महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
वीरं जनयते पुत्रं कन्यां वा राज्यभागिनीम् ॥ २२ ॥
युवराज तथा रानीको बारम्बार इसका श्रवण करते रहना चाहिये, इससे वह वीर पुत्र अथवा राज्यसिंहासनपर बैठनेवाली कन्याको जन्म देती है ॥ २२ ॥
धर्मशास्त्रमिदं पुण्यमर्थशास्त्रमिदं परम् ।
मोक्षशास्त्रमिदं प्रोक्तं व्यासेनामितबुद्धिना ॥ २३ ॥
अमित मेधावी व्यासजीने इसे पुण्यमय धर्मशास्त्र, उत्तम अर्थशास्त्र तथा सर्वोत्तम मोक्षशास्त्र भी कहा है ॥ २३ ॥
सम्प्रत्याचक्षते चेदं तथा श्रोष्यन्ति चापरे ।
पुत्राः शुश्रूषवः सन्ति प्रेष्याश्च प्रियकारिणः ॥ २४ ॥
जो वर्तमानकालमें इसका पाठ करते हैं तथा जो भविष्यमें इसे सुनेंगे, उनके पुत्र सेवापरायण और सेवक स्वामीका प्रिय करनेवाले होंगे ॥ २४ ॥
शरीरेण कृतं पापं वाचा च मनसैव च ।
सर्वं संत्यजति क्षिप्रं य इदं शृणुयान्नरः ॥ २५ ॥
जो मानव इस महाभारतको सुनता है, वह शरीर, वाणी और मनके द्वारा किये हुए सम्पूर्ण पापोंको त्याग देता है ॥ २५ ॥
भरतानां महज्जन्म शृण्वतामनसूयताम् ।
नास्ति व्याधिभयं तेषां परलोकभयं कुतः ॥ २६ ॥
जो दूसरोंके दोष न देखनेवाले भरतवंशियोंके महान् जन्म-वृत्तान्तरूप महाभारतका श्रवण करते हैं, उन्हें इस लोकमें भी रोग-व्याधिका भय नहीं होता, फिर परलोकमें तो हो ही कैसे सकता है? ॥ २६ ॥
धन्यं यशस्यमायुष्यं पुण्यं स्वर्ग्यं तथैव च ।
कृष्णद्वैपायनेनेदं कृतं पुण्यचिकीर्षुणा ॥ २७ ॥
कीर्तिं प्रथयता लोके पाण्डवानां महात्मनाम् ।
अन्येषां क्षत्रियाणां च भूरिद्रविणतेजसाम् ॥ २८ ॥
सर्वविद्यावदातानां लोके प्रथितकर्मणाम् ।
य इदं मानवो लोके पुण्यार्थे ब्राह्मणाञ्छुचीन् ॥ २९ ॥
श्रावयेत महापुण्यं तस्य धर्मः सनातनः ।
कुरुणां प्रथितं वंशं कीर्तयन् सततं शुचिः ॥ ३० ॥
लोकमें जिनके महान् कर्म विख्यात हैं, जो सम्पूर्ण विद्याओंके ज्ञानद्वारा उद्भासित होते थे और जिनके धन एवं तेज महान् थे, ऐसे महामना पाण्डवों तथा अन्य क्षत्रियोंकी उज्ज्वल कीर्तिको लोकमें फैलानेवाले और पुण्यकर्मके इच्छुक श्रीकृष्णद्वैपायन वेदव्यासने इस पुण्यमय महाभारत ग्रन्थका निर्माण किया है। यह धन, यश, आयु, पुण्य तथा स्वर्गकी प्राप्ति करानेवाला है। जो मानव इस लोकमें पुण्यके लिये पवित्र ब्राह्मणोंको इस परम
पुण्यमय ग्रन्थका श्रवण कराता है, उसे शाश्वत धर्मकी प्राप्ति होती है। जो सदा कौरवोंके इस विख्यात वंशका कीर्तन करता है, वह पवित्र हो जाता है॥ २७—३०॥
वंशमाप्नोति विपुलं लोके पूज्यतमो भवेत्।
योऽधीते भारतं पुण्यं ब्राह्मणो नियतव्रतः॥ ३१॥
चतुरो वार्षिकान् मासान् सर्वपापैः प्रमुच्यते।
विज्ञेयः स च वेदानां पारगो भारतं पठन्॥ ३२॥
इसके सिवा, उसे विपुल वंशकी प्राप्ति होती है और वह लोकमें अत्यन्त पूजनीय होता है। जो ब्राह्मण नियमपूर्वक ब्रह्मचर्यव्रतका पालन करते हुए वर्षके चार महीनेतक निरन्तर इस पुण्यप्रद महाभारतका पाठ करता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। जो महाभारतका पाठ करता है, उसे सम्पूर्ण वेदोंका पारंगत विद्वान् जानना चाहिये॥ ३१-३२॥
देवा राजर्षयो ह्यत्र पुण्या ब्रह्मर्षयस्तथा।
कीर्त्यन्ते धूतपाप्मानः कीर्त्यते केशवस्तथा॥ ३३॥
इसमें देवताओं, राजर्षियों तथा पुण्यात्मा ब्रह्मर्षियोंके, जिन्होंने अपने सब पाप धो दिये हैं, चरित्रका वर्णन किया गया है। इसके सिवा इस ग्रन्थमें भगवान् श्रीकृष्णकी महिमाका भी कीर्तन किया जाता है॥ ३३॥
भगवांश्चापि देवेशो यत्र देवी च कीर्त्यते।
अनेकजनननो यत्र कार्तिकेयस्य सम्भवः॥ ३४॥
देवेश्वर भगवान् शिव और देवी पार्वतीका भी इसमें वर्णन है तथा अनेक माताओंसे उत्पन्न होनेवाले कार्तिकेय-जीके जन्मका प्रसंग भी इसमें कहा गया है॥ ३४॥
ब्राह्मणानां गवां चैव माहात्म्यं यत्र कीर्त्यते।
सर्वश्रुतिसमूहोऽयं श्रोतव्यो धर्मबुद्धिभिः॥ ३५॥
ब्राह्मणों तथा गौओंके माहात्म्यका निरूपण भी इस ग्रन्थमें किया गया है। इस प्रकार यह महाभारत सम्पूर्ण श्रुतियोंका समूह है। धर्मात्मा पुरुषोंको सदा इसका श्रवण करना चाहिये॥ ३५॥
य इदं श्रावयेद् विद्वान् ब्राह्मणानिह पर्वसु।
धूतपाप्मा जितस्वर्गो ब्रह्म गच्छति शाश्वतम्॥ ३६॥
जो विद्वान् पर्वके दिन ब्राह्मणोंको इसका श्रवण कराता है, उसके सब पाप धुल जाते हैं और वह स्वर्ग-लोकको जीतकर सनातन ब्रह्मको प्राप्त कर लेता है॥ ३६॥
(यस्तु राजा शृणोतीदमखिलामश्रुते महीम्।
प्रसूते गर्भिणी पुत्रं कन्या चाशु प्रदीयते॥
वणिजः सिद्धयात्राः स्युर्वीरा विजयमाप्नुयुः।
आस्तिकाञ्छ्रावयेन्नित्यं ब्राह्मणाननसूयकान्॥
वेदविद्याव्रतस्नातान् क्षत्रियाञ्जयमास्थितान् ।
स्वधर्मनित्यान् वैश्यांश्च श्रावयेत् क्षत्रसंश्रितान् ॥)
जो राजा इस महाभारतको सुनता है, वह सारी पृथ्वीके राज्यका उपभोग करता है। गर्भवती स्त्री इसका श्रवण करे तो वह पुत्रको जन्म देती है। कुमारी कन्या इसे सुने तो उसका शीघ्र विवाह हो जाता है। व्यापारी वैश्य यदि महाभारत श्रवण करें तो उनकी व्यापारके लिये की हुई यात्रा सफल होती है। शूरवीर सैनिक इसे सुननेसे युद्धमें विजय पाते हैं। जो आस्तिक और दोषदृष्टिसे रहित हों, उन ब्राह्मणोंको नित्य इसका श्रवण कराना चाहिये। वेद-विद्याका अध्ययन एवं ब्रह्मचर्यव्रत पूर्ण करके जो स्नातक हो चुके हैं, उन विजयी क्षत्रियोंको और क्षत्रियोंके अधीन रहनेवाले स्वधर्म-परायण वैश्योंको भी महाभारत श्रवण कराना चाहिये।
(एष धर्मः पुरा दृष्टः सर्वधर्मेषु भारत ।
ब्राह्मणाच्छ्रवणं राजन् विशेषेण विधीयते ॥
भूयो वा यः पठेन्नित्यं स गच्छेत् परमां गतिम् ।
श्लोकं वाप्यनु गृह्णीत तथार्धश्लोकमेव वा ॥
अपि पादं पठेन्नित्यं न च निर्भारतो भवेत् ।)
भारत! सब धर्मोंमें यह महाभारत-श्रवणरूप श्रेष्ठ धर्म पूर्वकालसे ही देखा गया है। राजन्! विशेषतः ब्राह्मणके मुखसे इसे सुननेका विधान है। जो बारम्बार अथवा प्रतिदिन इसका पाठ करता है, वह परम गतिको प्राप्त होता है। प्रतिदिन चाहे एक श्लोक या आधे श्लोक अथवा श्लोकके एक चरणका ही पाठ कर ले, किंतु महाभारतके अध्ययनसे शून्य कभी नहीं रहना चाहिये।
(इह नैकाश्रयं जन्म राजर्षीणां महात्मनाम् ॥
इह मन्त्रपदं युक्तं धर्मं चानेकदर्शनम् ।
इह युद्धानि चित्राणि राज्ञां वृद्धिरिहैव च ॥
ऋषीणां च कथास्तात इह गन्धर्वरक्षसाम् ।
इह तत् तत् समासाद्य विहितो वाक्यविस्तरः ॥
तीर्थानां नाम पुण्यानां देशानां चेह कीर्तनम् ।
वनानां पर्वतानां च नदीनां सागरस्य च ॥)
इस महाभारतमें महात्मा राजर्षियोंके विभिन्न प्रकारके जन्म-वृत्तान्तोंका वर्णन है। इसमें मन्त्र-पदोंका प्रयोग है। अनेक दृष्टियों (मतों)-के अनुसार धर्मके स्वरूपका विवेचन किया गया है। इस ग्रन्थमें विचित्र युद्धोंका वर्णन तथा राजाओंके अभ्युदयकी कथा है। तात! इस महाभारतमें ऋषियों तथा गन्धर्वों एवं राक्षसोंकी भी कथाएँ हैं। इसमें विभिन्न प्रसंगोंको लेकर विस्तारपूर्वक वाक्यरचना की गयी है। इसमें पुण्यतीर्थों, पवित्र देशों, वनों, पर्वतों, नदियों और समुद्रके भी माहात्म्यका प्रतिपादन किया गया है।
(देशानां चैव पुण्यानां पुराणां चैव कीर्तनम् । उपचारस्तथैवाग्रयो वीर्यमप्यतिमानुषम् ।। इह सत्कारयोगश्च भारते परमर्षिणा । रथाश्ववारणेन्द्राणां कल्पना युद्धकौशलम् ।। वाक्यजातिरनेका च सर्वमस्मिन् समर्पितम् ।) पुण्यप्रदेशों तथा नगरोंका भी वर्णन किया गया है। श्रेष्ठ उपचार और अलौकिक पराक्रमका भी वर्णन है। इस महाभारतमें महर्षि व्यासने सत्कार-योग (स्वागत-सत्कारके विविध प्रकार)-का निरूपण किया है तथा रथसेना, अश्वसेना और गजसेनाकी व्यूहरचना तथा युद्धकौशलका वर्णन किया है। इसमें अनेक शैलीकी वाक्ययोजना—कथोपकथनका समावेश हुआ है। सारांश यह कि इस ग्रन्थमें सभी विषयोंका वर्णन है। श्रावयेद् ब्राह्मणाञ्छ्राद्धे यश्चेमं पादमन्ततः । अक्षय्यं तस्य तच्छ्राद्धमुपावर्तेत् पितॄनिह ।। ३७ ।। जो श्राद्ध करते समय अन्तमें ब्राह्मणोंको महाभारतके श्लोकका एक चतुर्थांश भी सुना देता है, उसका किया हुआ वह श्राद्ध अक्षय होकर पितरोंको अवश्य प्राप्त हो जाता है ।। ३७ ।। अह्ना यदेनः क्रियते इन्द्रियैर्मनसापि वा । ज्ञानादज्ञानतो वापि प्रकरोति नरश्च यत् ।। ३८ ।। तन्महाभारताख्यानं श्रुत्वैव प्रविलीयते । भरतानां महज्जन्म महाभारतमुच्यते ।। ३९ ।। दिनमें इन्द्रियों अथवा मनके द्वारा जो पाप बन जाता है अथवा मनुष्य जानकर या अनजानमें जो पाप कर बैठता है, वह सब महाभारतकी कथा सुनते ही नष्ट हो जाता है। इसमें भरतवंशियोंके महान् जन्म-वृत्तान्तका वर्णन है, इसलिये इसको 'महाभारत' कहते हैं ।। ३८-३९ ।। निरुक्तमस्य यो वेद सर्वपापैः प्रमुच्यते । भरतानां यतश्चायमितिहासो महाद्भुतः ।। ४० ।। महतो ह्येनसो मर्त्यान् मोचयेदनुकीर्तितः । त्रिभिर्वर्षैर्लब्धकामः कृष्णद्वैपायनो मुनिः ।। ४१ ।। नित्योत्थितः शुचिः शक्तो महाभारतमादितः । तपो नियममास्थाय कृतमेतन्महर्षिणा ।। ४२ ।। तस्मान्नियमसंयुक्तैः श्रोतव्यं ब्राह्मणैरिदम् । कृष्णप्रोक्तामिमां पुण्यां भारतीमुत्तमां कथाम् ।। ४३ ।। श्रावयिष्यन्ति ये विप्रा ये च श्रोष्यन्ति मानवाः । सर्वथा वर्तमाना वै न ते शोच्याः कृताकृतैः ।। ४४ ।।
जो महाभारत नामका यह निरुक्त (व्युत्पत्तियुक्त अर्थ) जानता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। यह भरतवंशी क्षत्रियोंका महान् और अद्भुत इतिहास है। अतः निरन्तर पाठ करनेपर मनुष्योंको बड़े-से-बड़े पापसे छुड़ा देता है। शक्तिशाली आप्तकाम मुनिवर श्रीकृष्णद्वैपायन व्यासजी प्रतिदिन प्रातःकाल उठकर स्नान-संध्या आदिसे शुद्ध हो आदिसे ही महाभारतकी रचना करते थे। महर्षिने तपस्या और नियमका आश्रय लेकर तीन वर्षोंमें इस ग्रन्थको पूरा किया है। इसलिये ब्राह्मणोंको भी नियममें स्थित होकर ही इस कथाका श्रवण करना चाहिये। जो ब्राह्मण श्रीव्यासजीकी कही हुई इस पुण्यदायिनी उत्तम भारती कथाका श्रवण करायेंगे और जो मनुष्य इसे सुनेंगे, वे सब प्रकारकी चेष्टा करते हुए भी इस बातके लिये शोक करने योग्य नहीं हैं कि उन्होंने अमुक कर्म क्यों किया और अमुक कर्म क्यों नहीं किया ।। ४०—४४ ।।
नरेण धर्मकामेन सर्वः श्रोतव्य इत्यपि । निखिलेनेतिहासोऽयं ततः सिद्धिमवाप्नुयात् ।। ४५ ।। धर्मकी इच्छा रखनेवाले मनुष्यके द्वारा यह सारा महाभारत इतिहास पूर्णरूपसे श्रवण करनेयोग्य है। ऐसा करनेसे मनुष्य सिद्धिको प्राप्त कर लेता है ।। ४५ ।।
न तां स्वर्गगतिं प्राप्य तुष्टिं प्राप्नोति मानवः । यां श्रुत्वैव महापुण्यमितिहासमुपाश्नुते ।। ४६ ।। इस महान् पुण्यदायक इतिहासको सुननेमात्रसे ही मनुष्यको जो संतोष प्राप्त होता है, वह स्वर्गलोक प्राप्त कर लेनेसे भी नहीं मिलता ।। ४६ ।।
शृण्वञ्छ्रद्दधः पुण्यशीलः श्रावयंश्चेदमद्भुतम् । नरः फलमवाप्नोति राजसूयाश्वमेधयोः ।। ४७ ।। जो पुण्यात्मा मनुष्य श्रद्धापूर्वक इस अद्भुत इतिहासको सुनता और सुनाता है, वह राजसूय तथा अश्वमेध यज्ञका फल पाता है ।। ४७ ।।
यथा समुद्रो भगवान् यथा मेरुर्महागिरिः । उभौ ख्यातौ रत्ननिधी तथा भारतमुच्यते ।। ४८ ।। जैसे ऐश्वर्यपूर्ण समुद्र और महान् पर्वत मेरु दोनों रत्नोंकी खान कहे गये हैं, वैसे ही महाभारत रत्नस्वरूप कथाओं और उपदेशोंका भण्डार कहा जाता है ।। ४८ ।।
इदं हि वेदैः समितं पवित्रमपि चोत्तमम् । श्राव्यं श्रुतिसुखं चैव पावनं शीलवर्धनम् ।। ४९ ।। यह महाभारत वेदोंके समान पवित्र और उत्तम है। यह सुननेयोग्य तो है ही, सुनते समय कानोंको सुख देनेवाला भी है। इसके श्रवणसे अन्तःकरण पवित्र होता और उत्तम शील-स्वभावकी वृद्धि होती है ।। ४९ ।।
य इदं भारतं राजन् वाचकाय प्रयच्छति । तेन सर्वा मही दत्ता भवेत् सागरमेखला ।। ५० ।।
राजन्! जो वाचकको यह महाभारत दान करता है, उसके द्वारा समुद्रसे घिरी हुई सम्पूर्ण पृथ्वीका दान सम्पन्न हो जाता है॥ ५० ॥
पारिक्षितकथां दिव्यां पुण्याय विजयाय च।
कथ्यमानां मया कृत्स्नां शृणु हर्षकरीमिमाम् ॥ ५१ ॥
जनमेजय! मेरे द्वारा कही हुई इस आनन्ददायिनी दिव्य कथाको तुम पुण्य और विजयकी प्राप्तिके लिये पूर्णरूपसे सुनो ॥ ५१ ॥
त्रिभिर्वर्षैः सदोत्थायी कृष्णद्वैपायनो मुनिः ।
महाभारतमाख्यानं कृतवानिदमद्भुतम् ॥ ५२ ॥
प्रतिदिन प्रातःकाल उठकर इस ग्रन्थका निर्माण करनेवाले महामुनि श्रीकृष्णद्वैपायनने महाभारत नामक इस अद्भुत इतिहासको तीन वर्षोंमें पूर्ण किया है ॥ ५२ ॥
धर्मे चार्थे च कामे च मोक्षे च भरतर्षभ ।
यदिहास्ति तदन्यत्र यन्नेहास्ति न तत् क्वचित् ॥ ५३ ॥
भरतश्रेष्ठ! धर्म, अर्थ, काम और मोक्षके सम्बन्धमें जो बात इस ग्रन्थमें है, वही अन्यत्र भी है। जो इसमें नहीं है, वह कहीं भी नहीं है ॥ ५३ ॥
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि अंशावतरणपर्वणि महाभारतप्रशंसायां
द्विषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत अंशावतरणपर्वमें महाभारतप्रशंसाविषयक बासठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६२ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ११ १/३ श्लोक मिलाकर कुल ६४ १/३ श्लोक हैं)
राजा उपरिचरका चरित्र तथा सत्यवती, व्यासादि प्रमुख पात्रोंकी संक्षिप्त जन्मकथा
त्रिषष्टितमोऽध्यायः
राजा उपरिचरका चरित्र तथा सत्यवती, व्यासादि प्रमुख पात्रोंकी संक्षिप्त जन्मकथा
वैशम्पायन उवाच
राजोपरिचरो नाम धर्मनित्यो महीपतिः ।
बभूव मृगयां गन्तुं सदा किल धृतव्रतः ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! पहले उपरिचर नामसे प्रसिद्ध एक राजा हो गये हैं, जो नित्य-निरन्तर धर्ममें ही लगे रहते थे। साथ ही सदा हिंसक पशुओंके शिकारके लिये वनमें जानेका उनका नियम था ॥ १ ॥
स चेदिविषयं रम्यं वसुः पौरवनन्दनः ।
इन्द्रोपदेशाज्जग्राह रमणीयं महीपतिः ॥ २ ॥
पौरवनन्दन राजा उपरिचर वसुने इन्द्रके कहनेसे अत्यन्त रमणीय चेदिदेशका राज्य स्वीकार किया था ॥ २ ॥
तमाश्रमे न्यस्तशस्त्रं निवसन्सं तपोनिधिम् ।
देवाः शक्रपुरोगा वै राजानमुपतस्थिरे ॥ ३ ॥
इन्द्रत्वमर्हो राजाऽयं तपसेत्यनुचिन्त्य वै ।
तं सान्त्वेन नृपं साक्षात् तपसः संन्यवर्तयन् ॥ ४ ॥
एक समयकी बात है, राजा वसु अस्त्र-शस्त्रोंका त्याग करके आश्रममें निवास करने लगे। उन्होंने बड़ा भारी तप किया, जिससे वे तपोनिधि माने जाने लगे। उस समय इन्द्र आदि देवता यह सोचकर कि यह राजा तपस्याके द्वारा इन्द्रपद प्राप्त करना चाहता है, उनके समीप गये। देवताओंने राजाको प्रत्यक्ष दर्शन देकर उन्हें शान्तिपूर्वक समझाया और तपस्यासे निवृत्त कर दिया ॥ ३-४ ॥
देवा ऊचुः
न संकीर्येत धर्मोऽयं पृथिव्यां पृथिवीपते ।
त्वया हि धर्मो विधृतः कृत्स्नं धारयते जगत् ॥ ५ ॥
**देवता बोले—**पृथ्वीपते! तुम्हें ऐसी चेष्टा रखनी चाहिये जिससे इस भूमिपर वर्णसंकरता न फैलने पावे (तुम्हारे न रहनेसे अराजकता फैलनेका भय है, जिससे प्रजा स्वधर्ममें स्थित नहीं रह सकेगी। अतः तुम्हें तपस्या न करके इस वसुधाका संरक्षण करना चाहिये)। राजन्! तुम्हारे द्वारा सुरक्षित धर्म ही सम्पूर्ण जगत्को धारण कर रहा है ॥ ५ ॥
इन्द्र उवाच
लोके धर्मं पालय त्वं नित्ययुक्तः समाहितः । धर्मयुक्तस्ततो लोकान् पुण्यान् प्राप्स्यसि शाश्वतान् ॥ ६ ॥ इन्द्रने कहा— राजन्! तुम इस लोकमें सदा सावधान और प्रयत्नशील रहकर धर्मका पालन करो। धर्मयुक्त रहनेपर तुम सनातन पुण्यलोकोंको प्राप्त कर सकोगे ॥ ६ ॥ दिविष्ठस्य भुविष्ठस्त्वं सखाभूतो मम प्रियः । रम्यः पृथिव्यां यो देशस्तमावस नराधिप ॥ ७ ॥ यद्यपि मैं स्वर्गमें रहता हूँ और तुम भूमिपर; तथापि आजसे तुम मेरे प्रिय सखा हो गये। नरेश्वर! इस पृथ्वीपर जो सबसे सुन्दर एवं रमणीय देश हो, उसीमें तुम निवास करो ॥ ७ ॥ पशव्यश्चैव पुण्यश्च प्रभूतधनधान्यवान् । स्वारक्ष्यश्चैव सौम्यश्च भोग्यैर्भूमिगुणैर्युतः ॥ ८ ॥ अर्थवानेष देशो हि धनरत्नादिभिर्युतः । वसुपूर्णा च वसुधा वस चेदिषु चेदिप ॥ ९ ॥ धर्मशीला जनपदाः सुसंतोषाश्च साधवः । न च मिथ्याप्रलापोऽत्र स्वैरेष्वपि कुतोऽन्यथा ॥ १० ॥ न च पित्रा विभज्यन्ते पुत्रा गुरुहिते रताः । युञ्जते धुरि नो गाश्च कृशान् संधुक्षयन्ति च ॥ ११ ॥ सर्वे वर्णाः स्वधर्मस्थाः सदा चेदिषु मानद । न तेऽस्त्यविदितं किंचित् त्रिषु लोकेषु यद् भवेत् ॥ १२ ॥ इस समय चेदिदेश पशुओंके लिये हितकर, पुण्यजनक, प्रचुर धन-धान्यसे सम्पन्न, स्वर्गके समान सुखद होनेके कारण रक्षणीय, सौम्य तथा भोग्य पदार्थों और भूमिसम्बन्धी उत्तम गुणोंसे युक्त है। यह देश अनेक पदार्थोंसे युक्त और धन-रत्न आदिसे सम्पन्न है। यहाँकी वसुधा वास्तवमें वसु (धन-सम्पत्ति)-से भरी-पूरी है। अतः तुम चेदिदेशके पालक होकर उसीमें निवास करो। यहाँके जनपद धर्मशील, संतोषी और साधु हैं। यहाँ हास-परिहासमें भी कोई झूठ नहीं बोलता, फिर अन्य अवसरोंपर तो बोल ही कैसे सकता है। पुत्र सदा गुरुजनोंके हितमें लगे रहते हैं, पिता अपने जीते-जी उनका बँटवारा नहीं करते। यहाँके लोग बैलोंको भार ढोनेमें नहीं लगाते और दीनों एवं अनाथोंका पोषण करते हैं। मानद! चेदिदेशमें सब वर्णोंके लोग सदा अपने-अपने धर्ममें स्थित रहते हैं। तीनों लोकोंमें जो कोई घटना होगी, वह सब यहाँ रहते हुए भी तुमसे छिपी न रहेगी—तुम सर्वज्ञ बने रहोगे ॥ ८—१२ ॥ देवोपभोग्यं दिव्यं त्वामाकाशे स्फाटिकं महत् । आकाशगं त्वां मदत्तं विमानमुपपत्स्यते ॥ १३ ॥ जो देवताओंके उपभोगमें आने योग्य है, ऐसा स्फटिक मणिका बना हुआ एक दिव्य, आकाशचारी एवं विशाल विमान मैंने तुम्हें भेंट किया है। वह आकाशमें तुम्हारी सेवाके लिये
सदा उपस्थित रहेगा ।। १३ ।। त्वमेकः सर्वमर्त्येषु विमानवरमास्थितः । चरिष्यस्युपरिस्थो हि देवो विग्रहवानिव ।। १४ ।। सम्पूर्ण मनुष्योंमें एक तुम्हीं इस श्रेष्ठ विमानपर बैठकर मूर्तिमान् देवताकी भाँति सबके ऊपर-ऊपर विचरोगे ।। १४ ।। ददामि ते वैजयन्तीं मालाम्म्लानपंकजम् । धारयिष्यति संग्रामे या त्वां शस्त्रैरविक्षतम् ।। १५ ।। मैं तुम्हें यह वैजयन्ती माला देता हूँ, जिसमें पिरोये हुए कमल कभी कुम्हलाते नहीं हैं। इसे धारण कर लेनेपर यह माला संग्राममें तुम्हें अस्त्र-शस्त्रोंके आघातसे बचायेगी ।। १५ ।। लक्षणं चैतदेवेह भविता ते नराधिप । इन्द्रमालेति विख्यातं धन्यमप्रतिमं महत् ।। १६ ।। नरेश्वर! यह माला ही इन्द्रमालाके नामसे विख्यात होकर इस जगत्में तुम्हारी पहचान करानेके लिये परम धन्य एवं अनुपम चिह्न होगी ।। १६ ।। यष्टिं च वैणवीं तस्मै ददौ वृत्रनिषूदनः । इष्टप्रदानमुद्दिश्य शिष्टानां प्रतिपालिनीम् ।। १७ ।। ऐसा कहकर वृत्रासुरका नाश करनेवाले इन्द्रने राजाको प्रेमोपहारस्वरूप बाँसकी एक छड़ी दी, जो शिष्ट पुरुषोंकी रक्षा करनेवाली थी ।। १७ ।। तस्याः शक्रस्य पूजार्थं भूमौ भूमिपतिस्तदा । प्रवेशं कारयामास गते संवत्सरे तदा ।। १८ ।। तदनन्तर एक वर्ष बीतनेपर भूपाल वसुने इन्द्रकी पूजाके लिये उस छड़ीको भूमिमें गाड़ दिया ।। १८ ।। ततः प्रभृति चाद्यापि यष्टेः क्षितिपसत्तमैः । प्रवेशः क्रियते राजन् यथा तेन प्रवर्तितः ।। १९ ।। राजन्! तबसे लेकर आजतक श्रेष्ठ राजाओंद्वारा छड़ी धरतीमें गाड़ी जाती है। वसुने जो प्रथा चला दी, वह अबतक चली आती है ।। १९ ।। अपरेद्युस्ततस्तस्याः क्रियतेऽत्युच्छ्रयो नृपैः । अलंकृतायाः पिटकैर्गन्धमाल्यैश्च भूषणैः ।। २० ।। माल्यदामपरिक्षिप्ता विधिवत् क्रियतेऽपि च । भगवान् पूज्यते चात्र हंसरूपेण चेश्वरः ।। २१ ।। दूसरे दिन अर्थात् नवीन संवत्सरके प्रथम दिन प्रति-पदाको वह छड़ी वहाँसे निकालकर बहुत ऊँचे स्थानमें रखी जाती है; फिर कपड़ेकी पेटी, चन्दन, माला और आभूषणोंसे उसको सजाया जाता है। उसमें विधिपूर्वक फूलोंके हार और सूत लपेटे जाते
हैं। तत्पश्चात् उसी छड़ीपर देवेश्वर भगवान् इन्द्रका हंसरूपसे पूजन किया जाता है॥ २०-२१ ॥
स्वयमेव गृहीतेन वसोः प्रीत्या महात्मनः ।
स तां पूजां महेन्द्रस्तु दृष्ट्वा देवः कृतां शुभाम् ॥ २२ ॥
वसुना राजमुख्येन प्रीतिमानब्रवीत् प्रभुः ।
ये पूजयिष्यन्ति नरा राजानश्च महं मम ॥ २३ ॥
कारयिष्यन्ति च मुदा यथा चेदिपतिर्नृपः ।
तेषां श्रीर्विजयश्चैव सराष्ट्राणां भविष्यति ॥ २४ ॥
इन्द्रने महात्मा वसुके प्रेमवश स्वयं हंसका रूप धारण करके वह पूजा ग्रहण की। नृपश्रेष्ठ वसुके द्वारा की हुई उस शुभ पूजाको देखकर प्रभावशाली भगवान् महेन्द्र प्रसन्न हो गये और इस प्रकार बोले—‘चेदिदेशके अधिपति उपरिचर वसु जिस प्रकार मेरी पूजा करते हैं, उसी तरह जो मनुष्य तथा राजा मेरी पूजा करेंगे और मेरे इस उत्सवको रचायेंगे, उनको और उनके समूचे राष्ट्रको लक्ष्मी एवं विजयकी प्राप्ति होगी॥ २२—२४॥
तथा स्फीतो जनपदो मुदितश्च भविष्यति ।
एवं महात्मना तेन महेन्द्रेण नराधिप ॥ २५ ॥
वसुः प्रीत्या मघवता महाराजोऽभिसत्कृतः ।
उत्सवं कारयिष्यन्ति सदा शक्रस्य ये नराः ॥ २६ ॥
भूमिरत्नादिभिर्दानैस्तथा पूज्या भवन्ति ते ।
वरदानमहायज्ञैस्तथा शक्रोत्सवेन च ॥ २७ ॥
‘इतना ही नहीं, उनका सारा जनपद ही उत्तरोत्तर उन्नतिशील और प्रसन्न होगा।’ राजन्! इस प्रकार महात्मा महेन्द्रने, जिन्हें मघवा भी कहते हैं, प्रेमपूर्वक महाराज वसुका भलीभाँति सत्कार किया। जो मनुष्य भूमि तथा रत्न आदिका दान करते हुए सदा देवराज इन्द्रका उत्सव रचायेंगे, वे इन्द्रोत्सवद्वारा इन्द्रका वरदान पाकर उसी उत्तम गतिको पा जायँगे, जिसे भूमिदान आदिके पुण्योंसे युक्त मानव प्राप्त करते हैं॥ २५—२७॥
सम्पूजितो मघवता वसुश्चेदीश्वरो नृपः ।
पालयामास धर्मेण चेदिस्थः पृथिवीमिमाम् ॥ २८ ॥
इन्द्रके द्वारा उपर्युक्त रूपसे सम्मानित चेदिराज वसुने चेदिदेशमें ही रहकर इस पृथ्वीका धर्मपूर्वक पालन किया॥ २८॥
इन्द्रप्रीत्या चेदिपतिश्चकारेन्द्रमहं वसुः ।
पुत्राश्चास्य महावीर्याः पञ्चासन्नमितौजसः ॥ २९ ॥
इन्द्रकी प्रसन्नताके लिये चेदिराज वसु प्रतिवर्ष इन्द्रोत्सव मनाया करते थे। उनके अनन्त बलशाली महापराक्रमी पाँच पुत्र थे॥ २९॥
नानाराज्येषु च सुतान् स सम्राडभ्यषेचयत् ।
महारथो मागधानां विश्रुतो यो बृहद्रथः ॥ ३० ॥
सम्राट् वसुने विभिन्न राज्योंपर अपने पुत्रोंको अभिषिक्त कर दिया। उनमें महारथी बृहद्रथ मगध देशका विख्यात राजा हुआ ॥ ३० ॥
प्रत्यग्रहः कुशाम्बश्च यमाहुर्मणिवाहनम् ।
मावेल्लश्च यदुश्चैव राजन्यश्चापराजितः ॥ ३१ ॥
दूसरे पुत्रका नाम प्रत्यग्रह था, तीसरा कुशाम्ब था, जिसे मणिवाहन भी कहते हैं। चौथा मावेल्ल था। पाँचवाँ राजकुमार यदु था, जो युद्धमें किसीसे पराजित नहीं होता था ॥ ३१ ॥
एते तस्य सुता राजन् राजर्षेर्भूरितेजसः ।
न्यवासयन् नामभिः स्वैस्ते देशांश्च पुराणि च ॥ ३२ ॥
राजा जनमेजय! महातेजस्वी राजर्षि वसुके इन पुत्रोंने अपने-अपने नामसे देश और नगर बसाये ॥ ३२ ॥
वासवाः पञ्च राजानः पृथग्वंशाश्च शाश्वताः ।
वसन्तमिन्द्रप्रासादे आकाशे स्फाटिके च तम् ॥ ३३ ॥
उपतस्थुर्महात्मानं गन्धर्वाप्सरसो नृपम् ।
राजोपरिचरेत्येवं नाम तस्याथ विश्रुतम् ॥ ३४ ॥
पाँचों वसुपुत्र भिन्न-भिन्न देशोंके राजा थे और उन्होंने पृथक्-पृथक् अपनी सनातन वंशपरम्परा चलायी। चेदिराज वसु इन्द्रके दिये हुए स्फटिक मणिमय विमानमें रहते हुए आकाशमें ही निवास करते थे। उस समय उन महात्मा नरेशकी सेवामें गन्धर्व और अप्सराएँ उपस्थित होती थीं। सदा ऊपर-ही-ऊपर चलनेके कारण उनका नाम 'राजा उपरिचर' के रूपमें विख्यात हो गया ॥ ३३-३४ ॥
पुरोपवाहिनीं तस्य नदीं शुक्तिमतीं गिरिः ।
अरौत्सीच्चेतनायुक्तः कामात् कोलाहलः किल ॥ ३५ ॥
उनकी राजधानीके समीप शुक्तिमती नदी बहती थी। एक समय कोलाहल नामक सचेतन पर्वतने कामवश उस दिव्यरूपधारिणी नदीको रोक लिया ॥ ३५ ॥
गिरिं कोलाहलं तं तु पदा वसुरताडयत् ।
निश्चक्राम ततस्तेन प्रहारविवरेण सा ॥ ३६ ॥
उसके रोकनेसे नदीकी धारा रुक गयी। यह देख उपरिचर वसुने कोलाहल पर्वतपर अपने पैरसे प्रहार किया। प्रहार करते ही पर्वतमें दरार पड़ गयी, जिससे निकलकर वह नदी पहलेके समान बहने लगी ॥ ३६ ॥
तस्यां नद्यामजनयन्मिथुनं पर्वतः स्वयम् ।
तस्माद् विमोक्षणात् प्रीता नदी राज्ञे न्यवेदयत् ॥ ३७ ॥
पर्वतने उस नदीके गर्भसे एक पुत्र और एक कन्या, जुड़वीं संतान उत्पन्न की थी। उसके अवरोधसे मुक्त करनेके कारण प्रसन्न हुई नदीने राजा उपरिचरको अपनी दोनों संतानें समर्पित कर दीं ॥ ३७ ॥
यः पुमानभवत् तत्र तं स राजर्षिसत्तमः ।
वसुर्वसुप्रदश्चक्रे सेनापतिमरिन्दमः ॥ ३८ ॥
उनमें जो पुरुष था, उसे शत्रुओंका दमन करनेवाले धनदाता राजर्षिप्रवर वसुने अपना सेनापति बना लिया ॥ ३८ ॥
चकार पत्नीं कन्यां तु तथा तां गिरिकां नृपः ।
वसोः पत्नी तु गिरिका कामकालं न्यवेदयत् ॥ ३९ ॥
ऋतुकालमनुप्राप्ता स्नाता पुंसवने शुचिः ।
तदहः पितरश्चैनमूचुर्जहि मृगानिति ॥ ४० ॥
तं राजसत्तमं प्रीतास्तदा मतिमतां वर ।
स पितॄणां नियोगं तमनतिक्रम्य पार्थिवः ॥ ४१ ॥
चकार मृगयां कामी गिरिकामेव संस्मरन् ।
अतीवरूपसम्पन्नां साक्षाच्छ्रियमिवापराम् ॥ ४२ ॥
और जो कन्या थी उसे राजाने अपनी पत्नी बना लिया। उसका नाम था गिरिका। बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ जनमेजय! एक दिन ऋतुकालको प्राप्त हो स्नानके पश्चात् शुद्ध हुई वसुपत्नी गिरिकाने पुत्र उत्पन्न होने योग्य समयमें राजासे समागमकी इच्छा प्रकट की। उसी दिन पितरोंने राजाओंमें श्रेष्ठ वसुपर प्रसन्न हो उन्हें आज्ञा दी—'तुम हिंसक पशुओंका वध करो।' तब राजा पितरोंकी आज्ञाका उल्लंघन न करके कामनावश साक्षात् दूसरी लक्ष्मीके समान अत्यन्त रूप और सौन्दर्यके वैभवसे सम्पन्न गिरिकाका ही चिन्तन करते हुए हिंसक पशुओंको मारनेके लिये वनमें गये ॥ ३९—४२ ॥
अशोकैश्चम्पकैश्चूतैरनेकैरातिमुक्तकैः ।
पुन्नागैः कर्णिकारैश्च वकुलैर्दिव्यपाटलैः ॥ ४३ ॥
पाटलैर्नारिकेलैश्च चन्दनैश्चार्जुनैस्तथा ।
एतै रम्यैर्महावृक्षैः पुण्यैः स्वादुफलैर्युतम् ॥ ४४ ॥
कोकिलाकुलसंनादं मत्तभ्रमरनादितम् ।
वसन्तकाले तत् तस्य वनं चैत्ररथोपमम् ॥ ४५ ॥
राजाका वह वन देवताओंके चैत्ररथ नामक वनके समान शोभा पा रहा था। वसन्तका समय था; अशोक, चम्पा, आम, अतिमुक्तक (माधवीलता), पुन्नाग (नागकेसर), कनेर, मौलसिरी, दिव्य पाटल, पाटल, नारियल, चन्दन तथा अर्जुन—से स्वादिष्ट फलोंसे युक्त, रमणीय तथा पवित्र महावृक्ष उस वनकी शोभा बढ़ा रहे थे। कोकिलाओंके कल-कूजनसे समस्त वन गूँज उठा था। चारों ओर मतवाले भौंरे कल-कल नाद कर रहे थे ॥ ४३—४५ ॥
मन्मथाभिपरीतात्मा नापश्यद् गिरिकां तदा । अपश्यन् कामसंतप्तश्चरमाणो यदृच्छया ॥ ४६ ॥ यह उद्दीपन-सामग्री पाकर राजाका हृदय कामवेदनासे पीड़ित हो उठा। उस समय उन्हें अपनी रानी गिरिकाका दर्शन नहीं हुआ। उसे न देखकर कामाग्निसे संतप्त हो वे इच्छानुसार इधर-उधर घूमने लगे ॥ ४६ ॥ पुष्पसंछन्नशाखाग्रं पल्लवैरुपशोभितम् । अशोकं स्तबकैश्छन्नं रमणीयमपश्यत ॥ ४७ ॥ घूमते-घूमते उन्होंने एक रमणीय अशोकका वृक्ष देखा, जो पल्लवोंसे सुशोभित और पुष्पके गुच्छोंसे आच्छादित था। उसकी शाखाओंके अग्रभाग फूलोंसे ढके हुए थे ॥ ४७ ॥ अधस्तात् तस्य छायायां सुखासीनो नराधिपः । मधुगन्धैश्च संयुक्तं पुष्पगन्धमनोहरम् ॥ ४८ ॥ राजा उसी वृक्षके नीचे उसकी छायामें सुखपूर्वक बैठ गये। वह वृक्ष मकरन्द और सुगन्धसे भरा था। फूलोंकी गन्धसे वह बरबस मनको मोह लेता था ॥ ४८ ॥ वायुना प्रेर्यमाणस्तु धूम्नाय मुदमन्वगात् । तस्य रेतः प्रचस्कन्द चरतो गहने वने ॥ ४९ ॥ उस समय कामोद्दीपक वायुसे प्रेरित हो राजाके मनमें रतिके लिये स्त्रीविषयक प्रीति उत्पन्न हुई। इस प्रकार वनमें विचरनेवाले राजा उपरिचरका वीर्य स्खलित हो गया ॥ ४९ ॥ स्कन्नमात्रं च तद् रेतो वृक्षपत्रेण भूमिपः । प्रतिजग्राह मिथ्या मे न पतेद् रेत इत्युत ॥ ५० ॥ उसके स्खलित होते ही राजाने यह सोचकर कि मेरा वीर्य व्यर्थ न जाय, उसे वृक्षके पत्तेपर उठा लिया ॥ ५० ॥ इदं मिथ्या परिस्कन्नं रेतो मे न भवेदिति । ऋतुश्च तस्याः पत्न्या मे न मोघः स्यादिति प्रभुः ॥ ५१ ॥ संचिन्त्यैवं तदा राजा विचार्य च पुनः पुनः । अमोघत्वं च विज्ञाय रेतसो राजसत्तमः ॥ ५२ ॥ उन्होंने विचार किया, 'मेरा यह स्खलित वीर्य व्यर्थ न हो, साथ ही मेरी पत्नी गिरिकाका ऋतुकाल भी व्यर्थ न जाय' इस प्रकार बारम्बार विचारकर राजाओंमें श्रेष्ठ वसुने उस वीर्यको अमोघ बनानेका ही निश्चय किया ॥ ५१-५२ ॥ शुक्रप्रस्थापने कालं महिष्याः प्रसमीक्ष्य वै । अभिमन्त्र्याथ तच्छुक्रमारात् तिष्ठन्तमाशुगम् ॥ ५३ ॥ सूक्ष्मधर्मार्थतत्त्वज्ञो गत्वा श्येनं ततोऽब्रवीत् । मत्प्रियार्थमिदं सौम्य शुक्रं मम गृहं नय ॥ ५४ ॥ गिरिकायाः प्रयच्छाशु तस्या ह्यार्तवमद्य वै ।
गृह्णीत्वा तत् तदा श्येनस्तूर्णमुत्पत्य वेगवान् ॥ ५५ ॥
तदनन्तर रानीके पास अपना वीर्य भेजनेका उपयुक्त अवसर देख उन्होंने उस वीर्यको पुत्रोत्पत्तिकारक मन्त्रोंद्वारा अभिमन्त्रित किया। राजा वसु धर्म और अर्थके सूक्ष्मतत्त्वको जाननेवाले थे। उन्होंने अपने विमानके समीप ही बैठे हुए शीघ्रगामी श्येन पक्षी (बाज)-के पास जाकर कहा—‘सौम्य! तुम मेरा प्रिय करनेके लिये यह वीर्य मेरे घर ले जाओ और महारानी गिरिकाको शीघ्र दे दो; क्योंकि आज ही उनका ऋतुकाल है।' बाज वह वीर्य लेकर बड़े वेगके साथ तुरंत वहाँसे उड़ गया ॥ ५३—५५ ॥
जवं परममास्थाय प्रदुद्राव विहंगमः ।
तमपश्यदथायन्तं श्येनं श्येनस्तथापरः ॥ ५६ ॥
वह आकाशचारी पक्षी सर्वोत्तम वेगका आश्रय ले उड़ा जा रहा था, इतनेहीमें एक दूसरे बाजने उसे आते देखा ॥ ५६ ॥
अभ्यद्रवच्च तं सद्यो दृष्ट्वैवामिषशङ्कया ।
तुण्डयुद्धमथाकाशे तावुभौ सम्प्रचक्रतुः ॥ ५७ ॥
उस बाजको देखते ही उसके पास मांस होनेकी आशंकासे दूसरा बाज तत्काल उसपर टूट पड़ा। फिर वे दोनों पक्षी आकाशमें एक-दूसरेको चोंचोंसे मारते हुए युद्ध करने लगे ॥ ५७ ॥
युध्यतोरपतद् रेतस्तच्चापि यमुनाम्भसि ।
तत्राद्रिकेति विख्याता ब्रह्मशापाद् वराप्सराः ॥ ५८ ॥
मीनभावमनुप्राप्ता बभूव यमुनाचरी ।
श्येनपादपरिभ्रष्टं तद् वीर्यमथ वासवम् ॥ ५९ ॥
जग्राह तरसोपेत्य साद्रिका मत्स्यरूपिणी ।
कदाचिदपि मत्सीं तां बबन्धुर्मत्स्यजीविनः ॥ ६० ॥
मासे च दशमे प्राप्ते तदा भरतसत्तम ।
उज्जह्रुरुदरात् तस्याः स्त्रीं पुमांसं च मानुषम् ॥ ६१ ॥
उन दोनोंके युद्ध करते समय वह वीर्य यमुनाजीके जलमें गिर पड़ा। अद्रिका नामसे विख्यात एक सुन्दरी अप्सरा ब्रह्माजीके शापसे मछली होकर वहीं यमुनाजीके जलमें रहती थी। बाजके पंजेसे छूटकर गिरे हुए वसुसम्बन्धी उस वीर्यको मत्स्यरूपधारिणी अद्रिकाने वेगपूर्वक आकर निगल लिया। भरतश्रेष्ठ! तत्पश्चात् दसवाँ मास आनेपर मत्स्यजीवी मल्लाहोंने उस मछलीको जालमें बाँध लिया और उसके उदरको चीरकर एक कन्या और एक पुरुष निकाला ॥ ५८—६१ ॥
आश्चर्यभूतं तद् गत्वा राज्ञेऽथ प्रत्यवेदयन् ।
काये मत्स्या इमौ राजन् सम्भूतौ मानुषाविति ॥ ६२ ॥
यह आश्चर्यजनक घटना देखकर मछेरोंने राजाके पास जाकर निवेदन किया—'महाराज! मछलीके पेटसे ये दो मनुष्य बालक उत्पन्न हुए हैं' ।। ६२ ।।
तयोः पुमांसं जग्राह राजोपरिचरस्तदा ।
स मत्स्यो नाम राजासीद् धार्मिकः सत्यसंगरः ।। ६३ ।।
मछेरोंकी बात सुनकर राजा उपरिचरने उस समय उन दोनों बालकोंमेंसे जो पुरुष था, उसे स्वयं ग्रहण कर लिया। वही मत्स्य नामक धर्मात्मा एवं सत्यप्रतिज्ञ राजा हुआ ।। ६३ ।।
साप्सरा मुक्तशापा च क्षणेन समपद्यत ।
या पुरोक्ता भगवता तिर्यग्योनिगता शुभा ।। ६४ ।।
मानुषौ जनयित्वा त्वं शापमोक्षमवाप्स्यसि ।
ततः सा जनयित्वा तौ विशस्ता मत्स्यघातिना ।। ६५ ।।
संत्यज्य मत्स्यरूपं सा दिव्यं रूपमवाप्य च ।
सिद्धर्षिचारणपथं जगामाथ वराप्सराः ।। ६६ ।।
इधर वह शुभलक्षणा अप्सरा अद्रिका क्षणभरमें शापमुक्त हो गयी। भगवान् ब्रह्माजीने पहले ही उससे कह दिया था कि 'तिर्यग्-योनिमें पड़ी हुई तुम दो मानव-संतानोंको जन्म देकर शापसे छूट जाओगी।' अतः मछली मारनेवाले मल्लाहने जब उसे काटा तो वह मानव-बालकोंको जन्म देकर मछलीका रूप छोड़ दिव्य रूपको प्राप्त हो गयी। इस प्रकार वह सुन्दरी अप्सरा सिद्ध महर्षि और चारणोंके पथसे स्वर्गलोकमें चली गयी ।। ६४—६६ ।।
सा कन्या दुहिता तस्या मत्स्या मत्स्यसगन्धिनी ।
राज्ञा दत्ता च दाशाय कन्येयं ते भवत्विति ।। ६७ ।।
उन जुड़वी संतानोंमें जो कन्या थी, मछलीकी पुत्री होनेसे उसके शरीरसे मछलीकी गन्ध आती थी। अतः राजाने उसे मल्लाहको सौंप दिया और कहा—'यह तेरी पुत्री होकर रहे' ।। ६७ ।।
रूपसत्त्वसमायुक्ता सर्वैः समुदिता गुणैः ।
सा तु सत्यवती नाम मत्स्यघात्यभिसंश्रयात् ।। ६८ ।।
आसीत् सा मत्स्यगन्धैव कंचित् कालं शुचिस्मिता ।
शुश्रूषार्थं पितुर्नावं वाहयन्तीं जले च ताम् ।। ६९ ।।
तीर्थयात्रां परिक्रामन्नपश्यद् वै पराशरः ।
अतीवरूपसम्पन्नां सिद्धानामपि काङ्क्षिताम् ।। ७० ।।
वह रूप और सत्त्व (सत्य)-से संयुक्त तथा समस्त सद्गुणोंसे सम्पन्न होनेके कारण 'सत्यवती' नामसे प्रसिद्ध हुई। मछेरोंके आश्रयमें रहनेके कारण वह पवित्र मुसकानवाली कन्या कुछ कालतक मत्स्यगन्धा नामसे ही विख्यात रही। वह पिताकी सेवाके लिये यमुनाजीके जलमें नाव चलाया करती थी। एक दिन तीर्थयात्राके उद्देश्यसे सब ओर
विचरनेवाले महर्षि पराशरने उसे देखा। वह अतिशय रूप-सौन्दर्यसे सुशोभित थी। सिद्धोंके हृदयमें भी उसे पानेकी अभिलाषा जाग उठती थी ।। ६८—७० ।। दृष्ट्वैव स च तां धीमांश्चकमे चारुहासिनीम् । दिव्यां तां वासवीं कन्यां रम्भोरुं मुनिपुङ्गवः ॥ ७१ ॥ उसकी हँसी बड़ी मोहक थी, उसकी जाँघें कदलीकी-सी शोभा धारण करती थीं। उस दिव्य वसुकुमारीको देखकर परम बुद्धिमान् मुनिवर पराशरने उसके साथ समागमकी इच्छा प्रकट की ॥ ७१ ॥ संगमं मम कल्याणि कुरुष्वेत्यभ्यभाषत । साब्रवीत् पश्य भगवन् पारावारे स्थितानृषीन् ॥ ७२ ॥ और कहा—‘कल्याणी! मेरे साथ संगम करो।’ वह बोली—‘भगवन्! देखिये, नदीके आर-पार दोनों तटोंपर बहुत-से ऋषि खड़े हैं ॥ ७२ ॥ आवयोर्दृष्टयोरेभिः कथं नु स्यात् समागमः । एवं तयोक्तो भगवान् नीहारमसृजत् प्रभुः ॥ ७३ ॥ ‘और हम दोनोंको देख रहे हैं। ऐसी दशामें हमारा समागम कैसे हो सकता है?’ उसके ऐसा कहनेपर शक्तिशाली भगवान् पराशरने कुहरेकी सृष्टि की ॥ ७३ ॥ येन देशः स सर्वस्तु तमोभूत इवाभवत् । दृष्ट्वा सृष्टं तु नीहारं ततस्तं परमर्षिणा ॥ ७४ ॥ विस्मिता साभवत् कन्या व्रीडिता च तपस्विनी । जिससे वहाँका सारा प्रदेश अन्धकारसे आच्छादित-सा हो गया। महर्षिद्वारा कुहरेकी सृष्टि देखकर वह तपस्विनी कन्या आश्चर्यचकित एवं लज्जित हो गयी ॥ ७४ १/२ ॥
सत्यवत्युवाच
विद्धि मां भगवन् कन्यां सदा पितृवशानुगाम् ॥ ७५ ॥ सत्यवतीने कहा—भगवन्! आपको मालूम होना चाहिये कि मैं सदा अपने पिताके अधीन रहनेवाली कुमारी कन्या हूँ ॥ ७५ ॥ त्वत्संयोगाच्च दुष्येत कन्याभावो ममानघ । कन्यात्वे दूषिते वापि कथं शक्ये द्विजोत्तम ॥ ७६ ॥ गृहं गन्तुमृषे चाहं धीमन् न स्थातुमुत्सहे । एतत् संचिन्त्य भगवन् विधत्स्व यदनन्तरम् ॥ ७७ ॥ निष्पाप महर्षे! आपके संयोगसे मेरा कन्याभाव (कुमारीपन) दूषित हो जायगा। द्विजश्रेष्ठ! कन्याभाव दूषित हो जानेपर मैं कैसे अपने घर जा सकती हूँ। बुद्धिमान् मुनीश्वर! अपने कन्यापनके कलंकित हो जानेपर मैं जीवित रहना नहीं चाहती। भगवन्! इस बातपर भलीभाँति विचार करके जो उचित जान पड़े, वह कीजिये ॥ ७६-७७ ॥
एवमुक्तवतीं तां तु प्रीतिमानृषिसत्तमः । उवाच मत्प्रियं कृत्वा कन्यैव त्वं भविष्यसि ॥ ७८ ॥ वृणीष्व च वरं भीरु यं त्वमिच्छसि भामिनि । वृथा हि न प्रसादो मे भूतपूर्वः शुचिस्मिते ॥ ७९ ॥ सत्यवतीके ऐसा कहनेपर मुनिश्रेष्ठ पराशर प्रसन्न होकर बोले—'भीरु! मेरा प्रिय कार्य करके भी तुम कन्या ही रहोगी। भामिनि! तुम जो चाहो, वह मुझसे वर माँग लो। शुचिस्मिते! आजसे पहले कभी भी मेरा अनुग्रह व्यर्थ नहीं गया है' ॥ ७८-७९ ॥
एवमुक्ता वरं वव्रे गात्रसौगन्ध्यमुत्तमम् । स चास्यै भगवान् प्रादान्मनसःकाङ्क्षितं भुवि ॥ ८० ॥ महर्षिके ऐसा कहनेपर सत्यवतीने अपने शरीरमें उत्तम सुमन होनेका वरदान माँगा। भगवान् पराशरने इस भूतलपर उसे वह मनोवांछित वर दे दिया ॥ ८० ॥
ततो लब्धवरा प्रीता स्त्रीभावगुणभूषिता । जगाम सह संसर्गमृषिणाद्भुतकर्मणा ॥ ८१ ॥ तेन गन्धवतीत्येवं नामास्याः प्रथितं भुवि । तस्यास्तु योजनाद् गन्धमाजिघ्रन्त नरा भुवि ॥ ८२ ॥ तस्या योजनगन्धेति ततो नामापरं स्मृतम् । तदनन्तर वरदान पाकर प्रसन्न हुई सत्यवती नारीपनके समागमोचित गुण (सद्यः ऋतुस्नान आदि)-से विभूषित हो गयी और उसने अद्भुतकर्मा महर्षि पराशरके साथ समागम किया। उसके शरीरसे उत्तम गन्ध फैलनेके कारण पृथ्वीपर उसका गन्धवती नाम विख्यात हो गया। इस पृथ्वीपर एक योजन दूरके मनुष्य भी उसकी दिव्य सुगन्धका अनुभव करते थे। इस कारण उसका दूसरा नाम योजनगन्धा हो गया ॥ ८१-८२ १/२ ॥
इति सत्यवती हृष्टा लब्ध्वा वरमनुत्तमम् ॥ ८३ ॥ पराशरेण संयुक्ता सद्यो गर्भं सुषाव सा । जज्ञे च यमुनाद्वीपे पाराशर्यः स वीर्यवान् ॥ ८४ ॥ इस प्रकार परम उत्तम वर पाकर हर्षोल्लाससे भरी हुई सत्यवतीने महर्षि पराशरका संयोग प्राप्त किया और तत्काल ही एक शिशुको जन्म दिया। यमुनाके द्वीपमें अत्यन्त शक्तिशाली पराशरनन्दन व्यास प्रकट हुए ॥ ८३-८४ ॥
स मातरमनुज्ञाप्य तपस्येव मनो दधे । स्मृतोऽहं दर्शयिष्यामि कृत्येष्विति च सोऽब्रवीत् ॥ ८५ ॥ उन्होंने मातासे यह कहा—'आवश्यकता पड़नेपर तुम मेरा स्मरण करना। मैं अवश्य दर्शन दूँगा।' इतना कहकर माताकी आज्ञा ले व्यासजीने तपस्यामें ही मन लगाया ॥ ८५ ॥
एवं द्वैपायनो जज्ञे सत्यवत्यां पराशरात् । न्यस्तो द्वीपे स यद् बालस्तस्माद् द्वैपायनः स्मृतः ॥ ८६ ॥
इस प्रकार महर्षि पराशरद्वारा सत्यवतीके गर्भसे द्वैपायन व्यासजीका जन्म हुआ। वे बाल्यावस्थामें ही यमुनाके द्वीपमें छोड़ दिये गये, इसलिये 'द्वैपायन' नामसे प्रसिद्ध हुए॥ ८६॥ (ततः सत्यवती हृष्टा जगाम स्वं निवेशनम्। तस्यास्त्वायोजनाद् गन्धमाजिघ्रन्ति नरा भुवि॥ दाशराजस्तु तद्गन्धमाजिघ्रन् प्रीतिमावहत्।) तदनन्तर सत्यवती प्रसन्नतापूर्वक अपने घरपर गयी। उस दिनसे भूमण्डलके मनुष्य एक योजन दूरसे ही उसकी दिव्य गन्धका अनुभव करने लगे। उसका पिता दाशराज भी उसकी गन्ध सूँघकर बहुत प्रसन्न हुआ।
दाश उवाच (त्वामाहुर्मत्स्यगन्धेति कथं बाले सुगन्धता। अपास्य मत्स्यगन्धत्वं केन दत्ता सुगन्धता॥) **दाशराजने पूछा—**बेटी! तेरे शरीरसे मछलीकी-सी दुर्गन्ध आनेके कारण लोग तुझे 'मत्स्यगन्धा' कहा करते थे, फिर तुझमें यह सुगन्ध कहाँसे आ गयी? किसने यह मछलीकी दुर्गन्ध दूर कर तेरे शरीरको सुगन्ध प्रदान की है?
सत्यवत्युवाच (शक्तेः पुत्रो महाप्राज्ञः पराशर इति स्मृतः॥ नावं वाह्यमानाया मम दृष्ट्वा सुगर्हितम्। अपास्य मत्स्यगन्धत्वं योजनाद् गन्धतां ददौ॥ ऋषेः प्रसादं दृष्ट्वा तु जनाः प्रीतिमुपागमन्।) **सत्यवती बोली—**पिताजी! महर्षि शक्तिके पुत्र महाज्ञानी पराशर हैं, (वे यमुनाजीके तटपर आये थे; उस समय) मैं नाव खे रही थी। उन्होंने मेरी दुर्गन्धताकी ओर लक्ष्य करके मुझपर कृपा की और मेरे शरीरसे मछलीकी गन्ध दूर करके ऐसी सुगन्ध दे दी, जो एक योजन दूरतक अपना प्रभाव रखती है। महर्षिका यह कृपाप्रसाद देखकर सब लोग बड़े प्रसन्न हुए।
पादापसारिणं धर्मं स तु विद्वान् युगे युगे। आयुः शक्तिं च मर्त्यानां युगावस्थामवेक्ष्य च॥ ८७॥ ब्रह्मणो ब्राह्मणानां च तथानुग्रहकाङ्क्षया। विव्यास वेदान् यस्मात् स तस्माद् व्यास इति स्मृतः॥ ८८॥ विद्वान् द्वैपायनजीने देखा कि प्रत्येक युगमें धर्मका एक-एक पाद लुप्त होता जा रहा है। मनुष्योंकी आयु और शक्ति क्षीण हो चली है और युगकी ऐसी दुरवस्था हो गयी है। यह
सब देख-सुनकर उन्होंने वेद और ब्राह्मणोंपर अनुग्रह करनेकी इच्छासे वेदोंका व्यास (विस्तार) किया। इसलिये वे व्यास नामसे विख्यात हुए ॥ ८७-८८ ॥ वेदानध्यापयामास महाभारतपञ्चमान् । सुमन्तुं जैमिनिं पैलं शुकं चैव स्वमात्मजम् ॥ ८९ ॥ प्रभुर्वरिष्ठो वरदो वैशम्पायनमेव च । संहितास्तैः पृथक्त्वेन भारतस्य प्रकाशिताः ॥ ९० ॥ सर्वश्रेष्ठ वरदायक भगवान् व्यासने चारों वेदों तथा पाँचवें वेद महाभारतका अध्ययन सुमन्तु, जैमिनि, पैल, अपने पुत्र शुकदेव तथा मुझ वैशम्पायनको कराया। फिर उन सबने पृथक्-पृथक् महाभारतकी संहिताएँ प्रकाशित कीं ॥ ८९-९० ॥ तथा भीष्मः शान्तनवो गङ्गायाममितद्युतिः । वसुवीर्यात् सम्भवन्महावीर्यो महायशाः ॥ ९१ ॥ अमिततेजस्वी शान्तनुनन्दन भीष्म आठवें वसुके अंशसे तथा गंगाजीके गर्भसे उत्पन्न हुए। वे महान् पराक्रमी और अत्यन्त यशस्वी थे ॥ ९१ ॥ वेदार्थविच्च भगवानृषिर्विप्रो महायशाः । शूले प्रोतः पुराणर्षिश्चौरश्चौरैरशङ्कया ॥ ९२ ॥ अणीमाण्डव्य इत्येवं विख्यातः स महायशाः । स धर्ममाहूय पुरा महर्षिरिदमुक्तवान् ॥ ९३ ॥ पूर्वकालकी बात है वेदार्थोंके ज्ञाता, महान् यशस्वी, पुरातन मुनि, ब्रह्मर्षि भगवान् अणीमाण्डव्य चोर न होते हुए भी चोरके संदेहसे शूलीपर चढ़ा दिये गये। परलोकमें जानेपर उन महायशस्वी महर्षिने पहले धर्मको बुलाकर इस प्रकार कहा— ॥ ९२-९३ ॥ इषीकया मया बाल्याद् विद्धा ह्येका शकुन्तिका । तत् किल्बिषं स्मरे धर्म नान्यत् पापमहं स्मरे ॥ ९४ ॥ ‘धर्मराज! पहले कभी मैंने बाल्यावस्थाके कारण सींकसे एक चिड़ियेके बच्चेको छेद दिया था। वही एक पाप मुझे याद आ रहा है। अपने दूसरे किसी पापका मुझे स्मरण नहीं है ॥ ९४ ॥ तन्मे सहस्रममितं कस्मान्नेहाजयत् तपः । गरीयान् ब्राह्मणवधः सर्वभूतवधाद् यतः ॥ ९५ ॥ ‘मैंने अगणित सहस्रगुना तप किया है। फिर उस तपने मेरे छोटे-से पापको क्यों नहीं नष्ट कर दिया। ब्राह्मणका वध समस्त प्राणियोंके वधसे बड़ा है ॥ ९५ ॥ तस्मात् त्वं किल्बिषी धर्म शूद्रयोनौ जनिष्यसि । तेन शापेन धर्मोऽपि शूद्रयोनावजायत ॥ ९६ ॥ ‘(तुमने मुझे शूलीपर चढ़वाकर वही पाप किया है) इसलिये तुम पापी हो। अतः पृथ्वीपर शूद्रकी योनिमें तुम्हें जन्म लेना पड़ेगा।' अणीमाण्डव्यके उस शापसे धर्म भी
शूद्रकी योनिमें उत्पन्न हुए ॥ ९६ ॥ विद्वान् विदुररूपेण धर्मी तनुरकिल्बिषी । संजयो मुनिकल्पस्तु जज्ञे सूतो गवलगणात् ॥ ९७ ॥ पापरहित विद्वान् विदुरके रूपमें धर्मराजका शरीर ही प्रकट हुआ था। उसी समय गवलगणसे संजय नामक सूतका जन्म हुआ, जो मुनियोंके समान ज्ञानी और धर्मात्मा थे ॥ ९७ ॥
सूर्याच्च कुन्तिकन्याया जज्ञे कर्णो महाबलः । सहजं कवचं बिभ्रत् कुण्डलो द्योतिताननः ॥ ९८ ॥ राजा कुन्तिभोजकी कन्या कुन्तीके गर्भसे सूर्यके अंशसे महाबली कर्णकी उत्पत्ति हुई। वह बालक जन्मके साथ ही कवचधारी था। उसका मुख शरीरके साथ ही उत्पन्न हुए कुण्डलकी प्रभासे प्रकाशित होता था ॥ ९८ ॥
अनुग्रहार्थं लोकानां विष्णुर्लोकनमस्कृतः । वसुदेवात् तु देवक्यां प्रादुर्भूतो महायशाः ॥ ९९ ॥ उन्हीं दिनों विश्ववन्दित महायशस्वी भगवान् विष्णु जगत्के जीवोंपर अनुग्रह करनेके लिये वसुदेवजीके द्वारा देवकीके गर्भसे प्रकट हुए ॥ ९९ ॥
अनादिनिधनो देवः स कर्ता जगतः प्रभुः । अव्यक्तमक्षरं ब्रह्म प्रधानं त्रिगुणात्मकम् ॥ १०० ॥ वे भगवान् आदि-अन्तसे रहित, द्युतिमान्, सम्पूर्ण जगत्के कर्ता तथा प्रभु हैं। उन्हींको अव्यक्त अक्षर (अविनाशी) ब्रह्म और त्रिगुणमय प्रधान कहते हैं ॥ १०० ॥
आत्मानमव्ययं चैव प्रकृतिं प्रभवं प्रभुम् । पुरुषं विश्वकर्माणं सत्त्वयोगं ध्रुवाक्षरम् ॥ १०१ ॥ अनन्तमचलं देवं हंसं नारायणं प्रभुम् । धातारमजमव्यक्तं यमाहुः परमव्ययम् ॥ १०२ ॥ कैवल्यं निर्गुणं विश्वमनादिमजमव्ययम् । पुरुषः स विभुः कर्ता सर्वभूतपितामहः ॥ १०३ ॥ आत्मा, अव्यय, प्रकृति (उपादान), प्रभव (उत्पत्ति-कारण), प्रभु (अधिष्ठाता), पुरुष (अन्तर्यामी), विश्वकर्मा, सत्त्वगुणसे प्राप्त होने योग्य तथा प्रणवाक्षर भी वे ही हैं; उन्हींको अनन्त, अचल, देव, हंस, नारायण, प्रभु, धाता, अजन्मा, अव्यक्त, पर, अव्यय, कैवल्य, निर्गुण, विश्वरूप, अनादि, जन्मरहित और अविकारी कहा गया है। वे सर्वव्यापी, परम पुरुष परमात्मा, सबके कर्ता और सम्पूर्ण भूतोंके पितामह हैं ॥ १०१—१०३ ॥
धर्मसंवर्धनार्थाय प्रजज्ञेऽन्धकवृष्णिषु । अस्त्रज्ञौ तु महावीर्यौ सर्वशास्त्रविशारदौ ॥ १०४ ॥