महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
श्रुत्वा तु राधेयवचो धृतराष्ट्रः प्रतापवान् ।
अभिपूज्य ततः पश्चादिदं वचनमब्रवीत् ॥ २२ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! कर्णकी बात सुनकर प्रतापी धृतराष्ट्रने उसकी बड़ी सराहना की और तदनन्तर इस प्रकार कहा— ॥ २२ ॥
उपपन्नं महाप्राज्ञ कृतास्त्रे सूतनन्दने ।
त्वयि विक्रमसम्पन्नमिदं वचनमीदृशम् ॥ २३ ॥
‘कर्ण! तुम परम बुद्धिमान्, अस्त्र-शस्त्रोंके ज्ञाता और सूतकुलको आनन्दित करनेवाले हो। ऐसा पराक्रमयुक्त वचन तुम्हारे ही योग्य है ॥ २३ ॥
भूय एव तु भीष्मश्च द्रोणो विदुर एव च ।
युवां च कुरुतं बुद्धिं भवेद् या नः सुखोदया ॥ २४ ॥
‘परंतु मेरा विचार है कि भीष्म, द्रोण, विदुर और तुम दोनों एक साथ बैठकर पुनः विचार कर लो तथा कोई ऐसी बात सोच निकालो, जो भविष्यमें भी हमें सुख देनेवाली हो’ ॥ २४ ॥
तत आनाय्य तान् सर्वान् मन्त्रिणः सुमहायशाः ।
धृतराष्ट्रो महाराज मन्त्रयामास वै तदा ॥ २५ ॥
महाराज! तदनन्तर महायशस्वी धृतराष्ट्रने भीष्म, द्रोण आदि सम्पूर्ण मन्त्रियोंको बुलवाकर उनके साथ उस समय विचार आरम्भ किया ॥ २५ ॥
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि विदुरागमनराज्यलम्भपर्वणि धृतराष्ट्रमन्त्रणे
एकाधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २०१ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत विदुरागमन-राज्यलम्भपर्वमें
धृतराष्ट्रमन्त्रणासम्बन्धी दो सौ पहला अध्याय पूरा हुआ ॥ २०१ ॥
२०२-
द्व्यधिकद्विशततमोऽध्यायः
भीष्मकी दुर्योधनसे पाण्डवोंको आधा राज्य देनेकी सलाह
भीष्म उवाच
न रोचते विग्रहो मे पाण्डुपुत्रैः कथंचन । यथैव धृतराष्ट्रो मे तथा पाण्डुरसंशयम् ॥ १ ॥ भीष्मजी बोले—मुझे पाण्डवोंके साथ विरोध या युद्ध किसी प्रकार भी पसंद नहीं है। मेरे लिये जैसे धृतराष्ट्र हैं, वैसे ही पाण्डु—इसमें संशय नहीं है ॥ १ ॥
गान्धार्याश्च यथा पुत्रास्तथा कुन्तीसुता मम । यथा च मम ते रक्ष्या धृतराष्ट्र तथा तव ॥ २ ॥ धृतराष्ट्र! जैसे गान्धारीके पुत्र मेरे अपने हैं, उसी प्रकार कुन्तीके पुत्र भी हैं; इसीलिये जैसे मुझे पाण्डवोंकी रक्षा करनी चाहिये, वैसे तुम्हें भी ॥ २ ॥
यथा च मम राजंश्च तथा दुर्योधनस्य ते । तथा कुरूणां सर्वेषामन्येषामपि पार्थिव ॥ ३ ॥ भूपाल! मेरे और तुम्हारे लिये जैसे पाण्डवोंकी रक्षा आवश्यक है, वैसे ही दुर्योधन तथा अन्य समस्त कौरवोंको भी उनकी रक्षा करनी चाहिये ॥ ३ ॥
एवं गते विग्रहं तैनं रोचे संधाय वीरैर्दीयतामर्धभूमिः । तेषामपीदं प्रपितामहानां राज्यं पितुश्चैव कुरूत्तमानाम् ॥ ४ ॥ ऐसी दशामें मैं पाण्डवोंके साथ लड़ाई-झगड़ा पसंद नहीं करता। उन वीरोंके साथ संधि करके उन्हें आधा राज्य दे दिया जाय। (दुर्योधनकी ही भाँति) उन कुरुश्रेष्ठ पाण्डवोंके भी बाप-दादोंका यह राज्य है ॥ ४ ॥
दुर्योधन यथा राज्यं त्वमिदं तात पश्यसि । मम पैतृकमित्येवं तेऽपि पश्यन्ति पाण्डवाः ॥ ५ ॥ तात दुर्योधन! जैसे तुम इस राज्यको अपनी पैतृक सम्पत्तिके रूपमें देखते हो, उसी प्रकार पाण्डव भी देखते हैं ॥ ५ ॥
यदि राज्यं न ते प्राप्ताः पाण्डवेया यशस्विनः । कुत एव तवापीदं भारतस्यापि कस्यचित् ॥ ६ ॥ यदि यशस्वी पाण्डव इस राज्यको नहीं पा सकते तो तुम्हें अथवा भरतवंशके किसी अन्य पुरुषको भी वह कैसे प्राप्त हो सकता है? ॥ ६ ॥
अधर्मेण च राज्यं त्वं प्राप्तवान् भरतर्षभ ।
तेऽपि राज्यमनुप्राप्ताः पूर्वमेवेति मे मतिः ॥ ७ ॥ भरतश्रेष्ठ! तुमने अधर्मपूर्वक इस राज्यको हथिया लिया है; परंतु मेरा विचार यह है कि तुमसे पहले ही वे भी इस राज्यको पा चुके थे ॥ ७ ॥
मधुरेणैव राज्यस्य तेषामर्धं प्रदीयताम् । एतद्धि पुरुषव्याघ्र हितं सर्वजनस्य च ॥ ८ ॥ पुरुषसिंह! प्रेमपूर्वक ही उन्हें आधा राज्य दे दो। इसीमें सब लोगोंका हित है ॥ ८ ॥
अतोऽन्यथा चेत् क्रियते न हितं नो भविष्यति । तवाप्यकीर्तिः सकला भविष्यति न संशयः ॥ ९ ॥ यदि इसके विपरीत कुछ किया जायगा तो हमारी भलाई नहीं हो सकती और तुम्हें भी पूरा-पूरा अपयश मिलेगा—इसमें संशय नहीं है ॥ ९ ॥
कीर्तिरक्षणमातिष्ठ कीर्तिर्हि परमं बलम् । नष्टकीर्तेर्मनुष्यस्य जीवितं ह्यफलं स्मृतम् ॥ १० ॥ अतः अपनी कीर्तिकी रक्षा करो, कीर्ति ही श्रेष्ठ बल है; जिसकी कीर्ति नष्ट हो जाती है, उस मनुष्यका जीवन निष्फल माना गया है ॥ १० ॥
यावत्कीर्तिर्मनुष्यस्य न प्रणश्यति कौरव । तावज्जीवति गान्धारे नष्टकीर्तिस्तु नश्यति ॥ ११ ॥ गन्धारीनन्दन! कुरुश्रेष्ठ! मनुष्यकी कीर्ति जबतक नष्ट नहीं होती, तभीतक वह जीवित है; जिसकी कीर्ति नष्ट हो गयी, उसका तो जीवन ही नष्ट हो जाता है ॥ ११ ॥
तमिमं समुपातिष्ठ धर्मं कुरुकुलोचितम् । अनुरूपं महाबाहो पूर्वेषामात्मनः कुरु ॥ १२ ॥ महाबाहो! कुरुकुलके लिये उचित इस उत्तम धर्मका पालन करो। अपने पूर्वजोंके अनुरूप कार्य करते रहो ॥ १२ ॥
दिष्ट्या ध्रियन्ते पार्था हि दिष्ट्या जीवति सा पृथा । दिष्ट्या पुरोचनः पापो न सकामोऽत्ययं गतः ॥ १३ ॥ सौभाग्यकी बात है कि कुन्तीके पुत्र जीवित हैं; यह भी सौभाग्यकी ही बात है कि कुन्ती भी मरी नहीं है और सबसे बड़े सौभाग्यका विषय यह है कि पापी पुरोचन अपने (बुरे) इरादेमें सफल न होकर स्वयं नष्ट हो गया ॥ १३ ॥
यदा प्रभृति दग्धास्ते कुन्तिभोजसुतासुताः । तदा प्रभृति गान्धारे न शक्नोम्यभिवीक्षितुम् ॥ १४ ॥ लोके प्राणभृतां कंचिच्छ्रुत्वा कुन्तीं तथागताम् । न चापि दोषेण तथा लोको मन्येत् पुरोचनम् । यथा त्वां पुरुषव्याघ्र लोको दोषेण गच्छति ॥ १५ ॥
गान्धारीकुमार! जबसे मैंने सुना कि कुन्तीके पुत्र लाक्षागृहकी आगमें जल गये तथा कुन्ती भी उसी अवस्थाको प्राप्त हुई है, तभीसे मैं (लज्जाके मारे) जगत्के किसी भी प्राणीकी ओर आँख उठाकर देख नहीं सकता था। नरश्रेष्ठ! लोग इस कार्यके लिये पुरोचनको उतना दोषी नहीं मानते, जितना तुम्हें दोषी समझते हैं ।। १४-१५ ।। तदिदं जीवितं तेषां तव किल्बिषनाशनम् । सम्मन्तव्यं महाराज पाण्डवानां च दर्शनम् ॥ १६ ॥ अतः महाराज! पाण्डवोंका यह जीवित रहना और उनका दर्शन होना वास्तवमें तुम्हारे ऊपर लगे हुए कलंकका नाश करनेवाला है, ऐसा मानना चाहिये ।। १६ ।। न चापि तेषां वीराणां जीवतां कुरुनन्दन । पित्र्योंऽशः शक्य आदातुमपि वज्रभृता स्वयम् ॥ १७ ॥ कुरुनन्दन! पाण्डववीरोंके जीते-जी उनका पैतृक अंश साक्षात् वज्रधारी इन्द्र भी नहीं ले सकते ।। १७ ।। ते सर्वेऽवस्थिता धर्मे सर्वे चैवैकचेतसः । अधर्मेण निरस्ताश्च तुल्ये राज्ये विशेषतः ॥ १८ ॥ वे सब धर्ममें स्थित हैं; उन सबका एक चित्त—एक विचार है। इस राज्यपर तुम्हारा और उनका समान स्वत्व है, तो भी उनके साथ विशेष अधर्मपूर्ण बर्ताव करके उन्हें यहाँसे हटाया गया है ।। १८ ।। यदि धर्मस्त्वया कार्यो यदि कार्यं प्रियं च मे । क्षेमं च यदि कर्तव्यं तेषामर्धं प्रदीयताम् ॥ १९ ॥ यदि तुम्हें धर्मके अनुकूल चलना है, यदि मेरा प्रिय करना है और यदि (संसारमें) भलाई करनी है, तो उन्हें आधा राज्य दे दो ।। १९ ।।
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि विदुरागमनराज्यलम्भपर्वणि भीष्मवाक्ये द्व्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २०२ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत विदुरागमन-राज्यलम्भपर्वमें भीष्मवाक्यविषयक दो सौ दूसरा अध्याय पूरा हुआ ।। २०२ ।।
२०३-
त्र्यधिकद्विशततमोऽध्यायः
द्रोणाचार्यकी पाण्डवोंको उपहार भेजने और बुलानेकी सम्मति तथा कर्णके द्वारा उनकी सम्मतिका विरोध करनेपर द्रोणाचार्यकी फटकार
द्रोण उवाच
मन्त्राय समुपानीतैर्धृतराष्ट्र हितैर्नृप ।
धर्म्ममर्थ्यं यशस्यं च वाच्यमित्यनुशुश्रुम ॥ १ ॥
द्रोणाचार्यने कहा—राजा धृतराष्ट्र! सलाह लेनेके लिये बुलाये हुए हितैषियोंको उचित है कि वे ऐसी बात कहें, जो धर्म, अर्थ और यशकी प्राप्ति करानेवाली हो—यह हम परम्परासे सुनते आये हैं ॥ १ ॥
ममाप्येषा मतिस्तात या भीष्मस्य महात्मनः ।
संविभज्यास्तु कौन्तेया धर्म एष सनातनः ॥ २ ॥
तात! मेरी भी वही सम्मति है, जो महात्मा भीष्मकी है। कुन्तीके पुत्रोंको आधा राज्य बाँट देना चाहिये, यही परम्परासे चला आनेवाला धर्म है ॥ २ ॥
प्रेष्यतां द्रुपदायाशु नरः कश्चित् प्रियंवदः ।
बहुलं रत्नमादाय तेषामर्थाय भारत ॥ ३ ॥
भारत! द्रुपदके पास शीघ्र ही कोई प्रिय वचन बोलनेवाला मनुष्य भेजा जाय और वह पाण्डवोंके लिये बहुत-से रत्नोंकी भेंट लेकर जाय ॥ ३ ॥
मिथः कृत्यं च तस्मै स आदाय वसु गच्छतु ।
वृद्धिं च परमां ब्रूयात् त्वत्संयोगोद्भवां तथा ॥ ४ ॥
सम्प्रीयमाणं त्वां ब्रूयाद राजन् दुर्योधनं तथा ।
असकृद् द्रुपदे चैव धृष्टद्युम्ने च भारत ॥ ५ ॥
राजा द्रुपदके पास बहूके लिये वरपक्षकी ओरसे उसे धन और रत्न लेकर जाना चाहिये। भारत! उस पुरुषको राजा द्रुपद और धृष्टद्युम्नके सामने बार-बार यह कहना चाहिये कि आपके साथ सम्बन्ध हो जानेसे राजा धृतराष्ट्र और दुर्योधन अपना बड़ा अभ्युदय मान रहे हैं और उन्हें इस वैवाहिक सम्बन्धसे बड़ी प्रसन्नता हुई है ॥ ४-५ ॥
उचितत्वं प्रियत्वं च योगस्यापि च वर्णयेत् ।
पुनः पुनश्च कौन्तेयान् माद्रीपुत्रौ च सान्त्वयन् ॥ ६ ॥
इसी प्रकार वह कुन्ती और माद्रीके पुत्रोंको सान्त्वना देते हुए बार-बार इस सम्बन्धके उचित और प्रिय होनेकी चर्चा करे ॥ ६ ॥
हिरण्मयानि शुभ्राणि बहून्याभरणानि च । वचनात् तव राजेन्द्र द्रौपद्याः सम्प्रयच्छतु ॥ ७ ॥ राजेन्द्र! वह आपकी आज्ञासे द्रौपदीके लिये बहुत-से सुन्दर सुवर्णमय आभूषण अर्पित करे ॥ ७ ॥
तथा द्रुपदपुत्राणां सर्वेषां भरतर्षभ । पाण्डवानां च सर्वेषां कुन्त्या युक्तानि यानि च ॥ ८ ॥ भरतश्रेष्ठ! द्रुपदके सभी पुत्रों, समस्त पाण्डवों और कुन्तीके लिये भी जो उपयुक्त आभूषण आदि हों, उन्हें भी वह अर्पित करे ॥ ८ ॥
एवं सान्त्वसमायुक्तं द्रुपदं पाण्डवैः सह । उक्त्वा सोऽनन्तरं ब्रूयात् तेषामागमनं प्रति ॥ ९ ॥ इस प्रकार (उपहार देनेके पश्चात्) पाण्डवोंसहित द्रुपदसे सान्त्वनापूर्ण वचन कहकर अन्तमें वह पाण्डवोंके हस्तिनापुरमें आनेके विषयमें प्रस्ताव करे ॥ ९ ॥
अनुज्ञातेषु वीरेषु बलं गच्छतु शोभनम् । दुःशासनों विकर्णश्चाप्यानेतुं पाण्डवानिह ॥ १० ॥ जब द्रुपदकी ओरसे पाण्डववीरोंको यहाँ आनेकी अनुमति मिल जाय, तब एक अच्छी-सी सेना साथ ले दुःशासन और विकर्ण पाण्डवोंको यहाँ ले आनेके लिये जायें ॥ १० ॥
ततस्ते पाण्डवाः श्रेष्ठाः पूज्यमानाः सदा त्वया । प्रकृतीनामनुमते पदे स्थास्यन्ति पैतृके ॥ ११ ॥ यहाँ आनेके पश्चात् वे श्रेष्ठ पाण्डव आपके द्वारा सदा आदर-सत्कार प्राप्त करते हुए प्रजाकी इच्छाके अनुसार वे अपने पैतृक राज्यपर प्रतिष्ठित होंगे ॥ ११ ॥
एतत् तव महाराज पुत्रेषु तेषु चैव हि । वृत्तमौपयिकं मन्ये भीष्मेण सह भारत ॥ १२ ॥ भरतवंशी महाराज! आपको अपने पुत्रों और पाण्डवोंके प्रति उपर्युक्त व्यवहार ही करना चाहिये—भीष्मजीके साथ मैं भी यही उचित समझता हूँ ॥ १२ ॥
कर्ण उवाच
योजितावर्थमानाभ्यां सर्वकार्येष्वनन्तरौ । न मन्त्रयेतां त्वच्छ्रेयः किमद्भुततरं ततः ॥ १३ ॥ कर्ण बोला—महाराज! भीष्मजी और द्रोणाचार्यको आपकी ओरसे सदा धन और सम्मान प्राप्त होता रहता है। इन्हें आप अपना अन्तरंग सुहृद् समझकर सभी कार्योंमें इनकी सलाह लेते हैं। फिर भी यदि ये आपके भलेकी सलाह न दें तो इससे बढ़कर आश्चर्यकी बात और क्या हो सकती है? ॥ १३ ॥
दुष्टेन मनसा यो वै प्रच्छन्नेनान्तरात्मना ।
ब्रूयान्निःश्रेयसं नाम कथं कुर्यात् सतां मतम् ॥ १४ ॥ जो अपने अन्त:करणके दुर्भावको छिपाकर, दोषयुक्त हृदयसे कोई सलाह देता है, वह अपने ऊपर विश्वास करनेवाले साधुपुरुषोंके अभीष्ट कल्याणकी सिद्धि कैसे कर सकता है? ॥ १४ ॥
न मित्राण्यर्थकृच्छ्रेषु श्रेयसे चेतराय वा ।
विधिपूर्वं हि सर्वस्य दुःखं वा यदि वा सुखम् ॥ १५ ॥
मित्र भी अर्थसंकटके समय अथवा किसी कामकी कठिनाई आ पड़नेपर न तो कल्याण कर सकते हैं और न अकल्याण ही। सभीके लिये दुःख या सुखकी प्राप्ति भाग्यके अनुसार ही होती है ॥ १५ ॥
कृतप्रज्ञोऽकृतप्रज्ञो बालो वृद्धश्च मानवः ।
ससहायोऽसहायश्च सर्वं सर्वत्र विन्दति ॥ १६ ॥
मनुष्य बुद्धिमान् हो या मूर्ख, बालक हो या वृद्ध तथा सहायकोंके साथ हो या असहाय, वह दैवयोगसे सर्वत्र सब कुछ पा लेता है ॥ १६ ॥
श्रूयते हि पुरा कश्चिदम्बुवीच इतीश्वरः ।
आसीद् राजगृहे राजा मागधानां महीक्षिताम् ॥ १७ ॥
सुना है, पहले राजगृहमें अम्बुवीच नामसे प्रसिद्ध एक राजा राज्य करते थे। वे मागध राजाओंमेंसे एक थे ॥ १७ ॥
स हीनः करणैः सर्वैरुच्छ्वासपरमो नृपः ।
अमात्यसंस्थः सर्वेषु कार्येष्वेवाभवत् तदा ॥ १८ ॥
उनकी कोई भी इन्द्रिय कार्य करनेमें समर्थ नहीं थी, वे (श्वासके रोगसे पीड़ित हो) एक स्थानपर पड़े-पड़े लंबी साँसें खींचा करते थे; अतः प्रत्येक कार्यमें उन्हें मन्त्रीके ही अधीन रहना पड़ता था ॥ १८ ॥
तस्यामात्यो महाकर्णिर्बभूवैकेश्वरस्तदा ।
स लब्धबलमात्मानं मन्यमानोऽवमन्यते ॥ १९ ॥
उनके मन्त्रीका नाम था महाकर्णि। उन दिनों वही वहाँका एकमात्र राजा बन बैठा था। उसे सैनिक बल प्राप्त था, अतः अपनेको सबल मानकर राजाकी अवहेलना करता था ॥ १९ ॥
स राज्ञ उपभोग्यानि स्त्रियो रत्नधनानि च ।
आददे सर्वशो मूढ ऐश्वर्यं च स्वयं तदा ॥ २० ॥
वह मूढ़ मन्त्री राजाके उपभोगमें आनेयोग्य स्त्री, रत्न, धन तथा ऐश्वर्यको भी स्वयं ही भोगता था ॥ २० ॥
तदादाय च लुब्धस्य लोभाल्लोभोऽप्यवर्धत ।
तथा हि सर्वमादाय राज्यमस्य जिहीर्षति ॥ २१ ॥
वह सब पाकर उस लोभीका लोभ उत्तरोत्तर बढ़ता गया। इस प्रकार सारी चीजें लेकर वह उनके राज्यको भी हड़प लेनेकी इच्छा करने लगा ॥ २१ ॥
हीनस्य करणैः सर्वैरुच्छ्वासपरमस्य च ।
यतमानोऽपि तद् राज्यं न शशाकेति नः श्रुतम् ॥ २२ ॥
यद्यपि राजा सम्पूर्ण इन्द्रियोंकी शक्तिसे रहित होनेके कारण केवल ऊपरको साँस ही खींचा करता था, तथापि अत्यन्त प्रयत्न करनेपर भी वह दुष्ट मन्त्री उनका राज्य न ले सका—यह बात हमने सुन रखी है ॥ २२ ॥
किमन्यद् विहिता नूनं तस्य सा पुरुषेन्द्रता ।
यदि ते विहितं राज्यं भविष्यति विशाम्पते ॥ २३ ॥
मिषतः सर्वलोकस्य स्थास्यते त्वयि तद् ध्रुवम् ।
अतोऽन्यथा चेद् विहितं यतमानो न लप्स्यसे ॥ २४ ॥
राजाका राजत्व भाग्यसे ही सुरक्षित था (उनके प्रयत्नसे नहीं;) (अतः) भाग्यसे बढ़कर दूसरा सहारा क्या हो सकता है? महाराज! यदि आपके भाग्यमें राज्य बदा होगा तो सब लोगोंके देखते-देखते वह निश्चय ही आपके पास रहेगा और यदि भाग्यमें राज्यका विधान नहीं है, तो आप यत्न करके भी उसे नहीं पा सकेंगे ॥ २३-२४ ॥
एवं विद्वन्नुपादत्स्व मन्त्रिणां साध्वसाधुताम् ।
दुष्टानां चैव बोद्धव्यमदुष्टानां च भाषितम् ॥ २५ ॥
राजन्! आप समझदार हैं, अतः इसी प्रकार विचार करके अपने मन्त्रियोंकी साधुता और असाधुताको समझ लीजिये। किसने दूषित हृदयसे सलाह दी है और किसने दोषशून्य हृदयसे, इसे भी जान लेना चाहिये ॥ २५ ॥
द्रोण उवाच
विद्म ते भावदोषेण यदर्थमिदमुच्यते ।
दुष्ट पाण्डवहेतोस्त्वं दोषमाख्यापयस्युत ॥ २६ ॥
द्रोणाचार्यने कहा—ओ दुष्ट! तू क्यों ऐसी बात कहता है, यह हम जानते हैं। पाण्डवोंके लिये तेरे हृदयमें जो द्वेष संचित है, उसीसे प्रेरित होकर तू मेरी बातोंमें दोष बता रहा है ॥ २६ ॥
हितं तु परमं कर्ण ब्रवीमि कुलवर्धनम् ।
अथ त्वं मन्यसे दुष्टं ब्रूहि यत् परमं हितम् ॥ २७ ॥
कर्ण! मैं अपनी समझसे कुरुकुलकी वृद्धि करनेवाली परम हितकी बात कहता हूँ। यदि तू इसे दोषयुक्त मानता है तो बता, क्या करनेसे कौरवोंका परम हित होगा? ॥ २७ ॥
अतोऽन्यथा चेत् क्रियते यद् ब्रवीमि परं हितम् ।
कुरवो वै विनङ्क्ष्यक्ष्यन्ति नचिरेणैव मे मतिः ॥ २८ ॥
मैं अत्यन्त हितकी बात बता रहा हूँ। यदि उसके विपरीत कुछ किया जायगा तो कौरवोंका शीघ्र ही नाश हो जायगा—ऐसा मेरा मत है ॥ २८ ॥
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि विदुरागमनराज्यलम्भपर्वणि द्रोणवाक्ये त्र्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २०३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत विदुरागमन-राज्यलम्भपर्वमें द्रोणवाक्यविषयक दो सौ तीसरा अध्याय पूरा हुआ ॥ २०३ ॥
२०४-
चतुरधिकद्विशततमोऽध्यायः
विदुरजीकी सम्मति—द्रोण और भीष्मके वचनोंका ही समर्थन
विदुर उवाच
राजन् निःसंशयं श्रेयो वाच्यस्त्वमसि बान्धवैः ।
न त्वशुश्रूषमाणे वै वाक्यं सम्प्रतितिष्ठति ॥ १ ॥
विदुरजी बोले— राजन्! आपके (हितैषी) बान्धवोंका यह कर्तव्य है कि वे आपको संदेहरहित हितकी बात बतायें। परंतु आप सुनना नहीं चाहते, इसलिये आपके भीतर उनकी कही हुई हितकी बात भी ठहर नहीं पा रही है ॥ १ ॥
प्रियं हितं च तद् वाक्यमुक्तवान् कुरुसत्तमः ।
भीष्मः शांतनवो राजन् प्रतिगृह्णासि तन्न च ॥ २ ॥
तथा द्रोणेन बहुधा भाषितं हितमुत्तमम् ।
तच्च राधासुतः कर्णो मन्यते न हितं तव ॥ ३ ॥
राजन्! कुरुश्रेष्ठ शांतनुनन्दन भीष्मने आपसे प्रिय और हितकी बात कही है; परंतु आप उसे ग्रहण नहीं कर रहे हैं। इसी प्रकार आचार्य द्रोणने अनेक प्रकारसे आपके लिये उत्तम हितकी बात बतायी है; किंतु राधानन्दन कर्ण उसे आपके लिये हितकर नहीं मानते ॥ २-३ ॥
चिन्तयंश्च न पश्यामि राजंस्तव सुहृत्तमम् ।
आभ्यां पुरुषसिंहाभ्यां यो वा स्यात् प्रज्ञयाधिकः ॥ ४ ॥
महाराज! मैं बहुत सोचने-विचारनेपर भी आपके किसी ऐसे परम सुहृद् व्यक्तिको नहीं देखता, जो इन दोनों वीर महापुरुषोंसे बुद्धि या विचारशक्तिमें अधिक हो ॥ ४ ॥
इमौ हि वृद्धौ वयसा प्रज्ञया च श्रुतेन च ।
समौ च त्वयि राजेन्द्र तथा पाण्डुसुतेषु च ॥ ५ ॥
राजेन्द्र! अवस्था, बुद्धि और शास्त्रज्ञान—सभी बातोंमें ये दोनों बढ़े-चढ़े हैं और आपमें तथा पाण्डवोंमें समानभाव रखते हैं ॥ ५ ॥
धर्मे चानवरौ राजन् सत्यतायां च भारत ।
रामाद् दाशरथेश्चैव गयाच्चैव न संशयः ॥ ६ ॥
भरतवंशी नरेश! ये दोनों धर्म और सत्यवादितामें दशरथनन्दन श्रीराम तथा राजा गयसे कम नहीं हैं। मेरा यह कथन सर्वथा संशयरहित है ॥ ६ ॥
न चोक्तवन्तावाश्रेयः पुरस्तादपि किंचन ।
न चाप्यपकृतं किंचिदनयोर्लक्ष्यते त्वयि ॥ ७ ॥ उन्होंने आपके सामने भी (कभी) कोई ऐसी बात नहीं कही होगी, जो आपके लिये अनिष्टकारक सिद्ध हुई हो तथा इनके द्वारा आपका कुछ अपकार हुआ हो, ऐसा भी देखनेमें नहीं आता ॥ ७ ॥
तावुभौ पुरुषव्याघ्रावनागसि नृपे त्वयि । न मन्त्रयेतां त्वच्छ्रेयः कथं सत्यपराक्रमौ ॥ ८ ॥ महाराज! आपने भी इनका कोई अपराध नहीं किया है; फिर ये दोनों सत्यपराक्रमी पुरुषसिंह आपको हितकारक सलाह न दें, यह कैसे हो सकता है? ॥ ८ ॥
प्रज्ञावन्तौ नरश्रेष्ठावस्मिंल्लोके नराधिप । त्वन्निमित्तमतो नेमौ किंचिज्जिह्मं वदिष्यतः ॥ ९ ॥ नरेश्वर! ये दोनों इस लोकमें नरश्रेष्ठ और बुद्धिमान् हैं, अतः आपके लिये ये कोई कुटिलतापूर्ण बात नहीं कहेंगे ॥ ९ ॥
इति मे नैष्ठिकी बुद्धिर्वर्तते कुरुनन्दन । न चार्थहेतोर्धर्मज्ञौ वक्ष्यतः पक्षसंश्रितम् ॥ १० ॥ कुरुनन्दन! इनके विषयमें मेरा यह निश्चित विचार है कि ये दोनों धर्मके ज्ञाता महापुरुष हैं, अतः स्वार्थके लिये किसी एक ही पक्षको लाभ पहुँचाने-वाली बात नहीं कहेंगे ॥ १० ॥
एतद्धि परमं श्रेयो मन्येऽहं तव भारत । दुर्योधनप्रभृतयः पुत्रा राजन् यथा तव ॥ ११ ॥ तथैव पाण्डवेयास्ते पुत्रा राजन् न संशयः । तेषु चेदहितं किञ्चिन्मन्त्रयेयुरतद्विदः ॥ १२ ॥ मन्त्रिणस्ते न च श्रेयः प्रपश्यन्ति विशेषतः । अथ ते हृदये राजन् विशेषः स्वेषु वर्तते । अन्तरस्थं विवृण्वानाः श्रेयः कुर्युर्न ते ध्रुवम् ॥ १३ ॥ भारत! इन्होंने जो सम्मति दी है, इसीको मैं आपके लिये परम कल्याणकारक मानता हूँ। महाराज! जैसे दुर्योधन आदि आपके पुत्र हैं, वैसे ही पाण्डव भी आपके पुत्र हैं—इसमें संशय नहीं है। इस बातको न जाननेवाले कुछ मन्त्री यदि आपको पाण्डवोंके अहितकी सलाह दें तो यह कहना पड़ेगा कि वे मन्त्रीलोग, आपका कल्याण किस बातमें है, यह विशेषरूपमें नहीं देख पा रहे हैं। राजन्! यदि आपके हृदयमें अपने पुत्रोंपर विशेष पक्षपात है तो आपके भीतरके छिपे हुए भावको बाहर सबके सामने प्रकट करनेवाले लोग निश्चय ही आपका भला नहीं कर सकते ॥ ११—१३ ॥
एतदर्थमिमौ राजन् महात्मानौ महाद्युती । नोचतुर्विवृतं किंचिन्न ह्येष तव निश्चयः ॥ १४ ॥
महाराज! इसीलिये ये दोनों महातेजस्वी महात्मा आपके सामने कुछ खोलकर नहीं कह सके हैं। इन्होंने आपको ठीक ही सलाह दी है; परंतु आप उसे निश्चितरूपसे स्वीकार नहीं करते हैं ।। १४ ।।
यच्चाप्यशक्यतां तेषामाहतुः पुरुषर्षभौ । तत् तथा पुरुषव्याघ्र तव तद् भद्रमस्तु ते ।। १५ ।।
इन पुरुषशिरोमणियोंने जो पाण्डवोंके अजेय होनेकी बात बतायी है, वह बिलकुल ठीक है। पुरुषसिंह! आपका कल्याण हो ।। १५ ।।
कथं हि पाण्डवः श्रीमान् सव्यसाची धनंजयः । शक्यो विजेतुं संग्रामे राजन् मघवतापि हि ।। १६ ।।
राजन्! दायें-बायें दोनों हाथोंसे बाण चलानेवाले श्रीमान् पाण्डुकुमार धनंजयको साक्षात् इन्द्र भी युद्धमें कैसे जीत सकते हैं? ।। १६ ।।
भीमसेनो महाबाहुर्नागायुतबलो महान् । कथं स्म युधि शक्येत विजेतुममरैरपि ।। १७ ।।
दस हजार हाथियोंके समान महान् बलवान् महाबाहु भीमसेनको युद्धमें देवता भी कैसे जीत सकते हैं? ।। १७ ।।
तथैव कृतिनौ युद्धे यमौ यमसुताविव । कथं विजेतुं शक्यौ तौ रणे जीवितुमिच्छता ।। १८ ।।
इसी प्रकार जो जीवित रहना चाहता है, उसके द्वारा युद्धमें निपुण तथा यमराजके पुत्रोंकी भाँति भयंकर दोनों भाई नकुल-सहदेव कैसे जीते जा सकते हैं? ।। १८ ।।
यस्मिन् धृतिरनुक्रोशः क्षमा सत्यं पराक्रमः । नित्यानि पाण्डवे ज्येष्ठे स जीयेत रणे कथम् ।। १९ ।।
जिन ज्येष्ठ पाण्डव युधिष्ठिरमें धैर्य, दया, क्षमा, सत्य और पराक्रम आदि गुण नित्य निवास करते हैं, उन्हें रणभूमिमें कैसे हराया जा सकता है? ।। १९ ।।
येषां पक्षधरो रामो येषां मन्त्री जनार्दनः । किं नु तैरजितं संख्ये येषां पक्षे च सात्यकिः ।। २० ।।
बलरामजी जिनके पक्षपाती हैं, भगवान् श्रीकृष्ण जिनके सलाहकार हैं तथा जिनके पक्षमें सात्यकि-जैसा वीर है, वे पाण्डव युद्धमें किसे नहीं परास्त कर देंगे? ।। २० ।।
द्रुपदः श्वशुरो येषां येषां श्यालाश्च पार्षताः । धृष्टद्युम्नमुखा वीरा भ्रातरो द्रुपदात्मजाः ।। २१ ।। सोऽशक्यतां च विज्ञाय तेषामग्रे च भारत । दायाद्यतां च धर्मेण सम्यक् तेषु समाचर ।। २२ ।।
द्रुपद जिनके श्वशुर हैं और उनके पुत्र पृषतवंशी धृष्टद्युम्न आदि वीर भ्राता जिनके साले हैं, भारत! ऐसे पाण्डवोंको रणभूमिमें जीतना असम्भव है। इस बातको जानकर तथा पहले
उनके पिताका राज्य होनेके कारण वे ही धर्मपूर्वक इस राज्यके उत्तराधिकारी हैं, इस बातकी ओर ध्यान देकर आप उनके साथ उत्तम बर्ताव कीजिये ॥ २१-२२ ॥ इदं निर्दिष्टमयशः पुरोचनकृतं महत् । तेषामनुग्रहेणाद्य राजन् प्रक्षालयात्मानः ॥ २३ ॥ राजन्! पुरोचनके हाथों जो कुछ कराया गया, उससे आपका बहुत बड़ा अपयश सब ओर फैल गया है। अपने उस कलंकको आज आप पाण्डवोंपर अनुग्रह करके धो डालिये ॥ २३ ॥ तेषामनुग्रहश्चायं सर्वेषां चैव नः कुले । जीवितं च परं श्रेयः क्षत्रस्य च विवर्धनम् ॥ २४ ॥ पाण्डवोंपर किया हुआ यह अनुग्रह हमारे कुलके सभी लोगोंके जीवनका रक्षक, परम हितकारक और सम्पूर्ण क्षत्रिय जातिका अभ्युदय करनेवाला होगा ॥ २४ ॥ द्रुपदोऽपि महान् राजा कृतवैरश्च नः पुरा । तस्य संग्रहणं राजन् स्वपक्षस्य विवर्धनम् ॥ २५ ॥ राजन्! द्रुपद भी बहुत बड़े राजा हैं और पहले हमारे साथ उनका वैर भी हो चुका है। अतः मित्रके रूपमें उनका संग्रह हमारे अपने पक्षकी वृद्धिका कारण होगा ॥ २५ ॥ बलवन्तश्च दाशार्हा बहवश्च विशाम्पते । यतः कृष्णस्ततः सर्वे यतः कृष्णस्ततो जयः ॥ २६ ॥ पृथ्वीपते! यदुवंशियोंकी संख्या बहुत है और वे बलवान् भी हैं। जिस ओर श्रीकृष्ण रहेंगे, उधर ही वे सभी रहेंगे। इसलिये जिस पक्षमें श्रीकृष्ण होंगे, उस पक्षकी विजय अवश्य होगी ॥ २६ ॥ यच्च साम्नैव शक्येत कार्यं साधयितुं नृप । को दैवशप्तस्तत् कार्यं विग्रहेण समाचरेत् ॥ २७ ॥ महाराज! जो कार्य शान्तिपूर्वक समझाने-बुझानेसे ही सिद्ध हो जा सकता है, उसीको कौन दैवका मारा हुआ मनुष्य युद्धके द्वारा सिद्ध करेगा ॥ २७ ॥ श्रुत्वा च जीवतः पार्थान् पौरजानपदा जनाः । बलवद् दर्शने हृष्टास्तेषां राजन् प्रियं कुरु ॥ २८ ॥ कुन्तीके पुत्रोंको जीवित सुनकर नगर और जनपदके सभी लोग उन्हें देखनेके लिये अत्यन्त उत्सुक हो रहे हैं। राजन्! उन सबका प्रिय कीजिये ॥ २८ ॥ दुर्योधनश्च कर्णश्च शकुनिश्चापि सौबलः । अधर्मयुक्ता दुष्प्रज्ञा बाला मैषां वचः कृथाः ॥ २९ ॥ दुर्योधन, कर्ण और सुबलपुत्र शकुनि—ये अधर्मपरायण, खोटी बुद्धिवाले और मूर्ख हैं; अतः इनका कहना न मानिये ॥ २९ ॥ उक्तमेतत् पुरा राजन् मया गुणवतस्तव ।
दुर्योधनापराधेन प्रजेयं वै विनङ्क्ष्यति ॥ ३० ॥
भूपाल! आप गुणवान् हैं। आपसे तो मैंने पहले ही यह कह दिया था कि दुर्योधनके अपराधसे निश्चय ही यह समस्त प्रजा नष्ट हो जायगी ॥ ३० ॥
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि विदुरागमनराज्यलम्भपर्वणि विदुरवाक्ये
चतुरधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २०४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत विदुरागमन-राज्यलम्भपर्वमें विदुरवाक्यविषयक दो सौ चौथा अध्याय पूरा हुआ ॥ २०४ ॥
२०५-
पञ्चाधिकद्विशततमोऽध्यायः
धृतराष्ट्रकी आज्ञासे विदुरका द्रुपदके यहाँ जाना और पाण्डवोंको हस्तिनापुर भेजनेका प्रस्ताव करना
धृतराष्ट्र उवाच
भीष्मः शांतनवो विद्वान् द्रोणश्च भगवानृषिः ।
हितं च परमं वाक्यं त्वं च सत्यं ब्रवीषि माम् ॥ १ ॥
धृतराष्ट्र बोले—विदुर! शांतनुनन्दन भीष्म ज्ञानी हैं और भगवान् द्रोणाचार्य तो ऋषि ही ठहरे। अतः इनका वचन परम हितकारक है। तुम भी मुझसे जो कुछ कहते हो, वह सत्य ही है ॥ १ ॥
यथैव पाण्डोस्ते वीराः कुन्तीपुत्रा महारथाः ।
तथैव धर्मतः सर्वे मम पुत्रा न संशयः ॥ २ ॥
कुन्तीके वीर महारथी पुत्र जैसे पाण्डुके लड़के हैं, उसी प्रकार धर्मकी दृष्टिसे वे सब मेरे भी पुत्र हैं—इसमें संशय नहीं है ॥ २ ॥
यथैव मम पुत्राणामिदं राज्यं विधीयते ।
तथैव पाण्डुपुत्राणामिदं राज्यं न संशयः ॥ ३ ॥
जैसे मेरे पुत्रोंका यह राज्य कहा जाता है, उसी प्रकार पाण्डुपुत्रोंका भी यह राज्य है—इसमें भी संशय नहीं है ॥ ३ ॥
क्षत्तारानय गच्छैतान् सह मात्रा सुसत्कृतान् ।
तया च देवरूपिण्या कृष्णया सह भारत ॥ ४ ॥
भरतवंशी विदुर! अब तुम्हीं जाओ और उनकी माता कुन्ती तथा उस देवरूपिणी वधू कृष्णाके साथ इन पाण्डवोंको सत्कारपूर्वक ले आओ ॥ ४ ॥
दिष्ट्या जीवन्ति ते पार्था दिष्ट्या जीवति सा पृथा ।
दिष्ट्या द्रुपदकन्यां च लब्धवन्तो महारथाः ॥ ५ ॥
सौभाग्यकी बात है कि वे कुन्तीपुत्र जीवित हैं। सौभाग्यसे ही कुन्ती भी जीवित है और यह भी बड़े सौभाग्यकी बात है कि उन महारथियोंने द्रुपदकन्याको प्राप्त कर लिया ॥ ५ ॥
दिष्ट्या वर्धामहे सर्वे दिष्ट्या शान्तः पुरोचनः ।
दिष्ट्या मम परं दुःखमपनीतं महाद्युते ॥ ६ ॥
महाद्युते! सौभाग्यसे हम सबकी वृद्धि हो रही है। भाग्यकी बात है कि पापी पुरोचन शान्त हो गया और सौभाग्यसे ही मेरा महान् दुःख मिट गया ॥ ६ ॥
वैशम्पायन उवाच
ततो जगाम विदुरो धृतराष्ट्रस्य शासनात् । सकाशं यज्ञसेनस्य पाण्डवानां च भारत ॥ ७ ॥ समुपादाय रत्नानि वसूनि विविधानि च । द्रौपद्याः पाण्डवानां च यज्ञसेनस्य चैव ह ॥ ८ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! तदनन्तर धृतराष्ट्रकी आज्ञासे विदुरजी द्रौपदी, पाण्डव तथा महाराज यज्ञसेनके लिये नाना प्रकारके धन-रत्नोंकी भेंट लेकर राजा द्रुपद और पाण्डवोंके समीप गये ॥ ७-८ ॥ तत्र गत्वा स धर्मज्ञः सर्वशास्त्रविशारदः । द्रुपदं न्यायतो राजन् संयुक्तमुपतस्थिवान् ॥ ९ ॥ राजन्! वहाँ पहुँचकर सम्पूर्ण शास्त्रोंके विद्वान् एवं धर्मज्ञ विदुर न्यायके अनुसार बड़े-छोटेके क्रमसे द्रुपद और अन्य लोगोंके साथ हृदयसे लगकर नमस्कार आदिपूर्वक मिले ॥ ९ ॥ स चापि प्रतिजग्राह धर्मेण विदुरं ततः । चक्रतुश्च यथान्यायं कुशलप्रश्नसंविदम् ॥ १० ॥ राजा द्रुपदने भी धर्मके अनुसार विदुरजीका आदर-सत्कार किया। फिर वे दोनों यथोचित रीतिसे एक-दूसरेके कुशल-समाचार पूछने और कहने लगे ॥ १० ॥ ददर्श पाण्डवांस्तत्र वासुदेवं च भारत । स्नेहात् परिष्वज्य स तान् पप्रच्छानामयं ततः ॥ ११ ॥ भारत! विदुरजीने वहाँ पाण्डवों तथा वसुदेवनन्दन भगवान् श्रीकृष्णको भी देखा और स्नेहपूर्वक उन्हें हृदयसे लगाकर उन सबकी कुशल पूछी ॥ ११ ॥ तैश्चाप्यमितबुद्धिः स पूजितो हि यथाक्रमम् । वचनाद् धृतराष्ट्रस्य स्नेहयुक्तं पुनः पुनः ॥ १२ ॥ पप्रच्छानामयं राजंस्ततस्तान् पाण्डुनन्दनान् । प्रददौ चापि रत्नानि विविधानि वसूनि च ॥ १३ ॥ पाण्डवानां च कुन्त्याश्च द्रौपद्याश्च विशाम्पते । द्रुपदस्य च पुत्राणां यथा दत्तानि कौरवैः ॥ १४ ॥ उन्होंने भी अमित-बुद्धिमान् विदुरजीका क्रमशः आदर-सत्कार किया। तदनन्तर विदुरजीने राजा धृतराष्ट्रकी आज्ञाके अनुसार बारंबार स्नेहपूर्वक युधिष्ठिर आदि पाण्डुपुत्रोंसे कुशल-मंगल एवं स्वास्थ्यविषयक प्रश्न किया। जनमेजय! फिर विदुरजीने कौरवोंकी ओरसे जैसे दिये गये थे, उसीके अनुसार पाण्डवों, कुन्ती, द्रौपदी तथा द्रुपदके पुत्रोंके लिये नाना प्रकारके रत्न और धन भेंट किये ॥ १२—१४ ॥ प्रोवाच चामितमतिः प्रश्रितं विनयान्वितः । द्रुपदं पाण्डुपुत्राणां संनिधौ केशवस्य च ॥ १५ ॥
अगाध बुद्धिवाले विदुरजी पाण्डवों तथा भगवान् श्रीकृष्णके समीप विनीतभावसे नम्रतापूर्वक बोले— ॥ १५ ॥
विदुर उवाच
राजञ्छृणु सहामात्यः सपुत्रश्च वचो मम ।
धृतराष्ट्रः सपुत्रस्त्वां सहामात्यः सबान्धवः ॥ १६ ॥
अब्रवीत् कुशलं राजन् प्रीयमाणः पुनः पुनः ।
प्रीतिमांस्ते दृढं चापि सम्बन्धेन नराधिप ॥ १७ ॥
विदुरने कहा— राजन्! आप अपने मन्त्रियों और पुत्रोंके साथ मेरी बात सुनें। महाराज धृतराष्ट्रने अपने पुत्र, मन्त्री और बन्धुओंके साथ अत्यन्त प्रसन्न होकर बारंबार आपकी कुशल पूछी है। महाराज! आपके साथ यह जो सम्बन्ध हुआ है, इससे उनको बड़ी प्रसन्नता हुई है ॥ १६-१७ ॥
तथा भीष्मः शांतनवः कौरवैः सह सर्वशः ।
कुशलं त्वां महाप्राज्ञः सर्वतः परिपृच्छति ॥ १८ ॥
इसी प्रकार शांतनुनन्दन महाप्राज्ञ भीष्मजी भी समस्त कौरवोंके साथ सब तरहसे आपकी कुशल पूछते हैं ॥ १८ ॥
भारद्वाजो महाप्राज्ञो द्रोणः प्रियसखस्तव ।
समाशलेषमुपेत्य त्वां कुशलं परिपृच्छति ॥ १९ ॥
आपके प्रिय मित्र महाबुद्धिमान् भरद्वाजनन्दन द्रोणाचार्य भी (मन-ही-मन) आपको हृदयसे लगाकर कुशल पूछ रहे हैं ॥ १९ ॥ धृतराष्ट्रश्च पाञ्चाल्य त्वया सम्बन्धमीयिवान् । कृतार्थं मन्यतेऽऽत्मानं तथा सर्वेऽपि कौरवाः ॥ २० ॥ पांचालनरेश! राजा धृतराष्ट्र आपके सम्बन्धी होकर अपने-आपको कृतार्थ मानते हैं। यही दशा समस्त कौरवोंकी है ॥ २० ॥ न तथा राज्यसम्प्राप्तिस्तेषां प्रीतिकरी मता । यथा सम्बन्धकं प्राप्य यज्ञसेन त्वया सह ॥ २१ ॥ यज्ञसेन! उन्हें राज्यकी प्राप्ति भी उतनी प्रसन्नता देनेवाली नहीं जान पड़ी, जितनी प्रसन्नता आपके साथ सम्बन्धका सौभाग्य पाकर हुई है ॥ २१ ॥ एतद् विदित्वा तु भवान् प्रस्थापयतु पाण्डवान् । द्रष्टुं हि पाण्डुपुत्रांश्च त्वरन्ति कुरवो भृशम् ॥ २२ ॥ यह जानकर आप पाण्डवोंको हस्तिनापुर भेज दें। समस्त कुरुवंशी पाण्डवोंको देखने और मिलनेके लिये अत्यन्त उतावले हो रहे हैं ॥ २२ ॥ विप्रोषिता दीर्घकालमेते चापि नरर्षभाः । उत्सुका नगरं द्रष्टुं भविष्यन्ति तथा पृथा ॥ २३ ॥ दीर्घकालसे ये परदेशमें रह रहे हैं, अतः नरश्रेष्ठ पाण्डव तथा कुन्ती—सभी लोग अपना नगर देखनेके लिये उत्सुक हो रहे होंगे ॥ २३ ॥ कृष्णामपि च पाञ्चालीं सर्वाः कुरुवरस्त्रियः । द्रष्टुकामाः प्रतीक्षन्ते पुरं च विषयाश्च नः ॥ २४ ॥ कौरवकुलकी सभी श्रेष्ठ स्त्रियाँ, हमारे हस्तिनापुर नगर तथा राष्ट्रके सभी लोग पांचालराजकुमारी कृष्णाको देखनेकी इच्छा रखकर उसके शुभागमनकी प्रतीक्षा कर रहे हैं ॥ २४ ॥ स भवान् पाण्डुपुत्राणामाज्ञापयतु मा चिरम् । गमनं सहदाराणामेतदत्र मतं मम ॥ २५ ॥ अतः आप पत्नीसहित पाण्डवोंको हस्तिनापुर चलनेके लिये शीघ्र आज्ञा दीजिये। इस विषयमें मेरी सम्मति यही है ॥ २५ ॥ विसृष्टेषु त्वया राजन् पाण्डवेषु महात्मसु । ततोऽहं प्रेषयिष्यामि धृतराष्ट्रस्य शीघ्रगान् । आगमिष्यन्ति कौन्तेयाः कुन्ती च सह कृष्णया ॥ २६ ॥ राजन्! जब आप महामना पाण्डवोंको जानेकी आज्ञा दे देंगे, तब मैं यहाँसे राजा धृतराष्ट्रके पास शीघ्रगामी दूत भेजूँगा और यह संदेश कहला दूँगा कि कुन्ती तथा कृष्णाके साथ समस्त पाण्डव हस्तिनापुरमें आयेंगे ॥ २६ ॥
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि विदुरागमनराज्यलम्भपर्वणि विदुरद्रुपदसंवादे पञ्चाधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २०५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत विदुरागमनराज्यलम्भपर्वमें विदुर-द्रुपदसंवादविषयक दो सौ पाँचवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २०५ ॥
२०६-
षडधिकद्विशततमोऽध्यायः
पाण्डवोंका हस्तिनापुरमें आना और आधा राज्य पाकर इन्द्रप्रस्थ नगरका निर्माण करना एवं भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामजीका द्वारकाके लिये प्रस्थान
द्रुपद उवाच
एवमेतन्महाप्राज्ञ यथाऽऽत्थ विदुराद्य माम् ।
ममापि परमो हर्षः सम्बन्धेऽस्मिन् कृते प्रभो ॥ १ ॥
**द्रुपद बोले—**महाप्राज्ञ विदुरजी! आज आपने जो कुछ मुझसे कहा है, सब ठीक है। प्रभो! (कौरवोंके साथ) यह सम्बन्ध हो जानेसे मुझे भी महान् हर्ष हुआ है ॥ १ ॥
गमनं चापि युक्तं स्याद् दृढमेषां महात्मनाम् ।
न तु तावन्मया युक्तमेतद् वक्तुं स्वयं गिरा ॥ २ ॥
यदा तु मन्यते वीरः कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ।
भीमसेनार्जुनौ चैव यमौ च पुरुषर्षभौ ॥ ३ ॥
रामकृष्णौ च धर्मज्ञौ तदा गच्छन्तु पाण्डवाः ।
एतौ हि पुरुषव्याघ्रावेषां प्रियहिते रतौ ॥ ४ ॥
महात्मा पाण्डवोंका अपने नगरमें जाना भी अत्यन्त उचित ही है। तथापि मेरे लिये अपने मुखसे इन्हें जानेके लिये कहना उचित नहीं है। यदि कुन्तीकुमार वीरवर युधिष्ठिर, भीमसेन, अर्जुन और नरश्रेष्ठ नकुल-सहदेव जाना उचित समझें तथा धर्मज्ञ बलराम और श्रीकृष्ण पाण्डवोंका वहाँ जाना उचित समझते हों तो ये अवश्य वहाँ जायँ; क्योंकि ये दोनों पुरुषसिंह सदा इनके प्रिय और हितमें लगे रहते हैं ॥ २–४ ॥
युधिष्ठिर उवाच
परवन्तो वयं राजंस्त्वयि सर्वे सहानुगाः ।
यथा वक्ष्यसि नः प्रीत्या तत् करिष्यामहे वयम् ॥ ५ ॥
**युधिष्ठिरने कहा—**राजन्! हम सब लोग अपने सेवकोंसहित सदा आपके अधीन हैं। आप स्वयं प्रसन्नतापूर्वक हमसे जैसा कहेंगे, वही हम करेंगे ॥ ५ ॥
वैशम्पायन उवाच
ततोऽब्रवीद् वासुदेवो गमनं रोचते मम ।
यथा वा मन्यते राजा द्रुपदः सर्वधर्मवित् ॥ ६ ॥