महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
**शकुन्तला बोली—**अभ्यागत! मेरे पूज्य पिताजी फल लानेके लिये आश्रमसे बाहर गये हैं। अतः दो घड़ी प्रतीक्षा कीजिये। लौटनेपर उनसे मिलियेगा ॥ ९ ॥
वैशम्पायन उवाच
अपश्यमानस्तमृषिं तथा चोक्तस्तया च सः ।
तां दृष्ट्वा च वरारोहां श्रीमतीं चारुहासिनीम् ॥ १० ॥
विभ्राजमानां वपुषा तपसा च दमेन च ।
रूपयौवनसम्पन्नामित्युवाच महीपतिः ॥ ११ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! राजा दुष्यन्तने देखा—महर्षि कण्व आश्रमपर नहीं हैं और वह तापसी कन्या उन्हें वहाँ ठहरनेके लिये कह रही है; साथ ही उनकी दृष्टि इस बातकी ओर भी गयी कि यह कन्या सर्वाङ्गसुन्दरी, अपूर्व शोभासे सम्पन्न तथा मनोहर मुसकानसे सुशोभित है। इसका शरीर सौन्दर्यकी प्रभासे प्रकाशित हो रहा है, तपस्या तथा मन-इन्द्रियोंके संयमने इसमें अपूर्व तेज भर दिया है। यह अनुपम रूप और नयी जवानीसे उद्भासित हो रही है, यह सब सोचकर राजाने पूछा— ॥ १०-११ ॥
का त्वं कस्यासि सुश्रोणि किमर्थं चागता वनम् ।
एवंरूपगुणोपेता कुतस्त्वमसि शोभने ॥ १२ ॥
‘मनोहर कटिप्रदेशसे सुशोभित सुन्दरी! तुम कौन हो? किसकी पुत्री हो? और किसलिये इस वनमें आयी हो? शोभने! तुममें ऐसे अद्भुत रूप और गुणोंका विकास कैसे हुआ है? ॥ १२ ॥
दर्शनादेव हि शुभे त्वया मेऽपहृतं मनः ।
इच्छामि त्वामहं ज्ञातुं तन्ममाचक्ष्व शोभने ॥ १३ ॥
‘शुभे! तुमने दर्शनमात्रसे मेरे मनको हर लिया है। कल्याणि! मैं तुम्हारा परिचय जानना चाहता हूँ, अतः मुझे सब कुछ ठीक-ठीक बताओ ॥ १३ ॥
(शृणु मे नागनासोरु वचनं मत्तकाशिनि ॥
राजर्षेरन्वये जातः पूरोरस्मि विशेषतः ।
वृणे त्वामद्य सुश्रोणि दुष्यन्तो वरवर्णिनि ॥
न मेऽन्यत्र क्षत्रियायां मनो जातु प्रवर्तते ।
ऋषिपुत्रीषु चान्यासु नावर्णासु परासु वा ॥
तस्मात् प्रणिहितात्मानं विद्धि मां कलभाषिणि ।
तस्य मे त्वयि भावोऽस्ति क्षत्रिया ह्यसि का वद ॥
न हि मे भीरु विप्रायांमनः प्रसहते गतिम् ।
भजे त्वामायतापाङ्गि भक्तं भजितुमर्हसि ॥
भुङ्क्ष्व राज्यं विशालाक्षि बुद्धिं मा त्वन्यथा कृथाः ।)
‘हाथीकी सूँड़के समान जाँघोंवाली मतवाली सुन्दरी! मेरी बात सुनो; मैं राजर्षि पूरुके वंशमें उत्पन्न राजा दुष्यन्त हूँ। आज मैं अपनी पत्नी बनानेके लिये तुम्हारा वरण करता हूँ। क्षत्रिय-कन्याके सिवा दूसरी किसी स्त्रीकी ओर मेरा मन कभी नहीं जाता। अन्यान्य ऋषिपुत्रियों, अपनेसे भिन्न वर्णकी कुमारियों तथा परायी स्त्रियोंकी ओर भी मेरे मनकी गति नहीं होती। मधुरभाषिणि! तुम्हें यह ज्ञात होना चाहिये कि मैं अपने मनको पूर्णतः संयममें रखता हूँ। ऐसा होनेपर भी तुमपर मेरा अनुराग हो रहा है, अतः तुम क्षत्रिय-कन्या ही हो। बताओ, तुम कौन हो? भीरु! ब्राह्मण-कन्याकी ओर आकृष्ट होना मेरे मनको कदापि सह्य नहीं है। विशाल नेत्रोंवाली सुन्दरी! मैं तुम्हारा भक्त हूँ; तुम्हारी सेवा चाहता हूँ; तुम मुझे स्वीकार करो। विशाललोचने! मेरा राज्य भोगो। मेरे प्रति अन्यथा विचार न करो, मुझे पराया न समझो’।
एवमुक्ता तु सा कन्या तेन राज्ञा तमाश्रमे ।
उवाच हसती वाक्यमिदं सुमधुराक्षरम् ॥ १४ ॥
उस आश्रममें राजाके इस प्रकार पूछनेपर वह कन्या हँसती हुई मिठासभरे वचनोंमें उनसे इस प्रकार बोली— ॥ १४ ॥
कण्वस्याहं भगवतो दुष्यन्त दुहिता मता ।
तपस्विनो धृतिमतो धर्मज्ञस्य महात्मनः ॥ १५ ॥
‘महाराज दुष्यन्त! मैं तपस्वी, धृतिमान्, धर्मज्ञ तथा महात्मा भगवान् कण्वकी पुत्री मानी जाती हूँ ॥ १५ ॥
(अस्वतन्त्रास्मि राजेन्द्र काश्यपो मे गुरुः पिता ।
तमेव प्रार्थय स्वार्थं नायुक्तं कर्तुमर्हसि ॥)
‘राजेन्द्र! मैं परतन्त्र हूँ। कश्यपनन्दन महर्षि कण्व मेरे गुरु और पिता हैं। उन्हींसे आप अपने प्रयोजनकी सिद्धिके लिये प्रार्थना करें। आपको अनुचित कार्य नहीं करना चाहिये’।
दुष्यन्त उवाच
ऊर्ध्वरेता महाभागे भगवाँल्लोकपूजितः ।
चलेद्धि वृत्ताद् धर्मोऽपि न चलेत् संशितव्रतः ॥ १६ ॥
दुष्यन्त बोले—महाभागे! विश्ववन्द्य कण्व तो नैष्ठिक ब्रह्मचारी हैं। वे बड़े कठोर व्रतका पालन करते हैं। साक्षात् धर्मराज भी अपने सदाचारसे विचलित हो सकते हैं, परंतु महर्षि कण्व नहीं ॥ १६ ॥
कथं त्वं तस्य दुहिता सम्भूता वरवर्णिनी ।
संशयो मे महानत्र तन्मे छेत्तुमिहार्हसि ॥ १७ ॥
ऐसी दशामें तुम-जैसी सुन्दरी देवी उनकी पुत्री कैसे हो सकती है? इस विषयमें मुझे बड़ा भारी संदेह हो रहा है। मेरे इस संदेहका निवारण तुम्हीं कर सकती हो ॥ १७ ॥
शकुन्तलोवाच
यथायमागमो मह्यं यथा चेदमभूत् पुरा ।
शृणु राजन् यथातत्त्वं यथास्मि दुहिता मुनेः ॥ १८ ॥
**शकुन्तलाने कहा—**राजन्! ये सब बातें मुझे जिस प्रकार ज्ञात हुई हैं, मेरा यह जन्म आदि पूर्वकालमें जिस प्रकार हुआ है और मैं जिस प्रकार कण्व मुनिकी पुत्री हूँ, वह सब वृत्तान्त ठीक-ठीक बता रही हूँ; सुनिये ॥ १८ ॥
(अन्यथा सन्तमात्मानमन्यथा सत्सु भाषते ।
स पापेनावृतो मूर्खः स्तेन आत्मापहारकः ॥)
जिसका स्वरूप तो अन्य प्रकारका है, किंतु जो सत्पुरुषोंके सामने उसका अन्य प्रकारसे ही परिचय देता है, अर्थात् जो पापात्मा होते हुए भी अपनेको धर्मात्मा कहता है, वह मूर्ख, पापसे आवृत्त, चोर एवं आत्मवंचक है।
ऋषिः कश्चिदिहागम्य मम जन्माभ्यचोदयत् ।
(ऊर्ध्वरेता यथासि त्वं कुतस्तेयं शकुन्तला ।
पुत्री त्वत्तः कथं जाता सत्यं मे ब्रूहि काश्यप ॥)
तस्मै प्रोवाच भगवान् यथा तच्छृणु पार्थिव ॥ १९ ॥
पृथ्वीपते! एक दिन किसी ऋषिने यहाँ आकर मेरे जन्मके सम्बन्धमें मुनिसे पूछा—'कश्यपनन्दन! आप तो ऊर्ध्वरेता ब्रह्मचारी हैं, फिर यह शकुन्तला कहाँसे आयी? आपसे पुत्रीका जन्म कैसे हुआ? यह मुझे सच-सच बताइये।' उस समय भगवान् कण्वने उससे जो बात बतायी, वही कहती हूँ, सुनिये ॥ १९ ॥
कण्व उवाच
तप्यमानः किल पुरा विश्वामित्रो महत् तपः ।
सुभृशं तापयामास शक्रं सुरगणेश्वरम् ॥ २० ॥
**कण्व बोले—**पहलेकी बात है, महर्षि विश्वामित्र बड़ी भारी तपस्या कर रहे थे। उन्होंने देवताओंके स्वामी इन्द्रको अपनी तपस्यासे अत्यन्त संतापमें डाल दिया ॥ २० ॥
तपसा दीप्तवीर्योऽयं स्थानान्मां च्यावयेदिति ।
भीतः पुरंदरस्तस्मान्मेनकामिदमब्रवीत् ॥ २१ ॥
इन्द्रको यह भय हो गया कि तपस्यासे अधिक शक्तिशाली होकर ये विश्वामित्र मुझे अपने स्थानसे भ्रष्ट कर देंगे, अतः उन्होंने मेनकासे इस प्रकार कहा— ॥ २१ ॥
गुणैरप्सरसां दिव्यैर्मेनके त्वं विशिष्यसे ।
श्रेयो मे कुरु कल्याणि यत् त्वां वक्ष्यामि तच्छृणु ॥ २२ ॥
असावादित्यसंकाशो विश्वामित्रो महातपाः ।
तप्यमानस्तपो घोरं मम कम्पयते मनः ॥ २३ ॥
'मेनके! अप्सराओंके जो दिव्य गुण हैं, वे तुममें सबसे अधिक हैं। कल्याणि! तुम मेरा भला करो और मैं तुमसे जो बात कहता हूँ, सुनो। वे सूर्यके समान तेजस्वी, महातपस्वी विश्वामित्र घोर तपस्यामें संलग्न हो मेरे मनको कम्पित कर रहे हैं ।। २२-२३ ।।
मेनके तव भारोऽयं विश्वामित्रः सुमध्यमे ।
शंसितात्मा सुदुर्धर्ष उग्रे तपसि वर्तते ।। २४ ।।
'सुन्दरी मेनके! उन्हें तपस्यासे विचलित करनेका यह महान् भार मैं तुम्हारे ऊपर छोड़ता हूँ। विश्वामित्रका अन्तःकरण शुद्ध है। उन्हें पराजित करना अत्यन्त कठिन है और वे इस समय घोर तपस्यामें लगे हैं ।। २४ ।।
स मां न च्यावयेत् स्थानात् तं वै गत्वा प्रलोभय ।
चर तस्य तपोविघ्नं कुरु मेऽविघ्नमुत्तमम् ।। २५ ।।
'अतः ऐसा करो, जिससे वे मुझे अपने स्थानसे भ्रष्ट न कर सकें। तुम उनके पास जाकर उन्हें लुभाओ, उनकी तपस्यामें विघ्न डाल दो और इस प्रकार मेरे विघ्नके निवारणका उत्तम साधन प्रस्तुत करो ।। २५ ।।
रूपयौवनमाधुर्यचेष्टितस्मितभाषणैः ।
लोभयित्वा वरारोहे तपसस्तं निवर्तय ।। २६ ।।
'वरारोहे! अपने रूप, जवानी, मधुर स्वभाव, हाव-भाव, मन्द मुसकान और सरस वार्तालाप आदिके द्वारा मुनिको लुभाकर उन्हें तपस्यासे निवृत्त कर दो' ।। २६ ।।
मेनकोवाच
महातेजाः स भगवांस्तथैव च महातपाः ।
कोपनश्च तथा ह्येनं जानाति भगवानपि ।। २७ ।।
**मेनका बोली—**देवराज! भगवान् विश्वामित्र बड़े भारी तेजस्वी और महान् तपस्वी हैं। वे क्रोधी भी बहुत हैं। उनके इस स्वभावको आप भी जानते हैं ।। २७ ।।
तेजसस्तपसश्चैव कोपस्य च महात्मनः ।
त्वमप्युद्विजसे यस्य नोद्विजेयमहं कथम् ।। २८ ।।
जिन महात्माके तेज, तप और क्रोधसे आप भी उद्विग्न हो उठते हैं, उनसे मैं कैसे नहीं डरूँगी? ।। २८ ।।
महाभागं वसिष्ठं यः पुत्रैरिष्टैर्व्ययोजयत् ।
क्षत्रजातश्च यः पूर्वमभवद् ब्राह्मणो बलात् ।। २९ ।।
शौचार्थं यो नदीं चक्रे दुर्गमां बहुभिर्जलैः ।
यां तां पुण्यतमां लोके कौशिकीति विदुर्जनाः ।। ३० ।।
विश्वामित्र ऋषि वे ही हैं, जिन्होंने महाभाग महर्षि वसिष्ठका उनके प्यारे पुत्रोंसे सदाके लिये वियोग करा दिया; जो पहले क्षत्रियकुलमें उत्पन्न होकर भी तपस्याके बलसे ब्राह्मण
बन गये; जिन्होंने अपने शौच-स्नानकी सुविधाके लिये अगाध जलसे भरी हुई उस दुर्गम नदीका निर्माण किया, जिसे लोकमें सब मनुष्य अत्यन्त पुण्यमयी कौशिकी नदीके नामसे जानते हैं ।। २९-३० ।।
बभार यत्रास्य पुरा काले दुर्गे महात्मनः ।
दारान्मत्तङ्गो धर्मात्मा राजर्षिर्व्याधतां गतः ।। ३१ ।।
विश्वामित्र महर्षि वे ही हैं, जिनकी पत्नीका पूर्वकालमें संकटके समय शापवश व्याध बने हुए धर्मात्मा राजर्षि मतंगने भरण-पोषण किया था ।। ३१ ।।
अतीतकाले दुर्भिक्षे अभ्येत्य पुनराश्रमम् ।
मुनिः पारेति नद्या वै नाम चक्रे तदा प्रभुः ।। ३२ ।।
दुर्भिक्ष बीत जानेपर उन शक्तिशाली मुनिने पुनः आश्रमपर आकर उस नदीका नाम ‘पारा’ रख दिया था ।। ३२ ।।
मतङ्गं याजयाञ्चक्रे यत्र प्रीतमनाः स्वयं ।
त्वं च सोमं भयाद् यस्य गतः पातुं सुरेश्वर ।। ३३ ।।
सुरेश्वर! उन्होंने मतंग मुनिके किये हुए उपकारसे प्रसन्न होकर स्वयं पुरोहित बनकर उनका यज्ञ कराया; जिसमें उनके भयसे आप भी सोमपान करनेके लिये पधारे थे ।। ३३ ।।
चकारान्यं च लोकं वै क्रुद्धो नक्षत्रसम्पदा ।
प्रतिश्रवणपूर्वाणि नक्षत्राणि चकार यः ।
गुरुशापहतस्यापि त्रिशङ्कोः शरणं ददौ ।। ३४ ।।
उन्होंने ही कुपित होकर दूसरे लोककी सृष्टि की और नक्षत्र-सम्पत्तिसे रूठकर प्रतिश्रवण आदि नूतन नक्षत्रोंका निर्माण किया था। ये वे ही महात्मा हैं, जिन्होंने गुरुके शापसे हीनावस्थामें पड़े हुए राजा त्रिशंकुको भी शरण दी थी ।। ३४ ।।
(ब्रह्मर्षिशापं राजर्षिः कथं मोक्ष्यति कौशिकः ।
अवमत्य तदा देवैर्यज्ञाङ्गं तद् विनाशितम् ।।
अन्यानि च महातेजा यज्ञाङ्गान्यासृजत् प्रभुः ।
निनाय च तदा स्वर्गं त्रिशंकुं स महातपाः ।।)
उस समय यह सोचकर कि ‘विश्वामित्र ब्रह्मर्षि वसिष्ठके शापको कैसे छुड़ा देंगे?’ देवताओंने उनकी अवहेलना करके त्रिशंकुके यज्ञकी वह सारी सामग्री नष्ट कर दी। परंतु महातेजस्वी शक्तिशाली विश्वामित्रने दूसरी यज्ञ-सामग्रियोंकी सृष्टि कर ली तथा उन महातपस्वीने त्रिशंकुको स्वर्गलोकमें पहुँचा ही दिया।
एतानि यस्य कर्माणि तस्याहं भृशमुद्विजे ।
यथासौ न दहेत् क्रुद्धस्तथाऽऽज्ञापय मां विभो ।। ३५ ।।
जिनके ऐसे-ऐसे अद्भुत कर्म हैं, उन महात्मासे मैं बहुत डरती हूँ। प्रभो! जिससे वे कुपित हो मुझे भस्म न कर दें, ऐसे कार्यके लिये मुझे आज्ञा दीजिये ।। ३५ ।।
तेजसा निर्दहेल्लोकान् कम्पयेद् धरणीं पदा ।
संक्षिपेच्च महामेरुं तूर्णमावर्तयेद् दिशः ॥ ३६ ॥
वे अपने तेजसे सम्पूर्ण लोकोंको भस्म कर सकते हैं, पैरके आघातसे पृथ्वीको कँपा सकते हैं, विशाल मेरुपर्वतको छोटा बना सकते हैं और सम्पूर्ण दिशाओंमें तुरंत उलट-फेर कर सकते हैं ॥ ३६ ॥
तादृशं तपसा युक्तं प्रदीप्तमिव पावकम् ।
कथमस्मद्विधा नारी जितेन्द्रियमभिस्पृशेत् ॥ ३७ ॥
ऐसे प्रज्वलित अग्निके समान तेजस्वी, तपस्वी और जितेन्द्रिय महात्माका मुझ-जैसी नारी कैसे स्पर्श कर सकती है? ॥ ३७ ॥
हुताशनमुखं दीप्तं सूर्यचन्द्राक्षितारकम् ।
कालजिह्वं सुरश्रेष्ठ कथमस्मद्विधा स्पृशेत् ॥ ३८ ॥
सुरश्रेष्ठ! अग्नि जिनका मुख है, सूर्य और चन्द्रमा जिनकी आँखोंके तारे हैं और काल जिनकी जिह्वा है, उन तेजस्वी महर्षिको मेरी-जैसी स्त्री कैसे छू सकती है? ॥ ३८ ॥
यमश्च सोमश्च महर्षयश्च
साध्या विश्वे वालखिल्याश्च सर्वे ।
एतेऽपि यस्योद्विजन्ते प्रभावात्
तस्मात् कस्मान्मादृशी नोद्विजेत ॥ ३९ ॥
यमराज, चन्द्रमा, महर्षिगण, साध्यगण, विश्वेदेव और सम्पूर्ण बालखिल्य ऋषि—ये भी जिनके प्रभावसे उद्विग्न रहते हैं, उन विश्वामित्र मुनिसे मेरी-जैसी स्त्री कैसे नहीं डरेगी? ॥ ३९ ॥
त्वयैवमुक्ता च कथं समीप-
मृषेर्न गच्छेयमहं सुरेन्द्र ।
रक्षां तु मे चिन्तय देवराज
यथा त्वदर्थं रक्षिताहं चरेयम् ॥ ४० ॥
सुरेन्द्र! आपके इस प्रकार वहाँ जानेका आदेश देनेपर मैं उन महर्षिके समीप कैसे नहीं जाऊँगी? किंतु देवराज! पहले मेरी रक्षाका कोई उपाय सोचिये; जिससे सुरक्षित रहकर मैं आपके कार्यकी सिद्धिके लिये चेष्टा कर सकूँ ॥ ४० ॥
कामं तु मे मारुतस्तत्र वासः
प्रक्रीडिताया विवृणोतु देव ।
भवेच्च मे मन्मथस्तत्र कार्ये
सहायभूतस्तु तव प्रसादात् ॥ ४१ ॥
देव! मैं वहाँ जाकर जब क्रीड़ामें निमग्न हो जाऊँ, उस समय वायुदेव आवश्यकता समझकर मेरा वस्त्र उड़ा दें और इस कार्यमें आपके प्रसादसे कामदेव भी मेरे सहायक
हों ।। ४१ ।। वनाच्च वायुः सुरभिः प्रवायात् तस्मिन् काले तमृषिं लोभयन्त्याः । तथेत्युक्त्वा विहिते चैव तस्मिं- स्ततो ययौ साऽऽश्रमं कौशिकस्य ।। ४२ ।। जब मैं ऋषिको लुभाने लगूँ, उस समय वनसे सुगन्धभरी वायु चलनी चाहिये। 'तथास्तु' कहकर इन्द्रने जब इस प्रकारकी व्यवस्था कर दी, तब मेनका विश्वामित्र मुनिके आश्रमपर गयी ।। ४२ ।।
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि शकुन्तलोपाख्याने एकसप्ततितमोऽध्यायः ।। ७१ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें शकुन्तलोपाख्यानविषयक इकहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ७१ ।। (दाक्षिणात्य अधिक पाठके १५ श्लोक मिलाकर कुल ५७ श्लोक हैं)
* दुष्यन्तके पिताके 'इलिल' और 'ईलिन' दोनों ही नाम मिलते हैं।
अध्याय (पृष्ठ 522)
द्विसप्ततितमोऽध्यायः
मेनका-विश्वामित्र-मिलन, कन्याकी उत्पत्ति, शकुन्त पक्षियोंके द्वारा उसकी रक्षा और कण्वका उसे अपने आश्रमपर लाकर शकुन्तला नाम रखकर पालन करना
कण्व उवाच
एवमुक्तस्तया शक्रः संदिदेश सदागतिम् ।
प्रतिष्ठत तदा काले मेनका वायुना सह ॥ १ ॥
(शकुन्तला दुष्यन्तसे कहती है—) महर्षि कण्वने (पूर्वोक्त ऋषिसे शेष वृत्तान्त इस प्रकार) कहा—मेनकाके ऐसा कहनेपर इन्द्रदेवने वायुको उसके साथ जानेका आदेश दिया। तब मेनका वायुदेवके साथ समयानुसार वहाँसे प्रस्थित हुई ॥ १ ॥
अथापश्यद् वरारोहा तपसा दग्धकिल्बिषम् ।
विश्वामित्रं तप्यमानं मेनका भीरुराश्रमे ॥ २ ॥
वनमें पहुँचकर भीरु स्वभाववाली सुन्दरी मेनकाने एक आश्रममें विश्वामित्र मुनिको तप करते देखा। वे तपस्याद्वारा अपने समस्त पाप दग्ध कर चुके थे ॥ २ ॥
अभिवाद्य ततः सा तं प्राक्रीडदृषिसंनिधौ ।
अपोवाह च वासोऽस्या मारुतः शशिसंनिभम् ॥ ३ ॥
उस समय महर्षिको प्रणाम करके वह अप्सरा उनके समीपवर्ती स्थानमें ही भाँति-भाँतिकी क्रीड़ाएँ करने लगी। इतनेमें ही वायुने मेनकाका चन्द्रमाके समान उज्ज्वल वस्त्र उसके शरीरसे हटा दिया ॥ ३ ॥
सागच्छत् त्वरिता भूमिं वासस्तदभिलिप्सती ।
स्मयमानेव सव्रीडं मारुतं वरवर्णिनी ॥ ४ ॥
यह देख सुन्दरी मेनका लजाकर वायुदेवको कोसती एवं मुसकराती हुई-सी वह वस्त्र लेनेकी इच्छासे तुरंत ही उस स्थानकी ओर दौड़ी गयी, जहाँ वह गिरा था ॥ ४ ॥
पश्यतस्तस्य तत्रर्षेरप्यग्निसमतेजसः ।
विश्वामित्रस्ततस्तां तु विषमस्थामनिन्दिताम् ॥ ५ ॥
गृद्धां वाससि सम्भ्रान्तां मेनकां मुनिसत्तमः ।
अनिर्देश्यवयोरूपामपश्यद् विवृतां तदा ॥ ६ ॥
अग्निके समान तेजस्वी महर्षि विश्वामित्रके देखते-देखते वहाँ यह घटना घटित हुई। वह अनिन्द्य सुन्दरी विषम परिस्थितिमें पड़ गयी थी और घबराकर वस्त्र लेनेकी इच्छा कर रही
थी। उसका रूप-सौन्दर्य अवर्णनीय था। तरुणावस्था भी अद्भुत थी। उस सुन्दरी अप्सराको मुनिवर विश्वामित्रने वहाँ नंगी देख लिया ॥ ५६ ॥ तस्या रूपगुणान् दृष्ट्वा स तु विप्रर्षभस्तदा । चकार भावं संसर्गात् तया कामवशं गतः ॥ ७ ॥ उसके रूप और गुणोंको देखते ही विप्रवर विश्वामित्र कामके अधीन हो गये। सम्पर्कमें आनेके कारण मेनकामें उनका अनुराग हो गया ॥ ७ ॥ न्यमन्त्रयत चाप्येनां सा चाप्यैच्छदनिन्दिता । तौ तत्र सुचिरं कालमुभौ व्यहरतां तदा ॥ ८ ॥ रममाणौ यथाकामं यथैकदिवसं तथा । (कामक्रोधावजितवान् मुनिर्नित्यं क्षमान्वितः । चिरार्जितस्य तपसः क्षयं स कृतवानृषिः ॥ तपसः संक्षयादेव मुनिर्मोहं समाविशत् । कामरागाभिभूतस्य मुनेः पार्श्वं जगाम सा ॥) जनयामास स मुनिर्मेनकायां शकुन्तलाम् ॥ ९ ॥ प्रस्थे हिमवतो रम्ये मालिनीमभितो नदीम् । जातमुत्सृज्य तं गर्भं मेनका मालिनीमनु ॥ १० ॥ कृतकार्या ततस्तूर्णमगच्छच्छक्रसंसदम् । तं वने विजने गर्भं सिंहव्याघ्रसमाकुले ॥ ११ ॥ दृष्ट्वा शयानं शकुनाः समन्तात् पर्यवारयन् । नेमां हिंस्युर्वने बालां क्रव्यादा मांसगृद्धिनः ॥ १२ ॥ उन्होंने मेनकाको अपने निकट आनेका निमन्त्रण दिया। अनिन्द्य सुन्दरी मेनका तो यह चाहती ही थी, उनसे सम्बन्ध स्थापित करनेके लिये वह राजी हो गयी। तदनन्तर वे दोनों वहाँ सुदीर्घ कालतक इच्छानुसार विहार तथा रमण करते रहे। वह महान् काल उन्हें एक दिनके समान प्रतीत हुआ। काम और क्रोधपर विजय न पा सकनेवाले उन सदा क्षमाशील महर्षिने दीर्घकालसे उपार्जित की हुई तपस्याको नष्ट कर दिया। तपस्याका क्षय होनेसे मुनिके मनपर मोह छा गया। तब मेनका काम तथा रागके वशीभूत हुए मुनिके पास गयी। ब्रह्मन्! फिर मुनिने मेनकाके गर्भसे हिमालयके रमणीय शिखरपर मालिनी नदीके किनारे शकुन्तलाको जन्म दिया। मेनकाका काम पूरा हो चुका था; वह उस नवजात गर्भको मालिनीके तटपर छोड़कर तुरंत इन्द्र-लोकको चली गयी। सिंह और व्याघ्रोंसे भरे हुए निर्जन वनमें उस शिशुको सोते देख शकुन्तों (पक्षियों)-ने उसे सब ओरसे पाँखोंद्वारा ढक लिया; जिससे कच्चे मांस खानेवाले गीध आदि जीव वनमें इस कन्याकी हिंसा न कर सकें ॥ ८—१२ ॥ पर्यरक्षन्त तां तत्र शकुन्ता मेनकात्मजाम् ।
उपस्पृष्टुं गतश्चाहमपश्यं शयितामिमाम् ॥ १३ ॥
निर्जने विपिने रम्ये शकुन्तैः परिवारिताम् ।
(मां दृष्ट्वैवान्वपद्यन्त पादयोः पतिता द्विजाः ।
अब्रुवंश्छकुनाः सर्वे कलं मधुरभाषिणः ॥
इस प्रकार वहाँ शकुन्त ही मेनकाकुमारीकी रक्षा कर रहे थे। उसी समय आचमन करनेके लिये जब मैं मालिनीतटपर गया तो देखा—यह रमणीय निर्जन वनमें पक्षियोंसे घिरी हुई सो रही है। मुझे देखते ही वे सब मधुरभाषी पक्षी मेरे पैरोंपर गिर गये और सुन्दर वाणीमें इस प्रकार कहने लगे ॥ १३ १/२ ॥
द्विजा ऊचुः
विश्वामित्रसुतां ब्रह्मन् न्यासभूतां भरस्व वै ।
कामक्रोधावजितवान् सखा ते कौशिकीं गतः ॥
तस्मात् पोषय तत्पुत्रीं दयावानिति तेऽब्रुवन् ।
**पक्षी बोले—**ब्रह्मन्! यह विश्वामित्रकी कन्या आपके यहाँ धरोहरके रूपमें आयी है। आप इसका पालन-पोषण कीजिये। कौशिकीके तटपर गये हुए आपके सखा विश्वामित्र काम और क्रोधको नहीं जीत सके थे। आप दयालु हैं; इसलिये उनकी पुत्रीका पालन कीजिये। इस प्रकार पक्षियोंने कहा।
कण्व उवाच
सर्वभूतरुतज्ञोऽहं दयावान् सर्वजन्तुषु ।
निर्जनेऽपि महारण्ये शकुनैः परिवारिताम् ॥)
आनयित्वा ततश्चैनां दुहितृत्वे न्यवेशयम् ॥ १४ ॥
**कण्व मुनि कहते हैं—**ब्रह्मन्! मैं समस्त प्राणियोंकी बोली समझता हूँ और सब जीवोंके प्रति दयाभाव रखता हूँ। अतः उस निर्जन महावनमें पक्षियोंसे घिरी हुई इस कन्याको वहाँसे लाकर मैंने इसे अपनी पुत्रीके पदपर प्रतिष्ठित किया ॥ १४ ॥
शरीरकृत् प्राणदाता यस्य चान्नानि भुञ्जते ।
क्रमेणैते त्रयोऽप्युक्ताः पितरो धर्मशासने ॥ १५ ॥
जो गर्भाधानके द्वारा शरीरका निर्माण करता है, जो अभयदान देकर प्राणोंकी रक्षा करता है और जिसका अन्न भोजन किया जाता है, धर्मशास्त्रमें क्रमशः ये तीनों पुरुष पिता कहे गये हैं ॥ १५ ॥
निर्जने तु वने यस्माच्छकुन्तैः परिवारिता ।
शकुन्तलेति नामास्याः कृतं चापि ततो मया ॥ १६ ॥
निर्जन वनमें इसे शकुन्तोंने घेर रखा था, इसलिये ‘शकुन्तान् लाति रक्षकत्वेन गृह्णाति’ इस व्युत्पत्तिके अनुसार इस कन्याका नाम मैंने ‘शकुन्तला’ रख दिया ॥ १६ ॥
एवं दुहितरं विद्धि मम विप्र शकुन्तलाम् । शकुन्तला च पितरं मन्यते मामनिन्दिता ॥ १७ ॥ ब्रह्मन्! इस प्रकार शकुन्तला मेरी बेटी हुई, आप यह जान लें। प्रशंसनीय शील-स्वभाववाली शकुन्तला भी मुझे अपना पिता मानती है ॥ १७ ॥
शकुन्तलोवाच
एतदाचष्ट पृष्टः सन् मम जन्म महर्षये । सुतां कण्वस्य मामेवं विद्धि त्वं मनुजाधिप ॥ १८ ॥ कण्वं हि पितरं मन्ये पितरं स्वमजानती । इति ते कथितं राजन् यथावृत्तं श्रुतं मया ॥ १९ ॥ शकुन्तला कहती है—राजन्! उन महर्षिके पूछनेपर पिता कण्वने मेरे जन्मका यह वृत्तान्त उन्हें बताया था। इस तरह आप मुझे कण्वकी ही पुत्री समझिये। मैं अपने जन्मदाता पिताको तो जानती नहीं, कण्वको ही पिता मानती हूँ। महाराज! इस प्रकार जो वृत्तान्त मैंने सुन रखा था, वह सब आपको बता दिया ॥ १८-१९ ॥
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि शकुन्तलोपाख्याने द्विसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७२ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें शकुन्तलोपाख्यानविषयक बहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७२ ॥ (दाक्षिणात्य अधिक पाठके ५ १/३ श्लोक मिलाकर कुल २४ १/३ श्लोक हैं)
अध्याय (पृष्ठ 526)
त्रिसप्ततितमोऽध्यायः
शकुन्तला और दुष्यन्तका गान्धर्व विवाह और महर्षि कण्वके द्वारा उसका अनुमोदन
दुष्यन्त उवाच
सुव्यक्तं राजपुत्री त्वं यथा कल्याणि भाषसे ।
भार्या मे भव सुश्रोणि ब्रूहि किं करवाणि ते ॥ १ ॥
**दुष्यन्त बोले—**कल्याणि! तुम जैसी बातें कह चुकी हो, उनसे भलीभाँति स्पष्ट हो गया कि तुम क्षत्रिय-कन्या हो (क्योंकि विश्वामित्र मुनि जन्मसे तो क्षत्रिय ही हैं)। सुश्रोणि! मेरी पत्नी बन जाओ। बोलो, मैं तुम्हारी प्रसन्नताके लिये क्या करूँ ॥ १ ॥
सुवर्णमालां वासांसि कुण्डले परिहाटके ।
नानापत्तनजे शुभ्रे मणिरत्ने च शोभने ॥ २ ॥
आहरामि तवाद्याहं निष्कादीन्यजिनानि च ।
सर्वं राज्यं तवाद्यास्तु भार्या मे भव शोभने ॥ ३ ॥
सोनेके हार, सुन्दर वस्त्र, तपाये हुए सुवर्णके दो कुण्डल, विभिन्न नगरोंके बने हुए सुन्दर और चमकीले मणिरत्ननिर्मित आभूषण, स्वर्णपदक और कोमल मृगचर्म आदि वस्तुएँ तुम्हारे लिये मैं अभी लाये देता हूँ। शोभने! अधिक क्या कहूँ, मेरा सारा राज्य आजसे तुम्हारा हो जाय, तुम मेरी महारानी बन जाओ ॥ २-३ ॥
गान्धर्वेण च मां भीरु विवाहेनैहि सुन्दरि ।
विवाहानां हि रम्भोरु गान्धर्वः श्रेष्ठ उच्यते ॥ ४ ॥
भीरु! सुन्दरि! गान्धर्व विवाहके द्वारा मुझे अंगीकार करो। रम्भोरु! विवाहोंमें गान्धर्व विवाह श्रेष्ठ कहलाता है ॥ ४ ॥
शकुन्तलोवाच
फलाहारो गतो राजन् पिता मे इत आश्रमात् ।
मुहूर्तं सम्प्रतीक्षस्व स मां तुभ्यं प्रदास्यति ॥ ५ ॥
**शकुन्तलाने कहा—**राजन्! मेरे पिता कण्व फल लानेके लिये इस आश्रमसे बाहर गये हैं। दो घड़ी प्रतीक्षा कीजिये। वे ही मुझे आपकी सेवामें समर्पित करेंगे ॥ ५ ॥
(पिता हि मे प्रभुर्नित्यं दैवतं परमं मतम् ।
यस्य वा दास्यति पिता स मे भर्ता भविष्यति ॥
पिता रक्षति कौमारे भर्ता रक्षति यौवने ।
पुत्रस्तु स्थविरे भावे न स्त्री स्वातन्त्र्यमर्हति ॥
अमन्यमाना राजेन्द्र पितरं मे तपस्विनम् ।
अधर्मेण हि धर्मिष्ठ कथं वरमुपास्महे ॥
महाराज! पिता ही मेरे प्रभु हैं। उन्हें ही मैं सदा अपना सर्वोत्कृष्ट देवता मानती हूँ। पिताजी मुझे जिसको सौंप देंगे, वही मेरा पति होगा। कुमारावस्थामें पिता, जवानीमें पति और बुढ़ापेमें पुत्र रक्षा करता है। अतः स्त्रीको कभी स्वतन्त्र नहीं रहना चाहिये। धर्मिष्ठ राजेन्द्र! मैं अपने तपस्वी पिताकी अवहेलना करके अधर्मपूर्वक पतिका वरण कैसे कर सकती हूँ?
दुष्यन्त उवाच
मा मैवं वद सुश्रोणि तपोराशिं दयात्मकम् ।
**दुष्यन्त बोले—**सुन्दरी! ऐसा न कहो। तपोराशि महात्मा कण्व बड़े ही दयालु हैं।
शकुन्तलोवाच
मन्युप्रहरणा विप्रा न विप्राः शस्त्रपाणयः ॥
अग्निर्दहति तेजोभिः सूर्यो दहति रश्मिभिः ।
राजा दहति दण्डेन ब्राह्मणो मन्युना दहेत् ॥
क्रोधितो मन्युना हन्ति वज्रपाणिरिवासुरान् ।)
**शकुन्तलाने कहा—**राजन्! ब्राह्मण क्रोधके द्वारा ही प्रहार करते हैं। वे हाथमें लोहेका हथियार नहीं धारण करते। अग्नि अपने तेजसे, सूर्य अपनी किरणोंसे, राजा दण्डसे और ब्राह्मण क्रोधसे दग्ध करते हैं। कुपित ब्राह्मण अपने क्रोधसे अपराधीको वैसे ही नष्ट कर देता है, जैसे वज्रधारी इन्द्र असुरोंको।
दुष्यन्त उवाच
इच्छामि त्वां वरारोहे भजमानामनिन्दिते ।
त्वदर्थं मां स्थितं विद्धि त्वद्गतं हि मनो मम ॥ ६ ॥
**दुष्यन्त बोले—**वरारोहे! तुम्हारा शील और स्वभाव प्रशंसाके योग्य है। मैं चाहता हूँ, तुम मुझे स्वेच्छासे स्वीकार करो। मैं तुम्हारे लिये ही यहाँ ठहरा हूँ। मेरा मन तुममें ही लगा हुआ है ॥ ६ ॥
आत्मनो बन्धुरात्मैव गतिरात्मैव चात्मनः ।
आत्मनो मित्रमात्मैव तथाऽऽत्मा चात्मनः पिता ।
आत्मनैवात्मनो दानं कर्तुमर्हसि धर्मतः ॥ ७ ॥
आत्मा ही अपना बन्धु है। आत्मा ही अपना आश्रय है। आत्मा ही अपना मित्र है और वही अपना पिता है, अतः तुम स्वयं ही धर्मपूर्वक आत्मसमर्पण करनेयोग्य हो ॥ ७ ॥
अष्टावेव समासेन विवाहा धर्मतः स्मृताः ।
ब्राह्मो दैवस्तथैवार्षः प्राजापत्यस्तथासुरः ।। ८ ।।
गान्धर्वो राक्षसश्चैव पैशाचश्चाष्टमः स्मृतः ।
तेषां धर्म्यान् यथापूर्वं मनुः स्वायम्भुवोऽब्रवीत् ।। ९ ।।
धर्मशास्त्रकी दृष्टिसे संक्षेपसे आठ प्रकारके ही विवाह माने गये हैं—ब्राह्म, दैव, आर्ष, प्राजापत्य, आसुर, गान्धर्व, राक्षस तथा आठवाँ पैशाच।* स्वायम्भुव मनुका कथन है कि इनमें बादवालोंकी अपेक्षा पहलेवाले विवाह धर्मानुकूल हैं ।। ८-९ ।।
प्रशस्तांश्चतुरः पूर्वान् ब्राह्मणस्योपधारय ।
षडानुपूर्व्या क्षत्रस्य विद्धि धर्म्याननिन्दिते ।। १० ।।
पूर्वकथित जो चार विवाह—ब्राह्म, दैव, आर्ष तथा प्राजापत्य हैं, उन्हें ब्राह्मणके लिये उत्तम समझो। अनिन्दिते! ब्राह्मसे लेकर गान्धर्वतक क्रमशः छह विवाह क्षत्रियके लिये धर्मानुकूल जानो ।। १० ।।
राज्ञां तु राक्षसोऽप्युक्तो विट्शूद्रेष्वासुरः स्मृतः ।
पञ्चानां तु त्रयो धर्म्या अधर्म्यौ द्वौ स्मृताविह ।। ११ ।।
राजाओंके लिये तो राक्षस विवाहका भी विधान है। वैश्यों और शूद्रोंमें आसुर विवाह ग्राह्य माना गया है। अन्तिम पाँच विवाहोंमें तीन तो धर्मसम्मत हैं और दो अधर्मरूप माने गये हैं ।। ११ ।।
पैशाच आसुरश्चैव न कर्तव्यौ कदाचन ।
अनेन विधिना कार्यो धर्मस्यैषा गतिः स्मृता ।। १२ ।।
पैशाच और आसुर विवाह कदापि करनेयोग्य नहीं हैं। इस विधिके अनुसार विवाह करना चाहिये। यह धर्मका मार्ग बताया गया है ।। १२ ।।
गान्धर्वराक्षसौ क्षत्रे धर्म्यौ तौ मा विशङ्किथाः ।
पृथग् वा यदि वा मिश्रौ कर्तव्यौ नात्र संशयः ।। १३ ।।
गान्धर्व और राक्षस—दोनों विवाह क्षत्रियजातिके लिये धर्मानुकूल ही हैं। अतः उनके विषयमें तुम्हें संदेह नहीं करना चाहिये। वे दोनों विवाह परस्पर मिले हों या पृथक्-पृथक् हों, क्षत्रियके लिये करनेयोग्य ही हैं, इसमें संशय नहीं है ।। १३ ।।
सा त्वं मम सकामस्य सकामा वरवर्णिनि ।
गान्धर्वेण विवाहेन भार्या भवितुमर्हसि ।। १४ ।।
अतः सुन्दरी! मैं तुम्हें पानेके लिये इच्छुक हूँ। तुम भी मुझे पानेकी इच्छा रखकर गान्धर्व विवाहके द्वारा मेरी पत्नी बन जाओ ।। १४ ।।
शकुन्तलोवाच
यदि धर्मपथस्त्वेष यदि चात्मा प्रभुर्मम ।
प्रदाने पौरवश्रेष्ठ शृणु मे समयं प्रभो ।। १५ ।।
**शकुन्तलाने कहा—**पौरवश्रेष्ठ! यदि यह गान्धर्व विवाह धर्मका मार्ग है, यदि आत्मा स्वयं ही अपना दान करनेमें समर्थ है तो इसके लिये मैं तैयार हूँ; किंतु प्रभो! मेरी एक शर्त है, उसे सुन लीजिये ॥ १५ ॥ सत्यं मे प्रतिजानीहि यथा वक्ष्याम्यहं रहः । मयि जायेत यः पुत्रः स भवेत् त्वदनन्तरः ॥ १६ ॥ युवराजो महाराज सत्यमेतद् ब्रवीमि ते । यद्येतदेवं दुष्यन्त अस्तु मे सङ्गमस्त्वया ॥ १७ ॥ और उसका पालन करनेके लिये मुझसे सच्ची प्रतिज्ञा कीजिये। वह शर्त क्या है, यह मैं एकान्तमें आपसे कह रही हूँ—महाराज दुष्यन्त! मेरे गर्भसे आपके द्वारा जो पुत्र उत्पन्न हो, वही आपके बाद युवराज हो, ऐसी मेरी इच्छा है। यह मैं आपसे सत्य कहती हूँ। यदि यह शर्त इसी रूपमें आपको स्वीकार हो तो आपके साथ मेरा समागम हो सकता है ॥ १६-१७ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवमस्त्विति तां राजा प्रत्युवाचाविचारयन् । अपि च त्वां हि नेष्यामि नगरं स्वं शुचिस्मिते ॥ १८ ॥ **वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! शकुन्तलाकी यह बात सुनकर राजा दुष्यन्तने बिना कुछ सोचे-विचारे यह उत्तर दे दिया कि ‘ऐसा ही होगा।’ वे शकुन्तलासे बोले—‘शुचिस्मिते! मैं शीघ्र तुम्हें अपने नगरमें ले चलूँगा ॥ १८ ॥ यथा त्वमर्हा सुश्रोणि सत्यमेतद् ब्रवीमि ते । एवमुक्त्वा स राजर्षिस्तामनिन्दितगामिनीम् ॥ १९ ॥ जग्राह विधिवत् पाणावुवास च तया सह । विश्वास्य चैनां स प्रायादब्रवीच्च पुनः पुनः ॥ २० ॥ प्रेषयिष्ये तवार्थाय वाहिनीं चतुरङ्गिणीम् । तया त्वानाययिष्यामि निवासं स्वं शुचिस्मिते ॥ २१ ॥ ‘सुश्रोणि! तुम राजभवनमें ही रहनेयोग्य हो। मैं तुमसे यह सच्ची बात कहता हूँ।’ ऐसा कहकर राजर्षि दुष्यन्तने अनिन्द्यगामिनी शकुन्तलाका विधिपूर्वक पाणिग्रहण किया और उसके साथ एकान्तवास किया। फिर उसे विश्वास दिलाकर वहाँसे विदा हुए। जाते समय उन्होंने बार-बार कहा—‘पवित्र मुसकानवाली सुन्दरी! मैं तुम्हारे लिये चतुरंगिणी सेना भेजूँगा और उसीके साथ अपने राजभवनमें बुलवाऊँगा’ ॥ १९—२१ ॥ (एवमुक्त्वा स राजर्षिस्तामनिन्दितगामिनीम् । सम्परिष्वज्य बाहुभ्यां स्मितपूर्वमुदैक्षत ॥ प्रदक्षिणीकृतां देवीं राजा सम्परिषस्वजे ।
शकुन्तला ह्यश्रुमुखी पपात नृपपादयोः ॥ तां देवीं पुनरुत्थाप्य मा शुचेति पुनः पुनः । शपेयं सुकृतेनैव प्रापयिष्ये नृपात्मजे ॥) अनिन्द्यगामिनी शकुन्तलासे ऐसा कहकर राजर्षि दुष्यन्तने उसे अपनी भुजाओंमें भर लिया और उसकी ओर मुसकराते हुए देखा। देवी शकुन्तला राजाकी परिक्रमा करके खड़ी थी। उस समय उन्होंने उसे हृदयसे लगा लिया। शकुन्तलाके मुखपर आँसुओंकी धारा बह चली और वह नरेशके चरणोंमें गिर पड़ी। राजाने देवी शकुन्तलाको फिर उठाकर बार-बार कहा—'राजकुमारी! चिन्ता न करो। मैं अपने पुण्यकी शपथ खाकर कहता हूँ, तुम्हें अवश्य बुला लूँगा।'
वैशम्पायन उवाच
इति तस्याः प्रतिश्रुत्य स नृपो जनमेजय । मनसा चिन्तयन् प्रायात् काश्यपं प्रति पार्थिवः ॥ २२ ॥ भगवांस्तपसा युक्तः श्रुत्वा किं नु करिष्यति । एवं स चिन्तयन्नेव प्रविवेश स्वकं पुरम् ॥ २३ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! इस प्रकार शकुन्तलासे प्रतिज्ञा करके नरेश्वर राजा दुष्यन्त आश्रमसे चल दिये। उनके मनमें महर्षि कण्वकी ओरसे बड़ी चिन्ता थी कि तपस्वी भगवान् कण्व यह सब सुनकर न जाने क्या कर बैठेंगे? इस तरह चिन्ता करते हुए ही राजाने अपने नगरमें प्रवेश किया ॥ २२-२३ ॥
मुहूर्तयाते तस्मिंस्तु कण्वोऽप्याश्रममागमत् । शकुन्तला च पितरं ह्रिया नोपजगाम तम् ॥ २४ ॥ उनके गये दो ही घड़ी बीती थी कि महर्षि कण्व भी आश्रमपर आ गये; परंतु शकुन्तला लज्जावश पहलेके समान पिताके समीप नहीं गयी ॥ २४ ॥
(शङ्कितैव च विप्रर्षिमुपचक्राम सा शनैः । ततोऽस्य राजञ्जग्राह आसनं चाप्यकल्पयत् ॥ शकुन्तला च सव्रीडा तमृषिं नाभ्यभाषत । तस्मात् स्वधर्मात् स्खलिता भीता सा भरतर्षभ ॥ अभवद् दोषदर्शित्वाद् ब्रह्मचारिण्ययन्त्रिता । स तदा व्रीडितां दृष्ट्वा ऋषिस्तां प्रत्यभाषत ॥ तत्पश्चात् वह डरती हुई ब्रह्मर्षिके निकट धीरे-धीरे गयी। फिर उसने उनके लिये आसन लेकर बिछाया। शकुन्तला इतनी लज्जित हो गयी थी कि महर्षिसे कोई बाततक न कर सकी। भरतश्रेष्ठ! वह अपने धर्मसे गिर जानेके कारण भयभीत हो रही थी। जो कुछ समय
पहलेतक स्वाधीन ब्रह्मचारिणी थी, वही उस समय अपना दोष देखनेके कारण घबरा गयी थी। शकुन्तलाको लज्जामें डूबी हुई देख महर्षि कण्वने उससे कहा।
कण्व उवाच
सव्रीडैव च दीर्घायुः पुरेव भविता न च ।
वृत्तं कथय रम्भोरु मा त्रासं च प्रकल्पय ॥
**कण्व बोले—**बेटी! तू सलज्ज रहकर ही दीर्घायु होगी। अब पहले जैसी चपल न रह सकेगी। शुभे! सारी बातें स्पष्ट बता; भय न कर।
वैशम्पायन उवाच
ततः कृच्छ्रादतिशुभा सव्रीडा श्रीमती तदा ।
सगद्गदमुवाचेदं काश्यपं सा शुचिस्मिता ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन्! पवित्र मुसकान-वाली वह सुन्दरी अत्यन्त सदाचारिणी थी; तो भी अपने व्यवहारसे लज्जाका अनुभव करती हुई महर्षि कण्वसे बड़ी कठिनाईके साथ गद्गदकण्ठ होकर बोली।
शकुन्तलोवाच
राजा ताताजगामेह दुष्यन्त इलिलात्मजः ।
मया पतिर्वृतो योऽसौ दैवयोगादिहागतः ॥
तस्य तात प्रसीदस्व भर्ता मे सुमहायशाः ।
अतः सर्वं तु यद् वृत्तं दिव्यज्ञानेन पश्यसि ।
अभयं क्षत्रियकुले प्रसादं कर्तुमर्हसि ॥)
**शकुन्तला बोली—**तात! इलिलकुमार महाराज दुष्यन्त इस वनमें आये थे। दैवयोगसे इस आश्रमपर भी उनका आगमन हुआ और मैंने उन्हें अपना पति स्वीकार कर लिया। पिताजी! आप उनपर प्रसन्न हों। वे महायशस्वी नरेश अब मेरे स्वामी हैं। इसके बादका सारा वृत्तान्त आप दिव्य ज्ञानदृष्टिसे देख सकते हैं। क्षत्रियकुलको अभयदान देकर उनपर कृपादृष्टि करें।
विज्ञायाथ च तां कण्वो दिव्यज्ञानो महातपाः ।
उवाच भगवान् प्रीतः पश्यन् दिव्येन चक्षुषा ॥ २५ ॥
महातपस्वी भगवान् कण्व दिव्यज्ञानसे सम्पन्न थे। वे दिव्य दृष्टिसे देखकर शकुन्तलाकी तात्कालिक अवस्थाको जान गये; अतः प्रसन्न होकर बोले— ।। २५ ।।
त्वयाद्य भद्रे रहसि मामनादृत्य यः कृतः ।
पुंसा सह समायोगो न स धर्मोपघातकः ॥ २६ ॥
‘भद्रे! आज तुमने मेरी अवहेलना करके जो एकान्तमें किसी पुरुषके साथ सम्बन्ध स्थापित किया है, वह तुम्हारे धर्मका नाशक नहीं है ।। २६ ।।
क्षत्रियस्य हि गान्धर्वो विवाहः श्रेष्ठ उच्यते ।
सकायामाः सकामेन निर्मन्त्रो रहसि स्मृतः ।। २७ ।।
‘क्षत्रियके लिये गान्धर्व विवाह श्रेष्ठ कहा गया है। स्त्री और पुरुष दोनों एक दूसरेको चाहते हों, उस दशामें उन दोनोंका एकान्तमें जो मन्त्रहीन सम्बन्ध स्थापित होता है, उसे गान्धर्व विवाह कहा गया है ।। २७ ।।
धर्मात्मा च महात्मा च दुष्यन्तः पुरुषोत्तमः ।
अध्यगच्छः पतिं यत् त्वं भजमानं शकुन्तले ।। २८ ।।
महात्मा जनिता लोके पुत्रस्तव महाबलः ।
य इमां सागरापाङ्गीं कृत्स्नां भोक्ष्यति मेदिनीम् ।। २९ ।।
‘शकुन्तले! महामना दुष्यन्त धर्मात्मा और श्रेष्ठ पुरुष हैं। वे तुम्हें चाहते थे। तुमने योग्य पतिके साथ सम्बन्ध स्थापित किया है; इसलिये लोकमें तुम्हारे गर्भसे एक महाबली और महात्मा पुत्र उत्पन्न होगा, जो समुद्रसे घिरी हुई इस समूची पृथ्वीका उपभोग करेगा ।। २८-२९ ।।
परं चाभिप्रयातस्य चक्रं तस्य महात्मनः ।
भविष्यत्यप्रतिहतं सततं चक्रवर्तिनः ।। ३० ।।
‘शत्रुओंपर आक्रमण करनेवाले उस महामना चक्रवर्ती नरेशकी सेना सदा अप्रतिहत होगी। उसकी गतिको कोई रोक नहीं सकेगा’ ।। ३० ।।
ततः प्रक्षाल्य पादौ सा विश्रान्तं मुनिमब्रवीत् ।
विनिधाय ततो भारं संनिधाय फलानि च ।। ३१ ।।
तदनन्तर शकुन्तलाने उनके लाये हुए फलके भारको लेकर यथास्थान रख दिया। फिर उनके दोनों पैर धोये तथा जब वे भोजन और विश्राम कर चुके, तब वह मुनिसे इस प्रकार बोली ।। ३१ ।।
शकुन्तलोवाच
मया पतिर्वृतो राजा दुष्यन्तः पुरुषोत्तमः ।
तस्मै ससचिवाय त्वं प्रसादं कर्तुमर्हसि ।। ३२ ।।
शकुन्तलाने कहा— भगवन्! मैंने पुरुषोंमें श्रेष्ठ राजा दुष्यन्तका पतिरूपमें वरण किया है। अतः मन्त्रियोंसहित उन नरेशपर आपको कृपा करनी चाहिये ।। ३२ ।।
कण्व उवाच
प्रसन्न एव तस्याहं त्वत्कृते वरवर्णिनि ।
(ऋतवो बहवस्ते वै गता व्यर्थाः शुचिस्मिते ।
सार्थकं साम्प्रतं ह्येतन्न च पापोऽस्ति तेऽनघे ॥ गृहाण च वरं मत्तस्त्वं शुभे यदभीप्सितम् ॥ ३३ ॥ कण्व बोले— उत्तम वर्णवाली पुत्री! मैं तुम्हारे भलेके लिये राजा दुष्यन्तपर भी प्रसन्न ही हूँ। शुचिस्मिते! अबतक तेरे बहुत-से ऋतु व्यर्थ बीत गये हैं। इस बार यह सार्थक हुआ है। अनघे! तुम्हें पाप नहीं लगेगा। शुभे! तुम्हारी जो इच्छा हो, वह वर मुझसे माँग लो ॥ ३३ ॥
वैशम्पायन उवाच
ततो धर्मिष्ठतां वव्रे राज्याच्चास्खलनं तथा । शकुन्तला पौरवाणां दुष्यन्तहितकाम्यया ॥ ३४ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! तब शकुन्तलाने दुष्यन्तके हितकी इच्छासे यह वर माँगा कि पुरुवंशी नरेश सदा धर्ममें स्थिर रहें और वे कभी राज्यसे भ्रष्ट न हों ॥ ३४ ॥ (एवमस्त्विति तां प्राह कण्वो धर्मभृतां वरः । पस्पर्श चापि पाणिभ्यां सुतां श्रीमिव रूपिणीम् ॥ उस समय धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ कण्वने उससे कहा—'एवमस्तु' (ऐसा ही हो)। यह कहकर उन्होंने मूर्तिमती लक्ष्मी-सी पुत्री शकुन्तलाका दोनों हाथोंसे स्पर्श किया और कहा।
कण्व उवाच
अद्यप्रभृति देवी त्वं दुष्यन्तस्य महात्मनः । पतिव्रतानां या वृत्तिस्तां वृत्तिमनुपालय ॥) कण्व बोले— बेटी! आजसे तू महात्मा राजा दुष्यन्तकी महारानी है। अतः पतिव्रता स्त्रियोंका जो बर्ताव तथा सदाचार है, उसका निरन्तर पालन कर।
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि शकुन्तलोपाख्याने त्रिसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७३ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें शकुन्तलोपाख्यानविषयक तिहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७३ ॥ (दाक्षिणात्य अधिक पाठके १९ १/३ श्लोक मिलाकर कुल ५३ १/३ श्लोक हैं)
* कन्याको वस्त्र और आभूषणोंसे अलंकृत करके सजातीय योग्य वरके हाथमें देना 'ब्राह्म' विवाह कहलाता है। अपने घरपर देवयज्ञ करके यज्ञान्तमें ऋत्विज्को अपनी कन्याका दान करना 'दैव' विवाह कहा गया है। वरसे एक गाय और एक बैल शुल्कके रूपमें लेकर कन्यादान करना 'आर्ष' विवाह बताया गया है। वर और कन्या दोनों साथ रहकर धर्माचरण करें, इस बुद्धिसे कन्यादान करना 'प्राजापत्य' विवाह माना गया है। वरसे मूल्यके रूपमें बहुत-सा धन लेकर कन्या देना 'आसुर' विवाह माना गया है। वर और वधू दोनों एक-दूसरेको स्वेच्छासे स्वीकार कर लें, यह 'गान्धर्व' विवाह है। युद्ध
करके मार-काट मचाकर रोती हुई कन्याको उसके रोते हुए भाई-बन्धुओंसे छीन लाना ‘राक्षस’ विवाह माना गया है। जब घरके लोग सोये हों अथवा असावधान हों, उस दशामें कन्याको चुरा लेना ‘पैशाच’ विवाह है।