महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
बुद्ध्या बुध्येन्न वा बुध्येदयं वै भरतर्षभः ॥ १७ ॥ **सभासद् बोले—**अहो धिक्कार है! ये भाई-बन्धु भी युधिष्ठिरको उनके ऊपर आनेवाले महान् भयकी बात नहीं समझाते। पता नहीं, ये भरतश्रेष्ठ युधिष्ठिर अपनी बुद्धिके द्वारा इस भयको समझें या न समझें ॥ १७ ॥
वैशम्पायन उवाच
जनप्रवादान् सुबहूञ्छृण्वन्नपि नराधिपः । ह्रिया च धर्मसंयोगात् पार्थो द्यूतमियात् पुनः ॥ १८ ॥ **वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! लोगोंकी तरह-तरहकी बातें सुनते हुए भी राजा युधिष्ठिर लज्जाके कारण तथा धृतराष्ट्रके आज्ञापालनस्वरूप धर्मकी दृष्टिसे पुनः जूआ खेलनेके लिये उद्यत हो गये ॥ १८ ॥
जानन्नपि महाबुद्धिः पुनर्द्यूतमवर्तयत् । अप्यासन्नो विनाशः स्यात् कुरूणामिति चिन्तयन् ॥ १९ ॥ परम बुद्धिमान् युधिष्ठिर जूएका परिणाम जानते थे, तो भी यह सोचकर कि सम्भवतः कुरुकुलका विनाश बहुत निकट है, वे द्यूतक्रीड़ामें प्रवृत्त हो गये ॥ १९ ॥
युधिष्ठिर उवाच
कथं वै मद्विधो राजा स्वधर्ममनुपालयन् । आहूतो विनिवर्तेत दीव्यामि शकुने त्वया ॥ २० ॥ **युधिष्ठिर बोले—**शकुने! स्वधर्मपालनमें संलग्न रहनेवाला मेरे-जैसा राजा जूएके लिये बुलाये जानेपर कैसे पीछे हट सकता था, अतः मैं तुम्हारे साथ खेलता हूँ ॥ २० ॥
(वैशम्पायन उवाच
एवं दैवबलाविष्टो धर्मराजो युधिष्ठिरः । भीष्मद्रोणैर्वार्यमाणो विदुरेण च धीमता ॥ युयुत्सुना कृपेणाथ सञ्जयेन च भारत । गान्धार्या पृथा चैव भीमार्जुनयमैस्तथा ॥ विकर्णेन च वीरेण द्रौपद्या द्रौणिना तथा । सोमदत्तेन च तथा बाह्लीकेन च धीमता ॥ वार्यमाणोऽपि सततं न च राजा नियच्छति ।) **वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! उस समय धर्मराज युधिष्ठिर प्रारब्धके वशीभूत हो गये थे। महाराज! उन्हें भीष्म, द्रोण और बुद्धिमान् विदुरजी दुबारा जूआ खेलनेसे रोक रहे थे। युयुत्सु, कृपाचार्य तथा संजय भी मना कर रहे थे। गान्धारी, कुन्ती, भीम, अर्जुन,
नकुल, सहदेव, वीर विकर्ण, द्रौपदी, अश्वत्थामा, सोमदत्त तथा बुद्धिमान् बाह्लीक भी बारंबार रोक रहे थे तो भी राजा युधिष्ठिर भावीके वश होनेके कारण जूएसे नहीं हटे।
शकुनिरुवाच
गवाश्वं बहुधेनूकमपर्यन्तमजाविकम् ।
गजाः कोशो हिरण्यं च दासीदासाश्च सर्वशः ॥ २१ ॥
शकुनिने कहा—राजन्! हमलोगोंके पास बैल, घोड़े और बहुत-सी दुधारू गौएँ हैं। भेड़ और बकरियोंकी तो गिनती ही नहीं है। हाथी, खजाना, दास-दासी तथा सुवर्ण सब कुछ हैं ॥ २१ ॥
एष नो ग्लह एवैको वनवासाय पाण्डवाः ।
यूयं वयं वा विजिता वसेम वनमाश्रिताः ॥ २२ ॥
फिर भी (इन्हें छोड़कर) एकमात्र वनवासका निश्चय ही हमारा दाँव है। पाण्डवो! आपलोग या हम, जो भी हारेंगे, उन्हें वनमें जाकर रहना होगा ॥ २२ ॥
त्रयोदशं च वै वर्षमज्ञाताः सजने तथा ।
अनेन व्यवसायेन दीव्याम पुरुषर्षभाः ॥ २३ ॥
केवल तेरहवें वर्ष हमें किसी जनसमूहमें अज्ञात-भावसे रहना होगा। नरश्रेष्ठगण! हम इसी निश्चयके साथ जूआ खेलें ॥ २३ ॥
समुत्क्षेपेण चैकेन वनवासाय भारत ।
प्रतिजग्राह तं पार्थो ग्लहं जग्राह सौबलः ।
जितमित्येव शकुनिर्युधिष्ठिरमभाषत ॥ २४ ॥
भारत! वनवासकी शर्त रखकर केवल एक ही बार पासा फेंकनेसे जूएका खेल पूरा हो जायगा। युधिष्ठिरने उसकी बात स्वीकार कर ली। तत्पश्चात् सुबलपुत्र शकुनिने पासा हाथमें उठाया और उसे फेंककर युधिष्ठिरसे कहा—मेरी जीत हो गयी ॥ २४ ॥
इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि अनुद्यूतपर्वणि पुनर्युधिष्ठिरपराभवे
षट्सप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत अनुद्यूतपर्वमें युधिष्ठिरपराभवविषयक
छिहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७६ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ३ १/३ श्लोक मिलाकर कुल २७ १/३ श्लोक हैं)
अध्याय (पृष्ठ 2213)
सप्तसप्ततितमोऽध्यायः
दुःशासनद्वारा पाण्डवोंका उपहास एवं भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेवकी शत्रुओंको मारनेके लिये भीषण प्रतिज्ञा
वैशम्पायन उवाच
ततः पराजिताः पार्था वनवासाय दीक्षिताः ।
अजिनान्युत्तरीयाणि जगृहुश्च यथाक्रमम् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! तदनन्तर जूएमें हारे हुए कुन्तीके पुत्रोंने वनवासकी दीक्षा ली और क्रमशः सबने मृगचर्मको उत्तरीय वस्त्रके रूपमें धारण किया ॥ १ ॥
अजिनैः संवृतान् दृष्ट्वा हृतराज्यानरिंदमान् ।
प्रस्थितान् वनवासाय ततो दुःशासनोऽब्रवीत् ॥ २ ॥
जिनका राज्य छिन गया था, वे शत्रुदमन पाण्डव जब मृगचर्मसे अपने अंगोंको ढँककर वनवासके लिये प्रस्थित हुए, उस समय दुःशासनने सभामें उनको लक्ष्य करके कहा — ॥ २ ॥
प्रवृत्तं धार्तराष्ट्रस्य चक्रं राज्ञो महात्मनः ।
पराजिताः पाण्डवेया विपत्तिं परमां गताः ॥ ३ ॥
‘धृतराष्ट्रपुत्र महामना राजा दुर्योधनका समस्त भूमण्डलपर एकछत्र राज्य हो गया। पाण्डव पराजित होकर बड़ी भारी विपत्तिमें पड़ गये ॥ ३ ॥
अद्यैव ते सम्प्रयाताः समैर्वर्त्मभिरस्थलैः ।
गुणज्येष्ठास्तथा श्रेष्ठाः श्रेयांसो यद् वयं परैः ॥ ४ ॥
‘आज वे पाण्डव समान मार्गोंसे, जिनपर आये हुओंकी भीड़के कारण जगह नहीं रही है, वनको चले जा रहे हैं। हमलोग अपने प्रतिपक्षियोंसे गुण और अवस्था दोनोंमें बड़े हैं। अतः हमारा स्थान उनसे बहुत ऊँचा है ॥ ४ ॥
नरकं पातिताः पार्था दीर्घकालमनन्तकम् ।
सुखाच्च हीना राज्याच्च विनष्टाः शाश्वतीः समाः ॥ ५ ॥
धनेन मत्ता ये ते स्म धार्तराष्ट्रान् प्रहासिषुः ।
ते निर्जिता हृतधना वनमेष्यन्ति पाण्डवा ॥ ६ ॥
‘कुन्तीके पुत्र दीर्घकालतकके लिये अनन्त दुःखरूप नरकमें गिरा दिये गये। ये सदाके लिये सुखसे वंचित तथा राज्यसे हीन हो गये हैं। जो लोग पहले अपने धनसे उन्मत्त हो धृतराष्ट्रपुत्रोंकी हँसी उड़ाया करते थे, वे ही पाण्डव आज पराजित हो अपने धन-वैभवसे हाथ धोकर वनमें जा रहे हैं ॥ ५-६ ॥
चित्रान् सन्नाहानवमुच्य पार्था वासांसि दिव्यानि च भानुमन्ति । विवास्यन्तां रुरुचर्माणि सर्वे यथा ग्लहं सौबलस्याभ्युपेताः ॥ ७ ॥
‘सभी पाण्डव अपने शरीरपर जो विचित्र कवच और चमकीले दिव्य वस्त्र हैं, उन सबको उतारकर मृगचर्म धारण कर लें; जैसा कि सुबलपुत्र शकुनिके भावको स्वीकार करके ये लोग जूआ खेले हैं ॥ ७ ॥
न सन्ति लोकेषु पुमांस ईदृशा इत्येव ये भावितबुद्धयः सदा । ज्ञास्यन्ति तेऽऽत्मानमिमेऽद्य पाण्डवा विपर्यये षण्ढतिला इवाफलाः ॥ ८ ॥
‘जो अपनी बुद्धिमें सदा यही अभिमान लिये बैठे थे कि हमारे-जैसे पुरुष तीनों लोकोंमें नहीं हैं, वे ही पाण्डव आज विपरीत अवस्थामें पहुँचकर थोथे तिलों-की भाँति निःसत्त्व हो गये हैं। अब इन्हें अपनी स्थितिका ज्ञान होगा ॥ ८ ॥
इदं हि वासो यदि वेदृशानां मनस्विनां रौरवमाहवेषु । अदीक्षितानामजिनानि यद्वद् बलीयसां पश्यत पाण्डवानाम् ॥ ९ ॥
‘इन मनस्वी और बलवान् पाण्डवोंका यह मृगचर्ममय वस्त्र तो देखो, जिसे यज्ञमें महात्मालोग धारण करते हैं। मुझे तो इनके शरीरपर ये मृगचर्म यज्ञकी दीक्षाके अधिकारसे रहित जंगली कोलभीलोंके चर्ममय वस्त्रके समान ही प्रतीत होते हैं ॥ ९ ॥
महाप्राज्ञः सौमकिर्यज्ञसेनः कन्यां पाञ्चालीं पाण्डवेभ्यः प्रदाय । अकार्षीद् वै सुकृतं नेह किंचित् क्लीबाः पार्थाः पतयो याज्ञसेन्याः ॥ १० ॥
‘महाबुद्धिमान् सोमकवंशी राजा द्रुपदने अपनी कन्या पांचालीको पाण्डवोंके लिये देकर कोई अच्छा काम नहीं किया। द्रौपदीके पति ये कुन्तीपुत्र निरे नपुंसक ही हैं ॥ १० ॥
सूक्ष्मप्रावारानजिनोत्तरीयान् दृष्ट्वारण्ये निर्धनानप्रतिष्ठान् । कां त्वं प्रीतिं लप्स्यसे याज्ञसेनि पतिं वृणीष्वेह यमन्यमिच्छसि ॥ ११ ॥
‘द्रौपदी! जो सुन्दर महीन कपड़े पहना करते थे, उन्हीं पाण्डवोंको वनमें निर्धन, अप्रतिष्ठित और मृगचर्मकी चादर ओढ़े देख तुम्हें क्या प्रसन्नता होगी? अब तुम किसी अन्य
पुरुषको, जिसे चाहो, अपना पति बना लो ।। ११ ।। एते हि सर्वे कुरवः समेताः क्षान्ता दान्ताः सुद्रविणोपपन्नाः । एषां वृणीष्वैकतमं पतित्वे न त्वां तपेत् कालविपर्ययोऽयम् ।। १२ ।। ‘ये समस्त कौरव क्षमाशील, जितेन्द्रिय तथा उत्तम धन-वैभवसे सम्पन्न हैं। इन्हींमेंसे किसीको अपना पति चुन लो, जिससे यह विपरीत काल (निर्धनावस्था) तुम्हें संतप्त न करे ।। १२ ।।
यथाफलाः षण्ढतिला यथा चर्ममया मृगाः । तथैव पाण्डवाः सर्वे यथा काकयवा अपि ।। १३ ।। ‘जैसे थोथे तिल बोनेपर फल नहीं देते हैं, जैसे केवल चर्ममय मृग व्यर्थ हैं तथा जैसे काकयव (तंदुलरहित तृणधान्य) निष्प्रयोजन होते हैं, उसी प्रकार समस्त पाण्डवोंका जीवन निरर्थक हो गया है ।। १३ ।।
किं पाण्डवांस्ते पतितानुपास्य मोघः श्रमः षण्ढतिलानुपास्य । एवं नृशंसः परुषाणि पार्था- नश्रावयद् धृतराष्ट्रस्य पुत्रः ।। १४ ।। ‘थोथे तिलोंकी भाँति इन पतित और नपुंसक पाण्डवोंकी सेवा करनेसे तुम्हें क्या लाभ होगा, व्यर्थका परिश्रम ही तो उठाना पड़ेगा।’ इस प्रकार धृतराष्ट्रके नृशंस पुत्र दुःशासनने पाण्डवोंको बहुत-से कठोर वचन सुनाये ।। १४ ।।
तद् वै श्रुत्वा भीमसेनोऽत्यमर्षी निर्भर्त्स्योच्चैः संनिगृह्यैव रोषात् । उवाच चैनं सहसैवोपगम्य सिंहो यथा हैमवतः शृगालम् ।। १५ ।। यह सब सुनकर भीमसेनको बड़ा क्रोध हुआ। जैसे हिमालयकी गुफामें रहनेवाला सिंह गीदड़के पास जाय, उसी प्रकार वे सहसा दुःशासनके पास जा पहुँचे और रोषपूर्वक उसे रोककर जोर-जोरसे फटकारते हुए बोले ।। १५ ।।
भीमसेन उवाच
क्रूर पापजनैर्जुष्टमकृतार्थं प्रभाषसे । गान्धारविद्याया हि त्वं राजमध्ये विकत्थसे ।। १६ ।।
**भीमसेनने कहा—**क्रूर एवं नीच दुःशासन! तू पापी मनुष्योंद्वारा प्रयुक्त होनेवाली ओछी बातें बक रहा है। अरे! तू अपने बाहुबलसे नहीं, शकुनिकी छल-विद्याके प्रभावसे आज राजाओंकी मण्डलीमें अपने मुँहसे अपनी बड़ाई कर रहा है ॥ १६ ॥
यथा तुदसि मर्माणि वाक्शरैरिह नो भृशम् ।
तथा स्मारयिता तेऽहं कृन्तन् मर्माणि संयुगे ॥ १७ ॥
जैसे यहाँ तू अपने वचनरूपी बाणोंसे हमारे मर्मस्थानोंमें अत्यन्त पीड़ा पहुँचा रहा है, उसी प्रकार जब युद्धमें मैं तेरा हृदय विदीर्ण करने लगूँगा, उस समय तेरी कही हुई इन बातोंकी याद दिलाऊँगा ॥ १७ ॥
ये च त्वामनुवर्तन्ते क्रोधलोभवशानुगाः ।
गोप्तारः सानुबन्धांस्तान् नेतास्मि यमसादनम् ॥ १८ ॥
जो लोग क्रोध और लोभके वशीभूत हो तुम्हारे रक्षक बनकर पीछे-पीछे चलते हैं, उन्हें उनके सम्बन्धियोंसहित यमलोक भेज दूँगा ॥ १८ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवं ब्रुवाणमजिनैर्विवासितं
दुःशासनस्तं परिनृत्यति स्म ।
मध्ये कुरूणां धर्मनिबद्धमार्गं
गौर्गौरिति स्माह्वयन् मुक्तलज्जः ॥ १९ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! मृगचर्म धारण किये भीमसेनको ऐसी बातें करते देख निर्लज्ज दुःशासन कौरवोंके बीचमें उनकी हँसी उड़ाते हुए नाचने लगा और 'ओ बैल! ओ बैल' कहकर उन्हें पुकारने लगा। उस समय भीमका मार्ग धर्मराज युधिष्ठिरने रोक रखा था (अन्यथा वे दुःशासनको जीता न छोड़ते) ॥ १९ ॥
भीमसेन उवाच
नृशंस परुषं वक्तुं शक्यं दुःशासन त्वया ।
निकृत्या हि धनं लब्ध्वा को विकत्थितुमर्हति ॥ २० ॥
**भीमसेन बोले—**ओ नृशंस दुःशासन! तेरे ही मुखसे ऐसी कठोर बातें निकल सकती हैं, तेरे सिवा दूसरा कौन है, जो छल-कपटसे धन पाकर इस तरह आप ही अपनी प्रशंसा करेगा ॥ २० ॥
मैव स्म सुकृताँल्लोकान् गच्छेत् पार्थो वृकोदरः ।
यदि वक्षो हि ते भित्त्वा न पिबेच्छोणितं रणे ॥ २१ ॥
मेरी बात सुन ले। यह कुन्तीपुत्र भीमसेन यदि युद्धमें तेरी छाती फाड़कर तेरा रक्त न पीये तो इसे पुण्यलोकोंकी प्राप्ति न हो ॥ २१ ॥
धार्तराष्ट्रान् रणे हत्वा मिषतां सर्वधन्विनाम् ।
शमं गन्तास्मि नचिरात् सत्यमेतद् ब्रवीमि ते ।। २२ ।। मैं तुझसे सच्ची बात कह रहा हूँ, शीघ्र ही वह समय आनेवाला है, जब कि समस्त धनुर्धरोंके देखते-देखते मैं युद्धमें धृतराष्ट्रके सभी पुत्रोंका वध करके शान्ति प्राप्त करूँगा ।। २२ ।।
वैशम्पायन उवाच
तस्य राजा सिंहगतेः सखेलं
दुर्योधनो भीमसेनस्य हर्षात् ।
गतिं स्वगत्यानुचकार मन्दो
निर्गच्छतां पाण्डवानां सभायाः ।। २३ ।।
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! जब पाण्डवलोग सभाभवनसे निकले, उस समय मन्दबुद्धि राजा दुर्योधन हर्षमें भरकर सिंहके समान मस्तानी चालसे चलनेवाले भीमसेनकी खिल्ली उड़ाते हुए उनकी चालकी नकल करने लगा ।। २३ ।।
नैतावता कृतमित्यब्रवीत् तं
वृकोदरः संनिवृत्तार्धकायः ।
शीघ्रं हि त्वां निहतं सानुबन्धं
संस्मार्याहं प्रतिवक्ष्यामि मूढ ।। २४ ।।
यह देख भीमसेनने अपने आधे शरीरको पीछेकी ओर मोड़कर कहा—'ओ मूढ़! केवल दुःशासनके रक्तपान-द्वारा ही मेरा कर्तव्य पूरा नहीं हो जाता है। तुझे भी सम्बन्धियोंसहित शीघ्र ही यमलोक भेजकर तेरे इस परिहासकी याद दिलाते हुए इसका समुचित उत्तर दूँगा' ।। २४ ।।
एवं समीक्ष्यात्मनि चावमानं
नियम्य मन्युं बलवान् स मानी ।
राजानुगः संसदि कौरवाणां
विनिष्क्रामन् वाक्यमुवाच भीमः ।। २५ ।।
इस प्रकार अपना अपमान होता देख बलवान् एवं मानी भीमसेन क्रोधको किसी प्रकार रोककर राजा युधिष्ठिरके पीछे कौरवसभासे निकलते हुए इस प्रकार बोले ।। २५ ।।
भीमसेन उवाच
अहं दुर्योधनं हन्ता कर्णं हन्ता धनंजयः ।
शकुनिं चाक्षकितवं सहदेवो हनिष्यति ।। २६ ।।
भीमसेनने कहा— मैं दुर्योधनका वध करूँगा, अर्जुन कर्णका संहार करेंगे और इस जुआरी शकुनिको सहदेव मार डालेंगे ।। २६ ।।
इदं च भूयो वक्ष्यामि सभामध्ये बृहद् वचः ।
सत्यं देवाः करिष्यन्ति यन्नो युद्धं भविष्यति ।। २७ ।।
सुयोधनमिमं पापं हन्तास्मि गदया युधि ।
शिरः पादेन चास्याहमधिष्ठास्यामि भूतले ।। २८ ।।
साथ ही इस भरी सभामें मैं पुनः एक बहुत बड़ी बात कह रहा हूँ। मेरा यह विश्वास है कि देवतालोग मेरी यह बात सत्य कर दिखायेंगे। जब हम कौरव और पाण्डवोंमें युद्ध होगा, उस समय इस पापी दुर्योधनको मैं गदासे मार गिराऊँगा तथा रणभूमिमें पड़े हुए इस पापीके मस्तकको पैरसे ठुकराऊँगा ।। २७-२८ ।।
वाक्यशूरस्य चैवास्य परुषस्य दुरात्मनः ।
दुःशासनस्य रुधिरं पातास्मि मृगराडिव ।। २९ ।।
और यह जो केवल बात बनानेमें बहादुर क्रूर-स्वभाववाला दुरात्मा दुःशासन है, इसकी छातीका खून उसी प्रकार पी लूँगा, जैसे सिंह किसी मृगका रक्त पान करता है ।। २९ ।।
अर्जुन उवाच
नैवं वाचा व्यवसितं भीम विज्ञायते सताम् ।
इतश्चतुर्दशे वर्षे द्रष्टारो यद् भविष्यति ।। ३० ।।
**अर्जुनने कहा—**आर्य भीमसेन! साधु पुरुष जो कुछ करना चाहते हैं, उसे इस प्रकार वाणीद्वारा सूचित नहीं करते। आजसे चौदहवें वर्षमें जो घटना घटित होगी, उसे स्वयं ही लोग देखेंगे ।। ३० ।।
भीमसेन उवाच
दुर्योधनस्य कर्णस्य शकुनेश्च दुरात्मनः ।
दुःशासनचतुर्थानां भूमिः पास्यति शोणितम् ।। ३१ ।।
**भीमसेन बोले—**यह भूमि दुर्योधन, कर्ण, दुरात्मा शकुनि तथा चौथे दुःशासनके रक्तका निश्चय ही पान करेगी ।।
अर्जुन उवाच
असूयितारं द्रष्टारं प्रवक्तारं विकत्थनम् ।
भीमसेन नियोगात् ते हन्ताहं कर्णमाहवे ।। ३२ ।।
**अर्जुनने कहा—**भैया भीमसेन! जो हमलोगोंके दोष ही ढूँढ़ा करता है, हमारे दुःख देखकर प्रसन्न होता है, कौरवोंको बुरी सलाहें देता है और व्यर्थ बढ़-बढ़कर बातें बनाता है, उस कर्णको मैं आपकी आज्ञासे अवश्य युद्धमें मार डालूँगा ।। ३२ ।।
अर्जुनः प्रतिजानीते भीमस्य प्रियकाम्यया ।
कर्णं कर्णानुगांश्चैव रणे हन्तास्मि पत्रिभिः ।। ३३ ।।
अपने भाई भीमसेनका प्रिय करनेकी इच्छासे अर्जुन यह प्रतिज्ञा करता है कि 'मैं युद्धमें कर्ण और उसके अनुगामियोंको भी बाणोंद्वारा मार डालूँगा' ॥ ३३ ॥
ये चान्ये प्रतियोत्स्यन्ति बुद्धिमोहेन मां नृपाः ।
तांश्च सर्वानहं बाणैर्नेतास्मि यमसादनम् ॥ ३४ ॥
दूसरे भी जो नरेश बुद्धिके व्यामोहवश हमारे विपक्षमें होकर युद्ध करेंगे, उन सबको अपने तीक्ष्ण सायकोंद्वारा मैं यमलोक पहुँचा दूँगा ॥ ३४ ॥
चलेद्धि हिमवान् स्थानान्निष्प्रभः स्याद् दिवाकरः ।
शैत्यं सोमात् प्रणश्येत मत्सत्यं विचलेद् यदि ॥ ३५ ॥
यदि मेरा सत्य विचलित हो जाय तो हिमालय पर्वत अपने स्थानसे हट जाय, सूर्यकी प्रभा नष्ट हो जाय और चन्द्रमासे उसकी शीतलता दूर हो जाय (अर्थात् जैसे हिमालय अपने स्थानसे नहीं हट सकता, सूर्यकी प्रभा नष्ट नहीं हो सकती, चन्द्रमासे उसकी शीतलता दूर नहीं हो सकती, वैसे ही मेरे वचन मिथ्या नहीं हो सकते) ॥ ३५ ॥
न प्रदास्यति चेद् राज्यमितो वर्षे चतुर्दशे ।
दुर्योधनोऽभिसत्कृत्य सत्यमेतद् भविष्यति ॥ ३६ ॥
यदि आजसे चौदहवें वर्षमें दुर्योधन सत्कारपूर्वक हमारा राज्य हमें वापस न दे देगा तो ये सब बातें सत्य होकर रहेंगी ॥ ३६ ॥
वैशम्पायन उवाच
इत्युक्तवति पार्थे तु श्रीमान् माद्रवतीसुतः ।
प्रगृह्य विपुलं बाहुं सहदेवः प्रतापवान् ॥ ३७ ॥
सौबलस्य वधं प्रेप्सुरिदं वचनमब्रवीत् ।
क्रोधसंरक्तनयनो निःश्वसन्निव पन्नगः ॥ ३८ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! अर्जुनके ऐसा कहनेपर परम सुन्दर प्रतापी वीर माद्रीनन्दन सहदेवने अपनी विशाल भुजा ऊपर उठाकर शकुनिके वधकी इच्छासे इस प्रकार कहा; उस समय उनके नेत्र क्रोधसे लाल हो रहे थे और वे फुँफकारते हुए सर्पकी भाँति उच्छ्वास ले रहे थे ॥ ३७-३८ ॥
सहदेव उवाच
अक्षान् यान् मन्यसे मूढ गान्धाराणां यशोहर ।
नैतेऽक्षा निशिता बाणास्त्वयैते समरे वृताः ॥ ३९ ॥
सहदेवने कहा— ओ गान्धारनिवासी क्षत्रियकुलके कलंक मूर्ख शकुने! जिन्हें तू पासे समझ रहा है, वे पासे नहीं हैं, उनके रूपमें तूने युद्धमें तीखे बाणोंका वरण किया है ॥ ३९ ॥
यथा चैवोक्तवान् भीमस्त्वामुद्दिश्य सबान्धवम् ।
कर्ताहं कर्मणस्तस्य कुरु कार्याणि सर्वशः ॥ ४० ॥ आर्य भीमसेनने बन्धु-बान्धवोंसहित तेरे विषयमें जो बात कही है, मैं उसे अवश्य पूर्ण करूँगा। तुझे अपने बचावके लिये जो कुछ करना हो, वह सब कर डाल ॥ ४० ॥ हन्तास्मि तरसा युद्धे त्वामेवेह सबान्धवम् । यदि स्थास्यसि संग्रामे क्षत्रधर्मेण सौबल ॥ ४१ ॥ सुबलकुमार! यदि तू क्षत्रियधर्मके अनुसार संग्राममें डटा रह जायगा, तो मैं वेगपूर्वक तुझे तेरे बन्धु-बान्धवोंसहित अवश्य मार डालूँगा ॥ ४१ ॥ सहदेववचः श्रुत्वा नकुलोऽपि विशाम्पते । दर्शनीयतमो नृणामिदं वचनमब्रवीत् ॥ ४२ ॥ राजन्! सहदेवकी बात सुनकर मनुष्योंमें परम दर्शनीय रूपवाले नकुलने भी यह बात कही ॥ ४२ ॥
नकुल उवाच
सुतेयं यज्ञसेनस्य द्यूतेऽस्मिन् धृतराष्ट्रजैः । यैर्वाचः श्राविता रूक्षाः स्थितैर्दुर्योधनप्रिये ॥ ४३ ॥ तान् धार्तराष्ट्रान् दुर्वृत्तान् मुमूर्षून् कालनोदितान् । गमयिष्यामि भूयिष्ठानहं वैवस्वतक्षयम् ॥ ४४ ॥ नकुल बोले—दुर्योधनके प्रियसाधनमें लगे हुए जिन धृतराष्ट्रपुत्रोंने इस द्यूतसभामें द्रुपदकुमारी कृष्णाको कठोर बातें सुनायी हैं, कालसे प्रेरित हो मौतके मुँहमें जानेकी इच्छा रखनेवाले उन दुराचारी बहुसंख्यक धृतराष्ट्रकुमारोंको मैं यमलोकका अतिथि बना दूँगा ॥ निदेशाद् धर्मराजस्य द्रौपद्याः पदवीं चरन् । निर्धार्तराष्ट्रां पृथिवीं कर्तास्मि नचिरादिव ॥ ४५ ॥ धर्मराजकी आज्ञासे द्रौपदीका प्रिय करते हुए मैं सारी पृथिवीको धृतराष्ट्रपुत्रोंसे सूनी कर दूँगा; इसमें अधिक देर नहीं है ॥ ४५ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवं ते पुरुषव्याघ्राः सर्वे व्यायतबाहवः । प्रतिज्ञा बहुलाः कृत्वा धृतराष्ट्रमुपागमन् ॥ ४६ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! इस प्रकार वे सभी पुरुषसिंह महाबाहु पाण्डव बहुत-सी प्रतिज्ञाएँ करके राजा धृतराष्ट्रके पास गये ॥ ४६ ॥
इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि अनुद्यूतपर्वणि पाण्डवप्रतिज्ञाकरणे सप्तसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत अनुद्यूतपर्वमें पाण्डवोंकी प्रतिज्ञासे सम्बन्ध रखनेवाला सतहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७७ ॥
अध्याय (पृष्ठ 2222)
अष्टसप्ततितमोऽध्यायः
युधिष्ठिरका धृतराष्ट्र आदिसे विदा लेना, विदुरका कुन्तीको अपने यहाँ रखनेका प्रस्ताव और पाण्डवोंको धर्मपूर्वक रहनेका उपदेश देना
युधिष्ठिर उवाच
आमन्त्रयामि भरतांस्तथा वृद्धं पितामहम् ।
राजानं सोमदत्तं च महाराजं च बाह्निकम् ॥ १ ॥
द्रोणं कृपं नृपांश्चान्यानश्वत्थामानमेव च ।
विदुरं धृतराष्ट्रं च धार्तराष्ट्रांश्च सर्वशः ॥ २ ॥
युयुत्सुं संजयं चैव तथैवान्यान् सभासदः ।
सर्वान्यामन्त्र्य गच्छामि द्रष्टास्मि पुनरेत्य वः ॥ ३ ॥
युधिष्ठिर बोले— मैं भरतवंशके समस्त गुरुजनोंसे वनमें जानेकी आज्ञा चाहता हूँ। बड़े-बूढ़े पितामह भीष्म, राजा सोमदत्त, महाराज बाह्लिक, गुरुवर द्रोण और कृपाचार्य, अश्वत्थामा, अन्यान्य नृपतिगण, विदुर, राजा धृतराष्ट्र, उनके सभी पुत्र, युयुत्सु, संजय तथा दूसरे सब सदस्योंसे पूछकर सबकी आज्ञा लेकर वनमें जाता हूँ, फिर लौटकर आप लोगोंका दर्शन करूँगा ॥ १—३ ॥
वैशम्पायन उवाच
न च किंचिदथोचुस्तं ह्रिया सन्ना युधिष्ठिरम् ।
मनोभिरेव कल्याणं दध्युस्ते तस्य धीमतः ॥ ४ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— राजन्! युधिष्ठिरके इस प्रकार पूछनेपर सब कौरव लाजके मारे सन्न रह गये, कुछ भी उत्तर न दे सके। उन्होंने मन-ही-मन उन बुद्धिमान् युधिष्ठिरके कल्याणका चिन्तन किया ॥ ४ ॥
विदुर उवाच
आर्या पृथा राजपुत्री नारण्यं गन्तुमर्हति ।
सुकुमारी च वृद्धा च नित्यं चैव सुखोचिता ॥ ५ ॥
इह वत्स्यति कल्याणी सत्कृता मम वेश्मनि ।
इति पार्था विजानीध्वमगदं वोऽस्तु सर्वशः ॥ ६ ॥
विदुर बोले— कुन्तीकुमारो! राजपुत्री आर्या कुन्ती वनमें जाने लायक नहीं हैं। वे कोमल अंगोंवाली और वृद्धा हैं, सदा सुख और आरामके ही योग्य हैं; अतः वे मेरे ही घरमें
सत्कारपूर्वक रहेंगी। यह बात तुम सब लोग जान लो। मेरी शुभ कामना है कि तुम वहाँ सर्वथा नीरोग एवं सुखसे रहो ।। ५-६ ।।
पाण्डवा ऊचुः
तथेत्युक्त्वाब्रुवन् सर्वे यथा नो वदसेऽनघ ।
त्वं पितृव्यः पितृसमो वयं च त्वत्परायणाः ।। ७ ।।
पाण्डवोंने कहा— बहुत अच्छा, ऐसा ही हो। इतना कहकर वे सब फिर बोले—‘अनघ! आप हमें जैसा कहें—जैसी आज्ञा दें, वही शिरोधार्य है। आप हमारे पितृव्य (पिताके भाई) हैं, अतः पिताके ही तुल्य हैं। हम सब भाई आपकी शरणमें हैं ।। ७ ।।
यथाऽऽज्ञापयसे विद्वंस्त्वं हि नः परमो गुरुः ।
यच्चान्यदपि कर्तव्यं तद् विधत्स्व महामते ।। ८ ।।
‘विद्वन्! आप जैसी आज्ञा दें, वही हमें मान्य है; क्योंकि आप हमारे परम गुरु हैं। महामते! इसके सिवा और भी जो कुछ हमारा कर्तव्य हो, वह हमें बताइये’ ।। ८ ।।
विदुर उवाच
युधिष्ठिर विजानीहि ममेदं भरतर्षभ ।
नाधर्मेण जितः कश्चिद् व्यथते वै पराजये ।। ९ ।।
विदुर बोले— भरतकुलभूषण युधिष्ठिर! तुम मुझसे यह जान लो कि अधर्मसे पराजित होनेवाला कोई भी पुरुष अपनी उस पराजयके लिये दुःखी नहीं होता ।। ९ ।।
त्वं वै धर्मं विजानीषे युद्धे जेता धनंजयः ।
हन्तारौणां भीमसेनो नकुलस्त्वर्थसंग्रही ।। १० ।।
तुम धर्मके ज्ञाता हो। अर्जुन युद्धमें विजय पानेवाले हैं। भीमसेन शत्रुओंका नाश करनेमें समर्थ हैं। नकुल आवश्यक वस्तुओंको जुटानेमें कुशल हैं ।। १० ।।
संयन्ता सहदेवस्तु धौम्यो ब्रह्मविदुत्तमः ।
धर्मार्थकुशला चैव द्रौपदी धर्मचारिणी ।। ११ ।।
सहदेव संयमी हैं तथा ब्रह्मर्षि धौम्यजी ब्रह्मवेत्ताओंके शिरोमणि हैं। एवं धर्मपरायणा द्रौपदी भी धर्म और अर्थके सम्पादनमें कुशल है ।। ११ ।।
अन्योन्यस्य प्रियाः सर्वे तथैव प्रियदर्शनाः ।
परैरभेद्याः संतुष्टाः को वो न स्पृहयेदिह ।। १२ ।।
तुम सब लोग आपसमें एक-दूसरेके प्रिय हो, तुम्हें देखकर सबको प्रसन्नता होती है। शत्रु तुममें भेद या फूट नहीं डाल सकते, इस जगत्में कौन है जो तुमलोगोंको न चाहता हो ।। १२ ।।
एष वै सर्वकल्याणः समाधिस्तव भारत ।
नैनं शत्रुर्विषहते शक्रेणापि समोऽप्युत ।। १३ ।।
भारत! तुम्हारा यह क्षमाशीलताका नियम सब प्रकारसे कल्याणकारी है। इन्द्रके समान पराक्रमी शत्रु भी इसका सामना नहीं कर सकता ॥ १३ ॥
हिमवत्यनुशिष्टोऽसि मेरुसावर्णिना पुरा ।
द्वैपायनेन कृष्णेन नगरे वारणावते ॥ १४ ॥
भृगुतुङ्गे च रामेण दृषद्वत्यां च शम्भुना ।
अश्रौषीरसितस्यापि महर्षेरञ्जनं प्रति ॥ १५ ॥
पूर्वकालमें मेरुसावर्णिने हिमालयपर तुम्हें धर्म और ज्ञानका उपदेश दिया है, वारणावत नगरमें श्रीकृष्णद्वैपायन व्यासजीने, भृगुतुंग पर्वतपर परशुरामजीने तथा दृषद्वतीके तटपर साक्षात् भगवान् शंकरने तुम्हें अपने सदुपदेशसे कृतार्थ किया है। अंजन पर्वतपर तुमने महर्षि असितका भी उपदेश सुना है ॥ १४-१५ ॥
कल्माषीतीरसंस्थस्य गतस्त्वं शिष्यतां भृगोः ।
द्रष्टा सदा नारदस्ते धौम्यस्तेऽयं पुरोहितः ॥ १६ ॥
कल्माषी नदीके किनारे निवास करनेवाले महर्षि भृगुने भी तुम्हें उपदेश देकर अनुगृहीत किया है। देवर्षि नारदजी सदा तुम्हारी देखभाल करते हैं और तुम्हारे ये पुरोहित धौम्यजी तो सदा साथ ही रहते हैं ॥ १६ ॥
मा हासीः साम्पराये त्वं बुद्धिं तामृषिपूजिताम् ।
पुरूरवसमैलं त्वं बुद्ध्या जयसि पाण्डव ॥ १७ ॥
ऋषियोंद्वारा सम्मानित उस परलोकविषयक विज्ञानका तुम कभी त्याग न करना। पाण्डुनन्दन! तुम अपनी बुद्धिसे एलानन्दन पुरूरवाको भी पराजित करते हो ॥ १७ ॥
शक्त्या जयसि राज्ञोऽन्यानृषीन् धर्मोपसेवया ।
ऐन्द्रे जये धृतमना याम्ये कोपविधारणे ॥ १८ ॥
शक्तिसे समस्त राजाओंको तथा धर्मसेवनद्वारा ऋषियोंको भी जीत लेते हो। तुम इन्द्रसे मनमें विजयका उत्साह प्राप्त करो। क्रोधको काबूमें रखनेका पाठ यमराजसे सीखो।
तथा विसर्गे कौबेरे वारुणे चैव संयमे ।
आत्मप्रदानं सौम्यत्वमद्भ्यश्चैवोपजीवनम् ॥ १९ ॥
उदारता एवं दानमें कुबेरका और संयममें वरुणका आदर्श ग्रहण करो। दूसरोंके हितके लिये अपने-आपको निछावर करना, सौम्यभाव (शीतलता) तथा दूसरोंको जीवन-दान देना—इन सब बातोंकी शिक्षा तुम्हें जलसे लेनी चाहिये ॥ १९ ॥
भूमेः क्षमा च तेजश्च समग्रं सूर्यमण्डलात् ।
वायोर्बलं प्राप्नुहि त्वं भूतेभ्यश्चात्मसम्पदम् ॥ २० ॥
तुम भूमिसे क्षमा, सूर्यमण्डलसे तेज, वायुसे बल तथा सम्पूर्ण भूतोंसे अपनी सम्पत्ति प्राप्त करो ॥ २० ॥
अगदं वोऽस्तु भद्रं वो द्रष्टास्मि पुनरागतान् ।
आपद्धर्मार्थकृच्छ्रेषु सर्वकार्येषु वा पुनः ॥ २१ ॥
यथावत् प्रतिपद्येथाः काले काले युधिष्ठिर ।
आपृष्टोऽसीह कौन्तेय स्वस्ति प्राप्नुहि भारत ॥ २२ ॥
तुम्हें कभी कोई रोग न हो, सदा मंगल-ही-मंगल दिखायी दे। कुशलपूर्वक वनसे लौटनेपर मैं फिर तुम्हें देखूँगा। युधिष्ठिर! आपत्तिकालमें, धर्म तथा अर्थका संकट उपस्थित होनेपर अथवा सभी कार्योंमें समय-समयपर अपने उचित कर्तव्यका पालन करना। कुन्तीनन्दन! भारत! तुमसे आवश्यक बातें कर लीं। तुम्हें कल्याण प्राप्त हो ॥ २१-२२ ॥
कृतार्थं स्वस्तिमन्तं त्वां द्रक्ष्यामः पुनरागतम् ।
न हि वो वृजिनं किंचिद् वेद कश्चित् पुरा कृतम् ॥ २३ ॥
जब वनसे कुशलपूर्वक कृतार्थ होकर लौटोगे, तब यहाँ आनेपर फिर तुमसे मिलूँगा। तुम्हारे पहलेके किसी दोषको दूसरा कोई न जाने, इसकी चेष्टा रखना ॥ २३ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्तस्तथेत्युक्त्वा पाण्डवः सत्यविक्रमः ।
भीष्मद्रोणौ नमस्कृत्य प्रातिष्ठत युधिष्ठिरः ॥ २४ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! विदुरके ऐसा कहनेपर सत्यपराक्रमी पाण्डुनन्दन युधिष्ठिर भीष्म और द्रोणको नमस्कार करके वहाँसे प्रस्थित हुए ॥ २४ ॥
इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि अनुद्यूतपर्वणि
युधिष्ठिरवनप्रस्थानेऽष्टसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत अनुद्यूतपर्वमें युधिष्ठिरका वनको प्रस्थानविषयक अठहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७८ ॥
अध्याय (पृष्ठ 2226)
एकोनाशीतितमोऽध्यायः
द्रौपदीका कुन्तीसे विदा लेना तथा कुन्तीका विलाप एवं नगरके नर-नारियोंका शोकातुर होना
वैशम्पायन उवाच
तस्मिन् सम्प्रस्थिते कृष्णा पृथां प्राप्य यशस्विनीम् ।
अपृच्छद् भृशदुःखार्ता याश्चान्यास्तत्र योषितः ॥ १ ॥
यथार्हं वन्दनाश्लेषान् कृत्वा गन्तुमियेष सा ।
ततो निनादः सुमहान् पाण्डवान्तःपुरेऽभवत् ॥ २ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— युधिष्ठिरके प्रस्थान करनेपर कृष्णाने यशस्विनी कुन्तीके पास जाकर अत्यन्त दुःखसे आतुर हो वनमें जानेकी आज्ञा माँगी। वहाँ जो दूसरी स्त्रियाँ बैठी थीं, उन सबकी यथायोग्य वन्दना करके सबसे गले मिलकर उसने वनमें जानेकी इच्छा प्रकट की। फिर तो पाण्डवोंके अन्तःपुरमें महान् आर्तनाद होने लगा ॥
कुन्ती च भृशसंतप्ता द्रौपदीं प्रेक्ष्य गच्छतीम् ।
शोकविह्वलया वाचा कृच्छ्राद् वचनमब्रवीत् ॥ ३ ॥
द्रौपदीको जाती देख कुन्ती अत्यन्त संतप्त हो उठीं और शोकाकुल वाणीद्वारा बड़ी कठिनाईसे इस प्रकार बोलीं— ॥ ३ ॥
वत्से शोको न ते कार्यः प्राप्येदं व्यसनं महत् ।
स्त्रीधर्मार्णामभिज्ञासि शीलाचारवती तथा ॥ ४ ॥ ‘बेटी! इस महान् संकटको पाकर तुम्हें शोक नहीं करना चाहिये। तुम स्त्रीके धर्मोंको जानती हो, शील और सदाचारका पालन करनेवाली हो ॥ ४ ॥
न त्वां संदेष्टुमर्हामि भर्तॄन् प्रति शुचिस्मिते । साध्वीगुणसमापन्ना भूषितं ते कुलद्वयम् ॥ ५ ॥ ‘पवित्र मुसकानवाली बहू! इसीलिये पतियोंके प्रति तुम्हारा क्या कर्तव्य है, यह तुम्हें बतानेकी आवश्यकता मैं नहीं समझती। तुम सती स्त्रियोंके सद्गुणोंसे सम्पन्न हो; तुमने पति और पिता—दोनोंके कुलोंकी शोभा बढ़ायी है ॥ ५ ॥
सभाग्याः कुरवश्चेमे ये न दग्धास्त्वयानघे । अरिष्टं व्रज पन्थानं मदनुध्यानबृंहिता ॥ ६ ॥ ‘निष्पाप द्रौपदी! ये कौरव बड़े भाग्यशाली हैं, जिन्हें तुमने अपनी क्रोधाग्निसे जलाकर भस्म नहीं कर दिया। जाओ, तुम्हारा मार्ग विघ्न-बाधाओंसे रहित हो; मेरे किये हुए शुभ चिन्तनसे तुम्हारा अभ्युदय हो ॥ ६ ॥
भाविन्यर्थे हि सत्स्त्रीणां वैकृतं नोपजायते । गुरुधर्माभिगुप्ता च श्रेयः क्षिप्रमवाप्स्यसि ॥ ७ ॥ ‘जो बात अवश्य होनेवाली है उसके होनेपर साध्वी स्त्रियोंके मनमें व्याकुलता नहीं होती। तुम अपने श्रेष्ठ धर्मसे सुरक्षित रहकर शीघ्र ही कल्याण प्राप्त करोगी ॥ ७ ॥
सहदेवश्च मे पुत्रः सदावेक्ष्यो वने वसन् । यथेदं व्यसनं प्राप्य नायं सीदेन्महामतिः ॥ ८ ॥ ‘बेटी! वनमें रहते हुए मेरे पुत्र सहदेवकी तुम सदा देखभाल रखना, जिससे यह परम बुद्धिमान् सहदेव इस भारी संकटमें पड़कर दुःखी न होने पावे’ ॥ ८ ॥
तथेत्युक्त्वा तु सा देवी स्रवन्नेत्रजलाविला । शोणिताक्तैकवसना मुक्तकेशी विनिर्ययौ ॥ ९ ॥ कुन्तीके ऐसा कहनेपर नेत्रोंसे आँसू बहाती हुई द्रौपदीने ‘तथास्तु’ कहकर उनकी आज्ञा शिरोधार्य की। उस समय उसके शरीरपर एक ही वस्त्र था, उसका भी कुछ भाग रजसे सना हुआ था और उसके सिरके बाल बिखरे हुए थे। उसी दशामें वह अन्तःपुरसे बाहर निकली ॥ ९ ॥
तां क्रोशन्तीं पृथा दुःखान्न्वव्राज गच्छतीम् । अथापश्यत् सुतान् सर्वान् हृताभरणवाससः ॥ १० ॥ रोती-बिलखती, वनको जाती हुई द्रौपदीके पीछे-पीछे कुन्ती भी दुःखसे व्याकुल हो कुछ दूरतक गयीं, इतनेहीमें उन्होंने अपने सभी पुत्रोंको देखा, जिनके वस्त्र और आभूषण उतार लिये गये थे ॥ १० ॥
रुरुचर्मावृततनून् ह्रिया किंचिदवाङ्मुखान् ।
परैः परीतान् संहृष्टैः सुहृद्भिश्चानुशोचितान् ।। ११ ।। उनके सभी अंग मृगचर्मसे ढँके हुए थे और वे लज्जावश नीचे मुख किये चले जा रहे थे। हर्षमें भरे हुए शत्रुओंने उन्हें सब ओरसे घेर रखा था और हितैषी सुहृद् उनके लिये शोक कर रहे थे ।। ११ ।।
तदवस्थान् सुतान् सर्वानुपसृत्यातिवत्सला । स्वजमानावदच्छोकात् तत्तद् विलपती बहु ।। १२ ।। उस अवस्थामें उन सभी पुत्रोंके निकट पहुँचकर कुन्तीके हृदयमें अत्यन्त वात्सल्य उमड़ आया। वे उन्हें हृदयसे लगाकर शोकवश बहुत विलाप करती हुई बोलीं ।। १२ ।।
कुन्त्युवाच
कथं सद्धर्मचारित्रान् वृत्तस्थितिविभूषितान् । अक्षुद्रान् दृढभक्तांश्च दैवतेज्यापरान् सदा ।। १३ ।। व्यसनं वः समभ्यागात् कोऽयं विधिविपर्ययः । कस्यापध्यानजं चेदं धिया पश्यामि नैव तत् ।। १४ ।। कुन्तीने कहा— पुत्रो! तुम उत्तम धर्मका पालन करनेवाले तथा सदाचारकी मर्यादासे विभूषित हो। तुममें क्षुद्रताका अभाव है। तुम भगवान्के सुदृढ़ भक्त और देवाराधनमें सदा तत्पर रहनेवाले हो, तो भी तुम्हारे ऊपर यह विपत्तिका पहाड़ टूट पड़ा है। विधाताका यह कैसा विपरीत विधान है। किसके अनिष्टचिन्तनसे तुम्हारे ऊपर यह महान् दुःख आया है, यह बुद्धिसे बार-बार विचार करनेपर भी मुझे कुछ सूझ नहीं पड़ता ।। १३-१४ ।।
स्यात् तु मद्भाग्यदोषोऽयं याहं युष्मानजीजनम् । दुःखायासभुजोऽत्यर्थं युक्तानप्युत्तमैर्गुणैः ।। १५ ।। यह मेरे ही भाग्यका दोष हो सकता है। तुम तो उत्तम गुणोंसे युक्त हो तो भी अत्यन्त दुःख और कष्ट भोगनेके लिये ही मैंने तुम्हें जन्म दिया है ।। १५ ।।
कथं वत्स्यथ दुर्गेषु वने ऋद्धिविनाकृताः । वीर्यसत्त्वबलोत्साहतेजोभिरकृशाः कृशाः ।। १६ ।। इस प्रकार सम्पत्तिसे वंचित होकर तुम वनके दुर्गम स्थानोंमें कैसे रह सकोगे? वीर्य, धैर्य, बल, उत्साह और तेजसे परिपुष्ट होते हुए भी तुम दुर्बल हो ।। १६ ।।
यद्येतदेवमज्ञास्यं वने वासो हि वो ध्रुवम् । शतशृङ्गान्मृते पाण्डौ नागमिष्यं गजाह्वयम् ।। १७ ।। यदि मैं यह जानती कि नगरमें आनेपर तुम्हें निश्चय ही वनवासका कष्ट भोगना पड़ेगा तो महाराज पाण्डुके परलोकवासी हो जानेपर शतशृंगपुरसे हस्तिनापुर नहीं आती ।। १७ ।।
धन्यं वः पितरं मन्ये तपोमेधान्वितं तथा ।
यः पुत्राधिमसम्प्राप्य स्वर्गेच्छामकरोत् प्रियाम् ॥ १८ ॥ मैं तो तुम्हारे तपस्वी एवं मेधावी पिताको ही धन्य मानती हूँ, जिन्होंने पुत्रोंके दुःखसे दुःखी होनेका अवसर न पाकर स्वर्गलोककी अभिलाषाको ही प्रिय समझा ॥ १८ ॥ धन्यां चातीन्द्रियज्ञानामिमां प्राप्तां परां गतिम् । मन्ये तु माद्रीं धर्मज्ञां कल्याणीं सर्वथैव तु ॥ १९ ॥ रत्या मत्या च गत्या च ययाहमभिसन्धिता । जीवितप्रियतां मह्यं धिङ्मां संक्लेशभागिनीम् ॥ २० ॥ इसी प्रकार अतीन्द्रिय ज्ञानसे सम्पन्न एवं परमगतिको प्राप्त हुई कल्याणमयी इस धर्मज्ञा माद्रीको भी सर्वथा धन्य मानती हूँ। जिसने अपने अनुराग, उत्तम बुद्धि और सद्व्यवहारद्वारा मुझे भुलाकर जीवित रहनेके लिये विवश कर दिया। मुझको और जीवनके प्रति मेरी इस आसक्तिको धिक्कार है! जिसके कारण मुझे यह महान् क्लेश भोगना पड़ता है ॥ १९-२० ॥ पुत्रका न विहास्ये वः कृच्छ्रलब्धान् प्रियान् सतः । साहं यास्यामि हि वनं हा कृष्णे किं जहासि माम् ॥ २१ ॥ पुत्रो! तुम सदाचारी और मेरे लिये प्राणोंसे भी अधिक प्यारे हो। मैंने बड़े कष्टसे तुम्हें पाया है; अतः तुम्हें छोड़कर अलग नहीं रहूँगी। मैं भी तुम्हारे साथ वनमें चलूँगी। हाय कृष्णे! तुम क्यों मुझे छोड़े जाती हो? ॥ अन्तवत्यसुधर्मेऽस्मिन् धात्रा किं नु प्रमादतः । ममान्तो नैव विहितस्तेनायुर्न जहाति माम् ॥ २२ ॥ यह प्राणधारणरूपी धर्म अनित्य है, एक-न-एक दिन इसका अन्त होना निश्चित है, फिर भी विधाताने न जाने क्यों प्रमादवश मेरे जीवनका भी शीघ्र ही अन्त नहीं नियत कर दिया। तभी तो आयु मुझे छोड़ नहीं रही है ॥ हा कृष्ण द्वारकावासिन् क्वासि संकर्षणानुज । कस्मान्न त्रायसे दुःखान्मां चेमांश्च नरोत्तमान् ॥ २३ ॥ हा द्वारकावासी श्रीकृष्ण! तुम कहाँ हो! बलरामजीके छोटे भैया! मुझको तथा इन नरश्रेष्ठ पाण्डवोंको इस दुःखसे क्यों नहीं बचाते? ॥ २३ ॥ अनादिनिधनं ये त्वामनुध्यायन्ति वै नराः । तांस्त्वं पासीत्ययं वादः स गतो व्यर्थतां कथम् ॥ २४ ॥ 'प्रभो! तुम आदि-अन्तसे रहित हो, जो मनुष्य तुम्हारा निरन्तर स्मरण करते हैं, उन्हें तुम अवश्य संकटसे बचाते हो।' तुम्हारी यह विरद व्यर्थ कैसे हो रही है? ॥ २४ ॥ इमे सद्धर्ममाहात्म्ययशोवीर्यानुवर्तिनः । नार्हन्ति व्यसनं भोक्तुं नन्वेषां क्रियतां दया ॥ २५ ॥
ये मेरे पुत्र उत्तम धर्म, महात्मा पुरुषोंके शील-स्वभाव, यश और पराक्रमका अनुसरण करनेवाले हैं, अतः कष्ट भोगनेके योग्य नहीं हैं; भगवन्! इनपर तो दया करो ॥ २५ ॥
सेयं नीत्यर्थविज्ञेषु भीष्मद्रोणकृपादिषु ।
स्थितेषु कुलनाथेषु कथमापदुपागता ॥ २६ ॥
नीतिके अर्थको जाननेवाले परम विद्वान् भीष्म, द्रोण और कृपाचार्य आदिके, जो इस कुलके रक्षक हैं, उनके रहते हुए यह विपत्ति हमपर क्यों आयी? ॥ २६ ॥
हा पाण्डो हा महाराज क्वासि किं समुपेक्षसे ।
पुत्रान् विवास्यतः साधूनरिभिर्धूतनिर्जितान् ॥ २७ ॥
हा महाराज पाण्डु! कहाँ हो? आज तुम्हारे श्रेष्ठ पुत्रोंको शत्रुओंने जूएमें जीतकर वनवास दे दिया है, तुम क्यों इनकी दुरवस्थाकी उपेक्षा कर रहे हो? ॥ २७ ॥
सहदेव निवर्तस्व ननु त्वमसि मे प्रियः ।
शरीरादपि माद्रेय मा मा त्याक्षीः कुपुत्रवत् ॥ २८ ॥
माद्रीनन्दन सहदेव! तुम मुझे अपने शरीरसे भी अधिक प्रिय हो। बेटा! लौट आओ। कुपुत्रकी भाँति मेरा त्याग न करो ॥ २८ ॥
व्रजन्तु भ्रातरस्तेऽमी यदि सत्याभिसंधिनः ।
मत्परित्राणजं धर्ममिहैव त्वमवाप्नुहि ॥ २९ ॥
तुम्हारे ये भाई यदि सत्यधर्मके पालनका आग्रह रखकर वनमें जा रहे हैं तो जायें; तुम यहीं रहकर मेरी रक्षाजनित धर्मका लाभ लो ॥ २९ ॥
एवं विलपतीं कुन्तीमभिवाद्य प्रणम्य च ।
पाण्डवा विगतानन्दा वनायैव प्रवव्रजुः ॥ ३० ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**इस प्रकार विलाप करती हुई माता कुन्तीको अभिवादन एवं प्रणाम करके पाण्डवलोग दुःखी हो वनको चले गये ॥ ३० ॥
विदुरश्चापि तामार्तां कुन्तीमाश्वास्य हेतुभिः ।
प्रावेशयद् गृहं क्षत्ता स्वयमार्ततरः शनैः ॥ ३१ ॥
विदुरजी शोकाकुला कुन्तीको अनेक प्रकारकी युक्तियोंद्वारा धीरज बँधाकर उन्हें धीरे-धीरे अपने घर ले गये। उस समय वे स्वयं भी बहुत दुःखी थे ॥ ३१ ॥