महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
**व्यासजी बोले—**जीवित पुत्रोंवाली बहू! तुम्हारे ये पुत्र नरश्रेष्ठ महात्मा धर्मराज युधिष्ठिर सदा धर्मपरायण हैं; अतः ये धर्मसे ही सारी पृथ्वीको जीतकर भूमण्डलके सम्पूर्ण राजाओंपर शासन करेंगे ।। १२ ।।
पृथिवीमखिलां जित्वा सर्वां सागरमेखलाम् ।
भीमसेनार्जुनबलाद् भोक्ष्यते नात्र संशयः ॥ १३ ॥
भीमसेन और अर्जुनके बलसे समुद्रपर्यन्त सारी वसुधाको अपने अधिकारमें करके ये उसका उपभोग करेंगे; इसमें संशय नहीं है ।। १३ ।।
पुत्रास्तव च माद्रयाश्च सर्व एव महारथाः ।
स्वराष्ट्रे विहरिष्यन्ति सुखं सुमनसः सदा ॥ १४ ॥
तुम्हारे और माद्रीके सभी महारथी पुत्र सदा अपने राज्यमें प्रसन्नचित्त हो सुखपूर्वक विचरेंगे ।। १४ ।।
यक्ष्यन्ति च नरव्याघ्रा निर्जित्य पृथिवीमिमाम् ।
राजसूयाश्वमेधाद्यैः क्रतुभिर्भूरिदक्षिणैः ॥ १५ ॥
पुरुषोंमें सिंहके समान बलवान् पाण्डव इस पृथ्वीको जीतकर प्रचुर दक्षिणासे सम्पन्न राजसूय तथा अश्वमेध आदि यज्ञोंद्वारा भगवान्का यजन करेंगे ।। १५ ।।
अनुगृह्य सुहृद्वर्गं भोगैश्वर्यसुखेन च ।
पितृपैतामहं राज्यमिमे भोक्ष्यन्ति ते सुताः ॥ १६ ॥
तुम्हारे ये पुत्र अपने सुहृदोंके समुदायको उत्तम भोग एवं ऐश्वर्य-सुखके द्वारा अनुगृहीत करके बाप-दादोंके राज्यका पालन एवं उपभोग करेंगे ।। १६ ।।
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्त्वा निवेश्यैनान् ब्राह्मणस्य निवेशने ।
अब्रवीत् पाण्डवश्रेष्ठमृषिर्द्वैपायनस्तदा ॥ १७ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! यों कहकर महर्षि द्वैपायनने इन सबको एक ब्राह्मणके घरमें ठहरा दिया और पाण्डवश्रेष्ठ युधिष्ठिरसे कहा— ।। १७ ।।
इह मासं प्रतीक्षध्वमागमिष्याम्यहं पुनः ।
देशकालौ विदित्वैव लप्स्यध्वं परमां मुदम् ॥ १८ ॥
‘तुमलोग यहाँ एक मासतक मेरी प्रतीक्षा करो। मैं पुनः आऊँगा। देश और कालका विचार करके ही कोई कार्य करना चाहिये; इससे तुम्हें बड़ा सुख मिलेगा’ ।। १८ ।।
स तैः प्राञ्जलिभिः सर्वैस्तथेत्युक्तो नराधिप ।
जगाम भगवान् व्यासो यथागतमृषिः प्रभुः ॥ १९ ॥
राजन्! उस समय सबने हाथ जोड़कर उनकी आज्ञा स्वीकार की। तदनन्तर शक्तिशाली महर्षि भगवान् व्यास जैसे आये थे, वैसे ही चले गये ।। १९ ।।
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि हिडिम्बवधपर्वणि एकचक्राप्रवेशे व्यासदर्शने
पञ्चपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १५५ ॥
इस प्रकार श्रीमद्भारत आदिपर्वके अन्तर्गत हिडिम्बवधपर्वमें पाण्डवोंका एकचक्रानगरीमें प्रवेश और व्यासजीका दर्शनविषयक एक सौ पचपनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १५५ ॥
(बकवधपर्व)
(बकवधपर्व)
षट्पञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः
ब्राह्मणपरिवारका कष्ट दूर करनेके लिये कुन्तीकी भीमसेनसे बातचीत तथा ब्राह्मणके चिन्तापूर्ण उद्गार
जनमेजय उवाच
एकचक्रां गतास्ते तु कुन्तीपुत्रा महारथाः ।
अत ऊर्ध्वं द्विजश्रेष्ठ किमकूर्वत पाण्डवाः ॥ १ ॥
**जनमेजयने पूछा—**द्विजश्रेष्ठ! कुन्तीके महारथी पुत्र पाण्डव जब एकचक्रा नगरीमें पहुँच गये, उसके बाद उन्होंने क्या किया? ॥ १ ॥
वैशम्पायन उवाच
एकचक्रां गतास्ते तु कुन्तीपुत्रा महारथाः ।
ऊषुर्नातिचिरं कालं ब्राह्मणस्य निवेशने ॥ २ ॥
**वैशम्पायनजीने कहा—**राजन्! एकचक्रा नगरीमें जाकर महारथी कुन्तीपुत्र थोड़े दिनोंतक एक ब्राह्मणके घरमें रहे ॥ २ ॥
रमणीयानि पश्यन्तो वनानि विविधानि च ।
पार्थिवानपि चोद्देशान् सरितश्च सरांसि च ॥ ३ ॥
चेरुर्भैक्षं तदा ते तु सर्व एव विशाम्पते ।
बभूवुर्नागराणां च स्वैर्गुणैः प्रियदर्शनाः ॥ ४ ॥
जनमेजय! उस समय वे सभी पाण्डव भाँति-भाँतिके रमणीय वनों, सुन्दर भूभागों, सरिताओं और सरोवरोंका दर्शन करते हुए भिक्षाके द्वारा जीवन-निर्वाह करते थे। अपने उत्तम गुणोंके कारण वे सभी नागरिकोंके प्रीति-पात्र हो गये थे ॥ ३-४ ॥
(दर्शनीया द्विजाः शुद्धा देवगर्भोपमाः शुभाः ।
भैक्षानर्हाश्च राज्यार्हाः सुकुमारास्तपस्विनः ॥
सर्वलक्षणसम्पन्ना भैक्षं नार्हन्ति नित्यशः ।
कार्यार्थिनश्चरन्तीति तर्कयन्त इति ब्रुवन् ॥
बन्धूनामागमान्नित्यमुपचिन्त्य तु नागराः ।
भाजनानि च पूर्णानि भक्ष्यभोज्यैरकारयन् ॥
मौनव्रतेन संयुक्ता भैक्षं गृह्णन्ति पाण्डवाः ।
माता चिरगतान् दृष्ट्वा शोचन्तीति च पाण्डवाः ।
त्वरमाणा निवर्तन्ते मातृगौरवयन्त्रिताः ॥)
उन्हें देखकर नगरनिवासी आपसमें तर्क-वितर्क करते हुए इस प्रकारकी बातें करते थे—'ये ब्राह्मणलोग तो देखने ही योग्य हैं। इनके आचार-विचार शुद्ध एवं सुन्दर हैं। इनकी आकृति देवकुमारोंके समान जान पड़ती है। ये भीख माँगनेयोग्य नहीं, राज्य करनेके योग्य हैं। सुकुमार होते हुए भी तपस्यामें लगे हैं। इनमें सब प्रकारके शुभ लक्षण शोभा पाते हैं। ये कदापि भिक्षा ग्रहण करनेयोग्य नहीं हैं। शायद किसी कार्यवश भिक्षुकोंके वेशमें विचर रहे हैं।' वे नागरिक पाण्डवोंके आगमनको अपने बन्धुजनोंका ही आगमन मानकर उनके लिये भक्ष्य-भोज्य पदार्थोंसे भरे हुए पात्र तैयार रखते थे और मौनव्रतका पालन करनेवाले पाण्डव उनसे वह भिक्षा ग्रहण करते थे। हमें आये हुए बहुत देर हो गयी, इसलिये माताजी चिन्तामें पड़ी होंगी—यह सोचकर माताके गौरव-पाशमें बँधे हुए पाण्डव बड़ी उतावलीके साथ उनके पास लौट आते थे।
निवेदयन्ति स्म तदा कुन्त्या भैक्षं सदा निशि ।
तया विभक्तान् भागांस्ते भुञ्जते स्म पृथक् पृथक् ॥ ५ ॥
प्रतिदिन रात्रिके आरम्भमें भिक्षा लाकर वे माता कुन्तीको सौंप देते और वे बाँटकर जिसके लिये जितना हिस्सा देतीं, उतना ही पृथक्-पृथक् लेकर पाण्डवलोग भोजन करते थे ॥ ५ ॥
अर्धं ते भुञ्जते वीराः सह मात्रा परंतपाः ।
अर्धं सर्वस्य भैक्षस्य भीमो भुङ्क्ते महाबलः ॥ ६ ॥
वे चारों वीर परंतप पाण्डव अपनी माताके साथ आधी भिक्षाका उपयोग करते थे और सम्पूर्ण भिक्षाका आधा भाग अकेले महाबली भीमसेन खाते थे ॥ ६ ॥
तथा तु तेषां वसतां तस्मिन् राष्ट्रे महात्मनाम् ।
अतिचक्राम सुमहान् कालोऽथ भरतर्षभ ॥ ७ ॥
भरतवंशशिरोमणे! इस प्रकार उस राष्ट्रमें निवास करते हुए महात्मा पाण्डवोंका बहुत समय बीत गया ॥ ७ ॥
ततः कदाचित् भैक्षाय गतास्ते पुरुषर्षभाः ।
संगत्या भीमसेनस्तु तत्रास्ते पृथा सह ॥ ८ ॥
तदनन्तर एक दिन नरश्रेष्ठ युधिष्ठिर आदि चार भाई भिक्षाके लिये गये; किंतु भीमसेन किसी कार्यविशेषके सम्बन्धसे कुन्तीके साथ वहाँ घरपर ही रह गये थे ॥ ८ ॥
अथार्तिजं महाशब्दं ब्राह्मणस्य निवेशने ।
भृशमुत्पतितं घोरं कुन्ती शुश्राव भारत ॥ ९ ॥
भारत! उस दिन ब्राह्मणके घरमें सहसा बड़े जोरका भयानक आर्तनाद होने लगा, जिसे कुन्तीने सुना॥ ९॥
रूरूयमाणांस्तान् दृष्ट्वा परिदेवयतश्च सा ।
कारुण्यात् साधुभावाच्च कुन्ती राजन् न चक्षमे ॥ १० ॥
राजन्! उन ब्राह्मण-परिवारके लोगोंको बहुत रोते और विलाप करते देख कुन्तीदेवी अत्यन्त दयालुता तथा साधु-स्वभावके कारण सहन न कर सकीं॥ १०॥
मथ्यमानेन दुःखेन हृदयेन पृथा तदा ।
उवाच भीमं कल्याणी कृपान्वितमिदं वचः ॥ ११ ॥
वसाम सुसुखं पुत्र ब्राह्मणस्य निवेशने ।
अज्ञाता धार्तराष्ट्रस्य सत्कृता वीतमन्यवः ॥ १२ ॥
उस समय उनका दुःख मानो कुन्तीदेवीके हृदयको मथे डालता था। अतः कल्याणमयी कुन्ती भीमसेनसे इस प्रकार करुणायुक्त वचन बोलीं—‘बेटा! हमलोग इस ब्राह्मणके घरमें दुर्योधनसे अज्ञात रहकर बड़े सुखसे निवास करते हैं। यहाँ हमारा इतना सत्कार हुआ है कि हम अपने दुःख और दैन्यको भूल गये हैं॥ ११-१२॥
सा चिन्तये सदा पुत्र ब्राह्मणस्यास्य किं न्वहम् ।
प्रियं कुर्यामिति गृहे यत् कुर्युरुषिताः सुखम् ॥ १३ ॥
‘इसलिये पुत्र! मैं सदा यही सोचती रहती हूँ कि इस ब्राह्मणका मैं कौन-सा प्रिय कार्य करूँ, जिसे किसीके घरमें सुखपूर्वक रहनेवाले लोग किया करते हैं॥ १३॥
एतावान् पुरुषस्तात कृतं यस्मिन् न नश्यति ।
यावच्च कुर्यादन्योऽस्य कुर्यादभ्यधिकं ततः ॥ १४ ॥
‘तात! जिसके प्रति किया हुआ उपकार उसका बदला चुकाये बिना नष्ट नहीं होता, वही पुरुष है (और इतना ही उसका पौरुष—मानवता है कि) दूसरा मनुष्य उसके प्रति जितना उपकार करे, वह उससे भी अधिक उस मनुष्यका प्रत्युपकार कर दे॥ १४॥
तदिदं ब्राह्मणस्यास्य दुःखमापतितं ध्रुवम् ।
तत्रास्य यदि साहाय्यं कुर्यामुपकृतं भवेत् ॥ १५ ॥
‘इस समय निश्चय ही इस ब्राह्मणपर कोई भारी दुःख आ पड़ा है। यदि उसमें मैं इसकी सहायता करूँ तो वास्तविक उपकार हो सकता है’॥ १५॥
भीमसेन उवाच
ज्ञायतामस्य यद् दुःखं यतश्चैव समुत्थितम् ।
विदित्वा व्यवसिष्यामि यद्यपि स्यात् सुदुष्करम् ॥ १६ ॥
भीमसेन बोले—माँ! पहले यह मालूम करो कि इस ब्राह्मणको क्या दुःख है और वह किस कारणसे प्राप्त हुआ है। जान लेनेपर अत्यन्त दुष्कर होगा, तो भी मैं इसका कष्ट दूर
करनेके लिये उद्योग करूँगा ।। १६ ।।
वैशम्पायन उवाच
एवं तौ कथयन्तौ च भूयः शुश्रुवतुः स्वनम् ।
आर्तिजं तस्य विप्रस्य सभार्यस्य विशाम्पते ।। १७ ।।
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन्! वे माँ-बेटे इस प्रकार बात कर ही रहे थे कि पुनः पत्नीसहित ब्राह्मणका आर्तनाद उनके कानोंमें पड़ा ।। १७ ।।
अन्तःपुरं ततस्तस्य ब्राह्मणस्य महात्मनः ।
विवेश त्वरिता कुन्ती बद्धवत्सेव सौरभी ।। १८ ।।
तब कुन्तीदेवी तुरंत ही उस महात्मा ब्राह्मणके अन्तःपुरमें घुस गयीं—ठीक उसी तरह जैसे घरके भीतर बँधे हुए बछड़ेवाली गाय स्वयं ही उसके पास पहुँच जाती है ।। १८ ।।
ततस्तं ब्राह्मणं तत्र भार्यया च सुतेन च ।
दुहित्रा चैव सहितं ददर्शावनताननम् ।। १९ ।।
भीतर जाकर कुन्तीने ब्राह्मणको वहाँ पत्नी, पुत्र और कन्याके साथ नीचे मुँह किये बैठे देखा ।। १९ ।।
ब्राह्मण उवाच
धिगिदं जीवितं लोके गतसारमनर्थकम् ।
दुःखमूलं पराधीनं भृशमप्रियभागि च ।। २० ।।
**ब्राह्मणदेवता कह रहे थे—**जगत्के इस जीवनको धिक्कार है; क्योंकि यह सारहीन, निरर्थक, दुःखकी जड़, पराधीन और अत्यन्त अप्रियका भागी है ।। २० ।।
जीविते परमं दुःखं जीविते परमो ज्वरः ।
जीविते वर्तमानस्य दुःखानामागमो ध्रुवः ।। २१ ।।
जीनेमें महान् दुःख है। जीवनकालमें बड़ी भारी चिन्ताका सामना करना पड़ता है। जिसने जीवन धारण कर रखा है, उसे दुःखोंकी प्राप्ति अवश्य होती है ।। २१ ।।
आत्मा ह्येको हि धर्मार्थौ कामं चैव निषेवते ।
एतैश्च विप्रयोगोऽपि दुःखं परमनन्तकम् ।। २२ ।।
जीवात्मा अकेला ही धर्म, अर्थ और कामका सेवन करता है। इनका वियोग होना भी उसके लिये महान् और अनन्त दुःखका कारण होता है ।। २२ ।।
आहुः केचित् परं मोक्षं स च नास्ति कथंचन ।
अर्थप्राप्तौ तु नरकः कृत्स्न एवोपपद्यते ।। २३ ।।
कुछ लोग चारों पुरुषार्थोंमें मोक्षको ही सर्वोत्तम बतलाते हैं, किंतु वह भी मेरे लिये किसी प्रकार सुलभ नहीं है। अर्थकी प्राप्ति होनेपर तो नरकका सम्पूर्ण दुःख भोगना ही पड़ता है ।। २३ ।।
अर्थेप्सुता परं दुःखमर्थप्राप्तौ ततोऽधिकम्।
जातस्नेहस्य चार्थेषु विप्रयोगे महत्तमम् ॥ २४ ॥
धनकी इच्छा सबसे बड़ा दुःख है, किंतु धन प्राप्त करनेमें तो और भी अधिक दुःख है और जिसकी धनमें आसक्ति हो गयी है*, उसे उस धनका वियोग होनेपर इतना महान् दुःख होता है, जिसकी कोई सीमा नहीं है ॥ २४ ॥
न हि योगं प्रपश्यामि येन मुच्येयमापदः।
पुत्रदारेण वा सार्धं प्राद्रवेयमनामयम् ॥ २५ ॥
मुझे ऐसा कोई उपाय नहीं दिखायी देता, जिससे इस विपत्तिसे छुटकारा पा सकूँ अथवा पुत्र और स्त्रीके साथ किसी निरापद स्थानमें भाग चलूँ ॥ २५ ॥
यतितं वै मया पूर्वं वेत्थ ब्राह्मणि तत् तथा।
क्षेमं यतस्ततो गन्तुं त्वया तु मम न श्रुतम् ॥ २६ ॥
ब्राह्मणी! तुम इस बातको ठीक-ठीक जानती हो कि पहले तुम्हारे साथ किसी ऐसे स्थानमें चलनेके लिये जहाँ सब प्रकारसे अपना भला हो, मैंने प्रयत्न किया था; परंतु उस समय तुमने मेरी बात नहीं सुनी ॥ २६ ॥
इह जाता विवृद्धास्मि पिता चापि ममेति वै।
उक्तवत्यसि दुर्मेधे याच्यमाना मयासकृत् ॥ २७ ॥
मूढमते! मैं बार-बार तुमसे अन्यत्र चलनेके लिये अनुरोध करता। उस समय तुम कहने लगती थीं—'यहीं मेरा जन्म हुआ, यहीं बड़ी हुई तथा मेरे पिता भी यहीं रहते थे' ॥ २७ ॥
स्वर्गतोऽपि पिता वृद्धस्तथा माता चिरं तव।
बान्धवा भूतपूर्वाश्च तत्र वासे तु का रतिः ॥ २८ ॥
अरी! तुम्हारे बूढ़े माता-पिता और पहलेके भाई-बन्धु जिसे छोड़कर बहुत दिन हुए स्वर्गलोकको चले गये, वहीं निवास करनेके लिये यह आसक्ति कैसी? ॥ २८ ॥
सोऽयं ते बन्धुकामाया अशृण्वत्या वचो मम।
बन्धुप्रणाशः सम्प्राप्तो भृशं दुःखकरो मम ॥ २९ ॥
तुमने बंधु-बान्धवोंके साथ रहनेकी इच्छा रखकर जो मेरी बात नहीं सुनी, उसीका यह फल है कि आज समस्त भाई-बंधुओंके विनाशकी घड़ी आ पहुँची है, जो मेरे लिये अत्यन्त दुःखका कारण है ॥ २९ ॥
अथवा मद्दिनाशोऽयं न हि शक्ष्यामि कंचन।
परित्यक्तुमहं बन्धुं स्वयं जीवन् नृशंसवत् ॥ ३० ॥
अथवा यह मेरे ही विनाशका समय है; क्योंकि मैं स्वयं जीवित रहकर क्रूर मनुष्यकी भाँति दूसरे किसी भाई-बंधुका त्याग नहीं कर सकूँगा ॥ ३० ॥
सहधर्मचरीं दान्तां नित्यं मातृसमां मम।
सखायं विहितां देवैर्नित्यं परमिकां गतिम् ॥ ३१ ॥
प्रिये! तुम मेरी सहधर्मिणी और इन्द्रियोंको संयममें रखनेवाली हो। सदा सावधान रहकर माताके समान मेरा पालन-पोषण करती हो। देवताओंने तुम्हें मेरी सखी (सहायिका) बनाया है। तुम सदा मेरी परम गति (सबसे बड़ा सहारा) हो ॥ ३१ ॥ पित्रा मात्रा च विहितां सदा गार्हस्थ्यभागिनीम् । वरयित्वा यथान्यायं मन्त्रवत् परिणीय च ॥ ३२ ॥ तुम्हारा पिता-माताने तुम्हें सदाके लिये मेरे गृहस्थाश्रमकी अधिकारिणी बनाया है। मैंने विधिपूर्वक तुम्हारा वरण करके मन्त्रोच्चारणपूर्वक तुम्हारे साथ विवाह किया है ॥ ३२ ॥ कुलीनां शीलसम्पन्नामपत्यजननीमपि । त्वामहं जीवितस्यार्थे साध्वीमनपकारिणीम् ॥ ३३ ॥ परित्यक्तुं न शक्ष्यामि भार्यां नित्यमनुव्रताम् । कुत एव परित्यक्तुं सुतं शक्ष्याम्यहं स्वयम् ॥ ३४ ॥ बालमप्राप्तवयसमजातव्यञ्जनाकृतिम् । भर्तुरर्थाय निक्षिप्तां न्यासं धात्रा महात्मना ॥ ३५ ॥ यया दौहित्रजाँल्लोकानांशंसे पितृभिः सह । स्वयमुत्पाद्य तां बालां कथमुत्स्रष्टुमुत्सहे ॥ ३६ ॥ तुम कुलीन, सुशीला और संतानवती हो, सती-साध्वी हो। तुमने कभी मेरा अपकार नहीं किया है। तुम नित्य मेरे अनुकूल चलनेवाली धर्मपत्नी हो। अतः मैं अपने जीवनकी रक्षाके लिये तुम्हें नहीं त्याग सकूँगा। फिर स्वयं ही अपने उस पुत्रका त्याग तो कैसे कर सकूँगा, जो अभी निरा बच्चा है, जिसने युवावस्थामें प्रवेश नहीं किया है तथा जिसके शरीरमें अभी जवानीके लक्षणतक नहीं प्रकट हुए हैं। साथ ही अपनी इस कन्याको कैसे त्याग दूँ, जिसे महात्मा ब्रह्माजीने उसके भावी पतिके लिये धरोहरके रूपमें मेरे यहाँ रख छोड़ा है? जिसके होनेसे मैं पितरोंके साथ दौहित्रजनित पुण्यलोकोंको पानेकी आशा रखता हूँ, उसी अपनी बालिकाको स्वयं ही जन्म देकर मैं मौतके मुखमें कैसे छोड़ सकता हूँ? ॥ ३३-३६ ॥ मन्यन्ते केचिदधिकं स्नेहं पुत्रे पितुर्नराः । कन्यायां केचिदपरे मम तुल्यावुभौ स्मृतौ ॥ ३७ ॥ कुछ लोग ऐसा मानते हैं कि पिताका अधिक स्नेह पुत्रपर होता है तथा कुछ दूसरे लोग पुत्रीपर ही अधिक स्नेह बताते हैं; किंतु मेरे लिये तो दोनों ही समान हैं ॥ ३७ ॥ यस्यां लोकाः प्रसूतिश्च स्थिता नित्यमथो सुखम् । अपापां तामहं बालां कथमुत्स्रष्टुमुत्सहे ॥ ३८ ॥ जिसपर पुण्यलोक, वंशपरम्परा और नित्य सुख—सब कुछ सदा निर्भर रहते हैं, उस निष्पाप बालिकाका परित्याग मैं कैसे कर सकता हूँ ॥ ३८ ॥ आत्मानमपि चोत्सृज्य तप्स्यामि परलोकगः ।
त्यक्ता ह्येते मया व्यक्तं नेह शक्ष्यन्ति जीवितुम् ॥ ३९ ॥
अपनेको भी त्यागकर परलोकमें जानेपर मैं सदा इस बातके लिये संतप्त होता रहूँगा कि मेरे द्वारा त्यागे हुए ये बच्चे अवश्य ही यहाँ जीवित नहीं रह सकेंगे ॥ ३९ ॥
एषां चान्यतमत्यागो नृशंसो गर्हितो बुधैः ।
आत्मत्यागे कृते चेमे मरिष्यन्ति मया विना ॥ ४० ॥
इनमेंसे किसीका भी त्याग विद्वानोंने निर्दयतापूर्ण तथा निन्दनीय बताया है और मेरे मर जानेपर ये सभी मेरे बिना मर जायँगे ॥ ४० ॥
स कृच्छ्रामहमापन्नो न शक्तस्तर्तुमापदम् ।
अहो धिक् कां गतिं त्वद्य गमिष्यामि सबान्धवः ।
सर्वैः सह मृतं श्रेयो न च मे जीवितं क्षमम् ॥ ४१ ॥
अहो! मैं बड़ी कठिन विपत्तिमें फँस गया हूँ। इससे पार होनेकी मुझमें शक्ति नहीं है। धिक्कार है इस जीवनको। हाय! मैं बन्धु-बान्धवोंके साथ आज किस गतिको प्राप्त होऊँगा? सबके साथ मर जाना ही अच्छा है। मेरा जीवित रहना कदापि उचित नहीं है ॥ ४१ ॥
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि बकवधपर्वणि ब्राह्मणचिन्तायां
षट्पञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १५६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत बकवधपर्वमें ब्राह्मणकी चिन्ताविषयक एक सौ छप्पनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १५६ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ४ १/३ श्लोक मिलाकर कुल ४५ १/३ श्लोक हैं)
* यावन्तो यस्य संयोगा द्रव्यैरिष्टैर्भवन्त्युत । तावन्तोऽस्य निखन्यन्ते हृदये शोकशङ्कवः ॥
१५७-
सप्तपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः
ब्राह्मणीका स्वयं मरनेके लिये उद्यत होकर पतिसे जीवित रहनेके लिये अनुरोध करना
ब्राह्मण्युवाच
न संतापस्त्वया कार्यः प्राकृतेनेव कर्हिचित् ।
न हि संतापकालोऽयं वैद्यस्य तव विद्यते ॥ १ ॥
ब्राह्मणी बोली—प्राणनाथ! आपको साधारण मनुष्योंकी भाँति कभी संताप नहीं करना चाहिये। आप विद्वान् हैं, आपके लिये यह संतापका अवसर नहीं है ॥ १ ॥
अवश्यं निधनं सर्वैर्गन्तव्यमिह मानवैः ।
अवश्यम्भाविन्यर्थे वै संतापो नेह विद्यते ॥ २ ॥
एक-न-एक दिन संसारमें सभी मनुष्योंको अवश्य मरना पड़ेगा; अतः जो बात अवश्य होनेवाली है, उसके लिये यहाँ शोक करनेकी आवश्यकता नहीं है ॥ २ ॥
भार्या पुत्रोऽथ दुहिता सर्वमात्मार्थमिष्यते ।
व्यथां जहि सुबुद्ध्या त्वं स्वयं यास्यामि तत्र च ॥ ३ ॥
एतद्धि परमं नार्याः कार्यं लोके सनातनम् ।
प्राणानपि परित्यज्य यद् भर्तृहितमाचरेत् ॥ ४ ॥
पत्नी, पुत्र और पुत्री—ये सब अपने ही लिये अभीष्ट होते हैं। आप उत्तम बुद्धि-विवेकका आश्रय लेकर शोक-संताप छोड़िये। मैं स्वयं वहाँ (राक्षसके समीप) चली जाऊँगी। पत्नीके लिये लोकमें सबसे बढ़कर यही सनातन कर्तव्य है कि वह अपने प्राणोंको भी निछावर करके पतिकी भलाई करे ॥ ३-४ ॥
तच्च तत्र कृतं कर्म तवापीदं सुखावहम् ।
भवत्यमुत्र चाक्षय्यं लोकेऽस्मिंश्च यशस्करम् ॥ ५ ॥
पतिके हितके लिये किया हुआ मेरा वह प्राणोत्सर्गरूप कर्म आपके लिये तो सुखकारक होगा ही, मेरे लिये भी परलोकमें अक्षय सुखका साधक और इस लोकमें यशकी प्राप्ति करानेवाला होगा ॥ ५ ॥
एष चैव गुरुर्धर्मो यं प्रवक्ष्याम्यहं तव ।
अर्थश्च तव धर्मश्च भूयानत्र प्रदृश्यते ॥ ६ ॥
यह सबसे बड़ा धर्म है, जो मैं आपसे बता रही हूँ। इसमें आपके लिये अधिक-से-अधिक स्वार्थ और धर्मका लाभ दिखायी देता है ॥ ६ ॥
यदर्थमिष्यते भार्या प्राप्तः सोऽर्थस्त्वया मयि ।
कन्या चैका कुमारश्च कृताहमनृणा त्वया ॥ ७ ॥
जिस उद्देश्यसे पत्नीकी अभिलाषा की जाती है, आपने वह उद्देश्य मुझसे सिद्ध कर लिया है। एक पुत्री और एक पुत्र आपके द्वारा मेरे गर्भसे उत्पन्न हो चुके हैं। इस प्रकार आपने मुझे भी उऋण कर दिया है ॥ ७ ॥
समर्थः पोषणे चासि सुतयो रक्षणे तथा ।
न त्वहं सुतयोः शक्ता तथा रक्षणपोषणे ॥ ८ ॥
इन दोनों संतानोंका पालन-पोषण और संरक्षण करनेमें आप समर्थ हैं। आपकी तरह मैं इन दोनोंके पालन-पोषण तथा रक्षाकी व्यवस्था नहीं कर सकूँगी ॥ ८ ॥
मम हि त्वद्विहीनायाः सर्वप्राणधनेश्वर ।
कथं स्यातां सुतौ बालौ भरेयं च कथं त्वहम् ॥ ९ ॥
मेरे सर्वस्वके स्वामी प्राणेश्वर! आपके न रहनेपर मेरे इन दोनों बच्चोंकी क्या दशा होगी? मैं किस तरह इन बालकोंका भरण-पोषण करूँगी? ॥ ९ ॥
कथं हि विधवानाथा बालपुत्रा विना त्वया ।
मिथुनं जीवयिष्यामि स्थिता साधुगते पथि ॥ १० ॥
मेरा पुत्र अभी बालक है, आपके बिना मैं अनाथ विधवा सन्मार्गपर स्थित रहकर इन दोनों बच्चोंको कैसे जिलाऊँगी ॥ १० ॥
अहंकृतावलिप्तैश्च प्रार्थ्यमानामिमां सुताम् ।
अयुक्तैस्तव सम्बन्धे कथं शक्ष्यामि रक्षितुम् ॥ ११ ॥
जो आपके यहाँ सम्बन्ध करनेके सर्वथा अयोग्य हैं, ऐसे अहंकारी और घमंडीलोग जब मुझसे इस कन्याको माँगेंगे, तब मैं उनसे इसकी रक्षा कैसे कर सकूँगी ॥ ११ ॥
उत्सृष्टमामिषं भूमौ प्रार्थयन्ति यथा खगाः ।
प्रार्थयन्ति जनाः सर्वे पतिहीनां तथा स्त्रियम् ॥ १२ ॥
साहं विचाल्यमाना वै प्रार्थ्यमाना दुरात्मभिः ।
स्थातुं पथि न शक्ष्यामि सज्जनेष्टे द्विजोत्तम ॥ १३ ॥
जैसे पक्षी पृथ्वीपर डाले हुए मांसके टुकड़ेको लेनेके लिये झपटते हैं, उसी प्रकार सब लोग विधवा स्त्रीको वशमें करना चाहते हैं। द्विजश्रेष्ठ! दुराचारी मनुष्य जब बार-बार मुझसे याचना करते हुए मुझे मर्यादासे विचलित करनेकी चेष्टा करेंगे, उस समय मैं श्रेष्ठ पुरुषोंके द्वारा अभिलषित मार्गपर स्थिर नहीं रह सकूँगी ॥ १२-१३ ॥
कथं तव कुलस्यैकामिमां बालामनागसम् ।
पितृपैतामहे मार्गे नियोक्तुमहमुत्सहे ॥ १४ ॥
आपके कुलकी इस एकमात्र निरपराध बालिकाको मैं बाप-दादोंके द्वारा पालित धर्ममार्गपर लगाये रखनेमें कैसे समर्थ होऊँगी ॥ १४ ॥
कथं शक्ष्यामि बालेऽस्मिन् गुणानाधातुमीप्सितान् ।
अनाथे सर्वतो लुप्ते यथा त्वं धर्मदर्शिवान् ।। १५ ।।
आप धर्मके ज्ञाता हैं, आप जैसे अपने बालकको सद्गुणी बना सकते हैं, उस प्रकार मैं आपके न रहनेपर सब ओरसे आश्रयहीन हुए इस अनाथ बालकमें वांछनीय उत्तम गुणोंका आधान कैसे कर सकूँगी ।। १५ ।।
इमामपि च ते बालामनाथां परिभूय माम् ।
अनर्हाः प्रार्थयिष्यन्ति शूद्रा वेदश्रुतिं यथा ।। १६ ।।
जैसे अनधिकारी शूद्र वेदकी श्रुतिको प्राप्त करना चाहता हो, उसी प्रकार अयोग्य पुरुष मेरी अवहेलना करके आपकी इस अनाथ बालिकाको भी ग्रहण करना चाहेंगे ।। १६ ।।
तां चैदहं न दित्सेयं त्वद्गुणैरुपबृंहिताम् ।
प्रमथ्यैनां हरेयुस्ते हविर्ध्वाङ्क्षा इवाध्वरात् ।। १७ ।।
आपके ही उत्तम गुणोंसे सम्पन्न अपनी इस पुत्रीको यदि मैं उन अयोग्य पुरुषोंके हाथमें न देना चाहूँगी तो वे बलपूर्वक इसे उसी प्रकार हर ले जायँगे, जैसे कौए यज्ञसे हविष्यका भाग लेकर उड़ जायँ ।। १७ ।।
सम्प्रेक्षमाणा पुत्रं ते नानुरूपमिवात्मनः ।
अनर्हवशमापन्नामिमां चापि सुतां तव ।। १८ ।।
अवज्ञाता च लोकेषु तथाऽऽत्मानमजानती ।
अवलिप्तैर्नरैर्ब्रह्मन् मरिष्यामि न संशयः ।। १९ ।।
ब्रह्मन्! आपके इस पुत्रको आपके अनुरूप न देखकर और आपकी इस पुत्रीको भी अयोग्य पुरुषके वशमें पड़ी देखकर तथा लोकमें घमंडी मनुष्योंद्वारा अपमानित हो अपनेको पूर्ववत् सम्मानित अवस्थामें न पाकर मैं प्राण त्याग दूँगी, इसमें संशय नहीं है ।। १८-१९ ।।
तौ च हीनौ मया बालौ त्वया चैव तथाऽऽत्मजौ ।
विनश्येतां न संदेहो मत्स्याविव जलक्षये ।। २० ।।
जैसे पानी सूख जानेपर वहाँकी मछलियाँ नष्ट हो जाती हैं, उसी प्रकार मुझसे और आपसे रहित होकर अपने ये दोनों बच्चे निस्संदेह नष्ट हो जायँगे ।। २० ।।
त्रितयं सर्वथाप्येवं विनशिष्यत्यसंशयम् ।
त्वया विहीनं तस्मात् त्वं मां परित्यक्तुमर्हसि ।। २१ ।।
नाथ! इस प्रकार आपके बिना मैं और ये दोनों बच्चे—तीनों ही सर्वथा विनष्ट हो जायँगे—इसमें तनिक भी संशय नहीं है। इसलिये आप केवल मुझे त्याग दीजिये ।। २१ ।।
व्युष्टिरेषा परा स्त्रीणां पूर्वं भर्तुः परां गतिम् ।
गन्तुं ब्रह्मन् सपुत्राणामिति धर्मविदो विदुः ।। २२ ।।
ब्रह्मन्! पुत्रवती स्त्रियाँ यदि अपने पतिसे पहले ही मृत्युको प्राप्त हो जायँ तो यह उनके लिये परम सौभाग्यकी बात है। धर्मज्ञ विद्वान् ऐसा ही मानते हैं ।। २२ ।।
(मितं ददाति हि पिता मितं माता मितं सुतः । अमितस्य हि दातारं का पतिं नाभिनन्दति ॥) पिता, माता और पुत्र—ये सब परिमित मात्रामें ही सुख देते हैं, अपरिमित सुखको देनेवाला तो केवल पति है। ऐसे पतिका कौन स्त्री आदर नहीं करेगी? परित्यक्तः सुतश्चायं दुहितेयं तथा मया । बान्धवाश्च परित्यक्तास्त्वदर्थं जीवितं च मे ॥ २३ ॥ आर्यपुत्र! आपके लिये मैंने यह पुत्र और पुत्री भी छोड़ दी, समस्त बन्धु-बान्धवोंको भी छोड़ दिया और अब अपना यह जीवन भी त्याग देनेको उद्यत हूँ ॥ २३ ॥ यज्ञैस्तपोभिर्नियमैर्दानैश्च विविधैस्तथा । विशिष्यते स्त्रिया भर्तुर्नित्यं प्रियहिते स्थितिः ॥ २४ ॥ स्त्री यदि सदा अपने स्वामीके प्रिय और हितमें लगी रहे तो यह उसके लिये बड़े-बड़े यज्ञों, तपस्याओं, नियमों और नाना प्रकारके दानोंसे भी बढ़कर है ॥ २४ ॥ तदिदं यच्चिकीर्षामि धर्मं परमसम्मतम् । इष्टं चैव हितं चैव तव चैव कुलस्य च ॥ २५ ॥ अतः मैं जो यह कार्य करना चाहती हूँ, यह श्रेष्ठ पुरुषोंसे सम्मत धर्म है और आपके तथा इस कुलके लिये सर्वथा अनुकूल एवं हितकारक है ॥ २५ ॥ इष्टानि चाप्यपत्यानि द्रव्याणि सुहृदः प्रियाः । आपद्धर्मप्रमोक्षाय भार्या चापि सतां मतम् ॥ २६ ॥ अनुकूल संतान, धन, प्रिय, सुहृद् तथा पत्नी—ये सभी आपद्धर्मसे छूटनेके लिये ही वांछनीय हैं; ऐसा साधु पुरुषोंका मत है ॥ २६ ॥ आपदर्थे धनं रक्षेद् दारान् रक्षेद् धनैरपि । आत्मानं सततं रक्षेद् दारैरपि धनैरपि ॥ २७ ॥ आपत्तिके लिये धनकी रक्षा करे, धनके द्वारा स्त्रीकी रक्षा करे और स्त्री तथा धन दोनोंके द्वारा सदा अपनी रक्षा करे ॥ २७ ॥ दृष्टादृष्टफलार्थं हि भार्या पुत्रो धनं गृहम् । सर्वमेतद् विधातव्यं बुधानामेष निश्चयः ॥ २८ ॥ पत्नी, पुत्र, धन और घर—ये सब वस्तुएँ दृष्ट और अदृष्ट फल (लौकिक और पारलौकिक लाभ)-के लिये संग्रहणीय हैं। विद्वानोंका यह निश्चय है ॥ २८ ॥ एकतो वा कुलं कृत्स्नमात्मा वा कुलवर्धनः । न समं सर्वमेवेति बुधानामेष निश्चयः ॥ २९ ॥ एक ओर सम्पूर्ण कुल हो और दूसरी ओर उस कुलकी वृद्धि करनेवाला शरीर हो तो उन दोनोंकी तुलना करनेपर वह सारा कुल उस शरीरके बराबर नहीं हो सकता; यह विद्वानोंका निश्चय है ॥ २९ ॥
स कुरुष्व मया कार्यं तारयात्मानमात्मना । अनुजानीहि मामार्य सुतौ मे परिपालय ॥ ३० ॥ आर्य! अतः आप मेरे द्वारा अभीष्ट कार्यकी सिद्धि कीजिये और स्वयं प्रयत्न करके अपनेको इस संकटसे बचाइये। मुझे राक्षसके पास जानेकी आज्ञा दीजिये और मेरे दोनों बच्चोंका पालन कीजिये ॥ ३० ॥
अवध्यां स्त्रियमित्याहुर्धर्मज्ञा धर्मनिश्चये । धर्मज्ञान् राक्षसानाहुर्न हन्यात् स च मामपि ॥ ३१ ॥ धर्मज्ञ विद्वानोंने धर्म-निर्णयके प्रसंगमें नारीको अवध्य बताया है। राक्षसोंको भी लोग धर्मज्ञ कहते हैं। इसलिये सम्भव है, वह राक्षस भी मुझे स्त्री समझकर न मारे ॥ ३१ ॥
निस्संशयं वधः पुंसां स्त्रीणां संशयितो वधः । अतो मामेव धर्मज्ञ प्रस्थापयितुमर्हसि ॥ ३२ ॥ पुरुष वहाँ जायँ, तो वह राक्षस उनका वध कर ही डालेगा इसमें संशय नहीं है; परंतु स्त्रियोंके वधमें संदेह है। (यदि राक्षसने धर्मका विचार किया तो मेरे बच जानेकी आशा है) अतः धर्मज्ञ आर्यपुत्र! आप मुझे ही वहाँ भेजें ॥ ३२ ॥
भुक्तं प्रियाण्यवाप्तानि धर्मश्च चरितो महान् । त्वत् प्रसूतिः प्रिया प्राप्ता न मां तप्स्यत्यजीवितम् ॥ ३३ ॥ मैंने सब प्रकारके भोग भोग लिये, मनको प्रिय लगनेवाली वस्तुएँ प्राप्त कर लीं, महान् धर्मका अनुष्ठान भी पूरा कर लिया और आपसे प्यारी संतान भी प्राप्त कर ली। अब यदि मेरी मृत्यु भी हो जाय तो उससे मुझे दुःख न होगा ॥ ३३ ॥
जातपुत्रा च वृद्धा च प्रियकामा च ते सदा । समीक्ष्यैतदहं सर्वं व्यवसायं करोम्यतः ॥ ३४ ॥ मुझसे पुत्र उत्पन्न हो गया, मैं बूढ़ी भी हो चली और सदा आपका प्रिय करनेकी इच्छा रखती आयी हूँ। इन सब बातोंपर विचार करके ही अब मैं मरनेका निश्चय कर रही हूँ ॥ ३४ ॥
उत्सृज्यापि हि मामार्य प्राप्स्यस्यन्यामपि स्त्रियम् । ततः प्रतिष्ठितो धर्मो भविष्यति पुनस्तव ॥ ३५ ॥ आर्य! मुझे त्याग करके आप दूसरी स्त्री भी प्राप्त कर सकते हैं। उससे आपका गृहस्थ-धर्म पुनः प्रतिष्ठित हो जायगा ॥ ३५ ॥
न चाप्यधर्मः कल्याण बहुपत्नीकृतां नृणाम् । स्त्रीणामधर्मः सुमहान् भर्तुः पूर्वस्य लङ्घने ॥ ३६ ॥ कल्याणस्वरूप हृदयेश्वर! बहुत-सी स्त्रियोंसे विवाह करनेवाले पुरुषोंको भी पाप नहीं लगता। परंतु स्त्रियोंको अपने पूर्वपतिका उल्लंघन करनेपर बड़ा भारी पाप लगता है ॥ ३६ ॥
एतत् सर्वं समीक्ष्य त्वमात्मत्यागं च गर्हितम् ।
आत्मानं तारयाद्याशु कुलं चेमौ च दारकौ ॥ ३७ ॥
इन सब बातोंको विचार करके और अपने देहके त्यागको निन्दित कर्म मानकर आप अब शीघ्र ही अपनेको, अपने कुलको और इन दोनों बच्चोंको भी संकटसे बचा लीजिये ॥ ३७ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्तस्तया भर्ता तां समालिङ्ग्य भारत ।
मुमोच बाष्पं शनकैः सभार्यो भृशदुःखितः ॥ ३८ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**भारत! ब्राह्मणीके यों कहनेपर उसके पति ब्राह्मणदेवता अत्यन्त दुःखी हो उसे हृदयसे लगाकर उसके साथ ही धीरे-धीरे आँसू बहाने लगे ॥ ३८ ॥
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि बकवधपर्वणि ब्राह्मणीवाक्ये
सप्तपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १५७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत बकवधपर्वमें ब्राह्मणीवाक्यविषयक एक सौ सत्तावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १५७ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल ३९ श्लोक हैं)
१५८-
अष्टपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः
ब्राह्मण-कन्याके त्याग और विवेकपूर्ण वचन तथा कुन्तीका उन सबके पास जाना
वैशम्पायन उवाच
तयोर्दुःखितयोर्वाक्यमतिमात्रं निशम्य तु ।
ततो दुःखपरीताङ्गी कन्या तावभ्यभाषत ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! दुःखमें डूबे हुए माता-पिताका यह (अत्यन्त शोकपूर्ण) वचन सुनकर कन्याके सम्पूर्ण अंगोंमें दुःख व्याप्त हो गया; उसने माता और पिता दोनोंसे कहा— ॥ १ ॥
किमेवं भृशदुःखार्तौ रोरूयेतामनाथवत् ।
ममापि श्रूयतां वाक्यं श्रुत्वा च क्रियतां क्षमम् ॥ २ ॥
‘आप दोनों इस प्रकार अत्यन्त दुःखसे आतुर हो अनाथकी भाँति क्यों बार-बार रो रहे हैं? मेरी भी बात सुनिये और उसे सुनकर जो उचित जान पड़े, वह कीजिये ॥ २ ॥
धर्मतोऽहं परित्याज्या युवयोर्नात्र संशयः ।
त्यक्तव्यां मां परित्यज्य त्राहि सर्वं मयैकया ॥ ३ ॥
‘इसमें संदेह नहीं कि एक-न-एक दिन आप दोनोंको धर्मतः मेरा परित्याग करना पड़ेगा। जब मैं त्याज्य ही हूँ, तब आज ही मुझे त्यागकर मुझ अकेलीके द्वारा इस समूचे कुलकी रक्षा कर लीजिये ॥ ३ ॥
इत्यर्थमिष्यतेऽपत्यं तारयिष्यति मामिति ।
अस्मिन्नुपस्थिते काले तरध्वं प्लववन्मया ॥ ४ ॥
‘संतानकी इच्छा इसीलिये की जाती है कि यह मुझे संकटसे उबारेगी। अतः इस समय जो संकट उपस्थित हुआ है, उसमें नौकाकी भाँति मेरा उपयोग करके आपलोग शोकसागरसे पार हो जाइये ॥ ४ ॥
इह वा तारयेद् दुर्गादुत वा प्रेत्य भारत ।
सर्वथा तारयेत् पुत्रः पुत्र इत्युच्यते बुधैः ॥ ५ ॥
‘जो पुत्र इस लोकमें दुर्गम संकटसे पार लगाये अथवा मृत्युके पश्चात् परलोकमें उद्धार करे—सब प्रकार पिताको तार दे, उसे ही विद्वानोंने वास्तवमें पुत्र कहा है ॥ ५ ॥
आकाङ्क्षन्ते च दौहित्रान् मयि नित्यं पितामहाः ।
तत् स्वयं वै परित्रास्ये रक्षन्ती जीवितं पितुः ॥ ६ ॥
‘पितरलोग मुझसे उत्पन्न होनेवाले दौहित्रसे अपने उद्धारकी सदा अभिलाषा रखते हैं, इसलिये मैं स्वयं ही पिताके जीवनकी रक्षा करती हुई उन सबका उद्धार करूँगी ॥ ६ ॥ भ्राता च मम बालोऽयं गते लोकममुं त्वयि । अचिरेणैव कालेन विनश्येत न संशयः ॥ ७ ॥ ‘यदि आप परलोकवासी हो गये तो यह मेरा नन्हा-सा भाई थोड़े ही समयमें नष्ट हो जायगा, इसमें संशय नहीं है ॥ ७ ॥ तातेऽपि हि गते स्वर्गं विनष्टे च ममानुजे । पिण्डः पितॄणां व्युच्छिद्येत् तत् तेषां विप्रियं भवेत् ॥ ८ ॥ ‘पिता स्वर्गवासी हो जायें और मेरा भैया भी नष्ट हो जाय, तो पितरोंका पिण्ड ही लुप्त हो जायगा, जो उनके लिये बहुत ही अप्रिय होगा ॥ ८ ॥ पित्रा त्यक्ता तथा मात्रा भ्रात्रा चाहमसंशयम् । दुःखाद् दुःखतरं प्राप्य म्रियेयमतथोचिता ॥ ९ ॥ ‘पिता, माता और भाई—तीनोंसे परित्यक्त होकर मैं एक दुःखसे दूसरे महान् दुःखमें पड़कर निश्चय ही मर जाऊँगी। यद्यपि मैं ऐसा दुःख भोगनेके योग्य नहीं हूँ, तथापि आप लोगोंके बिना मुझे वह सब भोगना ही पड़ेगा ॥ ९ ॥ त्वयि त्वरोगे निर्मुक्ते माता भ्राता च मे शिशुः । संतानश्चैव पिण्डश्च प्रतिष्ठास्यत्यसंशयम् ॥ १० ॥ ‘यदि आप मृत्युके संकटसे मुक्त एवं नीरोग रहे तो मेरी माता, मेरा नन्हा-सा भाई, संतान-परम्परा और पिण्ड (श्राद्धकर्म)—ये सब स्थिर रहेंगे; इसमें संशय नहीं है ॥ १० ॥ आत्मा पुत्रः सखा भार्या कृच्छ्रं तु दुहिता किल । स कृच्छ्रान्मोचयात्मानं मां च धर्मे नियोजय ॥ ११ ॥ ‘कहते हैं पुत्र अपना आत्मा है, पत्नी मित्र है; किंतु पुत्री निश्चय ही संकट है, अतः आप इस संकटसे अपनेको बचा लीजिये और मुझे भी धर्ममें लगाइये ॥ ११ ॥ अनाथा कृपणा बाला यत्रक्वचनगामिनी । भविष्यामि त्वया तात विहीना कृपणा सदा ॥ १२ ॥ ‘पिताजी! आपके बिना मैं सदाके लिये दीन और असहाय हो जाऊँगी, अनाथ और दयनीय समझी जाऊँगी। अरक्षित बालिका होनेके कारण मुझे जहाँ कहीं भी जानेके लिये विवश होना पड़ेगा ॥ १२ ॥ अथवाहं करिष्यामि कुलस्यास्य विमोचनम् । फलसंस्था भविष्यामि कृत्वा कर्म सुदुष्करम् ॥ १३ ॥ ‘अथवा मैं अपनेको मृत्युके मुखमें डालकर इस कुलको संकटसे छुड़ाऊँगी। यह अत्यन्त दुष्कर कर्म कर लेनेसे मेरी मृत्यु सफल हो जायगी ॥ १३ ॥ अथवा यास्यसे तत्र त्यक्त्वा मां द्विजसत्तम ।
पीडिताहं भविष्यामि तदवेक्षस्व मामपि ॥ १४ ॥
‘द्विजश्रेष्ठ पिताजी! यदि आप मुझे त्यागकर स्वयं राक्षसके पास चले जायँगे तो मैं बड़े दुःखमें पड़ जाऊँगी। अतः मेरी ओर भी देखिये ॥ १४ ॥
तदस्मदर्थं धर्मार्थं प्रसवार्थं स सत्तम ।
आत्मानं परिरक्षस्व त्यक्तव्यां मां च संत्यज ॥ १५ ॥
‘अतः हे साधुशिरोमणे! आप मेरे लिये, धर्मके लिये तथा संतानकी रक्षाके लिये भी अपनी रक्षा कीजिये और मुझे, जिसको एक दिन छोड़ना ही है, आज ही त्याग दीजिये ॥ १५ ॥
अवश्यकरणीये च मा त्वां कालोऽत्यगादयम् ।
किं त्वतः परं दुःखं यद् वयं स्वर्गते त्वयि ॥ १६ ॥
याचमानाः परादन्नं परिधावेमहि श्ववत् ।
त्वयि त्वरोगे निर्मुक्ते क्लेशादस्मात् सबान्धवे ।
अमृते वसती लोके भविष्यामि सुखान्विता ॥ १७ ॥
‘पिताजी! जो काम अवश्य करना है, उसका निश्चय करनेमें आपको अपना समय व्यर्थ नहीं जाने देना चाहिये (शीघ्र मेरा त्याग करके इस कुलकी रक्षा करनी चाहिये)। हमलोगोंके लिये इससे बढ़कर महान् दुःख और क्या होगा कि आपके स्वर्गवासी हो जानेपर हम दूसरोंसे अन्नकी भीख माँगते हुए कुत्तोंकी तरह इधर-उधर दौड़ते फिरें। यदि मुझे त्यागकर आप अपने भाई-बन्धुओंसहित इस क्लेशसे मुक्त हो नीरोग बने रहें तो मैं अमरलोकमें निवास करती हुई बहुत सुखी होऊँगी ॥ १६-१७ ॥
इतः प्रदाने देवाश्च पितरश्चेति न श्रुतम् ।
त्वया दत्तेन तोयेन भविष्यन्ति हिताय वै ॥ १८ ॥
‘यद्यपि ऐसे दानसे देवता और पितर प्रसन्न नहीं होते, ऐसा मैंने सुन रखा है, तथापि आपके द्वारा दी हुई जलांजलिसे वे प्रसन्न होकर अवश्य हमारा हित-साधन करनेवाले होंगे’ ॥ १८ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवं बहुविधं तस्या निशम्य परिदेवितम् ।
पिता माता च सा चैव कन्या प्ररुरुदुस्त्रयः ॥ १९ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! इस तरह उस कन्याके मुखसे नाना प्रकारका विलाप सुनकर पिता-माता और वह कन्या तीनों फूट-फूटकर रोने लगे ॥ १९ ॥
ततः प्ररुदितान् सर्वान् निशम्याथ सुतस्तदा ।
उत्फुल्लनयनो बालः कलमव्यक्तमब्रवीत् ॥ २० ॥
तब उन सबको रोते देख ब्राह्मणका नन्हा-सा बालक उन सबकी ओर प्रफुल्ल नेत्रोंसे देखता हुआ तोतली भाषामें अस्पष्ट एवं मधुर वचन बोला— ।। २० ।। मा पिता रुद मा मातर्मा स्वसस्त्विति चाब्रवीत् । प्रहसन्निव सर्वास्तानेकैकमनुसर्पति ।। २१ ।। ततः स तृणमादाय प्रहृष्टः पुनरब्रवीत् । अनेनाहं हनिष्यामि राक्षसं पुरुषादकम् ।। २२ ।। ‘पिताजी! न रोओ, माँ! न रोओ, बहिन! न रोओ, वह हँसता हुआ-सा प्रत्येकके पास जाता और सबसे यही बात कहता था। तदनन्तर उसने एक तिनका उठा लिया और अत्यन्त हर्षमें भरकर कहा—‘मैं इसीसे उस नरभक्षी राक्षसको मार डालूँगा’ ।। २१-२२ ।। तथापि तेषां दुःखेन परीतानां निशम्य तत् । बालस्य वाक्यमव्यक्तं हर्षः समभवन्महान् ।। २३ ।। यद्यपि वे सब लोग दुःखमें डूबे हुए थे, तथापि उस बालककी अस्पष्ट तोतली बोली सुनकर उनके हृदयमें सहसा अत्यन्त प्रसन्नताकी लहर दौड़ गयी ।। २३ ।। अयं काल इति ज्ञात्वा कुन्ती समुपसृत्य तान् । गतासूनमृतेनेव जीवयन्तीदमब्रवीत् ।। २४ ।। ‘अब यही अपनेको प्रकट करनेका अवसर है’ यह जानकर कुन्तीदेवी उन सबके निकट गयीं और अपनी अमृतमयी वाणीसे उन मृतक (तुल्य) मानवोंको जीवन प्रदान करती हुई-सी बोलीं ।। २४ ।।
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि बकवधपर्वणि ब्राह्मणकन्यापुत्रवाक्ये अष्टपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ।। १५८ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत बकवधपर्वमें ब्राह्मणकी कन्या और पुत्रके वचन-सम्बन्धी एक सौ अट्ठावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १५८ ।।
१५९-
एकोनषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः
कुन्तीके पूछनेपर ब्राह्मणका उनसे अपने दुःखका कारण बताना
कुन्त्युवाच
कुतोमूलमिदं दुःखं ज्ञातुमिच्छामि तत्त्वतः ।
विदित्वाप्यपकर्षेयं शक्यं चेदपकर्षितुम् ॥ १ ॥
कुन्तीने पूछा— ब्रह्मन्! आपलोगोंके इस दुःखका कारण क्या है? मैं यह ठीक-ठीक जानना चाहती हूँ। उसे जानकर यदि मिटाया जा सकेगा तो मिटानेकी चेष्टा करूँगी ॥ १ ॥
ब्राह्मण उवाच
उपपन्नं सतामेतद् यद् ब्रवीषि तपोधने ।
न तु दुःखमिदं शक्यं मानुषेण व्यपोहितुम् ॥ २ ॥
ब्राह्मणने कहा— तपोधने! आप जो कुछ कह रही हैं, वह आप-जैसे सज्जनोंके अनुरूप ही है; परंतु हमारे इस दुःखको मनुष्य नहीं मिटा सकता ॥ २ ॥
समीपे नगरस्यास्य बको वसति राक्षसः ।
(इतो गव्यूतिमात्रेऽस्ति यमुनागह्वरे गुहा ।
तस्यां घोरः स वसति जिघांसुः पुरुषादकः ॥)
ईशो जनपदस्यास्य पुरस्य च महाबलः ॥ ३ ॥
पुष्टो मानुषमांसेन दुर्बुद्धिः पुरुषादकः ।
(तेनेयं पुरुषादेन भक्ष्यमाणा दुरात्मना ।
अनाथा नगरी नाथं त्रातारं नाधिगच्छति ॥)
रक्षत्यसुरराण्नित्यमिमं जनपदं बली ॥ ४ ॥
नगरं चैव देशं च रक्षोबलसमन्वितः ।
तत्कृते परचक्राच्च भूतेभ्यश्च न नो भयम् ॥ ५ ॥
इस नगरके पास ही यहाँसे दो कोसकी दूरीपर यमुनाके किनारे घने जंगलमें एक गुफा है, उसीमें एक भयंकर हिंसाप्रिय नरभक्षी राक्षस रहता है। उसका नाम है बक। वह राक्षस अत्यन्त बलवान् है। वही इस जनपद और नगरका स्वामी है। वह खोटी बुद्धिवाला मनुष्यभक्षी राक्षस मनुष्यके ही मांससे पुष्ट हुआ है। उस दुरात्मा नरभक्षी निशाचरद्वारा प्रतिदिन खायी जाती हुई यह नगरी अनाथ हो रही है। इसे कोई रक्षक या स्वामी नहीं मिल रहा है। राक्षसोचित-बलसे सम्पन्न वह शक्तिशाली असुरराज सदा इस जनपद, नगर और