महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
(ततः सम्प्रस्थिते तत्र धर्मराजे तदा नृपे । जनाः समस्तास्तं द्रष्टुं समारुरुहुरातुराः ।। ततः प्रासादवर्याणि विमानशिखराणि च । गोपुराणि च सर्वाणि वृक्षानन्यांश्च सर्वशः ।। अधिरुह्य जनः श्रीमानुदासीनो व्यलोकयत् । तदनन्तर धर्मराज युधिष्ठिर जब वनकी ओर प्रस्थित हुए, तब उस नगरके समस्त निवासी दुःखसे आतुर हो उन्हें देखनेके लिये महलों, मकानकी छतों, समस्त गोपुरों और वृक्षोंपर चढ़ गये। वहाँसे सब लोग उदास होकर उन्हें देखने लगे। न हि रथ्यास्ततः शक्या गन्तुं बहुजनाकुलाः ।। आरुह्य ते स्म तान्यत्र दीनाः पश्यन्ति पाण्डवम् । उस समय सड़कें मनुष्योंकी भारी भीड़से इतनी भर गयी थीं कि उनपर चलना असम्भव हो गया था। इसीलिये लोग ऊँचे चढ़कर अत्यन्त दीनभावसे पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरको देख रहे थे ।। पदातिं वर्जितच्छत्रं चेलभूषणवर्जितम् ।। वल्कलाजिनसंवीतं पार्थं दृष्ट्वा जनास्तदा । ऊचुर्बहुविधा वाचो भृशोपहतचेतसः ।। कुन्तीनन्दन युधिष्ठिर छत्ररहित एवं पैदल ही चल रहे थे। उनके शरीरपर राजोचित वस्त्रों और आभूषणोंका भी अभाव था। वे वल्कल और मृगचर्म पहने हुए थे। उन्हें इस
दशामें देखकर लोगोंके हृदयमें गहरी चोट पहुँची और वे सब लोग नाना प्रकारकी बातें करने लगे।
जना ऊचुः
यं यान्तमनुयाति स्म चतुरङ्गबलं महत् । तमेवं कृष्णया सार्धमनुयान्ति स्म पाण्डवाः ॥ चत्वारो भ्रातरश्चैव पुरोधाश्च विशाम्पतिम् । नगरनिवासी मनुष्य बोले—अहो! यात्रा करते समय जिनके पीछे विशाल चतुरंगिणी सेना चलती थी, आज वे ही राजा युधिष्ठिर इस प्रकार जा रहे हैं और उनके पीछे द्रौपदीके साथ केवल चार भाई पाण्डव तथा पुरोहित चल रहे हैं।
या न शक्या पुरा द्रष्टुं भूतैराकाशगैरपि ।। तामद्य कृष्णां पश्यन्ति राजमार्गगता जनाः । जिसे आजसे पहले आकाशचारी प्राणीतक नहीं देख पाते थे, उसी द्रुपदकुमारी कृष्णाको अब सड़कपर चलनेवाले साधारण लोग भी देख रहे हैं।
अङ्गरागोचितां कृष्णां रक्तचन्दनसेविनीम् ।। वर्षमुष्णं च शीतं च नेष्यत्याशु विवर्णताम् । सुकुमारी द्रौपदीके अंगोंमें दिव्य अंगराग शोभा पाता था। वह लाल चन्दनका सेवन करती थी, परंतु अब वनमें सर्दी, गर्मी और वर्षा लगनेसे उसकी अंगकान्ति शीघ्र ही फीकी पड़ जायगी।
अद्य नूनं पृथा देवी सत्त्वमाविश्य भाषते ।। पुत्रान् स्नुषां च देवी तु द्रष्टुमद्याथ नार्हति ।। निश्चय ही आज कुन्तीदेवी बड़े भारी धैर्यका आश्रय लेकर अपने पुत्रों और पुत्रवधूसे वार्तालाप करती हैं; अन्यथा इस दशामें वे इनकी ओर देख भी नहीं सकतीं।
निर्गुणस्यापि पुत्रस्य कथं स्याद् दुःखदर्शनम् । किं पुनर्यस्य लोकोऽयं जितो वृत्तेन केवलम् ।। गुणहीन पुत्रका भी दुःख मातासे कैसे देखा जायगा; फिर जिस पुत्रके सदाचारमात्रसे यह सारा संसार वशीभूत हो जाता है, उसपर कोई दुःख आये तो उसकी माता वह कैसे देख सकती है?
आनृशंस्यमनुक्रोशो धृतिः शीलं दमः शमः । पाण्डवं शोभयन्त्येते षड् गुणाः पुरुषोत्तमम् ।। तस्मात् तस्योपघातेन प्रजाः परमपीडिताः । पुरुषरत्न पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरको कोमलता, दया, धैर्य, शील, इन्द्रियसंयम और मनोनिग्रह—ये छः सद्गुण सुशोभित करते हैं। अतः उनकी हानिसे आज सारी प्रजाको
बड़ी पीड़ा हो रही है। औदकानीव सत्त्वानि ग्रीष्मे सलिलसंक्षयात् ।। पीडया पीडितं सर्वं जगत् तस्य जगत्पतेः । मूलस्यैवोपघातेन वृक्षः पुष्पफलोपगः ।। जैसे गर्मीमें जलाशयका पानी घट जानेसे जलचर जीव-जन्तु व्यथित हो उठते हैं एवं जड़ कट जानेसे फल और फूलोंसे युक्त वृक्ष सूखने लगता है, उसी प्रकार सम्पूर्ण जगत्के पालक महाराज युधिष्ठिरकी पीड़ासे सारा संसार पीड़ित हो गया है। मूलं ह्येष मनुष्याणां धर्मराजो महाद्युतिः । पुष्पं फलं च पत्रं च शाखास्तस्येतरे जनाः ।। ते भ्रातर इव क्षिप्रं सपुत्राः सहबान्धवाः । गच्छन्तमनुगच्छामो येन गच्छति पाण्डवः ।। महातेजस्वी धर्मराज युधिष्ठिर मनुष्योंके मूल हैं। जगत्के दूसरे लोग उन्हींकी शाखा, पत्र, पुष्प और फल हैं। आज हम अपने पुत्रों और भाई-बन्धुओंको साथ लेकर चारों भाई पाण्डवोंकी भाँति शीघ्र उसी मार्गसे उनके पीछे-पीछे चलें, जिससे पाण्डुपुत्र युधिष्ठिर जा रहे हैं। उद्यानानि परित्यज्य क्षेत्राणि च गृहाणि च । एकदुःखसुखाः पार्थमनुयाम सुधार्मिकम् ।। आज हम अपने खेत, बाग-बगीचे और घर-द्वार छोड़कर परम धर्मात्मा कुन्तीनन्दन युधिष्ठिरके साथ चल दें और उन्हींके सुख-दुःखको अपना सुख-दुःख समझें। समुद्धृतनिधानानि परिध्वस्ताजिराणि च । उपात्तधनधान्यानि हृतसाराणि सर्वशः ।। रजसाप्यवकीर्णानि परित्यक्तानि दैवतैः । मूषकैः परिधावद्भिरुद्बिलैरावृतानि च ।। अपेतोदकधूमानि हीनसम्मार्जनानि च । प्रणष्टबलिकर्मेज्यामन्त्रहोमजपानि च ।। दुष्कालेनेव भग्नानि भिन्नभाजनवन्ति च । अस्मत्त्यक्तानि वेश्मानि सौबलः प्रतिपद्यताम् ।। हम अपने घरोंकी गड़ी हुई निधि निकाल लें। आँगनकी फर्श खोद डालें। सारा धन धान्य साथ ले लें। सारी आवश्यक वस्तुएँ हटा लें। इनमें चारों ओर धूल भर जाय। देवता इन घरोंको छोड़कर भाग जायँ। चूहे बिलसे बाहर निकलकर इनमें चारों ओर दौड़ लगाने लगें। इनमें न कभी आग जले, न पानी रहे और न झाडू ही लगे। यहाँ बलिवैश्वदेव, यज्ञ, मन्त्रपाठ, होम और जप बंद हो जाय। मानो बड़ा भारी अकाल पड़ गया हो, इस प्रकार ये
सारे घर ढह जायँ। इनमें टूटे बर्तन बिखरे पड़े हों और हम सदाके लिये इन्हें छोड़ दें—ऐसी दशामें इन घरोंपर कपटी सुबलपुत्र शकुनि आकर अधिकार कर ले। वनं नगरमद्यास्तु यत्र गच्छन्ति पाण्डवाः। अस्माभिश्च परित्यक्तं पुरं सम्पद्यतां वनम्॥ अब जहाँ पाण्डव जा रहे हैं, वह वन ही नगर हो जाय और हमारे छोड़ देनेपर यह नगर ही वनके रूपमें परिणत हो जाय। बिलानि दंष्ट्रिणः सर्वे वनानि मृगपक्षिणः। त्यजन्त्वस्मद्भयाद् भीता गजाः सिंहा वनान्यपि॥ वनमें हमलोगोंके भयसे साँप अपने बिल छोड़कर भाग जायँ, मृग और पक्षी जंगलोंको छोड़ दें तथा हाथी और सिंह भी वहाँसे दूर चले जायँ। अनाक्रान्तं प्रपद्यन्तु सेव्यमानं त्यजन्तु च। तृणमाषफलादानां देशांस्त्यक्त्वा मृगद्विजाः॥ वयं पार्थैर्वने सम्यक् सह वत्स्याम निर्वृताः। हमलोग तृण (साग-पात), अन्न और फलका उपयोग करनेवाले हैं। जंगलके हिंसक पशु और पक्षी हमारे रहनेके स्थानोंको छोड़कर चले जायँ। वे ऐसे स्थानका आश्रय लें, जहाँ हम न जायँ और वे उन स्थानोंको छोड़ दें, जिनका हम सेवन करें। हमलोग वनमें कुन्तीपुत्रोंके साथ बड़े सुखसे रहेंगे।
वैशम्पायन उवाच
इत्येवं विविधा वाचो नानाजनसमीरिताः। शुश्राव पार्थः श्रुत्वा च न विचक्रेऽस्य मानसम्॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! इस प्रकार भिन्न-भिन्न मनुष्योंकी कही हुई भाँति-भाँतिकी बातें युधिष्ठिरने सुनीं। सुनकर भी उनके मनमें कोई विकार नहीं आया। ततः प्रासादसंस्थास्तु समन्ताद् वै गृहे गृहे। ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां चैव योषितः॥ ततः प्रासादजालानामुत्पाट्यावरणानि च। ददृशुः पाण्डवान् दीनान् रौरवाजिनवाससः॥ कृष्णां त्वदृष्टपूर्वां तां व्रजन्तीं पद्भिरेव च। एकवस्त्रां रुदन्तीं तां मुक्तकेशीं रजस्वलाम्॥ दृष्ट्वा तदा स्त्रियः सर्वा विवर्णवदना भृशम्। विलप्य बहुधा मोहाद् दुःखशोकेन पीडिताः॥ हा हा धिग् धिग् धिगित्युक्त्वा नेत्रैरश्रूण्यवर्तयन्।)
तदनन्तर चारों ओर महलोंमें रहनेवाली ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रोंकी स्त्रियाँ अपने-अपने भवनोंकी खिड़कियोंके पर्दे हटाकर दीन पाण्डवोंको देखने लगीं। सब पाण्डवोंने मृगचर्ममय वस्त्र धारण कर रखा था। उनके साथ द्रौपदी भी पैदल ही चली जा रही थी। उसे उन स्त्रियोंने पहले कभी नहीं देखा था। उसके शरीरपर एक ही वस्त्र था, केश खुले हुए थे, वह रजस्वला थी और रोती चली जा रही थी। उसे देखकर उस समय सब स्त्रियोंका मुख उदास हो गया। वे क्षोभ एवं मोहके कारण नाना प्रकारसे विलाप करती हुई दुःख-शोकसे पीड़ित हो गयीं और 'हाय हाय! इन धृतराष्ट्रपुत्रोंको बार-बार धिक्कार है, धिक्कार है' ऐसा कहकर नेत्रोंसे आँसू बहाने लगीं।
धार्तराष्ट्रस्त्रियस्ताश्च निखिलेनोपलभ्य तत् । गमनं परिकर्षं च कृष्णाया द्यूतमण्डले ॥ ३२ ॥ रुरुदुः सुस्वनं सर्वा विनिन्दन्त्यः कुरून् भृशम् । दध्युश्च सुचिरं कालं करासक्तमुखाम्बुजाः ॥ ३३ ॥ धृतराष्ट्रपुत्रोंकी स्त्रियाँ द्रौपदीके द्यूतसभामें जाने और उसके वस्त्र खींचे जाने (एवं वनमें जाने) आदिका सारा वृत्तान्त सुनकर कौरवोंकी अत्यन्त निन्दा करती हुई फूट-फूटकर रोने लगीं और अपने मुखारविन्दको हथेलीपर रखकर बहुत देरतक गहरी चिन्तामें डूबी रहीं ॥
राजा च धृतराष्ट्रस्तु पुत्राणामनयं तदा । ध्यायन्नुद्विग्नहृदयो न शान्तिमधिजग्मिवान् ॥ ३४ ॥ उस समय अपने पुत्रोंके अन्यायका चिन्तन करके राजा धृतराष्ट्रका भी हृदय उद्विग्न हो उठा। उन्हें तनिक भी शान्ति नहीं मिली ॥ ३४ ॥
स चिन्तयन्ननेकाग्रः शोकव्याकुलचेतनः । क्षत्तुः सम्प्रेषयामास शीघ्रमागम्यतामिति ॥ ३५ ॥ चिन्तामें पड़े-पड़े उनकी एकाग्रता नष्ट हो गयी। उनका चित्त शोकसे व्याकुल हो रहा था। उन्होंने विदुरके पास संदेश भेजा कि तुम शीघ्र मेरे पास चले आओ ॥ ३५ ॥
ततो जगाम विदुरो धृतराष्ट्रनिवेशनम् । तं पर्यपृच्छत् संविग्नो धृतराष्ट्रो जनाधिपः ॥ ३६ ॥ तब विदुर राजा धृतराष्ट्रके महलमें गये। उस समय महाराज धृतराष्ट्रने अत्यन्त उद्विग्न होकर उनसे पूछा ॥
इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि अनुद्यूतपर्वणि द्रौपदीकुन्तीसंवादे एकोनाशीतितमोऽध्यायः ॥ ७९ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत अनुद्यूतपर्वमें द्रौपदीकुन्तीसंवादविषयक उनासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७९ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके २९ श्लोक मिलाकर कुल ६५ श्लोक हैं)
वनगमनके समय पाण्डवोंकी चेष्टा और प्रजाजनोंकी शोकातुरताके विषयमें धृतराष्ट्र तथा विदुरका संवाद और शरणागत कौरवोंको द्रोणाचार्यका आश्वासन
अशीतितमोऽध्यायः
वनगमनके समय पाण्डवोंकी चेष्टा और प्रजाजनोंकी शोकातुरताके विषयमें धृतराष्ट्र तथा विदुरका संवाद और शरणागत कौरवोंको द्रोणाचार्यका आश्वासन
वैशम्पायन उवाच
तमागतमथो राजा विदुरं दीर्घदर्शिनम् ।
साशङ्क इव पप्रच्छ धृतराष्ट्रोऽम्बिकासुतः ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! दूरदर्शी विदुरजीके आनेपर अम्बिकानन्दन राजा धृतराष्ट्रने शंकित-सा होकर पूछा ॥ १ ॥
धृतराष्ट्र उवाच
कथं गच्छति कौन्तेयो धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः ।
भीमसेनः सव्यसाची माद्रीपुत्रौ च पाण्डवौ ॥ २ ॥
**धृतराष्ट्र बोले—**विदुर! कुन्तीनन्दन धर्मपुत्र युधिष्ठिर किस प्रकार जा रहे हैं? भीमसेन, अर्जुन, नकुल और सहदेव—ये चारों पाण्डव भी किस प्रकार यात्रा करते हैं? ॥ २ ॥
धौम्यश्चैव कथं क्षत्तर्द्रौपदी च यशस्विनी ।
श्रोतुमिच्छाम्यहं सर्वं तेषां शंस विचेष्टितम् ॥ ३ ॥
पुरोहित धौम्य तथा यशस्विनी द्रौपदी भी कैसे जा रही है? मैं उन सबकी पृथक्-पृथक् चेष्टाओंको सुनना चाहता हूँ, तुम मुझसे कहो ॥ ३ ॥
विदुर उवाच
वस्त्रेण संवृत्य मुखं कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ।
बाहू विशालौ सम्पश्यन् भीमो गच्छति पाण्डवः ॥ ४ ॥
**विदुर बोले—**कुन्तीनन्दन युधिष्ठिर वस्त्रसे मुँह ढँककर जा रहे हैं। पाण्डुकुमार भीमसेन अपनी विशाल भुजाओंकी ओर देखते हुए जाते हैं ॥ ४ ॥
सिकता वपन् सव्यसाची राजानमनुगच्छति ।
माद्रीपुत्रः सहदेवो मुखमालिप्य गच्छति ॥ ५ ॥
सव्यसाची अर्जुन बालू बिखेरते हुए राजा युधिष्ठिरके पीछे-पीछे जा रहे हैं। माद्रीकुमार सहदेव अपने मुँहपर मिट्टी पोतकर जाते हैं ॥ ५ ॥
पांसूपलिप्तसर्वाङ्गो नकुलश्चित्तविह्वलः ।
दर्शनीयतमो लोके राजानमनुगच्छति ॥ ६ ॥
लोकमें अत्यन्त दर्शनीय मनोहर रूपवाले नकुल अपने सब अंगोंमें धूल लपेटकर व्याकुलचित हो राजा युधिष्ठिरका अनुसरण कर रहे हैं ॥ ६ ॥
कृष्णा तु केशौः प्रच्छाद्य मुखमायतलोचना ।
दर्शनीया प्ररुदती राजानमनुगच्छति ॥ ७ ॥
परम सुन्दरी विशाललोचना कृष्णा अपने केशोंसे ही मुँह ढँककर रोती हुई राजाके पीछे-पीछे जा रही है ॥ ७ ॥
धौम्यो रौद्राणि सामानि याम्यानि च विशाम्पते ।
गायन् गच्छति मार्गेषु कुशानादाय पाणिना ॥ ८ ॥
महाराज! पुरोहित धौम्यजी हाथमें कुश लेकर रुद्र तथा यमदेवतासम्बन्धी साम-मन्त्रोंका गान करते हुए आगे-आगे मार्गपर चल रहे हैं ॥ ८ ॥
धृतराष्ट्र उवाच
विविधानीह रूपाणि कृत्वा गच्छन्ति पाण्डवाः ।
तन्ममाचक्ष्व विदुर कस्मादेवं व्रजन्ति ते ॥ ९ ॥
धृतराष्ट्रने पूछा—विदुर! पाण्डवलोग यहाँ जो भिन्न-भिन्न प्रकारकी चेष्टाएँ करते हुए यात्रा कर रहे हैं, उसका क्या रहस्य है, यह बताओ। वे क्यों इस प्रकार जा रहे हैं? ॥
विदुर उवाच
निकृतस्यापि ते पुत्रैर्हृते राज्ये धनेषु च ।
न धर्माच्चलते बुद्धिर्धर्मराजस्य धीमतः ॥ १० ॥
विदुर बोले—महाराज! यद्यपि आपके पुत्रोंने छलपूर्ण बर्ताव किया है। पाण्डवोंका राज्य और धन सब कुछ चला गया है तो भी परम बुद्धिमान् धर्मराज युधिष्ठिरकी बुद्धि धर्मसे विचलित नहीं हो रही है ॥ १० ॥
योऽसौ राजा घृणी नित्यं धार्तराष्ट्रेषु भारत ।
निकृत्या भ्रंशितः क्रोधान्नोन्मीलयति लोचने ॥ ११ ॥
भारत! राजा युधिष्ठिर आपके पुत्रोंपर सदा दयाभाव बनाये रखते थे, किंतु इन्होंने छलपूर्ण जूएका आश्रय लेकर उन्हें राज्यसे वंचित किया है, इससे उनके मनमें बड़ा क्रोध है और इसीलिये वे अपनी आँखोंको नहीं खोलते हैं ॥
नाहं जनं निर्दहेयं दृष्ट्वा घोरेण चक्षुषा ।
स पिधाय मुखं राजा तस्माद् गच्छति पाण्डवः ॥ १२ ॥
‘मैं भयानक दृष्टिसे देखकर किसी (निरपराधी) मनुष्यको भस्म न कर डालूँ' इसी भयसे पाण्डुपुत्र राजा युधिष्ठिर अपना मुँह ढँककर जा रहे हैं ॥ १२ ॥
यथा च भीमो व्रजति तन्मे निगदतः शृणु ।
बाह्वोर्बले नास्ति समो ममेति भरतर्षभ ॥ १३ ॥
अब भीमसेन जिस प्रकार चल रहे हैं, उसका रहस्य बताता हूँ, सुनिये! भरतश्रेष्ठ! उन्हें इस बातका अभिमान है कि बाहुबलमें मेरे समान दूसरा कोई नहीं है ।। १३ ।।
बाहू विशालौ कृत्वासौ तेन भीमोऽपि गच्छति ।
बाहू विदशर्यन् राजन् बाहुद्रविणदर्पितः ।। १४ ।।
चिकीर्षन् कर्म शत्रुभ्यो बाहुद्रव्यानुरूपतः ।
इसीलिये वे अपनी विशाल भुजाओंकी ओर देखते हुए यात्रा करते हैं। राजन्! अपने बाहुबलरूपी वैभवपर उन्हें गर्व है। अतः वे अपनी दोनों भुजाएँ दिखाते हुए शत्रुओंसे बदला लेनेके लिये अपने बाहुबलके अनुरूप ही पराक्रम करना चाहते हैं ।। १४ १/२ ।।
प्रदिशञ्छरसम्पातान् कुन्तीपुत्रोऽर्जुनस्तदा ।। १५ ।।
सिकता वपन् सव्यसाची राजानमनुगच्छति ।
असक्ताः सिकतास्तस्य यथा सम्प्रति भारत ।
असक्तं शरवर्षाणि तथा मोक्ष्यति शत्रुषु ।। १६ ।।
कुन्तीपुत्र सव्यसाची अर्जुन उस समय राजाके पीछे-पीछे जो बालू बिखेरते हुए यात्रा कर रहे थे, उसके द्वारा वे शत्रुओंपर बाण बरसानेकी अभिलाषा व्यक्त करते थे। भारत! इस समय उनके गिराये हुए बालूके कण जैसे आपसमें संसक्त न होते हुए लगातार गिरते हैं, उसी प्रकार वे शत्रुओंपर परस्पर संसक्त न होनेवाले असंख्य बाणोंकी वर्षा करेंगे ।। १५-१६ ।।
न मे कश्चिद् विजानीयान्मुखमद्येति भारत ।
मुखमालिप्य तेनासौ सहदेवोऽपि गच्छति ।। १७ ।।
भारत! 'आज इस दुर्दिनमें कोई मेरे मुँहको पहचान न ले' यही सोचकर सहदेव अपने मुँहमें मिट्टी पोतकर जा रहे हैं ।। १७ ।।
नाहं मनांस्याददेयं मार्गे स्त्रीणामिति प्रभो ।
पांसुलिप्तसर्वाङ्गो नकुलस्तेन गच्छति ।। १८ ।।
प्रभो! 'मार्गमें मैं स्त्रियोंका चित्त न चुरा लूँ' इस भयसे नकुल अपने सारे अंगोंमें धूल लगाकर यात्रा करते हैं ।। १८ ।।
एकवस्त्रा प्ररुदती मुक्तकेशी रजस्वला ।
शोणितेनाक्तवसना द्रौपदी वाक्यमब्रवीत् ।। १९ ।।
द्रौपदीके शरीरपर एक ही वस्त्र था, उसके बाल खुले हुए थे, वह रजस्वला थी और उसके कपड़ोंमें रक्त (रज)-का दाग लगा हुआ था, उसने रोते हुए यह बात कही थी ।। १९ ।।
यत्कृतेऽहमिदं प्राप्ता तेषां वर्षे चतुर्दशे ।
हतपतयो हतसुता हतबन्धुजनप्रियाः ।। २० ।।
बहुशोणितदिग्धाङ्ग्यो मुक्तकेशयो रजस्वलाः ।
एवं कृतोदका भार्याः प्रवेक्ष्यन्ति गजाह्वयम् ॥ २१ ॥ 'जिनके अन्यायसे आज मैं इस दशाको पहुँची हूँ, आजके चौदहवें वर्षमें उनकी स्त्रियाँ भी अपने पति, पुत्र और बन्धु-बान्धवोंके मारे जानेसे उनकी लाशोंके पास लोट-लोटकर रोयेंगी और अपने अंगोंमें रक्त तथा धूल लपेटे, बाल खोले हुए, अपने सगे-सम्बन्धियोंको तिलांजलि दे इसी प्रकार हस्तिनापुरमें प्रवेश करेंगी' ॥ २०-२१ ॥
कृत्वा तु नैर्ऋतान् दर्भान् धीरो धौम्यः पुरोहितः । सामानि गायन् याम्यानि पुरतो याति भारत ॥ २२ ॥ भारत! धीरस्वभाववाले पुरोहित धौम्यजी कुशोंका अग्रभाग नैर्ऋत्यकोणकी ओर करके यमदेवतासम्बन्धी साम-मन्त्रोंका गान करते हुए पाण्डवोंके आगे-आगे जा रहे हैं ॥
हतेषु भारतेष्वाजौ कुरूणां गुरवस्तदा । एवं सामानि गास्यन्तीत्युक्त्वा धौम्योऽपि गच्छति ॥ २३ ॥ धौम्यजी यह कहकर गये थे कि युद्धमें कौरवोंके मारे जानेपर उनके गुरु भी इसी प्रकार कभी सामगान करेंगे ॥
हा हा गच्छन्ति नो नाथाः समवेक्षध्वमीदृशम् । अहो धिक् कुरुवृद्धानां बालानामिव चेष्टितम् ॥ २४ ॥ राष्ट्रेभ्यः पाण्डुदायादाँल्लोभान्निर्वासयन्ति ये । अनाथाः स्म वयं सर्वे वियुक्ताः पाण्डुनन्दनैः ॥ २५ ॥ दुर्विनीतेषु लुब्धेषु का प्रीतिः कौरवेषु नः । इति पौराः सुदुःखार्ताः क्रोशन्ति स्म पुनः पुनः ॥ २६ ॥ महाराज! उस समय नगरके लोग अत्यन्त दुःखसे आतुर हो बार-बार चिल्लाकर कह रहे थे कि 'हाय! हाय! हमारे स्वामी पाण्डव चले जा रहे हैं। अहो! कौरवोंमें जो बड़े-बूढ़े लोग हैं, उनकी यह बालकोंकी-सी चेष्टा तो देखो। धिक्कार है उनके इस बर्तावको! ये कौरव लोभवश महाराज पाण्डुके पुत्रोंको राज्यसे निकाल रहे हैं। इन पाण्डुपुत्रोंसे वियुक्त होकर हम सब लोग आज अनाथ हो गये। इन लोभी और उद्दण्ड कौरवोंके प्रति हमारा प्रेम कैसे हो सकता है? ॥ २४—२६ ॥
एवमाकारलिङ्गैस्ते व्यवसायं मनोगतम् । कथयन्तश्च कौन्तेया वनं जग्मुर्मनस्विनः ॥ २७ ॥ महाराज! इस प्रकार मनस्वी कुन्तीपुत्र अपनी आकृति एवं चिह्नोंके द्वारा अपने आन्तरिक निश्चयको प्रकट करते हुए वनको गये हैं ॥ २७ ॥
एवं तेषु नराग्र्येषु निर्यत्सु गजसाह्वयात् । अनभ्रे विद्युतश्चासन् भूमिश्च समकम्पत ॥ २८ ॥ राहुरग्रसदादित्यमपर्वणि विशाम्पते । उल्का चाप्यपसव्येन पुरं कृत्वा व्यशीर्यत ॥ २९ ॥
हस्तिनापुरसे उन नरश्रेष्ठ पाण्डवोंके निकलते ही बिना बादलके बिजली गिरने लगी, पृथ्वी काँप उठी। राजन्! बिना पर्व (अमावस्या)-के ही राहुने सूर्यको ग्रस लिया था और नगरको दायें रखकर उल्का गिरी थी ॥
प्रत्याहरन्ति क्रव्यादा गृध्रगोमायुवायसाः । देवायतनचैत्येषु प्राकाराट्टालकेषु च ॥ ३० ॥ गीध, गीदड़ और कौवे आदि मांसाहारी जन्तु नगरके मन्दिरों, देववृक्षों, चहारदीवारी तथा अट्टालिकाओंपर मांस और हड्डी आदि लाकर गिराने लगे थे ॥ ३० ॥
एवमेते महोत्पाताः प्रादुरासन् दुरासदाः । भरतानामभावाय राजन् दुर्मन्त्रिते तव ॥ ३१ ॥ राजन्! इस प्रकार आपकी दुर्मन्त्रणाके कारण ऐसे-ऐसे अपशकुनरूप दुर्दम्य एवं महान् उत्पात प्रकट हुए हैं, जो भरतवंशियोंके विनाशकी सूचना दे रहे हैं ॥ ३१ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवं प्रवदतोरेव तयोस्तत्र विशाम्पते । धृतराष्ट्रस्य राज्ञश्च विदुरस्य च धीमतः ॥ ३२ ॥ नारदश्च सभामध्ये कुरूणामग्रतः स्थितः । महर्षिभिः परिवृतो रौद्रं वाक्यमुवाच ह ॥ ३३ ॥ **वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! इस प्रकार राजा धृतराष्ट्र और बुद्धिमान् विदुर जब दोनों वहाँ बातचीत कर रहे थे, उसी समय सभामें महर्षियोंसे घिरे हुए देवर्षि नारद कौरवोंके सामने आकर खड़े हो गये और यह भयंकर वचन बोले— ॥ ३२-३३ ॥
इतश्चतुर्दशे वर्षे विनङ्क्ष्यन्तीह कौरवाः । दुर्योधनापराधेन भीमार्जुनबलेन च ॥ ३४ ॥ 'आजसे चौदहवें वर्षमें दुर्योधनके अपराधसे भीम और अर्जुनके पराक्रमद्वारा कौरवकुलका नाश हो जायगा' ॥
इत्युक्त्वा दिवमाक्रम्य क्षिप्रमन्तरधीयत । ब्राह्मीं श्रियं सुविपुलां बिभ्रद् देवर्षिसत्तमः ॥ ३५ ॥ ऐसा कहकर विशाल ब्रह्मतेज धारण करनेवाले देवर्षि-प्रवर नारद आकाशमें जाकर सहसा अन्तर्धान हो गये ॥
(धृतराष्ट्र उवाच)
किमब्रुवन् नागरिकाः किं वै जानपदा जनाः । मह्यं तत्त्वेन चाचक्ष्व क्षत्तः सर्वमशेषतः ॥ **धृतराष्ट्रने पूछा—**विदुर! जब पाण्डव वनको जाने लगे, उस समय नगर और देशके लोग क्या कह रहे थे, ये सब बातें मुझे पूर्णरूपसे ठीक-ठीक बताओ।
विदुर उवाच ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्रा येऽन्ये वदन्त्यथ । तच्छृणुष्व महाराज वक्ष्यते च मया तव ॥ **विदुर बोले—**महाराज! ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र तथा अन्यलोग इस घटनाके सम्बन्धमें जो कुछ कहते हैं, वह सुनिये, मैं आपसे सब बातें बता रहा हूँ। हा हा गच्छन्ति नो नाथाः समवेक्षध्वमीदृशम् । इति पौराः सुदुःखार्ताः शोचन्ति स्म समन्ततः ॥ पाण्डवोंके जाते समय समस्त पुरवासी दुःखसे आतुर हो सब ओर शोकमें डूबे हुए थे और इस प्रकार कह रहे थे—‘हाय! हाय! हमारे स्वामी, हमारे रक्षक वनमें चले जा रहे हैं। भाइयो! देखो, धृतराष्ट्रके पुत्रोंका यह कैसा अन्याय है?’ तदहृष्टमिवाकूजं गतोत्सवमिवाभवत् । नगरं हास्तिनपुरं सस्त्रीवृद्धकुमारकम् ॥ स्त्री, बालक और वृद्धोंसहित सारा हस्तिनापुर नगर हर्षरहित, शब्दशून्य तथा उत्सवहीन-सा हो गया। सर्वे चासन् निरुत्साहा व्याधिना बाधिता यथा ॥ पार्थात् प्रति नरा नित्यं चिन्ताशोकपरायणाः । तत्र तत्र कथां चक्रुः समासाद्य परस्परम् ॥ सब लोग कुन्तीपुत्रोंके लिये निरन्तर चिन्ता एवं शोकमें निमग्न हो उत्साह खो बैठे थे। सबकी दशा रोगियोंके समान हो गयी थी। सब एक-दूसरेसे मिलकर जहाँ-तहाँ पाण्डवोंके विषयमें ही वार्तालाप करते थे। वनं गते धर्मराजे दुःखशोकपरायणाः । बभूवुः कौरवा वृद्धा भृशं शोकेन पीडिताः ॥ धर्मराजके वनमें चले जानेपर समस्त वृद्ध कौरव भी अत्यन्त शोकसे व्यथित हो दुःख और चिन्तामें निमग्न हो गये। ततः पौरजनः सर्वः शोचन्नास्ते जनाधिपम् । कुर्वाणाश्च कथास्तत्र ब्राह्मणाः पार्थिवं प्रति ॥ तदनन्तर समस्त पुरवासी राजा युधिष्ठिरके लिये शोकाकुल हो गये। उस समय वहाँ ब्राह्मणलोग राजा युधिष्ठिरके विषयमें निम्नांकित बातें करने लगे।
ब्राह्मणा ऊचुः कथं नु राजा धर्मात्मा वने वसति निर्जने । तस्यानुजाश्च ते नित्यं कृष्णा च द्रुपदात्मजा ॥ सुखार्हापि च दुःखार्ता कथं वसति सा वने ॥
**ब्राह्मणोंने कहा—**हाय! धर्मात्मा राजा युधिष्ठिर और उनके भाई निर्जन वनमें कैसे रहेंगे? तथा द्रुपदकुमारी कृष्णा तो सुख भोगनेके ही योग्य है, वह दुःखसे आतुर हो वनमें कैसे रहेगी।
विदुर उवाच
एवं पौराश्च विप्राश्च सदाराः सहपुत्रकाः । स्मरन्तः पाण्डवान् सर्वे बभूवुर्भृशदुःखिताः ॥ **विदुरजी कहते हैं—**राजन्! इस प्रकार पुरवासी ब्राह्मण अपनी स्त्रियों और पुत्रोंके साथ पाण्डवोंका स्मरण करते हुए बहुत दुःखी हो गये। आविद्धा इव शस्त्रेण नाभ्यनन्दन् कथंचन । सम्भाष्यमाणा अपि ते न कंचित् प्रत्यपूजयन् ॥ शस्त्रोंके आघातसे घायल हुए मनुष्योंकी भाँति वे किसी प्रकार सुखी न हो सके। बात कहनेपर भी वे किसीको आदरपूर्वक उत्तर नहीं देते थे। न भुक्त्वा न शयित्वा ते दिवा वा यदि वा निशि । शोकोपहतविज्ञाना नष्टसंज्ञा इवाभवन् ॥ उन्होंने दिन अथवा रातमें न तो भोजन किया और न नींद ही ली; शोकके कारण उनका सारा विज्ञान आच्छादित हो गया था। वे सब-के-सब अचेत-से हो रहे थे। यदवस्था बभूवार्ता ह्यायोध्या नगरी पुरा । रामे वनं गते दुःखाद्धृतराज्ये सलक्ष्मणे ॥ तदवस्थं बभूवार्तमद्येदं गजसाह्वयम् । गते पार्थे वनं दुःखाद्धृतराज्ये सहानुजैः ॥ जैसे त्रेतायुगमें राज्यका अपहरण हो जानेपर लक्ष्मणसहित श्रीरामचन्द्रजीके वनमें चले जानेके बाद अयोध्या नगरी दुःखसे अत्यन्त आतुर हो बड़ी दुरवस्थाको पहुँच गयी थी, वही दशा राज्यके अपहरण हो जानेपर भाइयोंसहित युधिष्ठिरके वनमें चले जानेसे आज हमारे इस हस्तिनापुरकी हो गयी है।
वैशम्पायन उवाच
विदुरस्य वचः श्रुत्वा नागरस्य गिरं च वै । भूयो मुमोह शोकाच्च धृतराष्ट्रः सबान्धवः ॥ **वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! विदुरका कथन और पुरवासियोंकी कही हुई बातें सुनकर बन्धु-बान्धवोंसहित राजा धृतराष्ट्र पुनः शोकसे मूर्च्छित हो गये। ततो दुर्योधनः कर्णः शकुनिश्चापि सौबलः । द्रोणं द्वीपममन्यन्त राज्यं चास्मै न्यवेदयन् ॥ ३६ ॥
तब दुर्योधन, कर्ण और सुबलपुत्र शकुनिने द्रोणको अपना द्वीप (आश्रय) माना और सम्पूर्ण राज्य उनके चरणोंमें समर्पित कर दिया ।। ३६ ।। अथाब्रवीत् ततो द्रोणो दुर्योधनममर्षणम् । दुःशासनं च कर्णं च सर्वानैव च भारतान् ।। ३७ ।। उस समय द्रोणाचार्यने अमर्षशील दुर्योधन, दुःशासन, कर्ण तथा अन्य सब भरतवंशियोंसे कहा— ।। ३७ ।। अवध्यान् पाण्डवान् प्राहुर्देवपुत्रान् द्विजातयः । अहं वै शरणं प्राप्तान् वर्तमानो यथाबलम् ।। ३८ ।। गन्ता सर्वात्मना भक्त्या धार्तराष्ट्रान् सराजकान् । नोत्सहेयं परित्यक्तुं दैवं हि बलवत्तरम् ।। ३९ ।। 'पाण्डव देवताओंके पुत्र हैं, अतः ब्राह्मणलोग उन्हें अवध्य बतलाते हैं। मैं यथाशक्ति सम्पूर्ण हृदयसे तुम्हारे अनुकूल प्रयत्न करता हुआ तुम्हारा साथ दूँगा। भक्तिपूर्वक अपनी शरणमें आये हुए इन राजाओंसहित धृतराष्ट्रपुत्रोंका परित्याग करनेका साहस नहीं कर सकता। दैव ही सबसे प्रबल है ।। ३८-३९ ।। धर्मतः पाण्डुपुत्रा वै वनं गच्छन्ति निर्जिताः । ते च द्वादश वर्षाणि वने वत्स्यन्ति पाण्डवाः ।। ४० ।। 'पाण्डव जूएमं पराजित होकर धर्मके अनुसार वनमें गये हैं। वे वहाँ बारह वर्षोंतक रहेंगे ।। ४० ।। चरितब्रह्मचर्याश्च क्रोधामर्षवशानुगाः । वैरं निर्यातयिष्यन्ति महद् दुःखाय पाण्डवाः ।। ४१ ।। 'वनमें पूर्णरूपसे ब्रह्मचर्यका पालन करके जब वे क्रोध और अमर्षके वशीभूत हो यहाँ लौटेंगे, उस समय वैरका बदला अवश्य लेंगे। उनका वह प्रतीकार हमारे लिये महान् दुःखका कारण होगा ।। ४१ ।। मया च भ्रंशितो राजन् द्रुपदः सखिविग्रहे । पुत्रार्थमयजद् राजा वधाय मम भारत ।। ४२ ।। 'राजन्! मैंने मैत्रीके विषयको लेकर कलह प्रारम्भ होनेपर राजा द्रुपदको उनके राज्यसे भ्रष्ट किया था; भारत! इससे दुःखी होकर उन्होंने मेरे वधके लिये पुत्र प्राप्त करनेकी इच्छासे एक यज्ञका आयोजन किया ।। ४२ ।। याजोपयाजतपसा पुत्रं लेभे स पावकात् । धृष्टद्युम्नं द्रौपदीं च वेदीमध्यात् सुमध्यमाम् ।। ४३ ।। 'याज और उपयाजकी तपस्यासे उन्होंने अग्निसे धृष्टद्युम्न और वेदीके मध्यभागसे सुन्दरी द्रौपदीको प्राप्त किया ।। धृष्टद्युम्नस्तु पार्थानां श्यालः सम्बन्धतो मतः ।
पाण्डवानां प्रियरतस्तस्मान्मां भयमाविशत् ।। ४४ ।।
'धृष्टद्युम्न तो सम्बन्धकी दृष्टिसे कुन्तीपुत्रोंका साला ही है, अतः सदा उनका प्रिय करनेमें लगा रहता है, उसीसे मुझे भय है' ।। ४४ ।।
ज्वालावर्णो देवदत्तो धनुष्मान् कवची शरी ।
मर्त्यधर्मतया तस्मादद्य मे साध्वसो महान् ।। ४५ ।।
'उसके शरीरकी कान्ति अग्निकी ज्वालाके समान उद्भासित होती है। वह देवताका दिया हुआ पुत्र है और धनुष, बाण तथा कवचके साथ प्रकट हुआ है। मरणधर्मा मनुष्य होनेके कारण मुझे अब उससे महान् भय लगता है ।। ४५ ।।
गतो हि पक्षतां तेषां पार्षतः परवीरहा ।
रथातिरथसंख्यायां योऽग्रणीरर्जुनो युवा ।। ४६ ।।
सृष्टप्राणो भृशतरं तेन चेत् संगमो मम ।
किमन्यद् दुःखमधिकं परमं भुवि कौरवाः ।। ४७ ।।
'शत्रुवीरोंका संहार करनेवाला द्रुपदकुमार धृष्टद्युम्न पाण्डवोंके पक्षका पोषक हो गया है। रथियों और अतिरथियोंकी गणनामें जिसका नाम सबसे पहले लिया जाता है, वह तरुण वीर अर्जुन धृष्टद्युम्नके लिये, यदि मेरे साथ उसका युद्ध हुआ तो, लड़कर प्राणतक देनेके लिये उद्यत हो जायगा। कौरवो! (अर्जुनके साथ मुझे लड़ना पड़े) इस पृथ्वीपर इससे बढ़कर महान् दुःख मेरे लिये और क्या हो सकता है? ।। ४६-४७ ।।
धृष्टद्युम्नो द्रोणमृत्युरीति विप्रथितं वचः ।
मद्वधाय श्रुतोऽप्येष लोके चाप्यतिविश्रुतः ।। ४८ ।।
'धृष्टद्युम्न द्रोणकी मौत है, यह बात सर्वत्र फैल चुकी है। मेरे वधके लिये ही उसका जन्म हुआ है। यह भी सब लोगोंने सुन रखा है। धृष्टद्युम्न स्वयं भी संसारमें अपनी वीरताके लिये विख्यात है ।। ४८ ।।
सोऽयं नूनमनुप्राप्तस्त्वत्कृते काल उत्तमः ।
त्वरितं कुरुत श्रेयो नैतदेतावता कृतम् ।। ४९ ।।
'तुम्हारे लिये यह निश्चय ही बहुत उत्तम अवसर प्राप्त हुआ है। शीघ्र ही अपने कल्याण-साधनमें लग जाओ। पाण्डवोंको वनवास दे देनेमात्रसे तुम्हारा अभीष्ट सिद्ध नहीं हो सकता ।। ४९ ।।
मुहूर्तं सुखमेवैतत् तालच्छायेव हैमनी ।
यजध्वं च महायज्ञैर्भोगानश्नीत दत्त च ।। ५० ।।
इतश्चतुर्दशे वर्षे महत् प्राप्स्यथ वैशसम् ।
'यह राज्य तुमलोगोंके लिये शीतकालमें होनेवाली ताड़के पेड़की छायाके समान दो ही घड़ीतक सुख देनेवाला है। अब तुम बड़े-बड़े यज्ञ करो, मनमाने भोग भोगो और इच्छानुसार दान कर लो। आजसे चौदहवें वर्षमें तुम्हें बहुत बड़ी मार-काटका सामना करना पड़ेगा' ।। ५० १/२ ।।
द्रोणस्य वचनं श्रुत्वा धृतराष्ट्रोऽब्रवीदिदम् ।। ५१ ।।
द्रोणाचार्यकी यह बात सुनकर धृतराष्ट्रने कहा— ।। ५१ ।।
सम्यगाह गुरुः क्षत्तरुपावर्तय पाण्डवान् ।
यदि ते न निवर्तन्ते सत्कृता यान्तु पाण्डवाः ।
सशस्त्ररथपादाता भोगवन्तश्च पुत्रकाः ।। ५२ ।।
'विदुर! गुरु द्रोणाचार्यने ठीक कहा है। तुम पाण्डवोंको लौटा लाओ। यदि वे न लौटें तो वे अस्त्र-शस्त्रोंसे युक्त रथियों और पैदल सेनाओंसे सुरक्षित और भोग-सामग्रीसे सम्पन्न हो सत्कारपूर्वक वनमें भ्रमणके लिये जायें; क्योंकि वे भी मेरे पुत्र ही हैं' ।। ५२ ।।
इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि अनुद्यूतपर्वणि विदुरधृतराष्ट्रद्रोणवाक्ये
अशीतितमोऽध्यायः ।। ८० ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत अनुद्यूतपर्वमें विदुर, धृतराष्ट्र और द्रोणके वचनविषयक अस्सीवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ८० ।।
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके १५ श्लोक मिलाकर कुल ६७ श्लोक हैं)
अध्याय (पृष्ठ 2247)
एकाशीतितमोऽध्यायः
धृतराष्ट्रकी चिन्ता और उनका संजयके साथ वार्तालाप
वैशम्पायन उवाच
वनं गतेषु पार्थेषु निर्जितेषु दुरोदरे ।
धृतराष्ट्रं महाराज तदा चिन्ता समाविशत् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! जब पाण्डव जूएमं हारकर वनमें चले गये, तब राजा धृतराष्ट्रको बड़ी चिन्ता हुई ॥ १ ॥
तं चिन्तयानमासीनं धृतराष्ट्रं जनेश्वरम् ।
निःश्वसन्तमनेकाग्रमिति होवाच संजयः ॥ २ ॥
महाराज धृतराष्ट्रको लंबी साँस खींचते और उद्विग्नचित्त होकर चिन्तामें डूबे हुए देख संजयने इस प्रकार कहा ॥ २ ॥
संजय उवाच
अवाप्य वसुसम्पूर्णां वसुधां वसुधाधिप ।
प्रव्राज्य पाण्डवान् राज्याद् राजन् किमनुशोचसि ॥ ३ ॥
संजय बोले— पृथ्वीनाथ! यह धन-रत्नोंसे सम्पन्न वसुधाका राज्य पाकर और पाण्डवोंको अपने देशसे निकालकर अब आप क्यों शोकमग्न हो रहे हैं? ॥ ३ ॥
धृतराष्ट्र उवाच
अशोच्यत्वं कुतस्तेषां येषां वैरं भविष्यति ।
पाण्डवैर्युद्धशौण्डैर्हि बलवद्भिर्महारथैः ॥ ४ ॥
धृतराष्ट्रने कहा— जिन लोगोंका युद्धकुशल बलवान् महारथी पाण्डवोंसे वैर होगा, वे शोकमग्न हुए बिना कैसे रह सकते हैं? ॥ ४ ॥
संजय उवाच
तवेदं स्वकृतं राजन् महद् वैरमुपस्थितम् ।
विनाशो येन लोकस्य सानुबन्धो भविष्यति ॥ ५ ॥
संजय बोले— राजन्! यह आपकी अपनी ही की हुई करतूत है, जिससे यह महान् वैर उपस्थित हुआ है और इसीके कारण सम्पूर्ण जगत्का सगे-सम्बन्धियों-सहित विनाश हो जायगा ॥ ५ ॥
वार्यमाणो हि भीष्मेण द्रोणेन विदुरेण च ।
पाण्डवानां प्रियां भार्यां द्रौपदीं धर्मचारिणीम् ॥ ६ ॥
प्राहिणोदानयेहेति पुत्रो दुर्योधनस्तव ।
सूतपुत्रं सुमन्दात्मा निर्लज्जः प्रातिकामिनम् ॥ ७ ॥
भीष्म, द्रोण और विदुरने बार-बार मना किया तो भी आपके मूढ़ और निर्लज्ज पुत्र दुर्योधनने सूतपुत्र प्रातिकामी-को यह आदेश देकर भेजा कि तुम पाण्डवोंकी प्यारी पत्नी धर्मचारिणी द्रौपदीको सभामें ले आओ ॥ ६-७ ॥
यस्मै देवाः प्रयच्छन्ति पुरुषाय पराभवम् ।
बुद्धिं तस्यापकर्षन्ति सोऽवाचीनानि पश्यति ॥ ८ ॥
बुद्धौ कलुषभूतायां विनाशे समुपस्थिते ।
अनयो नयसंकाशो हृदयान्नापसर्पति ॥ ९ ॥
देवतालोग जिस पुरुषको पराजय देना चाहते हैं, उसकी बुद्धि ही पहले हर लेते हैं, इससे वह सब कुछ उलटा ही देखने लगता है। विनाशकाल उपस्थित होनेपर जब बुद्धि मलिन हो जाती है, उस समय अन्याय ही न्यायके समान जान पड़ता है और वह हृदयसे किसी प्रकार नहीं निकलता ॥ ८-९ ॥
अनर्थाश्चार्थरूपेण अर्थाश्चानर्थरूपिणः ।
उत्तिष्ठन्ति विनाशाय नूनं तच्चास्य रोचते ॥ १० ॥
उस समय उस पुरुषके विनाशके लिये अनर्थ ही अर्थरूपसे और अर्थ भी अनर्थरूपसे उसके सामने उपस्थित होते हैं और निश्चय ही अर्थरूपमें आया हुआ अनर्थ ही उसे अच्छा लगता है ॥ १० ॥
न कालो दण्डमुद्यम्य शिरः कृन्तति कस्यचित् ।
कालस्य बलमेतावद् विपरीतार्थदर्शनम् ॥ ११ ॥
काल डंडा या तलवार लेकर किसीका सिर नहीं काटता। कालका बल इतना ही है कि वह प्रत्येक वस्तुके विषयमें मनुष्यकी विपरीत बुद्धि कर देता है ॥ ११ ॥
आसादितमिदं घोरं तुमुलं लोमहर्षणम् ।
पाञ्चालीमपकर्षद्भिः सभामध्ये तपस्विनीम् ॥ १२ ॥
अयोनिजां रूपवतीं कुले जातां विभावसोः ।
को नु तां सर्वधर्मज्ञां परिभूय यशस्विनीम् ॥ १३ ॥
पर्यानयेत् सभामध्ये विना दुर्धूतदेविनम् ।
स्त्रीधर्मिणी वरारोहा शोणितेन परिप्लुता ॥ १४ ॥
एकवस्त्राथ पाञ्चाली पाण्डवानभ्यवैक्षत ।
हतस्वान् हतराज्यांश्च हतवस्त्रान् हतश्रियः ॥ १५ ॥
विहीनान् सर्वकामेभ्यो दासभावमुपागतान् ।
धर्मपाशपरिक्षिप्तानशक्तानिव विक्रमे ॥ १६ ॥
पांचालराजकुमारी द्रौपदी तपस्विनी है। उसका जन्म किसी मानवी स्त्रीके गर्भसे नहीं हुआ है, वह अग्निके कुलमें उत्पन्न हुई और अनुपम सुन्दरी है। वह सब धर्मोंको जाननेवाली तथा यशस्विनी है। उसे भरी सभामें खींचकर लानेवाले दुष्टोंने भयंकर तथा रोंगटे खड़े कर देनेवाले घमासान युद्धकी सम्भावना उत्पन्न कर दी है। अधर्मपूर्वक जूआ खेलनेवाले दुर्योधनके सिवा कौन है, जो द्रौपदीको सभामें बुला सके। सुन्दर शरीरवाली पांचालराजकुमारी स्त्रीधर्मसे युक्त (रजस्वला) थी। उसका वस्त्र रक्तसे सना हुआ था। वह एक ही साड़ी पहने हुए थी। उसने सभामें आकर पाण्डवोंको देखा। उन पाण्डवोंके धन, राज्य, वस्त्र और लक्ष्मी सबका अपहरण हो चुका था। वे सम्पूर्ण मनोवांछित भोगोंसे वंचित हो दासभावको प्राप्त हो गये थे। धर्मके बन्धनमें बँधे रहनेके कारण वे पराक्रम दिखानेमें भी असमर्थ-से हो रहे थे ॥ १२—१६ ॥
क्रुद्धां चानर्हतीं कृष्णां दुःखितां कुरुसंसदि ।
दुर्योधनश्च कर्णश्च कटुकान्यभ्यभाषताम् ॥ १७ ॥
उनकी यह दशा देखकर कृष्णा क्रोध और दुःखमें डूब गयी। वह तिरस्कारके योग्य कदापि न थी, तो भी कौरवोंकी सभामें दुर्योधन और कर्णने उसे कटु वचन सुनाये ॥
इति सर्वमिदं राजन्नाकुलं प्रतिभाति मे ।
राजन्! ये सारी बातें मुझे महान् दुःखको निमन्त्रण देनेवाली जान पड़ती हैं ॥ १७ ½ ॥
धृतराष्ट्र उवाच
तस्याः कृपणचक्षुर्भ्यां प्रदहेतापि मेदिनी ॥ १८ ॥
**धृतराष्ट्रने कहा—**संजय! द्रौपदीके उन दीनतापूर्ण नेत्रोंद्वारा यह सारी पृथ्वी दग्ध हो सकती थी ॥ १८ ॥
अपि शेषं भवेदद्य पुत्राणां मम संजय ।
भरतानां स्त्रियः सर्वा गान्धार्या सह संगताः ॥ १९ ॥
प्राक्रोशन् भैरवं तत्र दृष्ट्वा कृष्णां सभागताम् ।
धर्मिष्ठां धर्मपत्नीं च रूपयौवनशालिनीम् ॥ २० ॥
संजय! उसके अभिशापसे मेरे सभी पुत्रोंका आज ही संहार हो जाता, परंतु उसने सब कुछ चुपचाप सह लिया। जिस समय रूप और यौवनसे सुशोभित होनेवाली पाण्डवोंकी धर्मपरायणा धर्मपत्नी कृष्णा सभामें लायी गयी, उस समय वहाँ उसे देखकर भरतवंशकी सभी स्त्रियाँ गान्धारीके साथ मिलकर बड़े भयानक स्वरसे विलाप एवं चीत्कार करने लगीं ॥ १९-२० ॥
प्रजाभिः सह संगम्य ह्यनुशोचन्ति नित्यशः ।
अग्निहोत्राणि सायाह्ने न चाहूयन्त सर्वशः ॥ २१ ॥
ब्राह्मणाः कुपिताश्चासन् द्रौपद्याः परिकर्षणे ।
ये सारी स्त्रियाँ प्रजावर्गकी स्त्रियोंके साथ मिलकर रात-दिन सदा इसीके लिये शोक करती रहती हैं। उस दिन द्रौपदीका वस्त्र खींचे जानेके कारण सब ब्राह्मण कुपित हो उठे थे, अतः सायंकाल हमारे घरोंमें उन्होंने अग्निहोत्रतक नहीं किया ।। २१ १/२ ।।
आसीन्निष्ठानको घोरो निर्घातश्च महानभूत् ।। २२ ।।
दिव उल्काश्चापतन्त राहुश्चार्कमुपाग्रसत् ।
अपर्वणि महाघोरं प्रजानां जनयन् भयम् ।। २३ ।।
उस समय प्रलयकालीन मेघोंकी भयानक गर्जनाके समान भारी आवाजके साथ बड़े जोरकी आँधी चलने लगी। वज्रपातका-सा अत्यन्त कर्कश शब्द होने लगा। आकाशसे उल्काएँ गिरने लगीं तथा राहुने बिना पर्वके ही सूर्यको ग्रस लिया और प्रजाके लिये अत्यन्त घोर भय उपस्थित कर दिया ।। २२-२३ ।।
तथैव रथशालासु प्रादुरासीद्धुताशनः ।
ध्वजाश्चापि व्यशीर्यन्त भरतानामभूतये ।। २४ ।।
इसी प्रकार हमारी रथशालाओंमें आग लग गयी और रथोंकी ध्वजाएँ जलकर खाक हो गयीं, जो भरत-वंशियोंके लिये अमंगलकी सूचना देनेवाली थीं ।। २४ ।।
दुर्योधनस्याग्निहोत्रे प्राक्रोशन् भैरवं शिवाः ।
तास्तदा प्रत्यभाषन्त रासभाः सर्वतो दिशः ।। २५ ।।
दुर्योधनके अग्निहोत्रगृहमें गीदड़ियाँ आकर भयंकर स्वरसे हुँआ-हुँआ करने लगीं। उनकी आवाज सुनते ही चारों दिशाओंमें गधे रेंकने लगे ।। २५ ।।
प्रतिष्ठत ततो भीष्मो द्रोणेन सह संजय ।
कृपश्च सोमदत्तश्च बाह्लीकश्च महामनाः ।। २६ ।।
ततोऽहमब्रुवं तत्र विदुरेण प्रचोदितः ।
वरं ददानि कृष्णायै काङ्क्षितं यद् यदिच्छति ।। २७ ।।
संजय! यह सब देखकर द्रोणके साथ भीष्म, कृपाचार्य, सोमदत्त और महामना बाह्लीक वहाँसे उठकर चले गये। तब मैंने विदुरकी प्रेरणासे वहाँ यह बात कही—'मैं कृष्णाको मनोवांछित वर दूँगा। वह जो कुछ चाहे, माँग सकती है' ।। २६-२७ ।।
अवृणोत् तत्र पाञ्चाली पाण्डवानांमदासताम् ।
सरथान् सधनुष्कांश्चाप्यनुज्ञासिषमप्यहम् ।। २८ ।।
तब वहाँ पांचालीने यह वर माँगा कि पाण्डवलोग दासभावसे मुक्त हो जायँ। मैंने भी रथ और धनुष आदिके सहित पाण्डवोंको उनकी समस्त सम्पत्तिके साथ इन्द्रप्रस्थ लौट जानेकी आज्ञा दे दी थी ।। २८ ।।
अथाब्रवीन्महाप्राज्ञो विदुरः सर्वधर्मवित् ।
एतदन्तास्तु भरता यद् वः कृष्णा सभां गता ।। २९ ।।
यैषा पाञ्चालराजस्य सुता सा श्रीरनुत्तमा ।