपर कुन्तीने हिडिम्बाको अपने हृदयसे लगा लिया। तदनन्तर वह युधिष्ठिरसे कुछ दूरीपर रहकर भीमके साथ चल पड़ी। वह चलते समय भीम और अर्जुनके बीचमें रहती थी। नकुल और सहदेव सदा उसे आगे करके चलते थे। (इस प्रकार) वे (सब) लोग जल पीनेकी इच्छासे शालिहोत्र मुनिके रमणीय सरोवरके तटपर जा पहुँचे। वहाँ कुन्ती तथा युधिष्ठिरने पहले जो शर्त रखी थी, उसे स्वीकार करके हिडिम्बा राक्षसीने वैसा ही कार्य करनेकी प्रतिज्ञा की। तत्पश्चात् उसने वृक्षके नीचे जाकर घरकी तरह झाड़ू लगायी और पाण्डवोंके लिये निवास-स्थानका निर्माण किया। उन सबके लिये पर्णशाला तैयार करनेके बाद उसने अपने और कुन्तीके लिये एक दूसरी जगह कुटी बनायी। तदनन्तर पाण्डवोंने स्नान करके शुद्ध हो संध्योपासना किया और भूख-प्याससे पीड़ित होनेपर भी केवल जलका आहार किया। उस समय शालिहोत्र मुनिने उन्हें भूखसे व्याकुल जान मन-ही-मन उनके लिये प्रचुर अन्न-पानकी सामग्रीका चिन्तन किया (और उससे पाण्डवोंको भोजन कराया)। तदनन्तर कुन्तीदेवीसहित सब पाण्डव विश्राम करने लगे। विश्रामके समय उनमें नाना प्रकारकी बातें होने लगीं—किस प्रकार लाक्षागृहमें उन्हें जलानेका प्रयत्न किया गया तथा फिर राक्षस हिडिम्बने उन लोगोंपर किस प्रकार आक्रमण किया इत्यादि प्रसंग उनकी चर्चाके विषय थे। बातचीत समाप्त होनेपर कुन्तिराजकुमारी कुन्तीने पाण्डुनन्दन भीमसेनसे इस प्रकार कहा।
कुन्त्युवाच
यथा पाण्डुस्तथा मान्यस्तव ज्येष्ठो युधिष्ठिरः । अहं धर्मविधानेन मान्या गुरुतरा तव ।। तस्मात् पाण्डुहितार्थं मे युवराज हितं कुरु । निकृता धार्तराष्ट्रेण पापेनाकृतबुद्धिना । दुष्कृतस्य प्रतीकारं न पश्यामि वृकोदर ।। तस्मात् कतिपयाहेन योगक्षेमं भविष्यति ।।
क्षेमं दुर्गमिमं वासं वसिष्यामो यथासुखम् ।
इदमद्य महत् दुःखं धर्मकृच्छ्रं वृकोदर ॥
दृष्ट्वैव त्वां महाप्राज्ञ अनङ्गाभिप्रचोदिता ।
युधिष्ठिरं च मां चैव वरयामास धर्मतः ॥
धर्मार्थं देहि पुत्रं त्वं स नः श्रेयः करिष्यति ।
प्रतिवाक्यं तु नेच्छामि ह्यावाभ्यां वचनं कुरु ॥)
**कुन्ती बोली—**युवराज! तुम्हारे लिये जैसे महाराज पाण्डु माननीय थे, वैसे ही बड़े भाई युधिष्ठिर भी हैं। धर्मशास्त्रकी दृष्टिसे मैं उनकी अपेक्षा भी अधिक गौरवकी पात्र तथा सम्माननीय हूँ। अतः तुम महाराज पाण्डुके हितके लिये मेरी एक हितकर आज्ञाका पालन करो। वृकोदर! अपवित्र बुद्धिवाले पापात्मा दुर्योधनने हमारे साथ जो दुष्टता की है, उसके प्रतिशोधका उपाय मुझे कोई नहीं दिखायी देता। अतः कुछ दिनोंके बाद भले ही हमारा योगक्षेम सिद्ध हो। यह निवासस्थान अत्यन्त दुर्गम होनेके कारण हमारे लिये कल्याणकारी सिद्ध होगा। हम यहाँ सुखपूर्वक रहेंगे। महाप्राज्ञ भीमसेन! आज यह हमारे सामने अत्यन्त दुःखद धर्मसंकट उपस्थित हुआ है कि हिडिम्बा तुम्हें देखते ही कामसे प्रेरित हो मेरे और युधिष्ठिरके पास आकर धर्मतः तुम्हें पतिके रूपमें वरण कर चुकी है। मेरी आज्ञा है कि तुम उसे धर्मके लिये एक पुत्र प्रदान करो। वह हमारे लिये कल्याणकारी होगा। मैं इस विषयमें तुम्हारा कोई प्रतिवाद नहीं सुनना चाहती। तुम हम दोनोंके सामने प्रतिज्ञा करो।
वैशम्पायन उवाच
तथेति तत् प्रतिज्ञाय भीमसेनोऽब्रवीदिदम् ।
शृणु राक्षसि सत्येन समयं ते वदाम्यहम् ॥ १९ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! 'बहुत अच्छा' कहकर भीमसेनने वैसा ही करनेकी प्रतिज्ञा की (और हिडिम्बाके साथ गान्धर्व-विवाह कर लिया)। तत्पश्चात् भीमसेन हिडिम्बासे इस प्रकार बोले—'राक्षसी! सुनो, मैं सत्यकी शपथ खाकर तुम्हारे सामने एक शर्त रखता हूँ ॥ १९ ॥
यावत् कालेन भवति पुत्रस्योत्पादनं शुभे ।
तावत् कालं गमिष्यामि त्वया सह सुमध्यमे ॥ २० ॥
'शुभे! सुमध्यमे! जबतक तुम्हें पुत्रकी उत्पत्ति न हो जाय तभीतक मैं तुम्हारे साथ विहारके लिये चलूँगा' ॥ २० ॥
वैशम्पायन उवाच
तथेति तत् प्रतिज्ञाय हिडिम्बा राक्षसी तदा ।
भीमसेनमुपादाय सोर्ध्वमाचक्रमे ततः ॥ २१ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! तब 'ऐसा ही होगा' यह प्रतिज्ञा करके हिडिम्बा राक्षसी भीमसेनको साथ ले वहाँसे ऊपर आकाशमें उड़ गयी ।। २१ ।। शैलशृङ्गेषु रम्येषु देवतायतनेषु च । मृगपक्षिविघुष्टेषु रमणीयेषु सर्वदा ।। २२ ।। कृत्वा च परमं रूपं सर्वाभरणभूषिता । संजल्पन्ती सुमधुरं रमयामास पाण्डवम् ।। २३ ।। तथैव वनदुर्गेषु पुष्पितद्रुमवल्लिषु । सरस्सु रमणीयेषु पद्मोत्पलयुतेषु च ।। २४ ।। नदीद्वीपप्रदेशेषु वैदूर्यसिकतासु च । सुतीर्थवनतोयासु तथा गिरिनदीषु च ।। २५ ।। काननेषु विचित्रेषु पुष्पितद्रुमवल्लिषु । हिमवद्गिरिकुञ्जेषु गुहासु विविधासु च ।। २६ ।। प्रफुल्लशतपत्रेषु सरस्स्वमलवारिषु । सागरस्य प्रदेशेषु मणिहेमचितेषु च ।। २७ ।। पल्वलेषु च रम्येषु महाशालवनेषु च । देवारण्येषु पुण्येषु तथा पर्वतसानुषु ।। २८ ।। गुह्यकानां निवासेषु तापसायतनेषु च । सर्वर्तुफलरम्येषु मानसेषु सरस्सु च ।। २९ ।। बिभ्रती परमं रूपं रमयामास पाण्डवम् । रमयन्ती तथा भीमं तत्र तत्र मनोजवा ।। ३० ।। उसने रमणीय पर्वतशिखरोंपर, देवताओंके निवास-स्थानोंमें तथा जहाँ बहुत-से पशु-पक्षी मधुर शब्द करते रहते हैं, ऐसे सुरम्य प्रदेशोंमें सदा परम सुन्दर रूप धारण करके, सब प्रकारके आभूषणोंसे विभूषित हो मीठी-मीठी बातें करके पाण्डुनन्दन भीमसेनको सुख पहुँचाया। इसी प्रकार पुष्पित वृक्षों और लताओंसे सुशोभित दुर्गम वनोंमें, कमल और उत्पल आदिसे अलंकृत रमणीय सरोवरोंमें, नदियोंके द्वीपोंमें तथा जहाँकी वालुका वैदूर्य-मणिके समान है, जिनके घाट, तटवर्ती वन तथा जल सभी सुन्दर एवं पवित्र हैं, उन पर्वतीय नदियोंमें, विकसित वृक्षों और लता-वल्लरियोंसे विभूषित विचित्र काननोंमें, हिमवान् पर्वतके कुंजों और भाँति-भाँतिकी गुफाओंमें, खिले हुए कमलसमूहसे युक्त निर्मल जलवाले सरोवरोंमें, मणियों और सुवर्णसे सम्पन्न समुद्र-तटवर्ती प्रदेशोंमें, छोटे-छोटे सुन्दर तालाबोंमें, बड़े-बड़े शाल-वृक्षोंके जंगलोंमें, पवित्र देववनोंमें, पर्वतीय शिखरोंपर, गुह्यकोंके निवासस्थानोंमें, सभी ऋतुओंके फलोंसे सम्पन्न तपस्वी मुनियोंके सुरम्य आश्रमोंमें तथा मानसरोवर एवं अन्य जलाशयोंमें घूम-फिरकर हिडिम्बाने परम सुन्दर रूप धारण करके
पाण्डुनन्दन भीमसेनके साथ रमण किया। वह मनके समान वेगसे चलनेवाली थी, अतः उन-उन स्थानोंमें भीमसेनको आनन्द प्रदान करती हुई विचरती रहती थी॥ २२-३०॥
प्रजज्ञे राक्षसी पुत्रं भीमसेनान्महाबलम्।
विरूपाक्षं महावक्त्रं शङ्कुकर्णं बिभीषणम्॥ ३१॥
कुछ कालके पश्चात् उस राक्षसीने भीमसेनसे एक महान् बलवान् पुत्र उत्पन्न किया, जिसकी आँखें विकराल, मुख विशाल और कान शंकुके समान थे। वह देखनेमें बड़ा भयंकर जान पड़ता था॥ ३१॥
भीमनादं सुताम्रोष्ठं तीक्ष्णदंष्ट्रं महाबलम्।
महेष्वासं महावीर्यं महासत्त्वं महाभुजम्॥ ३२॥
महाजवं महाकायं महामायमरिंदमम्।
दीर्घघोणं महोरस्कं विकटोद्ध्वपिण्डिकम्॥ ३३॥
उसकी आवाज बड़ी भयानक थी। सुन्दर लाल-लाल ओठ, तीखी दाढ़ें, महान् बल, बहुत बड़ा धनुष, महान् पराक्रम, अत्यन्त धैर्य और साहस, बड़ी-बड़ी भुजाएँ, महान् वेग और विशाल शरीर—ये उसकी विशेषताएँ थीं। वह महामायावी राक्षस अपने शत्रुओंका दमन करनेवाला था। उसकी नाक बहुत बड़ी, छाती चौड़ी तथा पैरोंकी दोनों पिंडलियाँ टेढ़ी और ऊँची थीं॥ ३२-३३॥
अमानुषं मानुषजं भीमवेगं महाबलम्।
यः पिशाचानतीत्यान्यान् बभूवातीव राक्षसान्॥ ३४॥
यद्यपि उसका जन्म मनुष्यसे हुआ था तथापि उसकी आकृति और शक्ति अमानुषिक थी। उसका वेग भयंकर और बल महान् था। वह दूसरे पिशाचों तथा राक्षसोंसे बहुत अधिक शक्तिशाली था॥ ३४॥
बालोऽपि यौवनं प्राप्तो मानुषेषु विशाम्पते।
सर्वास्त्रेषु परं वीरः प्रकर्षमगमद् बली॥ ३५॥
राजन्! अवस्थामें बालक होनेपर भी वह मनुष्योंमें युवक-सा प्रतीत होता था। उस बलवान् वीरने सम्पूर्ण अस्त्र-शस्त्रोंमें बड़ी निपुणता प्राप्त की थी॥ ३५॥
सद्यो हि गर्भान् राक्षस्यो लभन्ते प्रसवन्ति च।
कामरूपधराश्चैव भवन्ति बहुरूपिकाः॥ ३६॥
राक्षसियाँ जब गर्भ धारण करती हैं, तब तत्काल ही उसको जन्म दे देती हैं। वे इच्छानुसार रूप धारण करनेवाली और नाना प्रकारके रूप बदलनेवाली होती हैं॥ ३६॥
प्रणम्य विकचः पादावगृह्णात् स पितुस्तदा।
मातुश्च परमेष्वासस्तौ च नामास्य चक्रतुः॥ ३७॥
उस महान् धनुर्धर बालकने पैदा होते ही पिता और माताके चरणोंमें प्रणाम किया। उसके सिरमें बाल नहीं उगे थे। उस समय पिता और माताने उसका इस प्रकार नामकरण
किया ।। ३७ ।। घटो हास्योत्कच इति माता तं प्रत्यभाषत । अब्रवीत् तेन नामास्य घटोत्कच इति स्म ह ।। ३८ ।। बालककी माताने भीमसेनसे कहा—‘इसका घट (सिर) उत्कच* अर्थात् केशरहित है।’ उसके इस कथनसे ही उसका नाम घटोत्कच हो गया ।। ३८ ।। अनुरक्तश्च तानासीत् पाण्डवान् स घटोत्कचः । तेषां च दयितो नित्यमात्मनित्यो बभूव ह ।। ३९ ।। घटोत्कचका पाण्डवोंके प्रति बड़ा अनुराग था और पाण्डवोंको भी वह बहुत प्रिय था। वह सदा उनकी आज्ञाके अधीन रहता था ।। ३९ ।। संवाससमयो जीर्ण इत्याभाष्य ततस्तु तान् । हिडिम्बा समयं कृत्वा स्वां गतिं प्रत्यपद्यत ।। ४० ।। तदनन्तर हिडिम्बा पाण्डवोंसे यह कहकर कि भीमसेनके साथ रहनेका मेरा समय समाप्त हो गया, आवश्यकताके समय पुनः मिलनेकी प्रतिज्ञा करके अपने अभीष्ट स्थानको चली गयी ।। ४० ।। घटोत्कचो महाकायः पाण्डवान् पृथाया सह । अभिवाद्य यथान्यायमब्रवीच्च प्रभाष्य तान् ।। ४१ ।। किं करोम्यहमार्याणां निःशङ्कं वदतानघाः । तं ब्रुवन्तं भैमसेनिं कुन्ती वचनमब्रवीत् ।। ४२ ।। तत्पश्चात् विशालकाय घटोत्कचने कुन्तीसहित पाण्डवोंको यथायोग्य प्रणाम करके उन्हें सम्बोधित करके कहा—‘निष्पाप गुरुजन! आप निःशंक होकर बतायें, मैं आपकी क्या सेवा करूँ?’ इस प्रकार पूछनेवाले भीमसेनकुमारसे कुन्तीने कहा— ।। ४१-४२ ।। त्वं कुरूणां कुले जातः साक्षाद् भीमसमो ह्यसि । ज्येष्ठः पुत्रोऽसि पञ्चानां साहाय्यं कुरु पुत्रक ।। ४३ ।। ‘बेटा! तुम्हारा जन्म कुरुकुलमें हुआ है। तुम मेरे लिये साक्षात् भीमसेनके समान हो। पाँचों पाण्डवोंके ज्येष्ठ पुत्र हो, अतः हमारी सहायता करो’ ।। ४३ ।।
वैशम्पायन उवाच
पृथायाप्येवमुक्तस्तु प्रणम्यैव वचोऽब्रवीत् । यथा हि रावणो लोके इन्द्रजिच्च महाबलः । वर्ष्मवीर्यसमो लोके विशिष्टश्चाभवं नृषु ।। ४४ ।। वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! कुन्तीके यों कहनेपर घटोत्कचने प्रणाम करके ही उनसे कहा—‘दादीजी! लोकमें जैसे रावण और मेघनाद बहुत बड़े बलवान् थे, उसी
प्रकार इस मानव-जगत्में मैं भी उन्हींके समान विशालकाय और महापराक्रमी हूँ; बल्कि उनसे भी बढ़कर हूँ ॥ ४४ ॥
कृत्यकाल उपस्थास्ये पितॄनिति घटोत्कचः । आमन्त्र्य रक्षसां श्रेष्ठः प्रतस्थे चोत्तरां दिशम् ॥ ४५ ॥ ‘जब मेरी आवश्यकता होगी, उस समय मैं स्वयं अपने पितृवर्गकी सेवामें उपस्थित हो जाऊँगा।’ यों कहकर राक्षसश्रेष्ठ घटोत्कच पाण्डवोंसे आज्ञा लेकर उत्तर दिशाकी ओर चला गया ॥ ४५ ॥
अध्याय (पृष्ठ 1127)
पाण्डवोंकी व्यासजीसे भेंट
धृष्टद्युम्नकी घोषणा
स हि सृष्टो मघवता शक्तिहेतोर्महात्मना ।
कर्णस्याप्रतिवीर्यस्य प्रतियोद्धा महारथः ॥ ४६ ॥
महामना इन्द्रने अनुपम पराक्रमी कर्णकी शक्तिका आघात सहन करनेके लिये घटोत्कचकी सृष्टि की थी। वह कर्णके सम्मुख युद्ध करनेमें समर्थ महारथी वीर था ॥ ४६ ॥
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि हिडिम्बवधपर्वणि घटोत्कचोत्पत्तौ
चतुष्पञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १५४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत हिडिम्बवधपर्वमें घटोत्कचकी उत्पत्तिविषयक एक सौ चौवनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १५४ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ३३ श्लोक मिलाकर कुल ७९ श्लोक हैं)
* कोई-कोई उत्कचका अर्थ 'ऊपर उठे हुए बालोंवाला' भी करते हैं।
१५५-
पञ्चपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः
पाण्डवोंको व्यासजीका दर्शन और उनका एकचक्रा नगरीमें प्रवेश
वैशम्पायन उवाच
ते वनेन वनं गत्वा घ्नन्तो मृगगणान् बहून् ।
अपक्रम्य ययु राजंस्त्वरमाणा महारथाः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! वे महारथी पाण्डव उस स्थानसे हटकर एक वनसे दूसरे वनमें जाकर बहुत-से हिंसक पशुओंको मारते हुए बड़ी उतावलीके साथ आगे बढ़े ॥ १ ॥
मत्स्यांस्त्रिगर्तान् पञ्चालान् कीचकानन्तरेण च ।
रमणीयान् वनोद्देशान् प्रेक्षमाणाः सरांसि च ॥ २ ॥
मत्स्य, त्रिगर्त, पंचाल तथा कीचक—इन जनपदोंके भीतर होकर रमणीय वनस्थलियॉं और सरोवरोंको देखते हुए वे लोग यात्रा करने लगे ॥ २ ॥
जटाः कृत्वाऽऽत्मनः सर्वे वल्कलाजिनवाससः ।
सह कुन्त्या महात्मानो बिभ्रतस्तापसं वपुः ॥ ३ ॥
क्वचिद् वहन्तो जननीं त्वरमाणा महारथाः ।
क्वचिच्छन्देन गच्छन्तस्ते जग्मुः प्रसभां पुनः ॥ ४ ॥
उन सबने अपने सिरपर जटाएँ रख ली थीं। वल्कल और मृगचर्मसे अपने शरीरको ढँक लिया था और तपस्वीका-सा वेष धारण कर रखा था। इस प्रकार वे महारथी महात्मा पाण्डव माता कुन्तीदेवीके साथ कहीं तो उन्हें पीठपर ढोते हुए तीव्र गतिसे चलते थे, कहीं इच्छानुसार धीरे-धीरे पाँव बढ़ाते थे और कहीं पुनः अपनी चाल तेज कर देते थे ॥ ३-४ ॥
ब्राह्मं वेदमधीयाना वेदाङ्गानि च सर्वशः ।
नीतिशास्त्रं च सर्वज्ञा ददृशुस्ते पितामहम् ॥ ५ ॥
पाण्डवलोग सब शास्त्रोंके ज्ञाता थे और प्रतिदिन उपनिषद्, वेद-वेदांग तथा नीतिशास्त्रका स्वाध्याय किया करते थे। एक दिन जब वे स्वाध्यायमें लगे थे, पितामह व्यासजीका दर्शन हुआ ॥ ५ ॥
तेऽभिवाद्य महात्मानं कृष्णद्वैपायनं तदा ।
तस्थुः प्राञ्जलयः सर्वे सह मात्रा परंतपाः ॥ ६ ॥
शत्रुओंको संताप देनेवाले पाण्डवोंने उस समय महात्मा श्रीकृष्णद्वैपायनको प्रणाम किया और अपनी माताके साथ वे सब लोग उनके आगे हाथ जोड़कर खड़े हो गये ॥ ६ ॥
व्यास उवाच
मयेदं व्यसनं पूर्वं विदितं भरतर्षभाः । यथा तु तैरधर्मेण धार्तराष्ट्रैर्विवासिताः ॥ ७ ॥ तद् विदित्वास्मि सम्प्राप्तश्चिकीर्षुः परमं हितम् । न विषादोऽत्र कर्तव्यः सर्वमेतत् सुखाय वः ॥ ८ ॥
तब व्यासजीने कहा—भरतश्रेष्ठ पाण्डुकुमारो! मैंने पहले ही तुमलोगोंपर आये हुए इस संकटको जान लिया था। धृतराष्ट्रके पुत्रोंने तुम्हें जिस प्रकार अधर्मपूर्वक राज्यसे बहिष्कृत किया है, वह सब जानकर तुम्हारा परम हित करनेके लिये मैं यहाँ आया हूँ। इसके लिये तुम्हें विषाद नहीं करना चाहिये; यह सब तुम्हारे भावी सुखके लिये हो रहा है ॥ ७-८ ॥
समास्ते चैव मे सर्वे यूयं चैव न संशयः । दीनतो बालतश्चैव स्नेहं कुर्वन्ति मानवाः । तस्मादभ्यधिकः स्नेहो युष्मासु मम साम्प्रतम् ॥ ९ ॥
इसमें संदेह नहीं कि मेरे लिये तुमलोग और धृतराष्ट्रके पुत्र दुर्योधन आदि सब समान ही हैं। फिर भी जहाँ दीनता और बचपन है, वहीं मनुष्य अधिक स्नेह करते हैं; इसी कारण इस समय तुमलोगोंपर मेरा अधिक स्नेह है ॥ ९ ॥
स्नेहपूर्वं चिकीर्षामि हितं वस्तन्निबोधत । इदं नगरमभ्याशे रमणीयं निरामयम् । वसतेह प्रतिच्छन्ना ममागमनकाङ्क्षिणः ॥ १० ॥
मैं स्नेहपूर्वक तुमलोगोंका हित करना चाहता हूँ। इसलिये मेरी बात सुनो। यहाँ पास ही जो यह रमणीय नगर है, इसमें रोग-व्याधिका भय नहीं है। अतः तुम सब लोग यहीं छिपकर रहो और मेरे पुनः आनेकी प्रतीक्षा करो ॥ १० ॥
वैशम्पायन उवाच
एवं स तान् समाश्वास्य व्यासः सत्यवतीसुतः । एकचक्रामभिगतः कुन्तीमाश्वासयत् प्रभुः ॥ ११ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! इस प्रकार पाण्डवोंको भलीभाँति आश्वासन देकर सत्यवतीनन्दन भगवान् व्यास उन सबके साथ एकचक्रा नगरीके निकट गये। वहाँ उन्होंने कुन्तीको इस प्रकार सान्त्वना दी ॥ ११ ॥
व्यास उवाच
जीवत्पुत्रि सुतस्तेऽयं धर्मनित्यो युधिष्ठिरः । धर्मेण पृथिवीं जित्वा महात्मा पुरुषर्षभः । पृथिव्यां पार्थिवान् सर्वान् प्रशासिष्यति धर्मराट् ॥ १२ ॥
**व्यासजी बोले—**जीवित पुत्रोंवाली बहू! तुम्हारे ये पुत्र नरश्रेष्ठ महात्मा धर्मराज युधिष्ठिर सदा धर्मपरायण हैं; अतः ये धर्मसे ही सारी पृथ्वीको जीतकर भूमण्डलके सम्पूर्ण राजाओंपर शासन करेंगे ।। १२ ।।
पृथिवीमखिलां जित्वा सर्वां सागरमेखलाम् ।
भीमसेनार्जुनबलाद् भोक्ष्यते नात्र संशयः ॥ १३ ॥
भीमसेन और अर्जुनके बलसे समुद्रपर्यन्त सारी वसुधाको अपने अधिकारमें करके ये उसका उपभोग करेंगे; इसमें संशय नहीं है ।। १३ ।।
पुत्रास्तव च माद्रयाश्च सर्व एव महारथाः ।
स्वराष्ट्रे विहरिष्यन्ति सुखं सुमनसः सदा ॥ १४ ॥
तुम्हारे और माद्रीके सभी महारथी पुत्र सदा अपने राज्यमें प्रसन्नचित्त हो सुखपूर्वक विचरेंगे ।। १४ ।।
यक्ष्यन्ति च नरव्याघ्रा निर्जित्य पृथिवीमिमाम् ।
राजसूयाश्वमेधाद्यैः क्रतुभिर्भूरिदक्षिणैः ॥ १५ ॥
पुरुषोंमें सिंहके समान बलवान् पाण्डव इस पृथ्वीको जीतकर प्रचुर दक्षिणासे सम्पन्न राजसूय तथा अश्वमेध आदि यज्ञोंद्वारा भगवान्का यजन करेंगे ।। १५ ।।
अनुगृह्य सुहृद्वर्गं भोगैश्वर्यसुखेन च ।
पितृपैतामहं राज्यमिमे भोक्ष्यन्ति ते सुताः ॥ १६ ॥
तुम्हारे ये पुत्र अपने सुहृदोंके समुदायको उत्तम भोग एवं ऐश्वर्य-सुखके द्वारा अनुगृहीत करके बाप-दादोंके राज्यका पालन एवं उपभोग करेंगे ।। १६ ।।
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्त्वा निवेश्यैनान् ब्राह्मणस्य निवेशने ।
अब्रवीत् पाण्डवश्रेष्ठमृषिर्द्वैपायनस्तदा ॥ १७ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! यों कहकर महर्षि द्वैपायनने इन सबको एक ब्राह्मणके घरमें ठहरा दिया और पाण्डवश्रेष्ठ युधिष्ठिरसे कहा— ।। १७ ।।
इह मासं प्रतीक्षध्वमागमिष्याम्यहं पुनः ।
देशकालौ विदित्वैव लप्स्यध्वं परमां मुदम् ॥ १८ ॥
‘तुमलोग यहाँ एक मासतक मेरी प्रतीक्षा करो। मैं पुनः आऊँगा। देश और कालका विचार करके ही कोई कार्य करना चाहिये; इससे तुम्हें बड़ा सुख मिलेगा’ ।। १८ ।।
स तैः प्राञ्जलिभिः सर्वैस्तथेत्युक्तो नराधिप ।
जगाम भगवान् व्यासो यथागतमृषिः प्रभुः ॥ १९ ॥
राजन्! उस समय सबने हाथ जोड़कर उनकी आज्ञा स्वीकार की। तदनन्तर शक्तिशाली महर्षि भगवान् व्यास जैसे आये थे, वैसे ही चले गये ।। १९ ।।