महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
'विदुरजीकी दृष्टिमें जो बहुत पहले आ चुकी थी, वही यह विपत्ति आज हमलोगोंपर आयी-की-आयी है। तुम हमें इस संकटसे इस तरह मुक्त करो, जिससे पुरोचनको हमारे विषयमें कुछ भी पता न चले' ।। १५ ।।
स तथेति प्रतिश्रुत्य खनको यत्नमास्थितः ।
परिखामुत्किरन्नाम चकार च महाबिलम् ।। १६ ।।
तब उस सुरंग खोदनेवालेने 'बहुत अच्छा, ऐसा ही होगा', यह प्रतिज्ञा की और कार्यसिद्धिके प्रयत्नमें लग गया। खाईकी सफाई करनेके व्याजसे उसने एक बहुत बड़ी सुरंग तैयार कर दी ।। १६ ।।
चक्रे च वेश्मनस्तस्य मध्येनातिमहद् बिलम् ।
कपाटयुक्तमज्ञातं समं भूम्याश्च भारत ।। १७ ।।
भारत! उसने उस भवनके ठीक बीचसे वह महान् सुरंग निकाली। उसके मुहानेपर किवाड़ लगे थे। वह भूमिके समान सतहमें ही बनी थी; अतः किसीको ज्ञात नहीं हो पाती थी ।। १७ ।।
पुरोचनभयादेव व्यदधात् संवृतं मुखम् ।
स तस्य तु गृहद्वारि वसत्यशुभधीः सदा ।
तत्र ते सायुधाः सर्वे वसन्ति स्म क्षपां नृप ।। १८ ।।
दिवा चरन्ति मृगयां पाण्डवेया वनाद् वनम् ।
विश्वस्तवदविश्वस्ता वञ्चयन्तः पुरोचनम् ।
अतुष्टा तुष्टवद् राजन्नूषुः परमविस्मिताः ।। १९ ।।
पुरोचनके भयसे उस सुरंग खोदनेवालेने उसके मुखको बंद कर दिया था। दुष्टबुद्धि पुरोचन सर्वदा मकानके द्वारपर ही निवास करता था और पाण्डवगण भी रात्रिके समय शस्त्र सँभाले सावधानीके साथ उस द्वारपर ही रहा करते थे। (इसलिये पुरोचनको आग लगानेका अवसर नहीं मिलता था।) वे दिनमें हिंस्र पशुओंके मारनेके बहाने एक वनसे दूसरे वनमें विचरते रहते थे। पाण्डव भीतरसे तो विश्वास न करनेके कारण सदा चौकन्ने रहते थे, परंतु ऊपरसे पुरोचनको ठगनेके लिये विश्वस्तकी भाँति व्यवहार करते थे। राजन्! वे संतुष्ट न होते हुए भी संतुष्टकी भाँति निवास करते और अत्यन्त विस्मययुक्त रहते थे ।। १८-१९ ।।
न चैनानन्वबुध्यन्त नरा नगरवासिनः ।
अन्यत्र विदुरामात्यात् तस्मात् खनकसत्तमात् ।। २० ।।
विदुरके मन्त्री और खोदाईके काममें श्रेष्ठ उस खनकको छोड़कर नगरके निवासी भी पाण्डवोंके विषयमें कुछ नहीं जान पाते थे ।। २० ।।
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि जतुगृहपर्वणि जतुगृहवासे
षट्चत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १४६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत जतुगृहपर्वमें जतुगृहवासविषयक एक सौ छियालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १४६ ॥
१४७-
सप्तचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः
लाक्षागृहका दाह और पाण्डवोंका सुरंगके रास्ते निकल जाना
वैशम्पायन उवाच
तांस्तु दृष्ट्वा सुमनसः परिसंवत्सरोषितान् ।
विश्वस्तानिव संलक्ष्य हर्षं चक्रे पुरोचनः ॥ १ ॥
पुरोचने तथा हृष्टे कौन्तेयोऽथ युधिष्ठिरः ।
भीमसेनार्जुनौ चोभौ यमौ प्रोवाच धर्मवित् ॥ २ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! पाण्डवोंको एक वर्षसे वहाँ प्रसन्नचित्त हो विश्वस्तकी तरह रहते हुए देख पुरोचनको बड़ा हर्ष हुआ। उसके इस प्रकार प्रसन्न होनेपर धर्मके ज्ञाता कुन्तीनन्दन युधिष्ठिरने भीमसेन, अर्जुन, नकुल और सहदेवसे इस प्रकार कहा— ॥ १-२ ॥
अस्मानयं सुविश्वस्तान् वेत्ति पापः पुरोचनः ।
वञ्चितोऽयं नृशंसात्मा कालं मन्ये पलायने ॥ ३ ॥
‘पापी पुरोचन हमलोगोंको पूर्ण विश्वस्त समझ रहा है। इस क्रूरको अबतक हमलोगोंने धोखा दिया है। अब मेरी रायमें हमारे भाग निकलनेका यह उपयुक्त अवसर आ गया है ॥ ३ ॥
आयुधागारमादीप्य दग्ध्वा चैव पुरोचनम् ।
षट् प्राणिनो निधायेह द्रवामोऽनभिलक्षिताः ॥ ४ ॥
‘इस आयुधागारमें आग लगाकर पुरोचनको जला करके इसके भीतर छः प्राणियोंको रखकर हम इस तरह भाग निकलें कि कोई हमें देख न सके’ ॥ ४ ॥
अथ दानापदेशेन कुन्ती ब्राह्मणभोजनम् ।
चक्रे निशि महाराज आजग्मुस्तत्र योषितः ॥ ५ ॥
ता विहृत्य यथाकामं भुक्त्वा पीत्वा च भारत ।
जग्मुर्निशि गृहानेव समनुज्ञाप्य माधवीम् ॥ ६ ॥
महाराज! तदनन्तर एक दिन रात्रिके समय कुन्तीने दान देनेके निमित्त ब्राह्मण-भोजन कराया। उसमें बहुत-सी स्त्रियाँ भी आयी थीं। भारत! वे सब स्त्रियाँ इच्छानुसार घूम-फिरकर खा-पी लेनेके बाद कुन्तीदेवीसे आज्ञा ले रातमें फिर अपने-अपने घरोंको ही लौट गयीं ॥ ५-६ ॥
निषादी पञ्चपुत्रा तु तस्मिन् भोज्ये यदृच्छया ।
अन्नार्थिनी समभ्यागात् सपुत्रा कालचोदिता ॥ ७ ॥
सा पीत्वा मदिरां मत्ता सपुत्रा मदविह्वला ।
सह सर्वैः सुतै राजंस्तस्मिन्नेव निवेशने ॥ ८ ॥
सुष्वाप विगतज्ञाना मृतकल्पा नराधिप ।
अथ प्रवाते तुमुले निशि सुप्ते जने तदा ॥ ९ ॥
तदुपादीपयद् भीमः शेते यत्र पुरोचनः ।
ततो जतुगृहद्वारं दीपयामास पाण्डवः ॥ १० ॥
परंतु दैवेच्छासे उस भोजके समय एक भीलनी अपने पाँच बेटोंके साथ वहाँ भोजनकी इच्छासे आयी, मानो कालने ही उसे प्रेरित करके वहाँ भेजा था। वह भीलनी मदिरा पीकर मतवाली हो चुकी थी। उसके पुत्र भी शराब पीकर मस्त थे। राजन्! शराबके नशेमें बेहोश होनेके कारण अपने सब पुत्रोंके साथ वह उसी घरमें सो गयी। उस समय वह अपनी सुध-बुध खोकर मृतक-सी हो रही थी। रातमें जब सब लोग सो गये, उस समय सहसा बड़े जोरकी आँधी चली। तब भीमसेनने उस जगह आग लगा दी, जहाँ पुरोचन सो रहा था। फिर उन्होंने लाक्षागृहके प्रमुख द्वारपर आग लगायी ॥ ७—१० ॥
समन्ततो ददौ पश्चादग्निं तत्र निवेशने ।
ज्ञात्वा तु तद् गृहं सर्वमादीप्तं पाण्डुनन्दनाः ॥ ११ ॥
सुरङ्गां विविशुस्तूर्णं मात्रा सार्धमरिंदमाः ।
ततः प्रतापः सुमहांञ्छब्दश्चैव विभावसोः ॥ १२ ॥
प्रादुरासीत् तदा तेन बुबुधे स जनव्रजः ।
तदवेक्ष्य गृहं दीप्तमाहुः पौराः कृशाननाः ॥ १३ ॥
इसके पश्चात् उन्होंने उस घरके चारों ओर आग लगा दी। जब वह सारा घर अग्निकी लपेटमें आ गया, तब यह जानकर शत्रुओंका दमन करनेवाले पाण्डव अपनी माताके साथ सुरंगमें घुस गये; फिर तो वहाँ अग्निकी भयंकर लपटें उठने लगीं, भीषण ताप फैल गया। घरको जलानेवाली उस आगका महान् चट-चट शब्द सुनायी देने लगा। इससे उस नगरका जनसमूह जाग उठा। उस घरको जलता देख पुरवासियोंके मुखपर दीनता छा गयी। वे व्याकुल होकर कहने लगे ॥ ११—१३ ॥
पौरा ऊचुः
दुर्योधनप्रयुक्तेन पापेनाकृतबुद्धिना ।
गृहमात्मविनाशाय कारितं दाहितं च तत् ॥ १४ ॥
अहो धिग् धृतराष्ट्रस्य बुद्धिर्नातिसमञ्जसा ।
यः शुचीन् पाण्डुदायादान् दाहयामास शत्रुवत् ॥ १५ ॥
**पुरवासी बोले—**अहो! पुरोचनका अन्तःकरण अपने वशमें नहीं था। उस पापीने दुर्योधनकी आज्ञासे अपने ही विनाशके लिये इस घरको बनवाया और जला भी दिया! अहो! धिक्कार है, धृतराष्ट्रकी बुद्धि बहुत बिगड़ गयी है, जिसने शुद्ध हृदयवाले पाण्डुपुत्रोंको शत्रुकी भाँति आगमें जला दिया ॥ १४-१५ ॥ दिष्ट्या त्विदानीं पापात्मा दग्धोऽयमतिदुर्मतिः । अनागसः सुविश्वस्तान् यो ददाह नरोत्तमान् ॥ १६ ॥ सौभाग्यकी बात है कि यह अत्यन्त खोटी बुद्धिवाला पापात्मा पुरोचन भी इस समय दग्ध हो गया है, जिसने बिना किसी अपराधके अपने ऊपर पूर्ण विश्वास करनेवाले नरश्रेष्ठ पाण्डवोंको जला दिया है ॥ १६ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवं ते विलपन्ति स्म वारणावतका जनाः । परिवार्य गृहं तच्च तस्थू रात्रौ समन्ततः ॥ १७ ॥ **वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! इस प्रकार वारणावतके लोग विलाप करने लगे। वे रातभर उस घरको चारों ओरसे घेरकर खड़े रहे ॥ १७ ॥ पाण्डवाश्चापि ते सर्वे सह मात्रा सुदुःखिताः । बिलेन तेन निर्गत्य जग्मुर्द्रुतमलक्षिताः ॥ १८ ॥ उधर समस्त पाण्डव भी अत्यन्त दुःखी हो अपनी माताके साथ सुरंगके मार्गसे निकलकर तुरंत ही दूर चले गये। उन्हें कोई भी देख न सका ॥ १८ ॥ तेन निद्रोपरोधेन साध्वसेन च पाण्डवाः । न शेकुः सहसा गन्तुं सह मात्रा परंतपाः ॥ १९ ॥ नींद न ले सकनेके कारण आलस्य और भयसे युक्त परंतप पाण्डव अपनी माताके साथ जल्दी-जल्दी चल नहीं पाते थे ॥ १९ ॥ भीमसेनस्तु राजेन्द्र भीमवेगपराक्रमः । जगाम भ्रातृनादाय सर्वान् मातरमेव च ॥ २० ॥ स्कन्धमारोप्य जननीं यमावङ्केन वीर्यवान् । पार्थौ गृहीत्वा पाणिभ्यां भ्रातरौ सुमहाबलः ॥ २१ ॥ राजेन्द्र! भयंकर वेग और पराक्रमवाले भीमसेन अपने सब भाइयों तथा माताको भी साथ लिये चल रहे थे। वे महान् बल और पराक्रमसे सम्पन्न थे। उन्होंने माताको तो कंधेपर चढ़ा लिया और नकुल-सहदेवको गोदमें उठा लिया तथा शेष दोनों भाइयोंको दोनों हाथोंसे पकड़कर उन्हें सहारा देते हुए चलने लगे ॥ २०-२१ ॥ उरसा पादपान् भञ्जन् महीं पद्भ्यां विदारयन् । स जगामाशु तेजस्वी वातरंहा वृकोदरः ॥ २२ ॥
तेजस्वी भीम वायुके समान वेगशाली थे। वे अपनी छातीके धक्केसे वृक्षोंको तोड़ते और पैरोंकी ठोकरसे पृथ्वीको विदीर्ण करते हुए तीव्र गतिसे आगे बढ़े जा रहे थे ॥ २२ ॥
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि जतुगृहपर्वणि जतुगृहदाहे सप्तचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १४७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत जतुगृहपर्वमें जतुगृहदाहविषयक एक सौ सैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १४७ ॥
१४८-
अष्टचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः
विदुरजीके भेजे हुए नाविकका पाण्डवोंको गङ्गाजीके पार उतारना
वैशम्पायन उवाच
एतस्मिन्नेव काले तु यथासम्प्रत्ययं कविः ।
विदुरः प्रेषयामास तद् वनं पुरुषं शुचिम् ।। १ ।।
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! इसी समय परम ज्ञानी विदुरजीने अपने विश्वासके अनुसार एक शुद्ध विचारवाले पुरुषको उस वनमें भेजा ।। १ ।।
अध्याय (पृष्ठ 1073)
सुरंगद्वारा मातासहित पाण्डवोंका लाक्षागृहसे निकलना
भीम अपने चारों भाइयोंको तथा माताको उठाकर ले चले
स गत्वा तु यथोद्देशं पाण्डवान् ददृशे वने ।
जनन्य सह कौरव्य मापयानान् नदीजलम् ॥ २ ॥
कुरुनन्दन! उसने विदुरजीके बताये अनुसार ठीक स्थानपर पहुँचकर वनमें मातासहित पाण्डवोंको देखा, जो नदीमें कितना जल है, इसका अनुमान लगा रहे थे ॥ २ ॥
विदितं तन्महाबुद्धेर्विदुरस्य महात्मनः ।
ततस्तस्यापि चारेण चेष्टितं पापचेतसः ॥ ३ ॥
ततः प्रवासितो विद्वान् विदुरेण नरस्तदा ।
पार्थानां दर्शयामास मनोमारुतगामिनीम् ॥ ४ ॥
सर्ववातसहां नावं यन्त्रयुक्तां पताकिनीम् ।
शिवे भागीरथीतीरे नरैर्विस्रम्भिभिः कृताम् ॥ ५ ॥
परम बुद्धिमान् महात्मा विदुरको गुप्तचरद्वारा उस पापासक्त पुरोचनकी चेष्टाओंका भी पता चल गया था। इसीलिये उन्होंने उस समय उस बुद्धिमान् मनुष्यको वहाँ भेजा था। उसने मन और वायुके समान वेगसे चलनेवाली एक नाव पाण्डवोंको दिखायी, जो सब प्रकारसे हवाका वेग सहनेमें समर्थ और ध्वजा-पताकाओंसे सुशोभित थी। उस नौकाको चलानेके लिये यन्त्र लगाया गया था। वह नाव गङ्गाजीके पावन तटपर विद्यमान थी और उसे विश्वासी मनुष्योंने बनाकर तैयार किया था ॥ ३—५ ॥
ततः पुनरथोवाच ज्ञापकं पूर्वचोदितम् ।
युधिष्ठिर निबोधेदं संज्ञार्थं वचनं कवेः ॥ ६ ॥
तदनन्तर उस मनुष्यने कहा—'युधिष्ठिरजी! ज्ञानी विदुरजीके द्वारा पहले कही हुई यह बात, जो मेरी विश्वसनीयताको सूचित करनेवाली है, पुनः सुनिये। मैं आपको संकेतके तौरपर स्मरण दिलानेके लिये इसे कहता हूँ॥ ६ ॥
कक्षघ्नः शिशिरघ्नश्च महाकक्षे बिलौकसः ।
न हन्तीत्येवमात्मानं यो रक्षति स जीवति ॥ ७ ॥
'(तुमसे विदुरजीने कहा था—) 'घास-फूस तथा सूखे वृक्षोंके जंगलको जलानेवाली और सर्दीको नष्ट कर देनेवाली आग विशाल वनमें फैल जानेपर भी बिलमें रहनेवाले चूहे आदि जन्तुओंको नहीं जला सकती। यों समझकर जो अपनी रक्षाका उपाय करता है, वही जीवित रहता है' ॥ ७ ॥
तेन मां प्रेषितं विद्धि विश्वस्तं संज्ञयानया ।
भूयश्चैवाह मां क्षत्ता विदुरः सर्वतोऽर्थवित् ॥ ८ ॥
कर्णं दुर्योधनं चैव भ्रातृभिः सहितं रणे ।
शकुनिं चैव कौन्तेय विजेतार्सि न संशयः ॥ ९ ॥
'इस संकेतसे आप यह जान लें कि 'मैं विश्वास-पात्र हूँ और विदुरजीने ही मुझे भेजा है।' इसके सिवा, सर्वतोभावेन अर्थसिद्धिका ज्ञान रखनेवाले विदुरजीने पुनः मुझसे आपके
लिये यह संदेश दिया कि 'कुन्ती-नन्दन! तुम युद्धमें भाइयोंसहित दुर्योधन, कर्ण और शकुनिको अवश्य परास्त करोगे, इसमें संशय नहीं है ।। ८-९ ।।
इयं वारिपथे युक्ता नौरप्सु सुखगामिनी ।
मोचयिष्यति वः सर्वानस्माद् देशान्न संशयः ।। १० ।।
'यह नौका जलमार्गके लिये उपयुक्त है। जलमें यह बड़ी सुगमतासे चलनेवाली है। यह नाव तुम सब लोगोंको इस देशसे दूर छोड़ देगी, इसमें संदेह नहीं है' ।। १० ।।
अथ तान् व्यथितान् दृष्ट्वा सह मात्रा नरोत्तमान् ।
नावमारोप्य गङ्गायां प्रस्थितानब्रवीत् पुनः ।। ११ ।।
इसके बाद मातासहित नरश्रेष्ठ पाण्डवोंको अत्यन्त दुःखी देख नाविकने उन सबको नावपर चढ़ाया और जब वे गंगाके मार्गसे प्रस्थान करने लगे, तब फिर इस प्रकार कहा — ।। ११ ।।
विदुरो मूर्युपाघ्राय परिष्वज्य वचो मुहुः ।
अरिष्टं गच्छताव्यग्राः पन्थानमिति चाब्रवीत् ।। १२ ।।
'विदुरजीने आप सभी पाण्डुपुत्रोंको भावनाद्वारा हृदयसे लगाकर और मस्तक सूँघकर यह आशीर्वाद फिर कहलाया है कि 'तुम शान्तचित्त हो कुशलपूर्वक मार्गपर बढ़ते जाओ' ।। १२ ।।
इत्युक्त्वा स तु तान् वीरान् पुमान् विदुरचोदितः ।
तारयामास राजेन्द्र गङ्गां नावा नरर्षभान् ।। १३ ।।
राजेन्द्र! विदुरजीके भेजनेसे आये हुए उस नाविकने उन शूरवीर नरश्रेष्ठ पाण्डवोंसे ऐसी बात कहकर उसी नावसे उन्हें गंगाजीके पार उतार दिया ।। १३ ।।
तारयित्वा ततो गङ्गां पारं प्राप्तांश्च सर्वशः ।
जयाशिषः प्रयुज्याथ यथागतमगाद्धि सः ।। १४ ।।
पार उतारनेके पश्चात् जब वे गंगाजीके दूसरे तटपर जा पहुँचे, तब उन सबके लिये 'जय हो, जय हो' यह आशीर्वाद सुनाकर वह नाविक जैसे आया था, उसी प्रकार लौट गया ।। १४ ।।
पाण्डवाश्च महात्मानः प्रतिसंदिश्य वै कवेः ।
गङ्गामुत्तीर्य वेगेन जग्मुर्गूढमलक्षिताः ।। १५ ।।
महात्मा पाण्डव भी विद्वान् विदुरजीको उनके संदेशका उत्तर देकर गंगापार हो अपनेको छिपाते हुए वेगपूर्वक वहाँसे चल दिये। कोई भी उन्हें देख या पहचान न सका ।। १५ ।।
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि जतुगृहपर्वणि गङ्गोत्तरणे
अष्टचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः ।। १४८ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत जतुगृहपर्वमें पाण्डवोंके गंगापार होनेसे सम्बन्ध रखनेवाला एक सौ अड़तालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १४८ ।।
१४९-
एकोनपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः
धृतराष्ट्र आदिके द्वारा पाण्डवोंके लिये शोकप्रकाश एवं जलांजलिदान तथा पाण्डवोंका वनमें प्रवेश
वैशम्पायन उवाच
अथ रात्र्यां व्यतीतायामशेषो नागरो जनः।
तत्राजगाम त्वरितो दिदृक्षुः पाण्डुनन्दनान्॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! उधर रात व्यतीत होनेपर वारणावत नगरके सारे नागरिक बड़ी उतावलीके साथ पाण्डुकुमारोंकी दशा देखनेके लिये उस लाक्षागृहके समीप आये॥ १ ॥
निर्वापयन्तो ज्वलनं ते जना ददृशुस्ततः।
जातुषं तद् गृहं दग्धममात्यं च पुरोचनम्॥ २ ॥
आते ही वे (सब) लोग आग बुझानेमें लग गये। उस समय उन्होंने देखा कि सारा घर लाखका बना था, जो जलकर खाक हो गया। उसीमें मन्त्री पुरोचन भी जल गया था॥ २ ॥
नूनं दुर्योधनेनेदं विहितं पापकर्मणा।
पाण्डवानां विनाशायेत्येवं ते चुक्रुशुर्जनाः॥ ३ ॥
(यह देख) वे (सभी) नागरिक चिल्ला-चिल्लाकर कहने लगे कि ‘अवश्य ही पापाचारी दुर्योधनने पाण्डवोंका विनाश करनेके लिये इस भवनका निर्माण करवाया था॥ ३ ॥
विदिते धृतराष्ट्रस्य धार्तराष्ट्रो न संशयः।
दग्धवान् पाण्डुदायादान् न ह्येनं प्रतिषिद्धवान्॥ ४ ॥
‘इसमें संदेह नहीं कि धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधनने धृतराष्ट्रकी जानकारीमें पाण्डुपुत्रोंको जलाया है और धृतराष्ट्रने इसे मना नहीं किया॥ ४ ॥
नूनं शांतनवोऽपीह न धर्ममनुवर्तते।
द्रोणश्च विदुरश्चैव कृपश्चान्ये च कौरवाः॥ ५ ॥
‘निश्चय ही इस विषयमें शांतनुनन्दन भीष्मजी भी धर्मका अनुसरण नहीं कर रहे हैं। द्रोण, विदुर, कृपाचार्य तथा अन्य कौरवोंकी भी यही दशा है॥ ५ ॥
ते वयं धृतराष्ट्रस्य प्रेषयामो दुरात्मनः।
संवृत्तस्ते परः कामः पाण्डवान् दग्धवानसि॥ ६ ॥
‘अब हमलोग दुरात्मा धृतराष्ट्रके पास यह संदेश भेज दें कि तुम्हारी सबसे बड़ी कामना पूरी हो गयी। तुम पाण्डवोंको जलानेमें सफल हो गये’॥ ६ ॥
ततो व्यपोहमानास्ते पाण्डवार्थे हुताशनम् । निषादीं ददृशुर्दग्धां पञ्चपुत्रामनागसम् ॥ ७ ॥ तदनन्तर उन्होंने पाण्डवोंको ढूँढ़नेके लिये जब आगको इधर-उधर हटाया, तब पाँच पुत्रोंके साथ निरपराध भीलनीकी जली लाश देखी ॥ ७ ॥ खनकेन तु तेनैव वेश्म शोधयता बिलम् । पांसुभिः पिहितं तच्च पुरुषैस्तैर्न लक्षितम् ॥ ८ ॥ उसी सुरंग खोदनेवाले पुरुषने घरको साफ करते समय सुरंगके छेदको धूलसे ढक दिया था। इससे दूसरे लोगोंकी दृष्टि उसपर नहीं पड़ी ॥ ८ ॥ ततस्ते ज्ञापयामासुर्धृतराष्ट्रस्य नागराः । पाण्डवानग्निना दग्धानमात्यं च पुरोचनम् ॥ ९ ॥ तदनन्तर वारणावतके नागरिकोंने धृतराष्ट्रको यह सूचित कर दिया कि पाण्डव तथा मन्त्री पुरोचन आगमें जल गये ॥ ९ ॥ श्रुत्वा तु धृतराष्ट्रस्तद् राजा सुमहदप्रियम् । विनाशं पाण्डुपुत्राणां विलाप सुदुःखितः ॥ १० ॥ महाराज धृतराष्ट्र पाण्डुपुत्रोंके विनाशका यह अत्यन्त अप्रिय समाचार सुनकर बहुत दुःखी हो विलाप करने लगे— ॥ १० ॥ अद्य पाण्डुर्मृतो राजा मम भ्राता महायशाः । तेषु वीरेषु दग्धेषु मात्रा सह विशेषतः ॥ ११ ॥ ‘अहो! मातासहित इन शूरवीर पाण्डवोंके दग्ध हो जानेपर विशेषरूपसे ऐसा लगता है, मानो मेरे भाई महायशस्वी राजा पाण्डुकी मृत्यु आज हुई है ॥ ११ ॥ गच्छन्तु पुरुषाः शीघ्रं नगरं वारणावतम् । सत्कारयन्तु तान् वीरान् कुन्तिराजसुतां च ताम् ॥ १२ ॥ ‘मेरे कुछ लोग शीघ्र ही वारणावत नगरमें जायँ और कुन्तिभोजकुमारी कुन्ती तथा वीरवर पाण्डवोंका आदरपूर्वक दाहसंस्कार करायें ॥ १२ ॥ कारयन्तु च कुल्यानि शुभानि च बृहन्ति च । ये च तत्र मृतास्तेषां सुहृदो यान्तु तानपि ॥ १३ ॥ ‘उन सबके कुलोचित शुभ और महान् संस्कारकी व्यवस्था करें तथा जो-जो उस घरमें जलकर मरे हैं, उनके सुहृद् एवं सगे-सम्बन्धी भी उन मृतकोंका दाह-संस्कार करनेके लिये वहाँ जायँ ॥ १३ ॥ एवं गते मया शक्यं यद् यत् कारयितुं हितम् । पाण्डवानां च कुन्त्याश्च तत् सर्वं क्रियतां धनैः ॥ १४ ॥ एवमुक्त्वा ततश्चक्रे ज्ञातिभिः परिवारितः । उदकं पाण्डुपुत्राणां धृतराष्ट्रोऽम्बिकासुतः ॥ १५ ॥
'इस दशामें मुझे पाण्डवों तथा कुन्तीका हित करनेके लिये जो-जो कार्य करना चाहिये या जो-जो कार्य मुझसे हो सकता है, वह सब धन खर्च करके सम्पन्न किया जाय।' यों कहकर अम्बिकानन्दन धृतराष्ट्रने जातिभाइयोंसे घिरे रहकर पाण्डवोंके लिये जलांजलि देनेका कार्य किया ।। १४-१५ ।।
(समेतास्तु ततः सर्वे भीष्मेण सह कौरवाः ।
धृतराष्ट्रः सपुत्रश्च गङ्गामभिमुखा ययुः ।।
एकवस्त्रा निरानन्दा निराभरणवेष्टनाः ।
उदकं कर्तुकामा वै पाण्डवानां महात्मनाम् ।।)
उस समय भीष्म, सब कौरव तथा पुत्रोंसहित धृतराष्ट्र एकत्र हो महात्मा पाण्डवोंको जलांजलि देनेकी इच्छासे गंगाजीके निकट गये। उन सबके शरीरपर एक-एक ही वस्त्र था। वे सभी आभूषण और पगड़ी आदि उतारकर आनन्दशून्य हो रहे थे।
रुरुदुः सहिताः सर्वे भृशं शोकपरायणाः ।
हा युधिष्ठिर कौरव्य हा भीम इति चापरे ।। १६ ।।
उस समय सब लोग अत्यन्त शोकमग्न हो एक साथ रोने और विलाप करने लगे। कोई कहता—'हा कुरुवंश-विभूषण युधिष्ठिर!' दूसरे कहते—'हा भीमसेन!' ।। १६ ।।
हा फाल्गुनेति चाप्यन्ये हा यमाविति चापरे ।
कुन्तीमार्ताश्च शोचन्त उदकं चक्रिरे जनाः ।। १७ ।।
अन्य कोई बोलते—'हा अर्जुन!' और इसी प्रकार दूसरे लोग 'हा नकुल-सहदेव!' कहकर पुकार उठते थे। सब लोगोंने कुन्तीदेवीके लिये शोकार्त होकर जलांजलि दी ।। १७ ।।
अन्ये पौरजनाश्चैवमन्वशोचन्त पाण्डवान् ।
विदुरस्त्वल्पशश्चक्रे शोकं वेद परं हि सः ।। १८ ।।
इसी प्रकार दूसरे-दूसरे पुरवासीजन भी पाण्डवोंके लिये बहुत शोक करने लगे। विदुरजीने बहुत थोड़ा शोक मनाया; क्योंकि वे वास्तविक वृत्तान्तसे परिचित थे ।। १८ ।।
(ततः प्रव्यथितो भीष्मः पाण्डुराजसुतान् मृतान् ।
सह मात्रेति तच्छ्रुत्वा विललाप रुरोद च ।।
भीष्म उवाच
न हि तौ नोत्सहेयातां भीमसेनधनंजयौ ।
तरसा वेगितात्मानौ निर्भेत्तुमपि मन्दिरम् ।
परासुत्वं न पश्यामि पृथायाः सह पाण्डवैः ।।
सर्वथा विकृतं नीतं यदि ते निधनं गताः ।
धर्मराजः स निर्दिष्टो ननु विप्रैर्युधिष्ठिरः ।।
सत्यव्रतो धर्मदत्तः सत्यवाक्शुभलक्षणः । कथं कालवशं प्राप्तः पाण्डवेयो युधिष्ठिरः ॥ आत्मानमुपमां कृत्वा परेषाम् वर्तते तु यः । सह मात्रा तु कौरव्यः कथं कालवशं गतः ॥ यौवराज्येऽभिषिक्तेन पितुर्यैनाहृतं यशः । आत्मनश्च पितुश्चैव सत्यधर्मस्य वृत्तिभिः ॥ कालेन स हि सम्भग्नो धिक् कृतान्तमनर्थकम् ॥ यच्च सा वनवासेन क्लेशिता दुःखभागिनी । पुत्रगृध्नुतया कुन्ती न भर्तारं मृता त्वनु ॥ अल्पकालं कुले जाता भर्तुः प्रीतिमवाप या । दग्धाद्य सह पुत्रैः सा असम्पूर्णमनोरथा ॥ पीनस्कन्धश्चारुबाहुर्मेरुकूटसमो युवा । मृतो भीम इति श्रुत्वा मनो न श्रद्दधाति मे ॥ अनिन्द्यानि च यो गच्छन् क्षिप्रहस्तो दृढायुधः । प्रपत्तिमॉल्लब्धलक्ष्यो रथयानविशारदः ॥ दूरपाती त्वसम्भ्रान्तो महावीर्यो महास्त्रवित् । अदीनात्मा नरव्याघ्रः श्रेष्ठः सर्वधनुष्मताम् ॥ येन प्राच्याः ससौवीरा दाक्षिणात्याश्च निर्जिताः । ख्यापितं येन शूरेण त्रिषु लोकेषु पौरुषम् ॥ यस्मिञ्जाते विशोकाभूत् कुन्ती पाण्डुश्च वीर्यवान् । पुरन्दरसमो जिष्णुः कथं कालवशं गतः ॥ कथं तावृषभस्कन्धौ सिंहविक्रान्तगामिनौ । मर्त्यधर्ममनुप्राप्तौ यमावरिनिबर्हणौ ॥
तदनन्तर भीष्मजी यह सुनकर कि राजा पाण्डुके पुत्र अपनी माताके साथ जल मरे हैं, अत्यन्त व्यथित हो उठे और रोने एवं विलाप करने लगे।
भीष्मजी बोले— वे दोनों भाई भीमसेन और अर्जुन उत्साह-शून्य हो गये हों, ऐसा तो नहीं प्रतीत होता। यदि वे वेगसे अपने शरीरका धक्का देते तो सुदृढ़ मकानको भी तोड़-फोड़ सकते थे। अतः पाण्डवोंके साथ कुन्तीकी मृत्यु हो गयी है, ऐसा मुझे नहीं दिखायी देता। यदि सचमुच उन सबकी मृत्यु हो चुकी है, तब तो यह सभी प्रकारसे बहुत बुरी बात हुई है। ब्राह्मणोंने तो धर्मराज युधिष्ठिरके विषयमें यह कहा था कि ये धर्मके दिये हुए राजकुमार सत्यव्रती, सत्यवादी एवं शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न होंगे। ऐसे वे पाण्डुनन्दन युधिष्ठिर कालके अधीन कैसे हो गये? जो अपने-आपको आदर्श बनाकर तदनुरूप दूसरोंके साथ बर्ताव करते थे वे ही कुरुकुलशिरोमणि युधिष्ठिर अपनी माताके साथ कालके अधीन कैसे
हो गये? जिन्होंने युवराजपदपर अभिषिक्त होते ही पिताके समान ही अपने सत्य एवं धर्मपूर्ण बर्तावके द्वारा अपना ही नहीं, राजा पाण्डुके भी यशका विस्तार किया था, वे युधिष्ठिर भी कालके अधीन हो गये। ऐसे निकम्मे कालको धिक्कार है। उत्तम कुलमें उत्पन्न कुन्ती, जो पुत्रोंकी अभिलाषा रखनेके कारण ही वनवासका कष्ट भोगती और दुःखपर दुःख उठाती रही तथा पतिके मरनेपर भी उनका अनुगमन न कर सकी, जिसे बहुत थोड़े समयतक ही पतिका प्रेम प्राप्त हुआ था, वही कुन्तिभोजकुमारी अभी अपने मनोरथ पूरे भी न कर पायी थी कि पुत्रोंके साथ दग्ध हो गयी! जिनके भरे हुए कंधे और मनोहर भुजाएँ थीं, जो मेरु-शिखरके समान सुन्दर एवं तरुण थे, वे भीमसेन मर गये, यह सुनकर भी मनको विश्वास नहीं होता। जो सदा उत्तम मार्गोंपर चलते थे, जिनके हाथोंमें बड़ी फुर्ती थी, जिनके आयुध अत्यन्त दृढ़ थे, जो गुरुजनोंके आश्रित रहते थे, जिनका निशाना कभी चूकता नहीं था, जो रथ हाँकनेमें कुशल, दूरतकका लक्ष्य बेधनेवाले, कभी व्याकुल न होनेवाले, महापराक्रमी और महान् अस्त्रोंके ज्ञाता थे, जिनके हृदयमें कभी दीनता नहीं आती थी, जो मनुष्योंमें सिंहके समान पराक्रमी तथा सम्पूर्ण धनुर्धरोंमें श्रेष्ठ थे, जिन्होंने प्राच्य, सौवीर और दाक्षिणात्य नरेशोंको परास्त किया था, जिस शूरवीरने तीनों लोकोंमें अपने पुरुषार्थको प्रसिद्ध किया था और जिनके जन्म लेनेपर कुन्ती और महापराक्रमी पाण्डु भी शोकरहित हो गये थे, वे इन्द्रके समान विजयी वीर अर्जुन भी कालके अधीन कैसे हो गये? जो बैलके-से हृष्ट-पुष्ट कंधोंसे सुशोभित थे तथा सिंहकी-सी मस्तानी चालसे चलते थे, वे शत्रुओंका संहार करनेवाले नकुल-सहदेव सहसा मृत्युको कैसे प्राप्त हो गये?
वैशम्पायन उवाच
तस्य विक्रन्दितं श्रुत्वा उदकं च प्रसिञ्चतः । देशकालं समाज्ञाय विदुरः प्रत्यभाषत ॥ मा शोचीस्त्वं नरव्याघ्र जहि शोकं महाव्रत । न तेषां विद्यते पापं प्राप्तकालं कृतं मया । एतच्च तेभ्य उदकं विप्रसिञ्च न भारत ॥ सोऽब्रवीत् किंचिदुत्सार्य कौरवाणामशृण्वताम् । क्षत्तारमुपसंगृह्य बाष्पोत्पीडकलस्वरः ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जलांजलि-दान देते समय भीष्मजीका यह विलाप सुनकर विदुरजीने देश और कालका भलीभाँति विचार करके कहा—'नरश्रेष्ठ! आप दुःखी न हों। महाव्रती वीर! आप शोक त्याग दें, पाण्डवोंकी मृत्यु नहीं हुई है। मैंने उस अवसरपर जो उचित था, वह कार्य कर दिया है। भारत! आप उन पाण्डवोंके लिये जलांजलि न दें।' तब भीष्मजी विदुरका हाथ पकड़कर उन्हें कुछ दूर हटा ले गये, जहाँसे कौरवलोग उनकी बात न सुन सकें। फिर वे आँसू बहाते हुए गद्गद वाणीमें बोले।
भीष्म उवाच
कथं ते तात जीवन्ति पाण्डोः पुत्रा महारथाः ।
कथमस्मत्कृते पक्षः पाण्डोर्न हि निपातितः ।।
कथं मत्प्रमुखाः सर्वे प्रमुक्ता महतो भयात् ।
जननी गरुडेनेव कुमारास्ते समुद्धृताः ।।
भीष्मजीने कहा—तात! पाण्डुके वे महारथी पुत्र कैसे जीवित बच गये? पाण्डुका
पक्ष किस तरह हमारे लिये नष्ट होनेसे बच गया? जैसे गरुड़ने अपनी माताकी रक्षा की थी,
उसी प्रकार तुमने किस तरह पाण्डुकुमारोंको बचाकर हम सब लोगोंकी महान् भयसे रक्षा
की है?
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्तस्तु कौरव्य कौरवाणामशृण्वताम् ।
आचचक्षे स धर्मात्मा भीष्मायाद्भुतकर्मणे ।।
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! इस प्रकार पूछे जानेपर धर्मात्मा विदुरने
कौरवोंके न सुनते हुए अद्भुत कर्म करनेवाले भीष्मजीसे इस प्रकार कहा—
विदुर उवाच
धृतराष्ट्रस्य शकुने राज्ञो दुर्योधनस्य च ।
विनाशे पाण्डुपुत्राणां कृतो मतिविनिश्चयः ।।
ततो जतुगृहं गत्वा दहनेऽस्मिन् नियोजिते ।
पृथायाश्च सपुत्राया धार्तराष्ट्रस्य शासनात् ।।
ततः खनकमाहूय सुरङ्गां वै बिले तदा ।
सगुहां कारयित्वा ते कुन्त्या पाण्डुसुतास्तदा ।।
निष्क्रामिता मया पूर्वं मा स्म शोके मनः कृथाः ।
निर्गताः पाण्डवा राजन् मात्रा सह परंतपाः ।।
अग्निदाहान्महाघोरान्मया तस्मादुपायतः ।
मा स्म शोकमिमं कार्षीर्जीवन्त्येव च पाण्डवाः ।।
प्रच्छन्ना विचरिष्यन्ति यावत् कालस्य पर्ययः ।।
तस्मिन् युधिष्ठिरं काले दक्ष्यन्ति भुवि भूमिपाः ।)
विदुर बोले—धृतराष्ट्र, शकुनि तथा राजा दुर्योधनका यह पक्का विचार हो गया था कि
पाण्डवोंको नष्ट कर दिया जाय। तदनन्तर लाक्षागृहमें जानेपर जब दुर्योधनकी आज्ञासे
पुत्रोंसहित कुन्तीको जला देनेकी योजना बन गयी, तब मैंने एक भूमि खोदनेवालेको
बुलाकर भूगर्भमें गुफासहित सुरंग खुदवायी और कुन्तीसहित पाण्डवोंको घरमें आग
लगनेसे पहले ही निकाल लिया, अतः आप अपने मनमें शोकको स्थान न दीजिये। राजन्!
शत्रुओंको संताप देनेवाले पाण्डव अपनी माताके साथ उस महाभयंकर अग्निदाहसे दूर निकल गये हैं। मेरे पूर्वोक्त उपायसे ही यह कार्य सम्भव हो सका है। पाण्डव निश्चय ही जीवित हैं, अतः आप उनके लिये शोक न कीजिये। जबतक यह समय बदलकर अनुकूल नहीं हो जाता, तबतक वे पाण्डव छिपे रहकर इस भूतलपर विचरेंगे। अनुकूल समय आनेपर सब राजा इस पृथिवीपर युधिष्ठिरको देखेंगे।
पाण्डवाश्चापि निर्गत्य नगराद् वारणावतात् ।
नदीं गङ्गामनुप्राप्ता मातृषष्ठा महाबलाः ॥ १९ ॥
(इधर) महाबली पाण्डव भी वारणावत नगरसे निकलकर माताके साथ गंगा नदीके तटपर पहुँचे ॥ १९ ॥
दाशानां भुजवेगेन नद्याः स्रोतोजवेन च ।
वायुना चानुकूलेन तूर्णं पारमवाप्नुवन् ॥ २० ॥
वे नाविकोंकी भुजाओं तथा नदीके प्रवाहके वेगसे अनुकूल वायुकी सहायता पाकर जल्दी ही पार उतर गये ॥ २० ॥
ततो नावं परित्यज्य प्रययुर्दक्षिणां दिशम् ।
विज्ञाय निशि पन्थानं नक्षत्रगणसूचितम् ॥ २१ ॥
तदनन्तर नाव छोड़ रातमें नक्षत्रोंद्वारा सूचित मार्गको पहचानकर वे दक्षिण दिशाकी ओर चल दिये ॥ २१ ॥
यतमाना वनं राजन् गहनं प्रतिपेदिरे ।
ततः श्रान्ताः पिपासार्ता निद्रान्धाः पाण्डुनन्दनाः ॥ २२ ॥
पुनरूचुर्महावीर्यं भीमसेनमिदं वचः ।
इतः कष्टतरं किं नु यद् वयं गहने वने ।
दिशश्च न विजानीमो गन्तुं चैव न शक्नुमः ॥ २३ ॥
राजन्! इस प्रकार आगे बढ़नेकी चेष्टा करते हुए वे सब-के-सब एक घने जंगलमें जा पहुँचे। उस समय पाण्डवलोग थके-माँदे, प्याससे पीड़ित और (अधिक जगनेसे) नींदमें अंधे-से हो रहे थे। वे महापराक्रमी भीमसेनसे पुनः इस प्रकार बोले—'भारत! इससे बढ़कर महान् कष्ट क्या होगा कि हमलोग इस घने जंगलमें फँसकर दिशाओंको भी नहीं जान पाते तथा चलने-फिरनेमें भी असमर्थ हो रहे हैं ॥ २२-२३ ॥
तं च पापं न जानीमो यदि दग्धः पुरोचनः ।
कथं तु विप्रमुच्येम भयादस्मादलक्षिताः ॥ २४ ॥
'हमें यह भी पता नहीं है कि पापी पुरोचन जल गया या नहीं। हम दूसरोंसे छिपे रहकर किस प्रकार इस महान् कष्टसे छुटकारा पा सकेंगे?' ॥ २४ ॥
पुनरस्मानुपादाय तथैव व्रज भारत ।
त्वं हि नो बलवानेको यथा सततगस्तथा ॥ २५ ॥
‘भैया! तुम पुनः पूर्ववत् हम सबको लेकर चलो। हमलोगोंमें एक तुम्हीं अधिक बलवान् और उसी प्रकार निरन्तर चलने-फिरनेमें भी समर्थ हो’ ॥ २५ ॥
इत्युक्तो धर्मराजेन भीमसेनो महाबलः ।
आदाय कुन्तीं भ्रातॄंश्च जगामाशु महाबलः ॥ २६ ॥
धर्मराजके यों कहनेपर महाबली भीमसेन माता कुन्ती तथा भाइयोंको अपने ऊपर चढ़ाकर बड़ी शीघ्रताके साथ चलने लगे ॥ २६ ॥
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि जतुगृहपर्वणि पाण्डववनप्रवेशे
एकोनपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १४९ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत जतुगृहपर्वमें पाण्डवोंका वनमें प्रवेशविषयक एक सौ उनचासवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १४९ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके २९ श्लोक मिलाकर कुल ५५ श्लोक हैं)
१५०-
पञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः
माता कुन्तीके लिये भीमसेनका जल ले आना, माता और भाइयोंको भूमिपर सोये देखकर भीमका विषाद एवं दुर्योधनके प्रति क्रोध
वैशम्पायन उवाच
तेन विक्रममाणेन ऊरुवेगसमीरितम् ।
वनं सवृक्षविटपं व्याघूर्णितमिवाभवत् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! भीमसेनके चलते समय उनके महान् वेगसे आन्दोलित हो वृक्ष और शाखाओंसहित वह सम्पूर्ण वन घूमता-सा प्रतीत होने लगा ॥ १ ॥
जङ्घावातो ववौ चास्य शुचिशुक्रागमे यथा ।
आवार्जितलतावृक्षं मार्गं चक्रे महाबलः ॥ २ ॥
जैसे ज्येष्ठ और आषाढ़ मासके संधिकालमें जोर-जोरसे हवा चलने लगती है, उसी प्रकार उनकी पिंडलियोंके वेगपूर्वक संचालनसे आँधी-सी उठ रही थी। महाबली भीम जिस मार्गसे चलते, वहाँकी लताओं और वृक्षोंको पैरोंसे रौंदकर जमीनके बराबर कर देते थे ॥ २ ॥
स मृद्नन् पुष्पितांश्चैव फलितांश्च वनस्पतीन् ।
अवरुज्य ययौ गुल्मान् पथस्तस्य समीपजान् ॥ ३ ॥
उनके मार्गके निकट जो फल और फूलोंसे लदे हुए वनस्पति एवं गुल्म आदि होते, उन्हें तोड़कर वे पैरोंसे रौंदते जाते थे ॥ ३ ॥
स रोषित इव क्रुद्धो वने भञ्जन् महाद्रुमान् ।
त्रिप्रस्रुतमदः शुष्मी षष्टिवर्षी मतङ्गजराट् ॥ ४ ॥
जैसे तीन अंगोंसे मद बहानेवाला साठ वर्षका तेजस्वी गजराज (किसी कारणसे) कुपित हो वनके बड़े-बड़े वृक्षोंको तोड़ने लगता है, उसी प्रकार महातेजस्वी भीमसेन उस वनके विशाल वृक्षोंको धराशायी करते हुए आगे बढ़ रहे थे ॥ ४ ॥
गच्छतस्तस्य वेगेन तार्क्ष्यमारुतरंहसः ।
भीमस्य पाण्डुपुत्राणां मूर्च्छेव समजायत ॥ ५ ॥
गरुड़ और वायुके समान तीव्र गतिवाले भीमसेनके चलते समय उनके (महान्) वेगसे अन्य पाण्डुपुत्रोंको मूर्च्छा-सी आ जाती थी ॥ ५ ॥
असकृच्चापि संतीर्य दूरपारं भुजप्लवैः ।
पथि प्रच्छन्नमासेदुर्धार्तराष्ट्रभयात् तदा ॥ ६ ॥